पृथ्वी एवं भूवैज्ञानिक समय-सारणी

(Earth and its Geological time scale)

पृथ्वी के भूगर्भिक इतिहास से संबंधित प्रमुख तथ्य-

1.  आद्य कल्प (Azoic or Archean Era) – इसे आर्कियन व प्री-कैम्ब्रियन दो भागों में बाँटा गया है।

2.  पुराजीवी महाकल्प (Palaeozoic Era) – कैम्ब्रियन काल में प्रथम बार स्थल भागों पर समुद्रों का अतिक्रमण हुआ। प्राचीनतम अवसादी शैलों का निर्माण कैम्ब्रियन काल में ही हुआ था। भारत में विंध्याचल पर्वतमाला का निर्माण इसी काल में हुआ था। पृथ्वी पर इसी काल में सर्वप्रथम वनस्पति तथा जीवों की उत्पत्ति हुई। ये जीव बिना रीढ़ की हड्डी वाले थे। इसी समय समुद्रों में घासों की उत्पत्ति हुई।

3.  मध्यजीवी महाकल्प (Mesozoic Era) – इसे टि्यासिक, जुरैसिक व क्रिटेशियस कालों में बाँटा गया है।

4.  नवजीवी महाकल्प - इसे पैल्योसीन, इओसिन, ओलीगोसनी, मायोसीन व प्लायोसीन कालों में बाँटा गया है। इस कल्प को टर्शियरी युग भी कहा जाता है। इसी कल्प के विभिन्न कालों में टर्शियरी युग भी कहा जाता है। इसी कल्प के विभिन्न कालों में अल्पाइन पर्वतीकरण हुए एवं विश्व के सभी नवीन मोड़दार पर्वतों आल्प्स, हिमालय, रॉकी, एंडीज आदि की उत्पत्ति हुई।

5.  नूतन महाकल्प (Neozoic Era) – इसे प्लीस्टोसीन व होलोसीन दो कालों में बाँटा गया है।

(i)  प्लीस्टोसीन काल में यूरोप में चार हिमयुग देखे गए। ये ये - गुंज (Gunz), मिन्डेल (Mindel) रिस (Riss) तथा वुर्म (Wurm)। विभिन्न हिमकालों के बीच में अंतर्हिम काल (Inter Glacial age) देखे गए जो तुलनात्मक रूप से उष्णकाल था। मिन्डेल व रिस के बीच का अंतर्हिम काल सर्वाधिक लम्बी अवधि का था। उत्तरी अमेरिका में इस समय नेब्रास्कन, कन्सान, इलीनोइन व विस्कासिन हिमकाल देखे गए। नेब्रास्कन व कन्सान के बीच अफ्टोनियम, कन्सान व इलीनोइन के बीच यारमाउथ, इलीनोइन व विंस्कासिन के बीच संगमन अंतर्हिम काल था। इस युग के अंत में हिम चादर पिघलते चले गए एव स्कैंडिनोवियन क्षेत्र की ऊँचाई में निरंतर वृद्धि हुई। पृथ्वी पर उड़ने वाले पक्षियों का आविर्भाव प्लीस्टोसीन काल में ही माना जाता है। मानव तथा अन्य स्तनपायी जीव वर्तमान स्वरूप में इसी काल में विकसित हुए।

 

भौतिक भू-आकृतियाँ : पर्वत, पठार, मैदान, झीलें एवं हिमनद

(Broad Physical Feature : Mountains, Plateaus, Plains, Lakes and Glaciers)

वेगनर की परिकल्पना (Continental Drift) –

(i)     संपूर्ण महाद्वीप एक अखण्डित, विशाल एवं वृहत महाद्वीप के रूप में 300 मिलियन वर्ष पूर्व कार्बोनिफेरस युग में अस्तित्व रखता था जिसे पेंजिया कहते थे।

(ii)    यह पेंजिया दक्षिणी ध्रुव के पास अवस्थित था।

(iii)   पेंजिया के चारों तरफ एक महासागर अवस्थित था जिसका नाम पेंथालसा था।

(iv)   पेंजिया दो भाग में विभाजित था उत्तरी भाग को अंगारालैण्ड एवं दक्षिणी भाग को गौण्डवानालैण्ड कहा जाता था।

(v)    इन दोनों महाद्वीप खण्डों के मध्य विभाजक रेखा के रूप में टेथिस सागर अवस्थित था।

सिद्धान्त की मूलभूत अवधारणाएँ -

1.   पृथ्वी के अंदर अनेक स्तर है एवं सबसे ऊपरी भाग सियाल से निर्मित है जो कि महाद्वीपों का प्रतिरूप है।

2.   सियाल के नीचे सीमा स्तर है जो कि अधिक घनत्व वाला है एवं सागरीय भू-पर्पटी का प्रतिरूप/समतुल्य है।

3.   सियाल, सीमा के ऊपर फिसल रहा है अर्थात् महाद्वीप के भाग सागर के नितल के ऊपर फिसल कर विस्थापित हो रहे हैं।

4.   यह विस्थापन दो दिशाओं में है- उत्तर की ओर एवं पश्चिम की ओर।

वेगनर द्वारा प्रस्तुत किये गए साक्ष्य -

1.   Jig Sam Fit / Juxtoposition/ साम्यस्थापन - वेगनर ने अंटलाण्टिक के पूर्व एवं पश्चिमी तट में मानचित्र द्वारा अद्धत समानांतरता को दर्शाया एवं अफ्रीका, यूरोप को अमेरिका के महाद्वीप में परस्पर जोड़कर एक ही महाद्वीप होने के साक्ष्य को प्रस्तुत किया।

2.   चट्टानों की संरचना एवं काल पर आधारित साक्ष्य - ब्राजील के उभार क्षेत्र में 570 मिलियन वर्ष पूर्व की चट्टान व्याप्त है अगर यह अफ्रिका के गिनी की खाड़ी में विलय हुआ है तो वहाँ भी इसी काल एवं संरचना की चट्‌टाने पाई जानी चाहिए। वास्तविक में इसे एक सच साक्ष्य पाया गया।

      प्लेसर (अवसादी) निक्षेप के रूप में पाए जाने वाले स्वर्ण कण गिनी के तट पर भी बिल्कुल समानांतर अवस्था में पाए गए।

3.   जीवाश्म संबंधी साक्ष्य - प्रागैतिहासिक काल में पाए जाने वाले "Ferm" मुख्य रूप से ‘ग्लोसोपोटेरिस’ के जीवाश्म गौंडवानालैण्ड के सभी भू-खण्डों पर पाए गए।

      इसके अतिरिक्त ‘मैसोसौरस’ जैव अवस्थाएँ उनके जीवाश्म भी दक्षिण अमेरिका, अफ्रीका एवं ऑस्ट्रेलिया पर पाए गए।

      इस प्रमाण में वेगनर ने अन्य कई जीवाश्मों के वितरण को दर्शाया है जो यह सिद्ध करता है कि कम से कम गौण्डवानालैण्ड के सभी टुकड़े एक ही महाद्वीप के रूप में थे।

4.   पुरा जलवायविक साक्ष्य - वेगनर ने यह दर्शाया कि वर्तमान के कोयला क्षेत्र समशीतोष्ण भाग में करीब 500 अक्षांश के पास अवस्थित है जबकि दूसरी ओर भूमध्य रेखा के पास हिम नदियों द्वारा निक्षेपित अवसादी जमाव के स्तर पाए जाते हैं यह एक विकट प्रश्न था समशीतोष्ण जलवायु क्षेत्र में कोयला उत्पन्न नहीं हो सकता भूमध्य रेखा क्षेत्र पर हिम नदियाँ नहीं पाई जाती। वर्तमान की यह अवस्थिति तभी विश्लेषित हो सकती है जब महाद्वीपों को जोड़कर उन्हें व्रतों के पास खिसका दिया जाए ऐसी स्थिति में वर्तमान का 50 अक्षांश, लगभग भू-मध्य रेखा के पास एवं वर्तमान के भूमध्य रेखा क्षेत्र दक्षिणी ध्रुव के आसपास खिसक जाएंगे जिससे यह सिद्ध होता है कि महाद्वीप उत्तर की ओर स्थित हुए हैं।

5.   अन्य प्रमाणों में वेगनर ने पर्वत श्रेणियों के विस्तार को आधार बनाया गया, एपलेशिया पर्वत, अमेरिका के उत्तर पूर्वी तट से अचानक विलुप्त होकर स्कैण्डोनेवियन पर्वत के रूप में नार्वे में पाया जाता है जो कि महाद्वीपीय विस्थापन का एक साक्ष्य है।

प्लेट विवर्तनिक का सिद्धान्त

(Plate Tectonics)

(i)    वर्ष 1965 में Tuzo Wilson ने प्लेट संबंधी परिकल्पना की। प्लेट स्थलमण्डल के वो टुकड़े हैं जो कि चारों तरफ गतिमान सीमाओं से घिरे हुए हैं ये अत्यंत ही कठोर एवं सुदृढ़ संरचना वाले हैं एवं 100 Km. की गहराई क्षेत्र तक विस्तृत है।

(ii)   वर्ष 1968 में Morgoh महोदय ने वैश्विक प्लेट विवर्तनिक सिद्धान्त को जन्म दिया। यह सिद्धान्त पूर्व के स्थापित अन्य सिद्धान्त जैसे- महाद्वीपीय विस्थापन, पुरा चुम्बकत्व, चुम्बकीय व्युत्क्रम इत्यादि पर आधारित है।

(iii)  प्लेट से तात्पर्य, स्थलमण्डल के कठोर एवं सुदृढ़ टुकड़ों से है जो आपस में सापेक्षिक रूप में परस्पर गतिमान है। विवर्तनिक से तात्पर्य उन शक्तियों से है जो प्लेटों को गतिमान बनाती है अतः प्लेट विवर्तनिक सिद्धान्त प्लेटों के पारस्परिक गति एवं उनके अंतर्सम्बन्ध तथा अन्तर्सम्बन्ध से जनित उत्पादों की व्याख्या करता है।

प्लेट विवर्तनिक सिद्धान्त के दो प्रमुख विभाग हैं -

(i)   ज्यामितिय भाग     (ii) गतिय भाग

(i)  ज्यामितिय भाग - इस भाग में प्लेटों की आकारिकी उनके परस्पर गति, प्लेटों की संख्या एवं प्लेटों के प्रकार का वर्णन है। प्लेट को तीन प्रकार का बतलाया गया है-

