कृषि
किसी निश्चित क्षेत्र में, एक निश्चित अवधि के अंतर्गत फसलों को ऐसे क्रम में उगाया जाना, जिससे कि भूमि की उर्वरा शक्ति का न्यूनतम हृास हो, फसल चक्र कहलाता है।
फसल चक्र के निर्धारण में यह ध्यान रखा जाता है कि कम गहरी जड़ वाली फसलों के बाद गैर दलहनी फसलें चाहिए। जैसे अरहर के बाद गेहूँ और दलहनी फसल के बाद गैर दलहनी फसल बोना चाहिए। अधिक खाद व कम पानी की आवश्यकता वाली फसलों की खेती करनी चाहिए। फसल चक्र को अपनाने से मृदा की उर्वराशक्ति बनी रहती हैं तथा रोग, कीट एवं खरपतवार के नियंत्रण में सहायता मिलती है। इसके अतिरिक्त सीमित साधनों का अधिकतम उपयोग कर अधिक उत्पादन करना संभव होता है। शस्य प्रतिरूप के आधार पर देश में तीन प्रकार की कृषि पाई जाती है।
भारत में फसलों का वर्गीकरण
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खरीफ |
रबी |
जायद |
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वर्षा काल |
शीतकाल |
ग्रीष्मकाल |
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उष्ण - आर्द्र जलवायु |
शीतोष्ण जलवायु |
शुष्क जलवायु |
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स्यालू |
उनालू |
मतीरे |
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मक्का |
गेहूँ |
सब्जियाँ |
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चावल |
चना |
चारा |
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कपास |
सरसों |
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बाजरा |
इसबगोल |
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सोयाबीन |
अफीम |
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उत्पादन - उद्देश्य के आधार पर
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खाद्यान्न |
तिलहन |
दलहन |
व्यापारिक |
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मक्का |
मूँगफली |
चना |
गन्ना |
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बाजरा |
सरसों |
मूँग |
कपास |
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गेहूँ |
अरण्डी |
उड़द |
चाय |
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चावल |
अलसी |
अरहर |
अफीम |
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रागी |
तिल |
मोठ |
कॉफी |
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होहोबा |
मसूर |
तम्बाकू, मसालें |
रबी की फसल - यह सामान्यतया अक्टूबर - नवम्बर में बो कर अप्रैल - मई तक काट ली जाती है। सिंचाई की सहायता से तैयार होने वाली फसल में मुख्यत: गेहूँ, जौ, चना, मटर, सरसों, राई आदि की कृषि की जाती है।
खरीफ की फसल - यह वर्षा काल की फसल है, जो जून - जुलाई में बुवाई करके सितम्बर - अक्टूबर तक काट ली जाती है। इसके अन्तर्गत चावल, ज्वार, बाजरा, रागी, मक्का, जूट, मूँगफली, कपास, पटसन, तम्बाकू, मूँग, उड़द, लोबिया आदि की कृषि की जाती हैं।
जायद की फसल - यह फसल रबी एवं खरीफ की मध्यवर्ती काल में अर्थात् मार्च में बुवाई करके जून तक काट ली जाती है। इसमें सिंचाई के माध्यम से सब्जियों तरबूज, खरबूज, ककड़ी, खीरा, करेला आदि की कृषि की जाती है। मूँग, उड़द व कुल्थी जैसी दलहनी फसलें भी इस समय उगाई जाती हैं।
आर्द्रता के आधार पर कृषि के प्रकार
