पादपों में पोषण (Nutrition in Plants) –
· जैविक क्रियाओं, वृद्धि, विकास एवं जनन के लिए पौधों में मुख्यतया मृदा से खनिज-लवण प्राप्त किए जाते हैं। इसे ही पोषण (Nutrition) कहते हैं।
· ‘वॉन हेलमॉण्ट' ने सर्वप्रथम प्रेक्षित किया कि पौधे की वृद्धि के साथ मृदा के वजन में कमी आने लगती है।
· ‘वुडयार्ड' ने सर्वप्रथम बताया कि पौधे अपना पोषण मृदा से प्राप्त करते हैं।
· लीबिंग के न्यूनता सिद्धांत (Law of Minimum) के अनुसार मृदा में जिस पोषक तत्त्व की सबसे ज्यादा कमी होती है, वही तत्त्व पादप वृद्धि को सबसे ज्यादा प्रभावित करता है।
‘जूलियस साक्स' ने सर्वप्रथम बताया कि यदि पोषक तत्त्व पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हों, तो पौधे मृदा के अलावा केवल जल में भी वृद्धि कर लेते हैं।
हाइड्रोपॉनिक्स – जल में पौधे उगाना।
· हाइड्रोपॉनिक्स एक ग्रीक शब्द है, जिसका अर्थ जल के साथ कार्य करना है। इस विधि में पौधों को उगाने के लिए मिट्टी के अतिरिक्त पोषक विलयनों का प्रयोग किया जाता है। शुरुआत में बालू, पोषक घोल प्रयोग में लिए जाते थे, लेकिन वर्तमान में पौधों के संवर्धन के लिए वर्मीकुलाइट (यह एक खनिज पदार्थ है, जिसे विशेष प्रकार की ताप भटि्टयों में 2000°F तक गर्म करके प्राप्त किया जाता है।) का प्रयोग किया जाता है। यह तकनीक वर्मीकुलोपोनिक्स कहलाती है।
एयरोपॉनिक्स – नम/आर्द्र वायु में पौधे उगाना।
बोनसाई तकनीक – गमले में पेड़ उगाना।
· ‘आर्नन व स्ट्राउट' के अनुसार पोषक तत्त्व (Nutrients) वे होते हैं, जो
(i) पौधे की वृद्धि, उपापचयी क्रियाओं व जनन के लिए आवश्यक हो।
(ii) जिसकी कमी को किसी अन्य तत्त्व से दूर न किया जा सके।
(iii) जिनकी कमी से कोई रोग हो जाए तथा वह रोग केवल उसी तत्त्व को उपलब्ध कराने से ठीक भी हो जाए।
· पौधे के शुष्क भार (Dry Weight) में पोषक तत्त्वों की मात्रा के आधार पर इन्हें 2 भागों में बाँटा गया है -
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वृहद् पोषक तत्त्व (Macronutrients) |
सूक्ष्म पोषक तत्त्व (Micronutrients) |
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· ये पौधे के शुष्कभार के प्रति ग्राम में लगभग 1-10 मिलीग्राम तक। · C, H, N, O, P, S, Mg, K, Ca |
· ये पौधे के शुष्कभार के प्रति ग्राम में लगभग 0.1 मिलीग्राम या इससे कम · Fe, Mn, Cu, Mo, Zn, B, Cl |
C, H एवं O/कार्बन, हाइड्रोजन एवं ऑक्सीजन –
· ये पौधों में लगभग 95% भार के रूप में पाए जाते हैं।
· इन्हें सामान्यतया खनिज-तत्त्वों की श्रेणी में नहीं रखा जाता है।
· पौधे इन्हें जल तथा वायु से प्राप्त करते हैं।
· ये पौधों में प्रकाश-संश्लेषण, श्वसन एवं वृद्धि (Growth) के लिए आवश्यक।
नाइट्रोजन (N) –
· हरे पौधों में नाइट्रोजन मृदा से नाइट्रेट आयन (\(\mathrm{NO}_{3}^{-}\)) के रूप में अवशोषित।
· ये प्रोटीन, न्यूक्लिक अम्ल, विटामिन व क्लोरोफिल का मुख्य घटक / हॉर्मोन्स व को-एन्ज़ाइम्स में भी उपस्थित।
