संत एवं सम्प्रदाय

हिन्दू धर्म राजस्थान प्रदेश का मुख्य धर्म है। हिन्दू धर्म के अंतर्गत विष्णु पूजक अर्थात वैष्णव धर्म में आस्था रखने वाले लोगों की संख्या सर्वाधिक है। वैष्णवों के अतिरिक्त शैव एवं शाक्त मतावलम्बी भी प्रदेश में न्यून संख्या में निवास करते हैं। वैष्णव, शैव एवं शाक्त तीनों ही मत अनेक पंथों एवं सम्प्रदायों में बंटे हुए हैं।

सगुण सम्प्रदाय

निर्गुण सम्प्रदाय

रामानुज सम्प्रदाय

विश्नोई सम्प्रदाय

वल्लभ सम्प्रदाय

जसनाथी सम्प्रदाय

निम्बार्क सम्प्रदाय

दादू सम्प्रदाय

नाथ सम्प्रदाय

रामस्नेही सम्प्रदाय

गौड़ीय सम्प्रदाय

परनामी सम्प्रदाय

पाशुपत सम्प्रदाय

निरंजनी सम्प्रदाय

निष्कलंक सम्प्रदाय

कबीरपंथी सम्प्रदाय

चरणदासी सम्प्रदाय

लालदासी सम्प्रदाय

मीरादासी सम्प्रदाय

 

वैष्णव धर्म एवं उसके सम्प्रदाय :-

वैष्णव :- विष्णु के उपासक

वैष्णव धर्म के विषय में प्रारम्भिक जानकारी उपनिषदों से मिलती है। वैष्णव धर्म को भागवत धर्म भी कहा जाता है।

प्रवर्तक :- वासुदेव श्रीकृष्ण

आधार :- अवतार

विष्णु के 14 अवतार हैं। मत्स्य पुराण में इसके 10 अवतारों का वर्णन हैं।

सबसे पवित्र अवतार :- वराह का अवतार

दक्षिण भारत में वैष्णव भक्ति आन्दोलन को सक्रिय करने में तमिल के आलवार सन्तों ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

एकमात्र महिला आलवार सन्त :- अंडाल

दिव्य प्रबंधम:- 12 आलवार सन्तों की काव्य रचना।

राजस्थान में वैष्णव धर्म का सर्वप्रथम उल्लेख द्वितीय शताब्दी ईसा पूर्व के घोसुण्डी अभिलेख में मिलता है।

वैष्णव धर्म के सम्प्रदाय :- (i) रामानुज सम्प्रदाय (ii) रामानन्दी सम्प्रदाय (iii) निम्बार्क सम्प्रदाय (iv) वल्लभ सम्प्रदाय (v) ब्रह्म या गौड़ीय सम्प्रदाय

(i) रामानुज सम्प्रदाय :-

प्रवर्तक :- रामानुजाचार्य द्वारा 11वीं सदी में।

इस दर्शन में राम को परब्रह्म मानकर उसकी पूजा-आराधना की जाती है।

रामानुजाचार्य मुक्ति का मार्ग ज्ञान को नहीं मानकर भक्ति को मानते हैं। वे सगुण ब्रह्म की उपासना में विश्वास रखते हैं।

रामानुज सम्प्रदाय का उत्तर भारत में प्रमुख पीठ उत्तर तोताद्रि-अयोध्या मठ एवं गलताजी (जयपुर) है।

रामानुजाचार्य का जन्म 1017 ई. में तमिलनाडु के तिरुपति नगर में हुआ था। इनके गुरु यमुनाचार्य थे। इन्होंने ब्रह्मसूत्र पर ‘श्री भाष्य’ की रचना की तथा भक्ति का नया दर्शन ‘विशिष्टाद्वैतवाद’ प्रारम्भ किया। श्रीरामानुजाचार्य ने ‘श्री’ सम्प्रदाय चलाया। रामानुज के क्रियाकलापों का प्रमुख केन्द्र श्रीरंगपट्टनम एवं काची था।

(ii) रामानन्दी सम्प्रदाय :- श्री राघवानंद जी के शिष्य रामानन्द पहले संत थे जिन्होंने दक्षिण भारत से उत्तर भारत में भक्ति परम्परा की शुरुआत की। रामानन्द द्वारा उत्तरी भारत में प्रवर्तित मत ‘रामावत’ या ‘रामानन्दी सम्प्रदाय’ कहलाया।

इस सम्प्रदाय में ‘ज्ञानमार्गी राम भक्ति की प्रधानता’ थी।

रामानन्द ऊँच-नीच, जाति-पाँति एवं छुआछूत के प्रबल विरोधी थे।

रामानन्द के शिष्य :- संत कबीर (जुलाहा), पीपा (दर्जी), धन्ना (जाट), रैदास (चर्मकार), सेना (नाई), सुरसुरी, पद्मावती, सुखानंद आदि।

रामानंद की भक्ति दास्य भाव की थी।

इस सम्प्रदाय में श्रीराम-सीता की शृंगारिक जोड़ी की पूजा की जाती है।

राजस्थान में रामानंदी सम्प्रदाय का प्रवर्तन संत श्री कृष्णदास जी ‘पयहारी’ ने किया, जो अनन्तानंद जी के शिष्य थे।

राजस्थान में रामानन्दी सम्प्रदाय की प्रमुख पीठ गलताजी (जयपुर) में है। पयहारी के शिष्य अग्रदास जी ने 16वीं सदी में सीकर के पास रेवासा ग्राम में इस सम्प्रदाय की अन्य पीठ स्थापित की।

अग्रदास जी ने रसिक सम्प्रदाय की स्थापना की। इस पंथ में सीता एवं राम की शृंगारिक जोड़ी की पूजा की जाती है।

रसिक सम्प्रदाय का प्रमुख ग्रन्थ :- ध्यान मंजरी (अग्रअली द्वारा रचित)

- जयपुर के संस्थापक सवाई जयसिंह ने रामानन्दी सम्प्रदाय को पश्रय दिया तथा राजकवि श्रीकृष्ण भट्ट कलानिधि से ‘राम रासा’ ग्रन्थ की रचना करवाई।

- रसिक सम्प्रदाय को जानकी सम्प्रदाय, सिया सम्प्रदाय तथा रहस्य सम्प्रदाय भी कहा जाता है।

(iii) निम्बार्क सम्प्रदाय :-

अन्य नाम :- हंस सम्प्रदाय / सनकादि सम्प्रदाय

प्रवर्तक :- आचार्य निम्बार्क (12वीं सदी में)

- रचित भाष्य :- वेदान्त पारिजात।

- प्रवर्तित दर्शन :- द्वैताद्वैत या भेदाभेद।

- इस सम्प्रदाय में राधा को श्रीकृष्ण की परिणीता माना जाता है तथा युगल स्वरूप की मधुर सेवा की जाती है।

- आचार्य निम्बार्क द्वारा लिखित ग्रंथ :- दशश्लोकी। (राधा एवं कृष्ण की भक्ति पर बल)

- हरिव्यास – देवाचार्य जी इस सम्प्रदाय के प्रमुख संत थे।

- सम्प्रदाय की प्रमुख पीठ :- सलेमाबाद (अजमेर)। इस पीठ की स्थापना आचार्य परशुराम जी देवाचार्य द्वारा की गई।

- सखी सम्प्रदाय :- निम्बार्क सम्प्रदाय के संत हरिदासजी ने कृष्ण भक्ति के ‘सखी सम्प्रदाय’ का प्रवर्तन किया। इनके अनुयायी श्रीकृष्ण की भक्ति उन्हें सखा मानकर करते हैं।

(iv) वल्लभ सम्प्रदाय :- कृष्ण भक्ति का मत।

प्रवर्तक :- वल्लभाचार्य (16वीं सदी में)

वल्लभाचार्य को विजयनगर शासक कृष्णदेवराय ने ‘महाप्रभु’ की उपाधि से विभूषित किया।

रचित भाष्य :- अणु भाष्य

प्रवर्तित दर्शन :- शुद्धाद्वैतवाद

- ‘पुष्टिमार्ग’ सम्प्रदाय का प्रवर्तन किया। ‘पुष्टिमार्ग’ का अर्थ होता है – ईश्वर की कृपा। इस सम्प्रदाय में भक्ति को रस के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है।

- वल्लभाचार्य के पुत्र विट्ठलनाथ जी ने ‘अष्टछाप कवि मंडली’ का संगठन किया।

- वल्लभाचार्य को वैश्वानरावतार (अग्नि का अवतार) कहा गया है।

- वल्लभ सम्प्रदाय की प्रमुख पीठ :- नाथद्वारा। (बनास नदी के तट पर बसा)

1669 ई. में मेवाड़ महाराणा राजसिंह के समय श्रीनाथजी की प्रतिमा वृन्दावन से सिंहाड़ (नाथद्वारा) लाई गई।

- इस सम्प्रदाय में मूर्तियों की प्राण-प्रतिष्ठा या स्थापना न करके कृष्ण के बालरूप की उपासना ‘सेवा’ के रूप में की जाती है।

- ‘हवेली संगीत’ इस सम्प्रदाय की प्रमुख विशेषता है।

- वल्लभ सम्प्रदाय (पुष्टिमार्ग) की सात पीठें -

(क) मथुरेश जी – कोटा

(ख) विट्ठलनाथ जी – नाथद्वारा (राजसमन्द)

