जैसलमेर का भाटी वंश
- जैसलमेर के क्षेत्र से प्राप्त जीवाश्म इस बात की ओर इशारा करते हैं कि, प्रागैतिहासिक काल में यहाँ समुद्र हुआ करता था।
- रामायण में वाल्मिकी ने किष्किंधा काण्ड में मरुस्थली नामक जनपद का उल्लेख किया है यह स्थान वर्तमान में जैसलमेर का क्षेत्र है।
- पौराणिक काल में इस क्षेत्र को माडमड़ प्रदेश कहा जाता था।
- प्रतिहार शासक कक्कुक के घटियाला शिलालेख में इस प्रदेश के लिए माड, वल्ल, त्रावणी शब्दों का प्रयोग किया गया है।
- भाटियों को 'उत्तर भड़ किवाड़ भाटी' कहा जाता था क्योंकि भाटी वंश उत्तर भारत के रक्षक के रूप में लम्बे समय तक रहे।
- भाटी चन्द्रवंशी है वे स्वयं को श्रीकृष्ण के वशंज मानते हैं।
- भाटियों का मूल स्थान पंजाब था। सातवीं सदी के आरंभ में भाटी जाति का इस क्षेत्र में आगमन हुआ तथा भट्टी राजवंश की स्थापना हुई।
भट्टी –
- भट्टी को भाटी राजवंश का आदि पुरुष अथवा मूल पुरुष माना जाता है।
- भट्टी के पुत्र भूपत ने 285 ई. में भटनेर दुर्ग का निर्माण करवाया।
मंगल राव भाटी –
- मंगल राव तथा गजनी के शासक ढुण्डी के बीच युद्ध हुआ जिसमें पराजित होकर मंगल राव जैसलमेर आ गया तथा तनोट को अपनी राजधानी बनाया।
केहर –
- केहर ने केहरोर दुर्ग का निर्माण करवाया तथा तनोट दुर्ग की नींव रखी।
भट्टी –
- भट्टी को भाटी राजवंश का आदि पुरुष अथवा मूल पुरुष माना जाता है।
तणु –
- केहर के उत्तराधिकारी तणु ने 787 ई. के लगभग तनोट दुर्ग का निर्माण पूर्ण करवाया तथा तनोट माता का मंदिर बनवाया।
- तनोट माता को 'थार की वैष्णो देवी'/जवानों की देवी/रूमाली देवी भी कहा जाता है।
- वृद्धावस्था के कारण तनु ने अपने जीवनकाल में ही पुत्र विजयराज को तनोट का शासक बनाया।
विजयराज प्रथम –
- विजयराज इतिहास में विजयराज चूड़ाला के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
- वाराहा और लंगाह राजपूतों ने धोखे से आक्रमण कर विजयराज को सेना सहित समाप्त कर दिया।
- विजयराज का पुत्र देवराज डाही धाय की स्वामीभक्ति के कारण बच गया।
देवराज –
- देवराज 10 वर्षों तक इधर-उधर भटकने के पश्चात शक्ति का संचय कर अपने मामा जजा भूटा की सहायता से देरावल दुर्ग बनवाया यहाँ से लाखा फुलाणी नामक योद्धा की सहायता से अपने पिता की हत्या का बदला लेते हुए हारे हुए क्षेत्रों पर पुन: अधिकार कर लिया।
- योगी रत्नू ने देवराज को सिद्धदेवराज का नाम प्रदान किया और रावल की उपाधि प्रदान की।
- देवराज ने लोद्रवा को अपनी राजधानी बनाया।
- देवराज के बाद मूंध, बच्छराज, दुसाज नामक शासक बने।
राव जैसल –
- जैसल ने शासन संभालने के बाद लोद्रवा से 10 मी. दूर जैसलमेर नगर बसाया तथा त्रिकूट पहाड़ी पर 12 जूलाई, 1155 ई. को जैसलमेर दुर्ग की नींव रखी।
- भाटी राजवंश की क्रमश: राजधानियाँ – भट्टी द्वारा भटनेर, मण्डयराय द्वारा मारोठ, राव तणु द्वारा तनोट, देवराज द्वारा देरावर और जैसल द्वारा जैसलमेर।
रावल जेतसिंह –
- रावल जेतसिंह के समय दिल्ली पर बलबन का शासन था।
- 1308 ई. में दिल्ली के सुल्तान अल्लाउद्दीन खिलजी ने अपने सेनानायक कमालुद्दीन गुर्ग के नेतृत्व में जैसलमेर पर सेना भेजी गुर्ग ने 2 वर्ष तक घेरा डाले रखा लेकिन सफलता नहीं मिली अत: मलिक कपूर के नेतृत्व में सेना भेजी जिसने जैसलमेर दुर्ग पर सीधा आक्रमण कर दिया जिससे तुर्क सेना को अत्यधिक क्षति हुई और सफलता हासिल नहीं हुई।
- खिलजी ने एक बार फिर कमालुद्दीन गुर्ग के नेतृत्व में विशाल सेना भेजी। गुर्ग ने किले को चारों ओर से घेर लिया इसी घेरे के दौरान जेतसिंह की मृत्यु हो गई।
रावल मूलराज प्रथम –
- जेतसिंह के बाद इसका बड़ा पुत्र मूलराज शासक बना। दुर्ग चारों ओर से घिरा होने के कारण खाद्य सामग्री की कमी हो गई। अत: राजपूतों ने केसरिया धारण किया तथा वीरांगनाओं ने जौहर किया।
- इस प्रकार 1312-13 ई. में जैसलमेर का प्रथम प्रामाणिक साका हुआ। इस युद्ध का वर्णन 'तारीख-ए-मासूमी' में मिलता है।
रावल दूदा – (1319-31 ई.)
