प्रमुख जनजातियाँ
राजस्थान में सर्वाधिक आबादी वाली जनजातियाँ :-
1. मीणा जनजाति
2. भील जनजाति
3. गरासिया जनजाति
4. सहरिया जनजाति
5. भील-मीणा जनजाति
| अनुसूचित जाति |
अनुसूचित जनजाति |
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• सर्वाधिक आबादी |
जयपुर, श्रीगंगानगर |
उदयपुर, बाँसवाडा |
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• प्रतिशत के आधार पर सर्वाधिक आबादी |
श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़ |
बाँसवाडा, डूँगरपूर |
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• न्यूनतम आबादी |
डूँगरपुर, प्रतापगढ़ |
बीकानेर, नागौर |
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• प्रतिशत के आधार पर न्यूनतम आबादी |
डूँगरपुर, बाँसवाडा |
नागौर, बीकानेर |
1. भील जनजाति:-
वन पुत्र (कर्नल जेम्स टॉड)
महाभारत में भीलों को निषाद कहा गया।
भील शब्द की उत्पत्ति - बील (द्रविड़ भाषा का शब्द) (अर्थ - जंगल में विचरण करने वाला)
राजस्थान की सबसे प्राचीन जनजाति है।
मीणा जनजाति के बाद राज्य की दूसरी सर्वाधिक आबादी वाली जनजाति है।
निवास क्षेत्र - बाँसवाडा (सर्वाधिक), डूँगरपुर, उदयपुर, प्रतापगढ़, सिरोही
कई घरों का मोहल्ला - फला
घर - टापरा/कू
बरामदा - ढ़ालिया
गाँव - पाल
गाँव/पाल का मुखिया - पालवी/तदवी
पंचायत का मुखिया - गमेती
भील पुरुषों के वस्त्र :
1) पोत्या - सफेद रंग का साफा
2) फेंटा - लाल/पीला/केसरिया साफा
3) लंगोटी/खोयतु - कमर पर पहना जाने वाला वस्त्र
4) ढे़पाडा - तंग धोती (घुटनों तक)
5) फालू - कमर पर रखे जाने वाला अंगोछा
भील महिलाओं के वस्त्र :
1) कछाबू - घुटनों तक पहना जाने वाला घाघरा
2) सिन्दूरी - लाल रंग की साड़ी
3) अंगरूढ़ी - विशेष चोली
4) पिरिया - पीले रंग का लहंगा
5) परिजनी - पीले रंगी की मोटी चूड़ियाँ जो पैरों में पहनी जाती है।
6) ताराभांत की ओढ़नी - लोकप्रिय ओढ़नी।
» सामाजिक जीवन :
• रोने –‘भीलों का मूल क्षेत्र मारवाड़’ को बताया।
• कर्नल जेम्स टॉड – ‘भीलों का मूल क्षेत्र अरावली पर्वत माला’ को बताया।
• हैडन – ‘भील पूर्वी द्रविड़ जाति की पश्चिमी शाखा है।'
भगत - भील जनजाति में धार्मिक संस्कार सम्पन्न करवाने वाला व्यक्ति
टोटम - भीलों का कुलदेवता
आमजा माता - भीलों की कूलदेवी
फायरे-फायरे - भीलों का रणघोष
गवरी या राई - भीलों का प्रमुख लोकनाट्य
झूमटी/दजिया - झूमिंग कृषि (मैदानी भागों को जलाकर) चिमाता - पहाड़ी भागों पर की जाने वाली झूमिंग कृषि
लोकगीत :-
1) हमसीढ़ो- महिला व पुरुषों का युगल गीत
2) सुंवटियो – केवल महिलाओं का गीत
प्रमुख नृत्य :
1) गवरी नृत्य
2) गैर नृत्य
3) युद्ध नृत्य
4) रमणी नृत्य
5) हाथीमना
6) द्विचक्री/द्विचक्की
7) घूमरा –
भीलों के मेले :
1) बेणेश्वर मेला - नवाटापरा (डूँगरपुर), माघ पूर्णिमा, इसे आदिवासियों का कुंभ' कहा जाता है।
2) मानगढ़ धाम मेला - मानगढ़ पहाडी (बाँसवाड़ा)
3) घोटिया अम्बा का मेला - घोटिया (बाँसवाड़ा)
ऊंदरिया पंथ - भील जनजाति में प्रचलित एक धार्मिक पंथ
पाखरिया भील (बहादुर भील) - कोई भील पुरुष किसी सैनिक के घोड़े को मार देता है तो उसे
पाखरिया भील कहा जाता है।
कांडी (अभद्र शब्द) - भीलों को कांडी कहने पर नाराज हो जाते हैं।
पाडा - प्रेम सूचक शब्द - इस शब्द को सुनने से भील प्रसन्न होते हैं। ,
2. मीणा जनजाति :
इसका गण चिह्न - मीन (मछली) मत्स्य
इस जनजाति का संबंध मत्स्य अवतार से है।
मीणाओं का उल्लेख "मीणा पुराण" तथा मत्स्य पुराण मिलता है।
हरबर्ट रिसले - इस जनजाति का संबंध द्रविड़ जाति से बताया।
यह देश की अति प्राचीन जनजाति है तथा राजस्थान में आबादी की दृष्टि से सबसे बड़ी जनजाति है।
आबादी - उदयपुर, जयपुर, प्रतापगढ़, सवाई माधोपुर, करौली, दौसा।
मीणा जनजाति स्वतन्त्रता के बाद अन्य सभी जनजातियों में सर्वाधिक सम्पन व शिक्षित हुई।
मीणा जनजाति के वर्ग :-..
