पशुपालन (Animal Husbandry)
पशुपालन (Animal Husbandry)
राजस्थान में अधिकांश भाग रेतीला व शुष्क होने के कारण कृषि क्षेत्र की सीमित संभावनाओं के चलते पशुपालन प्रारंभ से ही ग्रामीण आजीविका का प्रमुख साधन रहा है। राजस्थान में पशुपालन विशेषकर शुष्क व अर्द्धशुष्क क्षेत्रों में कृषि की सहायक गतिविधि ही नहीं है। बल्कि एक प्रमुख आर्थिक गतिविधि व आजीविका का साधन है, जो अकाल की स्थिति में कृषकों को अत्यधिक सुरक्षा प्रदान करता है। पशुपालन शुष्क कृषि का महत्वपूर्ण अंग है। पशुपालन वर्षा आधारित क्षेत्र में कृषि प्रणाली की आर्थिक व्यवहार्यता और स्थायित्व को बढ़ाता है। शुष्क पश्चिमी क्षेत्र में पशुपालन, सूखे एवं अकाल की मार के विरुद्ध सुरक्षा कवच का काम करता है और गरीब ग्रामीणों को सतत् एवं स्थायी आजीविका प्रदान करता है। राजस्थान पशुसंपदा की दृष्टि से समृद्ध राज्य है। यहाँ देश के सर्वोत्तम नस्ल के गौवंश, भेड, बकरी, घोड़ा व ऊँट की नस्ले पायी जाती हैं।
पशु-गणना 2019 के अनुसार, राज्य में कुल 567.76 लाख पशुधन एवं 146.23 लाख कुक्कुट है। देश के कुल पशु धन का 10.60 प्रतिशत पशुधन राजस्थान में उपलब्ध है। यहाँ देश का 7.23 प्रतिशत गौवंश, 12.47 प्रतिशत भैंस, 14 प्रतिशत बकरियां, 10.64 प्रतिशत भेड़ तथा 84.43 प्रतिशत ऊँट उपलब्ध है। राष्ट्रीय उत्पादन में वर्ष 2017-18 में राज्य का योगदान दुध उत्पादन में 12.72 प्रतिशत एवं ऊन उत्पादन में 34.46 प्रतिशत है।
पशुओं में रोग नियंत्रण हेतु वर्ष 2019-20 में 348.69 लाख टीकाकरण किए गए। पशुओं में उन्नत नस्लों के लिए दिसम्बर, 2019 तक 2.42 लाख बड़े पशुओं एवं 4.05 लाख छोटे पशुओं का बंध्याकरण तथा 27.22 लाख कृत्रिम गर्भाधान किए गए।
वर्ष 2019-20 के दौरान पशुपालन विभाग द्वारा उठाए गए प्रमुख कदम-
1. राज्य के गौ एवं भैंस वंशीय पशुओं को FMD (खूरपका, मुहपका रोग) रोग से मुक्त किये जाने के लिए केन्द्र सरकार के सहयोग से चलाये जा रहे राजव्यापी टीकाकरण कार्यक्रम के अन्तर्गत एक वर्ष में दो बार टीकाकरण अभियान चलाये जा रहे है। इस कार्यक्रम के अन्तर्गत वर्ष 2019-20 में दिसम्बर, 2019 तक 163.28 लाख पशुओं का टीकाकरण किया गया।
2. पशुधन निशुल्क आरोग्य योजना के अंतर्गत पशुपालकों को नियमित लाभान्वित किया जा रहा है। वित्तीय वर्ष 2019-20 में दिसम्बर, 2019 तक इस योजना में 78.58 लाख किसान लाभान्वित हुए है। यह योजना समस्त विभागीय पशु चिकित्सा संस्थाओं एवं समस्त उपचार शिविरों में उपलब्ध है।
3. भारत सरकार के राष्ट्रीय पशुधन मिशन अंतर्गत राजस्थान में भेड़ व बकरी वंश की नस्ल सुधार (GIGS) योजना संचालित की जा रही है जिससे केन्द्र एवं राज्य की हिस्सा राशि का प्रतिशत 60:40 है। यह परियोजना वर्तमान में राजस्थान के अजमेर, जयपुर, सीकर, राजसमंद, चित्तौडगढ़, चुरू, सिरोही एवं कुचामन सिटी (नागौर) जिलों में संचालित है।
