वेशभूषा एवं आभूषण

• पुरुषों के वस्त्र :-

जामायह वस्त्र गर्दन से लेकर घुटनों तक पहना जाता है।

मुगलकाल में जामा गर्दन से लेकर पैरों के टखने तक पहना जाता था इसे अकबरी जामा कहा जाता था।

पायजामाकमर से लेकर पैरों के टखने तक पहने जाने वाला वस्त्र।

आतमसुखयह सर्दियों में पहना जाने वाला वस्त्र, इसकी तुलना कश्मीरी फिरन से की जाती है।

घूघीयह वर्षा काल में पहने वाला वस्त्र है।

अगंरखा/अंगरखी/बुगत्तरीयह शरीर के ऊपरी भाग पर पहने जाने वाला वस्त्र है।

अचकनयह अंगरखी का विकसित रूप है।

चुगा/चौगायह अंगरखी के ऊपर पहना जाने वाला वस्त्र।

कमरबन्द/पटका यह चौगा को कमर से बांधने वाला वस्त्र जिसमें कटार या तलवार रखी जाती थी।

धोती यह सफेद रंग का वस्त्र है जो कमर पर पहनी जाती है।

पछेवड़ापुरुषों के द्वारा सर्दी में ओढ़ा जाने वाला वस्त्र।

डौछीयह जामा वस्त्र की तरह पहना जाता है, सर्वाधिक मेवाड़ में प्रचलित है।

अंगोछापुरुषों के कन्धे पर रखा जाने वाला वस्त्र।

बिरजस/ब्रिचेसचूड़ीदार पायजामे के स्थान पर प्रयोग किया जाने वाला वस्त्र।

 

नान्दणा आदिवासी महिलाओं का सबसे प्राचीन वस्त्र। यह आसमानी रंग की साड़ी है।

जामसाई साड़ी विवाह के अवसर पर दुल्हन द्वारा पहने वाला वस्त्र

कटकीअविवाहित बालिकाओं की ओढ़नी

ताराभांत की ओढ़नीआदिवासी महिलाओं का सबसे प्रिय वस्त्र।

ज्वार भांत की ओढ़नी

चूनड़भीलों की चूनड़ प्रसिद्ध है। यह एक प्रकार की ओढ़नी है।

केरी भांत की ओढ़नी

रेन शाही साड़ी

कछाबूआदिवासी महिलाओं द्वारा कमर से घुटनों तक पहने वाला वस्त्र।

दामड़ीयह मारवाड़ क्षेत्र में महिलाओं द्वारा पहने जाने वाली लाल रंग की साड़ी।

पेसवाजशरीर के ऊपरी भाग से लेकर नीचे तक ढकने वाला परिपूर्ण वस्त्र।

तिलका मुस्लिम महिलाओं द्वारा चूड़िदार पायजामे पर पहना जाने वाला वस्त्र।

राजस्थान में पगड़ीयों का एकमात्र संग्रहालय उदयपुर में पिछोला झील के किनारे बागोर की हवेली में है, जिसमें विश्व की सबसे बड़ी पगड़ी सुरक्षित है।

जोधपुर के कोट-पेन्ट को राष्ट्रीय पोशाक का दर्जा प्राप्त है।

मेवाड की पगड़ी और मारवाड़ का साफा प्रसिद्ध हैं।

मेवाड़ की उदयशाही पगड़ी तथा जोधपुरी साफा कशीदाकारी के लिए प्रसिद्ध हैं।

मंदील पगड़ी – यह दशहरें के पर्व पर पहनी जाने वाली पगड़ी है।

मोठड़े की पगड़ी – विवाह के अवसर पर पहने जाने वाली पगड़ी।

छापद्वार – मेवाड़ में पगड़ी बांधने वाले व्यक्ति को छापद्वार कहते हैं।

जयपुर की झाड़शाही/राजाशाही पगड़ी प्रसिद्ध है।

मेवाड़ की प्रचलित पगड़ियाँ :-

  1. अमरशाही पगड़ी – महाराणा अमरसिंह-I
  2. अरसी शाही पगड़ी – महाराणा अखैसिंह
  3. उदयशाही – महाराणा उदयसिंह
  4. स्वरूपशाही – महाराणा स्वरूपसिंह
  5. भीमशाही – महाराणा भीमसिंह
  1. जसवन्तशाही पगड़ी – महाराजा जसवन्तसिंह-I
  2. सरदारशाही – महाराजा सरदारसिंह
  3. उम्मेदशाही – महाराजा उम्मेदसिंह
  4. गजशाही- महाराजा गजसिंह
  1. पगड़ियाँ :-

 

  1. लहरिया पगड़ी :- तीज के त्योहार पर पहने जाने वाली पगड़ी।
  2. मंदील पगड़ी :- दशहरे के अवसर पर पहने जाने वाली पगड़ी।
  3. मोठडे़ की पगड़ी :- विवाह/उत्सव के अवसर पर पहने जाने वाली पगड़ी।

