कृषि (Agriculture)
राजस्थान की अर्थव्यवस्था प्रमुखत: कृषि आधारित अर्थव्यवस्था है। राजस्थान में कुल क्षेत्रफल के लगभग 55-60 प्रतिशत भाग पर कृषि की जाती है लेकिन राज्य का कुल कृषित क्षेत्रफल का लगभग 30 प्रतिशत भाग पर ही सिंचाई की सुविधा उपलब्ध है। शेष भाग पर कृषि मानसून के भरोसे रहती है। इसलिए कृषि को मानसून का जुआ भी कहा जाता है।
राजस्थान की अर्थव्यवस्था में कृषि का योगदान
1. राजस्थान देश में सरसों, चना एवं बाजरा के उत्पादन में प्रथम स्थान रखता है।
2. राज्य में कृषि गणना आंकड़ों (2015-16) के अनुसार 2010-11 की तुलना में राज्य में कृषि जोतो की संख्या में 11.14 प्रतिशत की वृद्धि होने के कारण भूमि जोतों के औसत आकार में 11.07 प्रतिशत की कमी आयी है।
3. वर्ष 2019-20 में प्रचलित मूल्यों पर सकल राज्य मूल्यवर्धन में कृषि क्षेत्र का योगदान 25.56 प्रतिशत है।
4. प्रारम्भिक पूर्वानुमार के अनुसार राज्य में वर्ष 2019-20 में खाद्यान्न का कुल उत्पादन 249.88 लाख मैट्रिक टन होने की संभावना है जो कि गत वर्ष के 231.25 लाख मैट्रिक टन की तुलना में 8.06 प्रतिशत अधिक है।
5. राज्य में कृषि क्षेत्र सबसे बड़ा रोजगार प्रदाता है। कृषि क्षेत्र के द्वारा राज्य की लगभग 58 प्रतिशत जनसंख्या को रोजगार प्रदान किया जाता है।
6. भू-उपयोग सांख्यिकी 2017-18 के अनुसार राज्य में 52.55 प्रतिशत शुद्ध बोया गया क्षेत्र है। 11.37 प्रतिशत क्षेत्र बंजर भूमि है। वहीं, लगभग 8.04 प्रतिशत क्षेत्र वानिकी के अंतर्गत है।
राजस्थान में कृषि की प्रमुख विशेषताएँ
1.राज्य में कृषि मानसून पर आधारित है अत: मानसून की सक्रियता और निष्क्रियता का कृषि पर प्रभाव पड़ता है।
2. राजस्थान में उगायी जाने वाली रबी फसलों में - गेहूं, सरसों, जौ, चना, तारामीरा आदि हैं तथा खरीफ फसलों में - बाजरा, ज्वार, ग्वार, मूंग, उड़द, सोयाबीन, मूंगफली आदि प्रमुख हैं। जायद फसलों में - खीरा, तरबूज, ककड़ी, खरबूज व हरी सब्जियां आदि।
3. राज्य में लगभग 52 प्रतिशत भाग पर कृषि की जाती है जिसमें से मात्र 30 प्रतिशत भाग ही सिंचित क्षेत्र है।
4. भारत के कुल कृषिगत क्षेत्रफल का लगभग 11 प्रतिशत राजस्थान में है लेकिन सतही जल की उपलब्धता देश की मात्र 1.16 प्रतिशत ही है।
5. राज्य में भू-जल की स्थिति भी बहुत विषम है। साथ ही इसमें पिछले दो दशकों में तेजी से गिरावट आयी है। राज्य के 249 खंडों में से अधिकांश डार्क जोन में हैं। तथा केवल 40 खंड ही सुरक्षित श्रेणी में है। यद्यपि पिछले वर्षों में मुख्यमंत्री जल स्वावलंबन अभियान के कारण इसमें कुछ सुधार देखा गया है।
6.राजस्थान में कृषि प्राथमिक रूप से वर्षा पर निर्भर है एवं सिंचाई की सुविधाओं में कमी के कारण प्रति हैक्टेयर उत्पादकता काफी कम रहती है।