राजस्थान की अर्थव्यवस्था में पशुपालन का योगदान
1.पशुधन से प्राप्त उत्पादों दुग्ध, ऊन, मांस, चमड़ा, हड्डियां आदि का उत्पादन गतिविधियों में उपयोग किया जाता है।
2. राज्य में पशुपालन वर्षभर रोजगार मुहैया करवाने के साथ ही आर्थिक संसाधनों में पशुपालन व पशु उत्पाद प्रसंस्करण से लगभग 10 प्रतिशत राजस्व की प्राप्ति भी होती है।
3. ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग 70 प्रतिशत परिवारों की आय का प्रमुख स्रोत पशुपालन ही है। पशुपालन की विकास दर हमेशा ऊँची बनी रहती है। साथ ही इस क्षेत्र में 90 प्रतिशत श्रम महिलाओं द्वारा किया जाता है।
4. राज्य के लघु व सीमांत कृषकों की आय में लगभग 35 प्रतिशत योगदान पशुपालन का है।
5. 2022 तक किसानों की आय को दोगुनी करने के उद्देश्य से भी पुशपालन का विशिष्ट महत्त्व है। इस महत्त्व को देखते हुए केन्द्रीय बजट 2019-20 में पृथक राष्ट्रीय कामधेनु आयोग की स्थापना का प्रावधान भी किया गया है।
राजस्थान में पशुधन
(1) गौवंश - राजस्थान गौवंश की दृष्टि से देश का 5वां बड़ा राज्य है। यहां पर देश का 7.23 प्रतिशत गौवंश पाया जाता है। राज्य में पायी जाने वाली गायों की प्रमुख नस्लें गिर, थारपारकर, नागौरी, राठी, कांकरेज, हरियाणवी, मालवी सांचोरी हैं।
भैंस - देश में भैंसों की संख्या के आधार पर राजस्थान दूसरा बड़ा राज्य है। यहां भारत की 12.47 प्रतिशत भैंसें पायी जाती है। राजस्थान में पायी जाने वाली प्रमुख भैंस नस्ले मुर्रा (खुण्डी), सूरती व जाफराबादी हैं।
भेड़ - संख्या की दृष्टि से राजस्थान आंध्रप्रदेश के बाद दूसरा सर्वाधिक भेडों वाला राज्य है- यहाँ देश की कुल 10.64 प्रतिशत भैड़े विद्यमान है। राज्य में पायी जाने वाली प्रमुख भेड़ों की नस्लें चोकला (मेरिनो) मालपुरी, सोनाड़ी, नाली, पूगल, मगरा, मारवाड़ी, जैसलमेरी व खेरी हैं। बाड़मेर, जैसलमेर व जोधपुर में सर्वाधिक तो वहीं धौलपुर में न्यूनतम भेड़े पायी जाती है।
बकरी - भारत की कुल बकरियों के 14 प्रतिशत के साथ राजस्थान देश में प्रथम स्थान पर है। बकरी को गरीब की गाय व रेगिस्तान का फ्रीज भी कहा जाता है। राज्य में पायी जाने वाली बकरी की प्रमुख नस्लें - मारवाड़ी, लोही, बारबरी, जखराना (अलवरी) शेखावाटी, सिरोही, परबतसरी व जमनापरी है।
ऊँट - ऊँटों की संख्या की दृष्टि से राजथान देश में प्रथम स्थान रखता है। राज्य में देश के लगभग 84.43 प्रतिशत ऊँट पाये जाते हैं। नाचना (जैसलमेर) का ऊँट पूरे देश में प्रसिद्ध है। ऊँट रेगस्तान क्षेत्रों में परिवहन का प्रमुख साधन है। राज्य में बीकानेरी, अलवरी, सिंधी, जैसलमेरी (नाचना) कच्छी व गुरहा नस्लों के ऊँट पाये जाते हैं।