(A) वृहद् प्लेट (B) लघु प्लेट (C) उप प्लेट।

(A) वृहद् प्लेट - ये प्लेट अत्यंत ही विशाल आकृति के पाए जाते हैं एवं ये प्लेट या पूर्ण सागरीय अथवा महाद्वीपीय अथवा महाद्वीपों एवं महासागरों दोनों से निर्मित हो सकते हैं।

सात वृहद् प्लेटों की परिकल्पना की गई है -

1.   प्रशांत व सागरीय प्लेट - यह प्लेट पूर्णतया सागरीय नितल से निर्मित है एवं यह प्लेट WWN दिशा में 2.5 Cm. प्रतिवर्ष की गति से गमन कर रही है यह पूर्ण सागरीय प्लेट है।

2.   यूरेशिया की प्लेट - यह सागर एवं महाद्वीप क्षेत्रों से निर्मित है। यूरेशिया के भूखण्ड एवं उत्तरी अटलांटिक सागर के तल से निर्मित है तथा NE दिशा में गमन कर रही है। यह 1 Cm. प्रतिवर्ष गति कर रही है।

3.   अफ्रीकन प्लेट - इसके मध्य में महाद्वीपीय खण्ड एवं चारों तरफ सागरीय प्लेट से घिरा है व NNE में 2 Cm. प्रतिवर्ष गति कर रही है।

4.   अंटार्कटिका प्लेट - मुख्य रूप से महाद्वीप परन्तु चारों तरफ से सागरीय भाग से घिरा हुआ। यह प्लेट लगभग स्थैतिक है तथा ऊपर की ओर उत्प्लावित होकर उठ रही है।

5.   इण्डो-ऑस्ट्रल प्लेट - यह प्लेट दो भागों में विभक्त पाया जा रहा है सैटेलाइट सर्वेक्षण में नासा ने यह पाया है कि वस्तुतः यह दो प्लेट है। भारतीय प्लेट उत्तर में प्रायद्वीपीय भारत के महाद्वीप से युक्त तथा दक्षिण में सागर के नितल से युक्त है यह उत्तर की ओर लगभग 3 Cm. प्रतिवर्ष की गति से गमन कर रही है।

ऑस्ट्रेलिया की प्लेट के मध्य में ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप का केन्द्रीय क्षेत्र है जबकि चारों तरफ सागर के नितल से व्याप्त है यह प्लेट NNE दिशा में 2.5 Cm. प्रतिवर्ष गति से अग्रसर हो रहा है।

6.   उत्तरी अमेरिकन प्लेट - यह प्लेट उत्तरी अमेरिका एवं मैक्सिको तथा उत्तर-पश्चिमी अटलांटिक सागर के नितल से निर्मित है यह पश्चिम दिशा में करीब 2 से 3 Cm. की गति से अग्रसर है।

7.   दक्षिण अमेरिका प्लेट - दक्षिण अमेरिका के महाद्वीपीय भाग एवं दक्षिण-पश्चिम अटलांटिक सागर के नितल से निर्मित है। यह पश्चिम दिशा की ओर 3 Cm. प्रतिवर्ष की गति से अग्रसर है।

(B) लघु प्लेट -

1. अरेबियन प्लेट

2. फीलीपींस प्लेट

3. केरेलाइन प्लेट

4. जुआन डी फूका प्लेट

5. केकोस (Cosos) प्लेट

6. नाजका (Nazca) प्लेट

7. कैरेबियन प्लेट

8. सोमालियन प्लेट

(ii) गतिक भाग - गतिक भाग में प्लेटों के पारस्परिक गतियों एवं गतियों के कारण उत्पन्न विभिन्न दशाओं का अध्ययन करते हैं। तीन प्रकार के प्लेट अन्तर्सम्बन्धों की परिकल्पना की गई है एवं इन तीन प्रकार के अंतर्सम्बन्धों के आधार पर तीन प्रकार की सीमाएँ सुनिश्चित की गई है। प्रथम अन्तर्सम्बन्ध (i) अपसारी- जहाँ दो प्लेट एक-दूसरे के अपेक्षा विपरीत दिशा में गमन करते हैं इस प्रकार के गमन से संरचनात्मक सीमा का निर्माण होता है। (ii) अभिसारी - इसमें दो प्लेट एक ही बिन्दु की ओर अग्रसर होते हैं एवं टकराते हैं। इस प्रकार की गति से विनाशकारी सीमा का निर्माण होता है (iii) समानांतर - इस गति में तथा इस तरह के अंतर्सम्बन्ध में दो प्लेटें एक-दूसरे के समानांतर फिसलती है या गति करती है। इस तरह के अन्तर्सम्बन्ध में संरक्षात्मक सीमा का निर्माण होता है।

तीन प्रकार की सीमाएँ -

1. विनाशात्मक

2. संरचनात्मक

3. संरक्षात्मक

प्लेट की सीमाएँ, अन्तर्सम्बन्ध एवं उत्पाद्य या परिणाम -

इस सिद्धान्त में शक्तियों के सम्बन्ध में स्पष्ट विचार नहीं है। परन्तु तीन प्रकार के शक्तियों का मिश्रित प्रभाव माना गया है -

(i)   संवहनीय धाराएँ - भूतापीय ऊर्जा के उर्ध्वमुखी प्रवाह के कारण धाराएँ स्थलमण्डल के पास पहुँचती है परन्तु ऊँचाई के साथ क्रमशः ठण्डी होने के कारण एवं भू-चालक पदार्थों में निरन्तर वृद्धि होने के कारण ये निम्नाभिमुख हो जाती है। जहां पर ये धाराएं विस्थापित हो रही हैं वहाँ प्लेटों में अपसारी किनारों का निर्माण हो रहा है और जहाँ ये धाराएँ निम्नाभिमुख हैं वहां प्लेट अभिसारी किनारों का निर्माण कर रही है।

(ii)  Push-Pull Model – जहाँ पर प्लेट विस्थापित हो रहे हैं वहाँ पर उठती हुई मैग्मा Push का कार्य करती है जबकि जहाँ प्लेट धंस रही हैं वहाँ खिंचाव की स्थिति है।

l.    विनाशात्मक सीमाएँ - प्लेटों के विनाशात्मक सीमाओं के पास दो प्लेट आपस में टकराते हैं अधिक भार अथवा घनत्व वाला प्लेट नीचे धंस जाता है जबकि हल्का एवं कम घनत्व वाला प्लेट ऊपर की ओर उत्प्लावित हो जाता है।

इस सीमा के पास तीन प्रकार के प्लेटों के अंतर्सम्बन्ध पाए जाते हैं -

(A)  सागरीय-सागरीय प्लेट अन्तर्सम्बन्ध - अधिक घनत्व वाला सागरीय प्लेट नीचे धंस जाता है। धंसते हुए सागरीय तल पर अवसाद एवं उच्चावच, घसाव क्षेत्र में निर्मित गर्त में संवलित होकर ऊपर की ओर द्वितीय चाप का निर्माण करता है।

उदाहरण - जापान का होंशू द्वीप। टकराने के स्थान पर गर्त का निर्माण भी देखा जाता है।

(B)  सागरीय एवं महाद्वीपीय प्लेटों के अन्तर्सम्बन्ध - चूँकि महाद्वीपीय भाग कम होने के कारण उत्प्लावित हो जाते हैं जबकि सागरीय प्लेट धंस जाता है। इस प्रक्रिया में भी समुद्री निक्षेप एवं महाद्वीपीय विक्षेप दोनों का संवलन होकर पर्वत निर्माण होते हैं जिन्हें Cordidlera कहते हैं।

उदाहरण-रॉकीज एवं एण्डीज।

(C)  महादेशीय-महादेशीय प्लेटों के मध्य अन्तर्सम्बन्ध - वस्तुतः ये सागरीय किनारों के पूर्ण अवतलन के बाद की स्थिति है। जहाँ भी विक्षेपों के संवलन से पर्वतों का निर्माण होता है। जिसे हिमालयन समतुल्य अथवा अल्पाइन समतुल्य पर्वत कहते हैं।

2.   रचनात्मक - रचनात्मक सीमा पर दो प्लेट अलग विस्थापित होने से मैग्मा बाहर निकलकर कटकों का निर्माण करती हैं। जिसके मध्य में भ्रंश घाटियों का तनावमूलक शक्तियों के कारण निर्माण होता है। मैग्मा का उत्सर्जन तीन कारण से होता है- (i) प्लेटों के भार हटने के कारण (ii) गर्म अवस्था में सिलिका अत्यन्त गतिशील होने से अतः इसमें ऊपर आने की प्रवृत्ति है (iii) उत्प्लावन बल।

3.   संरक्षात्मक किनारा - इन किनारों के पास दो प्लेट समानांतर गति करते हैं जिससे न तो विनाश है और न ही रचना। परन्तु फिसलन के कारण भूकंपीय दशाओं को जन्म देती है। उत्तरी अमेरिका के पश्चिमी तट पर ‘जुआन डी फुका प्लेट’ के पास की सीमा इसका उदाहरण हैं जहाँ SAN Andreas Fault अवस्थित है।

पर्वत (Mountain)

पठार (Plateu)

पठार की सामान्य विशेषताएँ -

पठारों का निर्माण तथा विकास

     1.   यदि आसपास की जमीन का अवसंवलन (downwarping) हो जाए तो अवशेष स्थल भाग एक पठार का रूप धारण कर सकता है।

     2.   उत्संवलन (upwarping) की क्रिया के कारण जब किसी विस्तृत स्थलखण्ड का कुछ भाग समीपी सतह से ऊँचा उठ जाता है तो पठार का निर्माण होता है।

     3.   मैदानी भागों या निचले भागों में लावा प्रवाह के कारण प्राप्त लावा के अत्यधिक जमाव के कारण वह स्थलखण्ड समीपी सतह से ऊँचा उठ जाता है तथा पठार का रूप धारण कर लेता है। संयुक्त राज्य अमेरिका का कोलम्बिया का पठार निश्चय ही लावा निर्मित पठार का एक उदाहरण है।

