वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) (Goods and Service Tax – GST)

                   (ii) अप्रत्यक्ष करों पर केलकर कार्यबल थी।

-     वर्ष 2011 में तत्कालीन वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी द्वारा 115वाँ संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में लाया गया था, जिसे वित्तीय मामलों से संबंधित संसदीय स्थाई समिति को भेज दिया था। मार्च , 2014 में इसे पुन: लोकसभा में प्रस्तुत किया गया, लेकिन लोकसभा भंग होने के कारण यह विधेयक निरस्त हो गया। 19 दिसंबर, 2014 को पुन: जीएसटी पर 122 वाँ संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में लाया गया जिसे मई 2015 में लोकसभा द्वारा कुछ संशोधनों के साथ इसे पारित कर दिया गया तथा राज्यसभा को भेज दिया गया तथा 14 मई,  2015 को राज्यसभा और लोकसभा की संयुक्त प्रवर समिति को भेज दिया गया। इस समिति में 22 जुलाई, 2015 को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। 3 अगस्त, 2016 को राज्यसभा द्वारा कुछ संशोधनों सहित इस विधेयक को पारित कर दिया। तत्पश्चात् 8 अगस्त, 2016 को लोकसभा द्वारा इसे पुन: पारित कर दिया गया।  8 सितंबर, 2016 को राष्ट्रपति द्वारा इस पर हस्ताक्षर किये गए तत्पश्चात् यह  '101 वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2016' बन गया। इस अधिनियम के द्वारा भारतीय संविधान के अनुच्छेद 279 (A) के अंतर्गत यह प्रावधान किया गया है कि इस अधिनियम के लागू होने के 60 दिनों के भीतर राष्ट्रपति जीएसटी परिषद् का गठन करेगा। 16 सिंतबर, 2016 को भारत सरकार द्वारा अधिसूचना जारी कर इस अधिनियम के सभी खंडों को लागू कर दिया गया। 

 भुगतान प्रक्रिया- जीएसटी के अंतर्गत निम्नलिखित तरीके से क्रेडिट का उपयोग करने की अनुमति है-

101वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2016 (101st Constitution Amendment Act, 2016) नए प्रावधान (New Provisions) -

जीएसटी आने के पश्चात कुछ अनुच्छेदों को, जो संविधान में निर्दिष्ट है, संशोधित किया गया और कुछ नए अनुच्छेद जोड़े भी गए। यथा-

अनुच्छेद 246: इस अनुच्छेद के तहत यह व्यवस्था की गई है कि संसद को सीजीएसटी और आईजीएसटी लगाने का अधिकार होगा और राज्यों को एसजीएसटी लगाने का अधिकार होगा।

अनुच्छेद 248: यह अनुच्छेद  बताता है कि कौन-से विधानमंडल के पास कौन-से अधिकार होंगे। अनुच्छेद 246-248 तीनों सूचियों से संबंधित हैं- संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची।

अनुच्छेद 268A: इस अनुच्छेद का पहले सेवा कर का प्रावधान करता था। अब यह अनुच्छेद संविधान से समाप्त कर दिया गया है।

अनुच्छेद 269: इसके तहत पहले जो अंतर्राज्यीय लेन-देन होता था, उस पर कर केंद्र लेता था, परंतु उसे राज्यों में बाँट दिया जाता था। अनुच्छेद 269 में अब एक नया अनुच्छेद 269A आईजीएसटी का प्रावधान किया गया है। यह अंतर्राज्यीय लेन-देन पर लगता है। अब अगर वस्तु का बाहर से आयात होगा तो वहाँ सीमा शुल्क के साथ-साथ आईजीएसटी भी लगेगा। 1 जुलाई, 2017 के बाद से जो भी वस्तुएँ आयातित होंगी, वे अंततः जिस राज्य में उपभोग होंगी, उस राज्य को उसके आयात पर आईजीएसटी का आधा हिस्सा भी मिलेगा। इस प्रकार पहली बार राज्यों को आयात में से कुछ हिस्सा मिलेगा। विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ) पर भी आईजीएसटी लगेगा।

अनुच्छेद 270: इस अनुच्छेद के तहत जो कर केंद्र लगाता और वसूलता था, उसके बाद इसे राज्यों में बाँट दिया जाता था। अब साथ में जीएसटी से जो राजस्व एकत्र होगा, उसमें अर्थात् सीजीएसटी और आईजीएसटी में केंद्र का जो आधा हिस्सा है, यह कर भी विभाज्य पूल का हिस्सा बनेगा और वित्त आयोग की अनुशंसाओं के अनुसार केंद्र और राज्यों के बीच बांटा जाएगा।

अनुच्छेद 271: इस अनुच्छेद  में दो बातें समाहित हैं- अधिभार और उपकर। इससे संबंधित केंद्र सरकार के पास विशेष उपाय थे। केंद्र का कर संग्रह कम होने पर केंद्र अनुच्छेद 269 और अनुच्छेद 270 में जो कर का प्रावधान था, उन पर अधिभार या उपकर लगा सकता था, जिसमें जो भी कर केंद्र लगाता था, उसका सारा पैसा केंद्र को मिलता भा तथा राज्यों को कोई पैसा नहीं मिलता था। लेकिन अब इससे जो भी कर राजस्व प्राप्त होगा, वह वित्त आयोग के सुझाव के अनुसार राज्यों तथा केंद्र में बाँट दिया जाएगा।