(ग) द्वारकाधीश जी – कांकरोली (राजसमन्द)

(घ) गोकुलनाथ जी – गोकुल (UP)

(ड) गोकुलचन्द्र जी – कामां (भरतपुर)

(च) बालकृष्ण जी – सूरत (गुजरात)

(छ) मदनमोहन जी – कामां (भरतपुर)

- नाथद्वारा स्थित श्रीनाथ जी के मंदिर में मुख्य मंदिर की छत आज भी खपरैल की ही बनी हुई है। निजमंदिर के ऊपर कलश, सुदर्शन चक्र और सप्त ध्वजा है।

- किशनगढ़ के शासक सावंतसिंह इस सम्प्रदाय के इतने भक्त हो गए कि समस्त राजपाट छोड़कर वृन्दावन चले गए तथा कृष्ण भक्ति में लीन हो गये तथा अपना नाम ही ‘नागरीदास’ रख लिया।

- पुष्टिमार्गीय उपासना पद्धति में भक्ति को साध्य माना गया है।

- ध्यातव्य है कि वल्लभ सम्प्रदाय के प्रवर्तक वल्लभाचार्य के पिता का नाम लक्ष्मण भट्ट तथा माता का नाम इल्लमागारु था।

- विट्ठलनाथ जी ने सूरदास जी को ‘पुष्टिमार्ग का जहाज’ की संज्ञा दी।

- पुष्टिमार्ग भगवान श्रीकृष्ण का सम्बन्धित मत है।

(v) ब्रह्म या गौड़ीय सम्प्रदाय :-

- प्रवर्तक :- स्वामी मध्वाचार्य (12वीं सदी में)

- रचित भाष्य :- पूर्ण प्रज्ञ भाष्य

- दर्शन :- द्वैतवाद

- उनके अनुसार ईश्वर सगुण है तथा वह विष्णु है। उसका स्वरूप सत्, चित् और आनन्द हैं।

- इस सम्प्रदाय को नया रूप देकर प्रवर्तित करने व जन-जन तक फैलाने का कार्य बंगाल के ‘गौरांग महाप्रभु चैतन्य’ ने किया।

- चैतन्य का जन्म नदिया (बंगाल) में हुआ तथा बचपन का नाम निमाई था।

- प्रमुख पीठ :- गोविन्द देवजी का मंदिर (जयपुर)। इस मंदिर का निर्माण सवाई जयसिंह ने करवाया था।

- गौड़ीय सम्प्रदाय का अन्य प्रसिद्ध मंदिर करौली में ‘मदनमोहन जी का मंदिर’ है।

- गौड़ीय सम्प्रदाय में ‘राधा-कृष्ण’ के युगल स्वरूप की पूजा की जाती है।

- ‘सहज पंथ’ गौड़ीय सम्प्रदाय की एक शाखा है जिसमें भजन व साधना के लिए एक सुन्दर व परकीया स्त्री की आवश्यकता होती है।

- आमेर के राजा मानसिंह इस सम्प्रदाय के अनुयायी थे।

शैव सम्प्रदाय :- भगवान शिव के उपासक।

ऋग्वेद में शिव के लिए रुद्र देवता का उल्लेख है। अथर्ववेद में शिव को भव, पशुपति या भूपति कहा गया है। शिवलिंग पूजा का पहला स्पष्ट वर्णन मत्स्य पुराण में मिलता है।

- नयनार :- दक्षिण भारत में शैव धर्म का प्रचार-प्रसार करने वाले नयनार कहलाते हैं। नयनार सन्तों की कुल संख्या 63 थीं।

- शैव मत के चार सम्प्रदाय :-

(i) कापालिक (ii) पाशुपात (iii) लिंगायत (वीरशैव) (iv) काश्मीरक

(i) कापालिक सम्प्रदाय :- इस सम्प्रदाय में भैरव को शिव का अवतार मानकर पूजा की जाती है। इस सम्प्रदाय के साधु तांत्रिक व श्मसानवासी होते हैं और अपने शरीर पर भस्म लपेटते हैं। इनके छ: चिह्न माला, भूषण, कुण्डल, रत्न, भस्म एवं उपवीत मुख्य हैं।

(ii) पाशुपत सम्प्रदाय :- प्रवर्तक :- लकुलीश। इस मत में लकुलीश को शिव का 28वाँ एवं अंतिम अवतार माना जाता है। मेवाड़ के हारित ऋषि लकुलीश सम्प्रदाय के थे। बापा रावल द्वारा निर्मित मेवाड़ के आराध्य देव एकलिंगजी का शिव मंदिर पाशुपत सम्प्रदाय का प्रमुख मंदिर है। सुण्डा माता मंदिर में भी भगवान शिव की मूर्ति लकुलीश सम्प्रदाय की है।

(iii) वीरशैव :-

प्रवर्तक :- बासवन्ना द्वारा।

कर्नाटक में पनपा।

(iv) काश्मीरक :- कश्मीर में प्रचलित सम्प्रदाय।

- शाक्त सम्प्रदाय :- युद्ध कार्य में संलग्न रहने वाले राजा, सेनापति एवं सैनिक शक्ति प्राप्त करने के लिए प्राचीन काल से ही शक्ति पूजा करते आए हैं।

शाक्त पंत के दो पंथ :- (i) वामाचार (ii) दक्षिणाचार।

वामाचारी मतानुयायी पंचमकारों से शक्ति की उपासना करते हैं। इन पंचमकारों में मद्य, मुद्रा, मैथुन, मत्स्य एवं माँस शामिल हैं।

राजपरिवार कुलदेवी

मेवाड़ (सिसोदिया वंश) बाणमाता

आमेर (कच्छवाह वंश) अन्नपूर्णा (शिलादेवी)

जोधपुर (राठौड़ वंश) नागणेच्या देवी

जैसलमेर (भाटी वंश) स्वांगिया जी

नाथ सम्प्रदाय :-

प्रवर्तक – नाथ मुनि।

पंथ के प्रमुख साधु :- मत्स्येन्द्र नाथ, गोपीचंद, भर्तृहरि, गोरखनाथ।

महामंदिर :- नाथ सम्प्रदाय का प्रमुख केन्द्र। राठौड़ शासक मानसिंह द्वारा मंदिर निर्माण। गुरु आयस देवनाथ मानसिंह के गुरु माने जाते हैं।

राजस्थान में नाथ पंथ की शाखाएँ :-

(i) बैराग पंथ :- मुख्य केन्द्र – राताडूंगा (पुष्कर)। प्रथम प्रचारक - भर्तृहरि

(ii) माननाथी पंथ :- मुख्य केन्द्र – महामंदिर (महाराजा मानसिंह द्वारा स्थापित)

- लोद्रवा के भाटी शासक देवराज ने नाथपंथी साधु योगी रतननाथ का आशीर्वाद प्राप्त किया था।

- जालौर में नाथपंथी साधु जालन्धरनाथ के मंदिर का निर्माण करवाया गया।

- ‘कानपा पंथ’ :- प्रवर्तक :- योगी जालन्धरनाथ के शिष्य कानपानाथ द्वारा।

राजस्थान के अन्य सम्प्रदाय :-

1. रामस्नेही सम्प्रदाय :- रामानंद के निर्गुण शिष्यों की परम्परा से विकसित निर्गुण सम्प्रदाय।

चार केन्द्र :-

(i) शाहपुरा (भीलवाड़ा) :- रामचरण जी

(ii) रैण (नागौर) :- दरियाव जी

(iii) सिंहथल (बीकानेर) :- हरिरामदास जी

(iv) खेड़ापा (जोधपुर) :- रामदास जी

- निर्गुण-निराकार राम का नाम स्मरण ही रामस्नेही भक्त अपनी मुक्ति का सर्वश्रेष्ठ अथवा एकमात्र साधन मानता है।

- सद्‌गुरु एवं सत्संग को इस सम्प्रदाय का प्राण तत्त्व माना गया है।

- मूर्तिपूजा, तीर्थयात्रा आदि साधना पद्धतियों का रामस्नेही सम्प्रदाय में निषेध किया गया है।

- बाह्य आडम्बरों व जातिगत भेदभाव का प्रबल विरोध, गुरु की सेवा, सत्संगति एवं राम नाम स्मरण आदि इनके प्रमुख उपदेश हैं।

- इस सम्प्रदाय में निर्गुण भक्ति तथा सगुण भक्ति की रामधुनी तथा भजन कीर्तन की परम्परा के समन्वय से निर्गुण निराकार परब्रह्म राम की उपासना की जाती है। इस सम्प्रदाय में राम दशरथ पुत्र राम न होकर कण-कण में व्याप्त निर्गुण-निराकार परब्रह्म है।

- रामद्वारा – रामस्नेही सम्प्रदाय का सत्संग स्थल।

- शाहपुरा (भीलवाड़ा) रामस्नेही सम्प्रदाय की मुख्य पीठ है जहाँ प्रतिवर्ष फूलडोल महोत्सव मनाया जाता है।

2. विश्नोई सम्प्रदाय :-

प्रवर्तक:- जाम्भोजी। (1485 ई. में) (कार्तिक कृष्णा अष्टमी)

- निर्गुण सम्प्रदाय (निराकार विष्णु (ब्रह्म) की उपासना पर बल)

- मुख्य पीठ:- मुकाम-तालवा (बीकानेर)