     4.   पर्वतों के निर्माण के समय पर्वतों के साथ कुछ समीपी भाग अधिक ऊपर न उठ पाने के कारण पठार का रूप धारण कर लेते हैं। अप्लेशियन पर्वत के पूर्व में पीडमाण्ट पठार को इसका उदाहरण बताया जा सकता है।

     5.   पर्वत निर्माण के समय भूसन्नति के दोनों किनारों पर वलन पड़ने तथा बीच वाले मध्य देश के अप्रभावित रह जाने से तथा उसमें कुछ उत्थान हो जाने से पठार का निर्माण होता है। तिब्बत का पठार इसका उदाहरण बताया जा सकता है।

     6.   अनाच्छादन (denudation) के कारण उच्च पर्वतीय भाग कटकर नीचे हो जाते हैं। ये निचले भाग जो कि अब भी आसपास की सतह से ऊँचे होते हैं, ‘पठार’ कहे जाते हैं।

     7.   पवन द्वारा मिट्टियों के निक्षेपण से भी पठारों का निर्माण हो जाता है। पवन अपने साथ अधिक मात्रा में मिट्टियाँ उड़ाकर लाती है तथा उन्हें निम्न भाग में जमा करते-करते उस भाग को समीपी सतह से ऊँचा उठा देती है, जिससे पठार का निर्माण होता है। चीन में इस तरह का लोयस का पठार मिलता है।

पठारों का वर्गीकरण -

     1.   निर्माण की प्रक्रिया के अनुसार

(क)  सामान्य पठार

(1)  बहिर्जात शक्तियों या कारकों द्वारा निर्मित पठार

(i)  हिमानीकृत पठार-गढ़वाल का पठार

(ii) पवन द्वारा निर्मित पठार-पोटावर का पठार

(iii)  जल द्वारा निर्मित पठार-विन्ध्य पठार,चेरापूँजी का पठार

(2)  अन्तर्जात बल द्वारा उत्पन्न पठार

(ख) पटलविरूपणी पठार (diastrophic plateau)

(iv) अन्तरापर्वतीय पठार (intermontane plateau)

(v) गिरिपद पठार (piedmont plateau)

(vi) गुम्बदीय पठार (dome plateau)

(ग)  आकस्मिक अन्तर्जात बल द्वारा निर्मित पठार

(vii) ज्वालामुखी पठार

(अ) लावा पठार

(1)  अन्तर्वेधी पठार (instrusive plateau)

(2)  बहिर्वेधी पठार (extrusive plateau)

(ब)  केन्द्रीय उद्गार द्वारा निर्मित पठार

(घ)  मिश्रित पठार (compound plateau)

2.   भौगोलिक स्थिति के अनुसार वर्गीकरण

(i)   अन्तरापर्वतीय पठार

(ii)  गिरिपद पठार

(iii) महाद्वीपीय पठार

(iv) तटीय पठार

(अ) बहिर्जात बल (अपरदन के कारक) द्वारा निर्मित पठार - अपरदन के कारकों में हिमानी, पवन तथा बहते हुए जल (नदी) द्वारा पठारों का निर्माण होता है। इस तरह के पठार साधारण तथा कम महत्त्वपूर्ण होते हैं -

1.   हिमानी पठार (glacial plateau)

विस्तृत हिमानी पर्वतीय भागों को अपने अपरदन कार्य द्वारा घिसकर सपाट पठार का निर्माण करते हैं। अण्टार्कटिका तथा ग्रीनलैण्ड में हिमानियों ने अपरदन द्वारा अनेक विस्तृत पठारों का निर्माण किया है। भारत के गढ़वाल पठार का निर्माण हिमानी द्वारा अपरदन के कारण ही हुआ है। निम्न स्थानों पर हिमानी अपने हिमोढ़ के निक्षेप द्वारा स्थलखण्ड को ऊँचा करके छोटे पठारों का निर्माण करता है।

2.   जलकृत पठार (fluvial plateau)

नदियों द्वारा तलछट के निक्षेप द्वारा स्थलखण्ड ऊँचा होता रहता है। तलछटीय जमाव के कारण अधिक भाग तलछट शैल में परिवर्तित होते रहते हैं। भू हलचल के कारण ये भाग समीपी सतह में ऊँचे उठ जाते हैं तथा पठार का निर्माण हो जाता है। भारत के विन्ध्य पठार, चेरापूँजी पठार तथा बर्मा (म्यांमार) के शान पठार इसी तरह निर्मित पठार के उदाहरण हैं।

3.   पवनकृत पठार

पवन अपने साथ मिट्टी के बारीक कण उड़ाकर लाती है तथा उनको सुनिश्चित स्थान पर निक्षेप कर देती है। इस तरह लम्बे समय तक निक्षेप के कारण मिट्टियाँ शैल में बदल जाती हैं और पठार का निर्माण हो जाता है। पाकिस्तान का पोटवार का पठार तथा चीन का लोयस का पठार इसके प्रमुख उदाहरण हैं।

(ब) पटलविरूपणी पठार (diastrophic plateau) - प्रायः विश्व के सर्वोच्च तथा अत्यधिक विस्तृत पठारों का निर्माण पटलविरूपणकारी बल के कारण लम्बवत् तथा क्षैतिज संचलन द्वारा हुआ है। भूपटल में उत्थान के कारण उच्च पठारों का निर्माण होता है। स्थिति के विचार से पटलविरूपणी पठार पाँच तरह के होते हैं- अन्तरापर्वतीय पठार, पीडमाण्ट या गिरिपद पठार, महाद्वीपीय पठार तथा गुम्बदाकार पठार।

1.  अन्तरापर्वतीय पठार (intermontane plateau) - वास्तव में भूपटल के सर्वोच्च, सर्वाधिक विस्तृत तथा अत्यधिक जटिल पठार इस श्रेणी में आते हैं। चारों तरफ से पर्वतों से घिरे होने के कारण इन पठारों को ‘अन्तरापर्वतीय पठार’ कहा जाता है। अन्तरापर्वतीय पठारों का निर्माण अन्तर्जात बल द्वारा वलित पर्वतों के निर्माण के साथ होता है। भूसन्नति के किनारों पर पर्वत श्रेणियों के निर्माण के साथ बीच वाले मध्यपिण्ड (median mass) के ऊपर उठ जाने से अन्तरापर्वतीय पठारों का निर्माण होता है। तिब्बत का पठार इसका सर्वोत्तम उदाहरण है। बोलिविया तथा पीरू के पठार, कोलम्बिया का पठार, मैक्सिको का पठार, इसके अन्य प्रमुख उदाहरण हैं। तिब्बत का पठार विश्व में सबसे ऊँचा पठार है जो कि सागर तल से औसत रूप में 16,000 फीट ऊँचा है। पठार का कुछ भाग 18,000 फीट तक भी ऊँचा है। क्षेत्रीय विस्तार की दृष्टि से भी (क्षेत्रफल 7,00,000 से 8,00,000 वर्गमील) तिब्बत का पठार विश्व का सबसे बड़ा पठार है।

2.  गिरिपद पठार (piedmont plateau) - पर्वतों के आधार पर स्थित पठारों को ‘गिरिपद पठार’ कहा जाता है। ये पठार एक ओर से उच्च पर्वतों से घिरे होते हैं तथा दूसरी ओर से सागर या मैदान से घिरे होते हैं। पठार का मैदान की ओर वाला ढाल तीव्र तथा खड़ा होता है, जो कि एस्कार्पमेण्ट की रचना करता है। इनका निर्माण भी उत्थान के कारण उन्हीं पर्वतों के साथ होता है, जिनके साथ ये पठार मिलते हैं।

संयुक्त राज्य अमेरिका के पीडमाण्ट पठार तथा दक्षिणी अमेरिका के पैटागोनिया के पठार गिरिपद पठार के सर्वोत्तम उदाहरण हैं।

3.  गुम्बदाकार पठार - वलन की क्रिया द्वारा जब स्थलखण्ड में इस तरह का उत्थान हो जाता है कि बीच का भाग ऊँचा होता है तथा किनारे वाले भाग गोलाकार होते हैं, तो उसे ‘गुम्बदाकार पठार’ कहा जाता है। गुम्बदाकार पठार तथा पर्वत में अन्तर यह होता है कि प्रथम अधिक विस्तृत, परन्तु कम ऊँचा होता है। ज्वालामुखी उद्गार के समय भी भूपटल में विस्तृत उभार के कारण गुम्बदाकार पठारों का निर्माण हो सकता है। भारत के छोटानागपुर के पठार को गुम्बदाकार पठार का उदाहरण बताया जा सकता है। संयुक्त राज्य अमेरिका का ओजार्क पठार इस तरह के पठार का सर्वोत्तम उदाहरण है।

4.  महाद्वीपीय पठार - जैसा कि नाम से ही विदित है, महाद्वीपीय पठार अत्यधिक विस्तृत पठारों के उदाहरण होते हैं, जो कि प्रायः पर्वतीय भागों से दूर किन्तु सागरीय तटों या मैदानों से घिरे होते हैं। कभी-कभी इनकी एकाध सीमा पर्वतों द्वारा निर्धारित हो सकती है, परन्तु ऐसा होना आवश्यक नहीं है। सागरीय तट या मैदान से इनका उठाव स्पष्ट रूप से दिखता है। प्रायद्वीपीय भारत का पठार महाद्वीपीय पठार का सर्वोत्तम उदाहरण है, जो कि कई लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में विस्तृत है। यह पठार न केवल महाद्वीपीय पठार का ही उदाहरण प्रस्तुत करता है, वरन् भूपटल के प्राचीनतम पठारों को भी प्रदर्शित करता है।

5.  तटीय पठार - सागरीय तटों के पास स्थित पठारों को तटीय पठार के अन्तर्गत सम्मिलित किया जाता है। भारत के कारोमण्डल तट को तटीय पठार का उदाहरण बताया जाता है।

ज्वालामुखी पठार - ज्वालामुखी उद्गार के कारण विस्तृत लावा प्रवाह के फलस्वरूप क्रमिक रूप में लावा के परत के ऊपर परत जमने से स्थलखण्ड समीपी सतह से ऊँचा हो जाता है तथा लावा पठार का निर्माण होता है।

