राजकोषीय नीति

प्रस्तावना (Introduction)

लोक वित्त एक विस्तृत विषय है जिसमें वे सभी मामले आते हैं, जो मुद्रा से जुड़े हुए हैं; जैसे- सरकार द्वारा प्राप्त किया गया, खर्च किया गया, उधार लिया गया अथवा छापी गयी मुद्रा। लोक वित्त अथवा सरकारी वित्त को अब लोक अर्थशास्त्र (Public Economics) भी कहा जाता है। इस विषय में सिर्फ इस बात की चर्चा नहीं की जाती है कि देश के कितने संसाधन का उपयोग सरकार अपने लिए करेगी बल्कि धन का उपयोग करने की कार्यक्षमता पर भी बल दिया जाता है। लोक वित्त का उल्लेख प्राचीन ऐतिहासिक पुस्तक कौटिल्य  कृत 'अर्थशास्त्र' में किया गया है, जिसमें राजकोष, राजस्व के स्रोत, लेखा एवं लेखा परीक्षण की विस्तार से चर्चा की गई है। यद्यपि इस विषय का द्वितीय विश्व युद्ध के बाद महत्त्व बढ़ गया, क्योंकि अर्थव्यवस्था में सरकार की भूमिका का विस्तार होने लगा। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अर्थव्यवस्था में सरकार की भूमिका का अहसास किया जाने लगा तथा यह माना जाने लगा कि अर्थव्यवस्था को पूरी तरह बाजार (निजी क्षेत्र) पर नहीं छोड़ा जा सकता है। रक्षा, कानून, स्वास्थ्य, शिक्षा, सामाजिक सुरक्षा, इत्यादि जैसे विषयों पर सरकार द्वारा ध्यान दिय जाना आवश्यक था। अर्थव्यवस्था में सरकारी भूमिका के बढ़ने के कारण विश्वमें सार्वजनिक क्षेत्र का उद्गम हुआ। जहाँ हम लोक वित्त से जुड़ी विशेष अवधारणाओं पर नजर डालेंगें (विशेष रूप से भारत के संदर्भ में)

राजकोषीय नीति का उद्देश्य-

राजकोषीय नीति की प्रकृति-

              प्रकृति के आधार पर चार प्रकार की राजकोषीय नीति देखी जाती है-

        1.   तटस्थ राजकोषीय नीति: बाजार आधारित अर्थव्यवस्था में जहां आर्थिक क्रियाएँ (उत्पादन, उपभोग विनिमय, निवेश आदि) बाजार द्वारा सम्पन्न की जाती है।

        2.   क्षति पूरक राजकोषीय नीति: बाजार शक्तियाँ कार्य करती रहेंगी लेकिन अर्थव्यवस्था में किन्ही कारणों से होने वाली क्षति को पूरा करने के लिए राज्य हस्तक्षेप करता है।

        3.   सक्रिय राजकोषीय नीति: आयोजन आधारित अर्थव्यवस्था में, जहां आर्थिक क्रियाएँ राज्य द्वारा                

               संपन्न की जाती है।

       4.    पहलकारी राजकोषीय नीति: आयोजन मिश्रित प्रणाली की अर्थव्यवस्था में जहां निजी क्षेत्रों को प्रोत्साहन के साथ-साथ सामाजिक न्याय के प्रश्न, आधारभूत संरचना के विकास आर्थिक क्रियाओं की परिस्थिति आदि का निर्माण राज्य द्वारा किया जाता है।

भारत में बजटरी व्यवस्था-

          1.      संचित कोष

          2.      सार्वजनिक कोष 

          3.      आकस्मिक कोष।

 (।)      संचित कोष [(अनुच्छेद 266(1)]: इसमें सरकार की संपूर्ण प्राप्तियां (आय + उधारी) प्रदर्शित की जाती है। इस कोष में व्यय के लिए संसद की अनुमति आवश्यक है। संसद यह अनुमति विनियोग विधेयक के माध्यम से प्रदान करती है।

(।।)          सार्वजनिक कोष: यह एक प्रकार का आकस्मिक व्यय को पूरा करने के लिए केन्द्र सरकार के संबंध में राष्ट्रपति तथा राज्य सरकार के संबंध में राज्यपाल के नाम ऐसा कोष है जो संसद की अनुमति के बिना अपरिहार्य परिस्थितियों में आवश्यक राशि प्रदान करता है। मूलतः यह 5 करोड़ रूपये का था, 1999 में पारित एक अध्यादेश द्वारा इसे 55 करोड़ रूपये कर दिया गया।

(।।।)          आकस्मिक कोष (अनुच्छेद 266): संचित फण्ड से संबंधित सामान्य स्वभाव की प्राप्तियों तथा व्ययों  के अतिरिक्त कुछ ऐसे ब्यवहार होते हैं, जो सरकारी खाते में आते हैं -

          1.    ऐसी प्राप्तियाँ जो वास्तव में सरकार की नहीं होती बल्कि सरकार दूसरों के लिए अपने पास रखती है  तथा जिन्हें बाद में लौटा देती है दूसरे शब्दों में सरकार बैंकर की भूमिका में होती है।

          2.    इसमें जनता की जमाएं स्वीकार की जाती है जैसे प्राविडेन्ट फंड, डाकखाने की बचत तथा अन्य।

          3.    इसमें से व्यय हेतु संसद की अनुमति आवश्यक नही होती है।

 

             (।)      प्रगतिशील कर व्यवस्था:- इसमें आय में वृद्धि के सापेक्ष कर की दरों में आनुपातिक वृद्धि होती है।

             (।।)     आनुपातिक कर व्यवस्था:- आय बढ़ने के सापेक्ष कर की दर स्थिर होती है। भारत में यही व्यवस्था लागू  है।

             (।।।)   प्रतिगामी कर व्यवस्था: इसमें आय स्थिर रहती है परंतु कर की दरें बढती जाती हैं। यह मुख्यतः अप्रत्यक्ष करों की वृद्धि के संदर्भ में देखी जाती है।

                        भारत में करों को वसूली और प्राप्ति के संदर्भ में तीन प्रकार से देखा जाता है-

             (।)      केन्द्र सरकार द्वारा वसूले गये एवं स्वयं के कोष में रखे जाने वाले कर।

             (।।)     केन्द्र सरकार द्वारा वसूले गये किन्तु राज्यों को इसमें से हिस्सा देना।

             (।।।)   राज्य सरकारों द्वारा वसूले गये कर जिसका प्रयोग वे स्वयं करते हैं।

1.         केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (1 जनवरी 1963 से कार्यरत)

            2.         केन्द्रीय उत्पाद और सीमा शुल्क बोर्ड।

भारत के विशेष सन्दर्भ में प्रत्यक्ष कर को अप्रत्यक्ष कर की तुलना में बेहतर माना जाता है, क्योंकि -

 (।)   उत्पादन संबंधी निर्णयों पर प्रत्यक्ष कर का प्रभाव कम पड़ता है, जबकि अप्रत्यक्ष कर का प्रभाव बहुत अधिक पड़ता है।

 (।।)   अप्रत्यक्ष करों के कारण निवेश तथा उत्पादन संबंधी निर्णयों में विकृतियाँ भी पैदा हो सकती है। इसके विपरीत  प्रत्यक्ष कर सामान्यतः प्रगतिशील होते हैं  अर्थात् कर की मात्रा भुगतान क्षमता पर निर्भर करती है।

 (।।।)  प्रत्यक्ष कर में सामान्यत: कर की दर में आय के मामले में वृद्धि की जाती है। अप्रत्यक्ष कर में यह स्थिति नहीं होती है और यहां कर का बोझ समान तौर से सभी पर पड़ता है जिससे सबसे अधिक निम्न आय वर्ग के लोग प्रभावित होते हैं।

 

बजट (Budget)

किसी भी अर्थव्यवस्था में सरकार के आगामी वर्ष के आय और व्ययके ब्यौरे को 'बजट' कहते हैं, लेकिन इस शब्द का उपयोग निजी कंपनी, कॉर्पोरेशन इत्यादि के लिए भी किया जा सकता है। बजट फ्रांसीसी शब्द 'बुगे' (Bugeut) से बना है, जिसका अर्थ-चमड़े का बैग होता है। ब्रिटेन में 18वीं सदी के मध्य में इस तरह के बैग से सरकारी आय तथा व्यय  के ब्यौरों को निकालकर संसद में प्रस्तुत किया जाता था। वर्तमान में इस शब्द को सरकार की वार्षिक आय और व्यय के ब्यौरों के वक्तव्य के लिए करते हैं। भारत में इस ब्यौरे का प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 112 में किया गया है, जिसे केन्द्रीय बजट कहते हैं। इसी तरह का प्रावधान राज्यों के लिए भी है।

बजट के आंकड़े

(Data in the Budget)

केन्द्रीय बजट में अर्थव्यवस्था के प्रत्येक क्षेत्र अथवा उप-क्षेत्र के लिए आँकड़ों का तीन समूह (सेट) होते हैं:-

(i) पिछले साल के वास्तविक आंकड़े (यहां पिछले साल का अर्थ उस साल से एक साल पहले है जिसका बजट पेश किया जा रहा है। मान लें कि साल 2016-17 का बजट पेश किया गया, इसमें साल 2015-16 के अंतिम/वास्तविक आंकड़े दिए जाएंगे। आंकड़ों के बाद हम या तो 'ए' लिखते हैं, जिसका अर्थ वास्तविक/अंतिम आंकड़े होता है या 'कुछ नहीं' लिखते (भारत में कुछ नहीं लिखा जाता)।

(ii) वर्तमान वर्ष के अस्थाई आंकड़े (चूंकि 2017-18 का बजट वित्त वर्ष 2016-17 के अंत में प्रस्तुत किया जा रहा है, इसलिए यह इस साल के लिए अस्थाई अनुमान उपलब्ध करवा देता है। इसे आंकड़ों के साथ कोष्ठक में 'पीई' लिखा जाता है)।

(iii) आने वाले वर्ष के लिए बजटीय अनुमान (यहां आने वाले वर्ष का अर्थ उस साल के अगले साल से है जिसमें बजट पेश किया जा रहा है या वह साल जिसके लिए बजट पेश किया जा रहा है, यानी कि 2017-18 इसे संबंधित आंकड़ों के साथ कोष्ठक में 'बीई' चिन्ह के साथ दर्शाया जाता है) सरकार के आर्थिक साहित्य में कई और आँकड़े देखने को मिलते हैं; यहां पर इस तरह के तीन प्रकार के आंकड़े दिए गए हैं:-

  1.           संशोधित अनुमान (Revised Estimates/RE) संशोधित आकलन मूलतः बजट के आकलन (BE) अथवा अस्थायी आंकड़ों (PE) का वर्तमान आकलन होता है। यह वर्तमान की स्थिति को दर्शाता है। ये अंतरिम आँकड़े हैं।
  2.           द्रुत अनुमान (Quick Estimate/QE) द्रुत अनुमान एक तरह का संशोधित आकलन है, जो अधिक नवीनतम स्थिति को दर्शाता है तथा कुछ क्षेत्रों एवं उप-क्षेत्रों के भविष्य के अनुमानों को दिखाने में उपयोगी है। ये अंतरिम आँकड़े हैं।
  3.           अग्रिम अनुमान (Advance Estimate/QE) अग्रिम आकलन एक तरह का तात्कालिक आकलन है, जो अंतरिम चरण (जब आँकड़ों को एकत्र किया जाता है) से पहले किया जाता है। ये अंतरिम आँकड़े हैं।

विकासात्मक तथा गैर-विकासात्मक व्यय

(Developmental and Non-Developmental Expenditure)

सरकार द्वारा उठाए गए खर्च को दो भागों में बाँटा जाता है - विकासात्मक तथा गैर-विकासात्मक। वे सभी व्यय जो प्रकृति से उत्पादनकारी होते हैं, विकासात्मक व्यय कहलाते हैं; जैसे-कारखाने, बाँध, पुल, सड़क, रेलवे इत्यादि पर किया गया खर्च यानि सभी निवेश।

वैसा सरकारी खर्च जो प्रकृति से उपभोगात्मक होते हैं तथा जिसमें किसी प्रकार का उत्पादन शामिल नहीं होता गैर-विकासात्मक व्यय कहलाता है; जैसे-वेतन, पेंशन, ब्याज अदायगी, छूट, रक्षा इत्यादि पर किया गया खर्च।

इस वर्गीकरण को अब भारतीय लोक वित्त प्रबंधन में नहीं उपयोग किया जाता है (योजनागत तथा गैर-योजनागत व्यय देखें)।

योजनागत तथा गैर-योजनागत व्यय

(Plan and Non-Plan Expenditure)

सरकार के द्वारा विभिन्न योजनाओं के अंर्तगत किया जाने वाली व्यय योजना व्यय कहलाता है। सामान्यतः सरकारें अपनी कल्याणकारी उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए अनेक प्रकार की योजनाएँ क्रियान्यवित करती हैं; जैसे- शिक्षा संबंधी योजना, स्वास्थ्य, पेयजल, आवास, सफाई, गरीबी उन्मूलन, रोजगार सृजन, ग्रामीण विकास, बुनियादी संरचना का विकास इत्यादि। इन योजनाओं पर किया जाने वाला सरकारी व्यय योजनागत व्यय कहलाता है। योजना व्यय उत्पादक प्रकृति के होते हैं, अतः इन व्ययों के तेजी से बँटने की स्थित में अर्थव्यवस्था के उत्पादन क्षमता में कोई विशेष वृद्धि नहीं होती है।

वित्त वर्ष 1987-88 से भारतीय लोक वित्त के साहित्य में परिवर्तन लाया गया जब विकासात्मक तथा गैर-विकासात्मक व्यय को योजनागत तथा गैर-योजनागत व्यय कहा जाने लगा (इस बदलाव का सुझाव सुखमय चक्रवर्ती समिति ने दिया था)।

इस दौरान सी. रंगराजन (प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद् के अध्यक्ष) की अध्यक्षता वाली उच्चाधिकार समिति ने सितंबर 2011 में सिफारिश की कि योजनागत और गैर-योजनागत व्यय को पूंजी और राजस्व व्ययके रूप में पुर्नपरिभाषित किया जाए, क्योंकि पहले वाले नाम 'अंतर को धुंधला' कर देते हैं। इससे व्यय को 'नतीजों' से जोड़ने में सुविधा मिलेगी और सरकारी खर्च बेहतर हो सकेगा। समिति की मुख्य सिफारिशें इस प्रकार हैं:

(i) बजट में योजनागत और गैर-योजनागत का अंतर न सरकारी खर्च के 'विकासात्मक' और 'गैर-विकासात्मक' आयाम का संतोषजनक अंतर उपलब्ध करवाता है, और न ही उचित बजटीय संरचना। इसलिए यह 'शिथिल' हो गया है।

(ii) योजना आयोग (पीसी) और वित्त मंत्रालय (एफएम) की भूमिकाओं को पुर्नपरिभाषित करने की सिफारिश की गई है। इनके अनुसार योजना आयोग को पंचवर्षीय योजना बनाने की जिम्मेदारी निभानी चाहिए और सालाना बजट तैयार

करने का काम वित्त मंत्रालय के पास होना चाहिए।

(iii) योजना आयोग को राज्यों की सालाना योजना की अनुमति देने के प्रयोग से अलग कर देना चाहिए। यह कोई रणनीति बना सकता है या राज्यों के प्रतिनिधियों के साथ बैठकें कर सकता है।

(iv) सार्वजनिक व्यय को पूंजी और राजस्व दो हिस्सों में बांट देना चाहिए।

(v) सार्वजनिक व्यय के 'प्रबंधन वाला नजरिया' होना चाहिए जो मापने योग्य 'नतीजों' पर आधारित हो। यह संकेत हैं कि इसकी जिम्मेदारी वित्त मंत्रालय के पास होनी चाहिए।

स्थिति का विश्लेषणः हालांकि बजट से आगे देखने की जरूरत को काफी स्वीकार किया गया है लेकिन कई ऐसे तत्व हैं, जो पंचवर्षीय योजनाओं के एक उपकरण के रूप में इस्तेमाल की 'कुशलता' और 'औचित्य' पर सवाल उठाते हैं। व्यय का योजनागत और गैर-योजनागत के बीच बंटवारा कृत्रिम है और समस्याएं पैदा करता है, जैसे कि:

  1.   योजनागत व्यय को प्राथमिकता दिए जाने का चलन है खासतौर पर तब जबकि वित्तीय मजबूती के लिए समय-समय पर खर्चों में कमी की जा रही हो। गैर-योजनागत खर्चों में कमी कर दी जाती है भले ही यह आर्थिक विकास के लिए अति महत्वपूर्ण हों। उदारहणार्थ अस्पताल, स्कूल और सिंचाई, बांधों जैसी परिसम्पत्तियों की देखरेख आदि, जो बजट के तहत बनाए जाते हैं लेकिन इनकी देखरेख को गैर-योजनागत व्ययमाना जाता है।
  2.   योजनाओं की समीक्षा और उन्हें लागू करना वित्त मंत्रालय, सांख्यिकी और कार्यक्रम निष्पादन मंत्रालय की सीधे जिम्मेदारी वाले दूसरे क्षेत्र हैं। वित्त मंत्री ने खुद 2005-06 के बजट भाषण में यह सुनिश्चित करने का वायदा किया था कि कार्यक्रम और योजनाएं एक योजनाकाल से दूसरे तक स्वतंत्र और गहरे मूल्यांकन के बिना नहीं चलने दिए जाएंगे। योजना आयोग, जो योजना आवंटन के केंद्रबिन्दु के रूप में काम कर रहा है, इस मामले में वित्त मंत्री की भूमिका को हल्का कर देता है।
  3.  'उत्पादन' और 'नजीता आधारित बजट बनाना' केंद्र सरकार ने 2005-06 में शुरू किया था। गैर-योजनागत व्यय इस की परिधि से बाहर ही रहा। उदाहरण के लिए स्कूल और अस्पताल चलाने पर किए गए खर्च के नतीजे का मूल्यांकन नहीं किया जाएगा। यह एक बार फिर योजनागत और गैर-योजनागत खर्चों में कृत्रिम विभाजन का नतीजा यह वर्गीकरण संपूर्ण बजट प्रक्रिया, निर्माण एवं कार्यान्वयन पर प्रतिकूल प्रभाव डालता था। इस विसंगति को देखते हुए सरकार ने राजकोषीय वर्ष 2017-18 के समय से ही (जैसा कि संघीय बजट 2017-18 में घोषित किया गया है) 'योजना' और 'गैर-योजना' व्यय के वर्गीकरण को 'राजस्व' और 'पूंजी' के वर्गीकरण में हस्तांतरित कर दिया है।

राजस्व (Revenue)

            किसी कंपनी अथवा सरकार द्वारा पैसों का उपार्जन (आय के रूप में), जिसके कारण सरकार पर वित्तीय भार नहीं पड़ता हो (जैसे-कर से प्राप्त आय, गैर-कर आय तथा विदेशी अनुदान) को राजस्व माना जाता है।

गैर-राजस्व (Non-Revenue)

            किसी कंपनी अथवा सरकार के द्वारा जैसे धन की प्राप्ति, जिसे आय अथवा उपार्जन के श्रेणी में नहीं रखा जाता हो, गैर-राजस्व स्रोत कहलाता है; जैसे-ऋण के द्वारा धन की प्राप्ति।

प्राप्तियाँ (Receipts)

            राजस्व तथा गैर-राजस्व स्रोतों द्वारा सरकार को प्राप्त होने वाले धन की संभूति को प्राप्ति (Receipt) कहते हैं। उनके योग को कुल प्राप्ति (Total Receipts) कहते हैं।

राजस्व प्राप्तियाँ (Revenue Receipts)

            सरकार के राजस्व की प्राप्ति को दो भागों में बाँटा जा सकता है - कर राजस्व प्राप्ति तथा गैर-कर राजस्व प्राप्ति।

कर राजस्व प्राप्तियाँ (Tax Revenue Receipts)

            विभिन्न करों (प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष) को लागू कर सरकार द्वारा किया गया पैसों का उपार्जन, कर राजस्व प्राप्ति कहलाता है।

गैर-कर राजस्व प्राप्तियाँ (Non-Tax Revenue Receipts)

            सरकार द्वारा कर के अतिरिक्त अन्य स्रोतों से उपार्जित पैसों को गैर-कर राजस्व प्राप्ति कहते हैं। भारत में इस किस्म की प्राप्ति में निम्नलिखित शामिल हैं:-

लाभ और लाभांश, जो सरकार को इसके सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसयू) से मिलते हैं।

  1.       सरकार द्वारा आगे दिए गए सभी ऋणों, चाहे ये देश के अंदर दिए गए हों (आंतरिक ऋण) या देश के बाहर (बाहरी ऋण) पर मिलने वाला ब्याज। इसका अर्थ यह हुआ कि यह आय दोनों घरेलू और विदेशी मुद्रा में हो सकती है।
  2.      वित्तीय सेवाओं (Fiscal Services) से भी सरकार को आय की प्राप्ति होती है; जैसे-मुद्रा को छापने, डाक-टिकट को छापने इत्यादि।
  3. सामान्य सेवाओं से भी सरकार को आय की प्राप्ति होती है; जैसे- विद्युत वितरण सिंचाई, बैंकिंग, बीमा, सामुदायिक सेवाएँ इत्यादि।
  4. फीस तथा जुर्माना से सरकार को हुई आय की प्राप्ति।

(vi)        सरकार द्वारा प्राप्त अनुदान केंद्र सरकार के संदर्भ में यह हमेशा बाह्य   होता है तथा राज्य सरकार के संदर्भ में यह हमेशा आंतरिक होता है।

राजस्व व्यय (Revenue Expenditure)

            सरकार द्वारा उठाया गया वैसा सभी व्यय, जो राजस्व किस्म (Revenue kind) अथवा बाध्यताकारी किस्म (Compulsive kind) के हों, राजस्व व्यय कहलाते हैं। इस प्रकार के व्यय का मूल पहचान यह है कि वे उपभोगात्मक होते हैं तथा उनमें उत्पादक परिसम्पत्ति सृजन करना शामिल नहीं है। इसका उपयोग सरकार को चलाने अथवा एक उत्पादक प्रक्रिया को चालू रखने के लिए किया जाता है।

भारत में इस प्रकार के व्यय में निम्नलिखित को शामिल किया जाता है:-

  1. आंतरिक तथा बाह्य कर्ज पर सरकार द्वारा दिया जाने वाला ब्याज।
  2.  सरकार द्वारा सरकारी कर्मचारियों को दिया जाने वाला वेतन तथा पेंशन।
  3. सभी क्षेत्रों में सरकार द्वारा दी जाने वाली छूट/रियायत।
  4. सरकार द्वारा उठाया गया रक्षा खर्च।
  5. सरकार का डाक-घाटा (Postal Deficit)।

(vi) विधि-व्यवस्था पर किया जाने वाला व्यय (पुलिस तथा अर्द्ध-सैन्य बल)।

(vii) सामाजिक सेवाओं तथा आम सेवा प्रदान किए जाने पर किया गया खर्च।

 (viii) सरकार द्वारा भारतीय राज्यों तथा अन्य देशों को दिया जाने वाला अनुदान।

राजस्व घाटा (Revenue Deficit)

            सरकारी बजट के राजस्व खाते की कुल व्यय यदि कुल आय से अधिक हो तो घाटे की मात्रा राजस्व घाटा कहलाता है। राजस्व व्यय अनिवार्य है तथा तात्कालिक होता है। ऐसे व्यय उपभोगात्मक तथा अनुत्पादक होते हैं। इस प्रकार के व्ययको वित्तीय नीति के क्षेत्र में अपराध माना जाता है। इस घाटे को कम करने के लिए खर्च किए जाने वाले पैसे का उपयोग किसी भी विकासात्मक कार्य के लिए किया जा सकता है। भारत में इस नयी शब्दावली का प्रयोग वित्त वर्ष 1997-98 से प्रारम्भ हुआ।

            सरकारी बजट के राजस्व खाते की यदि कुल आय कुल व्यय से अधिक हो तो यह आधिक्य राजस्व अधिशेष (Revenue Surplus) कहलाता है। इस तरह की वित्तीय नीति को बेहतर माना जाता है, क्योंकि राजस्व अधिशेष के पैसों को उपयोग उत्पादक क्षेत्रों में किया जा सकता है। दूसरी बात जो ध्यान में रखी जानी चाहिए कि किस प्रकार सरकार ने इस अधिशेष का प्रबंधन किया है तथा इस दिशा में अपनाई गई नीति औचित्यपूर्ण है अथवा नहीं। दूसरी पंचवर्षीय योजना में भारत राजस्व अधिशेष राज्य बन गया, लेकिन विशेषज्ञों ने इसकी सराहना नहीं की है, क्योंकि प्रभाव अर्थव्यवस्था पर अच्छा नहीं था - कर के अधिक दर हो जाने के कारण कर की चोरी होने लगी तथा भ्रष्टाचार, काला-धन इत्यादि भी अर्थव्यवस्था में व्याप्त हुआ।

            किसी भी वित्त वर्ष के राजस्व घाटे को मात्रात्मक रूप अथवा सकल घरेलू उत्पाद के प्रतिशत के रूप में दर्शाया जाता है। सामान्यतः राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय आकलन के लिए इसे प्रतिशत के रूप में दर्शाया जाता है।

प्रभाव राजस्व घाटा

(Effective Revenue Deficit)

            प्रभावी राजस्व घाटा (ERD) एक नयी अवधारणा है जिसे संघीय बजट 2011-12 द्वारा पहली बार इस्तेमाल किया गया। परंपरागत रूप से राजस्व घाटा (RD) सरकार की राजस्व प्राप्ति और व्यय के बीच का ऋणात्मक अंतर है। ज्ञात हो कि इस घाटे में केंद्र सरकार के वे व्ययभी शामिल होते हैं जो वह राज्य सरकारों को 'अनुदान' के रूप में देता है और इनसे कई विकासशील परिसम्पत्तियों का सृजन होता है। हालांकि इन परिसम्पत्तियों का स्वामित्व केंद्र के बजाय राज्यों का होता हैं। केन्द्रीय वित्त मंत्री (वर्ष 2011-12) के अनुसार केंद्र के इस व्ययको 'गैर-विकासात्मक' या 'अनुत्पादक' नहीं माना जा सकता, क्योंकि इनसे प्रत्यक्ष विकासशील निवेश होता है। इस प्रकार यह तर्क रखा गया कि इस कारण केंद्र के राजस्व व्ययमें से उन खर्चों को, जिनसे राज्यों में परिसम्पत्तियाँ सृजित होती हैं, को घटाकर देखा जाना चाहिए

और जो मात्रा बचती है वास्तव में वहीं केंद्र का राजस्व घाटा माना जाना चाहिए। इसे सूचित करने के लिए ही इस नयी अवधारणा का ERD उपयोग किया गया अर्थात् ERD की प्राप्ति केंद्र के राजस्व घाटे में से उसके 'पूंजीगत अस्तियों संबंधी अनुदानों' को घटाने से होती है। इन अस्तियों में मुख्यतया: प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, त्वरित सिंचाई लाभ कार्यक्रम आदि शामिल थे।

            इस 'पद' का प्रयोग उस समय की सरकार द्वारा अपने राजस्व घाटे में कुछ तार्किकता प्रदर्शित करने के लिए किया गया था कि ये सभी एक सामान्य राजस्व व्यय (जो अपनी प्रकृति में उपयोग की वस्तु) की तरह नहीं थे और इनमें से कुछ का इस्तेमाल 'पूंजीगत सम्पत्तियों' के सृजन (हालांकि इन्हें व्ययके 'पूंजी' मद में नहीं प्रदर्शित किया जा सकता था) में भी किया गया था। हालांकि केंद्र की नई सरकार ने इस 'पद' को पूर्व प्रचलित महत्व नहीं दिया है। फिर भी इस आंकड़े को जारी कर रही है।

            संघीय बजट 2017-18 प्रभावी राजस्व घाटे में वर्ष 2017-18 में 0.7 प्रतिशत और वर्ष 2018-19 में 0.2 प्रतिशत की कमी लाने के लिए प्रतिबद्ध है (इसके वर्ष 2016-17 में 1.2 प्रतिशत होने का अनुमान था), जबकि बजट में वर्ष 2017-18 के लिए राजस्व घाटा 1.9 प्रतिशत एवं वर्ष 2018-19 के लिए 1.4 प्रतिशत निर्धारित किया गया है।

राजस्व बजट (Revenue Budget)

            बजट का वह भाग जिसका संबंध राजस्व के व्यय तथा आय से हो। इस बजट में कुल राजस्व प्राप्ति तथा कुल राजस्व व्यय का वार्षिक वित्तीय ब्यौरा प्रस्तुत किया जाता है। यह अतिरेक (surplus) या घाटे (Deficit) दोनों ही तरह का हो सकता है।

पूँजी बजट (Capital Budget)

            यह बजट का वह भाग है, जिसका संबंध पूँजी की प्राप्ति तथा व्ययसे है। यह उन साधनों को दर्शाता है जिसके द्वारा पूँजी का प्रबंध न किया जाता है तथा उन क्षेत्रों को दर्शाता है जहाँ पूँजी का व्यय होता है।

पूँजी प्राप्तियाँ (Capital Receipts)

            किसी भी सरकार की सभी गैर-राजस्व प्राप्तियों को पूँजी प्राप्ति कहा जाता है। इस प्रकार की पूँजी का उद्देश्य निवेश करना होता है तथा सरकार इसका उपयोग योजना विकास के लिए करती है। भारत में पूँजी प्राप्ति में निम्नलिखित को शामिल किया जाता है:-

(i) ऋण की वसूली

            यह पूँजी प्राप्ति का एक स्रोत है। इसके अंर्तगत सरकार द्वारा दिए गए ऋण (भारत में तथा विदेश में) की अदायगी से पूँजी प्राप्ति होती है तथा सरकार को इन ऋणों पर ब्याज भी प्राप्त होता है, जिन्हें राजस्व प्राप्तियों में शामिल किया जाता है।

(ii) सरकार द्वारा लिया गया कर्ज

            सरकार द्वारा लिए गए कर्ज से भी पूँजी की प्राप्ति होती है। इसमें दोनों किस्म के कर्ज शामिल हैं - आंतरिक कर्ज तथा बाह्य कर्ज। आंतरिक कर्ज में सरकार द्वारा भारतीय रिजर्व बैंक, अन्य भारतीय बैंक तथा वित्तीय संस्थानों से लिया गया कर्ज शामिल होता है। इसी तरह बाह्य कर्ज में सरकार द्वारा विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, विदेशी बैंक, दूसरे देश की सरकारों, विदेशी वित्तीय संस्थानों इत्यादि से लिया गया ऋण शामिल होता है।

(iii)  सरकार की अन्य प्राप्तियाँ

            इसमें लम्बी अवधि के पूँजी उपचय शामिल होते हैं, जो सरकार को भविष्य निधि, लघु बचत योजना, इंदिरा विकास पत्र, किसान विकास-पत्र इत्यादि से प्राप्त होते हैं।

पूँजी व्यय (Capital Expenditure)

            वैसे सभी क्षेत्र, जिन्हें सरकार से पूँजी उपचय (accruals) शामिल होते हैं जो सरकार को भविष्य निधि, लघु बचत योजना, इंदिरा विकास-पत्र, किसान विकास-पत्र, इत्यादि से प्राप्त होते हैं। वैसे सभी क्षेत्र जिन्हें सरकार से पूँजी प्राप्त होती है पूँजी व्यय का भाग होते हैं। भारत में इसमें निम्नलिखित शामिल हैं:-

(i) सरकार द्वारा वितरित ऋण

            इसमें सरकार द्वारा दिए गए आंतरिक ऋण (राज्यों, केंद्रशासित प्रदेशों, सार्वजनिक क्षेत्र उद्यमों इत्यादि को) तथा बाह्य ऋण (अन्य देशों, विदेशी बैंकों इत्यादि) शामिल हैं।

(ii) सरकार द्वारा पूर्व में लिए गए ऋणों की अदायगी

            इसमें सरकार द्वारा लिए गए आंतरिक तथा बाह्य ऋणों की अदायगी शामिल है। इन ऋणों पर दिया जाने वाला ब्याज राजस्व व्यय के अंर्तगत आता है।

(iii) सरकार का योगनागत व्यय

            इसके अंर्तगत वे सभी व्यय आते हैं, जिनका उपयोग केंद्र सरकार योजनागत विकास तथा राज्यों के योगनागत विकास को समर्थन देने के लिए करती है।

(iv) सरकार द्वारा रक्षा पर किया जाने वाला पूँजी व्यय

            इसमें वे सभी पूँजी खर्च शामिल हैं जो सरकार सेना के लिए करती है। यह ध्यान में रखा जाना चाहिए कि रक्षा व्यय एक गैर-योजनागत व्ययहै, जिसमें पूंजी तथा राजस्व व्यय शामिल होते हैं।