· N की कमी से तने की असमान वृद्धि, जड़ तंत्र का विकास न होना तथा पत्तियों का पीलापन जैसे - लक्षण दिखाई देते हैं।
· पौधों को सबसे अधिक मात्रा में नाइट्रोजन की आवश्यकता होती है।
· इसकी आवश्यकता विभज्योतक व सक्रिय उपापचयी वाली कोशिकाओं की नाइट्रोजन न्यूक्लिक अम्ल, प्रोटीन, विटामिन तथा हाॅर्मोन का मुख्य घटक है।
· रासायनिक उर्वरकों के रूप में यूरिया N का प्रमुख स्त्रोत है। इनकी कमी से पत्तियों में हरिमाहीनता हो जाती है।
फॉस्फोरस (P) –
· फॉस्फोरस मृदा पौधों द्वारा अकार्बनिक अवस्था (मृदा की PH कम होने पर) \(H_{2} P o_{4}^{-}\) आयन तथा PH अधिक होने पर \(H_{2} P o_{4}^{-2}\) आयन्स के रूप में अवशोषित किया जाता है।
· ATP व ADP के रूप में ऊर्जा उपापचय से संबंधित, कोशिका झिल्ली निर्माण में सहायक, बीजों के अंकुरण में सहायक।
· इसकी कमी से पत्तियों में नेक्रोसिस, एन्थोसायनिन वर्णक जमाव (पत्तियाँ नीली हो जाना) तथा हंसियाकार/Sickle-Shaped पत्तियाँ दिखाई देती हैं।
· यह सभी फॉस्फेटीकरण की अभिक्रियाओं के लिए आवश्यक होते हैं।
· इनकी कमी से पत्तियों तथा फलों में ऊतकक्षय क्षेत्र बन जाते हैं तथा कैम्बियम की सक्रियता कम हो जाती है।
सल्फर (S) –
· मृदा से \(S o_{4}^{-2}\) (सल्फेट आयनों) के रूप में अवशोषित।
· सल्फर (S) अमीनो अम्ल निर्माण (सिस्टीन, मैथिऑनिन) में सहायक, प्याज व लहसुन की विशेष गंध सल्फर युक्त यौगिकों के कारण तथा लैग्यूमिनेसी पौधों (फलीदार) की जड़ों में ग्रंथियों के निर्माण में सहायक।
· S की कमी से तने की लंबाई कम, पत्तियों में हरिमाहीनता/क्लोरोसिस, पत्तियों के किनारों का मुड़ना, चाय की पत्तियों का पीलापन आदि लक्षण दिखाई देते हैं।
· यह तत्त्व प्रोटीन संश्लेषण में प्रयुक्त आवश्यक अमीनो अम्ल के संश्लेषण में सहायक है।
· यह विटामिन B तथा Co.A में उपस्थित होता है।
· इनकी कमी से मोटी भित्ति युक्त ऊतकों जैसे स्कलेरेनकाइमा, जाइलम, कोलेन्काइमा आदि की मात्रा में वृद्धि हो जाती है।
पोटेशियम (K) –
· एकमात्र एकसंयोजी धनायन जो 'K+' आयन के रूप में मृदा से अवशोषित।
· परासरण क्रिया नियमन, रंध्र (Stomata) की गति, कोशिका झिल्ली निर्माण व पोषक पदार्थों के परिवहन में सहायक।
· इसकी कमी से वाष्पोत्सर्जन व प्रकाश संश्लेषण क्रिया प्रभावित। पौधे झाड़ीनुमा हो जाती है। (रोजे़ट वृद्धि), प्रोटीन संश्लेषण भी प्रभावित।
· सबसे ज्यादा विभज्योतक कलिकाओं, पत्तियों और मूलशीर्ष के लिए आवश्यक होता है।
· यह कोशिकाओं में धनायन व ऋणायन का संतुलन बनाए रखता है। रन्ध्रों के खुलने और बंद होने का नियंत्रण, एन्जाइम सक्रियता को बढ़ाता है।
- कोशिकाओ की स्फीत्तता को बनाए रखने के लिए जरूरी।
कैल्शियम (Ca) –
· मृदा से Ca+2 आयन्स के रूप में अवशोषित।
· Ca कोशिका भित्ति की मध्य पटलिका (Middle lamella) के निर्माण में सहायक, एन्जाइमों का सक्रियकारक, कोशिका विभाजन में सहायक।
