-           राजनीतिक गत्यात्मकता से तात्पर्य ऐसे कारकों से है जो राजनीति को गतिशीलता प्रदान करते हैं। भारत में राजनीतिक गतिशीलता को निम्न कारक निर्धारित करते हैं-

जाति

-           जाति मतदाताओं के व्यवहार को प्रभावित करने वाला एक महत्वपूर्ण कारक है। जातियों का राजनीतिकरण तथा राजनीति में जातिवाद भारतीय राजनीति की महत्वपूर्ण विशेषता रही है।

-           भारतीय राजनीति में विकास या अन्य मुद्दों  की तुलना में जाति प्रमुख घटक है। भारत में राजनीति तथा जाति का सम्बन्ध परम्परागत भारतीय समाज तथा आधुनिक राजनीतिक प्रक्रिया का अन्त:सम्बन्ध है। स्वतंत्रता के बाद भारतीय राजनीति में जाति के प्रभाव में वृद्धि हुई है। जातियों ने अपने आप को संगठित कर वोट बैंक तथा सत्ता परिवर्तन का प्रयास किया है।

-           भारतीय समाज की प्रकृति जातिगत संरचना पर आधारित है, अर्थात् बिना जातिगत समीकरण के भारतीय राजनीतिक प्रक्रिया को नहीं समझा जा सकता है।

जाति की परिभाषा-

-           एक सर्वमान्य परिभाषा के अनुसार जाति जन्म से आधारित व्यवस्था है जिसमें व्यक्ति का निर्धारण जन्म  से होता है ना कि उसकी योग्यता से।

भारत की राजनीति में जाति की भूमिका के संदर्भ में विचारकों की राय

-           रजनी कोठारी- भारत में जातियों का राजनीतिकरण एवं राजनीति का जातिकरण हो गया है।

-           रूडोल्फ– जाति ने भारत में लोगों को संगृहित किया है तथा परम्परागत व्यवस्था को आधुनिक मूल्यों के अनुरूप परिवर्तित किया है।

-           मोरिस जोन्स- यह जाति है जो कि राजनीतिपरस्त हो गई है व राजनीति जाति परस्त हो गई।

भारतीय राजनीति में जाति की भूमिका

-           भारत में चुनाव पूर्व निर्णय प्रक्रिया में जाति की महत्वूपर्ण भूमिका होती है क्योंकि भारत में अधिकतर लोग जातिगत मतदान को प्रमुखता से रखते हैं।

-           जातिगत आधार पर राजनीतिक पार्टी चुनावों में उम्मीदवारों का चयन करती है ताकि पार्टी की सीटों में बढ़ोतरी हो सके अर्थात राजनीतिक दल, निर्वाचन क्षेत्रों में जिस जाति के लोग बहुमत में होते हैं, उसी जाति के किसी व्यक्ति को उम्मीदवार बनाना ज्यादा पसंद करते हैं।

-           जातिगत आधार पर चुनाव प्रचार किए जाते हैं अर्थात्  राजनेता चुनाव प्रचार-प्रसार में जातिगत मतदाताओं को कट्टर बनाने कि सोच वाली बातें करते हैं ताकि वोट ले सकें।

-           मंत्रिमंडल के निर्माण में जातिगत प्रतिनिधित्व का ध्यान रखा जाता है और जातिगत आधार पर जीते हुए लोगों को मंत्री पद प्रदान किया जाता है ताकि आगामी चुनावों में जातिगत परिणाम मिल सके।

-           भारत में विभिन्न राजनीतिक दलों का निर्माण जातिगत आधार पर किया गया है जैसे- रिपब्लिक पार्टी, बहुजन समाज पार्टी आदि।

-           जातिगत आधार पर भारत में दबाव समूहों का निर्माण किया गया है जो कि प्रशासन के निर्णयों को अपनी जाति के पक्ष में प्रभावित करने का प्रयास करते हैं जैसे- अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा, जाट महासभा, अखिल भारतीय ब्राह्मण महासभा, अखिल भारतीय वैश्य महासभा आदि।

राज्यों की राजनीति में जाति की भूमिका-

-           टिकंर के अनुसार भारत में केन्द्र की राजनीति की बजाय राज्य की राजनीति में जाति का व्यापक प्रभाव विद्यमान है इसीलिए इन्होंने राज्यों की राजनीति को जातिगत राजनीति की संज्ञा दी है।

-           राज्यों की राजनीति में जाति की भूमिका का विशलेषण निम्न प्रकार से किया जा सकता है-

1. आन्ध्र प्रदेश – काम्मा व रेड्‌डी के बीच।

2. राजस्थान – जाट व राजपूतों के बीच।

3. कर्नाटक – लिंगायत तथा वोक्कालिंगा के बीच।

4. गुजरात – पाटीदार व क्षत्रियों के बीच संघर्ष।

5. महाराष्ट्र – महार तथा ब्राह्मणों की बीच संघर्ष।

राजनीति में जाति के नकारात्मक प्रभाव-

-           जाति राष्ट्रीय एकीकरण व लोकतंत्र के समक्ष चुनौती पैदा करती है।

-           भारत में जाति विभिन्न सामाजिक समस्याओं को पैदा करती हैं जाति योग्यता में भी बाधा उत्पन्न करती है।

-           जाति के कारण राजनीति में विकास के मुद्दे न्यून हो जाते हैं।

-           अनेक बार जाति का राजनीति में विलय साम्प्रदायिक दंगों के रूप में सामने आता है।

-           इससे सामाजिक विषमता को बढ़ावा मिलता है।

-           राजनीति में जाति का प्रभाव राजनीति के पश्चगामी प्रभाव को इंगित करता है।

निष्कर्ष

-           भारत का समाज जाति आधारित है और यहाँ  चुनावों में जाति को काफी महत्व दिया जाता है। राजनीति भी जाति के प्रभाव से मुक्त नहीं है और टिकटों के बँटवारे से मतदान तक में जाति का प्रभाव नजर आता है। अंत में भारत की राजनीति में जाति के दुष्परिणामों को समाप्त करने के लिए यह आवश्यक है कि जाति शब्द का बहिष्कार किया जाए व उचित शिक्षा का प्रोत्साहन प्रदान किया जाए।

धर्म

-           धर्म, मानव समाज द्वारा अपनाई जाने वाली एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय वस्तु का नाम है। धर्म शब्द की उत्पति ‘धृ’से हुई है जिसका अभिप्राय है – ‘धारण करना’।

-           धर्म उन सभी कर्त्तव्यों का सूचक है जो कि मानव जीवन को नियमित तथा नियंत्रित करती है। धर्म भारत में व्यक्ति की निजी आस्था का विषय माना जाता है।

-           भारतीय राजनीति के निर्धारक तत्वों में धर्म की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। जहाँ एक ओर इसका प्रयोग राजनीति में प्रभाव तथा शक्ति अर्जित करने के लिए किया जाता है, वहीं दूसरी ओर धर्म का प्रयोग राजनीति में तनाव के लिए भी किया जाता है।

-           दरअसल धर्म नामक व्यवस्था विवादों में उस समय से घिरना शुरु हुई जबसे राजनीति के साथ धर्म का तालमेल बिठाने के दुर्भाग्यपूर्ण प्रयास शुरु हुए। यह घटना भी कोई आज की नई घटना नहीं है जबकि धर्म के साथ राजनीति का रिश्ता कायम करना उचित व कारगर नहीं है।

भारतीय राजनीति में धर्म का प्रभाव

-           भारतीय राजनीति में धार्मिक आधार पर चुनावों में प्रतिनिधि का चयन किया जाता है जो साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देता है।