(v) सामान्य सेवाओं के लिए

            सामान्य सेवा; जैसे-रेलवे, डाक विभाग, जलापूर्ति, शिक्षा, ग्रामीण विस्तार इत्यादि के लिए भी पूँजी व्यय की आवश्यकता है।

(vi) सरकार की अन्य अभिदेयताएं

            सरकार की अन्य अभिदेयताएं:- जैसे- पेंशन का भुगतान, लघु बचत योजनाओं की अदायगी तथा भविष्य निधि के भुगतान के लिए भी पूँजी व्यय की आवश्यकता होती है।

(vii) सरकार की अन्य देनदारियां

            मूलत: इसके अंर्तगत अन्य प्राप्तियों के पद पर सरकार की सभी पुनर्भुगतान देनदारियां अथवा दायित्व आते हैं। देनदारियों का स्तर इस तथ्य पर निर्भर होता है कि सरकार द्वारा विगत में कितनी प्राप्तियां हासिल की गई हैं। किस साल में कितना भुगतान दायित्व-यह इस बात पर निर्भर करता है कि विगत में किस वर्ष सरकार के पास कितनी परिपक्वता अवधि की प्राप्तियां उपलब्ध कीं। उदाहरण के लिए, भविष्य निधि (PF) देनदारी ऐसी देनदारियों का हिस्सा आजादी के बाद के तीन दशकों तक नहीं रही थी, लेकिन जब सरकारी कार्यकारी सेनानिवृत्ति होने लगे, यह देनदारी लगातार बढ़ती चली गई। बाद में (विशेषकर 1960 एवं 1970 के दशकों में) भारत में सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSUs) का विस्तार हुआ और इनमें अत्यधिक रोजगार सृजित हुए (श्रम की आवश्यकता के तर्क को अनदेखा कर)। हम 1990 के दशक में जीएफ देनदारियों को भारी मात्रा में बढ़ता देखते हैं। इस दबाव का मुकाबला करने के लिए सरकार ने पीएफ पर ब्याज में कटौती का रास्ता अपनाया या फिर जैसाकि अभी इसे आधार अर्थव्यवस्था के ऊपर छोड़ देने का प्रयास करती दिख रही है। यही हाल पेंशन का हुआ और इसके लिए हम एक बाजार आधारित प्रणाली अपनाने में सफल हुए जबकि पेंशन सुधार की चुनौती सामने आई और इसकी के साथ इस क्षेत्र के लिए पेंशन नियामक प्राधिकार भी अस्तित्व में आया।

पूँजी घाटा (Capital Deficit)

            सार्वजनिक वित्त या अर्थशास्त्र में ऐसा कोई शब्द नहीं है। लेकिन व्यवहार में अक्सर यह शब्द पूंजी की कमी, पूंजी की विरलता के अर्थ में रोजमर्रा के आर्थिक समाचारों में सुनने में आता है। दरअसल, जिस सरकार का खबरों में जिक्र हो रहा होता है वह सार्वजनिक व्ययके लिए अपेक्षित निधि, धन, पूंजी के प्रबंधन की समस्या से जूझ रही होती है। ऐसे खर्चे राजस्व से संबंधित भी हो सकते हैं, या पूंजी से जुड़े हुए भी। विकासशील अर्थव्यवस्था में पूंजीगत व्ययकी उच्च आवश्यकता के चलते इस तरह की मुश्किलें हमेशा बनी रहती हैं। क्या इस स्थिति को दर्शाने के लिए अगर कोई उपयुक्त शब्द है, यह स्वाभाविक रूप से पूंजी घाटा रहा है।

राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit)

            यदि सरकार की कुल प्राप्ति (राजस्व व पूँजी प्राप्ति) तथा कुल व्यय (राजस्व व पूँजी व्यय) का संतुलन नकारात्मक हो तो यह राजकोषीय घाटे को दर्शाता है। इस अवधारणा का उपयोग भारत में वित्त वर्ष 1997-98 से किया जा रहा है।

राजकोषीय घाटे का अभिप्राय यह है कि सरकार द्वारा किया गया खर्च उनके साधनों से कहीं अधिक है, यानि सरकार अपने आय से अधिक व्यय कर रही है। राजकोषीय घाटे को मात्रात्मक रूप अथवा सकल घरेलू उत्पाद के प्रतिशत के रूप में दर्शाया जा सकता है। राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय अध्ययनों के लिए सामान्यत: इसे प्रतिशत में ही दर्शाया जाता है। भारत में प्रायः यह घाटा देखा गया है तथा यह घाटा बहुत

अधिक होता रहा है।

            वित्तीय घाटे को मात्रात्मक रूप में (यानी कि घाटे का कुल मौद्रिक मूल्य) या उस विशेष वर्ष की जीडीपी के प्रतिशत के रूप में दिखाया जा सकता है। सामान्यतः घरेलू या अंतर्राष्ट्रीय अध्ययनों (यानी कि तुलनात्मक अर्थशास्त्र) में प्रतिशत का इस्तेमाल किया जाता है।

भारत एक ऐसा देश रहा है जहां न सिर्फ नियमित बल्कि भारी वित्तीय घाटा रहा है। इसके अलावा इसके वित्तीय घाटे की संरचना आलोचना का आसान शिकार भी रही है।

प्राथमिक घाटा (Primary Deficit)

            वित्तीय घाटा, एक साल की ब्याज देनदारियां हटाकर, प्राथमिक घाटा है। इस शब्द का इस्तेमाल भारत ने 1997-98 के बजट से करना शुरू किया था। यह उस साल अर्थव्यवस्था के वित्तीय घाटे को दर्शाता है, जिसमें विभिन्न ऋणों और देनदारियों पर ब्याज का भुगतान नहीं करना है। यह मात्रात्मक और जीडीपी के प्रतिशत दोनों रूपों में दिखाया जाता है।

इसे सरकार के व्ययके स्वरूप में ज्यादा पारदर्शिता लाने के लिए एक बहुत कारगर उपकरण माना जाता है। इससे किन्हीं भी दो सालों की तुलना की जा सकती है और बहुत सारी चीजें स्पष्टत: जानी जा सकती हैं।

मौद्रीकृत घाटा (Monetised Deficit)

            राजकोषीय घाटे का वह भाग, जिसकी आपूर्ति सरकार को RBI द्वारा की गयी (कर्ज के रूप में) उसे मौद्रीकृत घाटा कहा जाता है। इस नयी अवधारणा को भारत द्वारा वर्ष 1997-98 से उपयोग में लाया जा रहा है। किसी वित्त वर्ष के लिए इसे मात्रात्मक तथा सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के प्रतिशत के रूप में दर्शाया जाता है।

इस अवधारणा का विकास एक नयी शुरूआत है जिसके द्वारा भारत सरकार के बाजार ऋणों (Market Borrowings) पर निर्भरता तथा राजकोषीय प्रबंधन में पारदर्शिता लायी जाती है। वास्तव में अपनी दीर्घावधिक पूंजीगत आवश्यकताओं के लिए के लिए भारत सरकार और राज्य सरकारें बाजार ऋणों (जो आंतरिक ऋण हैं) पर बड़े अर्थों में निर्भर रही है। इस बाजार ऋण का प्रबंध RBI करती है। इसके अतिरिक्त सरकार अपनी प्रतिभूतियों, बॉण्डों आदि से जो बाजार ऋण लेती रही उसका प्राथमिक ग्राहक (Primary) भी RBI ही रहा है (वैसे 2006-07 से अब RBI पर यह बाध्यता नहीं रही)। इन माध्यमों से सरकार भी मात्रा में आंतरिक ऋणों की उगाही करती रही है तथा भारत की राजकोषीय नीति का यह एक चिंताजनक पहलू रहा था। वर्ष 1991 में शुरू की गई किए राजकोषीय समेकन की प्रक्रिया के प्रारम्भ का यह एक प्रतिफल है कि इस अवधारणा का विकास किया गया। अब सरकार RBI को दीर्घावधिक ऋणों की उगाही के लिए बाध्य नहीं करती है। वह अब इससे सिर्फ अर्थोपाय अग्रिम (Ways and Means Advances) के माध्यम से ही ऋण लेती है, जो छोटी अवधि के ऋण हैं (364 दिनों तक के)।

बजट घाटा तथा बजट (Deficit and Surplus Budget)

            सरकारी बजट की कुल आय (राजस्व खाते की आय + पूँजी खाते की आय) यदि व्यय से अधिक हो तो इस आधिक्य को बजट अधि शेष (Budget Surplus) कहते हैं। इसी तरह सरकारी बजट का कुल व्यय (राजस्व खाते का आय + पूँजी खाते का व्यय) यदि कुल आय (राजस्व खाते का आय + पूंजी खाते का आय) से अधिक हो तो यह आधिक्य बजट घाटा (Budget Deficit) कहलाता हैं।

व्यवहार में दुनिया भर की सरकारें अधिशेष वाला बजट पेश नहीं करती क्योंकि इससे सरकारों की विकास के प्रति उदासीनता का प्रतीक माना जाता है। लेकिन राजनीतिक हथियार के रूप में सरकार ऐसा बजट ला सकती है (उदाहरण के लिए 2006-07 का उत्तराखण्ड का बजट एक अधिशेष बजट था)। कोई सरकार किसी विकासशील राज्य में अधिशेष का बजट कैसे ला सकती है जबकि विकसित देशों को भी विकास की जरूरत होती है और वहां घाटे के बजट आ रहे हैं? भारत में केंद्र सरकार के बजट को अभी तक एक अधिशेष बजट के रूप में पेश नहीं किया गया है। पहली बार 1930 में अमेरिका में सार्वजनिक वित्त के क्षेत्र में इस शब्द (घाटे की वित्त व्यवस्था) का इस्तेमाल किया गया था, आज इसका इस्तेमाल कॉर्पोरेट सेक्टर भी कर रहा है और व्यावसायिक रणनीति के तहत किसी कंपनी का वित्तीय प्रबंधन इसका इस्तेमाल भी कर सकता है। किसी बीमारी कंपनी को कई साल तक घाटे की वित्तीय व्यवस्था का रास्ता अपनाना पड़ सकता है ताकि वह खतरे के निशान से ऊपर आ सके (यानी कि नुकसान को बंद कर सके)।

घाटे का वित्त पोषण (Deficit Financing)

            यह सरकार द्वारा बजट घाटे के लिए की गई वित्त प्रबंध की प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया में सरकार को यह पूर्व से ही मालूम होता है कि उसका कुल व्यय कुल प्राप्ति से अधिक होगा तथा वह ऐसी नीतियों का निर्धारण करती है, जिससे इस घाटे को वहन किया जा सके। इसका पहली बार उपयोग 1930 के दशक में संयुक्त राज्य अमेरिका में लोक वित्त के क्षेत्र में किया गया। अब इस शब्द का प्रयोग 'कॉर्पोरेट क्षेत्र' में भी किया जाता है।

            तीस के दशक की शुरूआत में अमेरिका को पहले घाटे की वित्त व्यवस्था में हाथ आजमाने पड़े और फिर पूरे यूरोप-अमेरिका की सरकारों ने यह रास्ता अपनाया। हालांकि इस रास्ते से विकसित दुनिया महामंदी (1929) के खौफ से बाहर निकल आई। साठ के दशक तक यह विचार पूरी दुनिया में लोकप्रिय हो गया। भारत ने घाटे की वित्त व्यवस्था में अपने हाथ 1969 में आजमाए और 1970 से यह एक नियमित कार्यक्रम बन गया, तब तक जब तक कि यह निराधार और अतार्किक नहीं हो गया और तुरंत सुधार की मांग नहीं करने लगा। भारत में वित्तीय घाटा न सिर्फ अवहनीय स्तर के शीर्ष पर पहुंच गया बल्कि इसकी संरचना ही न्यायसंगत नहीं थी और अर्थशास्त्र के आधारभूत सिद्धांतों के अनुरूप नहीं थी। अंतत: भारत ने वित्तीय सुधारों की धीमी लेकिन सुदृढ़ प्रक्रिया शुरू की जिसे वित्तीय मजबूती की प्रक्रिया के रूप में भी जाना जाता है।

घाटे के वित्त पोषण की आवश्यकता

(Need of Deficit Financing)

            1920 के दशक में इस प्रकार की नीति की आवश्यकता महसूस की गई तथा इस अवधारणा का उद्भव हुआ। इसकी आवश्यकता तब होती है, जब सरकार को किसी निर्धारित अवधि में विकास हेतु उपार्जन से अधिक खर्च करने की आवश्यकता होती है। विकास होने के बाद आय से अधिक खर्च किए गए पैसों की प्रतिपूर्ति की जाती है - यही सोच इसका आधार है।

1930 के दशक में पहली बार संयुक्त राज्य अमेरिका ने इस प्रकार की नीति को अजमाया तथा उसके तुरंत बाद सभी यूरोप-अमेरिकी सरकारों ने इस नीति का अनुसरण किया। इस नीति के द्वारा ही विश्व के विकसित देश 1929 की आर्थिक मंदी से उभर पाए। 1960 के दशक में यह अवधारणा विश्वभर में लोकप्रिय हो गई। भारत ने वित्तीय अभाव की नीति को 1969 में अजमाया तथा 1970 के दशक से यह एक अनिवार्य नीति बन गई। धीरे-धीरे भारत ने राजकोषीय सुधार की प्रक्रिया को अपनाया, जिसे वित्तीय समेकन (Fiscal Consolidation) की प्रक्रिया कहा जाने लगा।

(i) विदेशी सहायता (External Aids): यह सबसे उचित साधन है जिसके द्वारा सरकारी घाटे की आवश्यकता को पूरा किया जा सकता है यदि यह निम्न ब्याज के साथ आता हो तो भी। यदि यह सहायता बगैर ब्याज के आता हो तो इससे बेहतर और कुछ नहीं हो सकता। विदेशी अनुदान (External Grants) इससे भी बेहतर साधन है, क्योंकि न तो इस पर किसी किस्म का ब्याज होता है तथा न ही इसकी अदायगी जरूरी है, यह निःशुल्क होता है। इस तरह का अनुदान भारत को पोखरण परमाणु परीक्षण (सन् 1975) के बाद मिलना बंद हो गया। कई बार भारत ने इस तरह के अनुदान को नहीं स्वीकार है; जैसे- सुनामी के उपरांत भारत को दिया गया अनुदान (क्योंकि इनमें शर्ते छुपी होती हैं)।

(ii) विदेशी ऋण (External Borrowings): विदेशी ऋण वित्तीय घाटे को संभालने का दूसरा सबसे बेहतर तरीका है, बशर्ते कि वे तुलनात्मक रूप से सस्ते तथा लंबी अवधि के हों। यद्यपि विदेशी ऋण को देश की संप्रभु निर्णय लेने की प्रक्रिया पर हस्तक्षेप माना जाता है, लेकिन इसके अपने फायदे हैं तथा यह आंतरिक ऋण से दो का ऋणों से बेहतर माना जाता है: - विदेशी ऋण विदेशी मुद्रा के रूप में आता है जिससे सरकारी खर्च को अतिरिक्त फायदा होता है, सरकार चाहे तो इस ऋण का उपयोग देश के अंदर अथवा आयात पर टिकी विकास की आवश्यकताओं के लिए कर सकती है।

यह 'क्राउडिंग ऑउट' (Crowding Out) प्रभाव के कारण भी बेहतर माना जाता है, क्योंकि सरकार यदि देश के बैंकों से ऋण लेगी तो अन्य निवेश के लिए कहाँ से ऋण लेंगे?