तर कृषि - तर कृषि काँप मिट्टी के उन क्षेत्रों में प्रचलित है, जहाँ वर्षा की मात्रा 200 सेमी. से अधिक पाई जाती है। मध्य व पूर्वी हिमालय प्रदेश, प. बंगाल, असम, मेघालय, नागालैण्ड, मणिपुर, त्रिपुरा, मिजोरम तथा पश्चिम समुद्रतटीय मैदान पर इस प्रकार की कृषि का प्रसार है। यहाँ पर वर्ष में एक से अधिक बार भूमि से कृषि उत्पादन प्राप्त किया जाता है। यहाँ बिना सिंचाई के खेती होती है। चावल, जूट इस कृषि की प्रमुख फसलें हैं।
आर्द्र कृषि - यह कृषि काँप तथा काली मिट्टी के उन क्षेत्रों में प्रचलित है जहाँ वर्षा की मात्रा 100 से 200 सेमी. के बीच रहती है। ऐसे क्षेत्र मध्य एवं पूर्वी गंगा का मैदान, ब्रह्मपुत्र की घाटी तथा उत्तरी - पूर्वी पठारी भाग पर विस्तृत है।
- इसमें पूर्वी उत्तरप्रदेश, बिहार, झारखण्ड, छत्तीसगढ़, ओडिशा, प. बंगाल तथा असम राज्यों के भू - भाग शामिल हैं। यहाँ पर वर्ष में दो फसलों के अलावा कभी - कभी जायद फसल भी प्राप्त कर ली जाती है।
शुष्क कृषि - ऐसी भूमि में जहाँ वार्षिक वर्षा 50 सेमी. अथवा इससे कम हो वहाँ बिना किसी सिंचाई साधन के उपयोगी फसलों के आर्थिक उत्पादन को शुष्क कृषि कहते हैं।
- शुष्क कृषि के क्षेत्रों में फसल उत्पादन के लिए भूमि में वर्षा के पानी की अधिक से अधिक मात्रा को सुरक्षित रखा जाता है। संक्षेप में कहा जा सकता है कि शुष्क कृषि उत्पादन की वजह सुधरी प्रणाली है जिसमें किसी निश्चित भूमि पर पानी की अधिकतम मात्रा को सुरक्षित रखकर भरपूर उत्पादन किया जाता है।
सिंचित कृषि - इस कृषि का प्रसार काँप, काली व लाल, पीली मिट्टी के उन क्षेत्रों में मिलता है, जहाँ पर वर्षा की मात्रा 50 - 100 सेमी. के बीच रहती है, जो कि कृषि के लिए अपर्याप्त होती है।
- इन भागों में कृषि प्रमुख रूप से सिंचाई पर निर्भर करती है। इसका विस्तार पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तरप्रदेश, उत्तरी व दक्षिणी तमिलनाडु तथा पूर्वी तट पर नदियों के डेल्टा प्रदेशों तक सीमित हैं। यहाँ पर गेहूँ, चावल व गन्ना की खेती की जाती है।
विशिष्ट कृषि - झूमिंग - वह क्षेत्र जहाँ पर आदिवासियों की अधिकता है, जैसे - नागालैण्ड, त्रिपुरा, मणिपुर, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश और पश्चिमी घाट में झूमिंग कृषि की जाती है, जिसे निम्न नामों से जाना जाता हैं-
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क्र. स. |
नाम |
राज्य |
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1. |
वालरा |
गरासिया जनजाति द्वारा दक्षिण राजस्थान में |
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2. |
चिमाता |
भीलों द्वारा पहाड़ी क्षेत्र पर दक्षिण राजस्थान में |
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3. |
दजिया |
भीलों द्वारा मैदानी क्षेत्र पर दक्षिण राजस्थान में |
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4. |
पौंडू |
आंध्र प्रदेश |
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5. |
दीपा / वीवर |
मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ |
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6. |
बींगा / कोमान |
ओडिशा |
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7. |
कुरुवा |
मुण्डा जनजाति द्वारा झारखण्ड में |
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8. |
खिल |
हिमाचल प्रदेश |
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9. |
पाम्लू |
मणिपुर |
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10. |
बोग्मा |
मेघालय |
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11. |
कुमारी |
केरल (पश्चिम घाट) |
