मुगलकालीन प्रशासन
मुगलकालीन प्रशासन मुख्यत: अरबी, फारसी व भारतीय प्रशासन का मिला-जुला रूप था।
मुगलकालीन राजस्व सिद्धान्त शरीयत पर आधारित था।
आइने-अकबरी (अबुल फजल) के अनुसार बादशाह वही बनता है जो ईश्वर का प्रतिनिधित्व तथा पृथ्वी पर ईश्वर का दूत होता है।
जिसमें एक साथ हजारों व्यक्तियों के गुण समाहित हो। इस सिद्धान्त को दैविय सिद्धान्त कहा जाता है।
मुगल प्रशासन में बादशाह को सहायता देने हेतु एक मंत्री परिषद् होती थी, जिसे विजारत कहा जाता था।
मुगल प्रशासन ‘केन्द्रिकृत’ निरंकुश प्रशासन था, जो खलीफा की सत्ता में विश्वास नहीं करता था।
बाबर ने 1507 ई. में मिर्जा की उपाधि का त्याग कर बादशाह (पादशाह) की उपाधि धारण की यह उपाधि धारण करने वाला यह प्रथम शासक था।
मुगल काल से पूर्व दिल्ली सल्तनत काल के दौरान शासक सुल्तान की उपाधि धारण करते तथा वे खलीफा के अधीन रहकर शासन संचालित करते थे तथा खलीफा से जो आदेश प्राप्त करते थे जिसे “सनद” कहा जाता था।
1579 ई. में अकबर ने मजहर की घोषणा की। इस मजहर का अर्थ था अगर किसी धार्मिक विषय पर कोई वाद-विवाद की स्थिति प्रकट होती है तो इसमें बादशाह अकबर का फैसला सर्वोपरी होगा और यह फैसल सबको स्वीकार करना पड़ेगा।
मुगल कालीन केन्द्रीय प्रशासन
मुगल सम्राट साम्राज्य का प्रमुख होने के साथ ही सर्वोच्च सेनापति, सर्वोच्च न्यायधीश व इस्लाम का रक्षक और जनता का आध्यात्मिक नेता होता था।
शासन में अपनी सहायता के लिए बादशाह विभिन्न मंत्रियों की नियुक्ति करता था तथा प्रत्येक मंत्री का अपना पृथक्क कार्यालय होता था।
मुगल कालीन केन्द्रीय प्रशासन में सर्वोच्च इकाई केन्द्र था। जिसका प्रमुख बादशाह व मंत्री परिषद् होती थी।
केन्द्र को सूबा में विभाजित किया जाता था जिसका सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी “सूबेदार” होता था।
सूबा को सरकार (जिला) में विभाजित किया जाता था जिसका सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी “फौजदार” होता था।
सरकार को परगना (तहसीलों) में विभाजित किया जाता था जिसका सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी “शिकदार” होता था।
परगनों को गाँव (मौजा) में विभाजित किया जाता था जिसका प्रमुख मुकदम या चौधरी होता था।
प्रान्तीय (सूबा) शासन व्यवस्था :-
बाबर और हुमायूँ के शासन की प्रान्तीय व्यवस्था विकसित नहीं हो पाई थी।
मुगल कालीन प्रान्तीय प्रशासन के विकास का श्रेय अकबर को जाता है जिन्होंने 1580 ई. में मुगल साम्राज्य को सूबो में विभाजित किया तथा सूबो के प्रमुख अधिकारी सूबेदार व सूबाई दिवान होते थे।
सूबेदार :- यह प्रान्त का सार्वोच्च अधिकारी था इसे प्रान्त के सम्पुर्ण सैनिक व असैनिक अधिकार प्राप्त थे। इसे सूबेदार, नाजिम या सिपहसालार के नाम से जाना जाता था।
सूबाई दिवान :- ये प्रान्त में राजस्व विभाग का संचालक होता था इसका प्रमुख कार्य आय-व्यय का लेखा-जोखा रखना तथा राजस्व संबंधी मुकदमों का निर्णय करना होता था।
सरकार (जिला) :- मुगल प्रशासन में सूबो (प्रान्त) को जिला या सरकार में बांटा गया था जिसके प्रमुख अधिकारी फौजदार (कानून व्यवस्था) व अमलगुजार (राजस्व व्यवस्था) होते थे।