(iii) आंतरिक ऋण (Internal Borrowings): आंतरिक ऋण वित्तीय घाटे को कम करने का तीसरा सबसे बेहतर तरीका है, लेकिन यदि इस किस्म का ऋण अत्यधिक लिया गया तो जनता तथा निजी क्षेत्र के निवेश संभावनाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, अर्थव्यवस्था पर दोहरा नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, अर्थव्यवस्था पर दोहरा नकारात्मक प्रभाव पड़ता है - निम्न निवेश (जिसके कारण निम्न उत्पादन, निम्न सकल घरेलू उत्पाद तथा निम्न प्रति व्यक्ति आय इत्यादि) व निम्न माँग (आम जनता तथा निजी क्षेत्र द्वारा) - अर्थव्यवस्था की गति धीमी पड़ जाती है, जैसा कि 1960, 1970 तथा 1980 के दशकों में देखा गया।

(iv) मुद्रा छाप कर (Printing currency): यह वित्तीय घाटे को कम करने का अंतिम हथियार है। लेकिन इस साधन की विकलांगता यह है कि सरकार इसके द्वारा वह व्यय नहीं कर सकती है जिसे विदेशी मुद्रा में किया जाना है। मुद्रा छापने के

कारण अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले अन्य प्रतिकूल प्रभाव निम्नलिखित हैं:

यह आनुपातिक रूप में मुद्रास्फीति में वृद्धि करता है।

 - यह सरकारी कर्मचारियों के वेतनमान में संशोधन करने के लिए सरकार को बाध्य करता है जिसके कारण सरकारी खर्च का भार अधिक हो जाता है। सरकार इन सभी साधनों में से किसी भी साधन का चयन कर अपने वित्तीय घाटे को कम कर सकती है। सामान्यतः सरकारें वित्तीय प्रबंधन के लिए इन सभी साधनों के संयोजन का प्रयोग करती है।

राजकोषीय घाटे के संघटक (Composition of Fiscal Deficit)

            वित्तीय अभाव के लिए जे.एम. केन्स (J.M. Keynes) की अवधारणा को सामान्यतः सभी तीसरे विश्व की अर्थव्यवस्थाओं ने अपनाया, लेकिन उसके पूर्ण अर्थों पर अमल नहीं किया गया। यह अवधारणा इस बात पर आधारित थी कि क्यों कोई अर्थव्यवस्था, राजकोषीय घाटे से निपटने के लिए कदम उठाना चाहती है। इस प्रश्न को समझने के लिए राजकोषीय घाटे की बनावट/संघटन का आकलन आवश्यक है।

सरकार के राजस्व एवं पूंजीगत व्ययमें निम्नलिखित बनावट का सुझाव दिया गया है: (i) अधिशेष राजस्व बजट अथवा शून्य राजस्व व्ययके साथ राजकोषीय घाटा सबसे बेहतर संयोजन है तथा वित्तीय अभाव की नीति के लिए सबसे उपयुक्त है।

(ii) निम्न राजस्व व्यय तथा अधिक पूंजी व्ययके लिए घाटे की आवश्यकता इसके लिए दूसरा बेहतर विकल्प है बशर्ते कि राजस्व घाटे को शीघ्र ही मिटा दिया जाए।

(iii) अंतिम स्थिति ऐसी हो सकती है जब वित्तीय अभाव को कम करने की नीति का मुख्य भाग राजस्व व्ययकी पूर्ति करता है तथा एक लघु भाग पूँजी व्ययके लिए होता है। घाटे का पूरा पैसा राजस्व व्यय में जा सकता है, जो इसका सबसे बदतर रूप हो सकता है।

            भारत में घाटे की वित्त व्यवस्था के पीछे बेहतर कारण कम गैर-योजनागत खर्च या उच्च योजनागत खर्च थे (हालांकि भारत में पूंजीगत व्ययका विशिष्ट लक्षण रहा है जो इस गठजोड़ को घाटे की वित्तीय व्यवस्था का ऐसा प्रकार बना देता है जिसकी सलाह नहीं दी जाती)।

            हालांकि विकासशील देशों की अर्थव्यवस्थाएं (भारत समेत) भारी से भारी राजकोषीय घाटे और घाटे की वित्तीय व्यवस्था का इस्तेमाल कर रही थीं लेकिन या तो वे पूंजी और गैर-आय खर्चों के लिए उपयुक्त घाटे को साध नहीं पाईं या साधना नहीं चाहा।

राजकोषीय नीति

(Fiscal Policy)

            वित्तीय नीति का वास्तविक अर्थ, महत्त्व तथा प्रभाव महामन्दी (Great Depression) तथा द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सामने आया। वित्तीय नीति सरकार की वह नीति है, जिसका संबंध सरकारी क्रय के स्तर, स्थांतरण के स्तर तथा कर संरचना से है - यह संभवत: वित्तीय नीति की सबसे बेहतर परिभाषा है जिसे विशेषज्ञों ने भी माना है। इसके उपरांत समष्टि अर्थव्यवस्था पर राजकोषीय नीति के प्रभाव का बेहतर तरीके से विश्लेषण किया गया। चूँकि, इस नीति का अर्थव्यवस्था पर गहरा प्रभाव होता है इसलिए इस नीति की परिभाषा उस नीति के रूप में दी जाती है, जो सरकारी खर्च तथा कर को संचालित करता है तथा आर्थिक गतिविधियों (जिसे संख्यात्मक रूप में सकल घरेलू उत्पाद से दर्शाया जाता है) को उत्प्रेरित करता है। जे.एम. केन्स पहले अर्थशास्त्री थे, जिन्होंने राजकोषीय नीति तथा आर्थिक निष्पादन को जोड़ने वाले सिद्धांत का विकास किया।

राजकोषीय नीति को एक अन्य तरीके से भी परिभाषित किया जा सकता है। यह सरकारी व्यय तथा करों में किया जाने वाला बदलाव है, जिसका लक्ष्य समष्टि आर्थिक उद्देश्यों को प्राप्त करना है (जैसे— विकास, रोजगार, निवेश इत्यादि)। इसलिए हम यह कह सकते हैं कि राजकोषीय नीति कर तथा सरकारी व्यय के उपयोग को दर्शाता है।

कर तथा सरकारी व्यय संपूर्ण अर्थव्यवस्था को किस तरह प्रभावित करती है इसकी चर्चा नीचे की गई है। पहले हम कर तथा अर्थव्यवस्था पर उसके प्रभाव की चर्चा करेंगे:

(i) कर का लोगों की आय, उनकी क्रय शक्ति, उपभोग तथा परिणामस्वरूप उनके जीवन-स्तर पर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता

(ii) कर का व्यक्तियों, परिवारों तथा कंपनियों की बचत पर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है, जिससे अर्थव्यवस्था में निवेश प्रभावित

होता है - निवेश से सकल घरेलू उत्पाद प्रभावित होता है, जिसका असर प्रति व्यक्ति आय पर पड़ता है।

(iii) कर का वस्तुओं एवं सेवाओं के मूल्य पर भी प्रभाव पड़ता है, क्योंकि उनका उत्पादन मूल्य प्रभावित होता है।

सरकारी व्यय का अर्थव्यवस्था पर प्रभाव निम्नलिखित दो रूपों में पड़ता है:-

(i) वस्तुओं एवं सेवाओं को यदि सरकार द्वारा खरीदा जाए तो उन पर भी कुछ व्यय होता है; जैसे-सड़कों, रेलवे तथा बंदरगाह का निर्माण, खाद्यान्न की खरीद (वस्तुओं के वर्ग में) तथा सरकारी कर्मचारियों को वेतन का भुगतान (सेवाओं

के वर्ग में)।

(ii) सरकार द्वारा गरीबों, बेरोजगारों व वृद्ध व्यक्तियों को सहायता प्रदान करने में भी कुछ व्यय/खर्च होता है, जिसे सरकारी अंतरण भुगतान (Transfer Payments) कहते हैं।

भारत में घाटे का वित्त पोषण (Deficit Financing in India)

            स्वतंत्र भारत एक योजनागत अर्थव्यवस्था बना। चूँकि सरकार पर विकास का भार अधिक था इसलिए सरकार को अतिरिक्त धन की आवश्यकता थी, दोनों ही रूपों में - देशी तथा विदेशी मुद्रा। भारत को अपने पंचवर्षीय योजनाओं के लिए निधि एकत्र करने में अत्यंत कठिनाई हुई, क्योंकि समुचित मात्रा में विदेशी निधि तथा आंतरिक संसाधन का प्रबंध नहीं हो पाया।

धीरे-धीरे भारत का वित्तीय घाटा बढ़ता गया तथा सरकार द्वारा इस अभाव को कम करने के लिए घाटे के वित्त पोषण की नीति अपनाई गई। इस प्रक्रिया को तीन ऋणों में बाँटा जा सकता है:

प्रथम चरण (1947-1970) [The First Phase (1947-1970)]

            इस चरण में घाटे के वित्त प्रबंध की कोई अवधारणा नहीं थी, घाटे को बजट घाटे के रूप में दिखाया जाता था। इस चरण के मुख्य पहलू निम्नलिखित थेः

(i) अर्थव्यवस्था के अंदर तथा बाहर ऋण प्रबंध प्रयास करना, लेकिन लक्ष्य की प्राप्ति में चूक जाना।

(ii) 1950 के दशक में कर एकत्रण को बढ़ाने तथा राजस्व व्यय पर रोक लगाने का प्रयास किया गया। इस कदम से कर की चोरी, भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिला तथा सामाजिक क्षेत्र की स्थिति दयनीय हो गई।

(iii) भारतीय रिजर्व बैंक से अधिक मात्रा में ऋण लिया गया, बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया तथा उन बैंकों के पैसों को सरकार द्वारा योजनाओं में लगाया जा सके। इससे सरकार पर ब्याज का भार बढ़ गया।

(iv) अधिक राजस्व व्यय (वेतन) के साथ सार्वजनिक क्षेत्र में उद्यमों की स्थापना।

(v) उपर्युक्त कदम उठाकर भी सरकार निवेश की आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर पाई।

द्वितीय चरण (1970-1971) [The Second Phase (1970-1971]

            इस अवधि को घाटे के वित्त प्रबंध की अवधि माना जाता है, इस चरण में अर्थशास्त्र के अप्रमाणिक सिद्धांतों का अनुसरण किया गया तथा अंतत: यह चरण 1990-91 के वित्तीय संकट के रूप में समाप्त हुआ। इस चरण के मुख्य पक्ष निम्नलिखित हैं:

  1.  इस चरण में राष्ट्रीयकरण नीति तथा सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों के विस्तार पर बल दिया गया।
  2. आने वाले पीएसयू ने सरकार की आय का कुल खर्च और उसके साथ ही पूंजी को बढ़ा दिया।
  3. मौजूदा पीएसयू अर्थव्यवस्था से अपना देय वसूल रहे हैं - अतार्किक नियुक्तियों ने वेतन, पेंशन, पीएफ का बोझ बहुत ज्यादा बढ़ा दिया है। उनमें से कई अब तक भारी घाटे में चले गए हैं, लाभ और हानि के विश्लेषण की कमी रही, पीएसयू के अपनी जरूरत के श्रम और उपलब्ध श्रम के बीच कोई संबंध नहीं था। अंततः लाभ या हानि की जिम्मेदारी अधिकारियों की नहीं थी, इसलिए वह जान-बूझकर किए गए घाटों और संस्थानिक भ्रष्टाचार के केंद्र बन गए।
  4. सरकार दोनों ही मोर्चों पर नाकाम रही है - जनसंख्या नियंत्रण और बड़े पैमाने पर रोजगार निर्माण। सब्सिडी का बोझ बढ़ता रहा और उन्हें अप्रबंधनीय और भारी अतार्किक बनाया गया। स्व-रोजगार कार्यक्रम रफ्तार नहीं पकड़ सके या यह कहना सही रहेगा कि राजनीतिक रूप से अलग-अलग नामों के साथ छोटे टुकड़े वाले दिहाड़ी-रोजगार कार्यक्रम अपनाना सही था।
  5. योजनागत विकास बहुत ज्यादा केन्द्रीकृत रहे और स्थानीय आकांक्षाओं के लिए उनमें कोई स्थान नहीं रहा। लोगों की हताशा अतिवादी और कट्टर संगठनों की शक्ल में सिर उठाने लगी जो कानून-व्यवस्था की समस्या पैदा करने लगे जिस पर भारी खर्च होने लगा। इसका नतीजा है - काम के बोझ से दबे पुलिस बल और फंसा हुआ न्याय तंत्र।
  6. सरकारें पीएसयू में निवेश करने के योजनागत खर्च के रास्ते पर चल रही थीं, जो लाभ कमाने के प्रति प्रतिबद्ध नहीं थे। पीएसयू के लिए घाटे की वित्त व्यवस्था का मजबूत अर्थशास्त्रीय आधार नहीं था। इस तरह ज्यादातर योजनागत खर्च एक तरह से गैर-अर्थशास्त्रीय हो गया, यानी कि अंत में गैर-योजनागत खर्च।

ऊपर दिए गए का ऋणों की वजह से कहना मुश्किल हो रहा था कि भारत में भारी राजकोषीय घाटे के कारण क्या थे।

तीसरा चरण ( 1991 के बाद) [(The Third Phase (1991 Onwards)]

            अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की रखी शर्तों (जिनमें से एक राजकोषीय घाटे को नियंत्रण में रखना भी थी) पर आर्थिक सुधारों की शुरूआत हुई। जैसे-जैसे अर्थव्यवस्था सरकार के प्रभाव क्षेत्र से बाजार के प्रभाव क्षेत्र की ओर बढ़नी शुरू हुई अर्थव्यवस्था के पुनर्गठन और सार्वजनिक वित्त के थोड़ा तार्किक होने की जरूरत पड़ी।

भारत की राजकोषीय स्थिति : एक परिचर्चा (Indian Fiscal Situation : A Summary)

            दिसंबर 1985 में भारतीय सरकार ने संसद में एक दीर्घ अवधि के वित्तीय नीति का प्रस्ताव रखा। यह भारत के इतिहास में पहली बार था जब किसी राजकोषीय मुद्दे पर सरकार द्वारा संसद में 'दीर्घावधिक राजकोषीय नीति' (Long-term Fiscal Policy) पर कोई दस्तावेज/पत्र प्रस्तुत किया गया। इसमें सरकारी व्यय की नीति भी शामिल थी। प्रस्ताव ने सुधार के लिए कुछ विशेष लक्ष्य रखा। इस प्रस्ताव के बाद देशभर में इस मुद्दे पर बहस शुरू हो गई तथा वर्ष 1987 में सरकार दो ठोस कदमों के साथ सामने आई:

  1. सरकारी व्ययपर लगभग रोक लगा दी गई, तथा;

(ii) बजट घाटे की ऊपरी सीमा (ceiling) तय की गई।

उपर्युक्त कदमों का स्थिति पर एक सकारात्मक प्रभाव पड़ा, लेकिन यह अस्थायी था तथा वर्ष 1988 के मध्य से स्थिति बिगड़ने लगीर। वर्ष 1990 के अंत का भुगतान-संतुलन संकट का आंशिक रूप से कारण अधिक राजकोषीय घाटा तथा विदेशी ऋण की बढ़ती मात्रा थी। इस संकट से लड़ने के लिए IMF से सहायता मिली, जो शर्तों के साथ जुड़ी हुई थी। आर्थिक सुधार की प्रक्रिया (जिसकी शुरूआत 1991-92 में की गई) के साथ सरकार ने यह घोषणा की कि 1990 के दशक के मध्य तक वित्तीय घाटे को कम कर 3-4 प्रतिशत कर दिया जाएगा। अर्थव्यवस्था को स्थिरता प्रदान करने के लिए सरकार द्वारा उठाए गए उपायों में से यह एक था। 1990-91 तक की भारत की राजकोषीय स्थिति को निम्नलिखित रूप में देखा जा सकता है:-

  1.         केन्द्रीय सरकार का राजकोषीय घाटा, जो 1970 के दशक से पहले औसतन 4 प्रतिशत से भी कम था 1980-81 में बढ़कर 5.77 प्रतिशत, वित्त वर्ष 1986-87 में यह 8.47 प्रतिशत तथा वर्ष 1990-91 में 7.85 प्रतिशत हो गया।
  2. सरकार (केंद्र सरकार तथा राज्य सरकार संयुक्त रूप से) का राजस्व घाटा 1960 से 1990 के बीच 11.8 प्रतिशत से बढ़कर 23 प्रतिशत हो गया। राजस्व प्राप्ति, जो 1971-75 के मध्य औसतन 14.6 प्रतिशत थी, 1986-1990 तक बढ़कर 20 प्रतिशत हो गई, लेकिन राजस्व प्राप्ति तथा व्यय
  3. के बीच अंतर नकारात्मक रहा, जिसके लिए वित्त अधिकतर घरेलू ऋणों से प्राप्त हुआ परिणामस्वरूप घरेलू ऋण पर ब्याज बढ़ गया, 1975-90 के मध्य यह 0.5 प्रतिशत से बढ़कर 2.5 प्रतिशत हो गया। 1979-80 से राजस्व घाटा बढ़ता गया तथा वर्ष 1990-91 में यह 3.26 प्रतिशत हो गया।
  4. राज्यों की राजकोषीय स्थिति भी ठीक नहीं थी। राज्य सरकारें जिनकी प्राथमिक जिम्मेदारी स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य सामाजिक सुविधाएं हैं, उनके औसत राजकोषीय खर्च जीडीपी का 5 फीसदी इन खातों पर था, जबकि सामाजिक और अन्य क्षेत्रों में उनका पूंजीगत व्यय2.5 फीसदी था। अस्सी के दशक में राज्यों का सामाजिक क्षेत्र पर खर्च कम हो गया जबकि ब्याज का भुगतान बढ़ गया।