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12. |
झूम |
पूर्वोत्तर भारत मे |
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13. |
डाहिया / देपा |
मध्य प्रदेश |
भारत की प्रमुख खाद्यान्न फसलें
- भारत की भौतिक संरचना जलवायुविक एवं मृदा संबंधी विभिन्नताओं के कारण यहाँ अनेक प्रकार के फसलों की कृषि की जाती है। खाद्यान्न का अभिप्राय घास कुल के उन पौधों से है, जिन्हें खाने के लिए उगाया जाता है। इन्हें तीन वर्गों में विभाजित कर सकते हैं।
प्रमुख खाद्यान्न - इसके अन्तर्गत मक्का, धान एवं जौ को सम्मिलित किया जाता है।
मोटे अनाज - इसके अन्तर्गत मक्का, ज्वार, बाजरा तथा महुआ आते हैं।
लघु खाद्यान्न - इसके अन्तर्गत महुआ या रागी, कोदो, सांवा, काकुन, चना तथा कटुकी को शामिल किया जाता है।
चावल - यह ग्रेमिनी कुल की एक उष्णकटिबंधीय फसल है एवं भारत की मानसूनी जलवायु में इसकी अच्छी कृषि की जाती है। चावल हमारे देश की सबसे प्रमुख खाद्यान्न फसल है। गर्म एवं आर्द्र जलवायु हेतु उपर्युक्त होने के कारण इसे खरीफ की फसल के रूप में उगाया जाता है। देश में सकल बोयी गई भूमि के 23% क्षेत्र में एवं खाद्यान्नों के अन्तर्गत आने वाले कुल क्षेत्र में 47% भाग पर चावल की कृषि की जाती है। विश्व में चावल के अंतर्गत आने वाले सर्वाधिक क्षेत्र (28%) भारत में हैं, जबकि उत्पादन में इसका चीन के बाद दूसरा स्थान है। कृष्णा - गोदावरी डेल्टा क्षेत्र को भारत के चावल के कटोरे के नाम से जाना जाता है। चावल के लिए आवश्यक भौगोलिक दशाएँ निम्नलिखित हैं -
- चिकनी उपजाऊ मिट्टी, गर्म जलवायु
- 75 सेमी. से 200 सेमी. तक वर्षा
- प्रारंभ में तापमान 20°C तथा बाद में 27°C
- भारत में चावल की तीन फसलें होती हैं, जो मुख्यत: पश्चिम बंगाल में वर्षभर बोयी जाती है।
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किस्म |
ऋतु |
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अमन |
शीतकालीन |
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ओस |
शरदकालीन |
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बोरा |
ग्रीष्मकालीन |
- भारत की प्रमुख फसलें -
- खरीफ में सर्वाधिक उत्पादन - चावल
- चावल भारत में वर्ष भर बोयी जाने वाली फसल है।
- वर्ष भर सर्वाधिक उत्पादन की जाने वाली फसल चावल है।
- रबी - गेहूँ
- अनाज - चावल
- दलहन - चना
- तिलहन - मूँगफली
- व्यापारिक फसल - चाय
चावल - उष्ण - आर्द्र जलवायु की फसल है।
सर्वाधिक उत्पादन -
(1) प. बंगाल
(2) उत्तर प्रदेश
(3) पंजाब - उत्पादकता में पंजाब का प्रथम स्थान है।
- चावल उत्पादन में चीन के बाद भारत का दूसरा स्थान है, लेकिन निर्यात में भारत प्रथम स्थान पर है।
- प. बंगाल में चावल वर्ष भर बोया जाता है।
- ग्रीष्म काल - बोरा
- शीतकाल - औंस
- वर्षा काल - अमन
पद्मा, जमुना, जगन्नाथ, गोदावरी - चावल की अन्य किस्में हैं।
- छत्तीसगढ़ को चावल का कटोरा कहा जाता है।
- थंजाबुर (तमिलनाडु)- दक्षिण भारत का चावल का कटोरा (कावेरी डेल्टा)
विश्व में सर्वाधिक कृषि क्षेत्र :- (प्रतिशत के आधार पर)
(1) भारत - 51 %
(2) USA - 20 %
(3) चीन - 11 %
(4) कनाडा - 5 %