-           भारतीय राजनीति में धर्म निर्वाचक व्यवहार या मतदान व्यवहार तथा चुनाव प्रचार का महत्वूपर्ण साधन है क्योंकि भारत में अनेक राजनीतिक पार्टियाँ धार्मिक आधार पर प्रचार-प्रसार करती हैं।

-           भारतीय राजनीति में धर्म के आधार पर विभिन्न राजनीतिक दलों का गठन किया गया है जैसे- अकाली दल, मुस्लिम लीग, हिन्दू महासभा, शिवसेना  आदि।

-           भारत में धर्म के आधार दबाव समूहों का निर्माण किया गया है जो कि प्रशासन के निर्णयों को अपने पक्ष में प्रभावित करने का प्रयत्न करते हैं।

-           धार्मिक आधार पर अल्पसंख्यकों को सन्तुष्ट करने के लिए चुनावी समझौते किए गए हैं। जैसे- 1986 के शाहबानों वाद में उच्चतम न्यायालय के द्वारा मुस्लिम महिलाओं को गुजारा भत्ता प्रदान करने का दिशा-निर्देश जारी किया गया लेकिन राजीव गाँधी सरकार के द्वारा इसे कानून के माध्यम से अमान्य कर दिया गया।

-           धर्म के आधार पर पृथकतावादी आन्दोलनों को प्रोत्साहन प्रदान किया गया है जैसे- 1984 में पंजाब में खालिस्तान आन्दोलन।

भारत और पंथनिरपेक्षता

पंथनिरपेक्षता शब्द का समावेश

-           भारतीय संविधान में 42वें संशोधन अधिनियम, 1976 के माध्यम से प्रस्तावना में पंथ निरपेक्षता शब्द को जोड़ा गया।

भारत के संदर्भ में पंथनिरपेक्षता

-           भारतीय राज्य का अपना कोई धर्म नहीं होगा, भारत सभी धर्मों के प्रति तटस्थता की नीति का अनुसरण करेगा।

-           राज्य के द्वारा किसी भी धर्म विशेष को प्रोत्साहन प्रदान नहीं किया जायेगा, धर्म के आधार पर नागरिकों के मध्य कोई विभेद नहीं किया जाएगा अर्थात् भारत सर्वधर्म सद्भाव की नीति का अनुसरण करेगा। भारतीय संविधान में पंथ निरपेक्षता की अभिव्यक्ति मूल अधिकारों में धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार में होती है। स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान साम्प्रदायिक राजनीति का भारत में विकास हुआ परिणामस्वरूप भारत का विभाजन हो गया। भारत में अल्पसंख्यक वर्गों के लोग निवास करते हैं, उनमें असुरक्षा तथा भय को दूर करने के लिए, लोकतंत्र के मूल्यों के संरक्षण के लिए, व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्रोत्साहन प्रदान करने के लिए, विविधता मूलक संस्कृति के संरक्षण के लिए पंथ निरपेक्षता को अपनाया गया।

पंथनिरपेक्ष राज्य

-           जब राज्य की दृष्टि में सभी धर्म समान हैं और धर्म , पंथ एवं उपासना रीति के आधार पर राज्य किसी भी व्यक्ति के साथ भेदभाव नहीं करे तो वह राज्य पंथनिरपेक्ष राज्य होता है।

संविधान में उल्लेख

-           भारत में उद्देशिका/प्रस्तावना के अन्तर्गत पंथनिरपेक्षता शब्द का अनुसरण किया गया है।  जिसका अभिप्राय है कि राज्य धार्मिक मामलों में तटस्थता की नीति का अनुसरण करेगा तथा सभी धर्मों के प्रति समान दृष्टिकोण का पालन करेगा व न्यायालय के द्वारा पंथ निरपेक्षता को संविधान के मूल ढाँचे के अन्तर्गत सम्मिलित कर दिया गया है जिसमें परिवर्तन का अधिकार संसद के पास नही है।

-           भारत एक पंथ निरपेक्ष राष्ट्र है क्योंकि भारतीय संविधान के अन्तर्गत सभी व्यक्तियों को अन्त:करण की स्वतंत्रता, किसी भी धर्म को मानने, आचरण करने तथा प्रचार-प्रसार की स्वतंत्रता प्रदान की गई है।

-           धार्मिक आधार पर करों की अदायगी में व्यक्तियों को छूट प्रदान की गई है। राजकीय शिक्षण संस्थाओं में धार्मिक शिक्षा प्रतिबन्धित की गई है। धार्मिक सभाओं में नागरिकों को उपस्थिति से छूट प्रदान की गई अर्थात् भारत में राज्य तथा धर्म एक-दूसरे से अलग हैं तथा राज्य के द्वारा सभी धर्मों के प्रति सहयोग, समन्वय तथा विश्वास की नीति का अनुसरण किया जाता है।

आलोचना-

-           कुछ आलोचक कहते हैं कि भारत पंथनिरपेक्ष राष्ट्र नहीं हैं क्योंकि भारत में आपराधिक मामलों में सभी के लिए समान प्रावधान है परन्तु सिविल में समान उपबन्ध नही हैं। विभिन्न धर्मों के पसर्नल लॉ के अनुसार निर्णय लिए जाते हैं अर्थात् समान नागरिक संहिता का अभी तक निर्माण नहीं हो पाया है।

-           धार्मिक आधार पर मेलों व सब्सिडी प्रदान की जाती है। अल्पसंख्यकों के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं जो कि भारत की पंथनिरपेक्षता पर संकट पैदा करता है।

निष्कर्ष

-           भारत एक पंथ निरपेक्ष राष्ट्र है यद्यपि कई बार संकीर्ण राजनीतिक निर्णयों के द्वारा इस पर प्रहार किया गया है परन्तु न्यायालय के द्वारा उसकी अभिरक्षा की गई है। न्यायालय ने धर्म के ऐसे गौण तत्त्वों को जो कि पंथनिरपेक्षता पर प्रहार करते हैं, उन्हें अवैध घोषित कर दिया है जैसे- “शाहबानो वाद” में उच्चतम नयायालय ने मुस्लिमों में प्रचलित बहु विवाह तथा तीन तलाक की प्रथा को धर्म का गौण तत्त्व मानते हुए अवैध घोषित कर दिया है।

वर्ग
-        वर्ग लोगों का ऐसा समूह होता है कि जिसमे समान विशेषताएँ विद्यमान होती हैं, तथा इन्हीं समान विशेषताओं के कारण उनमें “हम” की भावना अथवा वर्ग चेतना विद्यमान होती है।

-           जन्म के अतिरिक्त समाज में विद्यमान व्यक्तियों का समूह वर्गीकृत हो जाता है तो उसे वर्ग की संज्ञा दी जाती है।

-           सदियों से राजनीति में वर्ग का एक महत्वपूर्ण स्थान रहा आज वर्ग अलग-अलग रूपों में अपने हित साधते हैं। पूंजीपति वर्ग अपने हितों के लिए अप्रत्यक्ष रूप से राजनीति को सर्वाधिक प्रभावित करता है उसी प्रकार निम्न वर्ग अपने दैनिक समस्याओं के निराकरण के लिए अपने हितों को सर्वोपरि रखता है।

-           भारत की राजनीति में पिछले दशक में शहरी मध्यम वर्ग की सक्रियता में निरंतर वृद्धि हो रही है हालांकि इसके बावजूद शहरी मध्यम वर्ग के बारे में सबसे अधिक लोकप्रिय और विद्वत्तापूर्ण धारणा यही रही है कि यह वर्ग चुनावी राजनीति के प्रति तिरस्कार और उपेक्षा का भाव रखता है। उदाहरण के लिए हम अक्सर सुनते हैं कि मध्यम वर्ग नागरिक के रूप में अपनी सक्रियता का प्रदर्शन आराम की ज़िंदगी जीने में करता है और चुनावी राजनीति को गरीबों का काम मानता है।

