सूफी आंदोलन
सूफीयों के निम्न तर्क -
अरब देशों में ‘सफा’ भेड़ की ऊन से बने हुए वस्त्रों को धारण करने वाले लोग ‘सूफी’ कहलाए।
इतिहासकार युसुफ मोहम्मद के अनुसार, हजरत पैगम्बर मोहम्मद साहब ने ‘सफा’ नामक पहाड़ी पर एक मस्जिद का निर्माण करवाया जिसमें आश्रय लेने वाले लोग जिन्होंने अल्लाह का प्रचार किया, वे सूफी कहलाए।
सूफी शब्द:-
सूफी शब्द अरबी भाषा का शब्द है जिसका शाब्दिक अर्थ होता है पवित्रता।
सूफी शब्द ‘सफा’ से बना है जो यूनानी भाषा के शब्द ‘सोफिया’ का रुपान्तरण है सोफिया का शाब्दिक अर्थ रहस्यमयी ज्ञान होता है।
सूफी लोगों ने जिस विचारधारा को आगे बढ़ाया उसे सूफीवाद कहते हैं।
सम्पूर्ण सूफीवाद 12 सिलसिलों (सम्प्रदाय) में विभाजित था।
सूफी आंदोलन के कारण-
कर्मकाण्डी व्यवस्था को समाप्त करने।
जनता के नैतिक उत्थान व वर्ण व्यवस्था में सुधार करना।
Note:- सूफी जन सामान्य भाषा में प्रचार-प्रसार किया करते थे। वह राजनीति से दूर रहते थें।
सूफी आंदोलन की प्रमुख शिक्षाएँ-
एकेश्वरवादी
इबादत पर अत्यधिक बल (पूजा)
दिन में पाँच बार नमाज अदा करना।
दान-दक्षिणा देना।
हज यात्रा करना।
सूफी आंदोलन का प्रारंभ-
सूफी आंदोलन का प्रारंभ ईरान से माना जाता है।
यह 12 सिलसिलों में विभाजित था तथा प्रत्येक सिलसिलें का एक धार्मिक गुरू जिसे “पीर” कहा जाता था।
इस विचारधारा में गुरू (पीर) व शिष्य (मुरीद) के संबंधों पर अत्यधिक बल दिया जाता था।
भारत में सूफी आंदोलन का प्रारंभ-
प्रथम तुर्क आक्रांता महमूद गजनवी के समय पहली बार सूफी संत भारत आए।
1005 ई. में महमूद की पंजाब विजय के समय शेख इस्माइल भारत आने वाले प्रथम सूफी संत थे।
भारत आने वाले दूसरे सूफी संत “शेख अली बिन उस्मान उल हुजबेरी” थे।
12वीं शताब्दी में एक और अन्य संत “सैय्यद अहमद सखी सखर” भारत आए जो लखदाता के नाम से प्रसिद्ध हुए।
मौहम्मद गौरी के तराइन के द्वितीय युद्ध के समय (1192 ई.) ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती भारत आए।
सूफी शब्दावली-
पीर-गुरू को पीर कहा जाता था।
मुरीद- शिष्य को कहते थे।
वली- गुरू का उत्तराधिकारी वली कहलाता था।
खानकाह- दरगाह (मठ) सूफियों का निवास स्थान
फना & समा- सूफी विचार धारा के लोग ईश्वर को अपना महबूब मानते हैं, तथा स्वयं को महबूबा मानते हैं।
ईश्वर को रिझाने हेतु “संगीत (कव्वाली) गाते हैं जिसे समा कहा जाता है। इसी के माध्यम से ईश्वर में विलीन हो जाना (अर्थात मोक्ष की प्राप्ती) समा कहलाता है।
मजार- समाधी स्थल को कहते थे।
तसव्वुफ- विभिन्न रहस्यात्मक प्रवृतियाँ या आंदोलन।
मलफूजात- सूफी संतों की विचारधारा या उनके उपदेशों का संकलन।
मकतुबात- सूफी संतों के पत्रों का संकलन।
