जैव-विविधता को सर्वप्रथम वर्ष 1992 में ब्राज़ील के रियो शहर में हुए 'पृथ्वी-सम्मेलन' के दौरान परिभाषित किया गया।
इसमें पृथ्वी समस्त जलीय एवं स्थलीय क्षेत्रों में पाए जाने वाले विभिन्न जीवों तथा उनमें पाई जाने वाली विभिन्नताओं से है।
जैव-विविधता के तीन स्तर –
1. आनुवांशिक जैव-विविधता –
एक ही प्रजाति सदस्यों के बीच पाई जाने वाली विभिन्नताएँ। जैसे - भारत में धान/अनाज की लगभग 50 हजार प्रजातियाँ
राऊल्फिया/सर्पगंधा की प्रजातियाँ, जो हिमालय की अलग-अलग ऊँचाईयों पर पाई जाती हैं, इनमें 'रेसरपीन' एल्केलॉयड की मात्रा भी अलग-अलग पाई जाती है, जो कि आनुवांशिक जैव-विविधता को दर्शाता है।
यह विविधता जीन में विविधता के कारण उत्पन्न होती है।
2. जातीय जैव विविधता –
भारत में पश्चिमी घाट की जैव-विविधता की पूर्वी घाट की तुलना में बहुत ज्यादा है।
जातियों के स्तर पर पाई जाने वाली विभिन्नताएँ।
पश्चिमी घाट में उभयचरों की अधिक जातियाँ पाई जाती है जबकि पूर्वी घाट पर उभयचरों की संख्या कम पाई जाती है।
3. पारिस्थितिकीय जैव-विविधता –
भारत की पारिस्थितिकीय जैव-विविधता, नॉर्वे, स्वीडन जैसे देशों की तुलना में बहुत ज्यादा है। क्योंकि विभिन्न वातावरणीय दशाओं में हमारे यहाँ अलग-अलग पारिस्थितिक तंत्रों में जैव-विविधता भी अधिक।
यह विविधता किसी देश में परिस्थितिकीय स्तर पर पाई जाने वाली विभिन्नता को दर्शाती है।
इन्हें तीन भागों में विभक्त किया गया है-
(i) \(\alpha\) - विविधता ( एल्फा विविधता )
(ii) \(\beta\) - विविधता ( बीटा विविधता )
(iii) \(\gamma\) - विविधता (गामा विविधता )
(i) \(\alpha\) - विविधता ( एल्फा विविधता ) - एक ही आवास/समुदाय में उपस्थित विभिन्न जीवों की विविधता एल्फा विविधता कहलाती है।
उदाहरण - विभिन्न पादपों की जाति के सदस्यों का पाया जाना।
(ii) \(\beta\) - विविधता ( बीटा विविधता ) - अलग-अलग आवास/समुदाय में उपस्थित विभिन्न जीवों की विविधता बीटा विविधता कहलाती है।
उदाहरण - हिमालय पर अलग-अलग अक्षांश पर अलग-अलग प्रकार की वनस्पति पाया जाना।
- स्थल व जल तंत्र में पाई जाने वाली जातियों की विभिन्नता।
(iii) \(\gamma\) - विविधता ( गामा विविधता ) - इसे क्षेत्रीय विविधता भी कहते है।
- इसमें एक क्षेत्र में पाई जाने वाले विभिन्न आवासों की जैव विविधता को शामिल किया गया।


जैव-विविधता का वितरण –
पूरे विश्व में अलग-अलग भागों में जैव-विविधता भी अलग-अलग पाई जाती है, जो कि निम्नलिखित कारकों से स्पष्ट है -
1. अक्षांशीय प्रवणता – भू-मध्य रेखा(Equator) पर तथा इसके आस-पास के क्षेत्रों में सर्वाधिक जैव-विविधता पाई जाती है, क्याेंकि
इस क्षेत्र में प्राकृतिक आवास अत्यधिक विकसित।
ये भू-भाग पृथ्वी पर हिम-युग (ice-age) से अप्रभावित रहा है।
जीव-जंतुओं के लिए प्रचुर मात्रा में भोजन।
विषुवत रेखा से ध्रुवों की ओर जाने पर जैव-विविधता में कमी आती है।
2. जाति-क्षेत्र संबंध – एलेक्जेंडर वॉन हम्बोल्ट के अनुसार - जैसे-जैसे अध्ययन का क्षेत्र बढ़ाते हैं, जैव-विविधता में एक निश्चित सीमा तक ही वृद्धि देखी जाती है। उसके बाद ये स्थिर हो जाती है। इसे ही जाति-क्षेत्र संबंध कहते हैं।
