भारत का प्राकृतिक स्वरूप एवं भौतिक संरचना
दो भूखण्डों का मिलन : भारतीय उप-महाद्वीप का वर्तमान भौगोलिक स्वरूप गोंडवाना भूमि और अंगारा भूमि के मिलन की कहानी से संबंध रखता है।
दक्षिणी भूखंड गोंडवाना भूमि पुराजीव महाकल्प समाप्त होने पर खंडित हो गया और उत्तरी भूखंड अंगारा भूमि की ओर धीरे-धीरे बढ़ने लगा।
इस दोनों भूखंडों के बीच विस्तृत सागर के रूप में टेथिस सागर था।
महाद्वीपों का अपने स्थान से हटते रहना, दो प्लेटों का बड़े पैमाने पर झटका लगने का परिणाम है।
लगभग कोई 20 करोड़ वर्ष पूर्व गौंडवाना भूमि के खंडित होकर उत्तर की ओर खिसकने के फलस्वरूप भारत वर्तमान रूप में विकसित हुआ है।
हिमालय पर्वतमाला और उत्तर के विशाल मैदान विस्तृत सागर (जिसे 'टेथिस सागर' नाम दिया गया है) की कोख से जन्में और विकसित हुए हैं।
इस प्रकार भारत का निर्माण टेथिस सागर और गोंडवाना लैंड से हुआ।
भूगर्भीय संरचना का इतिहास :
भूगर्भीय संरचना की दृष्टि से भारत के तीन स्पष्ट विभाग हैं और वे हैं -
(1) प्रायद्वीपीय भारत - यह भूखंड प्राचीनतम चट्टानों का बना है, जो गोंडवाना लैंड का भाग है (विन्ध्यन से दक्षिणी दक्कन तक)।
(2) नवीन वलित पर्वतीय मेखला- हिमालय पर्वत व उससे संबंधित नवीन मोड़दार पर्वत श्रेणियाँ, जिनमें दक्षिणी प्रायद्वीपीय भारत की अपेक्षा नयी चट्टानें हैं। थार का मरुस्थल टेथिस सागर में नदियों के तलछट के जमाव के परिणामस्वरूप बना। यह आर्कियन युग की आग्नेय चट्टानों से निर्मित है।
(3) सिंधु-गंगा का मैदान – इसका विस्तार सिंधु नदी घाटी से असम में ब्रह्मपुत्र नदी घाटी तक है।
यह देश का नवीनतम भू-भाग है, जिसका निर्माण नव महाकल्प के अभिनूतन और नूतन कालों में हिमालयों के उत्थान के उपरांत निर्मित अग्रगर्त के अवसादन के कारण हुआ है।
इससे स्पष्ट होता है कि भारत के तीनों भौतिक प्रदेशों का निर्माण क्रमशः एक के बाद दूसरे से हुआ है।
भारतीय चट्टानों के कई उपसमूह पाये जाते हैं और कुछ उपसमूहों को मिलाकर समूह का निर्माण होता है।
भारत के प्राकृतिक विभाग
(क) उत्तरी पर्वतीय प्रदेश (हिमालय पर्वतीय प्रदेश) :
यह नवीन मोड़दार पर्वतमाला है।
इनको बनाने में दबाव की शक्तियों अथवा समानान्तर भू-गतियों का अधिक हाथ रहा है।
इनको बनाने वाली परतदार चट्टानें बहुत अधिक मुड़ एवं टूट गई हैं।
उनमें अनेक प्रकार के मोड़, शायी मोड़, ग्रीवाखण्डीय मोड़ तथा उल्टी भ्रंशें पाई जाती है।
यह पर्वत अभी भी निर्माणावस्था में हैं।
यहां पर अनेक काल के समुद्रों में निक्षिप्त परतदार चट्टानें मिलती हैं।
इस श्रेणी की ढाल तिब्बत की ओर नतोदार (Concave) प्रकार की है तथा भारत की ओर उन्नत्तोदर (Convex) प्रकार की है।
यह विश्व की नवीनतम मोड़दार या वलित पर्वतमाला है।
वास्तव में, इसके पर्वत उस एक ही पर्वत समूह के अंग हैं जो यूरोप में पिरेनीज और आल्प्स से आरम्भ होकर भारत की सारी उत्तरी सीमा से होते हुए पूर्वी सीमा और उससे आगे तक फैले हुए हैं।
पूर्व से पश्चिम दिशा में इसकी लम्बाई 2400 किमी. है और इसकी चौड़ाई 160 से 400 किमी. के बीच पाई जाती है।
यह पर्वतमाला भारत के 5 लाख वर्ग किमी. क्षेत्र में विस्तृत है।
एशिया महाद्वीप में 6500 मी. से अधिक ऊंची 94 चोटियाँ हैं जिनमें से 92 चोटियाँ इसी पर्वतीय प्रदेश में स्थित हैं।
पश्चिम से पूर्व की ओर पर्वतीय भाग की चौड़ाई घटती जाती है, किन्तु ऊंचाई बढ़ती जाती है और साथ ही ढाल भी तीव्र होती जाती है।
हिमालय का वर्गीकरण तीन प्रकार से किया जाता है-
(A) भौगोलिक, (B) प्रादेशिक एवं (C) भू-गर्भीय
(A) भौगोलिक वर्गीकरण :
(1) वृहत् हिमालय : सबसे ऊंची व लगातार फैली यह आन्तरिक श्रेणी नंगा पर्वत से लेकर नामचा बरवा पर्वत तक फैली है।
इसकी लम्बाई 2400 किमी. औसत चौड़ाई 25 किमी. एवं औसत ऊंचाई 6100 मी. है।
इसकी ऊंचाई पश्चिम में नंगा पर्वत के रूप में 8126 मी. तथा पूर्व में नामचा बरबा पर्वत के रूप में 7756 मी. है।
इसका मध्य भाग जो प्रमुखतः नेपाल देश में विस्तृत है, सबसे ऊंचा भाग है।
विश्व की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट (8848 मी.) इसी पर्वत श्रेणी पर (नेपाल में) स्थित है।
हिमालय की सबसे ऊंची-ऊंची चोटियाँ इसी भाग में पायी जाती हैं। मुख्य चोटियाँ हैं -
माउंट एवरेस्ट (8848 मी.) नेपाल
गॉडविन आस्टिन (8,611 मी.) J & K (P o K)
कंचनजंघा (8,598 मी.) सिक्किम
मकालू (8,481 मी.)