- रावल दूदा के समय जैसलमेर पर फिरोजशाह तुगलक का आक्रमण हुआ। दूदा के नेतृत्व में त्रिलोकसी व अन्य भाटी सरदारों ने केसरिया धारण किया व महिलाओं ने जोहर किया यह जैसलमेर का द्वितीय साका था।
रावल घड़सी – (1343-61 ई.)
- घड़सी ने दिल्ली जाकर अलाउद्दीन खिलजी से जैसलमेर वापस प्राप्त किया।
- जैसलमेर में घड़सीसर जलाशय का निर्माण करवाया।
रावल लक्ष्मण – (1396-1436 ई.)
- जैसलमेर दुर्ग में लक्ष्मीनाथ (विष्णु) मंदिर का निर्माण करवाया।
- इन्होंने नई शासन पद्धति चलाई जिसमें जैसलमेर के मुख्य शासक लक्ष्मीनाथ तथा रावल उनके प्रतिनिधि के रूप में शासन चलाएंगे।
रावल लूणकरण – (1528-50 ई.)
- लूणकरण के समय दिल्ली का बादशाह बाबर था।
- लूणकरण ने अपने पिता जेतसिंह द्वारा शुरू करवाए गए जेतबंध का कार्य पूर्ण करवाया तथा उसके किनारे एक फलों का बाग लगवाया जिसे बड़ा बाग कहते हैं। यहाँ पर जैसलमेर भाटी शासकों की छतरियाँ है।
- लूणकरण के 9 पुत्र तथा 3 पुत्रियाँ थी। बड़ी पुत्री राम कंवरी तथा छोटी उमादे का विवाह जोधपुर के राव मालदेव के साथ किया। लूणकरण की छोटी पुत्री उमादे इतिहास में रूठी रानी के नाम से जानी जाती है।
- लूणकरण ने जेतबंध यज्ञ का आयोजन कर उन भाटियों को पुन: हिन्दु धर्म में शामिल करवाया जिन्होंने किसी कारण से इस्लाम स्वीकार कर लिया था। यह शुद्धिकरण की दिशा में किया गया पहला प्रयास था।
- कांधार का अपदस्थ शासक अमीर अली खाँ जो कि राव लूणकरण के यहाँ शरणागथ था उसने धोखे से दुर्ग में पहुँचकर दुर्ग में पहुँचकर आक्रमण कर दिया इस युद्ध में लूणकरण के नेतृत्व में वीरों ने केसरिया धारण किया लेकिन वीरांगनाओं को जोहर का समय नहीं मिल पाया। अत: इसे जैसलमेर का अर्द्धसाका कहा जाता है।
- इस युद्ध में लूणकरण वीर गति को प्राप्त हुआ लेकिन भाटियों की विजय हुई।
रावल हरराज/हरराय – (1561-77 ई.)
- हरराज राव मालदेव भाटी का पुत्र था।
- जयपुर के भारमल के समझाने पर इसने 1570 ई. में नागौर दरबार में उपस्थित होकर अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली तथा अपनी पुत्री नाथी बाई का विवाह अकबर से किया।
- यह प्रथम भाटी शासक था जिसने मुगलों के साथ वैवाहिक संबंध स्थापित किये।
- हरराय ने नई सामंती प्रणाली की शुरूआत की। जिसके अंतर्गत जीवणी व डावी मिसलों की स्थापना की।
- मालिया महल व खाबड़ियों की हवेली का निर्माण किया।
रावल भीम – (1577-1613 ई.)
- भीमसिंह ने अपनी पुत्री का विवाह सलीम/जहाँगीर से किया। जहाँगीर ने इसे मलिका-ए-जहाँ उप नाम से संबोधित किया।
- रावल भीम की महारानी ने घड़सीसर तालाब के किनारे नीलकंठ महादेव मंदिर का निर्माण करवाया।
महारावल मूलराज द्वितीय – (1761-1819 ई.)
- मूलराज ने 12 दिसम्बर, 1818 ई. में ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ संधि कर ली।
- यह संधि ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा अन्य राज्यों के साथ की गई संधियों से सम्मानप्रद तथा सममैत्री संधि थी।
महारावल रणजीतसिंह – (1846-64 ई.)
- 1857 ई. क्रांति के दौरान महारावल रणजीतसिंह शासक था। इसने खुले तौर पर ईस्ट इंडिया कंपनी का सहयोग किया।
महारावल जवाहरसिंह – (1914-49 ई.)
- जवाहरसिंह की शिक्षा-दिक्षा मेयो कॉलेज अजमेर में हुई। इसने प्रथम विश्वयुद्ध में ब्रिटिश शासन की सहायता की।
- जवाहरसिंह के राज्यकाल में राजस्थान के अंतिम दुर्ग मोहनगढ़ का निर्माण करवाया गया।
- इसके शासनकाल में सबसे दुर्भाग्यपूर्ण घटना प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी सागरमल गोपा को अमानवीय यातनाएँ देकर 4 अप्रैल, 1946 को मार डाला गया।