ज्वालामुखी के दरारी उद्गार के कारण निर्मित पठार के उदाहरण न्यूजीलैण्ड, दक्षिणी अफ्रीका, उत्तरी तथा दक्षिणी अर्जेण्टीना, ब्राजील, पश्चिमी संयुक्त राज्य अमेरिका, फ्रांस तथा साइबेरिया में मिलते हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका का कोलम्बिया का पठार, लावा निर्मित पठार का सर्वोत्तम उदाहरण है।

मैदान (Plains)

(1)  अधिकांश विस्तृत मैदानों का निर्माण पटल विरूपणी बल के कारण अधिमहाद्वीपीय सागर (Epicontinental Sea) में जलमग्न स्थलखण्डों के उत्थान के कारण होता है।

(2)  पटलविरूपणी बल के कारण पर्वतीकरण के समय पर्वत के सामने वाले स्थलखण्ड का प्रायः अवतलन हो जाता है, जिसमें नदियों द्वारा निक्षेप के कारण विस्तृत मैदान का निर्माण होता है। भारत का विशाल उत्तरी मैदान इसका प्रमुख उदाहरण है।

(3)  पर्वतीकरण के समय दो श्रेणियों के मध्य की भूसन्नति का मध्य पिण्ड (median mass) वलन की क्रिया से प्रभावित न होने के कारण सपाट ही रह जाता है। यह भाग अगर नीचा होता है तो ‘मैदान’ कहा जाता है।

(4)  सागरीय किनारों पर तटीय भाग निमज्जन (submergence) के कारण जलमग्न होता है। उस पर निक्षेप होते रहने से तटीय मैदान का निर्माण हो जाता है। भारत का कर्नाटक तथा उत्तरी सरकार (पूर्वी तटीय भाग) इसका प्रमुख उदाहरण है।

(5)  सागर के निवर्तन (retreat) या पीछे हटने से स्थलखण्ड सूख कर मैदान बन जाते हैं। भारत का कच्छ मैदान इसी प्रकार निर्मित मैदान है।

(6)  एक लम्बे समय तक अपरदन के कारण पठार घिसकर नीचे हो जाते हैं तथा मैदानों का निर्माण हो जाता है। उपर्युक्त वर्णित मैदान मुख्य रूप से द्वितीय श्रेणी के उच्चावच्च के उदाहरण हैं।

(अ) रचना के अनुसार वर्गीकरण (ट्रिवार्था)

1.   समतल मैदान (flat plain)

2.   तरंगित मैदान (undulating plain)

3.   लहरदार या उर्मिल मैदान (rolling plain)

4.   विच्छेदित या विभाजित मैदान (dissected plain)

(ब) निर्माण की प्रक्रिया के अनुसार

1. अन्तर्जात बल द्वारा उत्पन्न मैदान (रचनात्मक मैदान)

(i) पटल विरूपणी मैदान

(अ) उत्थान द्वारा निर्मित मैदान

(ब) अवतलन तथा निक्षेप द्वारा निर्मित मैदान

(ii) आकस्मिक घटना द्वारा निर्मित मैदान

ज्वालामुखी (लावा) मैदान

2.   बहिर्जात बल द्वारा निर्मित मैदान

(i) अपरदनात्मक मैदान

(ii) निक्षेपात्मक मैदान

(i) नदी द्वारा निर्मित अपरदनात्मक मैदान - नदियों के अपरदन द्वारा निर्मित मैदानों में सर्वप्रथम पेनीप्लेन या समप्राय मैदान है। नदियाँ अपने अपरदनचक्र की अन्तिम अवस्था में उच्च स्थल खण्ड (पहाड़, पठार आदि) को काटकर अपने आधार तल को प्राप्त कर लेती हैं। इस तरह से निर्मित मैदान को ‘पेनीप्लेन’ या ‘समप्राय मैदान’ कहा जाता है।

(ii) हिमअपरदित मैदान (glaciated plain) - हिमानी अपने अपरदन द्वारा उच्च भाग को घिसकर सपाट, परन्तु उच्चावच युक्त मैदान का निर्माण करती है। हिमानीघर्षित मैदान में चोटियाँ गोलाकार होती हैं। घाटियाँ चौड़ी होती हैं।

उदाहरण कई की संख्या में उत्तरी अमेरिका के उत्तरी भाग तथा उत्तरी-पश्चिमी यूरेशिया में मिलते हैं।

(iii) पवन अपरदित मैदान - मरुस्थलीय भागों से चट्टानें यांत्रिक अपक्षय द्वारा विघटित तथा वियोजित होकर ढीली पड़ जाती हैं। वेगवती पवन इन ढीले कणों को उड़ाकर अन्यत्र जमा करती है। इस तरह की क्रिया की लम्बे समय तक पुनरावृत्ति के कारण चट्टानी भाग घिसकर मैदान के रूप में बदल जाता है। पवन द्वारा घर्षित मैदान के उदाहरण सहारा के रेग, सेरिर तथा हमादा हैं।

(iv) चूनेदार मैदान या कार्स्ट मैदान - चूने की चट्टान वाले क्षेत्र में भूमिगत जल की क्रिया द्वारा उसकी ऊपरी सतह तथा निचली सतह में अपरदन कार्य होता रहता है, जिस कारण एक लम्बे समय में अधिकांश भाग कटकर तथा घिसकर नीचा हो जाता है। जीर्णावस्था में जब अधिकांश चूने की चट्टानें घिसकर कट जाती हैं तो अपवाह प्रतिरूप सतह पर दृष्टिगत होता है। इस समय तक पठार कटकर एक मैदान के रूप में बदल जाता है परन्तु इस तरह के मैदान की ऊपरी सतह बिल्कुल समतल नहीं होती है। धरातल ऊबड़-खाबड़ तथा तरंगित (undulating) होता है।

(1) नदी द्वारा निक्षेपित मैदान - अपरदन के कारकों द्वारा निक्षेप से बने हुए मैदानों में नदी द्वारा निक्षेपित मैदान सर्वाधिक विस्तृत तथा महत्त्वपूर्ण होता है। विश्व की प्रसिद्ध नदियों के मैदान इसके प्रमुख उदाहरण हैं। नदी द्वारा निर्मित मैदानों में गिरिपद जलोढ़ मैदान, बाढ़ के मैदान तथा डेल्टा मैदान अधिक महत्त्वपूर्ण होते हैं-

(i) गिरिपद जलोढ़ मैदान - नदी के निक्षेप द्वारा निर्मित मैदानों को मुख्य रूप से ‘जलोढ़ मैदान’ कहा जाता है। भारत में हिमालय पर्वत की निचली तलहटी में पर्वत के पाद के पास बड़े-बड़े टुकड़ों के ढेर से निर्मित इस तरह का मैदान भाबर कहा जाता है।

(ii) बाढ़ मैदान (flood plains) - नदी जब अपरदन द्वारा अपने आधार तल को प्राप्त कर लेती है, तो उसकी धारा मन्द पड़ जाती है। फलस्वरूप वह अपने अगल-बगल बारीक कणों वाले पदार्थों का निक्षेपण करने लगती है। बाढ़ के समय तक जितनी दूरी तक नदी का जल फैल जाता है, वहाँ तक बारीक कणों से मलबा का निक्षेप हो जाने से निर्मित मैदान को बाढ़ का मैदान कहा जाता है।

(iii) डेल्टा का मैदान - जब नदियाँ सागरों या झीलों में गिरती हैं तो वेग में कमी के कारण मुहाने के पास तलछट का निक्षेप होने से समतल तिकोनाकार मैदान का निर्माण होता है, जिसे ‘डेल्टा’ कहते हैं। यह ग्रीक भाषा के अक्षर से मिलता है। अतः इस मैदान को ‘डेल्टा’ कहते हैं। गंगा नदी का डेल्टा 50,000 वर्गमील के क्षेत्र में फैला हुआ है। डेल्टा के ऊँचे भागों को चार तथा निचले भागों को बील (बंगाल में) कहा जाता है। डेल्टाई मैदान भी खेती की दृष्टि से अधिक महत्वपूर्ण होते हैं।

(2) झीलकृत मैदान (Lacustrine Plain) - झीलों में गिरने वाली नदियाँ अपने साथ लाए हुए मलवा का उनमें निक्षेप करती रहती हैं, जिनसे झीलों की तली उथली होती जाती है और गहराई कम हो जाती है। धीरे-धीरे तलछटीय निक्षेप द्वारा झील भर जाती है और एक सपाट मैदान का निर्माण हो जाता है। दूसरे रूप में पृथ्वी के अन्तर्जात बल के कारण पटलविरूपणी संचलन द्वारा झील की तली ऊपर उठ आती है, जिससे उसका जल बह जाता है और एक मैदान का निर्माण होता है।

(3) लावा मैदान - ज्वालामुखी उद्गार से निकले लावा का जब पतली चादर के रूप में निचले भागों में निक्षेप हो जाने से सपाट भाग का निर्माण हो जाता है, तो उसे लावा मैदान कहते हैं। अधिक लावा के निक्षेप के कारण ऊँचे भाग ‘पठार’ कहे जाते हैं, परन्तु उनका अपरदन हो जाने पर मैदान का निर्माण हो जाता है। लावा मैदान काली मिट्टी के कारण खेती के लिए अधिक उपजाऊ होता है।

(4) पवन द्वारा निक्षेपित मैदान - पवन द्वारा निक्षेपित मैदान दो तरह के होते हैं। एक तो रेतीला मैदान या रेगिस्तानी मैदान होता है तथा दूसरा लोयस का मैदान। मरुस्थली भागों में पवन, यांत्रिक अपक्षय द्वारा विघटित एवं वियोजित बालुका पत्थर से बालू या रेत को उड़ाकर अन्यत्र जमा करके मैदानों का निर्माण करती है। लोयस का मैदान प्रायः मरुस्थलों से दूर निर्मित होता है। मरुस्थलीय भागों से आने वाली आँधियाँ अपने साथ में रेत तथा अन्य मिट्टी के कणों को उड़ाकर अधिक दूर तक ले जाती हैं। जहाँ पर उनकी गति मन्द पड़ जाती है, वहीं पर इन पदार्थों का निक्षेप हो जाने से ‘लोयस मैदान’ का निर्माण होता है। चीन के प्रसिद्ध लोयस के मैदान का निर्माण उदाहरण है।