अश्व - घोड़ों की संख्या की दृष्टि से राजस्थान का स्थान 6 प्रतिशत के साथ देश में चौथा है। यहां मालाणी, मारवाड़ी, काठियावाडी नस्ल के घोड़े पाये जाते हैं।
राज्य में पशुपालन के विकास हेतु संचालित योजनाएँ
(1) नस्ल सुधार कार्यक्रम का भी क्षमतावर्द्धन किया जा रहा है। निजी एकीकृत विकास केन्द्रों के विस्तार के माध्यम से प्रजनन सेवाओं में सुधार किया जा रहा है।
(2) टीकाकरण अभियान - खुरपका व मुंहपका के लिए (गाय-भैंस)।
(3) पशुधन नि:शुल्क आरोग्य दवा योजना के अन्तर्गत पशुपालकों को नियमित लाभान्वित किया जा रहा है।
(4) भामाशाह पशु बीमा योजना - यह योजना राज्य में पशुपालकों के कल्याण के लिए क्रियान्वित की जा रही है। इसके तहत SC/ST/BPL पशुपालकों को मवेशी बीमा प्रीमियम पर 70 प्रतिशत अनुदान और सामान्य पशुपालकों को मवेशी बीमा प्रीमियम पर 50 प्रतिशत अनुदान प्रदान किया जाता है।
(5) अविका कवच बीमा योजना - इस योजना के अन्तर्गत SC/ST व BPL भेड़ पालकों को भेड़ों के बीमा प्रीमियम पर 80 प्रतिशत अनुदान और सामान्य भेड़ पालकों को भेड़ो के बीमा प्रिमियम पर 70 प्रतिशत अनुदान प्रदान किया जाता है।
(6) राष्ट्रीय बोवाइन उत्पादकता मिशन:- यह मिशन जून 2016 में केन्द्र सरकार द्वारा 3 वर्ष के लिए चलाया गया। इसका मुख्य उद्देश्य दुग्ध उत्पादन बढ़ाना, पशुओं की उत्पादकता बढ़ाना व डेयरी व्यवस्था का विकास करना है।
गोपालन विभाग
गोपालन निदेशालय का लक्ष्य संरक्षण कार्यक्रमों एवं राज्य में गौवंश की संख्या में वृद्धि (जिसमें राज्य की गौशालओं के दुर्लभ गौवंश भी सम्मिलित हैं) एवं राज्य में विभिन्न प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से गौशाला प्रबंधकों को जैविक कृषि, चारा उत्पादन, गौवंश विपणन, पंचगव्य उत्पादों में अक्षम उर्जा का उपयोग एवं मूल्य संवर्द्धन क्षेत्र में प्रबंधकीय कौशल प्रदान करने हेतु दृढ़ता के साथ बढ़ावा देना है।
मत्स्य संसाधन
मत्स्य क्षेत्र द्वारा राज्य में उपलब्ध जल संसाधनों में मत्स्य विकास के कार्य के अलावा मछली के रूप में प्रोटीन युक्त आहार तथा कमजोर ग्रामीण वर्ग को रोजगार भी उपलब्ध कराया जाता है। राज्य में मत्स्य उत्पादन के लिए किये जा रहे प्रयास इस प्रकार हैं -
(1) आजीविका मॉडल - यह आदिवासी मछुआरों के लिए शून्य राजस्व मॉडल है। राज्य के तीन बड़े जलाश्यों यथा जयसमंद (उदयपुर), माहीं बजाज सागर (बांसवाड़ा) व कडाना बैक वाटर (डूंगरपुर) में प्रारंभ की गई है।
(2) नेशनल मिशन फॉर प्रोटीन सप्लीमेंट एक्वाकल्चर योजना - (जयसमंद व कडाना बैक वाटर सम्मिलित) है।
(3) सजावटी मछली - बीसलपुर बांध
(4) मत्स्य अभयारण - बड़ी तालाब (उदयपुर)