विलायत- राज्य नियंत्रण से मुक्त क्षेत्र।
खलीफा- इस्लाम धर्म का सर्वोच्च धार्मिक गुरू
उलेमा- धार्मिक गुरू।
काजी- धार्मिक न्यायाधीश।
भारत में इस्लाम रहस्यवाद पर लिखी गई प्रथम पुस्तक “कश्फ-उल-महजूब” इसके लेखक हुजवेरी थे।
भारत में प्रथम दो रहस्यवादी संत हुए
राबिया (8वीं सदी) इनकी तुलना महान महिला संत मीराबाई के साथ की जाती है।
मसूर बिल अल हज्जाज(10वीं सदी) यह अपने आप को अनलक (अर्थात ईश्वर) घोषित कर दिया लेकिन लोगों ने इन्हें फाँसी पर लटका दिया।
सूफी विचार धारा में दो मत माने जाते है-
वहदत-उल-वुजूद- यह एक ही ईश्वर में विश्वास करने वाले (एकेश्वरवादी) इनके पर्वतक इब्न-उल-अरबी को माना जाता है।
वहदत-उल-सुदूब- यह आत्मा व परमात्मा में दास व मालिक का संबंध मानते है इसके पर्वतक शेख- अहमद सरहिन्दी है।
नोट:- इन दोनों विचारधारों का परम लक्ष्य ईश्वर की प्राप्ति करना है।
सूफी आंदोलन की दो विचारधाराएँ-
बा-शरा- इस विचारधारा में इस्लामी कानून शरीयत में विश्वास रखने वाले लोग थे तथा यह विचारधारा आगे चलकर अनेक शाखाओं में विभाजित हुई। जैसे- चिश्ती, सुहरावर्दी, कादरी, नक्शबंदी, फिरादौसी व सतारी।
बे-शरा- इस विचारधारा में लोग शरीयत में विश्वास नहीं करते थे वह भम्रणशील हुआ करते थे।
यह विचार धारा आगे जा कर समाप्त (पतन) हो गई।
भारत में इन सिलसिलों के आगमन का सही क्रम:-
चिश्ती (सबसे प्राचीन सिलसिला)®सुहरावर्दी® फिरदोसी®सत्तारी®कादरी®नक्शबंदी(सबसे नवीनतम सिलसिला)
चिश्ती सिलसिला- भारत में चिश्ती सिलसिले के संस्थापक ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती को माना जाता है। तथा भारत से बाहर हैरात में इस सिलसिले का संस्थापक अबु अब्दाल चिश्ती (खुरासान निवासी) को माना जाता है।
सुफीयों में सांसारिक वस्तुओं के प्रति मोह-माया नहीं होती है। व विश्व परित्याग की भावना रखते है व वैरागी जीवन व्यतित करते हैं (जिसे तर्क-ए-दुनिया कहा जाता है।)
ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती:-
इनका जन्म 1141 ई. में सिस्तान (ईरान) के सिंजरी नामक स्थान पर हुआ था।
इनके पिता का नाम हजरत मौहम्मद गयासुद्दीन व माता का नाम बीबी माहेनूर था।
इनकी उपाधि सुल्तान-उल-हिन्द (हिन्द का आध्यात्मिक गुरू) मौहम्मद गौरी द्वारा प्रदान की गई।
इनके गुरू का नाम हजरत शेख उस्मान हारूनी था।
ख्वाजा साहब चिश्ती सिलसिले के 8वें संत (गुरू) थे।
मोइनुद्दीन चिश्ती 1192 ई. में तराइन के द्वितीय युद्ध के समय मुहम्मद गौरी के साथ पृथ्वीराज चौहान III के शासन काल के दौरान भारत आए थे।
इनकी मृत्यु के बाद (1230 ई.) इनकी दरगाह का निर्माण अजमेर में ही किया गया।
