राजस्थानी साहित्य
राजस्थानी साहित्य को तीन भागों में विभाजित किया गया है :-
1. प्राचीन काल/वीरगाथा का काल (8वीं सदी – 15वीं सदी तक) :-
ग्रन्थ :-
1) नेमीनाथ बारहमासा :-
कवि पाल्हण
भाषा – मारू गुर्जर भाषा
छंद/दोहे – 70
जैन धर्म के 22 वें तीर्थंकर नेमीनाथ का वर्णन
2) पृथ्वीराज रासो :-
चन्द्रबरदाई (ग्रन्थ को पूरा इनके पुत्र जल्हण ने किया)
भाषा – पिंगल (दोहों की भाषा)
अजमेर के चौहान शासकों तथा पृथ्वीराज चौहान तृतीय का वर्णन
इसमें पृथ्वीराज-तृतीय व संयोगिता के प्रेम सम्बन्धों का वर्णन
3) पृथ्वीराज विजय :-
जयानक
भाषा – संस्कृत
इसमें अजमेर का सचित्र वर्णन
पृथ्वीराज-तृतीय के सैनिक अभियानों का वर्णन
4) रणमल चन्द्र :-
श्रीधर व्यास – दुर्गा सप्तसती ग्रन्थ (राम रावण युद्ध का वर्णन)
भाषा – पिंगल
छंद – 70
मारवाड़ शासक राव रणमल और पाटन (गुजरात) के शासक मुजफ्फरशाह के मध्य युद्ध का वर्णन (रणमल की इस युद्ध में विजय का भी उल्लेख)
5) बीसलदेव रासो :-
नरपति नाल्ह
भाषा – गोड़वाड़ी
बीसलदेव चौहान और धार की राजकुमारी राजमती के प्रेम सम्बंधों का वर्णन (जो काल्पनिक है)।
6) ढोलामारू रा दूहा/दोहा :-
कवि कल्लोल कुशल लाभ
डिंगल भाषा में
ढोला और मारू के विवाह का वर्णन
ढोला की आयु – 3 वर्ष
मारू की आयु – 1.5 वर्ष
7) अचलदास खींची री वचनिका :-
शिवदास गाडण
गद्य शैली
चारण साहित्य में गद्य शैली की प्रथम रचना।
इसमें 1423 ईस्वी में गागरोन के शासक अचलदास खींची और मांडू के शासक होशंगशाह के मध्य हुए युद्ध का आँखों देखा वर्णन है।
इस युद्ध में शिवदास गाडण मौजूद थे।
8) हम्मीर महाकाव्य :-
नयनचन्द्र सूरी
इस ग्रन्थ में रणथम्भौर और नाडोल के चौहान शासकों के बारे में जानकारी मिलती है।
इस ग्रन्थ के अनुसार मुहम्मद गौरी ने पृथ्वीराज चौहान-तृतीय को अजमेर में बन्दी बनाकर रखा था।
9) बह्म स्फुट सिद्धांत:-
बह्मगुप्त (भीनमाल)
खगोल शास्त्री थे।
10) शिशुपाल वध :-
कवि माघ (भीनमाल)
पहले डाकू थे बाद में कवि बने।
2. मध्यकाल :-
इसे साहित्य एवं साहित्यकारों का काल भी कहा जाता है। (15वीं सदी – 19वीं सदी)
साहित्य/साहित्यकार :-
1) बीठू सूजा :-
यह बीकानेर के शासक राव जैतसी के दरबारी कवि थे।
ग्रन्थ – राव जैतसी रो छंद
पिंगल भाषा
राव बीका, लूणकरण एवं राव जैतसी का वर्णन
कलयुग का करण – लूणकरण
राव जैतसी के प्रमुख सैन्य अभियानों की जानकारी
1534 ईस्वी में कामरान और राव जैतसी के मध्य हुए युद्ध का वर्णन तथा राव जैतसी की विजय का उल्लेख।
2) मुहणोत नैणसी :-
यह जोधपुर के जैन परिवार से संबंध रखते थे।
यह जोधपुर के महाराजा जसवन्तसिंह-प्रथम के दरबारी कवि थे।
देवी मुंशी प्रसाद ने इन्हें – “राजपूताने का अबुल फज़ल कहा”
प्रमुख ग्रन्थ :-
1. मुहणोत नैणसी री ख्यात
2. मारवाड़ री परगाना री विगत (राजस्थान का गजेटियर)