आज के समय में मध्यम वर्ग के वे लोग, जिनकी राज्य के ऊँचे तबकों अर्थात् नौकरशाही या राजनैतिक दलों तक पहुँच होती है, औपचारिक राजनीति के बाहर ही सक्रिय रहते हैं। ये मध्यमवर्गीय नागरिक या तो ऊँचे पेशेवर पदों पर आसीन होते हैं या फिर प्रबंधक वर्ग से जुड़े होते हैं।

वर्ग निर्धारण का आधार

1. सम्पत्ति

2. निवास स्थान

3. धर्म

4. शिक्षा

5. परिवार

वर्ग की विशेषता

1. यह खुली व्यवस्था है।

2. यह जन्म आधारित नहीं है।

3. वर्ग के उप वर्ग भी होते है।

4. इसके सदस्यों के समान हित होते हैं।

5. वर्ग में गतिशीलता की प्रवृत्ति विद्यमान होती है।

6. वर्ग एक खुला समूह होता है जिसमें योग्यता के आधार पर बदलाव किया जा सकता है।

वर्ग तथा जाति में अन्तर

वर्ग

1. इसका निर्धारण व्यक्ति की योग्यता से होता है न कि जन्म से।

2. यह एक खुला समूह है अर्थात् व्यक्ति की स्थिति इस  बात का निर्धारण करती है की वर्तमान में उसका स्तर किस वर्ग का है।

3. वर्ग सामाजिक सम्बन्धों तथा खान-पान पर प्रतिबन्ध आरोपित नहीं करता है।

4. व्यक्ति अपनी योग्यता से वर्ग में परिवर्तन कर सकता है।

5. वर्ग का निर्धारण आय, सम्पत्ति, शिक्षा, आर्थिक, उपभोग आदि अनेक आधारों पर किया जाता है।

जाति

1. इसका निर्धारण जन्म से होता है।

2. यह एक बन्द समूह है जिसमें किसी भी स्थिति में परिवर्तन संभव नहीं है अर्थात जन्म से लेकर निधन तक एक समान ही रहती है।

3. इसमें सामाजिक सम्बन्धों तथा खान-पान पर प्रतिबन्ध आरोपित किया जा सकता है।

4. योग्यता के कारण जाति में परिवर्तन सम्भव नहीं है।

5. इसके निर्धारण का आधार केवल जन्म होता है।

भारत में वर्ग वर्गीकरण

-    प्रो. दीपांकर गुप्ता ने भारत में उपभोग के आधार पर समस्त व्यक्तियों को तीन वर्गों में विभक्त किया है-

1. उच्च वर्ग

2. मध्यम वर्ग

3. निम्न वर्ग

कार्ल मार्क्स के अनुसार वर्ग

-    आर्थिक आधार पर समस्त विश्व को दो भागों में वर्गीकृत किया गया है-

-    पूंजीपति या बुजुर्आ वर्ग

-    मजदूर या सर्वहारा वर्ग

संविधान में प्रावधान-

-  अनुच्छेद 15 [04]- राज्य को यह अधिकार प्रदान किया गया है कि वह सामाजिक तथा शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों एवं अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति के कल्याण के लिए विशेष उपबन्ध कर सकता है।

-  अनुच्छेद 15 [05]- इसके अन्तर्गत राज्य को सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जाति-जनजाति, के कल्याण के लिए निजी शिक्षण संस्थानों में पद आरक्षित करने की शक्ति प्रदान की गई है।

-  अनुच्छेद 15 [06]- इसके अन्तर्गत राज्य को अनु. 15[04] तथा अनु. 15[05] में उल्लेखित वर्गों के अतिरिक्त आर्थिक रूप से दुर्बल वर्गों के कल्याण के लिए उपबन्ध करने की शक्ति प्रदान की गई है।

-  अनुच्छेद 16 [04]- इसके अन्तर्गत राज्य को पिछड़े वर्गों का सार्वजनिक सेवाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं होने पर आरक्षण प्रदान करने की शक्ति दी गई है।

-   इन्दिरा साहनी vs भारत संघ वाद (1992) – में उच्चतम न्यायालय के द्वारा यह निर्धारित किया गया कि भारत में पिछड़ी जाति ही पिछड़े वर्ग में सम्मिलित हैं। परन्तु क्रीमीलेयर वर्ग में सभी पिछड़ी जातियाँ सम्मिलित नहीं होंगी।

नृजातीयता

-           नृजातीय को अंग्रेजी में एथनिसिटी कहा जाता है जिसका शाब्दिक अभिप्राय है कि ‘एक विशिष्ट संस्कृति का अनुसरण करने वाले एक ही प्रजाति के लोग।’

-           सामान्य अर्थों में धर्म या प्रजातीय भिन्नता को नृजातीयता (Ethnicity) समझ लिया जाता है। वास्तव में नृजातीयता एक भावना है। जब धर्म, भाषा, जाति, रंग, संस्कृति, क्षेत्र आदि के आधार पर कोई समूह एकजुट होकर अपनी भावना प्रदर्शित करे तो उसे नृजातीयता कहते हैं। नृजातीय मनोवृत्ति, राष्ट्रीय मनोवृत्ति या हित से पृथक होती है।

-           नृजातीयता की भावना तब उत्पन्न होती है जब किसी क्षेत्र के लोग बाहरी लोगों की उपस्थिति के कारण अपने स्थानीय संसाधनों एवं अस्मिता पर संकट महसूस करने लगते हैं एवं स्वयं को सुरक्षित रखने के लिए अति सुरक्षात्मक होने का प्रयास करते हैं। जो अलग क्षेत्र, राज्य या देश की माँग के रूप में सामने आता है।

-           नृजातीयता के कारणों में मुख्य रूप से गरीबी, अशिक्षा बेरोजगारी, पहचान संकट जैसी समस्याएँ होती हैं। इन्हीं समस्याओं के आधार पर भारत में कुछ नृजातीय समूह जैसे- विदर्भ, गोरखालैंड, बोडोलैंड आदि अपनी नृजातीय भावना को समय-समय पर प्रकट करते रहते हैं।

-           भारत में स्वतंत्रता के पश्चात् आर्थिक विकास के लिए सुनियोजित रणनीति का निर्माण हुआ। परन्तु बहुलवादी समाज में भाषायी व सांस्कृतिक विकास के लिए दीर्घकालिक रणनीति का निर्माण नहीं हो सका, परिणामस्वरूप नृजातीयता की उत्पत्ति हुई।

-           विश्व व भारत ने राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए भी नृजातीयता को प्रोत्साहन प्रदान किया। भारत में आर्थिक विकास का लाभ सभी वर्गों तक समान रूप से नहीं पहुँच पाया, इसलिए वितरणात्मक न्याय के लिए भी नृजातीयता को प्रोत्साहन प्रदान किया गया।

-           भारत में राजनीतिक दलों के पास ठोस कार्यक्रम, नीतियों तथा विचारधारा का अभाव विद्यमान है। इसलिए नृजातीयता की उत्पत्ति हुई।

-           भारत एक विविधतामूलक देश हैं जहाँ पर अनेक जनजाति, भाषायी, धार्मिक आधार पर नृजातीय समूह विद्यमान हैं, जिनके द्वारा सरकार के समक्ष राजनीतिक तथा आर्थिक माँगें रखी जाती हैं एवं चुनाव के समय भागीदारी अथवा संघर्ष के माध्यम से अपने हितों की पूर्ति का प्रयत्न किया जाता है। इसके कारण राष्ट्र निर्माण तथा राष्ट्र विकास में बाधाएँ उत्पन्न होती हैं।