कुछ इतिहासकारों के अनुसार “ख्वाजा साहब” की कच्ची मजार का निर्माण इल्तुतमिश द्वारा व पक्की मजार का निर्माण मालवा के सुल्तान मोहम्मद खिलजी के द्वारा 1464 ई. में करवाया गया।
ख्वाजा साहब का उर्स रज्जब की प्रथम तारीख से रज्जब की छठी तारीख तक अजमेर में लगता है। इसे साम्प्रदायिक सद्भाव का मेला भी कहा जाता है।
ख्वाजा साहब के भक्त इन्हें गरीब नवाज (गरीबों का हितेशी) कहकर पुकारते थे।
ख्वाजा साहब ने बृज भाषा में अनेक साहित्यों की रचना की।
ख्वाजा साहब की जीवनी “मिर्जा वहाउद्दीन बेग” द्वारा लिखी गई।
ख्वाजा साहब की दो शिष्य शेख हमीमुद्दीन नागौरी व कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी हुए
शेख हमीमुद्दीन नागौरी-
1192 ई. में ही ख्वाजा साहब के साथ (गौरी की सेना के साथ) भारत आए थे।
इन्होंने मोइनुद्दीन चिश्ती के आदेश पर नागौर को अपनी कर्मस्थली बनाया
उपाधियाँ:-
शेख-उल-इस्लाम- यह उपाधि सुल्तान इल्तुतमिश द्वारा प्रदान की गई थी।
सुल्तान-उल-तारकीन- यह उपाधि मोइनुद्दीन चिश्ती द्वारा दी गई थी। जिसका अर्थ होता है संन्यासीयों का सुल्तान
इन्होंने अपना संपूर्ण जीवन- कृषि के माध्यम से निर्वाह किया (किसान के रूप में)
मृत्यु- 1174 ई. में इनकी दरगाह का निर्माण नागौर में निगाणी तालाब के समीप किया गया, यहीं पर इनके उर्स का आयोजन कृष्ण जन्माष्टमी के दिन किया जाता है, जो राज. दूसरा सबसे बड़ा उर्स माना जाता है।
राज. का सबसे बड़ा उर्स ख्वाजा साहब का उर्स माना जाता है।
कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी:-
इनका जन्म 1186 ई. में फरगना (उजबेगिस्तान) में हुआ।
यह दिल्ली सल्तनत के शासक कुतुबुद्दीन ऐबक के समकालीन थे तथा ऐबक के आध्यात्मिक गुरू भी थे।
दिल्ली को इन्होंने अपनी कार्य स्थली बनाया
ऐबक ने इन्ही के नाम पर कुतुबमिनार का निर्माण करवाया।
ऐबक ने इन्हीं के नाम पर उत्तरभारत की प्रथम मस्जिद कुत्बल-उल-इस्लाम का निर्माण करवाया
बख्तियार काफी के शिष्य- शेख फरीदुद्दीन (गज-ए-शक्कर) बाबा फरीद हुए।
शेख फरीदुद्दीन (“बाबा फरीद- गज-ए-शक्कर”)
1175-1265 ई.
जन्म- मुल्तान में हुआ।
बाबा फरीद के परिवार को प्रात्साहित करने के कारण यह मुल्तान से अजोधन चले गए-इसे ही अपनी कर्मस्थली बनाया।
सिक्ख परम्परा में इन्हें बाबा फरीद के नाम से जाना जाता है।
गुरू नानक इनसे बेहद प्रभावित थे।
इनकी कुछ रचनाएँ “आदिग्रंथ” में शामिल है।
बाबा फरीद पंजाबी भाषा के प्रथम कवि माने जाते है।
भारत में चिश्ती सिलसिले के तीसरे प्रसिद्ध संत थे।
वृद्धावस्था में इन्होंने तीन विवाह किए।
बलबन के दामाद थे।
इनकी मजार अजोधन (पाक) में है।
निजामुद्दीन औलिया(1238-1325 ई.)