धौलागिरी (8172 मी.)
मंशालू (8163 मी.)
नंगा पर्वत (8126 मी.)
अन्नपूर्णा (8076 मी.)
नंदा देवी (7817 मी.)
इस पर्वत श्रेणी में अनेक दर्रें मिलते हैं।
प्रमुख दर्रा या घाटी :-
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बोलन घाटी (पाकिस्तान) |
क्वेटा एवं कंधार को खक्कर से जोड़ती है। |
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खैबर दर्रा (पाकिस्तान) |
पेशावर को काबुल से जोड़ता है। |
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जोजिला दर्रा (J & K) |
श्रीनगर से लेह को जोड़ता है। |
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बुर्जिल दर्रा (J & K) |
श्रीनगर से गिलगित को जोड़ता है। |
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बनिहाल (J & K) |
जम्मू को कश्मीर से जोड़ता है। |
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काराकोरम दर्रा (J & K) |
श्रीनगर से यारकन्द को जोड़ता है। भारत का सबसे अधिक ऊंचाई पर स्थित दर्रा है। |
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शिपकिला दर्रा (हिमाचल प्रदेश) |
भारत-तिब्बत मार्ग, शिमला से गार्टोक (तिब्बत) को जोड़ता है। |
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बड़ालापचा (हिमाचल प्रदेश) |
लेह को कुल्लू मनाली, कैलांग से जोड़ती है। |
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रोहतांग दर्रा (हिमाचल प्रदेश) |
लाहोल स्फीति को लेह लद्दाख से जोड़ता है। |
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माना और नीति दर्रा (उत्तराखंड) |
इससे मानसरोवर और कैलाश घाटी की ओर मार्ग जाता है। |
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लिपुलेख (उत्तराखंड) |
यह कुमायूं क्षेत्र को तिब्बत के तकला कोटा (पुरंग) शहर को जोड़ता है। |
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नाथूला एवं जेलेप ला (सिक्किम) |
भारत तिब्बत मार्ग, (कालिंपोंग से ल्हासा तक जाती है) चुम्बी घाटी से होकर जाता है। |
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बोमडिला दर्रा (अरूणाचल प्रदेश) |
भारत को चीन से जोड़ता है। |
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यांग्याप दर्रा (अरूणाचल प्रदेश) |
भारत को चीन से जोड़ता है। |
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दिफू दर्रा (अरूणाचल प्रदेश) |
भारत को चीन से जोड़ता है। |
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पांगसांड दर्रा (अरूणाचल प्रदेश) |
भारत को म्यांमार से जोड़ता है। |
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तुजु दर्रा (मणिपुर) |
भारत को म्यांमार से जोड़ता है। |
प्रमुख घाटियाँ :-
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क्र.सं. |
घाटी |
पर्वत श्रृंखला |
नदी |
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1 |
कश्मीर घाटी |
महान हिमालय तथा पीर पंजाल |
झेलम नदी |
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2 |
कुल्लू - कॉगड़ा घाटी |
महान हिमालय तथा धौलाहार |
व्यास नदी |
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3 |
मसूरी घाटी |
महान हिमालय तथा नाग टिब्बा |
यमुना नदी |
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4 |
काठमाण्डू घाटी |
महान हिमालय तथा महाभारत पर्वत माला |
बाघमती नदी |
(2) मध्य हिमालय :
यह श्रेणी महान हिमालय के दक्षिण में उसी के समानान्तर फैली हुई है।
इसकी चौड़ाई 80 से 100 किमी. औसत ऊंचाई 3700 से 4500 मी. है।
यहां नदियां 1,000 मी. की गहराई पर बहती हैं।
पीरपंजाल श्रेणी इसका पश्चिम विस्तार है, जिसका कश्मीर में फैलाव मिलता है।
यह इसे श्रेणी की सबसे लम्बी व प्रमुख श्रेणी है।
झेलम और व्यास नदियों के बीच लगभग 400 किमी. की लम्बाई में लगातार फैलकर आगे यह श्रेणी दक्षिण-पूर्व दिशा में मुड़ जाती है।
इस श्रेणी में पीरपंजाल और बनिहाल दो प्रमुख दर्रे हैं।
इस श्रेणी के दक्षिण-पूर्व की ओर धौलाधार श्रेणी है, जिस पर शिमला नगर स्थित है।
भारत के प्रसिद्ध स्वास्थ्यवर्द्धक स्थान शिमला, मसूरी, नैनीताल, डलहौजी, दार्जिलिग आदि इसी श्रेणी के निचले भाग में स्थित हैं।
इस श्रेणी में स्लेट, चूना पत्थर, क्वार्टज और अन्य शिलाओं की अधिकता पायी जाती है।