इस प्रकार जीएसटी में केंद्र सरकार एवं राज्य सरकार के उपर्युक्त अप्रत्यक्ष करों को सम्मिलित करके एक एकीकृत कर (वस्तु एवं सेवा कर) का निर्माण किया गया है।

जीएसटी परिषद् (GST Council)

101वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2016 के द्वारा अनुच्छेद 279A(1) में यह प्रावधान किया गया है कि 101वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2016 की शुरुआत की तारीख से 60 दिनों के भीतर राष्ट्रपति द्वारा जीएसटी परिषद् (GST Council) का गठन किया जाएगा। वस्तु एवं सेवा कर परिषद् का गठन 12 सितंबर, 2016 को किया गया। जीएसटी परिषद् की सहायता के लिये इसका एक सचिवालय भी स्थापित किया गया है। देश में वस्तुओं एवं सेवाओं के लिये राष्ट्रव्यापी बाजार विकसित करने की दृष्टि से जीएसटी परिषद् का मार्गदर्शी सिद्धांत केंद्र और राज्य एवं विभिन्न राज्य सरकारों के बीच जीएसटी के विभिन्न आयामों की सुसंगतता को सुनिश्चित करना है। जीएसटी परिषद् (GST Council) केंद्रीय जीएसटी, राज्य जीएसटी, संघ राज्य क्षेत्र जीएसटी, एकीकृत जीएसटी और राज्यों को क्षतिपूर्ति से संबंधित प्रारूप विधानों की अनुशंसा करने और जीएसटी से संबंधित अनेक नियम, लगभग 1200 वस्तुओं पर जीएसटी की विभिन्न 4 दरें आदि को प्रस्तुत करने में सफल रही है।

जीएसटी परिषद् का कार्य (Functions of GST Council) निम्नलिखित विषयों पर केंद्र और राज्यों की सिफारिश करना है -

GST परिषद् की संरचना –

जीएसटी के दायरे से बाहर की वस्तुएं – अनुच्छेद 366 (12A) में जीएसटी की परिभाषा के माध्यम से मानव उपभोग के लिये अल्कोहल को जीएसटी से बाहर रखा गया है। अस्थायी रूप  से पाँच पेट्रोलियम उत्पाद, पेट्रोलियम क्रूड, पेट्रोल, हाई स्पीड डीजल, प्राकृतिक गैस  और विमानन टरबाइन ईंधन तथा विद्युत को जीएसटी से बाहर रखा गया है।

जीएसटी कर की विभिन्न दरें – इसके तहत प्रत्येक वस्तु या सेवा पर चार दरों का स्लैब लागू होगा यथा – 5 प्रतिशित, 12 प्रतिशत, 18 प्रतिशत तथा 28 प्रतिशत। इसके अलावा कुछ वस्तुओं इस कर से छूट प्रदान की गई है, उनके लिए जीएसटी का स्लैब शून्य प्रतिशत अथवा शून्य होगा।

जीएसटी  नेटवर्क – इसकी कल्पना जीएसटी के आईटी अवसंरचना के रूप में की गई। यह संघटन नई प्रणाली के लिए आईटी ढांचे की समूचित व्यवस्था करेगा और करदाताओं को विविध प्रणालियों से एकल प्रणाली में लाने में सहायक होगा। केंद्र तथा राज्य सरकारों ने एक साथ मिलकर इस उद्देश्य विशेष की प्राप्ति हेतु गैर –सरकारी और गैर-लाभकारी संघटन के रूप में GSTN को विकसित किया है, जिसमें केंद्र कि हिस्सेदारी 24.5 प्रतिशत तथा राज्य की हिस्सेदारी 24.5 प्रतिशत है। शेष 51 प्रतिशत गैर-सरकारी वित्तीय संस्थाओं की हिस्सेदारी है।

 वस्तु एवं सेवा कर नेटवर्क (GSTN) की भूमिका-

जीएसटी के लाभ –

 

निष्कर्ष :-

जीएसटी एक आधुनिक कर व्यवस्था है जो पहले की कर व्यवस्था से अधिक सरल एवं पारदर्शी और भ्रष्टाचार को रोकने में मददगार भी है। जीएसटी से सरकार, उद्योग और उपभोक्ता सभी हितधारक लाभान्वित हो रहे है। भारत में जीएसटी लागू होने से उपभोक्ताओं को दोहरे कराधान (कर पर कर- Cascading) से मुक्ति मिली है जिससे होने वाले लाभों के कारण वस्तुओं की कीमतों में कमी की अपेक्षा की जा रही है। इसके द्वारा उत्पादन क्रियाकलापों तथा निर्यात को बढ़ावा मिलेगा तथा रोजगार के नए अवसरों का सृजन तथा बेहतर वित्तीय संसाधनों का विकास होगा जिससे गरीबी उन्मूलन में मदद मिलेगी और अंतत: समावेशी विकास का स्वप्न साकार हो सकेगा।