- अनुयायी 29 नियमों का पालन करते हैं, जिसमें हरे वृक्षों के काटने पर रोक, जीवों पर दया, नशीली वस्तुओं के सेवन पर प्रतिबन्ध, प्रतिदिन सवेरे स्नान, हवन एवं आरती तथा विष्णु के भजन करना, नील का त्याग आदि शामिल हैं।

- पर्यावरण संरक्षण हेतु प्राणों तक का बलिदान कर देने के लिए प्रसिद्ध सम्प्रदाय।

- यह सम्प्रदाय ईश्वर को सर्वव्यापी तथा आत्मा को अमर मानता है।

- इस सम्प्रदाय में मोक्ष की प्राप्ति हेतु गुरु का सान्निध्य आवश्यक माना जाता है।

- सम्प्रदाय के अन्य तीर्थ स्थल:- जाम्भा (फलोदी-जोधपुर), जांगलू (बीकानेर) रामड़ावास (पीपाड़-जोधपुर)

- सम्प्रदाय का प्रमुख ग्रन्थ:- जम्भ सागर (120 शब्द और 29 उपदेश)।

- इस सम्प्रदाय में नामकरण, विवाह, अन्त्येष्टि आदि संस्कार कराने वाले को ‘थापन’ कहते हैं।

3. जसनाथी सम्प्रदाय:- प्रवर्तक :- जसनाथ जी।

प्रमुख पीठ:- कतरियासर (बीकानेर)

मूर्तिपूजा विरोधी सम्प्रदाय।

इसमें निर्गुण भक्ति को ईश्वर-साधना का मार्ग बतलाया है।

इस सम्प्रदाय के अनुयायी 36 नियमों का पालन करते हैं।

जसनाथी सम्प्रदाय का अग्नि नृत्य प्रसिद्ध है। इसमें सिद्ध भोपे ‘फतै-फतै’ उद्‌घोष के साथ अंगारों पर नाचते हैं।

सिकन्दर लोदी जसनाथी सम्प्रदाय से काफी प्रभावित था।

जसनाथ सम्प्रदाय के अनुयायी काली ऊन का धागा गले में पहनते हैं।

जसनाथी सम्प्रदाय के लोग जाल वृक्ष तथा मोर पंख को पवित्र मानते हैं।

इस सम्प्रदाय में ’84 बाड़ियां’ प्रसिद्ध हैं। बाड़ियों को ‘आसंण’ (आश्रम) भी कहते हैं।

जसनाथी सम्प्रदाय के अन्य विरक्त संत ‘परमहंस’ कहलाते हैं।

- जसनाथी सम्प्रदाय के प्रमुख ग्रंथ:- सिंभूदड़ा एवं कोड़ा।

- जसनाथी सम्प्रदाय के संत:- लालनाथजी, चोखननाथ जी, सवाईदास जी।

- जसनाथी सम्प्रदाय की बाइबिल:- यशोनाथ-पुराण। (सिद्ध रामनाथ द्वारा रचित)।

- सिद्ध रुस्तम जी जसनाथी सम्प्रदाय को भारत में विख्यात करने वाले एकमात्र संत थे।

4. लालदासी सम्प्रदाय:-

प्रवर्तक :- लालदास जी

प्रमुख स्थल :- शेरपूर एवं धोलीदूब गाँव (अलवर)

- इस पंथ में हिन्दू-मुस्लिम एकता, ऊँच-नीच के भेदभावों की समाप्ति, दृढ़ चरित्र एवं नैतिकता की प्राप्ति, रूढ़ियों व आडम्बरों का विरोध तथा सामाजिक सदाचार पर अत्यधिक बल दिया गया है।

- इस पंथ में भिक्षावृत्ति का विरोध किया गया है। इसमें पुरुषार्थ पर बल दिया गया है।

- मेवात प्रदेश में इस सम्प्रदाय का प्रभाव अधिक है।

- इस सम्प्रदाय के लोग गृहस्थी जीवन यापन कर सकते हैं।

5. अलखिया सम्प्रदाय :-

प्रवर्तक :- लालगिरि।

इस सम्प्रदाय के लोग जाति-पाँति तथा ऊँच-नीच को नहीं मानते।

प्रमुख केन्द्र :- गलता (जयपुर)।

6. चरणदासी पंथ :-

प्रवर्तक :- चरणदास।

प्रमुख पीठ :- दिल्ली।

इस पंथ में निर्गुण-निराकार ब्रह्म की सखी भाव से सगुण भक्ति की जाती है।

यह पंथ सगुण और निर्गुण भक्ति मार्ग का मिश्रण है।

इस पंथ के अनुयायी ‘श्रीमद्‌भागवत्’ को बड़ी श्रद्धा की दृष्टि से देखते हैं तथा राधा-कृष्ण की उपासना करते हैं।

इस पंथ के अनुयायी सदैव पीत वस्त्र धारण करते हैं।

गुरु के प्रति दृढ-भक्ति और उनका देव-तुल्य सम्मान तथा पूजन भी इस पंथ की एक विशेषता है।

- राजस्थान में इस सम्प्रदाय का अत्यधिक प्रसार अलवर एवं जयपुर क्षेत्र में हुआ।

- चरणदासी ‘नवधाभक्ति’ (राधाकृष्ण की उपासना) का समर्थन भी करते हैं।

- इसमें गुरु के सान्निध्य को अत्यधिक महत्त्व, कर्मवाद को मान्यता तथा नैतिक शुद्धता व करुणा पर बल दिया गया है।

- चरणदासी पंथ के अनुसार करुणा के बिना ज्ञान प्राप्ति सम्भव नहीं है।

- चरणदासी पंथ के अनुयायी 42 नियमों का पालन करते हैं।

- चरणदासी सम्प्रदाय की परम्परा दो प्रकार की हैं –

(A) बिन्दु कुल परम्परा :- इस परम्परा की शृंखला पिता-पुत्रवत् चलती है।

(B) नाद कुल परम्परा :- इस परम्परा की शृंखला गुरु-शिष्यवत् चलती है।

7. निरंजनी सम्प्रदाय :-

प्रवर्तक :- हरिदास जी

प्रमुख पीठ :- गाढ़ा (डीडवाना, नागौर)

- पूर्ण रूप से निर्गुण पंथ है।

- यह सम्प्रदाय मूर्ति पूजा का खंडन नहीं करता है। यह वर्णाश्रम एवं जाति व्यवस्था का भी विरोध नहीं करता है।

- निरंजनी अनुयायी दो प्रकार के होते हैं –

(क) निहंग :- वैरागी जीवन व्यतीत करते हैं एवं एक गुदड़ी व एक पात्र धारण करते हैं।

(ख) घरबारी :- गृहस्थ जीवन यापन करते हैं।

- इसमें परमात्मा को अलख निरंजन, हरि निरंजन कहा गया है।

- इस मत का प्रभाव ओड़ीसा में भी है।

- सहिष्णुता एवं सह-अस्तित्व इस सम्प्रदाय के आधार बिन्दु है।

8. परनामी सम्प्रदाय :- प्रवर्तक :- प्राणनाथ जी।

निर्गुण विचारधारा वाला सम्प्रदाय।

इनके आराध्यदेव श्रीकृष्ण है।

मुख्य गद्दी :- पन्ना (MP)। जयपुर में इस सम्प्रदाय का कृष्ण मंदिर है।

कुलजम स्वरूप :- सम्प्रदाय का प्रमुख ग्रंथ जिसमें उपदेशों का संग्रह है।

9. दादू सम्प्रदाय :- प्रवर्तक :- संत दादूदयाल।

प्रमुख पीठ :- नरायणा/नरैना(जयपुर)।

दादू पंथ निर्गुण-निराकार – निरंजन ब्रह्म को अपना आराध्य मानता है।

दादू पंथी साधु विवाह नहीं करते तथा गृहस्थी के बच्चों को गोद लेकर अपना पंथ चलाते हैं।

अलख दरीबा :- दादू पंथ का सत्संग।

इस पंथ में मृत व्यक्ति के शव को जंगल में छोड़ देने की प्रथा है।

दादू पंथी ईश्वर को सर्वशक्तिमान मानते हैं।

दादू पंथी की 6 शाखाएँ :-

(i) खालसा :- मुख्य पीठ (नरायणा) से सम्बद्ध, इसके मुखिया गरीबदास थे।

(ii) विरक्त :- रमते-फिरते दादू पंथी साधु, जो गृहस्थियों को उपदेश देते थे।

(iii) उतरादे व स्थान धारी :- संस्थापक – बनवारीदास जी। गद्दी – रतिया (हिसार)

(iv) खाकी :- ये शरीर पर भस्म लगाते थे तथा खाकी वस्त्र पहनते थे।

(v) नागा :- संस्थापक – सुन्दरदास जी। ये वैरागी होते थे, नग्न रहते हैं तथा शस्त्र धारण करते हैं।

(vi) निहंग :- घुमन्तु साधु

- दादू पंथ के 52 स्तम्भ :- दादू के 52 प्रमुख शिष्य। (नाभादास के ग्रन्थ ‘भक्तमाल’ में दादूजी के 52 शिष्यों के नामों का उल्लेख हैं)