विशेषज्ञों के अनुसार राज्यों में कर्ज की स्थिति और खराब हो सकती थी लेकिन केंद्र के विपरीत, राज्य संवैधानिक ऑवरड्राफ्ट नियामक योजना के तहत सीधे न तो आरबीआई से ऋण ले सकते हैं और न ही बाजार से। इसलिए उनके घाटे खुद ही नियंत्रण में रहे-जब भी राज्यों ने अपने घाटे कम करने की कोशिश की सामाजिक क्षेत्र की योजनाओं को नुकसान पहुंचा और पूंजीगत व्यय और राज्य में विकास की संभावनाओं पर भी असर पड़ा।

अब प्रश्न यह उठता है कि आम सहमति होते हुए भी सरकार राजकोषीय घाटे को नियंत्रित क्यों नहीं कर पायी? इसके लिए तीन कारण दिए जा सकते हैं:-

(i) राजनीतिक कारकः राजनीतिक दबाव, क्षेत्रीय राजनीति तथा सब्सिडी (छूट) इसका प्रमुख कारण है, जिसके कारण सरकारी व्यय बढ़ गया।

(ii) संस्थागत कारकः प्रशासनिक आकार तथा अधिक संकेद्रण इसका कारण है। वस्तुओं एवं सेवाओं के उत्पादन एवं सुपुर्दगी की जगह रिपोर्टिंग, लेखाकरण तथा पर्यवेक्षण को अधिक महत्व दिय गया।

(iii) नीतिपरक कारकः यह एक महत्वपूर्ण कारक रहा, जिसके कारण सरकारी व्ययको आम जन-समर्थन मिलता है। इस प्रकार के व्यय में सब्सिडी (छूट), गरीबी उन्मूलन, कार्यक्रम, रोजगार प्रदान करने वाले कार्यक्रम, शिक्षा, स्वास्थ्य तथा सामाजिक सेवा शामिल है। इस प्रकार के सरकारी खर्च के पीछे यह तर्क दिया जाता है कि सरकार को गरीबों के संरक्षक के रूप में कार्य करना चाहिए, उन्हें रोजगार के अवसर प्रदान करना चाहिए, जिसका अर्थ यह हुआ कि इस प्रकार का सरकारी खर्च गरीबों के हित में है।

वर्ष 2000 में सरकार ने राजस्व तथा राजकोषीय घाटे के दोहरे खतरे पर विशेष ध्यान देना शुरू किया, जिसके परिणामस्वरूप संसद में राजकोषीय उत्तरदायित्व एवं बजट प्रबंधन विधेयक, 2000 का प्रस्ताव रखा गया।

एफ.आर.बी.एम. अधिनियम, 2003

            अर्थशास्त्रियों, नींत निर्माताओं तथा IMF सभी द्वारा राजकोषीय नीति को किसी भी अर्थव्यवस्था की आधारशिला मानी जाती है। इस नीति का बेहतर संचालन न सिर्फ अर्थव्यवस्था को स्थायित्व प्रदान करता है बल्कि उसके संसाधनों का प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में आवंटन को भी सुनिश्चित करता है।

अनुत्पादक सरकारी व्यय, कर की विसंगतियां तथा उच्च राजकोषीय घाटे के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था अपनी संवृद्धि के सक्षम स्तर तक पहुँचने में असफल होती रही है। आर्थिक सुधारों की प्रक्रिया प्रारम्भ किए जाने के पूर्व 1991 में आयी उच्च मुद्रास्फीति दर एवं भुगतान संतुलन (BOP) के जुड़वाँ (twin) संकट की जड़ में राजकोषीय असंतुलन ही रहा था। तब से (1991 से) राजकोषीय नीति के प्रति सरकार की मध्यम अवधि (medium-term) की सोच निम्न दिशा में रही है:

  1.         घाटे को कम करना (राजस्व एवं राजकोषीय दोनों ही);
  2.         व्यय का प्राथमिकता के अनुसार चुनाव तथा इच्छित परिणाम को सुनिश्चित करना;
  3. कर की दरों को निम्न रखते हुए कर के आधार को बढ़ाकर तथा इसकी चोरी एवं अपवंचन को रोककर संसाधनों में वृद्धि करना।

वर्ष 1991 में सरकार द्वारा प्रारम्भ किए राजकोषीय समेकन (Fiscal Consolidation) का इच्छित परिणाम नहीं प्राप्त किया जा सका, क्योंकि इसके प्रति कोई परिभाषित कटिबद्धता नहीं थी। न ही ऐसा करने के लिए कोई संवैधानिक बाध्यता ही थी। इन परिस्थितियों को ध्यान में रखकर सरकार द्वारा 26 अगस्त, 2003 को राजकोषीय उत्तरदायित्व एवं बजट प्रबंधन अधिनियम (Fiscal Responsibility and Budget Management Act/FRBMA) को पारित किया गया ताकि राजकोषीय समेकन के लिए मजबूत सांविधिक/बाध्यकारी (statutory/ obligatory) व्यवस्था स्थापित की जा सके। मध्यम-अवधि में राजकोषीय घाटे को प्रबंधित करने के उद्देश्य से पारित इस अधिनियम को 5 जुलाई, 2004 से प्रभावी बनाया गया।

वर्ष 2000 में निर्मित एफ.आर.बी.एम. विधेयक संसद में उपस्थित सभी राजनीतिक दलों के सभी सांसदों के मत द्वारा पारित किया गया, जो अपने आप में एक ऐतिहासिक घटना थी और यहाँ से भारत में राजकोषीय नीति-निर्माण की दिशा में एक नये युग की शुरूआत हुई। इस अधिनियम (राजकोषीय उत्तरदायित्व एवं बजट प्रबंधन अधिनियम, 2003) के प्रमुख अंश निम्न प्रकार हैं:-

(i) भारत सरकार द्वारा राजकोषीय एवं राजस्व घाटों को कम करने के लिए कदम उठाते हुए 31 मार्च, 2008 तक राजस्व घाटे को शून्य किया जाना था, जिसे यू.पी.ए.- सरकार (31 मार्च, 2009) द्वारा इसे एक वर्ष आगे किया गया।

(ii) सरकार द्वारा राजकोषीय एवं राजस्व घाटों, आकस्मिक (Contingent) एवं सकल अभिदेयताओं (Liabilities) को कम करने के वार्षिक लक्ष्यों की घोषणा की जाएगी (राजस्व घाटे को प्रतिवर्ष 0.5 प्रतिशत तथा राजकोषीय घाटे को प्रतिवर्ष

0.3 प्रतिशत कम करने का लक्ष्य 2004 में रखा गया)।

 (iii) राजकोषीय घाटा तथा राजस्व घाटा विशेष परिस्थितियां में घोषित लक्ष्यों को पार कर सकेंगे; यथा- राष्ट्रीय सुरक्षा, आपदा तथा अपवादात्मक आधार।

(iv) भारत सरकार अर्थोपाय अग्रिम (Ways and Means Advances/WMA) के अतिरिक्त किसी और प्रकार से RBI से उधार नहीं लेगा।

(v) वर्ष 2006-07 से RBI भारत सरकार द्वारा जारी की गयी प्रतिभूतियों (Securities) का प्राथमिक ग्राहक नहीं होगा अर्थात् सरकारी प्रतिभूतियों, बॉण्ड आदि बाजार-आधारित उपकरण होंगे।

  1. राजकोषीय परिचालन में पारदर्शिता लाने संबंधी कदम उठाए जाएंगे।

(viii)   बजट एवं अनुदान की मांग के साथ सरकार द्वारा प्रतिवर्ष निम्न तीन वक्तव्यों को संसद में प्रस्तुत किया गया:

 

राजकोषीय नीति रणनीति वक्तव्य

(Fiscal Policy Strategy Statement_FPSS)

            मध्यम अवधि राजकोषीय नीति वक्तव्य (Medium Term Fiscal Policy Statement – MTFPS), एवं समष्टि-अर्थशास्त्रीय रूपरेखा वक्तव्य (Macroeconomic Framework Statement MFS)।

(viii) वित्त मंत्री द्वारा आम बजट में उद्धृत लक्ष्यों के मद्देनजर सरकार की प्राप्तियों (Receipts) एवं व्यय(Expenditure)

की त्रैमासिक (Quarterly) समीक्षा बनाकर उसे संसद में प्रस्तुत की गई।

हाल में हुए बदलाव: FRMBA-  लागू होने के बाद, राज्यों ने भी आगामी वर्षों में अपने FRAS (राजकोषीय जिम्मेदारी कानूनों) को पारित किए। इसके बाद से दोनों ही सरकारों ने बेहतर राजकोषीय अनुशासन दिखाया है। एक सीमा तक जहाँ तक FRBMA से जुड़ लक्ष्यों का सवाल है, प्रदर्शन मिला-जुला रहा है। कई बार वित्तीय बहुत के कारण (प्राकृतिक आपदाओं के कारण या किसी असाधारण वजह से) लक्ष्य हासिल करना मुश्किल रहा, जबकि कई बार वे अनिवार्य लक्ष्यों से भी बेहतर थे। लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि इस अधिनियम से सरकारें राजकोष को लेकर अधिक अनुशासित हुईं।

            पिछले कुछ वर्षों में एक नजरिया उभरा है, जिसके अनुसार सरकारी खर्च को एक निश्चित आंकड़े में बांधना व्यापक तौर पर अर्थव्यवस्था के लिए प्रतिकूल हो सकता है। राजकोषीय लक्ष्यों के कठोर अनुशासन के कारण, सरकारी की ओर से कई अति आवश्यक खर्च रुक सकते हैं, उदाहरण के लिए-बुनियादी ढाँचे, सामाजिक कल्याण आदि पर खर्च। यही कारण है कि हमें FRBMA के बारे में केन्द्रीय बजट 2016-17 में हुई घोषणा में सरकार के बदले हुए रूख का पता चलता है। इसे नया विचार बताते हुए बजट अपने राजकोषीय रोडमैप में दो अहम बदलावों

का सुझाव देता है:-

(i) राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को एक संख्या (number) के बजाय एक संख्या परास (range) रखा जाए। इससे सरकार को गतिशील स्थितियों से निपटने के लिए आवश्यक नीतियां बनाने में मदद मिलेगी।

(ii) इस बात की आवश्यकता महसूस की गई कि अर्थव्यवस्था में, वित्तीय विस्तार या संकुचन को क्रेडिट विस्तार या संकुचन के साथ संबद्ध रखा जाए।

बजट की राय में, सरकार को राजकोषीय विवेक और समेकन के लिए प्रतिबद्ध रहना चाहिए, लेकिन समय आ गया है जब कि FRBMA की कार्यप्रणाली की समीक्षा की जानी चाहिए-विशेषकर अनिश्चितता और अस्थिरता के संदर्भ में, जो कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के नए मानदंड बन गए है। इस बदले हुए रूख की पृष्ठभूमि में, सरकार द्वारा 2016-17 में FRBMA के कार्यान्वयन की समीक्षा के लिए एक समिति गठित करने की घोषणा की गई।

एफआरबीएम समीक्षा समितिः- जनवरी 2017 के आखिर में पांच सदस्यीय समिति ने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी, हालांकि रिपोर्ट लोगों के सामने आना अभी भी बाकी है, इस बीच सुझावों के कुछ महत्वपूर्ण बिन्दुओं को संघीय बजट 2017-18 में रेखांकित किया गया है, जो इस प्रकार हैं:-

हाल में सरकार द्वारा इस समीक्षा समिति के कुछ प्रमुख सुझावों को मान लिया गया है (संघीय बजट 2018-19 में):

(i) इसके ऋण नियम (Debt Rule) के अनुसार केंद्र सरकार के ऋण का सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के साथ 40 प्रतिशत का अनुपात रखने की घोषणा की गयी। समिति ने राज्यों के लिए इस अनुपात को 20 प्रतिशत रखने का सुझाव दिया था।

(ii) राजकोषीय प्रबधंन के लिए 'राजकोषीय विसर्पण मार्ग' (fiscal glide path) के पालन का निर्णय लिया गया। इसके अंर्तगत राजकोषीय घाटे को लक्षित करने में अब 0.5 प्रतिशत की लोचशीलता (समिति का 'एस्केप क्लॉज' सुझाव) का पालन किया जाना निर्णीत है। वर्ष 2018-19 में सरकार द्वारा राजकोषीय घाटे का लक्ष्य 3.3 प्रतिशत बनाया है (तथा वर्ष 2019-20 में 3 प्रतिशत का लक्ष्य रखा गया है)।

सरकारी खर्च को सीमित करना

(Limiting Government Expenditure)

            निर्वाचित सरकारों में विभिन्न प्रकार के हित समूह तथा गुट संलग्न रहते हैं। कई बार ऐसी सरकारें बिना राष्ट्रीय खजाने की चिंता किए लोकलुभावन तरीके से अपनी आर्थिक नीतियों का उपयोग करती हैं, जिससे कि अधिकाधिक राजनीतिक लाभ उठाया जा सके। ऐसे प्रयासों के चलते सरकारें आंतरिक एवं बाह्य कर्ज लेने तथा मुद्रा छापने को भी बाध्य हो सकती हैं। सरकारें सामान्यतः कर बढ़ाने अथवा नए कर लगाने से बचती हैं, क्योंकि ऐसे काम अलोकप्रिय होते हैं। दूसरी ओर कर्जदारी अथवा मुद्रा की छपाई से तत्काल आर्थिक एवं राजनीतिक हानि पहुंचने की संभावना नहीं होती।ए चुनावी वर्ष में एक सरकार हाथ खोलकर पैसा खर्च करती है, वह भी कर्ज लेकर (भारतीय रिजर्व बैंक से), क्योंकि वास्तव में इसकी भरपाई तो अगली (नयी) सरकार को करनी होती है। ऐसा करने से अतिरिक्त रोजगार पैदा होता है तथा अर्थव्यवस्था के सकल घरेलू उत्पाद में भी वृद्धि होती है। अगर सरकार विस्तार-विरोधी राजकोषीय एवं मौद्रिक नीतियों पर यह सोचकर चलती है कि इससे इसके खर्चे पर रोक लगेगी तो इससे रोजगार भी घटता है और सकल घरेलू उत्पाद (GDP) पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इसे निर्वाचित सरकारों की आर्थिक नीतियों में एक पूर्वाग्रह के रूप में देखा जाता है, लेकिन विशेषज्ञों एवं नीति-निर्माताओं के बीच इस बात पर सहमति रही है कि सरकार के धन सृजन की शक्ति (कर्ज लेने अर्थात् नोट छापने) पर कोई-न-कोई बाहरी (सरकार के बाहर) वैधानिक अंकुश होना चाहिए। इसे पूर्वाग्रह को हटाने के उद्देश्य से तथा राजकोषीय नीतियों को चुनावों के प्रति कम-से-कम संवेदी बनाने के लिए कुछ देशों ने कुछ कानूनी प्रावधान दिए हैं, भारत द्वारा एफआरडीएमए (FRDMA) अधिनियमित करने के लिए कुछ कानूनी प्रावधान किए गए। दुनिया भर के ऐसे प्रावधानों के तीन प्रकार देखने को मिलते हैं:-

(i) न्यूजीलैंड पहला देश है जिसने सरकार के धन सृजन की शक्ति पर कानूनी अंकुश लगाया। जहां सेंट्रल बैंक कानूनी रूप से यह सुनिश्चित करने को बाध्य है कि सरकार द्वारा धन सृजन मुद्रास्फीति तथ्य (inflation target) की दर से अधिक न हो, इसका अर्थ है कि सेंट्रल बैंक को धन सृजन के क्षेत्र में सरकार के ऊपर अभिभावी (Overriding) शक्ति प्राप्त है।

(ii) दूसरा प्रकार है सरकारी घाटे अथवा सरकार के कर्ज लेने की शक्ति पर कुछ दृढ़ कानूनी अथवा संवैधानिक सीमा तय की जाए। जर्मनी और चिली में ऐसी व्यवस्था की गई है - आज जर्मनी मास्ट्रिक्ट संधि (Mastricht Treaty) द्वारा लागू राजकोषीय सीमा मानने को बाध्य है। 1991 के दशक के उत्तरार्द्ध में सरकार की घाटा सृजित करने की ऊपरी सीमा निश्चित की गई। कुछ अन्य देशों ने तथाकथित करेंसी बोर्ड (Currency Board) की तरह की व्यवस्थाए इन्हीं उद्देश्यों के लिए लागू की है - यह तीसरा प्रकार है। इस व्यवस्था में अर्थव्यवस्था में मुद्रा की आपूर्ति विदेशी परिसम्पत्तियों (शक्तियों) की आपूर्ति से सीधे जोड़ दी गई है - न तो सरकार, न ही सेंट्रल बैंक को धन सृजित करने की स्वतंत्र शक्ति है, क्योंकि विदेशी परिसम्पत्तियों में वृद्धि के लिए धन (मुद्रा) की आपूर्ति में वृद्धि की अनुमति नहीं दी जाती।