(5) हिमानी द्वारा निक्षेपित मैदान - हिमानी तथा हिमचादर द्वारा मलवा के निक्षेप को ‘हिमानीकृत मैदान’ कहा जाता है। उत्तरी पश्चिमी यूरोप तथा उत्तरी अमेरिका में प्लीस्टोसीन हिमाच्छादन के कारण निर्मित हिमानी मेदान अत्यधिक विस्तृत क्षेत्रों में मिलते हैं। इनकी सतह समतल नहीं होती है, क्योंकि निक्षेप द्वारा तरह-तरह के छोटे-छोटे मरुस्थलों की रचना हो जाती है।

(i)  टिल मैदान - हिमानी द्वारा लाए गए छोटे कणों से लेकर बड़े कणों वाले टुकड़ों को ‘टिल’ कहा जाता है। इनके निक्षेपण से निर्मित मैदान टिल मैदान होता है, जिसका तल लहरदार होता है और इसमें छोटी-छोटी चोटियाँ तथा गड्‌ढे होते हैं।

(ii) हिमोढ़ मैदान (moraine plains) - हिमानी द्वारा बारीक कणों वाले मलवे को ‘हिमोढ़’ कहते हैं। हिमोढ़ द्वारा निर्मित मैदान मुख्य रूप से असमान धरातल वाले होते हैं।

(iii) हिमनद अवक्षेप मैदान - हिमचादर के पिघल जाने पर जलधारा के द्वारा रेत, बजरी, मृत्तिका आदि का निक्षेप हो जाने से समतल सतह वाले मैदान को ‘हिमनद अवक्षेप मैदान’ कहते हैं।

(i)   समतल मैदान - उच्चावचीय कम विषमता वाले सपाट तथा विस्तृत मैदान को ‘समतल मैदान’ कहा जाता है। इस तरह के मैदान में निम्नतम तथा उच्चतम भागों का अन्तर 15 मीटर से अधिक नहीं होता है।

(ii)  तरंगित मैदान (undulating plains) - समान उतार व चढ़ाव वाले मैदान को ‘तरंगित मैदान’ कहा जाता है, जिसमें निम्नतम तथा उच्चतम भागों में अन्तर 15 मीटर से 50 मीटर तक होता है।

(iii) लहरदार या बेलनी मैदान (rolling plains) - जब मैदान की सतह समतल न होकर विषम होती है तथा छोटे-बड़े टीले यत्र-तत्र मिलते हैं, तो उस मैदान को ‘लहरदार या बेलनी मैदान’ कहते हैं। इस तरह के मैदान में निम्नतम तथा उच्चतम भागों का अन्तर 50 से 100 मीटर तक होता है।

(iv) विच्छेदित मैदान (dissected plains) - अनाच्छादन (denudation) द्वारा कटे-फटे तथा ऊबड़-खाबड़ मैदान को ‘विच्छेदित मैदान’ कहते हैं, जिनमें उच्चतम तथा निम्नतम भागों में 75 से 100 मीटर तक का अन्तर होता है।

झील (Lakes)

झीलों का वितरण -

झीलों की विशेषताएँ -

हिमानीकृत झील (Glacial Lake)

     यद्यपि हिमानी द्वारा निर्मित झीलें परन्तु उत्तरी अमेरिका की बृहत् झीलें (सुपीरियर, मिशिगन, ह्यूरन, इरी तथा ओण्टारियो) हिमानीकृत अत्यन्त विस्तृत झीलों के उदाहरण हैं।

नदीकृत झील (Fluvial Lake)

(अ) अपरदन द्वारा बनी झीलें

(i) अवनमन कुण्ड झील (Plunge pool lake) - बड़े-बड़े जलप्रपातों की तलहटी में नदियाँ अपने छेदक यंत्र (grinding tools) द्वारा जलगर्तिका (pot holes) का निर्माण करती हैं। धीरे-धीरे प्रपात पीछे हटते जाते हैं तथा जलगर्तिका का विस्तार होता जाता है। जब इनका अधिक विस्तार हो जाता है तो उन्हें अवनमन कुण्ड (plunge pools) कहते हैं। इन कुण्डों में जल भर जाता है तथा छोटी-बड़ी झीलों का निर्माण होता है।

(ii) संरचनात्मक झील (structural lake) - जब नदी के मार्ग में विभिन्न कठोरता वाली चट्टानों की परतें होती हैं तो कोमल चट्टान शीघ्र ही कट जाती हैं, परन्तु कठोर और प्रतिरोधी शैल बाहर निकली रहती हैं। कुछ समय तक ये चट्टानें नदी के अपरदन के लिए अस्थायी आधार तल का कार्य करती हैं। इन चट्टानों के ऊपर छोटी-छोटी झीलों का निर्माण हो जाता है।

(iii) चापाकार या गोखुर झील (ox-bow lake) - नदियाँ जब मैदानों में प्रवेश करती हैं तो क्षैतिज अपरदन के कारण बड़े-बड़े मोड़ों से होकर प्रवाहित होती हैं। इन मोड़ों को ‘नदी विसर्प’ (meander) कहा जाता है। जब यह घुमाव अधिक हो जाता है तो नदी अपने विसर्प को छोड़कर सीधे मार्ग से प्रवाहित होती है। इस तरह के परित्यक्त विसर्प में जल के भर जाने से निर्मित झीलों को ‘गोखुर’ या ‘चापाकार झील’ कहते हैं।

(ब) निक्षेप द्वारा निर्मित झील

(i) जलोढ़ पंख झील - जलोढ़ पंख का निर्माण उस समय होता है; जबकि कोई नदी पहाड़ी भाग से उतरकर मैदानी भाग में प्रवेश करती है। ढाल में कमी के कारण ढाल के पद के पास पंख का निर्माण होता है। जलोढ़ पंख द्वारा जब नदी अवरुद्ध हो जाती है तो अस्थायी झील का निर्माण होता है।

(ii) डेल्टा झील - डेल्टाई भाग में नदियाँ कई जल वितरिकाओं (distributaries) से होकर प्रवाहित होती हैं। दो शाखाओं के बीच स्थित डेल्टा वाले भाग के बीच निम्न स्थान में जल एकत्र होकर झील का निर्माण करता है।

(iii) बाढ़ के मैदान की झील - नदियों की बाढ़ के समय विस्तृत बाढ़ के मैदान में कांप का निक्षेप असमान रूप से होने के कारण कहीं-कहीं पर छोटे गड्‌ढे बन जाते हैं, जिनमें पानी भर जाने से अस्थायी तथा अल्पकालिक झीलों का निर्माण हो जाता है।

(iv) रैफ्ट द्वारा निर्मित झील - जब नदियाँ जंगली भागों से होकर प्रवाहित होती हैं, तो उनके साथ लकड़ी के बड़े-बड़े कुन्दे या टुकड़े भी बहते रहते हैं। जब ये टुकड़े नदी की धारा की दिशा में आड़े रूप में होते हैं तो उनके साथ घास-पात भी अवरुद्ध हो जाती हैं। धीरे-धीरे इन कुन्दों के साथ तलछट का भी जमाव होता रहता है और एक स्थायी बाँध तैयार हो जाता है। इस बाँध का कारण नदी का जल अवरुद्ध हो जाता है तथा छोटी परन्तु अस्थायी झील का निर्माण होता है।

ज्वालामुखी झील

ज्वालामुखी द्वारा निर्मित निम्न झीलें अधिक महत्वपूर्ण होती हैं-

(i) लावा बाँध झील - ज्वालामुखी के अचानक विस्फोट द्वारा उससे निस्सृत अत्यधिक लावा का प्रवाह जब नदी की घाटी में होता है तो लावा के ठोस होकर जम जाने से नदी में प्राकृतिक बाँध का निर्माण हो जाता है। इस बांध के कारण नदी का जल अवरुद्ध हो जाता है तथा झील का निर्माण होता है।

(ii) क्रैटर झील - ज्वालामुखी के मुख का जब अधिक विस्तार हो जाता है तो उसे क्रैटर या ज्वालामुखी बिवर कहते हैं। इस बिवर में जल के एकत्र हो जाने से निर्मित झील को क्रैटर झील कहा जाता है। संयुक्त राज्य अमेरिका के ओरेगन प्रान्त की क्रैटर लेक इस तरह की झील का एक प्रमुख उदाहरण है। यह झील माउण्ट मैजामा ज्वालामुखी के बिवर में स्थित है।

विश्व की प्रमुख झीलें -

हिमनद (Glaciers)

हिमनद के प्रकार :-  

भूकंप एवं ज्वालामुखी : प्रकार, वितरण एवं उनका प्रभाव
(Earthquakes and Volcanoes : Types, Distribution and their Impact)

भूकम्प (Earthquake) -

भूकम्प भू-पृष्ठ पर होने वाला आकस्मिक कंपन है जो भूगर्भ में चट्टानों के लचीलेपन या समस्थिति के कारण होनेवाले समायोजन का परिणाम होता है। यह प्राकृतिक व मानवीय दोनों ही कारणों से हो सकता है। भूकंप आने के पहले वायुमंडल में ‘रेडॉन’ गैसों की मात्रा में वृद्धि हो जाती है। अतः इस गैस की मात्रा में वृद्धि का होना उस प्रदेश विशेष में भूकंप आने का संकेत होता है।

जिस जगह से भूकंपीय तरंगें उत्पन्न होती हैं उसे ‘भूकंप मूल’ (Focus) कहते हैं तथा जहाँ सबसे पहले भूकंपीय लहरों का अनुभव किया जाता है उसे भूकंप अध्केन्द्र (Epi Centre) कहते हैं। यह भूकंप मूल के ठीक ऊपर भूपर्पटी पर स्थित होता है।

भूकंप के इस दौरान जो ऊर्जा भूकम्प मूल से निकलती है, उसे ‘प्रत्यास्थ ऊर्जा’ (Elastic Energy) कहते हैं। भूकंप के दौरान कई प्रकार की भूकंपीय तरंगें (Seismic Waves) उत्पन्न होती हैं जिन्हें  तीन श्रेणियों में रखा जा सकता हैः-

(i) प्राथमिक अथवा लम्बात्मक तरंगें (Primary or Longitudinal): इन्हें ‘P’ तरंगें भी कहा जाता है। ये अनुदैर्ध्य तरंगें हैं एवं ध्वनि तरंगों की भांति चलती हैं। तीनों भूकंपीय लहरों में सर्वाधिक तीव्र गति इसी की होती है। यह ठोस के साथ-साथ तरल माध्यम में भी चल सकती है, यद्यपि ठोस की तुलना में तरल माध्यम में इसकी गति मंद हो जाती है। ‘S’ तरंगों की तुलना में इसकी गति 40% अधिक होती है।