10. नवल सम्प्रदाय :- प्रवर्तक :- नवलदास जी

मुख्य मंदिर :- जोधपुर

इनके उपदेश ‘नवलेश्वर अनुभव वाणी’ में संगृहित है।

11. गूदड़ सम्प्रदाय :- प्रवर्तक :- संतदास जी

प्रमुख गद्दी :- दांतड़ा (भीलवाड़ा)।

निर्गुण भक्ति सम्प्रदाय।

संतदास जी गूदड़ी से बने कपड़े पहनते थे।

12. ऊंदरिया पंथ :- अतिमार्गीय पंथ। जयसमंद के भीलों में प्रचलित।

13. कांचलिया पंथ :- अतिमार्गीय पंथ।

14. कुण्डा पंथ :-

प्रवर्तक :- रावल मल्लीनाथ जी।

वाममार्गी पंथ। इसमें आध्यात्मिक साधना की विचित्र प्रणाली का प्रावधान किया गया है।

15. निष्कलंक सम्प्रदाय :-

प्रवर्तक :- संत मावजी।

मावजी विष्णु के ‘कल्कि अवतार’ माने जाते हैं।

इस सम्प्रदाय के लोग सफेद वस्त्र धारण करते हैं। ‘प्रशातियां’ नामक भजन इस सम्प्रदाय के अनुयायी गाते हैं।

मुख्य पीठ :- साबला (डूँगरपुर)

16. तेरापंथी :- राजस्थान की श्वेताम्बर शाखा की स्थानकवासी उपशाखा से विकसित पंथ।

प्रवर्तक :- संत भिक्षु। (भीखण्जी) 1760 ई. में स्थापना।

मेवाड़ के राजनगर और केलवा में तेरापंथ का अत्यधिक प्रभाव रहा।

राजस्थान के प्रमुख संत -

1. संत जाम्भोजी

सामान्य परिचय –

- जन्म –1451ईस्वी (विक्रम संवत् 1508) में  जन्माष्टमी के दिन (भाद्रपद कृष्ण अष्टमी)

- स्थान – पीपासर गाँव (नागौर)

- पिता – लोहटजी पंवार

- माता – हंसाबाई

- जाति – राजपूत

- गौत्र – पंवार

- बचपन का नाम – धनराज

- गुरु – गोरखनाथ

उपनाम –

1) पर्यावरण वैज्ञानिक

2) श्रीकृष्ण का अवतार (माता हंसाबाई ने माना)

3) गुंगागेहला

4) विष्णु का अवतार

- जाम्भोजी ने 34 वर्ष की आयु में अपनी सम्पूर्ण सम्पत्ति दान कर दी थी।

बिश्नोई सम्प्रदाय की स्थापना –

-     1485 ईस्वी  को कार्तिक कृष्ण अष्टमी के दिन समराथल (बीकानेर) के एक ऊँचे टीले पर बिश्नोई सम्प्रदाय की स्थापना की थी।

- इस टीले को बिश्नोई पंथ में 'धोक' धोरे के नाम से जाना जाता है।

- जाम्भोजी ने बिश्नोई समाज में धर्म की प्रतिष्ठा हेतु 29 नियम बनाए।

- 29 नियम निम्नलिखित हैं –

1) जल्दी उठना

2) ईश्वर की पूजा करना

3) हवन करना

4) सहनशीलता

5) शालीनता

6) चोरी नहीं करना

7) क्षमा भाव रखना

8) संतोष

9) किसी की निंदा नहीं करना

10) मीठी वाणी बोलना

11) दया भाव रखना

12) पानी को छानकर पीना

13) दूध को छानकर पीना

14) झगड़ा नहीं करना

15) सायं विष्णु भजन करना

16) अमावस्या का व्रत करना

17) हरे वृक्ष नहीं काटना

18) भेड़-बकरी नहीं पालना

19) अफीम व भांग का सेवन नहीं करना

20) नीले वस्त्र नहीं पहनना

21) जीवों की रक्षा करना

22) मूर्ति पूजा नहीं करना

23) विधवा विवाह को बढ़ावा देना

24) शराब का सेवन नहीं करना

25) सत्य वचन बोलना

26) धर्म का पालन करना

27) माँस का सेवन नहीं करना

28) निषेध कर्म नहीं करना

29) 30 दिनों तक जनन सुतक करना

- बिश्नोई सम्प्रदाय का उपदेश स्थल  'साथरी' कहलाता है।

- जाम्भोजी के प्रथम अनुयायी – पूल्होजी पंवार

जाम्भोजी द्वारा रचित ग्रंथ –

1) जम्भसागर (शब्दावली – 29 नियम)

2) जम्भवाणी (जम्भोजी द्वारा रचित, इनमें 120 शब्द संग्रहित है)

3) जम्भसंहिता/जम्भगीता – जम्भोजी के अनुयायी 151 शब्दों के इस संकलन को पाँचवां वेद एवं उन्नीसवाँ पुराण मानते हैं।

4) बिश्नोई धर्म प्रकाश

- जाम्भोजी का मूलमंत्र – ‘हृदय से विष्णु का नाम जपो और हाथ से कार्य करो।‘

- बिश्नोई सम्प्रदाय की प्रधानपीठ/मुक्तिधाम –

मुकाम (नोखा-तहसील, बीकानेर) में जाम्भोजी का समाधि स्थल है।

- यहाँ पर जाम्भोजी का एक सुन्दर मंदिर बना हुआ है।

- मेला – प्रतिवर्ष फाल्गुन एवं आश्विन अमावस्या को

- समाधि – 1536 ई.

बिश्नोई सम्प्रदाय के आराध्य स्थल –

1) पीपासर (नागौर) – जाम्भोजी का जन्म स्थल

इसे खड़ाऊ की पीपा कहते हैं।

2) मुकाम (बीकानेर) – जाम्भोजी का समाधि स्थल

3) लालासर (बीकानेर) – जाम्भोजी का निर्वाण (निधन) स्थल

4) गेटू (नागौर) – बिश्नोईयों का धार्मिक स्थल

5) रामड़ावास (जोधपुर) – विश्नोईयों का उपदेश स्थल एवं मंदिर

6) जांगलू (बीकानेर) – जाम्भोजी का मंदिर

- यहाँ चैत्र व भाद्रपद अमावस्या को मेला भरता है।

7) जाम्भा(जोधपुर) – यहाँ चैत्र व भाद्रपद अमावस्या को मेला भरता है।

जाम्भोजी के कहने पर जैसलमेर के शासक जैतसिंह ने यहाँ तालाब का निर्माण करवाया था, जिसे 'बिश्नोईयों का पुष्कर' कहा जाता है।

- संत जाम्भोजी ने हिन्दू व मुस्लिम धर्मों में व्याप्त आडम्बरों का विरोध किया था।

- ऐसी मान्यता है कि जाम्भोजी के प्रभाव के कारण दिल्ली के शासक सिकन्दर लोदी ने गौ हत्या पर प्रतिबंध लगाया था।

महत्वपूर्ण तथ्य –

- पाहल – जाम्भोजी द्वारा तैयार अभिमंत्रित जल।

- इसे पिलाकर जाम्भोजी ने आज्ञानुवर्ती समुदाय को विश्नोई पंथ में दीक्षित किया था।

- जाम्भोजी ने इस संसार को नाशवान एवं मिथ्या बताया। उन्होंने इस संसार को 'गोवलवास' अर्थात् अस्थायी निवास कहा।

कथा जैसलमेर की –

- संत कवि वील्होजी द्वारा लिखित प्रसिद्ध कविता।

- इसमें जाम्भोजी के समकालीन 6 राजाओं के बारे में जानकारी मिलती है, जो उनके अनुयायी थे।

1) सिकन्दर लोदी (दिल्ली बादशाह)

2) नवाब मोहम्मद खाँ नागौरी

3) राव दूदा (मेड़ता)

4) राव जैतसी (जैसलमेर)

5) राव सातलदेव (मारवाड़)

6) राणा सांगा (मेवाड़)

नोट : वील्होजी जाम्भोजी के बाद बिश्नोई सम्प्रदाय के अध्यक्ष बने थे।

 

2. जसनाथजी (निर्गुण भक्ति)

सामान्य परिचय –

- जन्म - 1482 ई. (विक्रम संवत् 1539) में कार्तिक शुक्ल एकादशी (देवउठनी एकादशी) को

- जन्म स्थान - कतरियासर गाँव (बीकानेर)

- पिता - हमीर जी

- माता - रूपादे

- जाति - जाट

- बचपन का नाम- जसवंतसिंह

- गुरु - गोरखनाथ

- मान्यता है कि जसनाथजी कतरियासर गाँव के डाबला तालाब के किनारे मिले थे।

- जसनाथजी ने बीकानेर के गोरखमालिया नामक स्थान पर 12 वर्ष तपस्या की थी।

- जसनाथजी आजीवन ब्रह्मचारी रहे थे।

जसनाथी सम्प्रदाय की स्थापना :

- 1504 ई. में जसनाथजी ने जसनाथी सम्प्रदाय की स्थापना की थी।

- इस सम्प्रदाय में कुल 36 नियम होते हैं।

- इस सम्प्रदाय के लोग गले में काले रंग का धागा पहनते हैं।

- अग्नि नृत्य - जसनाथी सम्प्रदाय के अनुयायी धधकते हुए अंगारों पर नृत्य करते हैं।

- अग्नि नृत्य करते समय ‘फतै-फतै’ का नारा लगाते है।

- इस नृत्य को बीकानेर के महाराजा गंगासिंह ने संरक्षण दिया था।

- परमहंस- जसनाथी सम्प्रदाय के अनुयायी, जो पूरी तरह से इस संसार से विरक्त हो गए वे परमहंस कहलाए।