- देश में सबसे अधिक अमन का उत्पादन होता है, जो जून से अगस्त तक बोकर नवम्बर से जनवरी तक काट ली जाती है। यहाँ विभिन्न राज्यों में उगाई जाने वाली चावल की कुछ विशेष किस्में इस प्रकार हैं - साम्बा, कुर्रुवई, कामिनी, कालाजीय गोंविद भोग (पश्चिम बंगाल), जरीसाल (गुजरात), बासमती (छत्तीसगढ़), वैज्ञानिकों ने जीन परिवर्तन (आनुवांशिक परिवर्तन) करके विटामिन A की कमी को दूर करने वाले चावल का विकास किया है। इस चावल का नाम गोल्डन राइस रखा गया है। गोल्डन राइस में पर्याप्त मात्रा में बीटा - कैरोसीन पाया जाता है। देश में चावल का प्रति हेक्टेयर उत्पादन अभी भी विकसित देशों की तुलना में बहुत कम है, जबकि जापान में 6240 किग्रा. प्रति हेक्टेयर चावल का उत्पादन किया जाता है। उत्पादन की दृष्टि से पश्चिम बंगाल 13.26% पंजाब 11.85% तथा उत्तर प्रदेश 11.75% का क्रमश: प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय स्थान है।
- एग्रो उद्योग द्वारा वर्ष 2018 - 19 में चावल उत्पादन का लक्ष्य 113 मिलियन टन था। जो कि 2017 - 18 में 112.9 मिलियन टन उत्पादन हुआ था, जबकि भारत का कुल खद्यान्न उत्पादन लक्ष्य 2018 - 19 में 285.2 मिलियन टन था जबकि उत्पादन 2017 - 18 में 248.8 मिलियन टन था।
गेहूँ - यह ग्रेमिनी कुल का पौधा है। विश्व में गेहूँ उत्पादन में चीन के बाद भारत का दूसरा स्थान है। चावल के बाद यह देश की दूसरी महत्त्वपूर्ण खाद्यान्न फसल है। देश की कुल कृषि योग्य भूमि के लगभग 10% एवं कुल बोए गए क्षेत्र के 13% भाग पर गेहूँ की कृषि की जाती है। चावल की अपेक्षा इसका प्रति हेक्टेयर उत्पादन अधिक है। इसकी अधिकांश कृषि सिंचाई के सहारे की जाती है। भारत में विश्व के लगभग 12.5% गेहूँ का उत्पादन होता है। हरित क्रांति के पश्चात गेहूँ में उच्च उत्पादकता एवं उत्पादन प्राप्त किया गया है। गेहूँ के लिए आवश्यक भौगोलिक दशाएँ निम्न हैं-
- जलोढ़ मृदा
- 50 सेमी. से 75 सेमी. तक वर्षा
- आरंभ से तापमान 10°C से 15°C तथा बाद में 20°C से 25°C हैं।
- गेहूँ में सामान्यत: प्रोटीन 8 - 15% कार्बोहाइड्रेट, 65 - 70%, वसा - 1.5% तथा खनिज 2.0% पाए जाते हैं।
- गेहूँ में ग्लूटिन नामक प्रोटीन अधिक मात्रा में पाई जाती है। गेहूँ के सबसे प्रमुख उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश (31.98%), मध्य प्रदेश (15.96%) तथा पंजाब (17.90%) है। हरियाणा, राजस्थान व बिहार अन्य प्रमुख उत्पादक राज्य है। उत्पादकता की दृष्टि से प्रथम स्थान पंजाब राज्य का है। गेहूँ की प्रमुख किस्में प्रताप, अर्जुन, जनक, कल्याण, सोना, गिरिजा 335 आदि प्रमुख हैं।
- ICAR द्वारा पूसा बेकर नामक गेहूँ की नई प्रजाति विकसित की गई है। बिस्कुट के लिए विकसित यह किस्म यूरोपीय देशों द्वारा निर्धारित मानक के अनुसार हैं।
जौ - यह भी देश की एक महत्त्वपूर्ण खाद्यान्न फसल है। इसकी गणना मोटे अनाजों में की जाती है। यह सामान्यतया शुष्क एवं बलुई मिट्टी में बोया जाता है। हरित एवं नमी सहन करने की क्षमता अधिक होती है। जौ के लिए आवश्यक भौगोलिक दशाएँ निम्न हैं-
- 70 सेमी से 100 सेमी. तक वर्षा
- 15°C से 18°C का तापमान
जलोढ़ मृदा - जौ का सबसे प्रमुख उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश है। राजस्थान, मध्यप्रदेश, हरियाणा एवं हिमाचल प्रदेश अन्य उत्पादक राज्य हैं।,
- जौ की प्रमुख किस्में, हिमानी, ज्योति, कैलाश आदि।
ज्वार - ज्वार भी एक मोटा अनाज है। जिसकी कृषि सामान्य वर्षा वाले क्षेत्रों में बिना सिंचाई की जाती है। इसके लिए उपजाऊ जलोढ़ अथवा चिकनी मिट्टी काफी उपर्युक्त होती है। इसकी वृद्धि के लिए तापमान 25°C से 30°C के बीच होना चाहिए। देश में ज्वार का तीन - चौथाई से अधिक क्षेत्र मात्र तीन राज्यों महाराष्ट्र, कर्नाटक और तमिलनाडु में विस्तृत है। देश का लगभग 80% ज्वार का उत्पादन भी इन्हीं तीनों राज्यों में होता है। इसका बड़ा उत्पादक भी इन्हीं तीन राज्यों में होता है। इसका सबसे बड़ा राज्य महाराष्ट्र है। इसके बाद कर्नाटक एवं तमिलनाडु का स्थान आता है।