परगना :- सरकार से नीचे की इकाई परगना थी। सरकार (जिला) कई परगनों में विभाजित था इसके प्रमुख अधिकारी शिकदार (कानून व्यवस्था) व आमिल (राजस्व व्यवस्था) होते थे।
गाँव (मौजा) :- प्रशासन की सबसे छोटी इकाई गाँव थी। गाँव का प्रशासन मुकदम (कानून) व पटवारी (राजस्व) के नियन्त्रण में था।
वजीर (वकील या प्रधानमंत्री) :- यह बादशाह के बाद सबसे शक्तिशाली पद था जिसे सैनिक व असैनिक दोनों अधिकार प्राप्त थे। अकबर के काल में वजीर को वकील कहा जाने जगा। इसे “वकील-ए-मुतलक” कहा जाता था। बाबर व हुमायूँ के काल में वजीर का पद सबसे महत्वपूर्ण था।
बाबर के वजीर का नाम निजामुद्दीन खलीफा।
हुमायूँ के वजीर का नाम अमीरउवैस व हिन्दुबेग।
अकबर के वजीर का नाम बैराम खाँ व माहम अनगा।
नोट : -
माहम-अनगा मुगल काल में वकील, वजीर व प्रधानमंत्री बनने वाली प्रथम व अंतिम महिला थी।
बैराम खाँ की मृत्यु के बाद अकबर ने वकील की शक्तियों को कम करने हेतु अपने शासन काल के 8वें वर्ष में दिवान का पद सृजित किया जिसे “दिवान-ए-वजारत-ए-कुल” कहा जाता था। इसे राजस्व व वित्त मामलों का सर्वोच्च अधिकारी बना दिया था तथा मुजफ्फर खाँन को प्रथम दिवान नियुक्त किया था।
अकबर ने वकील के एकाधिकार को समाप्त करने हेतु उसके समस्त अधिकारों को निम्न चार लोगों में विभाजित किया :-
दीवान – वित्त मामले
मीर बख्शी – सैनिक मामले
मीर-ए-सांमा – घरेलू मामले
सद्र-उस-सुदुर – धार्मिक मामले
दीवान-ए-कुल :- अकबर ने वकील (प्रधानमंत्री) की शक्तियों को कम करने हेतु 1565 ई. में इस पद का सृजन किया तथा इसके निम्न कार्य थे जैसे :-
राजस्व व वित्त मामलों का प्रमुख होता था।
राजस्व नीति का निर्माण करना।
सूबई दिवान की नियुक्ति बादशाह द्वारा दीवान-ए-कुल की सलाह से की जाती थी।
दीवान-ए-खालसा :- इस प्रमुख कार्य खालसा भूमि (सरकारी भूमि) की देखरेख करना।
दीवान-ए-जागीर :- इसका प्रमुख कार्य जागीर भूमि व इनाम भूमि की देखरेख करना।
दीवान-ए-वाकियात :- इसका प्रमुख कार्य रोजाने की आमदनी व खर्चों का लेखा-जोखा रखना।
मुस्तौफी :- इसका प्रमुख कार्य लेखा परीक्षक (ऑडीटर जनरल) करना।
मुसरिफ-ए-खजाना :- यह मुख्यत: खजांची होता था।
मीर बख्शी :- यह सैनिक विभाग का प्रमुख होता था। मीर बख्शी सेनापति नहीं होता था क्योंकि सर्वोच्च सेनापति बादशाह स्वयं होता था।
मीर बख्शी के निम्न कार्य थे :-
सैनिकों की नियुक्ति
सैनिकों का हुलिया रखना
सैनिकों को रसद व हथियार आपूर्ति करना
युद्ध काल के दौरान सैनिकों को वेतन बाटने का कार्य
सेना को वेतन मीर बख्शी द्वारा “सरखत” नामक पत्र पर हस्ताक्षर करने के बाद ही मिलता था।
शाही महल व यात्राओं के दौरान बादशाह की सुरक्षा का कार्य भी देखा जाता था।
मीर-ए-सामा:
इस पद का सृजन अकबर द्वारा किया गया, औरंगजेब के काल में इसे “खाने समा” कहा जाने लगा।
अकबर के काल में मीर-ए-समा दीवान के अधीन कार्य करता था, परन्तु जहाँगीर ने इसे स्वतंत्र मंत्री का दर्जा दे दिया।
यह घरेलू मामलों का प्रधान होता था, बादशाह तथा महल की दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति करता था।