- सिद्ध - जसनाथी सम्प्रदाय के अनुयायी, जिन्होंने भगवा धारण किया, वे ‘सिद्ध’ कहलाए।

- दिल्ली के बादशाह सिकन्दर लोदी ने जसनाथजी के चमत्कारों से प्रभावित होकर कतरियासर (बीकानेर) में 500 बीघा जमीन भेंट की थी।

इस सम्प्रदाय के प्रमुख ग्रंथ -

(1) सिंभूदड़ा - जसनाथजी के उपदेशों का संकलन

(2) कोंडा

(3) जलम झूमरो

(4) सिद्ध जी रो सिरलोको

(5) जसनाथी पुराण (36 नियम)

जसनाथजी के प्रमुख शिष्य -

(1) हंसो जी

(2) रुस्तम जी

(3) हीरा जी

जसनाथी सम्प्रदाय के प्रमुख संत -

(1) लालनाथ जी

(2) चौखननाथ जी

(3) सवाईदास जी

जसनाथी संत जीवित समाधि लेते थे।

समाधि (प्रधानपीढ) -

- 1506 ई. में जसनाथजी ने 24 वर्ष की आयु में आश्विन शुक्ल सप्तमी को कतरियासर, बीकानेर में समाधि ली थी।

- आश्विन शुक्ल सप्तमी को प्रतिवर्ष यहाँ पर मेला भरता है।

जसनाथी सम्प्रदाय की अन्य पीठें -

(1) मालासर (बीकानेर)

(2) लिखमादेसर (बीकानरे)

(3) पुरनासर (बीकानेर)

(4) बम्मल (बीकानेर)

(5) पाँचला (नागौर)

3. संत दादूदयाल जी

सामान्य परिचय –

- जन्म -1544 ई. में फाल्गुन शुक्ल अष्टमी को

- जन्म स्थान - अहमदाबाद (गुजरात)

(लोक मान्यता के अनुसार दादूदयालजी साबरमती नदी में लोदीरामजी नामक एक ब्राह्मण को संदूक में मिले थे।)

- लोदीरामजी एवं उनकी पत्नी सावित्री देवी ने इनका लालन-पोषण किया था।

- बचपन का नाम-महाबली

- गुरु- बुड़ढ़नजी (वृंदावनजी) - ये कबीरदासजी के शिष्य थे।

- वृंदावन जी में दीक्षा लेकर दादूदयालजी ने 11 वर्ष की आयु में गृह त्याग किया था।

- उपनाम :-

राजस्थान का कबीर

- दादूदयालजी ने 19 वर्ष की आयु में राजस्थान में आए तथा सांभर में इन्होंने अपना प्रथम बौद्धिक प्रवास व्यतीत

किया। यहीं पर 1568 ई. में अपना प्रथम उपदेश दिया था।

दादू पंथ की स्थापना -

- दादूदयालजी ने 1574 ई. में सांभर में दादू पंथ/निपरत सम्प्रदाय/ब्रह्म सम्प्रदाय की स्थापना की थी।

- दादू पंथ में सत्संग स्थल को ‘अलख दरीबा’ कहा जाता है।

- 1602 ई. में दादूदयालजी नरैना/नरायणा (फुलेरा) आ गए थे। यहीं पर 1603 ई. में ज्येष्ठ कृष्ण अष्टमी को उनका

निधन हुआ।

- मृत्यु के बाद दादूदयालजी के शव को जयपुर स्थित भैराणा की पहाड़ियों में जिस गुफा के सामने रखा गया, उसे ‘दादू

खोल’ कहा जाता है।

दादूदयालजी के प्रमुख ग्रंथ -

(1) दादू री वाणी

(2) दादू रा दूहा

(3) दादू हरडे वाणी

(4) अंग वधू दादू

- इनकी भाषा ढूँढाड़ी है।

- दादूदयालजी के शिष्यों ने ‘काव्य बेलि’ और अनभैवाणी के नाम से दादूदयालजी के उपदेशों को संकलित किया था।

- दादू पंथ की प्रधानपीठ - नरैना (जयपुर)

- मुख्य मेला- फाल्गुन शुक्ल अष्टमी

- 1585 ई. में दादूदयालजी ने अपनी फतेहपुर सीकरी (उत्तरप्रदेश) यात्रा के दौरान मुगल सम्राट अकबर से मुलाकात

की थी एवं अपने विचारों से प्रभावित किया था।

- दादूदयालजी की गुरु शिष्य परम्परा में कुल 152 शिष्य थे।

इनमें से 100 शिष्य वितरागी (एकांतवासी) हुए अर्थात उन्होंने दादूपंथ के प्रचार-प्रसार हेतु कोई कार्य नहीं किया।

- 52 शिष्यों ने घूम-घूमकर अपने थाम्ब अर्थात दादू द्वारों की स्थापना की, जिन्हें दादू पंथ में 52 स्तम्भ कहलाए।

- दादूदयालजी की मृत्यु के पश्चात उनके पुत्र गरीबदासजी नरैना गद्दी पर बैठे।

 

दादूदयाल जी के प्रमुख शिष्य :-

गरीबदासजी-

- दादूदयालजी के पुत्र।

- दादूदयालजी की मृत्यु के पश्चात नरैना गद्दी पर बैठे थे।

प्रमुख रचनाएँ:-

(1) आध्यात्म बोध

(2) अनभै प्रबोध

(3) सासी पद

 

(4) संत रज्जब जी -

- रज्जब जी का जन्म सांगानेर (जयपुर) में हुआ था।

- रज्जबजी परिणय सूत्र में बँधने जा रहे थे, परन्तु रास्ते में दादूदयालजी के उपदेश सुनकर सांसारिक मोह-माया का

त्याग करके दादूदयालजी के शिष्य बन गए।

- रज्जबजी जिन्दगी भर दूल्हे के वेश में रहे थे।

- रज्जबजी की मृत्यु सांगानेर में हुई थी।

- रज्जबजी के निवास स्थान को ‘रज्जब द्वार’ कहा गया।

- इनके शिष्यों को ‘रज्जबपंथी या ‘रज्जबात’ कहा गया है।

- रज्जबजी की प्रधान पीठ- सांगानेर (जयपुर)

प्रमुख रचनाएँ:-

(1) रज्जब वाणी

(2) सवेंगी

(3) सुन्दरदासजी

- इनका जन्म 1596 ई. में दौसा के खण्डेलवाल वैश्य परिवार में हुआ था।

- पिता- परमानंद जी

- माता - सती

- इनके द्वारा अनेक ग्रंथों की रचना की गई थी, जिनमें प्रमुख हैं-

1) हरिबोल चितावनी 2) ज्ञान समुन्दर

3) ज्ञान सर्वेया  4) सुन्दर सार

5) सुन्दर ग्रंथावली  6) सुखसमाधि आदि

इनकी ग्रंथों की भाषा पिंगल थी।

- सुन्दरदासजी शृंगार रस के घोर-विरोधी थे।

- सुन्दरदासजी को दूसरा शंकराचार्य कहा जाता है।

- इन्होंने ‘नागा पंथ’ चलाया था।

- प्रधान पीठ- दौसा

- 1707 ई. में इनकी मृत्यु हुई थी।

(4) जनगोपालजी:- फतेहपुर सीकरी (उत्तरप्रदेश) निवासी

प्रमुख रचनाएँ-

1) प्रहलाद चरित्र

2) दादू जन्म लीला पश्ची

3) चौबीस गुरुओं की लीला

4) ध्रुव चरित्र आदि।

5) बखनाजी:- इनके विचार बखनाजी की वाणी में संकलित है।

6) मंगलाराम जी:-

रचना- सुन्दरोदय सर्वोतम

इस ग्रंथ में नागा सम्प्रदाय का वर्णन है।

7) मिस्किनदासजी

8) संतदासजी -

अग्रवाल जाति के थे।

1639 ई. में इन्होंने जीवित समाधि ली थी।

रचना-12,000 छंदों की रचना

9) माधोदासजी

10) जगजीवनजी

11) जनगोपालजी

12) जगन्नादास जी

- दादूदयालजी की मृत्यु के पश्चात दादू पंथ 5 शाखाओं में विभक्त हो गया था, जो निम्नलिखित हैं-

1) खालसा - गरीबदासजी की आचार्य परम्परा से संबंधित साधु।

2) विरक्त - घूम-घूम कर दादू पंथ का उपदेश देने वाले साधु।

3) उत्तरादे या स्थानधारी - वे साधु जो राजस्थान को छोड़कर उत्तरी भारत में दादू पंथ का प्रचार-प्रसार करने गए।

4) खाकी - वे साधु जो अपने शरीर पर भस्म लगाते हैं एवं लम्बी जटाएँ रखते हैं।

5) नागा - इस शाखा के प्रवर्तक सुन्दरदासजी थे।

ये साधु कृषि व व्यापार का कार्य करते थे एवं हथियार रखते थे।

नोट : साबरमती नदी को दादू पंथ में ‘पुत्रवाहिनी कहा जाता है क्योंकि इसी नदी से दादूदयालजी लोदीराम नामक ब्राह्मण

को मिले थे।

 

5. चरणदासजी

सामान्य परिचय –

जन्म : विक्रम संवत 1760 में

(डेहरा गाँव, अलवर)

पिता : मुरली धर

माता : कुन्जो बाई

गुरु : सुखदेवजी

बचपन का नाम : रणजीतसिंह

निधन - 1782 ई. (नई दिल्ली)