· Ca की कमी से विभाजन में तर्कु निर्माण (Spindle formation) प्रभावित। पत्तियों में क्लोरोसिस, जड़ों का विकास न हो पाना, पुष्पन की क्रिया प्रभावित।
· सबसे अधिक कैल्शियम की आवश्यकता विभाजित होने वाले ऊतकों को होती है, क्योंकि कोशिका विभाजन के समय मध्य पटलिका का निर्माण कैल्शियम पैक्टेज से होता है।
· यह पुरानी पत्तियों की अधिचर्म कोशिकाओं में कैल्शियम ऑक्सीलेट के रूप में जमा होता है।
· यह तर्कु तन्तुओं के रूप में भी आवश्यक होता है।
· यह मृदा में एपेटाइट, कैल्साइट तथा डोलोमाइट अयस्कों के रूप में पाया जाता है।
मैग्नीशियम (Mg) –
· मृदा से Mg+2 आयन्स के रूप में अवशोषित।
· Mg भी मध्य पटलिका (Middle lamella) के निर्माण में सहायक।
· क्लोरोफिल का प्रमुख घटक तत्त्व।
· यह तत्त्व राइबोसोम की दोनों उप इकाइयों को आपस में जोड़ता है।
· एन्थोसायनिन वर्णकता, प्रोटीन संश्लेषण भी प्रभावित, हरिमाहीनता (Chlorisis)
· प्रकाश संश्लेषण तथा श्वसन के एन्जाइमों को सक्रिय करता है।
· DNA तथा RNA के संश्लेषण में शामिल होता है।
· यह क्लोरोफिल के केंद्र में पाया जाता है तथा उसकी संरचना को बनाए रखता है।
· तैलीय बीजों में इनकी मात्रा सर्वाधिक होती है।
लौह तत्त्व/आयरन (Fe) –
· मृदा से फेरिक (Fe+3) तथा फेरस Fe+2 आयनों के रूप में अवशोषित।
· Fe+2 अवस्था ही उपापचयी रूप से सक्रिय।
· एन्जाइम्स का सक्रियकारक, प्रकाश-संश्लेषण एवं विभिन्न उपापचयी क्रियाओं के सहायक के रूप में कार्य (क्लोरोफिल निर्माण)
· नेक्रोसिस/ऊतक क्षय, क्लोरोफिल निर्माण प्रभावित (विशेषतया नई पत्तियों में)
· यह तत्त्व साइटोक्रोम वर्णकों की संरचना, क्रेब्स चक्र, एकोनिटेज केटेलेज तथा परऑक्सीडेज एन्जाइमों के सक्रियक के रूप में प्रयुक्त होता है।
· यह तत्त्व श्वसन, ETS तथा कोशिका विभाजन के विभिन्न चरणों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
मैंगनीज (Mn) –
· मृदा से Mn+2 आयन के रूप में अवशोषित।
· यह मृदा में मुख्यत: MnO2 के रूप में पाया जाता है।
· मैंगनीज एन्जाइमों के सक्रियकारक, को-एंजाइम्स के रूप में श्वसन व प्रकाश संश्लेषण में सहायक/जल अपघटन में भी सहायक।
· पत्तियों में क्लोरोसिस, धब्बों/Spots का बनना। जैसे - जौ एवं मटर में।
· इनकी कमी से जई में ग्रे स्पिक तथा मटर में मार्श स्पाट रोग होते हैं।
· क्लोरोप्लास्ट में इस तत्त्व की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है।
कॉपर (Cu) –
· मृदा से Cu+2 आयन्स के रूप में अवशोषित हालाँकि इसकी अधिकता से पौधों में पुष्पन नहीं होता है।
· पोषक पदार्थों में संतुलन, एन्जाइम्स का सक्रियकारक
· Cu की कमी से जनन क्रिया प्रभावित, एक्सेनथीमा नामक रोग, जिसमें पौधे के वायवीय भागों पर गोंद के समान चिपचिपा पदार्थ उत्पन्न होता है।
· यह तत्त्व ऑक्सीकरण अपचयन अभिक्रिया में इलेक्ट्रॉन वाहक का कार्य करता है।
· यह तत्त्व साइटोक्रोम ऑक्सीडेज तथा प्लास्टोसाइनिन का मुख्य घटक है, जो प्रकाश संश्लेषण में इलेक्ट्रॉन वाहक के रूप में कार्य करता है।