इस भाग में कोणधारी वन मिलते हैं और ढालों पर छोटे-छोटे घास के मैदान पाये जाते हैं, जिन्हें कश्मीर में मर्ग (जैसे गुलमर्ग, सोनमर्ग) और उत्तरांखण्ड में बुग्याल और पयार कहते हैं।
मध्य व महान हिमालय के बीच विशाल सीमान्त दरार (Great Boundary Fault) पायी जाती है, जो पंजाब से असम राज्य तक विस्तृत है।
इसमें उल्टे भ्रंश व मोड़ पाये जाते हैं।
विवर्तनिक दृष्टि से हिमालय प्रायः शान्त रहा है।
मध्य और महान हिमालय के बीच दो खुली घाटियां पायी जाती हैं।
पश्चिम में कश्मीर की घाटी, पीरपंजाल व महान हिमालय के मध्य फैली हैं एवं पूर्व में काठमांडू घाटी है, जो नेपाल में स्थित है।
इसके गर्भ भाग में ग्रेनाइट नीस तथा शिष्ट चट्टानें पाई जाती हैं। पार्श्व भागों में अपरदित अवसादीय चट्टानें पाई जाती हैं।
(3) उप-हिमालय या शिवालिक श्रेणी : यह उपयुक्त दोनों श्रेणियों के दक्षिण में फैली है।
इन्हें बाह्य हिमालय भी कहते हैं।
इस श्रेणी की औसत ऊंचाई 900-1500 मी. है।
शिवालिक को जम्मू में जम्मू पहाड़ियां तथा अरुणाचल प्रदेश में डफला, मिरी, अबोर और मिशमी पहाड़ियों के नाम से जाना जाता है।
यह हिमालय का सबसे नवीन भाग है जिसका निर्माण मध्य मायोसीन से निम्न प्लीस्टोसीन काल तक माना जाता है।
यह श्रेणी भी अपने उत्तर में मध्य हिमालय से 'मुख्य सीमान्त दरारश् द्वारा अलग होती है।
शिवालिक एवं मध्य हिमालय के बीच अनेक घाटियाँ पायी जाती हैं।
मध्यवर्ती भाग में हरी-भरी घाटियों को पूर्व में 'द्वार' (हरिद्वार, कोटद्वार, रामद्वार) एवं पश्चिम में 'दून' (देहरादून, पाटलीदून) के नाम से पुकारते हैं।
देहरादून, हरिद्वार ऐसे ही मैदान हैं।
इन घाटियों में गहन खेती की जाती है तथा ये घनी बसी हैं।
(4) ट्रान्स हिमालय श्रेणी : यह महान हिमालय के उत्तर में या तिब्बत के दक्षिण में स्थित है।
कराकोरम श्रेणी को उच्च एशिया की रीढ़ भी कहा जाता है।
इसमें अनेक पर्वत श्रेणियां लद्दाख, जास्कर, कैलाश, कराकोरम शामिल हैं।
यह श्रेणी बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली नदियों तथा उत्तर की ओर भूमि से घिरी हुई झीलों में गिरनेवाली नदियों के लिए जल-विभाजक का कार्य करती हैं।
हिमालय के दीर्घ मोड़ : हिमालय पर्वत श्रेणियों के उत्तर-पश्चिम और उत्तर-पूर्व के अंतिम छोरों के निकट दीर्घ वलन हैं जिन्हें उत्तर-पश्चिम मोड़ और उत्तरी-पूर्वी मोड़ कहा जाता है।
पश्चिम की ओर इन श्रेणियों का विस्तार पश्चिम-उत्तर-पश्चिम दिशा में है।
यहां हिमालय तेजी से मुड़कर दक्षिण-पश्चिम दिशा में सुलेमान और किरथर श्रेणी कहलाते हैं।
पूर्व में हिमालय दक्षिण-पश्चिम दिशा में मुड़ जाता है जहां इनके अनेक नाम हैं-पटकोई, नागा, मणिपुर, लुशाई, अराकान आदि।
(B) हिमालय का प्रादेशिक वर्गीकरण :
(1) पंजाब हिमालय : यह सिन्धु नदी से लेकर सतलज नदी तक 560 किमी. लम्बाई में फैला है।
इसमें जास्कर, लद्दाख, कराकोरम, पीरपंजाल एवं धौलाधार श्रेणियां शामिल हैं।
यह कश्मीर व हिमालय प्रदेश राज्यों में फैला है।
पंजाब हिमालय के दक्षिणी ढालों पर वनों की प्रधानता है, जबकि उत्तरी ढाल निर्जन, ऊबड़-खाबड़ तथा शुष्क है।
शुष्क होने के कारण हिम रेखा अधिक ऊंचाई पर पायी जाती है।
पंजाब हिमालय की मुख्य चोटियाँ टाटाकुटी और ब्रह्मासकल हैं तथा मुख्य दर्रे पीरपंजाल, बनिहाल, जोजीला, बुर्जिल आदि है।
(2) कुमायूं हिमालय : इसका विस्तार सतलज नदी से काली नदी तक 320 किमी. की लम्बाई में उत्तराखण्ड राज्य में फैला है।
इस भाग की मुख्य चोटियाँ बद्रीनाथ, केदारनाथ, त्रिशूल, माना गंगोत्री, नन्दादेवी, कामेत और शिवलिंग हैं।
भागीरथी, अलकनन्दा और यमुना नदियों के उद्गम स्थान यहीं है।
यह उत्तराखण्ड में फैला है।
नन्दादेवी कुमायूं हिमालय का सर्वोच्च शिखर है।
दून घाटियां शिवालिक व मध्य हिमालय के बीच स्थित हैं।
नैनीताल के निकट नैनीताल, भीमताल तथा सातताल झीलें स्थित हैं।
माना एवं नीति दर्रों द्वारा यह भाग तिब्बत से जुड़ा हुआ है।
(3) नेपाल हिमालय : यह 800 किमी. के विस्तार में काली नदी और तिस्ता नदी के बीच में फैले हैं।
इसकी औसत ऊंचाई 6,250 मी. है।
इस भाग में भारत की सबसे ऊंची चोटियाँ अन्नपूर्णा प्रथम, धौलागिरि, गोसाईनाथ, कंचनजंघा, मकालू और एवरेस्ट स्थित हैं।
गंगा मैदान की कई प्रमुख नदियों जैसे- घाघरा, कोसी, गण्डक, तिस्ता आदि का उद्गम यहीं से होता है।
