राजस्थान की लोकदेवियाँ 

करणी माता-

- जन्म – 1587 ई. (वि.सं.1444)

- स्थान – सुआप गाँव, जोधपुर

- पिता- मेहाजी चारण

- माता- देवल

- बचपन का नाम- रिद्धु बाई/रिद्धि बाई

- करणीमाता का विवाह देशनोक (बीकानेर) निवासी देपाजी बिठू के साथ हुआ ।

- करणीमाता चारणों की कुलदेवी तथा बीकानेर के राठौड़ों की आराध्य देवी है।

- करणी माता ने वैवाहिक जीवन का त्याग कर अपनी बहिन गुलाब का विवाह देपाजी के साथ करवाया।

- देशनोक में करणीमाता का मंदिर स्थित है जो कि बीकानेर से 25 किलोमीटर दूर राष्ट्रीय राजमार्ग 89 पर है।

- नवरात्रों में देशनोक में करणीमाता का मेला लगता है।

- करणीमाता के मंदिर में सफेद चूहों को काबा कहते है, तथा करणी माता देश में चूहों की देवी के रूप में प्रसिद्ध है।

- देशनोक की स्थापना करणी माता ने स्वयं की थी।

- करणी माता ने 12 मई, 1459 को मेहरानगढ़ दुर्ग की नींव अपने हाथों से रखी तथा बीकानेर राज्य की स्थापना भी करणी माता के आशीर्वाद से की गई।

- करणी माता का प्रारंभिक पूजा स्थल बीकानेर में नेहड़ी कहलाता है जो जाल वृक्ष के नीचे स्थित है।

-  करणी माता के मंदिर को मठ कहा जाता है।

- करणी माता का एक रूप सफेद चील भी है।

- महाराजा गंगा सिंह ने करणी माता के मंदिर में चाँदी की किवाड़ चढ़वाये थे।

- लोकमान्यतानुसार करणी माता ने अपनी बहिन गुलाब कुँवरी के पुत्र लाखण को गोद लिया था, जिसकी मृत्यु हो गई थी, जिसे करणी माता ने अपने चमत्कार से पुन: जीवित कर दिया।

- 151 वर्ष की आयु में करणी माता ने 1538 ई. में धिरेरू की तलाई नामक स्थान दियात्रा गाँव बीकानेर में अपने प्राणों का त्याग किया।

तनोट माता (थार की वैष्णो देवी)-

- तनोट माता का मंदिर तनोट, जैसलमेर में स्थित है, इस मंदिर का निर्माण 888 ई. में भाटी शासक तणुराव ने करवाया।

- तनोट माता भाटी शासकों की कुलदेवी है, भारतीय सैनिकों की आराध्य देवी है।

- यहाँ का पुजारी सीमा सुरक्षा बल का जवान होता है।

- तनोटिया माता मंदिर के सामने भारत-पाक युद्ध 1965 ई. में भारत की विजय का प्रतीक विजय स्तम्भ स्थापित है।

- इन्हें रूमाली माता या रूमाली देवी के उपनाम से भी जाना जाता है।

जीण माता(दुर्गा का अवतार)-

- जन्म- धांधू गाँव, चुरू

- बचपन का नाम – जयन्ती/जैवण बाई

- पिता – धांधु

- भाई – हर्ष (भैरव का रूप )

- जीणमाता का मंदिर सीकर के रैवासा में आडावला की पहाडियों पर स्थित है।

- हर्ष पर्वत पर स्थित शिलालेख के अनुसार जीण माता मंदिर का निर्माण पृथ्वीराज चौहान प्रथम के शासन काल में हट्‌टड़ चौहान ने 1064 ई. (वि.स. 1121) में करवाया।

- जीण माता चौहानों कि कुलदेवी व मीणा  जनजाति की आराध्य देवी मानी जाती है

- जीण माता मंदिर के पास जोगी तालाब स्थित है, जहाँ पर पाण्डवों की आदमकद प्रतिमा है।

- जीण माता के गीत (चीरजा) सभी लोकदेवियों में से सबसे लम्बे गीत है जो कनफटे जोगी गाते है।

- ढाई प्याले शराब चढ़ाई जाती थी जिस पर अभी प्रतिबन्ध है।

- यहाँ वर्ष 2003 में इन पर जय जीण नाम से फिल्म बनी थी।

- इनका मेला प्रतिवर्ष चैत्र और आश्विन माह के नवरात्रों में लगता है।

आई माता-

- जन्म स्थान- मालवा।

- पिता – भीरवा डाबी।

- बचपन का नाम – जीजी बाई।

- माण्डु सुल्तान से विवाह के डर से जोधपुर आयी।

- आई माता सीरवी जाति की कुलदेवी है।

- ये रामदेव जी तथा रैदास जी की शिष्या रही।

- आई माता नवदुर्गा का अवतार मानी जाती है।

- आई पंथी आई माता द्वारा बनाये गये 11 नियमों का पालन करते है। अत: इन्हें 11 डोरा पंथी कहते है।