            1994 में भारत ने इस दिशा में कदम उठाया जबकि केंद्र सरकार ने भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के साथ अपने पदार्थ खजाने निपत्र (Adhere Treasury Bill) से एक पूर्ण निश्चित धनराशि (6000 करोड़ 1994-95 के लिए) के ऋण के संबंध में एक औपचारिक समझौता किया। हालांकि यह बहुत उदार किस्म का अनुबंध था जिसमें यह व्यवस्था की गई थी कि सरकार एक नया समझौता करके पूर्व निश्चित धनराशि में संशोधन भी कर सकती थी, लेकिन इस शुरूआत का परिणाम एफआरबीएम 2003 के अधिनियमित होने के रूप में सामने आया। देश में राजकोषीय विवेक क्षेत्र में यह एक ऐतिहासिक उपलब्धि थी।

भारत में राजकोषीय समेकन (Fiscal Consolidation In India)

            भारत का राजकोषीय घाटा अपने उच्च स्तर पर होने के लिए हमेशा ही समाचारों में रहा है। इसमें 1975 के बाद तेज वृद्धि हुई। वर्ष 1975 से लेकर 2001 के मध्य भारतीय अर्थव्यवस्था (केंद्र तथा राज्य सरकारों को जोड़कर) का राजकोषीय घाटा 10 प्रतिशत (GDP का) के ऊपर रहा। इस घाटे का 50 प्रतिशत से अधिक राजस्व घाटे के कारण रहा। इस पूरी अवधि में RBI, योजना आयोग, IMF एवं WB द्वारा सरकारों को उच्च राजकोषीय घाटे को कम करने संबंधी सलाह तथा चेतावनी दी जाती रही तथा इसे असंपोषणीय (unsustainable) बताया गया। अंततः वर्ष 1991 में प्रारम्भ किए गए आर्थिक सुधारों की प्रक्रिया के अंर्तगत सरकार द्वारा राजकोषीय समेकन की शुरूआत की गयी। यहाँ बाध्यता IMF की शर्तों की थी जो भारत पर भुगतान संतुलन संकट के समय इससे ली गयी सहायता से जुड़े थे। केंद्र सरकार द्वारा इस दिशा में कई कदम उठाए गए जिन्हें राज्यों के राजकोषीय प्रबंधन में शामिल करने की कोशिश की गयी। इन प्रयासों के मुख्य अंश को हम निम्न प्रकार देख सकते हैं:-

 

1. राजस्व घाटे को कम करने के लिए किए गए नीतिगत प्रयासः-

(i) राजस्व व्यय में कटौती संबंधी उपायः

(a) वेतन, पेंशन एवं आकस्मिक निधियों के भार में कमी (सरकारी नौकरियों में कटौती, आकस्मिक निधियों पर ब्याज कटौती, पेंशन सुधार, इत्यादि);

(b) छूट (subsidies) में कटौती (पेट्रोलियम, चीनी, दवा इत्यादि के प्रशासित मूल्य पद्धति का तार्कीकरण;

(c) ब्याज में कटौती (निम्नतर उधारी, विदेशी ऋणों की उनकी परिपक्वता के पूर्व अदायगी, विदेशी ऋण बाँटने

को प्रोत्साहन, महँगे विदेशी ऋणों से बचना इत्यादि);

(d) प्रतिरक्षा व्यय में कटौती (इसके लिए सरकार द्वारा पाकिस्तान एवं चीन से द्विपक्षीय वार्ताओं के द्वारा सीमा पर हो रहे प्रतिरक्षा व्यय में कटौती का प्रयास जारी है, इसी प्रकार आंतरिक सुरक्षा, आतंकवाद आदि पर भी कार्य जारी है);

(e) सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों (PSUs) को घाटे की स्थिति में सरकार द्वारा विशेष परिस्थितियों में ही बजटीय

सहायता दी जाएगी-ऐसा निर्णय लिया गया;

(1) अन्यान्य क्षेत्रों एवं विभागों में सरकार द्वारा व्यय सुधारों (Expenditure Reforms) की शुरूआत की गयी।

(g) सामान्य सेवाओं (General Services) की आपूर्ति से जुड़े सरकारी उपक्रमों को लाभकारी बनाने की कोशिश तथा सिर्फ उन्हीं वर्गों को छूट की सुविधा जिन्हें इसकी नितांत आवश्यकता है (रेल यातायात, सड़क, बिजली, जल इत्यादि)

(h) डाक सेवा से जुड़े घाटे को कम करने के लिए इन्हें दूसरे लाभ अर्जित करने वाले सेवा आपूर्ति क्षेत्रों में प्रवेश कराना;

(i) उच्चतर शिक्षा को प्राथमिकता क्षेत्र से बाहर करके इस पर होने वाले व्यय में कमी (ताकि सरकार प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा क्षेत्रों पर अधिक ध्यान दे सकें) इत्यादि।

 

राजस्व प्राप्तियों को बढ़ाने संबंधी उपायः-

(a) कर सुधारों की शुरूआत (सेनवैट, वैट, सेवा कर, जी. एस. टी. कर की आधार वृद्धि, कर चोरी नियंत्रण इत्यादि);

(b) सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों का विनिवेश एवं निजीकरण (राजनीतिक सहमति पर निर्भर कदम);

(c) विदेशी विनिमय भंडार (Forex) के अतिरेक (surplus) का विदेशी ऋण आवंटन एवं बेहतर विदेशी बॉण्ड में निवेश

(d) राज्य सरकारों को अपनी योजनागत व्यय की पूर्ति के लिए बाजार से ऋण लेने की अनुमति इत्यादि।

2. सरकार के ऋण कार्यक्रम पर नियंत्रण संबंधी उपायः-

(i) वर्ष 1997 से अर्थोपाय अग्रिम (ways & Means Advances/WMAS) की शुरूआत, जिसके अंर्तगत सरकार वित्त वर्ष के प्रारम्भ में RBI के साथ अपने ऋण कार्यक्रम की मात्रा पर एक समझौता ज्ञापन दिया जाता है। वैसे सरकार द्वारा यथा स्थिति इसमें वृद्धि की जा सकती है फिर भी इससे सरकार के ऋणों की उगाही के बारे में एक पारदर्शिता आती है तथा इस पर एक नैतिक नियंत्रण भी लगता है;

(ii) वर्ष 1997 से भारत सरकार की प्रतिभूतियों/बॉण्डों के निर्गम का RBI प्राथमिक ग्राहक नहीं रहा अर्थात् सरकार ऋण उगाही के इन पत्रों को बाजार में बेचती है (बाजार आधारित ब्याज पर)।

3. सरकार पर राजकोषीय उत्तरदायित्वः-

वर्ष 2003 में पारित किए गए एफ.आर.बी.एम. अधिनियम के माध्यम से सरकार के राजकोषीय जिम्मेवारी को एक कानूनी आधार मिला जिसके अंर्तगत राजस्व घाटे एवं राजकोषीय घाटे को नियंत्रित करने के लिए सरकार को वार्षिक लक्ष्यों की घोषणा करके उनके पालन के उत्तरदायित्व की व्यवस्था है। इस अधिनियम द्वारा राजकोषीय नीति में पारदर्शिता लाने के लिए कई प्रावधान डाले गए हैं; राज्यों की राजकोषीय नीति को भी उत्तरदायी बनाने की कोशिश की गयी है (बारहवें वित्त आयोग की सलाह द्वारा)। वर्तमान में केंद्र सरकार की तरह जिन राज्यों द्वारा अपने राजकोषीय (उत्तरदायित्व अधिनियमों (FRAS) को लागू किया गया है, उन्हें कई प्रकार की वित्तीय सुविधा प्राप्त है- अपने योजनागत व्ययको पूरा करने के लिए बाजार से ऋण लेने का अधिकार (बिना केंद्र सरकार की अनुमति के), राजस्व घाटे में प्रतिवर्ष की गई कटौती के बराबर धन सरकार (केंद्र)से पारितोषिक के रूप में प्राप्त करना, पुराने ऋणों का वर्तमान के सस्ते ब्याज दरों पर नवीकरण इत्यादि।

एफ.आर.बी.एम. अधिनियम के निर्णयों को पालन करने के क्षेत्र में सरकार को मिश्रित परिणाम प्राप्त हुए हैं। इस स्थिति पर विचार-विमर्श करने के बाद वर्ष 2016-17 में सरकार द्वारा इस अधिनियम की समीक्षा के लिए एक समिति गठित की गयी और सरकार द्वारा राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को 'संख्या' (number) की जगह 'परास' (range) में व्यक्त करने संबंधी विचार प्रकट किया गया। इस समिति के कुछ सुझावों को सरकार द्वारा मानकर उन पर अमल भी प्रारम्भ कर दिया गया है (संघीय बजट 2018-19 के अंर्तगत)। इसमें महत्वपूर्ण हैं - ऋण- जी. डी.पी. अनुपात को 40 प्रतिशत रखना तथा 'राजकोषीय विषर्पण मार्ग' (Fiscal Glide Path) में 0.5 की लोचशीलता रखना। इन बदलावों के बाद सरकार की राजकोषीय प्रबंधन में गुणवत्ता बढ़ने की संभावना है।

राजकोषीय उत्तरदायित्व व बजट प्रबंधन अधिनियम सरकार द्वारा आय वृद्धि का प्रयास: सरकार ने कर सुधारों के जरिये राजस्व में वृद्धि का प्रयास किया। इस हेतु कई समितियों का गठन किया जैसे 1991 में चेलैया समिति, 2001 में सोम समिति, 2001 में ही रेड्डी समिति (लघु बचत) एवं केलकर समिति।

चेलैया समिति की सिफारिशें:-

(1991 में गठित 1993 में प्रस्तुत रिपोर्ट)

आयकर लोकपाल:-

 

वर्तमान में उपर्युक्त में से अधिकतर सुझाव स्वीकार और क्रियान्वित कर दिए गए हैं।

राजकोषीय घाटे को नियंत्रित करने के प्रयासों की भावी दिशा:-

राज्यों के सन्दर्भ में राजकोषीय घाटा:-

राज्यों में राजकोषीय घाटे में वृद्धि के कारण :-

शून्य आधारित बजट (ZERO-BASE BUDGETING)

            शून्य आधारित बजट (ZBB) की अवधारणा का सूत्रपात बीसवीं सदी के साठ के दशक (1960s) में संयुक्त राज्य अमेरिका के निजी क्षेत्रीय संगठित क्षेत्र (Corporate Sector/Company) में हुआ। यह उस समय प्रचलित प्रबंध श्रेष्ठता (Excellence) एवं सफलता प्राप्त करने के कई तरीकों में से एक था - इस तरह की अन्य अवधारणाएँ 'मैनेजमेन्ट बाई ऑब्जेक्टिव' (MEO), 'मैट्रिक्स मैनेजमेंट', 'पोर्टफोलियो मैनेजमेंट', इत्यादि भी थीं। सरकार की बजटीय प्रक्रिया में इस अवधारणा के प्रयोग का प्रस्ताव पहली बार अमेरिकी वित्त विशेषज्ञ पीटी फीर (Peter Phyr) द्वारा प्रस्तुत किया गया तथा जिमी कार्टर (जॉर्जिया के गवर्नर के रूप में) द्वारा इसे पहली बार किसी सार्वजनिक क्षेत्र में उपयोग में लाया गया। किसी राष्ट्र द्वारा ZEB का प्रथम प्रयोग सन् 1979 में अमेरिकी राष्ट्रपति जिम्मी कार्टर द्वारा किया गया (USA के वार्षिक बजट में)।

शून्य-आधारित बजट प्रक्रिया वास्तव में संसाधनों के आवंटन का एक तरीका है, जिसके अंर्तगत ऐजेंसियों को उनके द्वारा कार्यान्वित किए जा रहे कार्यक्रमों को चलाते रहने का समय-समय पर तर्क प्रस्तुत करना पड़ता है - इसके अंर्तगत निष्पादन की समीक्षा 'शून्य' (Zero) से की जाती है।

ZBB तीन आवश्यक सिद्धांतों के आधार पर कार्य करता है। कुछ विशेषज्ञ इसे दूसरी तरह भी कहते हैं - किसी भी व्यय को करने के पूर्व निम्न तीन प्रश्नों के वस्तु परक उत्तर प्राप्त किए जाने चाहिए:

  1. क्या हमें खर्च करना चाहिए?
  2. हमें कितना खर्च करना चाहिए?
  3. हमें कहां खर्च करना चाहिए?

इस तरह की बजटीय प्रक्रिया की तीन विशेषताएँ हैं, जिनके आधार पर यह परंपरागत बजटीय प्रक्रिया से भिन्न है:

  1. परंपरागत बजटीय प्रक्रिया में "समष्टि विधि" (Aggregate Approach) का प्रयोग किया जाता है, जिसके अंर्तगत विभिन्न विभागों द्वारा चलाए जा रहे अन्यान्य कार्यक्रमों के लिए 'एकीकृत' Aggrergated) एवं 'संयुक्त' (Composite) बजट का निर्माण किया जाता है। इस कारण अनेक अलग-अलग गतिविधियों की 'संवीक्षा' (Scrutiny) कठिन, जटिल और लगभग असंभव हो जाती है। इसके विपरीत ZBB प्रक्रिया में प्रत्येक विभाग तथा उनकी गतिविधियों के अस्तित्व में बने रहने के लिए 'औचित्य' (Justification) प्रस्तुत करना होता है। औचित्य प्रस्तुत करने के लिए उन्हें अपनी प्रत्येक गतिविधियों की 'अर्थमिति' (Econometrics) एवं 'लागत-लाभ विश्लेषण' (Cost benefit Analysis) के आधारों पर 'संवीक्षा' (scrutiny) करनी पड़ती है। औचित्यपूर्ण संवीक्षा के उपरांत ही इन विभागों को पुनः धन का आवंटन किया जाता है।
  2. 'मितव्ययता/किफायत' (economy) इस बजटीय प्रक्रिया का 'मूल उद्देश्य' (raison dtre) है। यही कारण है कि इसके अंर्तगत अभी कार्यक्रमों एवं लोक व्ययका सूक्ष्म परीक्षण किया जाता है। अंततः जन-लाभ के स्तर और पहुँच में बिना कमी किए हुए संबंधित व्ययमें कटौती की जाती है।
  3. प्रतिस्पर्धी (competing) जरूरतों (needs) का 'प्राथमिकीकरण' (Prioritising) इस बजटीय प्रक्रिया की तीसरी विशेषता है। उपलब्ध संसाधनों के आवंटन के पूर्व समसामयिक जरूरतों की उनकी प्राथमिकता के अनुसार सूची तैयार की जाती है तथा पुनः उन्हें 'ऊपर से नीचे की ओर' (from top to bottom) जाते हुए धन आवंटित किया जाता है। चूंकि संसाधन सीमित होते हैं इसलिए ऐसा भी हो सकता है कि प्राथमिकता सूची में वर्णित नीचे की कुछ मदों को कोई धन की प्राप्ति ही नहीं हो।

उपरोक्त लाभों (benefits) के साथ-साथ ZBB की कुछ सीमाएँ (Limitations) भी हैं जिस कारण इसकी इच्छित सफलता में बाधाएं भी पहुँचती हैं। इन सीमाओं के माध्यम से ZBB का आलोचना भी की जाती है। ZBB की सीमाओं को हम निम्न प्रकार समझ सकते हैं:

  1. कुछ ऐसे व्यय हैं, जो सरकार/संसद की संवीक्षा (Scrutiny) के दायरे के बाहर हैं [जैसे कि भारत में प्रभारित व्यय' (चाड एक्सपेंडिचर)], जिन्हें ZBB द्वारा किफायती बनाना संभव नहीं है।
  2. कुछ ऐसी लोक सेवाएँ हैं, जिनका 'लागत-लाभ विश्लेषण संभव नहीं हैं, यथा-प्रतिरक्षा, कानून एवं व्यवस्था, विदेशी संबंध इत्यादि।
  3. संवीक्षा (scrutiny) एक विषयपरक (Subjective) विषय है जिस कारण इसमें पूर्वाग्रह (Bias) की स्थिति बन सकती है। अगर संवीक्षा में पूर्ण उपयोगितावादी (Utilitarian) सोच है तो लोक नीति एवं दीर्घवधिक उद्देश्यों की प्राप्ति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