ऊंचे भागों में मिट्टी का क्षरण होने से यहां के उच्च भाग का धरातल वनस्पतिविहीन है, किन्तु निचले भागों, ढालों व घाटियों में देवदार, स्प्रूस, फर, चीड़ आदि के कोणधारी वन मिलते हैं।
काठमांडू घाटी यहां की प्रमुख घाटी है।
(4) असम हिमालय : तिस्ता नदी से ब्रह्मपुत्र नदी (दिहांग) तक यह 750 किमी. की लम्बाई में फैला हैं।
इस श्रेणी की ढाल दक्षिणवर्ती मैदान की ओर बड़ी तेज है, किन्तु उत्तर-पश्चिम की ओर क्रमशः धीमी होती गयी है।
यह श्रेणी नेपाल हिमालय की अपेक्षा नीची है।
यह सिक्किम, असम व अरुणाचल राज्यों व भूटान देश में फैली है।
इस भाग की मुख्य चोटियाँ कुलाकांगड़ी, चुमलहारी, काबरु, जांग सांगला और पोहुनी हैं।
सिक्कम की चुम्बी घाटी में जेलेप ला और अरुणाचल प्रदेश में बुमला दर्रे स्थित हैं।
(ख) उत्तर का विशाल मैदानी भाग -
लगभग 3200 कि.मी. की लम्बाई में विस्तृत यह मैदानी भाग औसतन 150-300 कि.मी. की चौड़ाई रखता है जिसका अधितम उच्चावच 291 मी. है और इसका क्षेत्रफल 7.5 लाख वर्ग किमी. है।
चूंकि यह मैदानी भाग सिंधु गंगा व ब्रह्मपुत्र नदियों के अपवाह तंत्र के द्वारा लाये गये अवसादों से निर्मित है इसीलिए सिंधु, गंगा, ब्रह्मपुत्र मैदान भी कहते हैं।
इस मैदान के पूर्वी भाग जहां आर्द्र प्रदेश है वहीं पश्चिमी भाग शुष्क रेगिस्तानों के रूप में निर्मित हो गया है।
यहां तक कि थार मरुस्थल भी इसी मैदान का पश्चिमी शुष्क प्रदेश है जो इस प्रदेश में जलवायुविक परिवर्तन के कारण निर्मित हुआ है।
यहां बालू के टीलों की अधिकता है।
भूगर्भिक संरचना के अनुसार उत्तर के विशाल मैदानी भाग को पांच भागों में बांटकर देखा जा सकता है-
1. भाबर-
यहां कंकड़, पत्थर, रेत की अधिकता के कारण अत्यधिक पारगम्यता मिलती है, जिसमें छोटी-छोटी नदियां विलुप्त हो जाती हैं।
यही कारण है नदियां यहां अंतः प्रवाही या विलुप्त हो जाती है।
लगभग 8-16 किमी. चौड़ाई में यह क्षेत्रीय सिंधु से तिस्ता नदी तक प्रायः अविछिन्न रूप में फैली है।
2. तराई-
भाबर प्रदेश के दक्षिणी भाग व उसके समान्तर में अत्यधिक आर्द्रता मैदानी भाग व कुछ दलदली क्षेत्र हैं।
भाबर प्रदेश की विलुप्त नदियां यहां पुनः सतही प्रवाह रखती परंतु इनकी गति धीमी रहती है।
तराई प्रदेश अत्यधिक जैव विविधता का केन्द्र है।
3. बांगर-
ये सामान्यतः उच्च मैदानी भागों में मिलते हैं जहां बाढ़ का पानी नहीं पहुंचता।
ये पुराने जलोढ़ों से निर्मित है तथा इसमें सामान्यतः रेत व कंकड़ की अधिकता रहती है।
बांगर मिट्टियों के प्रायः असमतल तथा कंकड़ वाले अधिकता वाले क्षेत्र को 'भूड़' कहा जाता है।
ये निचले भागों की तुलना में औसतन 30 मीटर की ऊंचाई रखती है।
निचले खादर मैदानों की तुलना में अपेक्षाकृत कम उर्वर होती है।
बांगर व खादर के ढांचे युक्त क्षेत्र को 'खोल' कहा जाता है।
शुष्क क्षेत्रों कहीं-कहीं लवणीय उत्फुलन देखे जाते हैं, जिन्हें 'रेह' कहते हैं।
4. खादर-
ये निम्न मैदानी भाग है जहां नदियां प्रत्येक वर्ष नवीन जलोढ़कों का जमाव करती हैं।
इनके कण अपेक्षाकृत बारीक होते हैं।
बांगर की तुलना में अधिक उपजाऊ मिट्टियों तथा सामान्यतः बाढ़ के मैदानों डेल्टाई क्षेत्रों में ये अपना विस्तार रखती है।
खादर मिट्टियाँ होलोसीन काल की उत्पत्ति हैं।
पश्चिमी बंगाल, बिहार, पूर्वी उत्तरप्रदेश में खादर का अधिक विस्तार पाया जाता है।
5. डेल्टा-
जब नदियां समुद्र में जाकर गिरती हैं तो गिरते समय कई धाराओं में बंट जाती है।
वह प्रदेश डेल्टा कहलाता है।
यहां उच्च भूमि को 'चार' तथा दलदली क्षेत्र को 'बिल' कहते हैं।
क्षेत्रीय आधार पर विभाजन -
1. सिंधु सतलज का मैदान-
इनमें बांगर मिट्टियों की प्रधानता है क्योंकि यहां बाढ़ की घटनाएं नहीं होती तथा नवीन जलोढ़ों की आपूर्ति नहीं हो पाती।
यह मैदान अनेक दोआब में विभाजित है।
इनमें 'सिंधु सागर दोआब', सिंधु व झेलम के मध्य में है।
झेलम व चिनाव के मध्य 'चाझ' 'दोआब' कहलाता है।
चिनाव व रावी के बीच का दोआब 'रेचना दोआब'।
रावी व्यास के बीच मैदानी 'बारी दोआब' कहलाता है।
व्यास व सतलज के बीच 'बिस्त दोआब' का क्षेत्र आता है।
सतलज के दक्षिण में राजस्थान क्षेत्र में कभी सरस्वती नदी प्रवाहित होती थी।
सतलज एवं सरस्वती के बीच भी दोआब क्षेत्र थे परंतु सरस्वती के विलुप्त के बाद यह दिखाई नहीं पड़ता।
घग्घर-हाकरा पाट इस दोआब के अवशेष के रूप में बचे हैं।