1) जमींदार मीणा - कृषि, व पशुपालन का कार्य
2) चौकीदार मीणा - राजघरानों की चौकीदारी
कुलदेवता - बुझदेवता
कुलदेवी - जीणमाता - रैवासा (सीकर)
आराध्य देव - भूरिया बाबा (नाणा रेलवे स्टेशन-पाली)
» सामाजिक जीवन :
यह जनजाति सर्वाधिक शिक्षित हुई।
बाल-विवाह का प्रचलन
मोरना-मोरनी विवाह का प्रकार है।
नाता प्रथा इस जनजाति में प्रचलित है।
हुक्का पीना इनका प्रमुख शौक है।
प्रिय भोजन - राबड़ी, कांदे(प्याज) की सब्जी
मीणाओं के घर को - मेवासे कहा जाता है।
गाँव का मुखिया - पटेल
अनाज रखने की बड़ी-बड़ी कोठियों को - ओबरी
मीणाओं के पुरुष को भी "गोदने" का शौक है।
इस जनजाति में गोद प्रथा प्रचलित है।
मीणाओं के नृत्य - रसिया, नेजा नृत्य
3. कथौड़ी जनजाति :
इसका राज्य में सभी जनजातियों में सबसे कम शैक्षिक विकास हुआ है।
यह जनजाति मूलत: महाराष्ट्र की जनजाति है तथा यह जनजाति बन्दर का माँस तथा शराब का
सेवन करती है।
राजस्थान में कत्था तैयार करने के कारण यह कथौड़ी जनजाति कहलाई।
आबादी - उदयपुर, डूँगरपुर , बाराँ, झालावाड़।
सामाजिक जीवन :
यह जनजाति जंगलों में विचरण करती है अत: यह अस्थायी और घुमक्कड़ जीवन यापन करती है।
घर - खोलरा - जंगलों में काष्ठ तथा घास का बना होता है।
यह जनजाति दूध, घी, छाछ व दही का बिल्कुल प्रयोग नहीं करती है।
कथौड़ी जनजाति पूर्णत: जंगलों (प्रकृति) पर आश्रित है।
लोकनृत्य -
1) मावलिया नृत्य - नवरात्र में – केवल "पुरुषों के द्वारा।
2) होली नृत्य - होली - केवल महिलाओं के द्वारा किया जाने वाला नृत्य ।
इस जनजाति की महिलाएँ मराठी अंदाज में साड़ी पहनती है, जिसे फड़का कहा जाता है।
इस जनजाति में पुरुषों व महिलाओं को गोदना बनाने का शौक है।
इस जनजाति के लोग शव को दफनाते समय शव के मुँह में चावल और हाथ में पैसे रखते हैं।
वाद्ययंत्र इस जनजाति :
1) तालीसर वाद्ययंत्र - पीतल की थाली, देवी-देवताओं की स्तुति के समय, मृतक के अंतिम
संस्कार के समय प्रयोग
2) तारणी वाद्ययंत्र - लोकी के एक सिरे में छेद करके बनाया जाता है, महाराष्ट्र के तारपा वाद्ययंत्र
से मिलता जुलता है।
3) खोखरा/घोरिया वाद्ययंत्र
4) पावरी वाद्ययंत्र - यह मृत्यु के समय बजाया जाता है।
5) टापरा वाद्ययंत्र
कथौड़ी जनजाति के समाज के मुखिया को नायक कहा जाता है।
इसमें नाता प्रथा (तलाक), विधवा पुनर्विवाह तथा मृत्यु भोज आदि परम्परा मौजूद है।
प्रमुख देवता - डुँगरदेव, ग्रामदेव, वाघदेव
प्रमुख देवियाँ - भारी माता, कंसारी माता
4. डामोर जनजाति :
यह मूलत: गुजरात राज्य की रहने वाली जनजाति है।
इस जनजाति की संस्कृति व सभ्यता गुजरात से मिलती है।
यह जनजाति अपनी उत्पत्ति राजपूतों से मानती है।
आबादी - डूंगरपुर - सीमलवाड़ा तहसील प्रमुख क्षेत्र है।, बाँसवाडा, उदयपुर
सामाजिक
डामोर जनजाति के मुखिया - मुखी
परिवार – पूर्णत: एकाकी होता है अर्थात पुत्र का विवाह होने के तुरन्त बाद अलग कर दिया
जाता है।
भाषा - गुजराती
प्रमुख व्यवसाय - कृषि और पशुपालन
यह जनजाति मैदानों में निवास करती है।