राज्य के कारखानों का निरीक्षण, दीवान-ए-बयूयात व मुशर्रिफ पर नियंत्रण रखने का कार्य भी करता था।
शाही दावतों का आयोजन करवाना भी इसका प्रमुख कार्य था।
सद्र-उस-सुदुर :
धार्मिक मामलों का प्रमुख होता था, जो बादशाह को सलाह भी देता था।
प्रमुख कार्य :
दान-पुण्य की व्यवस्था करना,
विद्वानों को कर मुक्त भूमि प्रदान करना, वजीफा दैना
धार्मिक शिक्षा की व्यवस्था करना व इस्लामी कानूनों का पालन करवाना।
दान में दी गई भूमि (मदद-ए-माश) का निरीक्षण करना।
Note : प्रारंभिक समय में सद्र-उस-सूदूर ही काजी के रूप में कार्य करता था, परन्तु अकबर ने इन दोनों पदों को अलग कर “काजी-उल-कुजात” नामक पद का सृजन किया।
अकबर के समय ही “अब्दुल नबी” नामक सद्र को भ्रष्टाचार के कारण पद से हटा दिया गया।
मुगलकाल का प्रथम “सद्र-उस-सूदूर” शेख गदई था
1578 के बाद प्रांतों में भी सद्र की नियुक्ति की जाने लगी।
काजी-उल-कुजात :
मुख्य काजी (न्यायधीश), इसकी सहायता हेतु “मुफ्ती” नियुक्त होते थे,
मुफ्ती की व्याख्या के आधार पर ही काजी अपने निर्णय देता था, वर्तमान वकील के समान
मुहतसिब :
इनकी नियुक्ति औरंगजेब के द्वारा की गई जो मुस्लिम वर्ग के लोगों की नैतिक चरित्र की जाँच करना था,
इस्लाम के अनुसार आचरण करवाना मुख्य कार्य :
औरंगजेब ने बनारस फरमान के द्वारा हिंदु मंदिरों को तोड़ने का कार्य मुहतसिबों को दिया था।
मुगलकालीन अन्य अधिकारी :
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अधिकारी |
विभाग/कार्य |
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1 मीर-ए-आतिश (मीर |
शाही तोपखाने का प्रमुख |
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2 मीर-ए-बर्र |
वन विभाग का प्रमुख होता था |
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3 मीर-ए-बहर |
जल सेना का प्रमुख व शाही नौकाओं की देखरेख करने |
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4 दरोगा-ए-डाकचौकी |
डाकविभाग व गुप्तचर विभाग का प्रमुख |
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5 मीर-ए-अर्ज |
बादशाह के पास भेजे जाने वाले आवेदन पत्रों का प्रभारी |
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6 मीर-ए-तोजक |
धार्मिक उत्सवों का प्रबध करने वाला अधिकारी |
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7 वाकिया-नवीस |
समाचार लेखक व गुप्तचर |
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8 खुफिया नवीस |
गुप्त सूचनाएँ केन्द्र (बादशाह) तक पहुँचाने का कार्य |
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9 हरकारा |
संदेश वाहक व गुप्तचर |
बितक्ची :- प्रांतों में भूमि व लगान के कागज तैयार करने वाला
मुशरिफ :- (लेखाधिकारी) – राज्य की आय – व्यय का लेखा-जोखा
मुस्तौफी :- (लेखा परीक्षक) – मुशरिफ द्वारा तैयार रिकॉर्डस की जाँच
मुसद्दी :- बंदरगाह का प्रशासक
प्रांतीय प्रशासन
बाबर व हुमायु को प्रांतीय प्रशासन का गठन करने का समय नहीं मिला, अत: मुगलकाल में प्रांतीय प्रशासन का जनक “अकबर” को माना जाता है।
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शासक |