नृजातीय समस्याएँ

नृजातीयता से भारत में होने वाली समस्याओं को निम्न बिंदुओं में देखा जा सकता है -

-           नृजातीयता के कारण एक राज्य के लोग दूसरे राज्यों को अपने क्षेत्र से बाहर करने का प्रयास करते हैं - उदाहरण के लिए उत्तर-पूर्वी राज्यों एवं हाल ही में महाराष्ट्र एवं गुजरात में दूसरे प्रांत के लोगों के विरुद्ध की घटना में इसे देखा जा सकता है।

-           नृजातीयता के कारण कुछ क्षेत्रीय लोग स्वयं को देश से अलग होने की भी आवाज उठाते हैं, जैसे कश्मीर के कुछ अलगाववादी संगठन।

नृजातीयता के कारण अलग राज्यों की मांग उठने लगती है। हाल ही में आंध्र प्रदेश से अलग हुआ भारत का राज्य तेलंगाना इसका उदाहरण है।

भारतीय राजनीति में नृजातीय समूहों की भूमिका-

-           जनजातीय नृजातीय समूह- भारत में अनेक जनजातीय नृजातीय समूह विद्यमान हैं जैसे- गारों, खासी, जयन्तिया, नागा, मिजो, मुन्डा, भील, मीणा आदि। इनके द्वारा समय-समय पर राजनीतिक व आर्थिक माँगें प्रस्तुत की गई हैं जैसे-

-           नागालैंड में नागा जनजाति के द्वारा नेशनल सोशलिस्ट काउन्सिल ऑफ नागालैंड के माध्यम से वृहत्तर नागालैंड की मांग की जा रही है।

-           मेघालय में गारों जनजाति के द्वारा ‘गारोलैण्ड’ की मांग करना।

-           असम में विदेशी तत्त्वों के विरुद्ध उल्फा आन्दोलन।

-           पं. बंगाल में गोरखालैण्ड की मांग।

भाषायी नृजातीय समूह-

-           1953 में भाषायी आधार पर ही सर्वप्रथम आन्ध्र प्रदेश का गठन किया गया।

-           1960 में मराठी तथा गुजराती भाषा को लेकर महाराष्ट्र तथा गुजरात को अलग किया गया।

-           मध्यप्रदेश में बुन्देली भाषा के आधार पर बुन्देलखण्ड की मांग की जा रही हैं।

-           बिहार में मिथिला भाषा के आधार पर मिथिलांचल की मांग।

धार्मिक नृजातीय समूह-

-           भारत में धार्मिक आधार पर अनेक राजनीतिक दलों का निर्माण किया गया है जहाँ पर धार्मिक नृजातीय समूह की पहचान की जा सकती हैं जैसे-

1. महाराष्ट्र में शिवसेना- हिन्दुओं के लिए

2. पंजाब में अकाली दल- सिक्खों के लिए

3. मुस्लिम लीग – मुस्लिमों के लिए

भाषा

-           ब्रिटिश साम्राज्य से आजादी मिलने के बाद भारत में भाषायी आधार पर राज्य निर्माण की मांगों ने जोर पकड़ लिया था जो भाषीय अवधारणा की मजबूती को दिखाता है। हालांकि आजादी पूर्व भी ब्रिटिश सरकार ने भारत में अप्रत्यक्ष रूप से भाषायी आधार पर बढ़ावा दिया था। आजादी बाद भाषायी आधार पर राज्य की मांग प्रारम्भ हुई थी जो अब भी बनी हुई है तथा जो वर्तमान में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता के लिए खतरा बनी हुई है।

-           स्वतंत्रता के पश्चात् भारत में हिन्दी को आधिकारिक भाषा के रूप में स्थान प्राप्त हुआ, जिसका गैर-हिन्दी राज्यों के द्वारा विरोध किया गया। संविधान सभा में इस बात को लेकर व्यापक बहस हुई तथा संविधान सभा की नियम समिति के द्वारा हिन्दी के पक्ष में समर्थन किया गया।

-           भाषा की राजनीति करने वाले लोग भाषाई मतभेद उत्पन्न कर उसका राजनीतिक लाभ उठाते हैं। सामान्यतः भाषा की राजनीति राजनेताओं द्वारा की जाती है। जिसमें कई नेता चाहे वे किसी अन्य भाषा में आम तौर पर बात करते हों, लेकिन जनता के सामने उनकी भाषा में बात करते हैं, जिससे जनता को विश्वास हो कि वह नेता उन्हीं का है। इस तरह का कार्य नेता अपना रिश्ता जनता से जोड़ने के लिए करते हैं। इसके अलावा भी कई प्रकार से भाषा की राजनीति की जाती है।

-           भारत की संविधान सभा ने मुशी-आयंगर फार्मूला के अन्तर्गत 14 सितम्बर 1949 को हिन्दी को भारत में राजभाषा के रूप में स्वीकार किया तथा अंग्रेजी को सहायक भाषा के रूप में मान्यता प्रदान की गई।

भारत में भाषा के संदर्भ संवैधानिक प्रावधान

-           भारतीय संविधान के भाग-17 के अन्तर्गत चार अध्यायों में भाषा सम्बन्धी प्रावधान किए गए हैं-

राजभाषा से संबंधित अनुच्छेद, एक नजर में

अनुच्छेद             विषय-वस्तु

संघ की भाषा

343                  संघ की राजभाषा

344                  राजभाषा पर संसदीय आयोग एवं समिति

क्षेत्रीय भाषाएँ

345                  राज्य की राजभाषा अथवा भाषा

346                  एक राज्य से दूसरे राज्य अथवा एक राज्य से संघ के बीच संवाद के लिए राजभाषा

347      किसी राज्य की जनसंख्या के एक समूह द्वारा बोली-जाने वाली भाषा से संबंधित प्रावधान

सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालयों की भाषा

348      सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों में साथ ही अधिनियमों एवं विधेयकों में प्रयोग की जाने वाली भाषा

349      भाषा से संबंधित कुछ नियम अधिनियमित करने के लिए विशेष प्रक्रिया

विशेष विनिर्देश (डायरेक्टिव्स)

350      शिकायत निवारण में प्रतिनिधित्व के लिए प्रयुक्त भाषा

350ए    प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षण के लिए सुविधाएँ

350बी   भाषाई अल्पसंख्यकों के लिए विशेष पदाधिकारी

351      हिन्दी भाषा के विकास के लिए विनिर्देश

संघ की राजभाषा

-        भारत के संविधान के अनुच्छेद-343 के अन्तर्गत यह प्रावधान किया गया है कि हिन्दी भारतीय संघ की राजभाषा तथा देवनागरी संघ की लिपि होगी। परन्तु अनु. 343 [02] के अन्तर्गत यह प्रावधान किया गया कि संविधान लागू होने के 15 वर्षों तक राजकीय एवं शासकीय प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी का प्रयोग किया जाएगा। संसद विशिष्ट प्रयोजनों के लिए विधि के माध्यम से अंग्रेजी के प्रयोग को जारी रख सकेगी।

-        इस सम्बन्ध में संसद के द्वारा 1963 में राजभाषा अधिनियम पारित किया गया जिसमें हिन्दी के साथ-साथ अंग्रेजी के प्रयोग को भी मान्यता प्रदान की गई।

          राजभाषा आयोग

भारत के संविधान के अनुच्छेद- 344 के अन्तर्गत राष्ट्रपति को राजभाषा के सम्बन्ध में सलाह प्रदान करने के लिए राजभाषा आयोग तथा ससंदीय समिति का उपबन्ध किया गया है।

-        राष्ट्रपति के द्वारा संविधान लागू होने के पाँच वर्ष पश्चात् तथा उसके बाद दस वर्ष की समाप्ति पर आदेश के माध्यम से राजभाषा आयोग का गठन किया जाएगा, इस आयोग में एक अध्यक्ष तथा आठवीं अनुसूची में सम्मिलित भाषाओं के प्रतिनिधि सम्मिलित होंगे।