निजामुद्दीन औलिया का मूल नाम मौहम्मद बिन अहमद बिन दानियल अल बुखारी था।
इनका जन्म बदायुं (उत्तरप्रदेश) में हुआ।
इनके पिता का नाम अहमद बदायनी व माता का नाम बी.बी जुलैखा था।
इनके गुरू बाबा- फरीद (गज-ए-शक्कर) थे जिनसे इनकी मुलाकात अजोधन (पाक) में हुई थी।
औलिया आजीवन अविवाहित रहें।
औलिया सूफी सिलसिले के सबसे प्रसिद्ध संत माने जाते है। इन्होंने योग व प्राणायाम के माध्यम से सूफी आंदोलन को लोकप्रिय बनाया।
योग व प्राणायाम की विधि को “हब्स-ए-दम” कहा जाता था, इसी कारण इन्हें “योगी फकीर, सिद्ध योगी व प्रथम योगी” भी कहा जाता है।
यह हिन्दु-मुस्लिम एकता के प्रवर्तक थे।
दोनों समुदायों के प्रति उदारवादी दृष्टिकोण रखने के कारण इन्हें “महबूब-ए-इलाही” (ईश्वर का सच्चा प्रेमी) व “कुतुब-ए-देहली” कहा जाता था।
इन्होंने दिल्ली के सात सुल्तानों का शासनकाल देखा था, परन्तु किसी के दरबार में नहीं गए।
गयासुद्दीन तुगलक ने इनकी लोकप्रियता से प्रभावित होकर जब वह बंगाल अभियान पर थे तब औलिया को पत्र लिखकर “दिल्ली छोड़ने” का आदेश दिया, औलिया ने प्रत्युत्तर में लिखा की “दिल्ली अभी दूर है” गयासुद्दीन तुगलक की अफगानपुर (दिल्ली के समीप) में लकड़ी के महल गिरने से दिल्ली पहुँचने से पहले ही मृत्यु हो गई।
अलाउद्दीन खिलजी ने पत्र लिखकर ‘औलिया से मिलने की अनुमति मांगी’ लेकिन औलिया ने प्रत्युत्तर में लिखा की मेरे घर के दो दरवाजें है सुल्तान एक से अंदर आएगा तो में दूसरे से बाहर चला जाउंगा।
निजामुद्दीन औलिया का मकबरा दिल्ली में स्थित है।
इनकी अंतिम इच्छा थी कि इनकी कब्र पर कोई मकबरा ना बनाए पर ‘मौहम्मद बिन तुगलक’ ने इनका मकबरा बनवा दिया।
इनके मकबरे के समीप इनके परम शिष्य अमीर खुशरों व शाहजहाँ की पुत्री ‘जहानआरा’ की कब्र भी बनी हुई है।
औलिया के उपदेशों व कथनों का संकलन “हसन सिज्जी” द्वारा फारसी भाषा में “फवायद-उल-फवाद” के नाम से किया गया।
निजामुद्दीन औलिया के दो प्रमुख शिष्य-
नासिरूद्दीन (चिराग-ए-दिल्ली)
इनके ग्रंथ का नाम तौहिद-ए-वजूदी है।
100 वार्ताओं का संकलन “खैर-ए-मजलिस” कहलाता है जिसका संकलन हमिद कंलदर द्वारा किया गया।
नासिरूद्दीन के शिष्य का नाम सैय्यद महमूद गेसूदराज(बंदा नवाज) था, जिन्होंने दक्षिण भारत के गुलबर्गा (कर्नाटक) में चिश्ती सिलसिले की नींव रखी।
अमीर खुसरो
अमीर खुसरो को तोता-ए-हिंद कहा जाता है।
इन्होंने सीतार और तबले का आविष्कार किया।
हिन्दी ग्रंथों का अरबी भाषा में अनुवाद किया।
इनके ग्रंथ का नाम “नूर-ए-सिपेहर” जिसका शाब्दिक अर्थ “खुला आसमान” होता है।