मुहणोत नैणसी महाराजा जसवन्तसिंह-प्रथम के साथ दक्षिण भारत गए जहाँ जसवन्तसिंह-प्रथम व मुहणोत नैणसी के मध्य विवाद हो गया तथा महाराजा ने नैणसी को बन्दी बना दिया तथा नैणसी व उसका भाई सुन्दरसी ने आत्मग्लानि के कारण आत्महत्या कर ली।
3) अबुल फज़ल:-
नागौर के शेख मुबारक खाँ के पुत्र थे।
भाई-फैजी तथा यह दोनों अकबर के दरबारी व नवरत्नों में से एक थे।
अबुल फज़ल जहाँगीर के साथ दक्षिण भारत गए जहाँ जहाँगीर के साथ विवाद हो गया था तथा जहांगीर के कहने पर बुन्देलखण्ड के शासक वीरसिंह बुन्देला ने फज़ल की हत्या कर दी।
ग्रन्थ –
1. अकबरनामा (फारसी भाषा) – 21 अध्याय (पहला अध्याय आईने अकबरी)
2. तुजुक-ए-बाबरी (तुर्की भाषा) – फारसी में अनुवाद किया – बाबरनामा
4) कवि दुरसा आढ़ा :-
अकबर के दरबारी कवि थे किन्तु बाद में अकबर का दरबार छोड़कर सिरोही के शासक सुरताण देवड़ा के दरबार में चले गए।
कवि दुरसाआढ़ा ने राजस्थान उन तीन शासकों के बारे में खूब लिखा जिन्होंने स्वतंत्रता की लड़ाई अकबर से लड़ी:- 1. राव चन्द्रसेन, 2. महाराणा प्रताप और 3. सुरताण देवड़ा
प्रमुख ग्रन्थ –
1. विरुद्ध छतरी
2. किरतार बावनी
3. महाराजा गजसिंह – अमरसिंह घोतरी
कवि दुरसा आढ़ा ने ‘वेलि क्रिसन रुकमणी री ख्यात’ नामक ग्रन्थ को 5वाँ वेद, 19वाँ पुराण, 109वाँ उपनिषद कहा।
5) कवि बांकीदास :-
यह मारवाड़ के शासक महाराजा मानसिंह के दरबारी कवि व मित्र थे।
ग्रन्थ :-
1. बांकीदास री ख्यात
2. भूरजाल भूषण
3. नीति मंजरी
4. कुकवि बत्तीसी
5. दातार बावनी
यह राजस्थान के प्रथम कवि थे जिन्होंने सर्वप्रथम अंग्रेजों के विरुद्ध चेतावनी के गीत लिखे।
6) पृथ्वीराज राठौड़ :-
डिंगल का हैरोस
यह बीकानेर का शासक राव कल्याणमल के पुत्र तथा महाराजा रायसिंह के भाई थे।
1570 ईस्वी में पृथ्वीराज राठौड़ अकबर की सेवा में आगरा चले गए तथा यह अकबर के दरबारी कवि बन गए।
प्रमुख ग्रन्थ :-
1. वेलि क्रिसन रुकमणी री ख्यात – 4000 दोहे
2. दसम भागवत का दुल्हा
3. गंगा लहरी
4. कल्ला जी रायमलोत री कुंडलियाँ
अकबर ने पृथ्वीराज राठौड़ को गागरोन का दुर्ग जागीर में दे दिया।
यह पीथल के नाम से कविता लिखते थे।
पाथल महाराणा प्रताप को कहा गया।
कन्हैयालाल सेठिया ने पृथ्वीराज राठौड़ और महाराणा प्रताप के हुए मध्य संवाद पर पीथल-पाथल नामक कविताएँ लिखी।
7) महाराणा कुम्भा :- संगीत शास्त्र पर 4 ग्रन्थ लिखे।
8) सवाई प्रतापसिंह :-
यह जयपुर के शासक थे तथा कृष्ण के बहुत बड़े भक्त थे।
यह “ब्रजनिधि” नाम से कविताएँ लिखते थे।
स. प्रतापसिंह की सभी कविताओं का संग्रह – ब्रजनिधि ग्रन्थावली में संगृहित है।
9) महाराणा सावंतसिंह :-
यह किशनगढ़ के शासक थे तथा भगवान कृष्ण के भक्त थे।
इन्होंने अपने राजपाट के त्याग करके संन्यास ले लिया और वृंदावन चले गए और अपना नाम नागरीदास रख लिया।