पश्चिमी शुष्क प्रदेशों के भी सिंधु नदी तंत्र से जोड़कर देखा जाता है।
2. गंगा नदी तंत्र के मैदान-
यह भी कई भागों में विभक्त है इनमें सबसे पश्चिमी में गंगा यमुना दोआब क्षेत्र आते हैं जिसे ट्रान्स गंगा मैदान कहा जाता है।
इसमें बांगर मिट्टियों की प्रधानता है ऊपरी गंगा मैदान में भी बांगर मिट्टियों की प्रधानता है मध्य गंगा मैदान में बागर के साथ खादर मिट्टियां भी मिलती है।
निम्न गंगा मैदान व डेल्टाई भाग पूर्णता खादर मिट्टियों से निर्मित है।
प्रायद्वीपीय भारत से आने वाली चम्बल, सोन, जैसी नदियां गंगा नदी तंत्र के मैदान के निर्माण में सहायक है।
सिंधु सतलज मैदानों से गंगा नदी तंत्र के मैदान अम्बाला के आस-पास के भूमि के द्वारा अलग होते हैं।
3. ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र का मैदान-
असम के रैम्प घाटी क्षेत्र में अवसादों के जमाव से इस मैदानी भाग का निर्माण हुआ, बांग्लादेश में गंगा नदी तंत्र से मिल जाती है तथा गंगा ब्रह्मपुत्र का डेल्टा बनाती है।
इनके द्वारा निर्मित मैदान में खादर मिट्टियों की प्रधानता है( उत्तर के विशाल मैदान भारत में अपनी उर्वर मिट्टियों के लिये विख्यात हैं।
मैदानी क्षेत्र होने के करण यहां भूमिगत जल के भंडार हैं साथ ही यहां नदियों की बहुलता है इसीलिए यहां सिंचाई का बेहतर विकास सम्भव हुआ है एवं यह कृषि के दृष्टिकोण से और अधिक उपयोगी बन सका है।
इस प्रकार उत्तर का विशाल मैदान व्यापक आर्थिक महत्व रखता है।
(ग) प्रायद्वीपीय पठार :
यह लगभग 16 लाख वर्ग किमी. क्षेत्र पर फैला देश का सबसे बड़ा भू-आकृति प्रदेश है।
भारत का प्रायद्वीपीय पठारी प्रदेश एक अनियमित त्रिभुजाकार आकृति है, जिसका आधार दिल्ली एवं राजमहल की पहाड़ियों के बीच उत्तरी मैदान की दक्षिणी सीमा तथा शीर्ष कन्याकुमारी है।
यह पठार भारत का प्राचीनतम भू-खंड है, जिसकी समुद्र तल से औसत ऊंचाई 600 से 900 मी. है।
यह पठारी भाग तीनों ओर से पर्वतों द्वारा घिरा हुआ है।
इसके उत्तर में अरावली, विन्ध्याचल और सतपुड़ा की पहाड़ियों, पश्चिम में पश्चिमी घाट और पूर्व में पूर्वी घाट स्थित हैं।
नर्मदा और ताप्ती (भ्रंश घाटी से गुजरती है) की संकरी श्रेणियों ने इसे दो असमान भागों में बांट रखा है।
उत्तरी भाग को मालवा का पठार तथा दक्षिणी भाग को दक्षिण का मुख्य पठार अथवा 'दक्कन ट्रैप' कहते हैं।
इस पठार के प्रमुख भाग हैं :
(1) मालवा का पठार :
लावा से निर्मित मालवा का पठार काली मिट्टी का समप्राय मैदान बन गया है।
यह पठार स्थान-स्थान पर नदियों के प्रवाह के कारण टूट गया है।
इस भाग में पूर्व की ओर बघेलखण्ड और पश्चिम की ओर बुन्देलखंड में नदियों द्वारा निर्मित बड़े-बड़े बीहड़ खड्ड पाए जाते हैं, जिनके कारण अधिकांश भूमि खेती के अयोग्य हो गयी है।
मालवा पठार के इस लहरदार प्रदेश में कहीं कहीं साधारण ऊंचाई की पहाड़ियाँ भी मिलती हैं (जैसे ग्वालियर की पहाड़ियाँ), किन्तु इन सब में विन्ध्याचल श्रेणी मुख्य है।
यह विंध्याचल, से चंबल नदी के आसपास तथा यमुना के बीच फैला हुआ है।
मालवा का पठार का अपवाह बंगाल की खाड़ी तथा अरब सागर दोनों ओर है नर्मदा, तापी एवं माही नदियाँ अरब सागर में तथा चम्बल सिंध और केन नदियों का पानी बंगाल की खाड़ी में गिरता है।
(2) छोटानागपुर का पठार :
यह पठार बिहार एवं झारखंड में फैला हुआ है।
सोन नदी इस पठार के दक्षिण-पश्चिम में एवं दामोदर नदी पठार के मध्य भाग में पश्चिम से पूर्व दिशा की ओर प्रवाहित होती है।
राजमहल पहाड़ियाँ इस पठार की उत्तरी सीमा बनाती हैं।
दामोदर घाटी एक भ्रंश के रूप में है।
यह पठार खनिज पदार्थों में धनी है।
यहां पर भारत के प्रमुख खनिज बाक्साइट, अभ्रक व कोयला भारी मात्रा में पाये जाते हैं।
छोटा नागपुर पठार में आर्कियन युग की ग्रेनाइट व नाइस चट्टान पाई जाती है।
(3) मेघालय का पठार :
मेघालय के पठार में आर्कियन, धारवाड़ और टर्शियरी युग की चट्टानें पाई जाती हैं।
यह उत्तर-पूर्व दिशा में मिकिर पहाड़ियों के नाम से फैली है।
इस पठार की उत्तरी ढाल खड़ी ढाल है जहां पर ब्रह्मपुत्र नदी बहती है तथा दक्षिणी ढाल धीमी है।
गारो, खासी एवं जयन्तियां यहां की प्रमुख पहाड़ियाँ हैं।
(4) तेलंगाना का पठार :
तेलंगाना का पठार मुख्य धारवाड़ युग की चट्टानों से बना है।
गोदावरी एवं वर्धा नदी इस पठार की प्रमुख नदियाँ हैं।
गोदावरी नदी इसे दो भागों में बांटती है।