-        पूर्व में 1955 में राष्ट्रपति ने बी.जी.खरे की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन किया गया। आयोग ने 1956 में अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति को प्रस्तुत की। 1957 में पंडित गोविंद वल्लभ पंत की अध्यक्षता में बनी संसदीय समिति ने इस रिपोर्ट की समीक्षा की। हालांकि 1960 में दूसरे आयोग (जिसकी कल्पना संविधान में की गई थी)  का गठन नहीं किया गया।

          राज्य/प्रान्तीय या क्षेत्रीय भाषाओं के सम्बन्ध में उपबन्ध

          भारत के संविधान के अनुच्छेद- 345 के अन्तर्गत प्रत्येक राज्य के विधानमंडल को यह अधिकार प्रदान किया गया है कि वह विधि के माध्यम से राज्य में प्रयुक्त होने वाली भाषाओं में एक से अधिक या एक भाषा अथवा हिन्दी को शासकीय प्रयोजन के लिए स्वीकार कर सकेगा। परन्तु जब तक राज्य विधानमंडल के द्वारा इस सम्बन्ध में विधि का निर्माण नहीं किया जाता है, तब तक अंग्रेजी ही शासकीय प्रयोजन की भाषा होगी कुछ प्रमुख राज्य और उनकी राजभाषा- आंध्र प्रदेश की तेलुगु, अरुणाचल प्रदेश की अंग्रेजी, असम की असमिया, गोवा की कोंकणी है।

          भारत के संविधान के अनुच्छेद- 346

-        इसके अन्तर्गत यह उपबन्ध किया गया है कि संघ तथा राज्य एवं एक राज्य तथा दूसरे राज्य के बीच राजकीय भाषा ही शासकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग की जाएगी।

-        परन्तु दो या दो से अधिक राज्य विधानमंडलों के द्वारा आपसी समझौते के माध्यम से यदि हिन्दी को पत्रादि का माध्यम बना दिया जाता है तो उन राज्यों में पत्रादि का माध्यम हिन्दी होगा।

          भारत के संविधान के अनुच्छेद- 347

-        इसके अन्तर्गत यह उपबन्ध किया गया है कि यदि राष्ट्रपति को इस बात का समाधान हो जाता है कि किसी राज्य में अधिकांश लोगों के द्वारा बोली जाने भाषा को आधिकारिक भाषा के रूप में मान्यता प्रदान की जानी चाहिए तो राष्ट्रपति इस सम्बन्ध में दिशा निर्देश जारी कर सकता है।

          न्यायपालिका की भाषा एवं विधि पाठ

          उच्चतम तथा उच्च न्यायालयों की भाषा-

-        भारत के संविधान के अनुच्छेद-  348 के अन्तर्गत यह उपबन्ध किया गया है कि जब तक इस सम्बन्ध में संसद के द्वारा विधि निर्माण नहीं किया जाए उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों की समस्त कार्यवाही अंग्रेजी में होगी।

-        राज्यों के उच्च न्यायालयों के सम्बन्ध में हिन्दी को कार्यवाही के रूप में प्रयुक्त किया जा सकता है परन्तु इस सम्बन्ध में राज्यपाल को राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति लेनी होगी लेकिन उच्च न्यायालयों के सभी निर्णय आदेश आदि अंग्रेजी में ही जारी किए जाएंगे।

-        हालांकि संसद ने उच्चतम न्यायालय में हिंदी के प्रयोग के लिए ऐसी कोई व्यवस्था नहीं की है। अत: उच्चतम न्यायालय केवल उन्हीं याचिकाओं को सुनता है, जो केवल अंग्रेजी में हों। सन् 1971 में एक याचिकाकर्ता द्वारा हिंदी में बहस के लिए एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका उच्चतम न्यायालय में प्रस्तुत की गयी। परंतु न्यायालय ने उस याचिका को इस आधार पर निरस्त कर दिया कि वह अंग्रेजी में नहीं है तथा हिंदी का प्रयोग असंवैधानिक है।

          भाषा सम्बन्धी दिशा-निर्देश

          भारत के संविधान के अनुच्छेद-  350

-        इसके अन्तर्गत यह प्रावधान किया गया है कि प्रत्येक नागरिक के द्वारा अपनी समस्याओं के निराकरण के लिए संघ या राज्य में प्रयुक्त होनी वाली भाषा के अन्तर्गत अधिकारी के समक्ष आवेदन किया जा सकेगा।

          भारत के संविधान के अनुच्छेद- 350[A]

-        इसके अन्तर्गत अल्पसंख्यक वर्ग को प्राथमिक स्तर पर उनकी मातृभाषा में शिक्षा के प्रावधान किए गए हैं।

          भारत के संविधान के अनुच्छेद-  351

-        इसके अन्तर्गत संघ का यह दायित्व निर्धारित किया गया है कि वह हिन्दी भाषा का प्रसार करे तथा उसका इस प्रकार से विकास करे कि वह भारत की सामाजिक सस्ंकृति को अभिव्यक्त कर सके।

          भारतीय राजनीति में भाषा की भूमिका-

-        भारतीय राजनीति में भाषा की भूमिका अनेक रूपों में देखी जा सकती है। भारत में आज़ादी के बाद से अब तक भी भाषाई आधार पर राजनीति को बढ़ावा मिलता रहा।

-        भारत में भाषा के आधार पर राजनीति को निम्न रूप से समझा जा सकता है-

          राज्यों का पुनर्गठन-

-        स्वतंत्रता के पश्चात् भारत के भाषायी आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की मांग उठने लगी परिणामस्वरूप भाषा के आधार पर राज्यों का पुनर्गठन उचित है या नहीं, इसकी जाँच के लिए संविधान सभा के अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के अवकाशप्राप्त न्यायाधीश एस. के. धर की अध्यक्षता में एक चार सदस्यीय आयोग की नियुक्ति की। इस आयोग ने भाषा के आधार पर राज्यों के पुनर्गठन का विरोध किया और प्रशासनिक सुविधा के आधार पर राज्यों के पुनर्गठन का समर्थन किया।

-        JVP समिति 1948-49 में भाषा के आधार पर नए राज्यों की स्थापना के लिए बनाई गई थी। इसमें 3 सदस्य जवाहर लाल नेहरू, वल्लभ भाई पटेल, पट्टाभि सीतारमैया थे तथा इस समिति द्वारा भी भाषायी आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की मांग को अस्वीकार कर दिया गया तथा उसके स्थान पर प्रशासनिक कार्यकुशलता के आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की मांग की गई।

-        इन समितियों की रिपोर्ट के बाद तेलगू भाषी क्षेत्र में आन्ध्रप्रदेश के गठन को लेकर व्यापक जन आन्दोलन हुआ तथा एक स्थानीय नेता पोट्‌टू श्रीरामुल्लू के 56 दिन के आमरण अनशन के बाद 15 दिसंबर, 1952 ई० को रामुल्लू की मृत्यु हो गई। रामुल्लू की मृत्यु के बाद प्रधानमंत्री नेहरू ने तेलगुभाषियों के लिए पृथक आंध्र प्रदेश के गठन की घोषणा कर दी। 1 अक्टूबर, 1953 ई० को आंध्र प्रदेश राज्य का गठन हो गया। यह राज्य स्वतन्त्र भारत में भाषा के आधार पर गठित होने वाला पहला राज्य था।

-        भाषायी आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की मांग को लेकर 1953 में फजल अली के नेतृत्व में राज्य पुनर्गठन आयोग का निर्माण किया गया प० हृदयनाथ कुंजरू और सरदार के एम. पणिक्कर इसके सदस्य थे।