महाराणा सावंतसिंह ने “नागर सामुच्य” के नाम से कविताएँ लिखी।
10) महाराव बुद्धसिंह :-
यह बूँदी के शासक थे तथा इन्होंने कृष्ण भक्ति पर आधारित “नेहतंरग” नामक ग्रन्थ की रचना की।
11) महाराजा जसवन्तसिंह-प्रथम :-
यह मारवाड़ के शासक थे।
इन्होंने रीति और अलंगार से युक्त “भाषा भूषण” नामक ग्रन्थ की रचना की।
3. आधुनिक काल/इतिहासकारों का काल (19वीं सदी से वर्तमान तक) :-
1) कर्नल जेम्स टॉड :-
राजस्थान का इतिहास अंग्रेजी भाषा में लिखा।
जन्म – 20 मार्च, 1782 इलिंग्टन प्रान्त (इंग्लैण्ड)
स्कॉटलैंड– मूलत: यहीं के निवासी थे।
प्रारम्भिक शिक्षा यहीं हुई।
माता – मैरी हेडली
पिता – जेम्स (इंग्लैण्ड आर्मी का सैनिक)
पत्नी – क्लेटबर्क
गुरु – यति ज्ञानचन्द्र (मांडलगढ़, भीलवाड़ा)
घोड़े का नाम - अल्बुर्ज
उपाधि – कर्नल
पारिवारिक उपाधि – टॉड
उपनाम – घोड़े वाले बाबा, राजस्थान इतिहास के जनक
इन्होंने राजस्थान का इतिहास सर्वप्रथम सम्पूर्ण , व्यवस्थित एवं क्रमबद्ध तरीके से लिखा।
सर्वप्रथम भारत आए – 1798 ई. – बंगाल
सर्वप्रथम राजस्थान आए – 1806 ई. मांडलगढ़
मेवाड़ व हाड़ौती के पॉलिटिकल एजेंट बनकर उदयपुर आए।
महाराणा भीमसिंह के काल में आए।
कर्नल की उपाधि – 1813 ई. (पंजाब में)
इंग्लैण्ड चले गए – 1822 ई.– मानमौरी का शिलालेख साथ लेकर गए लेकिन भार अधिक होने के कारण मार्ग में समुद्र में फेंक दिया।
मृत्यु – 18 नवम्बर, 1835 ।
कर्नल जेम्स टॉड ने भारत में 24 वर्षों तक नौकरी की।
कर्नल जेम्स टॉड की पुस्तक :-
1. एनल्स एण्ड एण्टीक्वीटीज ऑफ राजस्थान (1829 ई.)
2. सेन्ट्रल एंड वेस्टर्न राजपूत स्टेट (1832 ई.)
सम्पादनकर्ता – विलियम क्रुक (दोनों पुस्तकों का)
लॉर्ड विलियम बैंटिक को समर्पित की।
पुस्तक में उल्लेख-
शौर्य और बलिदान के लिए यूरोप की थर्मोपल्ली जैसे अन्य कोई रणभूमि नहीं, लेकिन राजस्थान में पग-पग पर वीरों की हड्डियाँ धूमिल है तथा थर्मोपल्लियाँ हैं।
राजस्थान, रायथान रजवाडा शब्दों का प्रयोग
राजस्थान में शायद कोई छोटा सा राज्य ऐसा नहीं है जहाँ थर्मोपल्ली जैसी रणभूमि और लियोनाइडस जैसा वीर पुरुष पैदा नहीं हुआ हो
पश्चिमी भारत की यात्रा (Travels of Western India)
1839 ईस्वी में प्रकाशित।
क्लेटवर्क द्वारा प्रकाशित व सम्पादित।
2) कवि सूर्यमल्ल मिश्रण :-
आधुनिक राजस्थानी काव्य/साहित्य के नवजागरण के पुरोधा/जनक।
आधुनिक काल में डिंगल परम्परा के प्रथम और अंतिम कवि।
यह बूँदी के शासक महाराव रामसिंह के दरबारी कवि थे।
प्रमुख ग्रन्थ :-
1. वंश भास्कर -
बूँदी राज्य का इतिहास
गद्य शैली में लिखित
बड़ा ग्रन्थ होने के कारण विश्वकोषीय ऐतिहासिक ग्रन्थ कहा जाता है।
यह ग्रन्थ 1840 ईस्वी में लिखना प्रारम्भ हुआ तथा मुरारीदान द्वारा पूर्ण किया गया।
2. वीर सतसई -