(ii) अनुप्रस्थ अथवा गौण तरंगें (Secondary or Transverse Waves): इन्हें ‘S’ तरंगें भी कहा जाता है। ये प्रकाश तरंगों की भांति चलती हैं। ये सिर्फ ठोस माध्यम में ही चल सकती है, तरल माध्यम में प्रायः लुप्त हो जाती है। चूंकि ये पृथ्वी के क्रोड से गुजर नहीं पाती, अतः ‘S’ तरंगों से पृथ्वी के क्रोड के तरल होने के संबंध में अनुमान लगाया जाता है।

(iii) धरातलीय तरंगें (Surface or Long Period Waves): इन्हें ‘L’ तरंगें भी कहा जाता है। ये पृथ्वी के ऊपरी भाग को ही प्रभावित करती है। ये अत्यधिक प्रभावशाली तरंगें हैं एवं सबसे अधिक लंबा मार्ग तय करती है। यद्यपि इनकी गति काफी धीमी होती है और यह सबसे देर में पहुँचती है परंतु इनका प्रभाव सबसे विनाशकारी होता है।

P, S व L तरंगों का पथ एवं पृथ्वी की आंतरिक संरचना

भूकम्पमूल की गहराई के आधार पर भूकम्पों को तीन वर्गों में रखा जाता हैः (1) सामान्य भूकम्प- 0-50 कि.मी. (2) मध्यवर्ती भूकम्प- 50-250 कि.मी. (3) गहरे या पातालीय भूकम्प- 250-700 कि.मी.। जिन संवेदनशील यंत्रों द्वारा भूकम्पीय तरंगों की तीव्रता मापी जाती है उन्हें ‘भूकम्प लेखी’ या ‘सीस्मोग्राफ’ (Seismograph) कहते हैं, इसके तीन स्केल (Scale) हैं-

1.    रॉसी - फेरल स्केल (Rossy Feral Scale): इसके मापक 1 से 11 रखे गए थे।

2.    मरकेली स्केल (Mercall Scale): यह अनुभव प्रधान स्केल है। इसके 12 मापक हैं।

3.    रिक्टर स्केल (Richter Scale): यह गणितीय मापक है, जिसकी तीव्रता 0 से 9 तक होती है और प्रत्येक बिन्दु दूसरे बिन्दु की तीव्रता का 10 गुना अधिक तीव्रता रखता है।

समान भूकम्पीय तीव्रता वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा को ‘समभूकम्पीय रेखा’ या ‘भूकम्प समाघात रेखा’ (Isoseismal Lines) कहते हैं। एक ही समय पर आने वाले भूकम्पीय क्षेत्रों को मिलाने वाली रेखा होमोसीस्मल लाइन (Homoseismal Lines) कहलाती है।

भूकम्पों का विश्व वितरण : विश्व में भूकम्पों का वितरण उन्हीं क्षेत्रों से संबंधित है जो अपेक्षाकृत कमजोर तथा अव्यवस्थित हैं। भूकम्प के ऐसे क्षेत्र मोटे तौर पर दो विवर्तनिकी घटनाओं से संबंधित है- (1) प्लेट के किनारों के सहारे तथा (2) भ्रंशों के सहारे।

विश्व में भूकम्प की कुछ विस्तृत पेटियाँ इस प्रकार हैः

सुनामी (Tsunami): स्यू-ना-मी जापानी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है तट पर आती समुद्री लहरें। ये बहुत लंबी व कम कंपन वाली समुद्री लहरें हैं जो महासागरीय भूकंपों के प्रभाव से महासागरों में उत्पन्न होती हैं। सुनामी लहरों के साथ जल की गति संपूर्ण गहराई तक होती है, इसलिए ये अधिक प्रलयकारी होती हैं। सुनामी लहरों की दृष्टि से प्रशांत महासागर सबसे खतरनाक स्थिति में है। महासागरीय प्लेटों के अभिसरण क्षेत्र में ये सर्वाधिक शक्तिशाली होती है। इंडोनेशिया के सुमात्रा द्वीप में 26 दिसंबर, 2004 को हिंद महासागर के तली के नीचे उत्पन्न सुनामी लहरें भारतीय प्लेट के बर्मी प्लेट के नीचे क्षेपण का परिणाम थी। भूकंप की तीव्रता रिक्टर स्केल पर 8.9 थी जिसके कारण प्रलयकारी सुनामी लहरों की उत्पत्ति हुई। इंडोनेशिया, मलेशिया, श्रीलंका व भारत समेत कुल 11 देश इन लहरों की चपेट में आए। भारत में तमिलनाडु का नागपट्टनम जिला सर्वाधिक प्रभावित क्षेत्र था।

अक्टूबर, 2007 को भारत ने विश्व की सबसे आधुनिक सुनामी चेतावनी प्रणाली प्रारंभ की है। इस प्रणाली से मिलने वाली जानकारी भारत पड़ोसी देशों को भी देगा। यह प्रणाली भूकम्प की तीव्रता गहराई और केन्द्र बताएगी। हिन्द महासागर में हर तरह की भूकम्पीय हलचल को सिर्फ 20 मिनट में आकलन कर यह प्रणाली निकटवर्तीय क्षेत्रों में सूचना उपलब्ध करा देगी। यह प्रणाली भारतीय राष्ट्रीय महासागर सूचना सेवा केन्द्र हैदराबाद में लगाई जाएगी।

भारत के भूकंपीय क्षेत्र आपदा प्रबंधन

हिमालय का पर्वतीय भाग एवं उत्तर का मैदानी भाग भूकंप की दृष्टि से अत्यधिक संवेदनशील क्षेत्र है क्योंकि भारतीय प्लेट, यूरेशियन प्लेट को निरंतर धक्का दे रही है। इसलिए यह भाग भू-संतुलन की दृष्टि से काफी अस्थिर है एवं अक्सर यहाँ पर भूकंप आते रहते हैं। पिछली एक सदी में इस क्षेत्र में अनेक बड़े भूकंप आ चुके हैं जिनमें आसाम, कांगड़ा, बिहार व नेपाल, उत्तरकाशी में आए भूकंप शामिल हैं।

हाल के वर्षों में दक्षिणी प्रायद्वीपीय पठार, जो कि सामान्यतः भू-गर्भीय रूप से स्थिर समझा जाता रहा है एवं भूकंप के कम संभावित प्रदेशों के अंतर्गत आता है, वहाँ भी भूकंप आ गया है। इस संदर्भ में वर्ष 1993 में महाराष्ट्र के लातूर भूकंप का उदाहरण लिया जा सकता है। इससे प्रायद्वीपीय पठार के भू-गर्भीय स्थिरता की अवधारणा को झटका लगा। अब यह माना जाने लगा है कि भारत का कोई भी प्रदेश, भूकंप रहित नहीं है, क्योंकि भारतीय प्लेट के उत्तरी खिसकाव के कारण एवं उससे उत्पन्न दबाव जनित बल से पठारी भाग के आंतरिक भागों में ऊर्जा तरंगों का प्रभाव बढ़ा है। जब यह ऊर्जा बाहर विनिर्मुक्त होने का प्रयास करता है तो भारतीय प्लेट में भ्रंश निर्माण की स्थितियाँ बनती हैं यही कारण है कि भूगर्भिक रूप से स्थिर भारतीय प्लेट में भी अनेक भ्रंश उत्पन्न हो गए हैं, जहाँ बड़े  भूकंप आने की आशंका रहती है। सन् 2001 में कच्छ के भुज क्षेत्र में आए भूकंप का मुख्य कारण, इसका सर्वाधिक भूकंप संभावित क्षेत्र (Zone V) में बसा होना है। साथ ही इस क्षेत्र में छोटे-छोटे प्लेटों के अंतरा-प्लेटीय गतिविधियों के कारण दबावजनित बल उत्पन्न होता रहता है। इस भ्रंश क्षेत्र में बसे होने से और भारतीय प्लेट के उत्तरी खिसकाव के कारण भ्रंशों में फैलाव होने से यहाँ अत्यधिक तीव्रता का भूकंप आया। जिसकी तीव्रता रिएक्टर स्केल पर 6.9 थी।