-        1955 में राज्य पुनर्गठन आयोग के द्वारा अपना प्रतिवेदन दिया गया जिसमें भाषा को राज्यों के पुनर्गठन के आधार के रूप में स्वीकार किया गया, परन्तु एक राज्य एक भाषा के सिद्धान्त के मान्यता प्रदान नहीं की गई। 7 वे संशोधन अधिनियम 1956 के माध्यम से राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिशों को मान्यता प्रदान की गई तथा सम्पूर्ण देश को 14 राज्यों एवं 06 केन्द्र शासित प्रदेशों में विभक्त किया गया।

-        भाषायी आधार पर ही 1960 में महाराष्ट्र से अलग कर गुजरात तथा 1966 में पंजाब से अलग कर हरियाणा का निर्माण किया गया। वर्तमान में भाषायी आधार पर ही मिथिआंचल, बुन्देलखण्ड, बोडोलेन्ड आदि की मांग चल रही है।

          आठवीं अनुसूची-

-        संविधान द्वारा मान्यता प्राप्त भाषाएँ (मूल रूप से 14 मगर फिलहाल 22) ये भाषाएँ हैं- असमिया, बांग्ला, बोडो, डोगरी, गुजराती, हिन्दी, कन्नड़, कश्मीरी, कोंकणी, मैथिली, मलयालम, मणिपुरी, मराठी, नेपाली, उड़िया, पंजाबी, संस्कृत, संथाली, सिंधी, तमिल, तेलुगू तथा उर्दू।

-        सिंधी भाषा को 1967 के 21वें संशोधन अधिनियम द्वारा जोड़ा गया था।

-        कोंकणी, मणिपुरी और नेपाली को 1992 के 71वें संशोधन अधिनियम द्वारा और बोड़ो, डोगरी, मैथिली और संथाली को 2003 के 92वें संशोधन अधिनियम द्वारा जोड़ा गया था।

          निष्कर्ष-

-        वर्तमान में बढती भाषाई राजनीति का एक समाधान नहीं निकल सकता है क्योंकि भाषा ही क्षेत्र के लोगों की भावनाओं को इंगित करती है व जनतंत्र में जन की आवाज़ को दबाना किसी भी देश के लिए घातक हो सकता है। 

-        भाषावाद से सम्बन्धित समस्याओं के समाधान के लिए आवश्यक है कि हिन्दी को अधिकारिक भाषा के रूप में स्वीकार कर लिया जाए। हिन्दी को और अधिक सरल बनाया जाए तथा प्रादेशिक भाषाओं का भी विकास किया जाए। त्रिभाषा फार्मूले को लागू किया जाए।

लिंग

-        वैश्विक स्तर पर राजनीतिक, आर्थिक व सामाजिक क्षेत्रों में लैंगिक असमानता सर्वाधिक नजर आती है। आज 21वीं सदी में भी महिला-पुरुष के मध्य उपस्थित असमानता की खाई को पाटने का काम किया जा रहा है। इसके बावजूद भी समाज में किसी भी अर्थ में असमानता समाप्त नहीं हो पा रही है।

-        भारत में लैंगिक असमानता का तात्पर्य सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक गतिविधियों की जड़ में उपस्थित स्थितियों से है। आज विभिन्न संविधान संशोधनों उच्चतम न्यायालय व विभिन्न राज्यों के उच्च न्यायालयों के न्याय निर्णयों ने महिलाओं के सन्दर्भ में प्रावधान किए हैं।

          संविधान में प्रावधान-

          मूल अधिकारों में महिलाओं के लिए प्रावधान-

-        भारतीय संविधान के अनेक प्रावधानों में लैंगिक संरक्षण के उपबन्ध किए गए हैं-

-        संविधान के अनुच्छेद-15 के अन्तर्गत लिंग के आधार पर विभेद को प्रतिषेध कर दिया गया है।

          वैसे तो देश के सभी नागरिक समान हैं, उनसे भेदभाव नहीं किया जा सकता, लेकिन महिलाओं और बच्चों को इस नियम में अपवाद के रूप में देखा जा सकता है। आर्टिकल 15 के नियम 3 के मुताबिक, अगर महिलाओं और बच्चों के लिये विशेष उपबंध किये जा रहे हैं तो आर्टिकल 15 ऐसा करने से नहीं रोक सकता। इसके तहत महिलाओं के लिये आरक्षण या बच्चों के लिये मुफ्त शिक्षा इसी उपबंध के तहत आते हैं।

-        संविधान के अनुच्छेद-23 के अनुसार, “मनुष्यों के क्रय-विक्रय और बेगार (जबरदस्ती श्रम) पर रोक लगा दी गई है, जिसका उल्लंघन विधि के अनुसार दंडनीय अपराध है”।

          इसके अन्तर्गत महिलाओं की खरीद-बिक्री व बेगार पर भी पूर्ण प्रतिबन्ध आरोपित कर दिया गया है।

          नीति निदेशक तत्वों में महिलाओं के लिए प्रावधान-

-        संविधान के अनुच्छेद 39 (a) के अन्तर्गत राज्य को महिलाओं तथा पुरुषों के लिए जीविका के संसाधन उपलब्ध कराना।

-        संविधान के अनुच्छेद 39 (d) के अन्तर्गत महिलाओं तथा पुरुषों के लिए समान कार्य, समान वेतन सम्बन्धी प्रावधान किए गए हैं।

-        संविधान के अनुच्छेद 39 (c) के अन्तर्गत राज्य को यह दिशा-निर्देश जारी किया गया है कि वह महिलाओं के स्वास्थ्य का संरक्षण करे तथा उनकी सुकुमार अवस्था के दुरुपयोग को रोकने के लिए कदम उठाए।

-        संविधान के अनुच्छेद 42 के अन्तर्गत राज्य काम की न्यायसंगत और मानवोचित दशाओं को सुनिश्चित करने के लिए और प्रसूति सहायता के लिए उपबंध करेगा।

          मूल कर्त्तव्यों में महिलाओं के लिए प्रावधान-

-        संविधान के अनुच्छेद 51 (A)(ङ) में नागरिकों का यह कर्त्तव्य निर्धारित किया गया है कि वे ऐसी प्रथाओं को त्यागे जो कि स्त्रियों के सम्मान के विरुद्ध हो अर्थात नागरिकों को महिलाओं का सम्मान करना चाहिए।

          विधायिका प्रावधान

-        संविधान निर्माण के बाद विधायिका अर्थात संसद के द्वारा विभिन्न कानूनों के माध्यम से महिलाओं के हितों को संरक्षित करने के लिए कदम उठाये  गए हैं जैसे-

          हिन्दू विवाह अधिनियम-1955

          हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम-1956

          दहेज निषेध अधिनियम-1961

          घरेलू हिंसा संरक्षण अधिनियम-2005

          महिला अत्याचार दुष्कर्म निरोधक अधिनियम-2012

-        भारत में राष्ट्रीय स्तर पर महिलाओं के अत्याचार, दमन तथा उत्पीड़न सम्बन्धी शिकायतों के निवारण के लिए केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय महिला आयोग का गठन किया।

          इस आयोग का गठन 31 जनवरी, 1992 को राष्ट्रीय महिला आयोग का गठन किया गया। राज्य स्तर पर भी महिलाओं के उत्पीडन सम्बन्धी शिकायतों की जाँच के लिए तथा विधानमंडल के द्वारा महिलाओं के संरक्षण हेतु बनाए गए कानूनों की समीक्षा के लिए राज्य महिला आयोग का प्रावधान किया गया है।

          न्यायालय के प्रावधान

-        उच्चतम न्यायालय के द्वारा विभिन्न वादों के माध्यम से महिलाओं के सशक्तीकरण को लेकर उपबन्ध किए गए हैं जैसे-