इन्हें उर्दू का प्रथम शायर माना जाता है।
अन्य महत्वपूर्ण सूफी संत-
शेख सलीम चिश्ती- यह मुगलकाल में सबसे लोकप्रिय चिश्ती संत माने जाते थे तथा यह अकबर के आध्यात्मिक गुरू थे।
इनके आशीर्वाद से जाहाँगीर का जन्म हुआ तथा इन्हीं के नाम पर जाहाँगीर के बचपन का नाम सलीम रखा गया।
शेख सलीम चिश्ती का मकबरा फतेहपुर सिकरी में स्थित है।
शेख अब्दुल कद् दुस-
इनका उपनाम गांगोही था। यह सिकन्दर लोदी व बाबर के समकालीन माने जाते है।
इनकी मजार गांगौह सहारनपुर (उत्तर प्रदेश) में स्थित है।
इनकी कविताओं का संग्रह अलख के नाम से प्रसिद्ध है।
चिश्ती संप्रदाय की तीन शाखाएँ- नागौरी, साबरी व निजामी मानी जाती है।
सुहरावर्दी संप्रदाय-
इसकी स्थापना बगदाद में शिहाबुद्दीन सुहरावर्दी के द्वारा की गई।
भारत में इसकी स्थापना (पंजाब व सिंध) शेख बहाउद्दीन जकारिया द्वारा की गई।
इसे लोकप्रिय बनाने का श्रेय जलालुद्दीन तबरीजी को माना जाता है।
सुहरावर्दी संप्रदाय की विशेषता-
चिश्ती सिलसिले के विपरित जीवन यापन करते थे।
यह भोग विलास जीवन व्यतित करते थे।
सक्रिय राजनीति में भाग लेते थे।
यह बड़े-बड़े राजकीय पद धारण करना जैसे “सद्र-ए-विलायत”
इस सिलसिले के सबसे प्रसिद्ध संत शेख जलालुद्दीन सुर्ख बुखारी जिन्होंने 36 बार मक्का की यात्रा की जिस कारण इन्हें “जहानीयाँ-ए-जहाजश्त” (विश्व भम्रण करने वाला) कहा जाता है।
कादरी सिलसिला-
यह सिलसिला इस्लाम का प्रथम रहस्यवादी पंथ माना जाता है।
इसका संस्थापक शेख-अब्दुल कादिर जिलानी को माना जाता है।
भारत में इका संस्थापक नासिरूद्दीन मोहम्मद सैयय्द जिलानी को माना जाता है।
कादरी सिलसिले की विशेषता-
दारा शिकोह इसी सिलसिले से प्रभावित थे।
लाहौर में इस संप्रदाय के सबसे प्रसिद्ध संत “शेख मीर मोहम्मद” (मियाँ मीर) हुए जो उदारवादी विचारधारा के संत थे जिन्होंने हिन्दु-मुस्लिम एकता को बढ़ावा दिया।
पाँचवे सिक्ख गुरू “अर्जुनदेव” ने स्वर्ण मंदिर की नींव “मियाँ मीर” से रखवाई थी।
नक्शबंदी सिलसिला-
इसकी स्थापना बगदाद में ख्वाजा बहाउद्दीन द्वारा की गई।
भारत में इस सिलसिले का संस्थापक ख्वाजा बाकी बिल्लाह को माना जाता है।
नक्शबंदी सिलसिले की विशेषता-
इस सिलसिले को इस्लाम में सबसे कट्टर सिलसिला माना जाता है।
बाकी बिल्लाह के शिष्य “शेख अहमद सरहिन्दी” ने स्वयं को मुजहिद (ईश्वर) घोषित कर बादशाह अकबर के विरुद्ध फतवा जारी किया था।
1619 ई. में जहाँगीर ने इसे जेल में डाल दिया।
औरंगजेब नक्शबंदी से प्रभावित था इसी कारण इसने हिन्दु मंदिरों को तुड़वाया।