मानवीय प्रभाव के कारण भी कई बार भूकंप आ जाते हैं। बड़े बाँध, समस्थिति जनक बल उत्पन्न करते हैं जिनसे जल-संग्रहण क्षेत्र में या उसके आस-पास भूकंप आने की आशंका बढ़ जाती है। वर्ष 1967 में महाराष्ट्र के कोयना में आया भूकंप इसका उदाहरण है। कई बार परमाणुविक परीक्षण के कारण भी भूकंप आते हैं। पर्वतीय क्षेत्रों में सड़क निर्माण करते समय चट्टानी संरचना का ध्यान नहीं रखने के कारण भी भू-स्खलन व भूकंप की घटनाएँ बढ़ी हैं। भारत में भूकंप के संबंध में पर्याप्त सुरक्षोपाय नहीं होने के कारण रिक्टर स्केल पर कम तीव्रता के भूकंप भी जान-माल की अति क्षति करते हैं। जहाँ जापान में सामान रूप से रिक्टर स्केल 7 तीव्रता के भूकंप भी अधिक हानि की स्थिति उत्पन्न नहीं करते  वहीं भारत में 5 से अधिक तीव्रता के भूकंप भी गंभीर संकट उत्पन्न कर देते हैं। अवैज्ञानिक निर्माण कार्य तथा कच्चे व उपस्तरीय मकानों का निर्माण भूकंप के कारण उत्पन्न होने वाले संकट को बढ़ा देते हैं जिससे जन-धन की काफी हानि होती है। भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान, बेंगलुरु के प्रो. विनोद कुमार गौड़ का यह सुझाव रहा है कि सभी भूकंपीय संभावना वाले क्षेत्रों में आपदा के वैज्ञानिक मूल्यांकन की आवश्यकता हैं। इन क्षेत्रों में भूमि उपयोग एवं विविध तरह के निर्माण कार्यों में भूकंप की आशंका एवं उसके खतरे को कम करने के लिए पर्याप्त ध्यान दिया जाना नियोजन करना अपेक्षित हैं। जनजागरूकता व शैक्षिक अभियानों के द्वारा भूकंप के प्रति लोगों को सचेत किया जा सकता है। अग्रिम चेतावनी द्वारा सघन क्षेत्रों को तुरंत खाली कराया जा सकता है एवं यातायात संचार व शक्ति प्रणालियों को बंद किया जा सकता है। भूकंप विज्ञान में सेंसर डिजॉयनिंग, टेलीमैट्री  ऑन लाइन कंप्यूटिंग व बेहतर संचार जैसे नवीन विकासों को वैज्ञानिक उपयोग कर भूकंप से होने वाली जान-माल की हानि को कम किया जा सकता है। यद्यपि देश में ऐसी कोई प्रणाली नहीं है, जिसके आधार पर भूकंप की पूर्व सूचना मिल सके, पर अब कुछ शोधों से भूकंप आने से पूर्व की स्थिति का आकलन करना संभव हो रहा है। हल्के झटको वाले भूकंप को सिस्मोफोन, माइक्रोफोन एवं अन्य दुर्गम उपकरणों से मापा जा सकता है। कुओं के जलस्तर में आए बदलाव से, कुओं में तरंगे उठने एवं तापमान के अघ्ययन से, पशुओं के व्यवहार में आए बदलाव से और भूकंप के मुख्य केंद्र बिंदु में हुई भू-गर्भीय हलचल से भूकंप का आकलन किया जा सकता है। ऑटोनेस वॉटर लेवल रिकॉर्डर हर 15 मिनट के अंतराल में टेलीमैट्री नेटवर्किंग के माध्यम से पानी में होने वाली हलचल की जानकारी इंटरनेट पर दर्शाएगा, जिसके आधार पर भू-वैज्ञानिक भूकंप कि भविष्यवाणी को संभव मान रहे है। अध्ययन के अनुसार 1 से 3 घंटे पहले भूकंप की सूचना मिलना संभव हो पाएगा। देश के भू-गर्भीय हलचल से भी भूकंप का आकलन किया जा सकता है जो भूकंपीय जोन की बेहतर समझ पर निर्भर है।

वर्तमान समय में हिमालय क्षेत्र के भूगर्भिक संरचना व प्लेट विवर्तनिक क्रिया के संबंध में पर्याप्त जानकारी हासिल हो चुकी है एवं भारत के अन्य क्षेत्रों में भी भूकंप के आशंका वाले क्षेत्रों में पर्याप्त जानकारी सुलभ हुई है। भारतीय मानक ब्यूरो द्वारा भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के दिशा निर्देशन भूकंपीय मानचित्रों को अद्यतन बनाने का प्रयास किया गया है। इस मानचित्र में भारत में भूकंप की आशंका वाले क्षेत्रों के निर्धारण में अधिक परिशुद्धता लाने के लिए पहले से उपलब्ध भूगर्भिक एवं विवर्तनिक आँकड़ों का पुनरीक्षण किया जा रहा है। भूकंप के जोखिमों के अध्ययन व मूल्यांकन हेतु स्थलाकृतिक मानचित्रों के एवं उपग्रह सर्वेक्षणों को भी सहारा लिया जा रहा है।

राष्ट्रीय आपदा प्रबंध आयोग का गठन शीर्ष निकाय के रूप में किया गया है। जो भूकंप समेत विभिन्न आपदाओं के प्रबंध हेतु तत्कालीन व दीर्घकालीन रणनीति तैयार करता है। इसके राजनीतिक प्रशासनिक व तकनीकी तीनों की विभाग है। जो अपने-अपने कार्यों को विशेष रूप से अंजाम देने में लगे हैं। भूकंप की आशंका वाले क्षेत्रों में पूर्व सुरक्षोपाय अपनाने के प्रयास किए जा रहे हैं। वर्तमान समय में महाराष्ट्र ही एक मात्रा ऐसा प्रांत है जहाँ भूकंप के जाखिम को कम करने हेतु मलबा हटाने वाले वाहनों सुसज्जित बचाव दल व चिकित्सा वाहनों, उपग्रह संचार आधारित निगरानी कक्ष, आदि की व्यवस्था है। वर्ष 2001 में भुज में आए भूकंप में जान-माल की अधिक हानि का मुख्य कारण भूकंप के जोखिम को कम करने के लिए पर्याप्त प्रबंध का नहीं होना था। अतः तत्कालीन के साथ-साथ दीर्घकालीन रक्षोपाय पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। जापान से तकनीकी संबंधी मदद भी ली जा रही है। भूकंपरोधी मकानों के निर्माण एवं आपदा प्रबंधन की पर्याप्त व्यवस्था के द्वारा भूकंप से हानि की आशंकाओं को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

ज्वालामुखी (Volcanoes)

ज्वालामुखी मुख्य रूप से एक विवर या छिद्र होता है जिसका संबंध पृथ्वी के आन्तरिक भाग से होता है तथा जिसके माध्यम से लावा, राख, गैस, जलवाष्प आदि का निर्गमन होता है। ज्वालामुखी क्रिया के अन्तर्गत मैग्मा के निकलने से लेकर सतह या उसके अंदर विभिन्न रूपों में इसके ठंडा होने की प्रक्रिया शामिल होती है।

प्रारंभ में मैग्मा तथा लावा एवं आग्नेय शैल का वर्गीकरण उनमें मौजूद सिलिका की मात्रा के आधार पर किया जाता था। सिलिका की मात्रा के आधार पर लावा के दो प्रकार हैः-

1. Acid Lava - इस लावा में सिलिका की अधिक मात्रा होने के कारण यह काफी गाढ़ा तथा चिपचिपा होता है। इसे धरातल पर अधिक फैलने का मौका नहीं मिलता, अतः यह क्रेटर के आसपास जमा होकर तीव्र ढालवाले ‘गुंबदाकार शंकु’ का निर्माण करता है। इटली में स्ट्राम्बोली तथा फ्रांस में पाई-डी-डोम इसके अच्छे उदाहरण हैं।

2. Basic Lava - इसमें सिलिका की मात्रा कम होती है। अतः यह अम्ल लावा की अपेक्षा अधिक तरल तथा पतला होता है। यह धरातल पर दूर तक फैलता है जिसके कारण शंकु की ढाल मंद होती है। इसे ‘शील्ड शंकु’ या ‘चपटा शंकु’ कहते हैं। हवाई द्वीप का मोनालोआ शंकु इसका उदाहरण है।

वर्तमान समय में मैग्मा तथा लावा एवं आग्नेय शैलों का वर्गीकरण रासायनिक खनिज संघटन के आधार पर किया जाता है। खनिजों को हल्के रंग व गहरे रंग की दो कोटियों में विभक्त किया जाता है। हल्के रंग के खनिजों को फेल्सिक (Felsic) एवं गहरे रंग के खनिजों को मैफिक (Mafic) कहते हैं। फेल्सिक समूह में सिलिका प्रधन खनिज क्वार्ट्ज तथा फेल्सफार प्रमुखता से होते हैं जबकि मैफिक समूह में मैग्नेशियम व लौह तत्त्व की अधिकता वाले खनिज पायरॉक्सींस, एम्फीबोल्स तथा ऑल्वीन की प्रधानता होती है। फेल्सिक व मैफिक के मध्यस्थ गुणों वाले खनिजों को अल्ट्रामैफिक (Ultramafic) कहा जाता है। इसमें सिलिकन व एल्युमिनियम की मात्रा अधिक होती है। फेल्सिक, अल्ट्रामैफिक व मैफिक के अंतर्गत ग्रेनाइट, डायोराइट व गैब्रो क्रमशः अंतर्जात लावा के एवं रायोलाइट, एंडेसाइट व बैसाल्ट क्रमशः बहिर्जात लावा के उदाहरण हैं।

स्थिति के आधार पर ज्वालामुखी क्रिया द्वारा निर्मित स्थलाकृतियों को दो भागों में बाँट सकते हैं-

ज्वालामुखी निर्मित आन्तरिक बाह्य स्थलाकृतियाँ

(A) आभ्यंतरिक स्थलाकृतियाँ (ग्रेनाइट चट्टानें)

(क) आन्तरिक लावा

(ख) बैथोलिथ         

(ग) लैकोलिथ          

(घ) पफैकोलिथ       

(ङ) लोपोलिथ         

(च) सिल

(छ) डाइक

(ज) स्टॉक

(B)  बाह्य स्थलाकृतियाँ (बैसाल्ट चट्टाने)

(क) विभिन्न प्रकार के शंकु

(ख) क्रेटर व काल्डेरा

(ग) लावा पठार या ट्रेप

(घ) लावा मैदान       

(ङ) धुआँरे तथा गेसर

आभ्यंतरिक स्थलाकृतियों को निम्न भागों में बाँटकर समझा जा सकता हैः

(i) बैथोलिथ : किसी भी प्रकार के चट्टानों में ग्रेनाइट के गुंबदाकार निक्षेप को बैथोलिथ कहते हैं। पर्वतीय क्षेत्रों में जहाँ ज्वालामुखी उद्गार होते हैं, यह संरचना पाई जाती है।

(ii) लैकोलिथ : यह भी गुंबदनुमा होता है जो सिर्फ अवसादी चट्टानों में मैग्मा के जमाव से बनता है। इसकी ढाल उत्तल होती है।

(iii) फैकोलिथ : जब ज्वालामुखी उद्गार से प्राप्त मैग्मा मोड़दार पर्वतों के अपनति तथा अभिनति में जमा हो जाता है तो फैकोलिथ का निर्माण होता है।

(iv) लोपोलिथ : जब मैग्मा का जमाव धरातल के नीचे अवतल ढाल वाली छिछली बेसिन में होता है तब उसे लोपोलिथ कहते हैं।

(v) सिल : जब मैग्मा का जमाव लगभग क्षैतिज रूप में परतदार या रूपान्तरित शैलों की विभिन्न परतों के बीच हो जाता है तो वह सिल कहलाता है। इसकी पतली परत को शीट (Sheet) कहते हैं।

(vi) डाइक : यह सिल के विपरीत लम्बवत एवं पतले रूप में मिलने वाला मैग्मा का जमाव है।