(iv)  इसके अंर्तगत वित्त मंत्रालय की शक्तियों में अप्रत्याशित वृद्धि हो सकती है था

         वह अन्य मंत्रालयों पर तानाशाही कर सकता है।

(v)   नौकरशाही (Bureaucracy) द्वारा इसे पसंद नहीं किया जाता, क्योंकि इसके         अंर्तगत इसकी प्रत्येक गतिविधि के सूक्ष्म संवीक्षा की व्यवस्था होती है।

उपरोक्त सीमाओं के बावजूद भी ZBB की प्रक्रिया में मजबूत तर्क है ताकि इसे बजटीय सुधार प्रक्रिया का दीर्घावधिक लक्ष्य बनाया जा सके। इसकी मूल अवधारणा वास्तव में व्यय के लाभ का महत्तमीकरण करना है, जो अपने आप में इसे एक विशिष्ट (Exceptional) बजटीय प्रक्रिया प्रमाणित करता है। जहां तक संगठित क्षेत्र की बात है तो वहाँ यह काफी कारगर व्यवस्था साबित भारत में इसकी शुरूआत वित्त वर्ष 1997-98 से मानी जाती है। वैसे इसके लागू होने के बाद देश में 'आउटकम' एवं 'परफॉर्मेन्स' बज की भी शुरूआत की गयी है। सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों में ZBB को अपनाने से अच्छी सफलता प्राप्त हुई है।

प्रभारित व्यय (Charged Expenditure)

            भारत सरकार के लोक व्यय का वह भाग, जो संसद के मतदान अधिकार क्षेत्र के बाहर है तथा जिसका आहरण प्रत्यक्षत: भारत की संचित निधि से होती है। इसके अंर्तगत राष्ट्रपति, लोकसभा के अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष, राज्य सभा के अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष, सर्वोच्च एवं उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के वेतनमान इत्यादि शामिल हैं।

बजट के प्रकार (Types of Budgets)

            यह अवधारणा कि सरकार को सिर्फ निवेश करने के लिए (भारत में 'पूंजीगत व्यय') ही ऋण लेना चाहिए अपने चालू व्यय (भारत में 'राजस्व व्यय') की पूर्ति के लिए नहीं, लोक नीति का 'स्वर्ण नियम' (Golden Rule) कहलाता है। यह नियम वास्तव में काफी अच्छा और तार्किक है बशर्ते कि निवेश की परिभाषा ईमानदारी से की जाए एवं उसमें दक्षता शामिल हो तथा यह निजी क्षेत्रीय निवेश के लिए अर्थव्यवस्था में धन की कमी नहीं करें (Crowding out)।

संतुलित बजट (Balanced Budget)

            जिस बजट की सकल सार्वजनिक क्षेत्र व्यय उसके सकल आय (राजस्व प्राप्तियाँ) के बराबर होती हैं तो वह संतुलित बजट कहलाता है। दूसरी भाषा में अगर किसी बजट का राजस्व घाटा शून्य हो तो वह संतुलित बजट है। इस तरह की बजट प्रक्रिया को लोकप्रिय रूप से 'बैलेंस बजटिंग' कहते हैं।

'जेंडर बजटिंग' (Gender Budgeting)

            सरकार द्वारा निर्मित ऐसा बजट, जो संसाधन एवं कार्यों का आवंटन लिंग (Gender) के आधार पर करता है, 'लिंग आधारित बजटीय प्रक्रिया' (Gender, Budgeting) है। ऐसी बजटीय प्रक्रिया उन देशों में उपयोग में लायी जाती है, जहाँ सामाजिक आर्थिक असमानता में लिंग के आधार पर विभेद दिखता हो तथा वह चिरकालिक (chronic) भी हो (जैसे-भारत में)।

भारत में इस तरह की बजटीय प्रक्रिया आम बजट 2006-07 से प्रारम्भ की गयी।

'आउटकम' एवं 'परफॉर्मेन्स' बजट

(Outcome & Performance Budgets)

            ये दोनों ही अवधारणाएँ एवं परिणाम-लक्षित बजटीय प्रक्रिया से संबद्ध हैं। जहाँ 'परिणाम' (Outcome) बजट का निर्माण विभिन्न विभागों एवं मंत्रालयों द्वारा किया जाता है, वहीं 'निष्पादन' (Perfomance) बजट का निर्माण वित्त मंत्री द्वारा किया जाता है। दोनों ही बजटीय प्रक्रियाओं में निष्पादन के 'मात्रात्मक' (Quantitative) तथा 'गुणात्मक' (Qualitative) प्रगति प्रपत्र (Progress Reports) तैयार किए जाते हैं। जहाँ परिणाम बजट एक 'व्यष्टि-स्तर' (micro-level) प्रक्रिया है, वहीं निष्पादन बजट एक 'समष्टि-स्तर' (macro-level) प्रक्रिया है। किसी एक निष्पादन बजट में कई परिणाम बजट होते हैं।

इस प्रकार की बजटीय प्रक्रियाओं का मुख्य उद्देश्य बजटीय प्रक्रिया में पारदर्शिता लाना है ताकि सरकार राजकोषीय नीति के मामले में जनता तथा सदन के प्रति अधिक जवाबदेह हो सके। इनके द्वारा सरकारी व्यय को परिणाम-लक्षित और ईष्टतम बनाया जाता है।

कटौती प्रस्ताव (Cut Motion)

            लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्थाओं में सरकार द्वारा बनाए गए बजट में सदन/विपक्ष के द्वारा कटौती प्रस्ताव लाने का प्रावधान है (साधारणतया इस प्रक्रिया में विपक्ष ही भाग लेता है, लेकिन सत्तासीन राजनीतिक दल/गठबंधन में आपसी मतभेद होने पर इसमें सत्तासीन सांसद भी भाग ले सकते हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका में सरकार की बजट प्रावधानों को तभी लागू किया जा सकता है, जब इसे सदन (कांग्रेस)

की मंजूरी मिल जाती है। ब्रिटिश संसदीय प्रणाली में व्यवस्था अमेरिकी व्यवस्था से भिन्न है। सरकार द्वारा बनाए गए बजट को हालांकि ब्रिटिश सदन द्वारा पारित किया जाता है इसमें वह कोई परिवर्तन नहीं करता। भारत में अमेरिकी एवं ब्रिटिश प्रावधानों का एक मिश्रण दिखाई देता है। यहां बजट पर परिचर्चा होती है, पुनः इस पर सदन मतदान करता है। भारत सरकार द्वारा प्रस्तुत किए गए बजट की माँगों, अनुदानों, आदि पर सदन के परिचर्चा करने के लिए कई संवैधानिक प्रावधानों की व्यवस्था की गयी है:

  1. प्रतीकात्मक कटौती (Token cut): यह प्रस्ताव माँग से 100 रूपये की कमी करने के लिए लाया जाता है। ऐसा प्रस्ताव भारत सरकार के उत्तरदायित्व के दायरे में आने वाले किसी मामले से संबंधित शिकायत को जगह देने के लिए लाया जाता है। चर्चा प्रस्ताव में उल्लिखित एक विशेष शिकायत पर केन्द्रित रहती है।
  2. किफायत कटौती (Economycut): यह प्रस्ताव किफायत या मितव्ययिता के लिए माँग में विर्निष्ट राशि तक की कटौती के लिए लाया जाता है। ऐसी विनिदिष्ट राशि माँग में एकमुश्त कटौती अथवा माँग में किसी मद (Item) को हटाने अथवा घटाने के लिए हो सकती है। चर्चा इस विषय पर केन्द्रित रहती है कि किफायत किस प्रकार प्रभावी हो।
  3. नीतिगत कटौती की अस्वीकृति (Disapprovalof Policycut): यह प्रस्ताव माँग में एक रूपये की कमी करने के लिए लाया जाता है। इसका आशय उस नीति के प्रति अस्वीकृति प्रकट करना है जो माँग के पीछे है। चर्चा नीति विशेष पर केन्द्रित रहती है और सदस्यों को वैकल्पिक नीति प्रस्तावित करने की सुविधा रहती है।
  4. गिलोटीन (Guillotine): यह वह प्रक्रिया है जिसमें लोक सभाध्यक्ष बजट की सभी बकाया माँगें प्रत्यक्ष मतदान के लिए सदन में रखता है। उन पर चर्चा का अंत करते हुए ताकि बजट पर चर्चा को संक्षिप्त रखा जा सके। इसके माध्यम से लोक सभाध्यक्ष (Speaker) संपूर्ण बजट को मतदान के लिए रख सकता है। हाल के वर्षों में आक्रामक विपक्ष का सामना करने से बचने के लिए यही रास्ता इस्तेमाल किया जाता रहा है। यह बजट चर्चा का एक छोटा रास्ता है, लेकिन इसके अपने खतरे भी हैं, क्योंकि मतदान प्रक्रिया अविश्वास प्रस्ताव' की शक्ल अख्तियार कर सकती है और परिणामस्वरूप सरकार गिर भी सकती है, लेकिन सभी तक भारत में गिलोटीन के कारण सरकार गिरने की नौबत नहीं आई है। इसका एक कारण यह भी है कि भारत ने ब्रिटिश संसदीय प्रणाली को अपनाया है।

त्रिविधा (Trilemmas)

पूरी दुनिया में लोकतांत्रिक सरकारों के लिए सही प्रकार की राजकोषीय नीति पर चलना सबसे चुनौतीपूर्ण नीतिगत निर्णय रहा है। इससे संबंधित कुछ त्रिविधाएं प्रसिद्ध हैं:

(i) डिर्क शोएनमेकर (Dirk Schoenmaker, 2008):- में 'वित्तीय स्थिरता विविधा' का विचार यूरोजोने के आंतरिक असामंजस्य की व्याख्या करने के लिए प्रस्तुत कियाः

• एक स्थिर वित्तीय प्रणाली;

• एक समेकित वित्तीय प्रणाली, तथा;

• राष्ट्रीय वित्तीय स्थिरीकरण नीतियां।

(ii) वर्तमान में यूरोजोन के सबसे 'हाई प्रोफाइल' त्रिविधा का उल्लेख एडवर्ड चान्सलर ने किया, इसकी तीन इच्छाओं के बीच पूर्ण असामंजस्य की स्थिति को लेकरः

एक मुद्राः 'वेस आइट्स' के लिए न्यूनतम राजकोषीय योगदान, तथा;

ईसीबी (ECBs) की निम्न मुद्रास्फीति के प्रति प्रतिबद्धता।

(iii) मार्टिन बुल्फ में अमेरिकी रिपब्लिकन पार्टी को राजकोषीय नीति की त्रिविधा का जिक्र किया:-

• बड़े स्तरीय घाटे बर्बाद करने वाले होते हैं:

• कटौती की इच्छा बराबर बनी रहना, तथा;

बड़े पैमाने पर खर्च में कटौती के प्रति अनिच्छिा।

(iv) एक भू-त्रिविधा, यानी (Earth Trilemma (EEE) भी है, जिसके अनुसारः

आर्थिक विकास के लिए; हमें ऊर्जा खर्च में बढ़ोतरी करनी होगी, तथा;

• लेकिन इससे पर्यावरण का मुद्दा खड़ा होता है।

(v) इन त्रिविधाओं के अंर्तगत अर्थशास्त्र में काद और त्रिविधाओं की भी चर्चा रही है, उनमें सबसे प्रमुख है मुंडेल (Mundell) की 'इम्पॉसिबल ट्रिनिटी'। पुरानी त्रिविधा का जोर है कि किसी देश के एक साथ तीन नीतिगत लक्ष्यों को हासिल नहीं किया जा सकता; दानी रौड्रिक (DaniRodrik) ने विचार व्यक्त किया कि अगर कोई देश अधिक भूमंडलीकरण चाहता है, तो इसे या तो लोकतंत्र को अथवा कुछ राष्ट्रीय संप्रभुता को कुछ हद तक छोड़ना होगा। नॉयल फर्ग्युसन (Niall Ferguson) में भूमंडलीकरण के प्रति प्रतिबद्धता, सामाजिक व्यवस्था तथा छोटे राज्य (मतलब राज्य के सीमित हस्तक्षेप) के बीच चुनाव की विविधा को उजागर किया।

 

राजकोषीय कम्प्यूटरीकरण

(Treasury Computerisation) सरकार (Government)

            मिशन मोड़ परियोजना "राज्य राजकोषों का कम्प्यूटीकरण" के क्रियान्वयन हेतु योजना भारत सरकार द्वारा जून 2010 में राष्ट्रीय ई-अभिशासन योजना (एनईजीपी) के तहत सुव्यवस्थित की गई थी। राज्यों तथा संघ राज्य क्षेत्रों से यह अपेक्षित है कि वे 2010-11 से आरम्भ लगभग तीन वर्षों में अपनी परियोजनाएं पूर्ण कर लें। निधियां परिदेय परिणामों के प्रति निर्मुक्त की जाती हैं। यह योजना आधारभूत कम्प्यूटरीकरण में सहायता करने के अलावा राज्यों तथा संघ राज्य क्षेत्रों के राजकोष कम्प्यूटरीकरण, उन्नयन, विस्तार तथा इंटरफेस आवश्यकताओं में विद्यमान कमियों को दूर करने में उन की सहायता करेंगी। योजना में एक व्यापक क्षेत्र आधार पर नेटवर्क किए गए माहौल में उपयुक्त हार्डवेयर तथा अनुप्रयोग सॉफ्टवेयर प्रणालियों की संस्थापना करना एवं विभिन्न पणधारकों में आंकड़ा साझेदारी हेतु इंटरफेस निर्माण शामिल हैं।

प्रवाह

            यह आशा है कि राजकोष कम्प्यूटरीकरण की योजना से राज्यों तथा संघ राज्य क्षेत्रों में बजट व्यवस्था प्रक्रिया अधिक दक्ष होगी, नकद प्रवाह प्रबंधन में सुधार होगा, खातों की वास्तविक समय सुमेलता का संवर्द्धन होगा, प्रबंधन सूचना प्रणालियां (एमआईएस) सुदृढ़ होगा, प्रबंध न सूचना प्रणालियां (एमआईएस) सुदृढ़ होंगी, लेखा तैयारी में यथार्थता एवं समय बद्धता में सुधार होगा, सार्वजनिक परिदाय प्रणालियों में पारदर्शिता तथा दक्षता आएगी, अभिशासन की बेहतर गुणता के साथ बेहतर वित्तीय प्रबंधन करने में सहायता मिलगी। योजना की समग्र अनुमानित लागत पहली अप्रैल 2011 को अस्तित्वाधीन में प्रति जिला एक करोड़ के हिसाब से 626 करोड़ रूपए है। वित्तीय सहायता अनुज्ञेय संघटकों की व्यष्टि परियोजना लागत के 75 प्रतिशत (पूर्वोत्तर राज्यों के मामले में 90 प्रतिशत) तक है जो प्रति जिला 75 लाख रूपए (पूर्वोत्तर राज्यों के लिए 90 लाख रूपए प्रति जिला) तक सीमित है। निधियां उपयोग प्रमाण-पत्रों की संतोषजनक प्राप्ति के अध्यधीन 40 प्रतिशत, 30 प्रतिशत तथा 30 प्रतिशत प्रत्येक की तीन किस्तों में निर्मुक्त की जाएंगी।

प्रत्यक्ष लाभ अंतरण

(Direct Benefit Transfer)

 वर्ष, 2015 में, केंद्र की नई सरकार ने तकनीकी आधारित प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) की शुरूआती की। इसे JAM (जन-धन-आधार-मोबाइल) नंबर समाधान कहा जाता है। इसके तहत सार्वजनिक संसाधनों को प्रभावी तरीके से उन लोगों तक पहुँचने की संभावनाएं प्रदान की गई हैं जिन्हें इनकी सबसे अधिक आवश्यकता है और इसमें वे सभी लोग शामिल हैं जो इनसे वंचित हैं। कई अर्थों में इसके तहत, लाभार्थी को उनके बैंक या डाकघर के 12 अंकों वाले बायोमीट्रिक पहचान वाले खातो में 'सीधे' पैसा मिल जाएगा, जिसे भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधि करण (यूआईडीएआई) ने प्रदान किया है। इस विचार को सबसे पहले 2013 में भारत सरकार (यूपीए-II) ने देश के 20 जिलों में सात योजनाओं के लिए पायलट आधार पर शुरू किया था।