· इस तत्त्व की कमी से शीर्षारंभी रोग (नीबू) होता है।
मॉलिब्डेनम (Mo) –
· \(M o O_{4}^{-2}\) – मॉलिण्डेट आयन्स के रूप में अवशोषित।
· उपापचयी क्रियाओं में एन्जाइम्स के सक्रियकारक (Activator) के रूप में सहायक, वृद्धि के लिए आवश्यक। एस्कॉर्बिक अम्ल संश्लेषण एवं N2 स्थिरीकरण में सहायक।
· वृद्धि मंदित, हरिमाहीनता एवं उपापचयी क्रियाएँ प्रभावित।
· इनकी कमी से फूल गोभी में व्हिप टेल रोग होता है, जिसमें पौधे की पत्तियाँ विकृत हो जाती है।
· यह तत्त्व नाइट्रोजिनेज एन्जाइम तथा नाइट्रेट रिडक्टेज का मुख्य कारक है, जो नाइट्रोजन स्थिरीकरण करते हैं।
जिंक (Zn) –
· मृदा Zn+2 आयन्स के रूप में प्रभावित।
· प्रोटीन संश्लेषण, अमीनो अम्ल (ट्रिप्टोफैन) उपापचय, पोषक तत्त्वों के उपापचय का नियमन।
· इसकी कमी से पौधे के वायवीय भागों की वृद्धि प्रभावित, पुष्पन एवं फल निर्माण भी प्रभावित हाेते हैं।
· पादप वृद्धि हॉर्मोन्स ऑक्सिन (IAA) के संश्लेषण में महत्त्वपूर्ण उपयोगी है।
· इस तत्त्व की कमी से लघु पर्ण रोग होता है।
बोरॉन (B) –
· मृदा से H3BO3/बोरिक अम्ल या टेट्राबोरेट आयन्स के रूप में अवशोषित।
· पेक्टिन निर्माण, शर्करा स्थानांतरण आदि।
· B की कमी से कोशिका दीर्घीकरण/Elongation नहीं, जिससे जड़ों की वृद्धि प्रभावित, पुष्पन नहीं हो पाता है।
· यह तत्त्व मृदा में उपस्थित कैल्शियम तत्त्व के साथ कैल्शियम बोरेट बनाता है।
· यह तत्त्व पौधों में कोशिका झिल्ली की कार्यशीलता, कार्बोहाइड्रेट के स्थानांतरण, परागकणों के अंकुरण तथा कोशिका विभाजन में सहायक होते हैं।
क्लोरीन (Cl) –
· मृदा से क्लोराइड आयन्स (Cl–) के रूप में अवशोषित।
· प्रकाश संश्लेषण में सहायक, Na+–K+ आयन्स का संतुलन, परासरण नियमन में सहायक।
· इस तत्त्व के कारण प्रकाश संश्लेषण प्रभावित, जल संतुलन प्रभावित होती है।
· यह सोडियम व पोटेशियम आयन के साथ मिलकर कोशिकाओं में विलेय सान्द्रता तथा धनायन, ऋणायन का संतुलन बनाए रखता है।
· जल के प्रकाश अपघटन में सहायक।
· इस तत्त्व की कमी से पत्तियों में चितकबरी हरिमाहीनता उत्पन्न होती है, जो अन्त में ऊतक क्षय में परिणित हो जाती है।
अन्य तत्त्व -
सोडियम (Na) –
· यह नीलहरित शैवालों के विकास के लिए तथा न्यूक्लियोप्रोटीन के संश्लेषण में आवश्यक।
सिलिकन (Si) –
· यह डाइटम शैवाल तथा इक्वीसीटम की कोशिका भित्ति का घटक तथा विभिन्न प्रकार की घास में पाया जाता है।
सेलेनियम (Se) –
· Atriplex पादप में यह तत्त्व कोशिका भित्ति की पारगम्यता को बनाए रखता है।
निकल (Ni) –
· पौधे Ni+2 के रूप में अवशोषित करते हैं।
· इस तत्त्व को डाल्टन द्वारा वर्ष 1988 में अनिवार्य तत्त्व के रूप में सम्मिलित किया गया।
· यह तत्त्व यूरिएज एन्जाइम का महत्त्वपूर्ण घटक है, जो कि जड़ों की जल अवशोषण क्षमता बढ़ाता है।
· पौधों को इस तत्त्व की आवश्यकता सामान्यत: कम होती है, लेकिन जौ पादपों में इसकी कमी से जीवन अक्षम बीज उत्पन्न होते हैं।