-        शाहबानो वाद-1986

          इस वाद में उच्चतम न्यायालय के द्वारा मुस्लिम महिलाओं को गुजारा भत्ता देने का दिशा निर्देश जारी किया गया था जबकि शरीयत के अनुसार मुस्लिम महिलाओं को गुजारा भत्ता प्राप्त करने का अधिकार प्राप्त नहीं है।

-        सरला मुद्गल वाद-1995

          इस वाद में उच्चतम न्यायालय के द्वारा दूसरे विवाह के लिए धर्मान्तरण को अवैध घोषित कर दिया ताकि कोई अपना मूल धर्म बदलकर दूसरी शादी न कर सके।

-        विशाखा वाद-1997

          इस वाद में उच्चतम न्यायालय के द्वारा कार्यस्थल पर महिलाओं के लैगिक संरक्षण को लेकर दिशा-निर्देश जारी किये। न्यायालय के अनुसार लैंगिक समानता में अवरोध अनुच्छेद-14, अनुच्छेद-19 तथा अनुच्छेद-21 का उल्लंघन है।

-        उच्चतम न्यायालय के द्वारा सरकार के प्रत्येक विभाग को महिलाओं के संरक्षण को लेकर दिशा-निर्देश जारी किए गए एवं महिलाओं के यौन संरक्षण को अनुच्छेद-21 के अन्तर्गत जीवन के अधिकार के रूप में स्वीकार किया गया।

-        शायरा बानो वाद-2017

          इस वाद में उच्चतम न्यायालय के द्वारा मुस्लिमों में प्रचलित बहु-पत्नी प्रथा, तीन तलाक की प्रथा को अवैध घोषित कर दिया एवं इसे इस्लाम धर्म के मूल तत्वों के रूप में स्वीकार करने से इनकार कर दिया।

          व्यावहारिक प्रयास-

-        भारत में महिलाओं को मुख्य धारा में लाने व महिलाओं के सशक्तीकरण को लेकर अनेक व्यावहारिक प्रयास किए जा रहे हैं जैसे-

          1. लोकसभा तथा विधानसभाओं में महिलाओं को आरक्षण प्रदान करने के लिए 108वां संविधान संशोधन विधेयक प्रस्तावित किया गया है यद्यपि अभी तक यह संसद से पारित नहीं हो सका है।

          2. 73 वें संशोधन अधिनियम 1992 के माध्यम से पंचायती राज संस्थानों में महिलाओं के लिए 1/3 सीटें आरक्षित की गई है जिसे कुछ राज्यों ने बढाकर 50% कर दिया है।

          3. 74 वें संशोधन अधिनियम 1992 के माध्यम से नगरीय संस्थानों में महिलाओं के लिए 1/3 स्थान आरक्षित किए गए हैं।

          4. अनेक गैर सरकारी संगठनों जैसे- सेवा, दुर्गावाहिनी आदि के द्वारा भी महिला सशक्तीकरण को लेकर कदम उठाए गए हैं।

मतदान व्यवहार

-        मतदान व्यवहार को निर्वाचक व्यवहार के रूप में भी जाना जाता है। यह राजनीतिक व्यवहार का ही एक रूप है। इसका अभिप्राय है कि मतदाता मतदान करते समय किन-किन तत्वों से प्रभावित होता है। कौन से कारक मतदाताओं के व्यवहार को प्रभावित करते हैं एवं किन कारकों से मतदाता किसी भी दल विशेष अथवा प्रतिनिधि को बार-बार मतदान करता है।

-        लोकतांत्रिक शासन प्रभावी जनता की शासन में सहभागिता मतदान व्यवहार से ही नापी जा सकती है। सर्वप्रथम फ्रांस में मतदान व्यवहार की शुरूआत हुई तथा भारत में द्वितीय आम चुनाव के पश्चात मतदान व्यवहार की शुरूआत की गई।

-        भारत एक बहुसंस्कृतिवादी तथा विविधतामूलक देश है जहाँ पर मतदान व्यवहार का अध्ययन करना अत्यधिक कठिन है क्योंकि समय तथा परिस्थितियों के अनुसार मतदाताओं के व्यवहार में परिवर्तन होता रहता है।

मतदान व्यवहार की परिभाषा-

प्लानो एण्ड रिग्स - सार्वजनिक चुनाव में लोग किस प्रकार वोट देते हैं, इससे संबंधित अध्ययन क्षेत्र ही मतदान व्यवहार है और इसमें वे कारण भी शामिल हैं कि लोग मतदान उसी प्रकार क्यों करते हैं।

गार्डन मार्शन – मतदान व्यवहार का अध्ययन उन निर्धारकों पर एकाग्र होता है कि लोग एक खास तरीके से क्यों मतदान करते हैं तथा इस बारे में लिए गए निर्णय तक कैसे पहुँचते हैं।

ओइनम कुलाबिधु – मतदान व्यवहार को ऐसे व्यवहार के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जो कि मतदाता की पसंद, प्राथमिकता विकल्पों, विचारधाराओं, चिंताओं, समझौते तथा कार्यक्रमों को  साफ – साफ प्रतिबिम्बित करता है जो कि विभिन्न मुद्दों से जुड़े होते हैं और समाज तथा राष्ट्र से संबंधित प्रश्नों से संबंधित होते हैं।

स्टीफन वाजबाई – मतदान व्यवहार के अंतर्गत वैयक्तिक मनोवैज्ञानिक समिति तथा उसका राजनीतिक क्रिया के साथ-साथ सांस्कृतिक विन्यास जैसे कि संचार प्रक्रिया तथा चुनावों पर उसका प्रभाव शामिल होते हैं।

         मतदान व्यवहार का महत्व  

-           सेफोलॉजी अर्थात् चुनाव विश्लेषण राजनीति विज्ञान की एक शाखा है जिसमें मतदान व्यवहार का वैज्ञानिक अध्ययन किया जाता है। यह एक नई शब्दावली है जिसे अमरीकी राजनीति विज्ञानियों तथा राजनीतिक समाजशास्त्रियों ने लोकप्रिय बनाया है।

-        मतदान का अभिलेखित इतिहास ग्रीक पोलिस तक जाता है। मतदान व्यवहार के लिए आधुनिक शब्द सेफोलॉजी की उत्पति भी शास्त्री ग्रीक सेफ्रस (Psephos) से हुई है जिसका अर्थ ऐसे मृदभांडों से है जिन पर कतिपय मत उत्कीर्णित रहते थे, विशेष तौर पर राज्य के लिए खतरनाक वस्तुओं से संबंधित ।

      निम्नलिखित कारणों  से मतदान व्यवहार का अध्ययन महत्वपूर्ण है-

      1. यह राजनीतिक समाजीकरण की प्रक्रिया को समझने में सहायक होता है।

      2. यह अभिजात्य के साथ – साथ आमजनों में भी लोकतंत्र के अंतस्थिकरण की जाँच करने में सहायक होता है।

      3. यह क्रांतिकारी मतपेटी के वास्तविक प्रभाव का महत्व बताता है।

      4. यह इस बात पर भी प्रकाश डालता है कि चुनावी राजनीति किस हद तक अतीत से जुड़ी है या विच्छेदित है।

      5. यह राजनीतिक विकास के संदर्भ में आधुनिकता अथवा प्राचीनता को मापने में सहायता करता है।

          भारत में मतदान व्यवहार को प्रभावित करने वाले कारक-

          1. अल्पकालिक तत्त्व

          2. दीर्घकालिक तत्त्व

          अल्पकालिक तत्त्व-

 -       बेरोजगारी में वृद्धि, महंगाई, मुद्रा स्फीति में वृद्धि आवश्यक वस्तुओं की कमी आदि को सम्मिलित किया जाता है।