प्रांत (सुबों) की संख्या |
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1. अकबर |
1580 ई. सूबों की संख्या- 1 |
Note : अकबर के शासनकाल के अंतिम समय में दक्षिण अभियान बरार, खानदेश, अहमदनगर को जीतने के बाद - (15 सूबे) हो गये थे
Note : आइने अकबरी (अकबरनामा का तीसरा अध्याय) में सूबों की संख्या 12 बताई गई है।
2 जहाँगीर : सूबों की संख्या 15
Note : जहाँगीर ने कांगड़ा (हिमाचल) को तीतने के बाद उसे लाहौर सूबे में मिला दिया अत: सूबों की संख्या – 15
3 शाहजहाँ : 18 सूबे
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शाहजहाँ ने |
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कश्मीर (लाहौर सूबे में शामिल) |
को जीतकर इन तीन सूबों शामिल किया |
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थट्टा (मुल्तान सूबे में शामिल) |
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उड़ीसा (बंगाल सूबे में शामिल) |
4 औरगंजेब : 20/21
मुगलकाल में सर्वाधिक सूबों की संख्या इसी के काल में थी
औरंगजेब ने बीजापुर (1686) व गौलकुण्डा (1687) ई. में जीता इस प्रकार सूबों की संख्या – 20
Note : प्रो. राय चौधरी व मजूमदार ने औरंगजेब के काल में सूबों की संख्या 21 बताई है
सूबे के मुख्य प्रशासक को – सूबेदार/सिपहसालार/ नाजिम कहा जाता था।
सूबेदार :
सूबे का सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी
1586 ई. में सूबेदार की शक्तियों को नियंत्रित करने हेतु अकबर प्रांतीय दीवान (सुबई) का पद सृजित
Note : सूबेदार को संधि करने व मनसब प्रदान करने का अधिकार नहीं था परन्तु गुजरात के सुबेदार राजा टोडरमल को अकबर ने राजपूतों से संधि करने व उन्हें मनसब प्रदान का अधिकार प्रदान किया था।
प्रांतीय दीवान :
पद का सृजन अकबर द्वारा किया गया।
प्रांतों में वित्त व राजस्व का सर्वोच्च अधिकारी था।
यह शाही दीवान के प्रति उत्तरदायी था।
प्रांतों में दीवानी मामलों का निपटारा भी करता था।
बख्शी : प्रांतों में सेना की देखभाल करना।
वाकिया निगार के रूप में प्रांतों की सूचना केन्द्र में देने का कार्य।
मीर-ए-अदल :
इसकी नियुक्ती सर्वप्रथम अकबर द्वारा की गई थी।
यह दान, (अनुदान) व उत्तराधिकार से संबंधित मामलों का निपटारा करता था।
बड़े सूबों व उनकी राजधानियों में यह कार्य करने हेतु “कौतवाल” की नियुक्ती की जाती थी।
सरकार (जिला) प्रशासन :
फौजदार : सर्वोच्च प्रशासक था।
अमलगुजार : राजस्व व वित्त से संबंधित कार्य करना।
खालसा भूमि से भी राजस्व वसूलता था।
बितक्ची : अमलगुजार के अधीन लिपिक, लगान व भूमि के कागज तैयार करवाना।
खजानदार : मुख्य खजांची होता था।
परगने का प्रशासन :
1 शिकदार : सर्वोच्च प्रशासक होता था।
2 आमिल : किसानों से राजस्व वसूल करने हेतु – अकबर ने 1574 ई. में 1 करोड़ दाम से अधिक राजस्व वाले परगनों में एक आमिल की नियुक्ती की जिसे “करौड़ी” कहा जाता था।
अमीन : शाहजहाँ द्वारा नियुक्त – मालगुजारी का निर्धारण करने हेतु इसकी नियुक्ति की जाती थी।
फौजदार : मुख्य खंजाची होता था।
कारकून : परगने का लिपिक
परगने का लेखा (रिकॉर्ड - फारसी) भाषा में रखा जाता था।