तकनीकी मंच के हिस्से-द डिजिटल इंडिया के माध्यम से उम्मीद है कि आधार के साथ विभिन्न लाभार्थियों के डेटाबेस प्रदान होगा और उचित प्रक्रिया फिर से शुरू होगी, जिसका नतीजा होगा:

इस बीच, आधार (वित्तीय और अन्य सब्सिडी, लाभ और सेवाओं के लक्षित विवरण) विधेयक, 2016 को संसद ने पारित किया तथा सरकारने वर्ष 2016 के अंत तक लागू कर दिया। ये कानून का परिवर्तनकारी अंग था जिससे गरीबों और कमजोरों को लाभ होगा। आधार की वैधानिकता इस परियोजना से जुड़ी अनिश्चितताओं को दूर करेगी, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने आधार संख्या के उपयोग पर रोक लगा दी थी, लेकिन तब तक जब तक संविधान पीठ ने सरकारी योजनाओं में आधार के इस्तेमाल को अनिवार्य करने और गोपनीयता के नियमों के उल्लंघन को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अपना फैसला नहीं दे दिया।

वास्तविक लाभार्थियों को सरकारी सब्सिडी और वित्तीय सहायता सुनिश्चित करना सरकार की 'न्यूनतम सरकार और अधिकतम अभिशासन' की प्रतिबद्धता का महत्वपूर्ण घटक है। सरकार के अनुसार, रसोई गैस में डीबीटी की सफल शुरूआत के बाद, सरकार ने 2016-17 में इसे कुछ जिलों में उर्वरक सब्सिडी देने के लिए प्रायोगिक आधार पर पेश किया है। इसी तरह, सरकार ने 5.35 लाख (उचित मूल्य की दुकानों) जो कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत आती हैं, के लिए भी स्वचालन सुविधा शुरू की है।

            आर्थिक सर्वेक्षण2015-16 में किसानों को दिए जाने वाले कृषि ऋण और ब्याज सहायता योजनाओं के लिए डीबीटी समाधान का सुझाव दिया गया है। इसमें ये भी कहा गया है कि मौजूदा एमएसपी/खरीद आधारित पीडीएस प्रणाली को डीबीटी से बदला जना चाहिए जो बाजार को घरेलू गतिविधियों और आयात के सभी नियंत्रण

ऋणों से मुक्त कर देगी। मौजूदा व्यवस्था में यह बाजार की अवधारणा को विकृत करती है और सर्वे के अनुसार कृषि क्षेत्र में उत्पादकता बढ़ाने के लिए इसे बंद कर दिया जाना चाहिए।

            संघीय बजट 2017-18 के अनुसार, डीबीटी के संदर्भ में, एलपीजी और केरोसीन उपभोक्ताओं के संदर्भ देश ने एक मजबूत शुरूआत की है। चंडीगढ़ तथा हरियाणा के आठ जिले केरोसीन मुक्त हो चुके हैं। इसके अलावा 84 सरकारी योजनाएं भी डीबीटी के मंच पर मंचासीन हो चुकी हैं। दरअसल, डीबीटी का विचार भारत की लेन-देन की 'कैशलैस' अर्थव्यवस्था के लिए कुंजी होगा, जैसा कि (आर्थिक सर्वेक्षण 2015-16 में उल्लिखित) विमौद्रीकरण के उपरांत पुष्टि हो गई है।

व्यय प्रबंधन आयोग

            (Expenditure Management Commission) सितंबर 2014 तक भारत सरकार ने एक संकल्प के माध्यम से व्यय प्रबंधन आयोग (EMC) का गठन किया। ईएमसी सरकार द्वारा शुरू किस गए व्यय सुधारों के विभिन्न पक्षों के साथ ही सार्वजनिक व्यय प्रबंधन से संबंधित विषयों को देखेगा। आयोग का एक पूर्णकालिक, एक अंशकालिक तथा एक पदेन सदस्य होता है। आयोग के अध्यक्ष को मंत्रिमंडलीय स्तर की हैसियत प्राप्त है। विमल जालान इसके पहले अध्यक्ष थे। आयोग का टीओआर (Terms of Reference) निम्नवत् है:

(i) केंद्र सरकार के खर्चों के प्रमुख क्षेत्रों की समीक्षा करना, साथ ही विकासात्मक खर्चों की जरूरत के लिए राजकोषीय खाते में जगह बनाने के बारे में तरीके सुझाना, वित्तीय अनुशासन के प्रति पूरी तरह प्रतिव्रत रहते हुए।

(ii) संस्थानिक व्यवस्थाओं की समीक्षा, बजट निर्माण प्रक्रिया तथा एफआरबीएम रूल्स सहित, ताकि वित्तीय अनुशासन बना रहे। साथ ही स्थिति में सुधार के लिए रास्ते सुझाना।

(iii) मौजूदा व्यय प्रशासकीय प्रणाली में आवंटन संबंधी कुशलता के लिए उपाय सुझाना-पूंजीगत खर्च पर ध्यान रखते हुए। खर्चों की प्रशासकीय कुशलता में उपयोग, लक्ष्यों एक परिणामों पर एकाग्रता के माध्यम से सुधार लाने के लिए एक फ्रेमवर्क

डिजाइन करना।

(v) यूजर चार्जेज के माध्यम से सेवा क्षेत्र पर खर्च के तर्कसंगत अनुपात की व्यवस्था के लिए प्रभावकारी रणनीति सुझाना।

(vi) बेहद नकद प्रबंधन प्रणाली के माध्यम से वित्तीय लागत में कमी के उपाय सुझाना।

(vii) व्यय प्रबंधन के लिए आईटी टूल्स के व्यापक उपयोग के लिए सुझाव देना।

(viii) अकाउंटिंग, बजटिंग के संदर्भ में बेहतर वित्तीय सूचना प्रणाली की सलाह राज्यों ने जब से राजकोषीय उत्तरदायित्व कानून (एफआरए) लागू किए हैं तब से वे अपने राजकोषीय मोर्चों पर बेहतर कर रहे हैं।

(ix) केंद्र सरकार में सार्वजनिक व्यय प्रबंधन से संबंधित अन्य प्रासंगिक विषयों पर विचार करना तथा उपयुक्त अनुशंसाएं करना।

सार्वजनिक निवेश की आवश्यकता

(Need of Public Investment)

            केंद्र में नई सरकार कई सुधारों की शुरूआत करती दिख रही है। विशेषज्ञों के साथ भारत सरकार को लगता है कि इसने निवेशकों की भावना जगा दी है। लेकिन वास्तव में निवेश को अभी रफ्तार पकड़नी है, खासतौर पर निजी क्षेत्र को इस स्थिति की वजह को 'बैलेंस शीट सिंड्रोम विद इंडियन कैरेक्टरस्टिक्स' कहा गया है। साल 2014-15 के आर्थिक सर्वेक्षण में इस स्थिति को ज्यादा ब्यौरे के साथ विश्लेषित किया गया है।

            ऐसी स्थिति में, अन्य उपायों के साथ, जो सबसे महत्वपूर्ण कदम उठाने की सिफारिश की गई वह है, 'सरकारी निवेश को बढ़ाना।' ऐसे काम की विशेषता पर अर्द्ध-वार्षिक आर्थिक सर्वेक्षण 2014-15 में भी जोर दिया गया है। यह दस्तावेज कहता है कि 'चुनिंदा सरकारी निवेश' अल्पकाल में वृद्धि के इंजन की तरह काम करेगा और निजी क्षेत्र के निवेश के लिए भी रास्ता बनाएगा। इसने सरकारी निवेश को निजी निवेश का विकल्प नहीं बताया बल्कि पुरक और किक स्टार्ट निवेश बताया है जिसके पीछे-पीछे दूसरा निवेश आता है।

सार्वजनिक निवेश की भूमिका

(Role of Public Investment)

            आर्थिक सर्वेक्षण 2014-15 में भारत एवं भारत के बाहर के कुछ अध्ययनों को उद्धृत करते हुए सार्वजनिक निवेश को लक्षित रूप से बढ़ाने की जरूरत बताई थी। यह सार्वजनिक निवेश ही लक्षित प्रभाव (Targeted effect) पैदा कर सकता है। वर्तमान समय में यह क्षमता रेलवे में सबसे अधिक है।सर्वेक्षण डब्ल्यू. डब्ल्यू. रोस्तोव के इस आकललन से सहमति व्यक्त करता है - "रेलवे ऐतिहासिक रूप से आर्थिक उठान का अकेला सबसे शक्तिशाली प्रारम्भिक रहा है।'' ऐसी नीतिगत कार्यकारी के औचित्य एवं तर्क को निम्नलिखित दस्तावेजों एवं अध्ययनों के माध्यम से रेखांकित किया गया है:

(i) यह पाया गया कि सार्वजनिक एवं निजी निवेश के बीच एक जुड़ाव (link) रहा है, जिसके चलते वृद्धि दर में बढ़ोतरी या गिरावट आती रही है। केन्द्रीय सांख्यिकीय कार्यालय (Central Statistics Office, CSO) के आंकड़े दर्शाते हैं कि 2004-08 के उच्च वृद्धि दर वाले चरण में निजी कॉरपोरेट निवेश में उछाल के बाद सार्वजनिक निवेश में भी 1.5 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई।

इसी प्रकार 2008-13 की अवधि में सार्वजनिक निवेश में 1 प्रतिशत प्वाइंट की गिरावट के बाद निजी कॉरपोरेट निवेश में भी 6 प्रतिशत प्वाइंट की गिरावट देखी गई। (2009-10 तथा 2010-11 के बीच की वृद्धि को छोड़कर)।

(ii) 'दि वर्ल्ड इकोनोमिक आउटलुक-2014' (आईएमएफ रिपोर्ट) ने नोट किया कि यदि सार्वजनिक अधिरचना निवेश को कुशलतापूर्वक कार्यान्वित किया जाए तो अर्थव्यवस्था पर इसका दो तरीके से प्रभाव होता है:-

(a) अल्पावधि के रूप में यह कुल मांग में तेजी लाता है तथा निजी निवेश की अधिरचना सेवाओं की पूरक प्रवृत्ति के कारण बढ़ता है।

(b) दीर्घावधिक रूप में अधिरचना निर्माण ज्यों ही अर्थव्यवस्था को उत्पादक क्षमता से पुष्ट करने लगता है (अधिरचना अर्थव्यवस्था की जीवन रेखा होती है जिसका सकारात्मक प्रभाव सभी क्षेत्रों पर पड़ता है), इसके पार्श्व प्रभाव (Side effect) के रूप में आपूर्ति में भी उछाल आता है)।

अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) का अध्ययन इस बात की पुष्टि करता है कि सार्वजनिक निवेश का उत्पादन पर भी सकारात्मक प्रभाव होता है। विकासशील

 

 

अर्थव्यवस्थाओं के लिए मध्यावधिक सार्वजनिक निवेश गुणक

(Medium-term public investment multiplier)

अनुमानत: 0.5 तथा 0.9 के बीच होता है, तथापि इसकी परिभाषा कार्यान्वयन की कुशलता एवं दक्षता पर निर्भर करती है।

(iii) सार्वजनिक निवेश बढ़ाने के रास्ते में दो चुनौतियां हैं :

(a) सार्वजनिक निवेश बढ़ाने के लिए वित्तीय संसाधनों का संघटन, तथा;

(b) कार्यान्वयन करना।

जहां तक कार्यान्वयन क्षमता का संबंध है, या क्षेत्र के अधिकतम सकारात्मक उत्पल्वन (positive spillover) संभव है, जिसमें द्रुतता से दक्षतापूर्वक निवेश करने की प्रभावित दक्षता हो और इससे बात बन सकती है। ऐसे दो क्षेत्र हैं - ग्रामीण सड़कें एवं रेलवे। सड़क सम्पर्क बढ़ाने का अर्थव्यवस्था पर भारी उत्पल्वन प्रभाव हो सकता है ऐसा अध्ययनों से प्रमाणित हो चुका है। इसके उदाहरण हैं - राष्ट्रीय उच्च पथ विकास परियोजना एवं प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क परियोजना (2000 के दशक के दौरान)। ऐसी सार्वजनिक निवेश की पहलों से ग्रामीण रोजगार एवं आय में वृद्धि हुई।

सर्वेक्षण का मत है कि, वर्तमान सरकार को अब तक उपेक्षित रेलवे क्षेत्र में सार्वजनिक निवेश प्रोत्साहित करना चाहिए। इस क्षेत्र में भी वहीं संभावनाएं हैं, जो ग्रामीण सड़क में विगत में अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक प्रभाव के रूप में अनुभव की गई। इस क्षेत्र में निजी निवेश आकर्षित करने की भी क्षमता है बिना भारत के सार्वजनिक ऋण की गतिकी (Dynamics) को जोखिम में डालें।

(iv) आनुभविक अध्ययनों से यह तथ्य स्पष्ट हुआ है कि सार्वजनिक निवेश का वृद्धि संभावनाओं पर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है। 1980 के दौरान भारत में उत्पादकता में बढ़ोतरी का कारण अधिसंरचना क्षेत्र के सार्वजनिक निवेश रहा था (इसके मांग पैदा करने वाले प्रभावों के विपरीत)। अध्ययन में एक फ्रेमवर्क का उपयोग करके वृद्धि दर पर उन प्रभावों का विश्लेषण किया है जहां सरकारी अधिरचना सेवाएं किसी उत्पादन के लिए इनपुट थीं। अध्ययन से यह पता चला कि यदि सार्वजनिक अधिरचना व्यय तथा वृद्धि के बीच उपयुक्त 'लैग' (Lag) की अनुमति दी जाए (लगभग पांच वर्ष के लिए) तो सार्वजनिक अधिरचना व्यय कुल वृद्धि का 1.5-2.9 प्रतिशत ठहर सकता है।

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के एक अध्ययन ने दीर्घावधिक गुणक (जीडीपी पर पूंजीगत लागत का) 2.4 बताया है। अध्ययन इस बात की भी पुष्टि करता है कि जीडीपी पर राजस्व खर्च का प्रभाव, हालांकि अधिक होता है, लेकिन पहले साल के बाद इसमें कमी आती है, जिससे खर्चों की पुनः प्राथमिकता निर्धारण से हुआ लाभ दृष्टिगोचर होता है।

            इस प्रकार इस सर्वेक्षण ने रेलवे क्षेत्र में सार्वजनिक निवेश बढ़ाने की अनिवार्यता जताई है। इसकी शुरूआत केवल सार्वजनिक निवेश के रूप में की जा सकती है, लेकिन सरकार द्वारा इस दिशा में आगे बढ़ने के साथ ही इतनी सहूलियतें एवं संभावनाएं पैदा हो जाएंगी कि यह क्षेत्र पर्याप्त मात्रा में निजी क्षेत्र से भी निवेश आकर्षित करने लगेगा। जब ऐसा प्रभाव दृष्टिगोचर होने लगे तब निवेश प्रोत्साहित करने के कई अन्य संभव विकल्प भी हैं - समर्पित निजी निवेश के लिए सार्वजनिक निजी भागीदारी, पीपीपी। रेलवे के नेतृत्वकारी अधिरचना क्षेत्र होने के कारण अर्थव्यवस्था पर इसके बहुआयामी उत्पल्वनकारी प्रभाव हो सकते हैं। लोगों एवं स्थानों के जुड़ाव से अर्थव्यवस्था में बड़ी संभावनाएं पैदा होती हैं।

वर्तमान राजकोषीय स्थिति

(Current Fiscal Situation)

            भारतीय अर्थव्यवस्था (केंद्र एवं राज्य सरकारों की) की राजकोषीय स्थिति आर्थिक सर्वेक्षण2017-18 के अनुसार निम्न प्रकार है:-

FRBM एक्ट की समीक्षा हेतु एन. के. सिंह समिति की सिफारिशें-

भारत जैसी अर्थव्यवस्था में राजकोषीय नीति की सीमाएं:-

सहायिकी /उपादान (Subsidy):-

किसी भी वस्तु या सेवा को उसके उत्पादन लागत मूल्य या आर्थिक लागत मूल्य से कम पर आपूर्ति करने के लिए दोनों के अंतर को पूरा करने के लिए सरकार द्वारा जो व्यय किया जाता है उसे सहायिकी Subsidy कहा जाता है।

सब्सिडी = लागत - मूल्य जिस पर वस्तु या सेवा लोगों को दी गयी है

सहायिकी का स्तर चिंता का विषय क्यों?

 

सहायिकी के प्रति सरकार की नीति:-