चरणदासी सम्प्रदाय :

- चरणदासजी ने भाद्रपद शुक्ल तृतीया के दिन इस सम्प्रदाय की स्थापना की थी।

- यह सम्प्रदाय निर्गुण एवं सगुण भक्ति का मिश्रण है।

- इस सम्प्रदाय के अनुयायी पीले वस्त्र धारण करते हैं।

- इस सम्प्रदाय में कुल 42 नियम बताए गए हैं।

- इस सम्प्रदाय का अत्यधिक प्रभाव मेवात क्षेत्र एवं दिल्ली में है।

- प्रधान पीठ - नई दिल्ली

(चरणदासजी राजस्थान के एकमात्र संत है, जिनका जन्म राजस्थान में हुआ था, लेकिन इनके द्वारा चलाए गए सम्प्रदाय की प्रथमपीठ दिल्ली में है।)

- जयपुर के कच्छवाह वंश के शासक सवाई प्रतापसिंह चरणदासजी के अनुयायी थे।

- मेला- बसंत पंचमी (समाधि पर, नई दिल्ली)

चरणदासजी के प्रमुख ग्रंथ:-

(1) ब्रह्म ज्ञान सागर

(2) भक्ति सागर

(3) ब्रह्म चरित्र

(4) ज्ञान सर्वोदय

- चरणदासजी ने मूर्तिपूजा का खण्डन किया था।

- चरणदासजी ने नादिरशाह के आक्रमण की भविष्यवाणी की थी।

प्रमुख शिष्याएँ -

(1) दयाबाई :

जन्म - डहरा गाँव, अलवर

प्रमुख ग्रंथ -

- दयाबोध

- विनय मालिका

 

(2) सहजोबाई -

जन्म - डहरा गाँव (अलवर)

प्रमुख ग्रंथ-

- सहज प्रकाश

- सबद वाणी

- सोलह तिथि

- सहजोबाई ने भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति की थी, इन्हें मत्स्य मीरा कहा जाता है।

 

 

6. संत मावजी

सामान्य परिचय –

जन्म  : 1714 ईस्वी में माघ शुक्ल पंचमी को साबला गाँव (डूँगरपुर) में

पिता  : दालरूमसी

माता  : केसर बाई

- संत मावजी भगवान कृष्ण की भक्ति करते थे।

- संत मावजी को भगवान विष्णु का कल्कि अवतार माना जाता है।

- इन्होंने कर्म, भक्ति और योग पर बल दिया था।

संत मावजी को ज्ञान की प्राप्ति :

- 1727 ई. में बेणेश्वर नामक स्थान पर

(इन्होंने सोम, माही व जाखम नदियों के संगम पर बेणेश्वर धाम की स्थापना की थी)

- माघ पूर्णिमा को बेणेश्वर धाम पर मेला भरता है, जिसे आदिवासियों को कुम्भ कहते हैं।

- चौपड़ा:- संत मावजी की वाणियाँ चौपड़ा कहलाती है।

- इनकी भाषा बागड़ी है।

- इसमें भगवान श्रीकृष्ण की लीलाएँ वर्णित हैं।

- चौपड़े दीपावली के दिन बाहर निकाले जाते हैं एवं मकर संक्रांति को इनका वाचन होता है।

- संत मावजी ने निएकलंक सम्प्रदाय की स्थापना की थी।

- इस सम्प्रदाय की प्रधानपीठ- साबला गाँव (डुँगरपुर)

- मावजी के अनुयायियों को साध कहा जाता है।

 

7. संत रामचरणजी

सामान्य परिचय –

जन्म  : 1720 ई. में माघ शुक्ल चतुर्दशी को सोड़ा गाँव(टोंक) में

पिता  : बख्तराम जी

माता  : देवजी/देऊजी

पत्नी  : गुलाब कँवर

बचपन का नाम:   रामकिशन

- गुरु - कृपारामजी (दाँतड़ा ग्राम, शाहपुरा भीलवाड़ा) कृपारामजी ने रामकिशन को ‘रामचरण’ नाम दिया था।

- इन्होंने भगवान राम की निर्गुण उपासना की थी।

अनाभाई वैणी/अणर्भवाणी:-इस ग्रंथ में संत रामचरणजी के उपदेश संकलित है।

रामस्नेही सम्प्रदाय की स्थापना :

- संत रामचरणजी ने रामस्नेही सम्प्रदाय की स्थापना की थी।

- इस सम्प्रदाय की प्रधान पीठ- शाहपुरा (भीलवाड़ा)

- इनके अनुयायी गुलाबी वस्त्र धारण करते हैं।

- रामचरणजी के 12 प्रधान शिष्य थे।

- 1798 ई. में शाहपुरा में रामचरण का देहान्त हुआ था।

- रामद्वारा - इस सम्प्रदाय का प्रार्थना स्थल।

रामस्नेही सम्प्रदाय की प्रमुख पीठें :

- राजस्थान में रामस्नेही सम्प्रदाय की चार पीठें हैं-

(1) शाहपुरा शाखा (भीलवाड़ा)

- संस्थापक- संत रामचरण जी

- यहाँ रामस्नेही सम्प्रदाय का अंतर्राष्ट्रीय कार्यालय है।

- शाहपुरा में चैत्र कृष्ण द्वितीया से पंचमी तक फूलडोल उत्सव का आयोजन होता है।

(2) रैण शाखा (मेड़ता सिटी, नागौर)

- संस्थापक- संत दरियावजी

- संत दरियावजी का जन्म 1676 ई. में जैतारण (पाली) में हुआ था।

- इनके पिता का नाम मानजी धुनिया एवं माता का नाम गीगा था।

- इन्होंने ‘वाणी ग्रंथ’ (10 हजार पद) की रचना की थी।

- 1758 ई.में दरियावजी का निधन हुआ था।

(3) खेड़ापा शाखा (जोधपुर)

- संस्थापक- संत रामदासजी

- इनका जन्म 1783 ई. में जोधपुर में हुआ था।

- इनके पिता का नाम शार्दुलजी एवं माता का नाम अणमी था।

- हरिरामजी इनके गुरु थे।

प्रमुख रचनाएँ:-

(1) जमभारगति  (2) गुरुमहिमा

(3) अंगवद्व अनुभववाणी (4) चेतावनी

(5) भक्तमाल

- 1576 ई.में रामदासजी ने योग व प्राणायाम पर ‘निशानी’ नामक ग्रंथ की रचना की थी।

(4) सिंहथल शाखा (बीकानेर)

संस्थापक – हरिराम दास जी

- हरिराम दास जी का जन्म सिंहथल (बीकानेर) में हुआ था।

- इनके पिता का नाम भाग्यचन्द एवं माता का नाम रामी देवी था।

- जैमल दास इनके गुरु थे।

 

8. संत लालदासजी

सामान्य परिचय –

जन्म  : 1540 . में श्रावण कृष्ण पंचमी को धौलीद्रव गाँव (अलवर) में

पिता  : चाँदमल

माता  : समदा

पत्नी  : मोगरी

गुरु   : फ़कीर गंदर चिश्ती

- लालदासजी मेव जाति के लकड़हारे थे।

- इन्होंने भगवान राम की निर्गुण उपासना करते हुए हिन्दू मुस्लिम एकता पर बल दिया था।

- इन्होंने समाज में व्याप्त अंधविश्वासों एवं मिथ्याचारों का विरोध किया एवं नैतिक शुद्वता और भक्ति पर बल दिया।

 

प्रमुख ग्रंथ:-

(1) लालदासजी की चेतावनियाँ

(2) वाणी

इनमें लालदासजी के उपदेश संकलित है।

 

लालदासी सम्प्रदाय की स्थापना :

- संत लालदासजी ने लालदासी सम्प्रदाय की स्थापना की थी।

- प्रधानपीठ:- नगलाजहाज (भरतपुर)

(यहाँ पर इनका निधन हुआ था।)

मेला :- आश्विन शुक्ल एकादशी एवं माघ पूर्णिमा

- इस सम्प्रदाय में दीक्षित करने हेतु व्यक्ति को सबसे पहले काला मुँह करके गधे पर उल्टा मुँह करके बिठाकर गाँव की गलियों में घुमाया जाता है, ताकि उसके जीवन में कोई भी अभिमान नहीं रहे।

- लालदासजी का समाधि स्थल शेरपुर (अलवर) में है।

- अलवर व भरतपुर की मेव जाति में लालदासजी की अत्यधिक मान्यता है।

 

- शाहजहाँ का पुत्र औरंगजेब, जब लालदासजी से मिलने आया था, तब लालदासजी ने भविष्यवाणी की थी, कि वह दिल्ली का शासक बनेगा, जो अपने भाईयों का वध करेगा। बाद में औरंगजेब ने अपने भाईयों की हत्या करके दिल्ली की गद्दी प्राप्त की थी।

 

 

9. हरिदास निरंजनी

सामान्य परिचय –

जन्म  : 1452 . में कापडोद (डीडवाणा, नागौर में)

- ये शत्रिय सांखला परिवार से थे।

- इनका मूल नाम हरिसिंह था।

- उपनाम : ‘कलयुग का वाल्मीकि’ (संन्यासी बनने से पहले हरिदासजी डाकू थे।)