इस पठार के दक्षिणी भाग पर उर्मिल मैदान मिलते हैं, जिन पर सिंचाई के लिए तालाब बनाने हेतु उपयुक्त भूमि भी मिलती है।
पहाड़ियाँ -
अरावली और बुंदेलखंड के बीच के नाइस क्षेत्र काफी घिस चुके हैं।
विंघ्य और सतपुड़ा के बीच नर्मदा और ताप्ती द्रोणियां प्रसिद्ध भ्रंश घाटियाँ है।
दक्षिणी पठार अत्यन्त पुरानी कड़ी और रवेदार परिवर्तित चट्टानों से निर्मित है।
मध्यवर्ती पश्चिमी भाग लावा प्रदेश है, जहां विखंडन के चलते रेगुर या काली मिट्टी मिलती है।
पठार के पूर्वी और पश्चिमी तटों पर संकरे मैदान कच्छ से लेकर उड़ीसा तक फैले हुए हैं।
पूर्वी तट पर नदियों के पूर्व विकसित डेल्टा पाये जाने के कारण तटीय मैदान अधिक चौड़े हो गये हैं।
दक्षिणी पठार पर पहाड़ों की जो शृंखला पायी जाती हैं, वो इस प्रकार हैं -
(1) अरावली पर्वतमाला -
यह उत्तर-पश्चिम में है और अवशिष्ट पर्वतमाला का उदाहरण है।
यह विच्छिन्न पहाड़ियों की शृंखला के रूप में गुजरात से दिल्ली तक विस्तृत है।
इसकी मुख्य पहाड़ियां राजस्थान में स्थित हैं।
इसकी अधिकतम ऊंचाई आबू पहाड़ी के गुरु शिखर की है, जिसकी ऊंचाई 1722 मीटर है।
अरावली के पश्चिम में थार मरुस्थल है, जहां कठोर अपरदित चट्टानें और अर्द्धचन्द्रकार बालुका स्तूप मिलते हैं।
थार मरुस्थल लगभग ढाई लाख वर्ग किमी. क्षेत्र में विस्तृत है।
अरावली के पूर्व में चम्बल नदी की प्रसिद्ध बीहड़ घाटी मिलती है, जो मालवा पठार से होकर गुजरती है।
(2) विंध्य पर्वतमाला -
इसकी श्रेणी मालवा के दक्षिण से आरम्भ होती है और उत्तरी भारत को दक्षिणी भारत से अलग करती है।
प्राचीन युग की परतदार चट्टानों से बनी इस श्रेणी में रक्त चट्टानें प्रधान रूप से मिलती हैं।
यह पश्चिम से पूर्व की ओर भारनेर, कैमूर तथा पारसनाथ पहाड़ियों के रूप में बिहार तक विस्तृत है।
(3) सतपुड़ा श्रेणी -
यह श्रेणी विंध्याचल के दक्षिण में है और उसके समानान्तर है।
इसमें पाये जानेवाले सात मोड़ों का सम्बन्ध इसके सात उत्थानों से बताया जाता है।
सतपुड़ा पश्चिम में राजपीपला पहाड़ियों से आरम्भ होकर महादेव और मैकाल पहाड़ियों के रुप में छोटानागपुर पठार की पश्चिमी सीमा तक विस्तृत है।
सतपुड़ा का सबसे ऊंचा भाग महादेव पहाड़ी है जिस पर पंचमढ़ी नगर स्थित है।
सोन और नर्मदा नदियों का उद्गम यहीं है।
मैकाल से पूर्व की ओर पर छोटानागपुर और राजमहल की पहाड़ियाँ और उससे भी पूर्व की ओर मेघालय की पहाड़ियाँ (गारो, खांसी और जयन्तियां) मिलती हैं।
ये सभी दक्षिणी पठार के अंग हैं।
छोटानागपुर स्थित रांची का पठार समतलप्राय मैदान का सुन्दर उदाहरण प्रस्तुत करता है।
मेघालय (जिसे शिलांग पठार भी कहते हैं) छोटानागपुर पठार का अग्रभाग है।
यह भारत का सर्वाधिक वर्षा वाला स्थल है।
(4) पश्चिमी घाट -
यह अरब सागर के समानान्तर है।
ताप्ती के मुहाने से लेकर कुमारी अन्तरीप तक 1500 किमी. में विस्तृत पश्चिमी घाट की औसत ऊंचाई 900-1200 मी. है।
पश्चिमी घाट की महाराष्ट्र में उच्चतम् चोटी 'कल्सुबाई (1,646 मी)' हरिश्चन्द्र श्रेणी में स्थित है।
यह वास्तविक पर्वत श्रेणी नहीं हैं, बल्कि दक्षिणी पठार का अपरदित खड़ा कगार या किनारा है।
ताप्ती से 160 उत्तरी अक्षांश तक इस पर बैसाल्ट लावा का प्रवाह मिलता है।
160 अक्षांश उत्तर से दक्षिणी नीलगिरी तक इसमें ग्रेनाइट और नीस चट्टानें मिलती है।
पश्चिमी घाट में थालघाट, भोरघाट, और पालघाट एवं सेनकोट्टा दर्रे मिलते हैं।
पाल घाट - केरल को तमिलनाडु, कर्नाटक से जोड़ती है।
थाल घाट - इससे मुंबई-कोलकाता मार्ग गुजरता है। (581 मीटर)
भोर घाट - इससे मुंबई-पूना एवं दक्षिण को मार्ग जाता है। (630 मीटर)
लावा-भाग में महाबलेश्वर और दक्षिणी लावारहित भाग में ऊटी स्थित है।
नीलगिरि के दक्षिण अनयमलय (अन्नामलाई) की पहाड़ियाँ हैं जिनकी सबसे अधिक ऊंचाई 2695 मी. (अन्नाईमुड्डी के रूप में) है।
नीलगिरि की अधिकतम ऊंचाई 2637 मी. (दोदाबेटा शिखर के रूप में) है।
अनयमुदी के निकट ही पालनी और इलायची पहाड़ियां (कार्डेमम हिल) हैं।
पश्चिमी घाट में ही शरावती नदी का गरसोप्पा जलप्रपात मिलता है, जो भारत में सर्वोच्च है।
इस घाट के उत्तरी भाग को 'कोंकण' तट और दक्षिणी भाग को 'मालाबार' तट कहते हैं।
(5) पूर्वी घाट -
इसका विस्तार महानदी के मुहाने से कुमारी अंतरीप तक फैला है, इसकी औसत चौड़ाई 60 किमी. तथा लम्बाई 1800 किमी. है।