7.राज्य में सिंचाई के प्रमुख स्रोत कुएं, नलकूप, नहर और तालाब है जिसमें सर्वाधिक प्रतिशत क्षेत्र कुओं व नलकूपों का है।
8.राज्य में प्रतिव्यक्ति जोत के आकार में निरंतर गिरावट आयी है।
राज्य की प्रमुख कृषि फसलें
1.खरीफ फसलें - ये फसलें जून-जुलाई में बोई जाती हैं तथा सितम्बर अक्टूबर में काटी जाती है। मुख्य खरीफ फसलें - ज्वार, बाजरा, चावल, मक्का, मूंग, उड़द, अरहर, मोठ, मूंगफली, अरण्डी, तिल, सोयाबीन, कपास, गन्ना, ग्वार आदि । राज्य में खरीफ की 90 फसलें बारानी क्षेत्र पर बोई जाती हैं, जो पूर्णत: वर्षा पर निर्भर होती हैं। खाद्यान्नों में बाजरे का कृषित क्षेत्रफल सर्वाधिक है।
2. रबी फसलें - इन्हें उनालु भी कहा जाता है। ये फसलें अक्टूबर-नवम्बर में बोकर मार्च-अप्रैल में काट ली जाती है। मुख्य रबी फसलें - गेहूँ, जौ, चना, मटर, सरसों, अलसी, तारामीरा, सूरजमुखी, धनियां, जीर, मेथी आदि है।
3.जायद फसलें - इन फसलों को मार्च से मध्य जून तक उगाया जाता है। राज्य में जायद फसलों की कृषि जल की उपलब्धता वाले क्षेत्रों में की जाती है। मुख्य जायद फसलें- तरबूज, खरबूजा, ककड़ी, सब्जियां आदि।
राजस्थान में कृषि से संबधित समस्याएं -
कृषि विपणन
कृषि संबंधी उत्पादों को कृषकों से उपभोक्ताओं तक पहुँचाने से संबद्ध क्रियाओं को कृषि विपणन कहा जाता है।
राज्य में कृषकों को उनकी उपज का उचित मूल्य दिलाने हेतु अच्छी विपणन की सुविधा उपलब्ध कराने तथा राज्य में मण्डी नियामक एवं प्रबंधन को प्रभावी ढंग से लागू करने हेतु कृषि विपणन निदेशालय कार्यरत है।
1. ‘राजीव गांधी कृषक साथी योजना' के अन्तर्गत कृषकों/ खेतिहर मजदूरों एवं हम्मालों आदि को कार्यस्थल पर दुर्घटनावश मृत्यु होने पर 2 लाख रू की सहायता राशि उपलब्ध करवायी जाती है।
2.महात्मा ज्योतिबा फुले मंडी श्रमिक कल्याण योजना - मंडी श्रमिकों के लिए राज्य में वर्ष 2015 से यह योजना चलाई जा रही हैं जिसकी प्रमुख विशेषताएं निम्न हैं -
1. प्रसूति सहायता - लाभार्थी श्रमिक महिलाओं को अधिकतम दो प्रसूतियों के लिए राज्य सरकार द्वारा अकुशल श्रमिक के रूप में निर्धारित 45 दिन प्रचलित मजदूरी दर के अनुसार भुगतान किया जा रहा है। नवजात शिशु के पिता को राज्य सरकार द्वारा अकुशल श्रमिक के रूप में निर्धारित प्रचलित मजदूरी दर अनुसार 15 दिन की मजदूरी के समतुल्य राशि का भुगतान किया जा रहा है।
2. छात्रवृत्ति/मेधावी छात्र पुरस्कार योजना - मण्डी में ऐसे लाभार्थी श्रमिकों जिनके पुत्र/पुत्री जो 60 प्रतिशत एवं उससे अधिक अंक प्राप्त करते हैं, को इस योजना के अन्तर्गत छात्रवृत्ति दी जाएगी।
3. विवाह के लिये सहायता लाभार्थी श्रमिक महिलाओं की पुत्रियों के विवाह के लिए रू 50,000 की सहायता राशि देय होगी। यह सहायता अधिकतम दो पुत्रियों के लिए ही देय होगी।