3. समुद्र तल से ऊँचाई के साथ जैव-विविधता में कमी आती है।


विश्व में 12 मेगाबायोडायवर्सिटी देश, जहाँ पर कुल वैश्विक जैव-विविधता का 50-60% भाग पाया जाता है। ये देश - ऑस्ट्रेलिया, मलेशिया, इण्डोनेशिया, चीन, भारत, मेडागास्कर, घाना, पेरु, कोलंबिया, इक्वेडोर, मैक्सिको एवं ब्राज़ील।
हाल ही में 5 नए मेगाबायोडायवर्सिटी देशों की पहचान की गई है, जो इस प्रकार हैं - यूएसए, वेनेजुएला, दक्षिण अफ्रीका, फिलीपींस, पपुआ न्यू गिनी।
अत: वर्तमान में 17 मेगा बायोडायवर्सिटी देश।
वास्तव में जातीय समृद्धि और वर्गीकरण पद या जीव समूह की किस्मों के क्षेत्र के बीच का संबंध आयताकार अतिपरवलय के रूप में प्रकट होता है इस संबंध को लघुगणक स्केल में सीधी रेखा में प्राप्त होता है।

महत्त्व -
(i) अधिक उत्पादकता में
(ii) स्थिरता में
(iii) पारिस्थितिक स्वस्थता
रिवेट पोपर परिकल्पना -
पारिस्थितिक स्वस्थता को समझाने के लिए स्टैडफोर्ड के पारिस्थितिक विद पॉल एहरलिक ने अपनी रिवेट पोपर परिकल्पना प्रस्तुत की थी।
इस परिकल्पना में परितंत्र की जातियों की तुलना वायुयान में लगे रिवेट से की है।
इनके अनुसार यदि किसी वायुयान में लगे रिवेटों को उसमें बैठे यात्री ही अपने घर ले जाएँ तो वायुयान उड़ने योग्य नहीं रहेगा।
इस परिकल्पना में वायुयान को पारितंत्र, रिवेट को जाति व यात्रियों के द्वारा रिवेट ले जाने को जातियो के लुप्त होने के रूप में समझाया है।
जैव-विविधता के तप्त स्थल (Hot-Spots of biodiversity) –
इनके बारे में डॉ. नॉर्मन मेयर्स ने बताया।
ये जैव-विविधता समृद्ध क्षेत्र है, जहाँ लगभग 50% जैव-विविधता नष्ट हो चुकी है तथा कम से कम 1500 संवहनी पौधों (vascular plants) की प्रजातियाँ पाई जाती हैं।



जैव-विविधता में क्षति के प्रमुख कारण –
1. आवासीय विखण्डन (Fregmentation of Habitat) –
मानवीय गतिविधियों या प्राकृतिक कारणों से जब जीवों के प्राकृतिक आवास नष्ट होने लगते हैं, तो जीवों की प्रजातियाँ धीरे-धीरे विलुप्त होने लगती है, जिससे जैव-विविधता में कमी आने लगती है।
अमेज़न वर्षा वनों में सोयाबीन की खेती व चारागाह विकास हेतु इन वनों की कटाई की गई, जिससे यहाँ के हजारों जीवों की प्रजातियाँ हमेशा के लिए विलुप्त हो गई।
अमेजन को पृथ्वी के फेफड़े भी कहा जाता है।
2. अतिदोहन (Over exploitation) – जब मानवीय आवश्यकताएँ लालच में बदलती हैं, तो वह प्राकृतिक संसाधनों का अतिदोहन करने लगता है, जिससे इन संसाधनों पर निर्भर जीवों का अस्तित्व ही संकट में आ जाता है।
3. विदेशी जातियों का आक्रमण – कई बार जीव किसी नए वातावरण में पहुँच कर तेजी से वृद्धि करने लगता है तथा स्थानीय प्रजातियों के अस्तित्व पर संकट उत्पन्न कर देता है, जिससे स्थानीय जैव-विविधता में कमी आने लगती है। उदाहरण -
1. जलकुंभी(Water Hycinth) को भारत में सजावटी पौधे के रूप में लाया गया, परंतु ये भारत में खरपतवार के रूप में तेजी से वृद्धि करने लगा तथा स्थानीय जलीय पारिस्थितिक तंत्रों को नष्ट करने लगा।
2. लान्टाना केमेरा -
यह अमेरिका से लाई गई एक उष्णकटिबंधीय झाड़ी है।
ये खरपतवार के रूप में हानिकारक प्रभाव दिखा रही है।
3. कांग्रेस घास/गाजर घास -