 

 

  1. बरखारमा पाग – मेवाड़ की सर्वाधिक प्रचलित पाग।
  2. उदयशाही पगड़ी – महाराणा उदयसिंह के काल में प्रचलित।
  3. अमर शाही पगड़ी – महाराणा अमरसिंह के काल में प्रचलित।
  4. अरसी शाही पगड़ी – महाराणा अरिसिंह के काल में प्रचलित।
  5. भीमशाही पगड़ी – महाराणा भीमसिंह के काल में प्रचलित।
  6. स्वरूप शाही पगड़ी – महाराणा स्वरूपसिंह के काल में प्रचलित।

 

राजस्थान के आभूषण

 

पुरुषों के आभूषण:-

बच्चों के आभूषण-

• स्त्रियों के आभूषण-

सिर के आभूषण:- शीशफूल, मेमंद, बोर, रखड़ी, टिकड़ा, काचर, खींच, गेडी, गोफण, चाँद-सूरज, तीबगट्टौ, थुंडी, मैण, मोडियौ, मोरमीडंली, सरकयारौ मोली, बोरला, टीका, झेला, सांकली, खेंचा, तावित, दामनी, टिडीभलकौ, सिवतिलक, सोहली आदि।

कान के आभूषण:- कर्णफूल, पीपलपत्र, अंगोट्या, लटकन, बाली, टॉप्स, सुरलियाँ, मोरफवर, बारेठ, ओगनियाँ, कुंडला, लूंग, भचूरिया, टोटी, जमेला, कोकरूं, कुड़कली, खींटली, गुड़दौ, छेलकड़ी, झूंटणौ, ठोरियौ, डरगलियौ/डुरगली, बूझली, माकड़ी, मुरकी, वेड़लौ, संदोल, सुरगवाळी आदि।

नाक के आभूषण:- नथ, बारी, कांटा, भोगली, बुलाक, लटकन, चोप, कोकौ, खीवण, नकफूल, नकेसर, वेण, वेसरि, बलनी, लौंग आदि।

गले के आभूषण:- गळपटियौ, गळबंध, तखति, तगतगई, थेड्यो, थमण्यो, तेड्यो, मूँठया, झालरा, खाँटला, ठुस्सी, कंठी, नक्कस, निंबोळी, निगोदर, पंचलड़ी, पंचमाणियौ, पटियौ, तिमणियाँ, तुलसी, बजट्टी, मांदलिया, हांसली, चंद्रहार, कंठहार, हांकर, सरी, टेवटौ, ताबीज, तेवटियौ, तांतणियौ, मंगलसूत्र, रूचक, हालरियो, हौदळ, बाड़ली, बटण, खींवली, खूंगाळी, छेड़ियौ, हमेल, खंगवारी, रामनामी, चम्पाकली, जुगावली, चोकी, चन्द्रमाला, मटरमाल, मोहरन, गुलीबन्द, हार आदि।

हाथ के आभूषण- अणंत, बाजूबन्द, हारपान, ठ्डडा, गजरा, आरत, तकमा, चूड़ला, नवरतन, चूड़ियाँ, नोगरी, मौकड़ी, पछेली, गोखरु, पाटला, कंगन, पूंचिया, गजरौ, तॉती, दुड़ी, नवग्रही, पुणची (पौंचा), माठी, मूठियौ, पट, कँकण, चूड़ा, बंगड़ी, चूड़ी, कड़ा, हथफूल, खंजरी, आरसि, चूड़ियाँ, छैलकड़ौ, दुगड़ी, बाजूजोसण, सूतड़ौ, सोवनपान, हाथुली, अंगुठी, मूंदड़ी, बींटी, दामणा, हथपान, अरसी, छल्ला, छाप आदि।

कमर के आभूषण- तगड़ी, वसन, करधनी, कन्दोरा, सटका, कंदीरा, कणकती, जंजीर, चौथ आदि।

पैर के आभूषण:- पायजेब, पायल (रमझोल), नेवरी, नुपुर, पैंजनिया, टनका, हिरना मैन, लछने, घुंघरु, तेघड़, आंवला, कड़ा, लंगर, झांझर, टनका जीवी, तोड़ा-छोड़ा, अणवट, पंजा, अंगूथळौ, अणोटपोल, कड़लौ, झंकारतन, टणकौ, टोडरौ, तोड़ौ, तोड़ासाट, मकियौ, मसूरियौ, रोळ, लछौ, हीरानामी, बीछियां, फोलरी, गोर, पगपान, गोळया, गूठलौ, दोळीकियौं, नखलियौं, नखालियौं आदि। पैरों की अँगुलियों में केवल विवाहित स्त्रियाँ ही यह आभूषण धारण कर सकती है।

बिछिया- इसे चूटकी अथवा छल्ला भी कहते हैं, यह सुहाग का प्रतीक है। बिछिया को पाँव के अंगूठे के पास वाली अंगुली में पहना जाता है।