बाह्य स्थलाकृतियां -

लावा तथा अन्य पदार्थों का निकास एक प्राकृतिक नली द्वारा होता है जिसे ‘ज्वालामुखी नली’ (Volcanic Pipe) कहते हैं। ज्वालामुखी शंकु के शीर्ष पर प्याले या कीप की आकृति का जो गड्ढा होता है उसे क्रेटर (Crater) कहते हैं। जब क्रेटर में वर्षा-जल भर जाता है तो वह क्रेटर झील (Crater Lake) कहलाता है। दक्षिणी अमेरिका की टिटीकाका झील तथा भारत में महाराष्ट्र का लोनार झील इसके सुन्दर उदाहरण हैं। काल्डेरा (Caldera) का निर्माण क्रेटर के धंसाव से या ज्वालामुखी में पुनः विस्पफोट से क्रेटर के मुख के बड़ा हो जाने से होता है। विश्व का सबसे बड़ा काल्डेरा ‘आसो’ है, जो जापान में स्थित है। कभी-कभी ज्वालामुखी में पुनः विस्फोट से बड़े क्रेटर में अनेक छोटे-छोटे क्रेटरों का निर्माण हो जाता है जिसे घोंसलादार क्रेटर (Nasted Crater) कहते हैं।

गेसर (Gyser) गर्म जल के ऐसे स्रोत हैं जहाँ से समय-समय पर गर्म जल की फुहारें निकलती रहती हैं। इसका सबसे अच्छा उदाहरण U.S.A. के येलोस्टोन नेशनल पार्क (Yellow Stone National Park) में ओल्ड फेथफुल (old faithful) तथा एक्सेल्सियर (Exelsiar) गेसर है। आइसलैंड का ग्रांड (Grand) गेसर भी विख्यात है। धुआँरे (Fumaroles) से गैस व जलवाष्प निकला करते हैं। अलास्का (U.S.A.) के कटमई पर्वत को ‘हजारों धुआँरों की घाटी’ (A valley of ten thousand smokes) कहा जाता है। ईरान का कोह सुल्तान धुआँरा तथा न्यूजीलैंड की प्लेन्टी खाड़ी में स्थित ह्वाइट द्वीप का धुआँरा भी प्रसिद्ध है।

ज्वालामुखी के दरारी उद्भेदन से बैसाल्टिक भाग शान्त रूप से प्रवाहित होकर धरातल के ऊपर मोटी परत के रूप में जमा हो जाता है। इन परतों को लावा पठार या ट्रैप (Trapp) कहते हैं। इसका सबसे अच्छा उदाहरण भारत का ‘दक्कन ट्रैप’ है।

विभिन्न आधारों पर ज्वालामुखी का निम्न प्रकार से वर्गीकरण किया जाता हैः-

(A) सक्रियता के आधार पर :-

1. सक्रिय (Active) ज्वालामुखी : वैसे ज्वालामुखी जिनसे लावा, गैस तथा विखण्डित पदार्थ सदैव निकला करते हैं। वर्तमान समय में उनकी संख्या लगभग 500 है। इनमें सिसली के उत्तर में लेपारी द्वीप का स्ट्राम्बोली (भूमध्यसागर का प्रकाश स्तंभ), इटली का एटना, इक्वेडोर का कोटोपैक्सी (विश्व का सबसे ऊँचा सक्रिय ज्वालामुखी), अंटार्कटिका का एकमात्रा सक्रिय ज्वालामुखी माउंट इरेबस तथा अंडमान-निकोबार के बैरेन द्वीप में सक्रिय ज्वालामुखी प्रमुख हैं।

2. सुषुप्त (Dormant) ज्वालामुखी : अर्थात् वैसे ज्वालामुखी जो वर्षों से सक्रिय नहीं है पर कभी भी विस्फोट कर सकते हैं। इनमें इटली का विसुवियस, जापान का फ्यूजीयामा, इंडोनेशिया का क्राकाताओ तथा अंडमान-निकोबार के नारकोंडम द्वीप में दो सुषुप्त ज्वालामुखी उल्लेखनीय है।

3. मृत (Dead or Extinct) ज्वालामुखी : इसके अंतर्गत वैसे ज्वालामुखी शामिल किए जाते हैं जिनमें हजारों वर्षों से कोई उद्भेदन नहीं हुआ है तथा भविष्य में भी इसकी कोई संभावना नहीं है। अफ्रीका के पूर्वी भाग में स्थित केनिया व किलिमंजारो, इक्वेडोर का चिम्बाराजो, म्यांमार का पोपा, ईरान का देमबन्द व कोहसुल्तान और एंडीज पर्वतश्रेणी का एकांकागुआ इसके प्रमुख उदाहरण हैं।

(B) क्रेटर के आधार परः

1. केन्द्रीय उद्भेदन (Central Erruption) : ज्वालामुखी उदगार जब भारी धमाके के साथ केन्द्रीय मुख से उद्भेदित होता है तो उसे केन्द्रीय उद्भेदन कहते हैं। यह विनाशात्मक प्लेट किनारों के सहारे होता है। इटली का एटना, जापान का फ्यूजीयामा तथा इटली का विसुवियस इसके अच्छे उदाहरण हैं।

2. दरारी उद्भेदन (Flssure Erruption) : भू-गर्भिक हलचलों से भूपर्पटी की शैलों में दरारें पड़ जाती हैं। इन दरारों से लावा धरातल पर प्रवाहित होकर निकलता है जिसे दरारी उद्भेदन कहते हैं। यह रचनात्मक प्लेट-किनारों के सहारे होता है।

ज्वालामुखी का विश्व वितरण : प्लेट विवर्तनिकी के आधार पर ज्वालामुखी क्षेत्रों की व्याख्या वर्तमान में सबसे मान्य संकल्पना है। इसके अनुसार 80% ज्वालामुखी विनाशात्मक प्लेट किनारों पर, 15% रचनात्मक प्लेट किनारों पर तथा शेष प्लेट के आन्तरिक भागों में पाए जाते हैं।

ज्वालामुखियों का मेखलाबद्ध वितरण इस प्रकार है-

1. परि-प्रशान्त महासागरीय मेखला (Circum Pacific Belt) : यहाँ विनाशात्मक प्लेट किनारों के सहारे ज्वालामुखी मिलते हैं। विश्व के ज्वालामुखियों का लगभग 2/3 भाग प्रशान्त महासागर के दोनों तटीय भागों, द्वीप चापों तथा समुद्री द्वीपों के सहारे पाया जाता है। इसे ‘प्रशान्त महासागर का अग्निवलय’ (Fire ring of the Pacific Ocean) कहते हैं। यह पेटी अंटार्कटिका के माउन्ट इरेबस से शुरू होकर दक्षिण अमेरिका के एंडीज पर्वतमाला व उत्तर अमेरिका के रॉकीज पर्वतमाला का अनुसरण करते हुए अलास्का, पूर्वी रूस, जापान, फिलीपींस आदि द्वीपों से होते हुए ‘मध्य महाद्वीपीय पेटी’ में मिल जाती है।

2. मध्य महाद्वीपीय पेटी (Mid-continental Belt) : इस मेखला के अधिकांश ज्वालामुखी विनाशात्मक प्लेट किनारों के सहारे मिलते हैं क्योंकि यहाँ यूरेशियन प्लेट तथा अफ्रीका व इंडियन प्लेट का अभिसरण होता है। इसकी एक शाखा अफ्रीका की भू-भ्रंश घाटी एवं दूसरी शाखा स्पेन व इटली होते हुए काकेशस व हिमालय की ओर आगे बढ़ते हुए दक्षिण की ओर मुड़कर प्रशांत महासागरीय पेटी से मिल जाती है। यह मेखला मुख्य रूप से अल्पाइन-हिमालय पर्वत श्रृंखला के साथ चलती है। भूमध्यसागर के ज्वालामुखी भी इसी पेटी के अन्तर्गत आते हैं। स्ट्राम्बोली, विसुवियस व एटना भूमध्यसागर के प्रसिद्ध ज्वालामुखी हैं। इसी पेटी में ईरान का देमबन्द, कोह सुल्तान, आर्मेनिया का अरारात ज्वालामुखी भी शामिल हैं। यूरोप के अधिकांश ज्वालामुखी इस पेटी में मीडियन मास एवं अफ्रीका के ज्वालामुखी भू-भ्रंश घाटियों के सहारे मिलते हैं। पश्चिम अफ्रीका का एकमात्रा जागृत ज्वालामुखी कैमरून पर्वत है।

3. मध्य अटलांटिक मेखला या मध्य महासागरीय कटकः ये रचनात्मक प्लेट किनारों के सहारे मिलते हैं। जहाँ पर दो प्लेटों के अपसरण के कारण भ्रंश का निर्माण होता है एवं क्रस्ट के नीचे एस्थेनोस्फेयर से पेरिडोटाइट तथा बैसाल्टिक मैग्मा ऊपर उठते हैं। इनके शीतलन से नवीन क्रस्ट का निर्माण होता रहता है। कटक के पास नवीनतम लावा होता है एवं कटक से बढ़ती दूरी के साथ लावा भी प्राचीन होता जाता है। हेकला व लॉकी इस प्रदेश में आइसलैंड के प्रमुख ज्वालामुखी है। एंटलीज दक्षिणी अटलांटिक महासागर के एवं एजोर्स व सेंट हेलेना उत्तरी अटलांटिक महासागर के प्रमुख ज्वालामुखी है।

4. अन्तरा प्लेटीय ज्वालामुखी : महासागरीय या महाद्वीपीय प्लेट के आंतरिक भागों में भी ज्वालामुखी क्रियाएँ देखी गई हैं जिन्हें माइक्रो प्लेट गतिविधि एवं गर्म स्थल (Hot Plums) की संकल्पना द्वारा समझा जा सकता है। प्लेट विवर्त्तनिकी सिद्धांत द्वारा इनका स्पष्टीकरण अभी तक नहीं हो सका है। हवाई द्वीप से लेकर कमचटका तक के ज्वालामुखी, पूर्वी अफ्रीका के भू-भ्रंश घाटी के ज्वालामुखी एवं ज्वालामुखी के दरारी उद्भेदन से बने कोलम्बिया पठार, पराना पठार, दक्कन का लावा पठार अंतरा प्लेट ज्वालामुखी क्रियाओं के अन्तर्गत शामिल किए जा सकते हैं।