4.चिकित्सा सहायता - लाभार्थी श्रमिकों को गंभीर बीमारी (कैंसर, हार्ट अटैक, लीवर, किडनी आदि) होने की दशा में सरकारी अस्पताल में भर्ती रहने पर वित्तीय सहायता के रूप में अधिकतम रु. 20,000 की राशि स्वीकृत की जाएगी।
राज्य में कृषि विभाग की प्रमुख योजनाएं
(1) राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (NFSM) - केन्द्र सरकार द्वारा केन्द्र प्रवर्तित योजना के रूप में वर्ष 2007-08 में राज्य में गेहूं व दलहन पर राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन प्रारम्भ किया गया था। भारत सरकार ने वर्ष 2015-16 के दौरान इसका वित्त पोषण केन्द्र राज्य के लिए 60:40 कर दिया हैं। गेहूँ के लिए यह मिशन 14 जिलों यथा- बांसवाड़ा, भीलवाडा़, बीकानेर, जयपुर, झुंझुनूं व जोधपुर, करौली, नागौर, पाली, प्रतापगढ़, सवाईमाधोपुर, सीकर, टोंक एवं उदयपुर में राज्य खाद्य सुरक्षा मिशन को लागू किया गया है व मोटे अनाज मक्का के लिए 5 जिलों यथा- बांसवाड़ा, भीलवाड़ा, चित्तौडगढ़, डूंगरपुर तथा उदयपुर में क्रियान्वित किया जा रहा है। मोटा अनाज जौ के लिए सात जिलो यथा- अजमेर, भीलवाडा़, हनुमानगढ़, जयपुर, नागौर, श्री गंगानगर तथा सीकर में क्रियान्वित किया जा रहा है।
(2) राष्ट्रीय तिलहन एवं ऑयल पॉम मिशन - इस मिशन का उद्देश्य, तिलहन फसलों एवं वृक्ष जनित पौधों, खाद्यान्न की उत्पादकता में वृद्धि, गुणवत्ता में सुधार कर राज्य को खाद्य सुरक्षा में आत्मनिर्भर बनाना है।
(3) राष्ट्रीय टिकाऊ कृषि मिशन – पूर्व में संचालित योजनाओं- राष्ट्रीय सुक्ष्म सिंचाई मिशन, राष्ट्रीय जैविक खेती परियोजना, राष्ट्रीय मृदा स्वास्थ्य एवं उर्वरता प्रबन्ध परियोजना तथा वर्षा आधारित क्षेत्र विकास कार्यक्रम जलवायु परिवर्तन को केन्द्रित करते हुए पुर्नगठन कर एक नया कार्यक्रम राष्ट्रीय टिकाऊ खेती मिशन क्रियान्वित किया जा रहा है। केन्द्रियांश व राज्यांश का वित्त पोषण का अनुपात 60:40 है।
(4) राष्ट्रीय कृषि विस्तार एवं तकनीकी मिशन (NMAET) - इस मिशन का उद्देश्य कृषि विस्तार का पुनर्गठन एवं सशक्तिकरण करना है। जिसके द्वारा कृषकों को उचित तकनीक एवं कृषि विज्ञान की बेहतर प्रणाली का हस्तांतरण करना है। इसमें वित्तपोषण में केन्द्र राज्य का 60-40 अनुपात में हैं।
(5) राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (RKVY) - कृषि एवं संबद्ध क्षेत्रों में (11वीं पंचवर्षीय योजना में) 4 प्रतिशत विकास दर अर्जित करने के उद्देश्य से भारत सरकार द्वारा यह मिशन प्रारम्भ किया गया। इसमें केन्द्र व राज्य का अंशदान 60-40 है। इस मिशन के तहत राज्य के कृषि जलवायु एवं प्राकृतिक संसाधनों पर विचार करने के लिए एवं कृषि, पशुपालन, मत्स्यपालन, मुर्गी पालन, बागवानी और डेयरी क्षेत्र में एकीकृत जिला कृषि योजना तैयार करने हेतु परियोजना आधारित सहायता प्रदान की जा रही है। इस योजना के अन्तर्गत वर्ष 2019-20 में रू. 208.80 करोड़ प्रावधान के विरूद्ध माह दिसम्बर 2019 तक रू. 52.36 करोड़ व्यय किए गए हैं।