इस ग्रन्थ का आरम्भ ‘समय पल्टी शीश’ नामक दोहे से होता है।
सूर्यमल्ल मिश्रण ने यह ग्रन्थ भारतीय जनमानस में जागृति लाने के लिए तथा राजस्थान के रणबांकुरो (क्रांतिकारी) का उल्लेख भी किया है।
3. बलवंत विलास -
यह एक चरित्र ग्रन्थ है।
महाराजा बलवन्त सिंह का चरित्र वर्णन किया गया।
4. रामजाट/रामनूजाट – यह ग्रन्थ सूर्यमल्ल मिश्रण ने 10 वर्ष की आयु में लिखा।
5. मयूर चन्द
3) कन्हैयालाल सेठिया :-
राजस्थानी भाषा के प्रबल समर्थक व विद्वान।
जन्म – 1919 ईस्वी ,सुजानगढ़ (चुरु)
केन्द्र – राजस्थान व कलकत्ता
प्रमुख ग्रन्थ :-
1. पीथल-पाथल
2. धरती-धोरा री
3. लील टांस
4. काको रोडसे
5. हिन्दी
6. हल्दी घाटी
7. मींझर
8. हेमाणी
9. मायड़ रो हेलो
10. वनफल
11. लीक लिकाडो
प्रमुख पुरस्कार :-
1. पद्मश्री– भारत सरकार द्वारा
2. राजस्थान रत्न – राजस्थान सरकार (मरणोपरान्त)
3. ज्ञानपीठ पुरस्कार – राजस्थानी साहित्य भाषा संस्कृति अकादमी – बीकानेर
4. सूर्यमल्ल मिश्रण अवॉर्ड – राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी – बीकानेर
5. राजस्थानी साहित्य अकादमी पुरस्कार
कन्हैयालाल की स्मृति में प्रतिवर्ष कन्हैयालाल सेठिया फाउण्डेशन द्वारा प्रशस्ति पत्र तथा 1 लाख रु नकद पुरस्कार दिया जाता है।
4) गौरीशंकर हीराचन्द औझा ( वर्ष 1963-1947) :-
राजस्थान के प्रथम पूर्ण इतिहासकार
राजस्थान का ग्रिबन
जन्म – 1883 ईस्वी रोहिड़ा (सिरोही)
शिक्षा – मुम्बई/बम्बई
गौरीशंकर उदयपुर में महाराणा सज्जनसिंह के दरबार में रहे तथा कविराजा श्यामलदास दधवाडिया इनके गुरु रहे ।
50 से भी अधिक ग्रन्थ लिखे तथा राजस्थान का इतिहास शुद्ध रूप से एवं कर्नल जेम्स टॉड द्वारा लिखितअंग्रेजी भाषा में इतिहास का हिन्दी में अनुवाद ‘राजपूताने का इतिहास’ के नाम से विभिन्न रियासतों का इतिहास लिखा।
गौरी शंकर का प्रसिद्ध ग्रन्थ – भारतीय प्राचीन लिपिमाला।
मुहणोत नैणसी री ख्यात का सम्पादन किया।
वर्ष 1914 में अंग्रेजों ने इन्हें “रायबहादुर” की उपाधि दी।
भारतीय लिपि का शास्त्र अंकन कर अपना नाम गिनिज बुक ऑफ वर्ल्ड में लिखवाया।
राजस्थानी भाषा की प्रथम रचना :-
भरतेश्वर बाहुबलिघोर
रचना – ब्रजसेन सूरी
भाषा – मारू गुर्जर
भरत व बाहुबली के मध्य युद्ध का वर्णन
संवत् का उल्लेख वाली राजस्थानी भाषा की प्रथम रचना :-
भरत बाहुबलि रास
रचना – शालिभद्र सूरी
भाषा – मारू गुर्जर
राजस्थानी भाषा की वचनिका :-
अचलदास खिंची री वचनिका
शिवदास गाडण
राजस्थान भाषा का प्रथम उपन्यास :- कनक सागर
शिवचन्द्र भरतिया
प्रथम नाटक – केसर विलास
प्रथम कहानी – विश्रांत प्रवास
स्वतन्त्रता काल का प्रथम उपन्यास :- आभैपटकी
श्रीलाल नथमल जोशी
अन्य ग्रन्थ – एक बिन्दणी दो बिन्द
आधुनिक राजस्थानी काव्य की प्रथम रचना :-बादली
चन्द्रसिंह बिरसाली