इनका वानस्पतिक नाम पार्थेनियम हिस्टेरोफोरस है।
यह एक खतरनाक खरपतवार है, जो त्वचीय बीमारियों तथा अस्थमा जैसी बीमारियों को बढ़ावा दे रही है।
4. नाइलपर्च -
यह नील नदी की मछली है, जिसे दक्षिणी अफ्रीका की विक्टोरिया झील में डाला गया परन्तु परभक्षी मछली ने अपनी संख्या इतनी बढ़ाई की विक्टोरिया झील में रहने वाली सिचलिड मछलियों की कई जातियों को नष्ट कर दिया।
5. अफ्रीकन कैटफिश -
इनका वानस्पतिक नाम कलोरियस गैरीपाइनस है।
यह देशी प्रजाति की कैटफिश के अस्तित्व के लिए खतरा बन गई है।
4. सहविलुप्तता – दो या दो से अधिक जीवों की प्रजातियाँ, जो आपस में एक-दूसरे पर निर्भर हों, यदि उनमें से एक जीव की प्रजाति नष्ट हो जाए तो दूसरे जीवों की संख्या में कमी आने लगती है।
5. विक्षुब्धन - जीवों के प्राकृतिक आवासों में आने वाले परिवर्तन को विक्षुब्धन कहते है।
सूखा पड़ने, बाढ़, पेड़ों की कटाई, खनन के कारण विक्षुब्धन होता है।
जैव-विविधता संरक्षण –
1. स्वस्थाने संरक्षण (In-Situ conservation) – जीव का प्राकृतिक आवास में संरक्षण। उदाहरण - राष्ट्रीय उद्यान, बायोस्फीयर रिज़र्व, वन्य जीव अभयारण्य, पवित्र उपवन एवं झीलें।
जैव विविधता हॉट स्पॉट (तप्तस्थल) -
वर्ष 1988 में नॉर्मन मेयर ने इस संकल्पना के बारे में बताया था।
इसमें उन क्षेत्रों को रखा जाता है जिसमें अत्यधिक जातीय समृद्धि होती है तथा उच्च स्थानिकता दर्शाती है।
सर्वप्रथम 25 हॉट-स्पॉट थे।
वर्तमान में सम्पूर्ण विश्व में 35 जैव विविधता हॉट-स्पॉट है।
भारत में तीन जैव विविधता स्थल है। (वर्तमान - 4)
1. पश्चिमी घाट
2. पूर्वी हिमालय
3. इंडो-बर्मा क्षेत्र
4. सुंडालेंड (अंडमान- निकोबार द्वीप समूह )
राष्ट्रीय उद्यान -
इनका निर्माण केन्द्र सरकार द्वारा किया जाता है लेकिन रखरखाव व व्यवस्था की जिम्मेदारी राज्य सरकार को सौंपी गई है।
ये सरकार द्वारा घोषित किए गए आवास परिरक्षण क्षेत्र है जहाँ पर वन्य जातियों को संरक्षित किया जाता है।
भारत में कुल 108 राष्ट्रीय उद्यान है।
राजस्थान में कुल तीन राष्ट्रीय उद्यान है -
1 मुकुंदरा हिल्स (दर्रा) राष्ट्रीय उद्यान
2 रणथम्भौर राष्ट्रीय उद्यान
3 केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान
4 मरु राष्ट्रीय उद्यान (नाममात्र)
जैव मण्डल प्रारक्षण (बायोस्फीयर रिजर्व)
ये बहुउद्देशीय प्रतिबंधित सुरक्षित क्षेत्र है जो जैव विविधता (आनुवांशिक) को संरक्षित करते हैं।
इनकी जन्तु, पादपों के साथ मूल आदिवासियों लोगों को रहने की अनुमति होती है।
इनके तीन भाग होते हैं-
1. कोर अनुक्षेत्र - किसी भी मानवीय क्रिया या हस्तक्षेप की अनुमति नहीं।
2. बफर अनुक्षेत्र - मानवीय क्रियाओं की सीमित अनुमति।
3. कुशलयोजना अनुक्षेत्र (Manipulation) - इसमें मानव के लाभकारी उत्पादों को प्राप्त करने की पूर्ण अनुमति के साथ-साथ पारिस्थितिक तंत्र की क्षति की अनुमति नहीं होती है।
बायोस्फेयर प्रारक्षण कार्यक्रम वर्ष 1971 में प्रारंभ हुआ था।
प्रथम बायोस्फेयर क्षेत्र का निर्माण यूनेस्को के मनुष्य तथा जीवमण्डल कार्यक्रम (MAB) के अन्तर्गत किया है।