इस जनजाति के पुरुष भी महिलाओं के समान गहने पहनते हैं।
गाँव की सबसे छोटी इकाई को फला कहा जाता है।
बहुविवाह प्रचलित है।
वधू मूल्य, तलाक प्रथा, नातरा प्रथा (विधवा पुनर्विवाह) प्रचलित है।
मेले -
1) छैला बावजी का मेला - पंचमहल (गुजरात) - लोकदेवता
2) ग्यारस की रवाडी - सीमलवाड़ा (डूँगरपुर)
चाडिया - डामोर जनजाति में होली के अवसर पर होने वाला कार्यक्रम।
5. सांसी जाति :
भरतपुर (सर्वाधिक) जोधपुर, हनुमानगढ़, श्रीगंगानगर व नागौर में निवास करती है।
इसे जनजातियों में सम्मिलित नहीं किया गया।
सांसी जाति की उत्पत्ति - सांसमल शब्द से मानी जाती है।
यह जाति अनुसूचित जाति (SC) समूह में सम्मलित है।
कूकड़ी की रस्म- युवती के विवाह के उपरान्त उसके चरित्र की परीक्षा ली जाती है।
इस जाति में विवाह का निपटारा हरिजन व्यक्ति द्वारा किया जाता है।
सांसी जाति के वर्ग- बीजा और माला
इस जाति का कोई व्यवसाय नहीं है।
नारियल के गोले से इस जाति में सगाई की रस्म पूरी मानी जाती है।
बहु विवाह प्रचलित है लेकिन विधवा विवाह प्रचलित नहीं है।
संरक्षक देवता - भाखर बावजी
इस जाति के लोग पेड़-पौधों तथा वृक्षों को पवित्र मानते हैं।
6. सहरिया जनजाति :
बाराँ (97%) - किशनगंज, कोटा, झालावाड़ में निवास।
यह अत्यधिक पिछड़ी होने के कारण राजस्थान की एकमात्र जनजाति।
जनजाति जिसे भारत सरकार ने "आदिम समूह जनजाति" में शामिल किया है।
• सहरिया शब्द की उत्पत्ति - फारसी भाषा के सहर शब्द से हुई जिसका अर्थ "जंगल में विचरण करना"
यह जनजाति एक वनवासी जनजाति है।
प्रिय लोकदवता-तेजाजी
कुलदेवी - कोडिया देवी
धारी संस्कार - यह जनजाति में प्रचलित मृतक के तीसरे दिन शमशान से मृतक की फूलों (हड्डियों) को आँगन में रखकर ढक देते हैं और दूसरे दिन प्रात: काल अस्थियों से निर्मित चिह्न को देखकर कपिलधारा (सीताबाड़ी-बाराँ) में विसर्जित करते हैं।
मेले-
1) सीताबाड़ी का मेला - सीताबाड़ी (बाराँ) - ज्येष्ठ अमावस्या।
2) कपिल धारा का मेला - सीताबाड़ी (बाराँ) कार्तिक पूर्णिमा
प्रमुख लोकनृत्य - शिकारी, इन्द्रपरी, लहंगा, झैला नृत्य
» सामाजिक जीवन :-
महिला और पुरुष एकसाथ कभी नृत्य नहीं करते।
इस जनजाति में भीख मांगना वर्जित है।
इस जनजाति में मृतक श्राद्ध नहीं किया जाता है।
नवरात्रों में इस जनजाति के लोग माँ दुर्गा व माँ काली की विशेष पूजा करते हैं।
सहरिया लोगों की बस्ती - सहराना
गाँव - सहरोल
झोपड़ी - हथाई या बंगला
दहेज प्रथा प्रचलित नहीं है।
सहरिया जनजाति में विधवा विवाह व नाता प्रथा प्रचलित है।
इस समुदाय में बच्चों का मुंडन करने का रीति-रिवाज है।
सहरिया समाज की सबसे बडी संस्था - पंचायत
पंचायत की बैठक - वाल्मिकि मंदिर (सीताबाडी-बाराँ)
पंचायत का मुखिया - कोतवाल
इस जनजाति में पर्दा प्रथा केवल घर में प्रचलित है।
इस समुदाय में विवाह हिन्दू रीति-रिवाज के अनुसार लेकिन फेरों में अन्तर (6 फेरे वधू, 1 फेरा वर) होता है।
माता - पिता की सम्पत्ति पर लड़की का अधिकार नहीं होता।
लट्ठमार होली भी प्रचलित है।
इस समुदाय में सबसे कम साक्षरता दर है।