पूर्वी घाट न तो श्रृंखलाबद्ध है और न इसकी ऊंचाई ही अधिक है।
इसका उत्तरी भाग उड़ीसा और आंध्र प्रदेश में हैं, जहां महेन्द्रगिरि (1501 मी.) सबसे ऊंचा शिखर है।
उत्तरी-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम की ओर बढ़ते हुए यह नीलगिरी में मिल गया है।
उत्तरी खंड में उत्तरी पहाड़ी, मध्यखंड में कुडप्पा पहाड़ी और दक्षिणी खंड में तमिलनाडु पहाड़ी के नाम से पुकारी जाने वाली इन पहाड़ियों की ऊंचाई सामान्यतः 600 मी. है।
पूर्वी घाट में रेतीले जमावों द्वारा घिरी चिल्का और पुलीकट छिछली (Lagoon) झीलें बन गयी हैं।
इस संपूर्ण तट को 'कोरोमंडल' तट कहते हैं।
उत्तरी भाग को उत्तरी सरकार या गोलकुंडा, मध्यवर्ती भाग को काकीनाड़ा का तट और दक्षिणी भाग को कोरोमंडल तट कहते हैं।
(घ) तटीय मैदान और द्वीप समूह :
(i) तटीय मैदान
पूर्वी-पश्चिमी तटीय मैदान-
इन मैदानों का निर्माण नदियों द्वारा लाये गये अवसादों व समुद्री तरंगों द्वारा तटवर्ती भागों के अपक्षयन व अपरदन से निर्मित अवसादों के निक्षेपण से हुआ है।
पूर्वी व पश्चिमी तटीय मैदानों में कुछ मूलभूत अंतर है-
पश्चिमी तटीय मैदान-
पश्चिमी घाट के पश्चिमी भागों में संकीर्ण तटीय मैदान हैं।
पश्चिमी घाट से सैकड़ों नदियाँ निकलकर अरब सागर में गिरती हैं और ढाल अधिक होने तथा कम दूरी में बहने के कारण यह अवसादों को भी अल्प मात्रा में ही बहा कर ले जाती हैं।
इसीलिये इन मैदानों की चौड़ाई काफी कम है।
पश्चिमी तटीय मैदान काठियावाड़ से लेकर कन्याकुमारी तक विकसित है, जो 1840 किमी. लम्बा है।
गुजरात के क्षेत्र में इसे गुजरात मैदान, काठियावाड़ तट, सौराष्ट्र तट के नाम से जाना जाता है।
मुम्बई से गोवा तक क्षेत्र में इसे 'कोंकण तट' कहा जाता है।
जबकि गोवा से मंगलौर एवं मंगलौर से कन्याकुमारी के तटीय भाग क्रमशः कन्नड़ तट, मालाबार तट के नाम से जाने जाते हैं।
पश्चिमी तटीय मैदानों की सर्वाधिक चौड़ी नर्मदा ताप्ती के मुहाने पर मिलती है।
जहां 80 कि.मी. चौड़ा है जबकि सबसे संकीर्ण भाग कन्नड़ तट का क्षेत्र है।
मालाबार तट पर पश्च जलों व लैगूनों की अधिकता है।
इसमें बेम्बानद व अष्टमुदी झील (केरल) विशेष महत्वपूर्ण है।
पश्चिमी तटीय मैदान में सामान्यतः नदियों के द्वारा लाये गये अवसादों की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण है परंतु कच्छ या काठियावाड़ क्षेत्र में समुद्री निक्षेपों की प्रधानता है।
इसके अलावा यहां ज्वालामुखी बेसाल्टिक लावा के अपक्षयन से प्राप्त रेगुर मिट्टी का निर्माण हुआ है।
पश्चिमी तटीय मैदान अधिक कटे छटे हैं।
जिससे यहां प्राकृतिक पोताश्रयों का बेहतर विकास हो सकता है।
क्योंकि यहां प्राकृतिक खाड़ियों की अधिकता से पश्चिमी तटीय मैदान द. पश्चिमी मानसून पवनों के द्वारा भारी वर्षा प्राप्त करते हैं।
इस प्रकार ये अधिक वर्षा के क्षेत्र हैं।
पूर्वी तटीय मैदान-
ये अपेक्षाकृत अधिक चौड़े मैदान हैं।
बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली प्रायद्वीप नदियां अपेक्षाकृत लम्बी है तथा कम ढाल से प्रवाहित होते हुए समुद्र में गिरती है।
इन नदियों द्वारा डेल्टाओं का निर्माण किया जाता है।
महानदी डेल्टा, कृष्णा-गोदावरी डेल्टा, कावेरी डेल्टा आदि क्षेत्रों में भारी अवसादों का जमाव हुआ।
इस प्रकार डेल्टाई भाग में पूर्व तटीय मैदान अधिक चौड़ाई रखता है।
इन मैदानों में नदियों द्वारा लाए गए जलोढ़ों को मुख्य भूमिका रही है।
पूर्वी तटीय मैदान सुन्दर वन के डेल्टाई क्षेत्र से लेकर कन्याकुमारी तक विकसित है।
कृष्णा गोदावरी के उत्तरी भाग में उड़ीसा इसे कलिंग तट, उत्कल तट या आंध्र तटवर्ती क्षेत्र में उत्तरी सरकार तट के नाम से जाना जाता है।
जबकि कृष्णा डेल्टाई क्षेत्र से कन्याकुमारी तक का तटीय मैदान कोरोमण्डल तट कहलाता है।
सामान्यतः पूर्वी तटीय मैदान कम कटे-छटे हैं तथा यहां प्राकृतिक खाड़ियों की कमी है।
इसीलिए यहां प्राकृतिक पोताश्रयों का विकास भी ठीक से नहीं हो सका है।
दक्षिणी पश्चिमी मानसून पवनों से वर्षा इस तटीय भाग को प्रायः नहीं के बराबर मिलती है, यहां वर्षा की मुख्य मात्रा लौटते हुए उत्तरी पूर्वी मानसून से सर्दियों में प्राप्त होती है।
पूर्वी तटीय मैदान अपनी प्राकृतिक उर्वरता के लिए विख्यात हैं।
(ii) द्वीप समूह :
भारत में कुल 247 द्वीप हैं।
जिनमें से 204 द्वीप बंगाल की खाड़ी में तथा शेष 43 अरब सागर में स्थित हैं।