-        इसके अन्तर्गत प्रभावशाली व्यक्तित्व, सुदृढ सरकार की इच्छा, भ्रष्टाचार, मीडिया, तात्कालिक राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय घटनाओं को भी सम्मिलित किया जाता है।

          दीर्घकालिक तत्त्व-

-        इसके अन्तर्गत जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्रीयता, राजनीतिक दलों के विचारधारा तथा कार्यक्रम विकास आदि मुद्दों को सम्मिलित किया जाता है।

-        वर्तमान समय में भारतीय मतदाता जागरूक हो रहा है तथा वह परम्परागत तत्त्वों के स्थान पर नवीन व आधुनिक मुद्दों जैसे- विकास, राष्ट्रवाद आदि के आधार पर मतदान का प्रयोग कर रहा है।

-        17वीं लोकसभा में 67.11% मतदान रहा है जिसके कारण भाजपा के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबन्धन की स्पष्ट बहुमत से सरकार बनी है।

-        17वीं लोकसभा के मतदान व्यवहार को प्रभावित करने वाले तत्त्वों में – पुलवामा आतंकी हमला, राष्ट्रवाद का मुद्दा, POK में सर्जिकल स्ट्राईक, नरेन्द्र मोदी का प्रभावशाली व्यक्तित्व, कमजोर तथा बिखरा हुआ विपक्ष, समावेशी विकास आदि मुद्दे प्रमुख रहे हैं।

नागरिक समाज तथा राजनीतिक आन्दोलन

-        नागरिक समाज एक नवीन अवधारणा है जो कि राज्य की तुलना में व्यक्ति पर बल देती है। यह स्वैच्छिक गैर-सरकारी संगठन है जो सरकार के कार्यक्रमों तथा नीतियों की कमियों को उजागर करती है तथा जनता को उसके प्रति जागरूक करती है।

-        नागरिक समाज एवं बुद्धिजीवी वर्ग है जो कि जनता में जागरुकता पैदा करने का कार्य करता है। यह समाज तथा सरकार के बीच मध्यस्थ की भूमिका का निर्वहन करता है। इसकी प्रकृति स्वैच्छिक होती है अर्थात् इसमें भाग लेने के लिए किसी को बाध्य नही किया जा सकता है। ये विकेन्द्रीकरण, विश्व शास्त्र, वैश्विक नागरिकता का समर्थन करते हैं। इनके द्वारा जनता के लिए नवीन अधिकारों की मांग की जाती है।

          नागरिक समाज की अवधारणा का प्रतिपादन

          विश्व में-

-        सर्वप्रथम सिसरो के द्वारा नागरिक समाज की अवधारणा का प्रतिपादन किया गया एवं जॉन ऑक तथा मान्टेस्क्यू के द्वारा इसका विस्तार किया गया।

          भारत में-

-        भारत में सर्वप्रथम नीरा चंडोक के द्वारा “सिविल सोसायटी” पुस्तक के माध्यम से इसकी शुरूआत की गई।

          नागरिक समाज  की परिभाषा

एस. के. दास- ”नागरिक समाज वो संगठित समाज है जिस पर राज्य शासन करता है ।”

-        जॉर्ज हजिंस- ”नागरिक समाज एक सामाजिक स्थान है जो राज्य और व्यापारिक क्षेत्रों से अलग होता है किंतु साथ-साथ काम करते हुए राज्य के साथ, कभी-कभी तनावपूर्ण सह-संबंध रखता है ।”

-        जेफ्री अलेक्ज़ेंडर- ”नागरिक समाज एक समावेशी छाते जैसी अवधारणा है जो राज्य के बाहर की अनगिनत संस्थाओं के संबंध में उद्धरित की जाती है ।”

-        नीरजा गोपाल जायाल- ”नागरिक समाज तमाम ऐसे स्वैच्छिक संगठनों और सामाजिक अंतरक्रियाओं को समावेशित करता है जिन पर राज्य का नियंत्रण नहीं होता ।”

-        सूसैन हेबर रुडोल्फ- ”भिन्न-भिन्न सिद्धांतकारों ने नागरिक समाज की परिभाषा विभिन्न प्रकार से की है, परंतु एक न्यूनतम परिभाषा अ-राज्यीय स्वायत्त क्षेत्र के विचार को सम्मिलित करेगी जिसके अंतर्गत आता है- नागरिकों का सशक्तिकरण, परस्पर विश्वास निर्माण और संघ जीवन राज्य की अधीनता के बजाए इसके साथ परस्पर क्रिया ।”

-           लैरी डायमंड- ”नागरिक समाज एक संगठित सामाजिक जीवन को दर्शाता है जो कि स्वैच्छिक, स्वजनित, स्व-समर्थित होती है और एक वैधानिक व्यवस्था या सहभागिता मूल्यों के समुच्चय द्वारा घिरा होता है ।”

नागरिक समाज  के संघटक

-           स्वदेशी लोगों के संगठन

-           मजदूर संगठन

-           किसान संगठन

-           सहकारी संस्थाएँ

-           धार्मिक संगठन

-           युवा दल

-           महिला दल

-           गैर-सरकारी संगठन

-           समुदाय आधारित संगठन

          नागरिक समाज के लक्षण

-        इसका लक्ष्य समान सार्वजनिक भलाई है ।

-        यह जनमत का निर्माण करता है और सामान्य प्रकृति की माँगें तय करता है ।

-        यह उत्पीड़न नहीं बल्कि स्वैच्छिकतावाद का महत्वपूर्ण प्रतीक है ।

-        यह स्वायत्त होते हुए भी राज्य की सत्ता के अधीन है ।

-        यह राज्येतर संस्थाओं को इंगित करता है ।

-        इसमें समाज का विशाल क्षेत्र आता है ।

-        यह संगठित समाज को इंगित करता है ।
नागरिक समाज प्रमुख आन्दोलन
-        नागरिक समाज के द्वारा चलाए गए प्रमुख आन्दोलनों में उत्तराखण्ड में पेड़ों की कटाई के विरोध तथा पर्यावरण संरक्षण को लेकर चलाया गया चिपको आन्दोलन, महाराष्ट्र में दलितों के उत्थान को लेकर चलाया गया दलित पैन्थर्स आन्दोलन, जयप्रकाश नारायण के द्वारा महंगाई, बेरोजगारी के विरुद्ध सम्पूर्ण क्रान्ति, गुजरात में सरदार सरोवर बाँध तथा मध्य प्रदेश में नर्मदा सागर परियोजना को लेकर विस्थापितों की समस्या एवं उनका पुनर्वास मेधा पाटेकर का नर्मदा बचाओ आन्दोलन, राजस्थान में वृक्षों की कटाई के विरोध में खेजडली आन्दोलन, अरुणा रॉय के मजदूर किसान शक्ति संगठन के द्वारा सूचना के अधिकार को लेकर चलाया गया सूचना आन्दोलन, अन्ना हजारे के द्वारा जनलोकपाल विधेयक को लेकर चलाए गए आन्दोलन प्रमुख हैं।
  आलोचना
-        आलोचकों का यह मानना है कि नागरिक समाज अस्थिरता उत्पन्न करने का कार्य करते हैं। इनकी प्रकृति विकास विरोधी होती है। लोकतंत्र में कानून का निर्माण सड़कों पर उतर कर नहीं अपितु संसद के माध्यम से किया जाना चाहिए। परन्तु लोकतंत्र को सर्वव्यापी बनाने के लिए, विकास को समावेशी बनाने के लिए राज्य तथा सरकार की निरकुंश शक्तियों को सीमित करने के लिए प्रशासन को नैतिक तथा जनता के प्रति उत्तरदायी बनाने के लिए जनता को अपने अधिकारों के प्रति जागरुक बनाने के लिए नागरिक समाज की अवधारणा प्रासंगिक है।