- इनके मंदिर में गुर्जर जाति के लोग प्रवेश नहीं करते है।

- आई माता मंदिर में अखण्ड दीपक जलता है जिसकी जोत से केसर टपकता है।

- माता का थान बडेर कहलाता है, इसमें मूर्ति नहीं होती।

- सीरवी जाति के लोग आई माता के मंदिर को ‘दरगाह’ कहते है।

शीतला माता-

- शीतला माता का मुख्य मंदिर शील की डूँगरी, चाकसू, (जयपुर) में स्थित है।

- शीतला माता के मंदिर को सुहाग मंदिर के नाम से भी जाना जाता है।

- प्रतीक चिह्न- जलता हुआ दीपक/मिट्टी का बर्तन

- शीतला माता को महामाई/बच्चों की संरक्षिका/सैडल माता/ बास्योड़ा की देवी/ चेचक निवारक आदि नामों से जाना जाता है।

- शीतला माता एकमात्र ऐसी देवी है, जिनकी खण्डित मूर्ति की पूजा होती है।

- इनका वाहन गधा होता है।

- इनका पुजारी कुम्हार जाति का होता है।

- चाकसू में शीतला माता के मंदिर का निर्माण सवाई माधोसिंह ने करवाया।

- खेजड़ी को शीतला माता के रूप में भी पूजा जाता है।

- चैत्र कृष्ण अष्टमी को चाकसू, जयपुर में शीतला माता का मेला भरता है।

नोट:- जोधपुर के कागा क्षेत्र में शीतला माता का मेला चैत्र शुक्ल सप्तमी को लगता है।

कैलादेवी-

- करौली के यादव वंश की कुलदेवी है।

- कैलादेवी की भक्ति में लांगुरिया गीत गाये जाते है।

- कैलादेवी का लक्खी मेला चैत्र शुक्ल अष्टमी को त्रिकूट पर्वत पर भरता है।

- कैलादेवी गुर्जरों व मीणाओं की आराध्य देवी है।

- कैलादेवी के मंदिर का निर्माण वर्ष 1900 में गोपालसिंह ने करवाया।

- उपनाम- योगमाया/अंजनी माता।

- कैला देवी मंदिर के सामने ही बोहरा सम्प्रदाय की छतरी है।

- कैला देवी का मंदिर करौली जिले में कालीसील नदी के किनारे त्रिकूट पर्वत पर स्थित है।

 

सारिका माता-

- उपनाम- उष्ट्रवाहिनी देवी।

- राजस्थान की एकमात्र देवी जो ऊँट पर सवार है।

- मधुमेह रोग निवारक देवी।

- पुष्करणा ब्राह्मणों की कुलदेवी

- जोधपुर तथा बीकानेर में इनके कई मंदिर हैं।

नागणेची माता-

- मारवाड़ के राठौड़ वंश की कुलदेवी।

- बाड़मेर का नागाणा गाँव नागणेची देवी का प्रथम धाम रहा।

- इनको महिषासुरमर्दिनी कहा जाता है, तथा इनका दूसरा रूप बाज अथवा चील है।

बाण माता-

- सिसोदिया वंश की कुलदेवी।

- मुख्य मंदिर नागदा, उदयपुर।

सुगाली माता-

- इनकी मूर्ति में 10 सिर और 54 हाथ है।

- आउवा के चम्पावत ठाकुरों की कुलदेवी।

- 1857 की क्रांति की देवी।

चामुण्डा माता-

- दुर्गा माता का सातवां अवतार।

- राठौड़ों की आराध्य देवी।

- इंदा प्रतिहारों की कुलदेवी।

- 30 सितम्बर, 2008 में नवरात्रा के अवसर पर मंदिर में भगदड़ मची थी, जिसमें लगभग 300 लोगों की अकाल मृत्यु हुई। इस दुर्घटना की जाँच के लिए जसराज चौपड़ा कमेटी का गठन किया गया।

प्रमुख राजवंशों की कुलदेवियाँ

माता

जिला

राजवंश

जमुवाय माता

जयपुर

कच्छवाहा राजवंश की आराध्य देवी

ज्वाला माता

जोबनेर

खंगारोतों की कुल देवी

शिला माता

जयपुर

कच्छवाहा राजवंश की आराध्य देवी

बाण माता

उदयपुर

सिसोदिया राजवंश की कुल देवी

शाकम्भरी माता

साँभर

शाकंभरी के चौहानों की कुल देवी

करणी माता

बीकानेर

बीकानेर के राठौड़ों की कुल देवी

अंजना/कैलामाता

करौली

यादव राजवंश की कुल देवी

जीण माता

सीकर

चौहानों की आराध्य देवी

आशापुरा माता

जालोर

जालोर के सोनगरा चौहानों की कुल देवी

राजेश्वरी माता

भरतपुर

भरतपुर जाट वंश की कुल देवी ,

नागणेची माता

जोधपुर

जोधपुर के सम्पूर्ण राठौड़ों की कुल देवी

स्वांगिया माता

जैसलमेर

भाटी राजवंश की कुल देवी

चामुंडा माता

मंडोर (जोधपुर)

गुर्जर प्रतिहार राजवंश की कुल देवी एवं पृथ्वीराज चौहान की आराध्य देवी