(A) बंगाल की खाड़ी के द्वीप :
इन द्वीपों की उत्पत्ति ज्वालामुखी उद्गारों से हुई है। बंगाल की खाड़ी के द्वीपों को दो भागों में रखा जाता है -
(1) तटवर्ती द्वीप :
बंगाल की खाड़ी में ऐसे द्वीपों की संख्या गंगा के डेल्टाई भाग में अधिक है।
गोदावरी, कृष्णा तथा कावेरी नदियों के डेल्टा पर ऐसे द्वीपों का अभाव है।
भारत और श्रीलंका के बीच मन्नार की खाड़ी में पम्बन द्वीप पाया जाता है, जो आदम पुल का एक अंश है। यह चट्टानी धरातल रखता है।
नेल्लौर के निकट श्रीहरिकोटा द्वीप महत्वपूर्ण है।
(2) दूरवर्ती द्वीप :
इनमें अंडमान और निकोबार द्वीप शामिल हैं -
(a) अंडमान द्वीप समूह :
अंडमान द्वीप समूह 8300 वर्ग किमी. में फैले हैं।
यहां पर टरर्शियरी काल की बलुआ पत्थर, चूना पत्थर तथा शेल चट्टानें पायी जाती हैं।
यहां पर वनों की अधिकता पायी जाती है।
इन द्वीपों का पश्चिमी तट प्रवाल चट्टानें रखता है, जो तट से 32 किमी. भीतर तक फैली है। पोर्ट ब्लेयर के उत्तर में दो ज्वालामुखी द्वीप-बैरन व नारकोनडम द्वीप पाये जाते हैं।
(b) निकोबार द्वीप समूह :
यह द्वीप-समूह अंडमान द्वीप समूह के छोटे अंडमान से 100 डिग्री चैनल द्वारा अलग है।
यह 19 द्वीपों का समूह है जो 6045' से 9030' उत्तरी अक्षांशों के बीच फैले हैं।
अंडमान-निकोबार द्वीप समूह निमग्न पर्वत की ऊपर उठी चोटियाँ हैं।
(B) अरब सागर के द्वीप :
अरब सागर के द्वीपों में लक्षद्वीप सम्मिलित किये जाते हैं।
ये केरल तट से दूर प्रवाल निक्षेपों पर निर्मित हैं।
इन द्वीपों में से सबसे दक्षिण में स्थित द्वीप मालदीव के ठीक उत्तर में स्थित है।
इन द्वीपों में से सबसे बड़ा द्वीप लक्षद्वीप है।
यह मुख्यतः प्रवाल भित्तियों से निर्मित है।
कवारत्ती जो कि इन द्वीपों की राजधानी है यही स्थित है।
अमीनदीवी छोटा द्वीप है।
मिनीकॉय धुर दक्षिण में स्थित सबसे बड़ा द्वीप है। यह आठ अंश पर स्थित है।
इन द्वीपों पर नारियल के वृक्ष अधिकता से पाये जाते हैं।
भारत के प्रमुख जलप्रपात
(Waterfalls of India)
1. जोग/गरसोपा/महात्मा गांधी जलप्रपात:- कर्नाटक के शिमोगा जिले के शरावती नदी पर स्थित यह भारत में सबसे ऊँचा गैर-पंक्तिबद्ध जलप्रपात है। यह कर्नाटक के पर्यटन में एक प्रमुख आकर्षण है।
2. शिव समुन्द्रम् जलप्रपात:- यह कर्नाटक राज्य में कावेरी नदी पर स्थित जलप्रपात है।
- यह भारत में दूसरा सबसे ऊँचा जलप्रपात है।
3. धुंआधार जलप्रपात:- यह नर्मदा नदी पर मध्यप्रदेश के जबलपुर जिले में अवस्थित है।
- यह जलप्रपात भेड़ाघाट क्षेत्र का प्रमुख दर्शनीय स्थल है।
- यहाँ नर्मदा की धारा 50 फीट ऊपर से गिरती है। जिसका जल सफेद धुएं के समान उड़ने लगता है, इसी कारण इसे धुआंधार कहते हैं।
4. हुण्डरु जलप्रपात - स्वर्ण रेखा नदी पर झारखण्ड राज्य में राची में स्थित जलप्रपात है।
- यहाँ पर जल 320 फीट की ऊँचाई से गिरता है।
5. वसुधारा जलप्रपात :- अलकनन्दा नदी पर उत्तराखण्ड राज्य में बद्रीनाथ के निकट स्थित है।
- इसे रहस्यमयी जल प्रपात के नाम से भी जाना जाता है।
6. पानासम जलप्रपात :- ताम्रपर्णी नदी पर तमिलनाडु राज्य में स्थित जलप्रपात है।
7. गोकक जलप्रपात:- गोकक नदी (कृष्णा नदी की सहायक) यह कर्नाटक राज्य में स्थित है।
- यह नियाग्रा जलप्रपात के सदृश है।
- सन् 1987 में भारत में पहली बार यहीं बिजली उत्पन्न की गई थी।
8. चित्रकूट जलप्रपात:- इन्द्रावती नदी पर छत्तीसगढ़ राज्य में स्थित है।
- इस जलप्रपात की ऊँचाई 90 फीट हैं। 90 फीट की ऊँचाई से इन्द्रावती की ओजस्विन धारा गर्जना करते हुए गिरती है।
9. दूधसागर जलप्रपात:- मांडवी नदी पर गोवा राज्य में स्थित है।
- यह एक पंक्तिबद्ध जलप्रपात है।
- इसकी ऊँचाई 310 मीटर (1017 फीट) है।
10. पायकारा जलप्रपात:-पायकारा नदी पर तमिलनाडु राज्य में नीलगिरी पहाड़ियों पर स्थित जलप्रपात है।
- इस जलप्रपात पर से जल विद्युत उत्पादन संयंत्र भी स्थापित है।
11. मधार व पुनासा जलप्रपात:-चंबल नदी पर मध्यप्रदेश के खंडवा जिलों में स्थित जलप्रपात है।
- इस झरने की खासियत यह है कि गर्मी के दिनों में भी पर्याप्त मात्रा में पानी भरा रहता है।
12. चूलिया जलप्रपात:-चूलिया जलप्रपात चम्बल नदी पर भैंसरोड़गढ़ के निकट राजस्थान में स्थित है।
13. अय्यानार जलप्रपात:-यह पश्चिमी घाट में तमिलनाडु में विरुद्धनगर जिले में स्थित है।