रचित प्रमुख ग्रंथ:-

1) भरधरी संवाद 2) साखी

3) विरदावली   4) मंत्र राजप्रकाश

5) हरिपुरुष की वाणी

- इन ग्रंथों में हरिदासजी के उपदेश संकलित है।

- हरिदासजी ने निरंजनी/निराला सम्प्रदाय की स्थापना की थी।

- प्रधान पीठ- गाढा (डीडवाणा, नागौर)

(यहाँ पर हरिदासजी ने समाधि ली थी)

- मेला- प्रतिवर्ष फाल्गुन शुक्ल एकम् से फाल्गुन शुक्ल द्वादशी तक

- इस सम्प्रदाय की शाखाएँ हैं-

1) निहंग  2) घरबारी

- हरिदासजी के 52 शिष्य थे।

 

10. संत पीपा

सामान्य परिचय –

जन्म  : विक्रम संवत् 1323 में चैत्र पूर्णिमा को गागरोन दुर्ग में

पिता  : कड़ावा राव

माता  : लक्ष्मीवती

जाति  : खींची राजपूत

गुरु   : रामानन्दजी

- बचपन का नाम- प्रतापसिंह

- संत पीपा की कुल 20 रानियाँ थी।

- इन्होंने अपनी छोटी रानी पद्मावती की प्रेरणा से राजपाट अपने भतीजे को सौंपकर वैराग्य धारण किया था।

- संत पीपा दर्जी समुदाय के आराध्य देवता है।

- संत पीपा वस्त्रों की सिलाई का कार्य करते थे।

 

- संत पीपा की छतरी : गागरोन दुर्ग (काली सिन्ध व आहु नदियों के संगम पर)

- यहाँ पर उनके चरण चिह्न की पूजा होती है।

 

संत पीपा की गुफा : (टोडा ग्राम (टोंक)

- इस गुफा मे संत पीपा ने अपना अंतिम समय व्यतीत किया था एवं यहीं पर भजन करते हुए चैत्र कृष्ण नवमी को देवलोक को गमन हुए थे।

- समदड़ी ग्राम (बाड़मेर) में संत पीपा का मंदिर है, जहाँ प्रतिवर्ष मेला भरा जाता है।

संत पीपा के चमत्कार :

1) तेली जाति के व्यक्ति को मारकर पुनः जीवित करना।

2) शेर को भी पालतू जानवर बनाना।

- जब दिल्ली के बादशाह फिरोजशाह तुगलक ने आक्रमण किया था, तब संत पीपा ने उसे पराजित किया था।

 

जैन संत

1. आचार्य भिक्षु स्वामी :- अन्य नाम :- भीखण जी

श्वेताम्बर जैन आचार्य।

- जन्म :- 1726 ई. में कंटालिया (मारवाड़) में।

1760 ई. में जैन श्वेताम्बर के तेरापंथ सम्प्रदाय की स्थापना की। ये इस सम्प्रदाय के प्रथम आचार्य बने।

2. आचार्य श्री तुलसी :- जन्म :- वर्ष 1914 में लाडनूं में।

तेरापंथ सम्प्रदाय के आचार्य।

‘अणुव्रत’ का सिद्धान्त दिया।

‘जैन श्वेताम्बर सम्प्रदाय’ के 9वें आचार्य।

वर्ष 1949 में चूरू जिले के सरदारशहर से ‘अणुव्रत आन्दोलन’ प्रारम्भ किया।

वर्ष 1980 में लाडनूं में समण श्रेणी को प्रारम्भ किया।

फरवरी, 1994 में सुजानगढ़ में मर्यादा महोत्सव का आयोजन करवाया।

23 जून, 1997 को निधन।

3. आचार्य महाप्रज्ञ :-

जन्म :- 1920 टमकोर (झुंझुनूँ) में।

- वर्ष 1970 के दशक में ‘प्रेक्षाध्यान’ सिद्धान्त दिया। इस सिद्धान्त के चार चरण हैं – ध्यान, योगासन एवं प्राणायाम, मंत्र एवं थेरेपी।

- सुजानगढ़ से वर्ष 2001 में ‘अहिंसा यात्रा’ प्रारम्भ की।

- वर्ष 1991 में लाडनूं में ‘जैन विश्व भारती’ डीम्ड विश्वविद्यालय की स्थापना की।

- वर्ष 2003 में जारी सूरत स्प्रिचुअल घोषणा (SSD) के नेतृत्वकर्ता।

- रचित पुस्तकें :- मंत्र साधना, योग, अनेकांतवाद, Art of thinking Positive, Mistries of Mind, Morror of World.

- 9 मई, 2010 को देहावसान।

4. आचार्य श्री महाश्रमण :- 13 मई, 1962 को सरदार शहर में जन्म।

- मूल नाम :- मोहन दूगड़।

- रचित पुस्तकें :- आओ हम जीना सीखें, दु:ख मुक्ति का मार्ग, संवाद भगवान से, ‘महात्मा महाप्रज्ञ’ आदि।

मुस्लिम संत

1. ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती :-

- जन्म :- संजरी (फारस)

- अन्य नाम :- गरीब नवाज

- गुरु :- हजरत शेख उस्मान हारुनी।

- ख्वाजा साहब पृथ्वीराज चौहान तृतीय के काल में राजस्थान आए तथा अजमेर को कार्यस्थली बनाया।

- चिश्ती ने राजस्थान में चिश्तिया सम्प्रदाय का प्रवर्तन किया।

- अजमेर में ख्वाजा साहब की दरगाह है जहाँ प्रतिवर्ष रज्जब माह की 1 से 6 रज्जब तक उर्स का विशाल मेला भरता है। यह हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिक सद्‌भाव का सर्वोत्तम स्थल है।

- इंतकाल :- 1233 में अजमेर में।

- रचित पुस्तक :- कंजुल इसरार (1215 ई. में)

- ‘आफताबे हिंद’ उपाधि से विभूषित।

- मुहम्मद गौरी ने ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती को ‘सुल्तान-उल-हिन्द’ की उपाधि दी।

- अजमेर में ख्वाजा साहब की दरगाह का निर्माण इल्तुतमिश ने करवाया था।

- ईश्वर प्रेम तथा मानव की सेवा उनके प्रमुख सिद्धान्त थे।

2. शेख हमीदुद्‌दीन नागौरी :- चिश्ती परम्परा के संत।

- कार्यक्षेत्र :- नागौर का सुवल गाँव।

नागौरी ने इल्तुतमिश द्वारा प्रदत्त ‘शेख-उल-इस्लाम’ के पद को अस्वीकार कर दिया।

नागौरी केवल कृषि से जीविका चलाते थे।

- उपाधि :- ‘सुल्तान-उल-तरीकीन’ (संन्यासियों के सुल्तान)

यह उपाधि ख्वाजा मुइनुद्‌दीन चिश्ती द्वारा दी गई।

- मृत्यु :- 1274 ई. में।

- शेख हमीदुद्‌दीन नागौरी का उर्स :- नागौर में।

3. नरहड़ के पीर :-

- अन्य नाम – हजरत शक्कर बार

- दरगाह :- नरहड़ ग्राम (चिड़ावा, झुंझुनूँ)

शेख सलीम चिश्ती के गुरु, जिनके नाम पर बादशाह अकबर ने अपने पुत्र का नाम सलीम रखा।

जन्माष्टमी (भाद्रपद कृष्ण अष्टमी) के दिन नरहड़ के पीर का उर्स का मेला भरता है।

- उपनाम :- बागड़ के धणी।

नरहड़ के पीर की दरगाह भावात्मक राष्ट्रीय एवं सामाजिक एकता का प्रतीक मानी जाती है।

4. पीर फखरुद्दीन :- दोउदी बोहरा सम्प्रदाय के आराध्य पीर।

- दरगाह :- गलियाकोट (डूँगरपुर)।

गलियाकोट (डूँगरपुर) दाउदी बोहरा सम्प्रदाय का प्रमुख धार्मिक स्थल है।

महिला संत

1. मीराबाई :- 16वीं सदी की प्रसिद्ध कृष्ण भक्त कवयित्री व गायिका।

- जन्म :- 1498 में वैशाख शुक्ल तृतीया (आखातीज) के दिन कुड़की (पाली) में।

- पिता :- रतन जी राठौड़ (बाजोली के जागीरदार)

- दादा :- राव दूदा

- बचपन का नाम :- पेमल

- विवाह :- 1516 ई. में भोजराज से (राणा सांगा का ज्येष्ठ पुत्र)

- गुरु :- संत रैदास व रूप गोस्वामी।

- रचनाएँ :- पदावली, टीका राग गोविन्द, नरसी मेहता की हुंडी, रुक्मिणी मंगल, सत्यभामाजी नू रुसणो।

मीरा बाई ने सगुण भक्ति का सरल मार्ग भजन, नृत्य एवं कृष्ण स्मरण को बताया।

मीरा के निर्देशन में रतना खाती ने ‘नरसी जी रो मायरो’ की रचना ब्रज भाषा में की।

- उपनाम :- राजस्थान की राधा।

मीराबाई ने अपने जीवन के अंतिम दिन गुजरात के डाकोर स्थित रणछोड़ मंदिर में गुजारे।

2. गवरी बाई :-

डूँगरपुर के नागर कुल में जन्म।

- इन्होंने कृष्ण को पति के रूप में स्वीकार कर कृष्ण भक्ति की।

- उपनाम :- वागड़ की मीरा।

- रचना :- कीर्तनमाला।

- डूँगरपुर के महारावल शिवसिंह ने गवरी बाई के प्रति श्रद्धास्वरूप बालमुकुन्द मन्दिर का निर्माण करवाया था।