UNESCO तथा UNEP दोनों ने संयुक्त रूप से टास्कफोर्स का गठन किया जिसमें वर्ष 1981 में बायोस्फेयर प्रारक्षण के उद्देश्य बताए।
2. बाह्य स्थाने संरक्षण (Ex-Situ Conservation) – जीव का प्राकृतिक आवास के बाहर संरक्षण।
1. जंतु उद्यान
2. वानस्पतिक उद्यान
3. जन्तु घर
4. निम्न ताप परिरक्षण (क्रायोप्रिजर्वेशन)
5. प्रयोगशालाएँ
6. जीन बैंक
7. बीज बैंक/वीर्य बैंक/युग्मक बैंक
8. पात्रे निषेचन
9. ऊतक संवर्धन
क्रायोप्रिजर्वेशन (निम्नताप परिरक्षण) में जीवों के युग्मकों, बीजों तथा बीजाणुओं को - 1960c ताप पर द्रव N2 (द्रव नाइट्रोजन) में रखा जाता है।
पात्रे निषेचन में दो उच्च श्रेणी के विशिष्ट जाति के नर व मादा युग्मकों का निषेचन परखनली या प्रायोगिक पात्र में कराया जाता है।
ऊतक संवर्धन तकनीक में कायिक कोशिकाओं/ऊतकों का कृत्रिम माध्यम में संवर्धन करवाकर जाति विशेष के जीवों की संख्या को बढ़ाया जाता है।


सतत विकास
(Sustainable development)
धारणीय/संवहनीय विकास
UNCED (संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण एवं विकास सम्मेलन) के अनुसार सतत् विकास ऐसी विकास प्रक्रिया है, जिसमें वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं को पूरा किया जा सके तथा भविष्य की पीढ़ियों को न करना पड़े।
ब्रूटलैण्ड आयोग (1987) की रिपोर्ट 'Our common future'/हमारा साझा भविष्य में सभी मनुष्यों की बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा करते हुए सभी को अच्छा जीवन जीने के अवसर मिले, ऐसा विकास 'सतत् विकास' कहलाता है।
एडवर्ड बारबियर के अनुसार विकास की वह प्रक्रिया, जिससे गरीबों के जीवन के भौतिक मानकों में सुधार लाया जा सके, सतत् विकास कहलाता है।
हरमन डेली के अनुसार सतत् विकास निम्नलिखित 4 कारकों से संभव है -
(i) जनसंख्या नियंत्रण
(ii) प्रदूषण नियंत्रण
(iii) विज्ञान एवं तकनीकी का प्रयोग
(iv) संसाधनों का सीमित प्रयोग
वैश्विक स्तर पर वर्ष 1992 में ब्राज़ील के रियो शहर में हुए 'पृथ्वी सम्मेलन' सर्वप्रथम सतत् विकास के लिए 21वीं सदी में विकास प्रक्रिया के लिए 'सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्य' (Millenium development goals) रखे गए, जिन्हें सन् 2015 तक प्राप्त करना (एजेण्डा-21) था।
दक्षिण अफ्रीका के जोहान्सबर्ग में सतत विकास पर विश्व शिखर सम्मेलन हुआ था।
दिसंबर 2015 में MDG की लक्ष्य अवधि समाप्त होने से पूर्व ही सितंबर 2015 में न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र की साधारण सभा में नए विकास लक्ष्यों को 'सतत् विकास के लक्ष्य' (Sustainable development goals : SDG) निर्धारित किया।
सतत् विकास के 17 लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं, जिन्हें 'एजेण्डा-30' के नाम से जाना जाता है। इन्हें दिसंबर 2030 तक प्राप्त करना है।
नोट -
अंतर्राष्ट्रीय जैव-विविधता दिवस 22 मई को मनाया जाता है।
वर्ष 2020 के जैव-विविधता दिवस की थीम - Our solutions in Nature
वर्ष 2019 के जैव-विविधता दिवस की थीम - Our biodiversity, our food, our Health.
जैव-विविधता शब्द = W.G. रोज़ेन
इस शब्द को प्रसिद्ध बनाया - एडवर्ड विल्सन
Super Year for biodiversity - वर्ष 2020