(6) परंपरागत कृषि विकास योजना (PKVY) - जैविक खेती में पर्यावरण आधारित न्यूनतम लागत तकनीकों के प्रयोग से रसायनों व कीटनाशकों का प्रयोग कम करते हुए कृषि उत्पादन किया जाता है। राष्ट्रीय टिकाऊ कृषि मिशन (NMSA) के अन्तर्गत मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन का ही विस्तार परंपरागत कृषि विकास योजना है। इसके अन्तर्गत क्लस्टर व PGS प्रमाणन के माध्यम से जैविक कृषि को प्रोत्साहित किया जाता है। इसमें केन्द्र व राज्य का अंशदान 60-40 हैं।
(7) प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना - प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना भारत सरकार द्वारा वर्ष 2015-16 से वित्त पोषित पैटर्न केन्द्र एवं राज्य के बीच अनुपात 60:40 से लागू की गई है। कृषि, उद्यानिकी, जल ग्रहण, विकास एवं भू-संरक्षण तथा जल संसाधन विभाग द्वारा विभिन्न गतिविधियाँ क्रियान्वित की जा रही है जिसका नोडल विभाग उद्यानिकी विभाग है। वर्ष 2019-20 रू. 74.80 करोड़ प्रावधान के विरूद्ध माह दिसम्बर 2019 तक 27.33 करोड़ रू. व्यय किए गए।
(8) प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना – प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना खरीफ, 2016 से प्रारम्भ की गई है। इस योजना में खाद्यान्न फसलों (अनाज, मोटा अनाज और दालें) तिलहन और वार्षिक वाणिज्यिक/वार्षिक बागवानी फसलों को शामिल किया गया है। प्रीमीयम राशि के अंतर्गत कृषक से खरीफ फसल में 2 प्रतिशत, रबी में 1.5 प्रतिशत एवं वार्षिक वाणिज्यि/वार्षिक बागवानी फसलों के लिए 5 ली जाकर फसल का बीमा किया जा रहा है। प्रीमीयम का शेष भाग केन्द्र और राज्य सरकार द्वारा समान रूप से 50:50 प्रतिशत के अनुपात में बीमा कम्पनी को भुगतान किया जाता है। राज्य में प्रीमीयम सब्सिडी का भुगतान और फसल कटाई प्रयोगों के संचालन हेतु राज्य वित्त पोषित योजना क्रियान्वित की जा रही है।
(9) ग्लोबल राजस्थान एग्रीटेक मीट (GRAM) - इसका प्रारम्भ सीतापुरा (जयपुर) से किया गया। इसके बाद राजस्थान सरकार द्वारा GRAM का आयोजन कोटा, उदयपुर में किया जा चुका है।
इसका उद्देश्य कृषि क्षेत्र में विकास दर को बढ़ाकर सतत विकास एवं आर्थिक विकास के माध्यम से किसानों की आय को 2022 तक दोगुनी करना है।
यह कृषि और सम्बद्ध क्षेत्र की नीतिगत पहल है इसके द्वारा किसानों को खेती के नये तरीकों व तकनीकी की जानकारी दी जाती है।
राज्य में कृषि क्षेत्र के विकास हेतु सुझाव -