- गवरी बाई ने अपनी भक्ति में हृदय की शुद्धता पर बल दिया।

3. संत रानाबाई :-

- जन्म :- 1504 ई. में हरनावां (नागौर) में।

- दादा :- जालम जाट

- पिता :- रामगोपाल

संत राना बाई ने खोजी जी महाराज से शिक्षा-दीक्षा ग्रहण की।

राना बाई कृष्ण भक्ति की संत थी।

- गुरु :- संत चतुरदास।

- उपनाम :- राजस्थान की दूसरी मीरा।

राना बाई ने 1570 ई. में फाल्गुन शुक्ल त्रयोदशी के दिन हरनावा में जीवित समाधि ले ली।

4. संत करमेती बाई :-

- पिता :- परशुराम कांथड़िया (खण्डेला निवासी)

कृष्ण भक्ति की संत।

इन्होंने वृन्दावन के ब्रह्मकुण्ड में साधना की।

- मंदिर :- खण्डेला में।

5. संत दया बाई :- चरणदास जी की शिष्या / राधा कृष्ण भक्ति की उपासिका।

- रचित ग्रन्थ :- दयाबोध, विनय मालिका।

- समाधि :- बिठूर।

6. संत सहजो बाई :- राधाकृष्ण भक्ति की संत नारी।

चरणदासी मत की प्रमुख संत।

- रचित ग्रन्थ :- सोलह तिथि, सहज प्रकाश।

7. संत भूरी बाई अलख :-

मेवाड़ की महान महिला संत।

इन्होंने निर्गुण-सगुण समन्वित भक्ति को स्वीकार किया।

भूरीबाई उदयपुर की अलारख बाई तथा उस्ताद हैदराबादी के भजनों से प्रभावित थी।

8. संत नन्ही बाई :- खेतड़ी की सुप्रसिद्ध गायिका।

दिल्ली घराने से सम्बन्धित तानरस खाँ की शिष्या।

9. संत ज्ञानमति बाई :-

- कार्यक्षेत्र :- गजगौर (जयपुर)

इनकी 50 वाणियाँ प्रसिद्ध हैं।

10. संत रानी रूपादे :-

निर्गुण भक्ति उपासिका।

राव मल्लीनाथ की रानी।

- गुरु :- नाथजागी उगमासी।

- इन्होंने अलख को पति रूप में स्वीकार कर ईश्वर के एकत्व का उपदेश दिया था।

- देवी सन्त के रूप में रानी रूपादे तोरल जेसल में पूजी जाती है।

11. संत समान बाई :-

- कार्यक्षेत्र :- अलवर

कृष्ण उपासिका।

12. संत ताज बेगम :- कृष्ण भक्ति की संत नारी।

- गुरु :- आचार्य विट्ठलनाथ।

वल्लभ सम्प्रदाय से सम्बन्धित

- कार्यक्षेत्र :- कोटा

13. संत करमा बाई :- कृष्णोपासिका। अलवर से सम्बद्ध।

14. संत कर्मठी बाई :- कृष्णोपासिका। वृन्दावन में साधना की।

- कार्यक्षेत्र :- बागड़ क्षेत्र।

15. संत जनसुसाली बाई :-

हल्दिया अखेराम की शिष्या।

- रचित ग्रन्थ :- सन्तवाणी, गुरुदौनाव, अखैराम, लीलागान, हिण्डोर लीला की मल्हार राग, साधु महिमा, बन्धु विलास।

16. संत करमा बाई :- नागौर के जाट परिवार में जन्म।

भगवान जगन्नाथ की भक्त कवियत्री।

मान्यता है कि भगवान ने उनके हाथ से खीचड़ा खाया था। उस घटना की स्मृति में आज भी जगन्नाथपुरी में भगवान को खीचड़ा परोसा जाता है।

17. संत फूली बाई :- जोधपुर महाराजा जसवन्तसिंह ने फूली बाई को धर्मबहिन बनाया था

- कार्यक्षेत्र :- जोधपुर।

अन्य तथ्य :-

- राजस्थान में ‘ऊंदरिया पंथ’ भीलों में प्रचलित है।

- लोद्रवा जैनियों के लिए प्रसिद्ध है।

- भगत पंथ का संस्थापक :-  गुरु गोविन्द गिरि।

- दादूजी के देहान्त के पश्चात नरायणा दादू पंथ की खालसा उपशाखा का मुख्य स्थान रहा है।

- मुरीद :- सूफी अनुयायी।

- जसनाथ जी के चमत्कारों से प्रभावित होकर सुल्तान सिकन्दर लोदी ने उन्हें जागीर प्रदान की।

- जैन विश्व भारती संस्थान :- लाडनूं

- दादू पंथ का अधिकांश साहित्य ढूँढाड़ी बोली में लिपिबद्ध है।

- संत पीपा के अनुसार मोक्ष का साधन भक्ति है।

- राजस्थान का उत्तर-तोताद्रि :- गलता (जयपुर)

- सुप्रसिद्ध ‘कायाबेलि’ ग्रन्थ की रचना दादू दयाल ने की।

- रसिक सम्प्रदाय का प्रवर्तक :- अग्रदास जी।

- संत मीठेशाह की दरगाह :- गागरोन दुर्ग में।

मलिक शाह पीर की दरगाह :- जालोर में।

चोटिला पीर दुलेशाह की दरगाह :- पाली।

खुदाबक्श बाबा की दरगाह :- सादड़ी (पाली)

- अमीर अली शाह पीर की दरगाह :- दूदू (जयपुर)

- पारसी धर्म के संस्थापक जरथ्रुष्ट्र थे। पारसी धर्म के अनुयायी सूर्य की पूजा करते हैं।

- राजस्थान के बाँसवाड़ा जिले में ईसाई सर्वाधिक संख्या में है।

- उमराव कंवर अर्चना देश की पहली जैन साध्वी है, जिन पर डाक टिकट जारी किया गया है। (वर्ष 2011 में 5 रुपये का डाक टिकट)

- गुण हरिरस एवं देवियाणा ग्रंथ के लेखक :- ईसरदास।

- कुंडा पंथ के प्रणेता राव मल्लीनाथ थे। यह वाममार्गी पंथ है।

- राधावल्लभ सम्प्रदाय के प्रवर्तक :- गोस्वामी हितहरिवंश।

- चतु:सम्प्रदाय :- वैष्णव भक्ति के लिए प्रसिद्ध चार सम्प्रदाय

(i) श्री (ii) ब्रह्म (iii) रुद्र (iv) सनक।

- ‘धौलागढ़ देवी’ का मंदिर :- अलवर में।

- विश्नोई सम्प्रदाय के लोग भेड़ पशु को पालना पसन्द नहीं करते हैं।

- पंडित गजाधर :- मीरा बाई के शिक्षक।

- दासी मत का संबंध मीरा से है।

- हठ योग प्रणाली के जन्मदाता :- गोरखनाथ जी।

- मारवाड़ में निम्बार्क सम्प्रदाय को ‘नीमावत’ के नाम से जाना जाता है।

- चरणदासी पंथ के संत रामरूपजी की गद्दी :- पानों की दरीबा (जयपुर)।

- वल्लभ सम्प्रदाय से सम्बन्धित वल्लभ घाट पुष्कर में है।

- रामद्वारा :- रामस्नेही सम्प्रदाय का प्रार्थना स्थल।

- लालदासी सम्प्रदाय के सर्वाधिक अनुयायी मेव जाति के हैं।

- ’84 वैष्णवों की वार्ता’ एवं ’52 वैष्णवों की वार्ता’ ग्रन्थ वल्लभ सम्प्रदाय से सम्बन्धित है।

- ‘गुरु-दीक्षा’, ‘डोली-पाहल’ एवं ‘थापन’ संस्कार का संबंध विश्नोई सम्प्रदाय से है।

- चरणदासी सम्प्रदाय सगुण एवं निर्गुण भक्ति मार्ग का मिश्रण है।

- चरण सम्प्रदाय का ‘बड़े रियापाड़ी वाला मंदिर’ व ‘टोली के कुएँ वाला मंदिर’ राजस्थान के अलवर जिले में स्थित है।

- संत सुन्दरदास जी की प्रधान पीठ :- फतेहपुर में।

- संत सुन्दरदास जी ने काशी के 80 घाट पर गोस्वामी तुलसीदास के साथ निवास किया था।

- ‘श्रीनाथ जी’ की प्रतिमा मुगल शासक औरंगजेब के समय वृन्दावन से सिंहाड़ (नाथद्वारा) लाई गई।

- ‘लश्करी पीठ’ का सम्बन्ध रामानन्दी सम्प्रदाय से है।

- निरंजनी सम्प्रदाय नाथमल एवं संतमल के मध्य की कड़ी माना जाता है।

- परमहंस :- जसनाथी सम्प्रदाय के विरक्त सन्त।

- राजस्थान में निर्गुणी संत-सम्प्रदायों का आविर्भाव 15वीं सदी में हुआ।

- हरड़े बानी :- संत दादूजी की वाणियों का संग्रह।

- निम्बार्क सम्प्रदाय के साधुओं को ‘विष्णु स्वामी’ कहा जाता है।

- ‘जो पिण्ड में है वही ब्रह्माण्ड में है।’ सिद्धान्त का विवेचन संत पीपा द्वारा किया गया।