7. कंजर जाति :
अनुसूचित जाति (SC) वर्ग में शामिल है।
कंजर शब्द की उत्पत्ति - संस्कृत भाषा के "काननचर" शब्द से हुई जिसका अर्थ "जंगल में
विचरण करने वाला होता है"
आबादी (53818) - भीलवाड़ा, चित्तौड़गढ़, अजमेर, सवाई माधोपुर
यह जाति घुमक्कड जीवन जीते हैं।
कुलदेवी - जोगणिया माता (भीलवाड़ा)
आराध्य देवी - चौथमाता व रक्तदंजी माता (सवाई माधोपुर)
आराध्य देव - हनुमान जी।
इस जाति का मुखिया - पटेल
पाती मांगना - इस जाति के लोग चोरी करने से पूर्व देवी-देवताओं से आशीर्वाद लेते हैं।
हाकमराजा का प्याला - यह प्याला पीकर इस जाति के लोग झूठ नहीं बोलते।
नृत्य - धाकड़ नृत्य, लाडी नृत्य, चकरी नृत्य।
वाद्ययंत्र - ढोलक, मंजीरा।
सूसनी वस्त्र - कंजर जाति की महिलाओं द्वारा कमर पर पहना जाने वाला वस्त्र।
इस जाति में मृतक के मुँह में शराब की बूँदे डाली जाती है।
8. कालबेलिया जाति :
अनुसूचित जनजाति (ST) में शामिल है।
उपनाम - सपेरा
पुंगी- कालबेलिया समाज का खानदानी वाद्ययंत्र है।
सर्वाधिक आबादी - पाली, उदयपुर, भीलवाडा, चित्तौड़गढ़
नृत्य - बागड़िया नृत्य, पणिहारी नृत्य, कालबेलिया नृत्य, शंकरिया नृत्य, इंडोणी नृत्य
9. गरासिया जनजाति :
सिरोही, उदयपुर, पाली (बाली)
कर्नल जेम्स टॉड - गरासिया शब्द की उत्पत्ति "गवास" शब्द से हुई जिसका अर्थ सर्वेन्ट/नौकर होता है।
राज्य की आबादी की दृष्टि से तीसरी सबसे बड़ी जनजाति।
इस जनजाति पर गुजराती, राजस्थानी और मराठी इन तीनों संस्कृतियों एवं सभ्यता का प्रभाव है।
सिरोही जिले का भाखर क्षेत्र इस जनजाति का मूल प्रदेश है।
» सामाजिक जीवन
नक्की झील (आबू)- इस समुदाय के लोग सबसे पवित्र मानते है तथा इसी में अपने पूर्वजों की अस्थियों का विसर्जन करते हैं। इसे गरासियों की गंगा भी कहा जाता है।
घरों को घेर कहा जाता है।
इस समुदाय में गाँव की सबसे छोटी इकाई - फालिया
पंचायत का मुखिया - सहरोल
लोकनृत्य - गोल नृत्य, माँदल नृत्य, ज्वारा, राय, लूर नृत्य, मोरिया नृत्य, वालर, कूद, दोह नृत्य
वाद्ययंत्र - बाँसुरी, नगाड़ा, अलगोजा
मोर पक्षी को इस समुदाय के लोग अपना आदर्श पक्षी मानते हैं।
प्रमुख व्यवसाय - कृषि एवं पशुपालन
भील गरासिया - गरासिया पुरुष + भील स्त्री का विवाह
गमेती गरासिया - भील पुरुष + गरासिया स्त्री का विवाह
इस समुदाय में 3 वर्ग होते हैं।
1) मोटी नियात-उच्च वर्ग के लोग - बाबोर हाईया
2) नेनकी नियात - मध्यम वर्ग के लोग - माँडरिया
3) निचली नियात - निम्न वर्ग के लोग
इस समुदाय में त्योहारों का आरम्भ आखातीज से माना जाता है।
प्रिय त्योहार - होली, गणगौर
यह जनजाति एकांकी परिवार में विभक्त होती है।
इस समुदाय में मृतक का अंतिम संस्कार मृत्यु के 12वें दिन किया जाता है।
इस समुदाय में प्रेम विवाह का सर्वाधिक प्रचलित है।
कांधिया/मेक - मृत्यु भोज
घेण्टी - घरों में हाथ से प्रयुक्त चक्की
हलेरू - इस समुदाय की सामाजिक संस्था
हुरे - मृतक की याद में बनाए जाने वाला स्मारक
मानखारो रो मेला - भाखर क्षेत्र (सिरोही) - गरासिया समुदाय का सबसे बड़ा मेला।