प्रमुख किस्में - CSV - 1, CSV - 7, CSH - 1, CSH - 8 आदि हैं।
बाजरा - बाजरे की गणना भी मोटे अनाजों में की जाती है। यह वास्तव में शुष्क दशाओं में पैदा किया जाता है। बाजरा के लिए आवश्यक भौगोलिक दशाएँ निम्नवत् हैं -
- बलुई मिट्टी
- 50 सेमी. से 70 सेमी. तक वर्षा
- तापमान 20°C से 30°C के बीच होना चाहिए।
- राजस्थान, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, गुजरात, हरियाणा में बाजरे की खेती बड़े पैमाने पर की जाती हैं।
प्रमुख किस्में - बावापुरी, मोती, HB - 3, HB - 4, T - 55, C01 आदि हैं।
मक्का - मक्के की उत्पत्ति पॉपकार्न से हुई है। यह एक उभयलिंगी पौधों में से हैं। हमारे देश के अपेक्षाकृत शुष्क भागों में मक्के लिए आवश्यक भौगोलिक दशाएँ, गर्मी का लंबा मौसम, साफ आकाश तथा अच्छी वर्षा 25°C से 30°C तापमान, 50 सेमी. से 80 सेमी. तक वर्षा, नाइट्रोजन युक्त गहरी दोमट मिट्टी है। अन्य धान्य फसलों की अपेक्षा इसमें स्टार्च की मात्रा सबसे अधिक पाई जाती है। देश में मक्के का सर्वाधिक उत्पादन कर्नाटक में होता है। इसके बाद महाराष्ट्र व मध्य प्रदेश का स्थान आता है। मक्के के उत्पादन में भारत का विश्व में 7 वाँ स्थान है। मक्के के उत्पादन में भारत का विश्व में 7 वाँ स्थान है। मक्के की प्रमुख किस्में - गंगा, गंगा 101, विजय, जवाहर, विक्रम रतन आदि।
कपास - भारत, कपास के पौधों का मूल स्थान है। यह एक उष्ण कटिबंधीय फसल है जो देश के अर्द्ध शुष्क भागों में खरीफ ऋतु में बोई जाती है।
- भारत में कपास की खेती 60 से 85 सेमी औसत वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्रों तक सीमित है। कम वर्षा वाले क्षेत्र यथा, पंजाब में यह एक सिंचित फसल है। परम्परागत रूप से कपास की खेती दक्कन के सिंचित फसल है। परम्परागत रूप से कपास की खेती दक्कन के लावा पठार पर की जाती है। यही कारण है कि यहाँ पाई जाने वाली मृदा को काली कपासी मृदा भी कहा जाता है।
- उच्च तापमान, हल्की वर्षा, पाला रहित मौसम एवं चमकीली धूप कपास की कृषि हेतु अनुकूल दशाएँ हैं। कपास पर फूल आने के समय आकाश का बादल रहित होना आवश्यक है।
- कपास के उत्पादन में भारत का चीन के बाद विश्व में दूसरा स्थान है। देश के बोए गए क्षेत्र के लगभग 4.86% भाग पर कपास की खेती की जाती है।
- कपास के तीन प्रमुख उत्पादक क्षेत्र हैं-
1. उत्तर - पश्चिम भारत में पंजाब, हरियाणा एवं उत्तरी राजस्थान
2. पश्चिम भारत में गुजरात तथा महाराष्ट्र
3. दक्षिण भारत में आंध्र प्रदेश, कर्नाटक एवं तमिलनाडु
- भारत में कपास उत्पादन में गुजरात (36.22%) का स्थान प्रथम है, दूसरे एवं तीसरे स्थान पर क्रमश: महाराष्ट्र (18.76%) एवं तेलंगाना (13.63%) है। चौथे, पाँचवें व छठें स्थान पर क्रमश: हरियाणा, मध्य प्रदेश एवं पंजाब हैं।
- भारत में छोटे रेशे वाले एवं लम्बे रेशे वाले दोनों प्रकार के कपास का उत्पादन होता है। अमेरिकन कपास को देश के उत्तर पश्चिमी भाग में 'नरमा' कहा जाता है।
जूट - जूट भारत की प्रमुख नगदी फसल है।
- उच्च तापमान 20°C - 30°C, भारी वर्षा 125 सेमी. - 200 सेमी.
- निम्न समतल भूमि जूट की कृषि हेतु अनुकूल भौगोलिक दशाएँ हैं।
- भारत विश्व में जूट का सबसे बड़ा (विश्व का 75%) उत्पादक देश है।
- स्वतंत्रता से पूर्व जूट एवं जूट के सामानों पर भारत का विश्व में एकाधिकार था, लेकिन विभाजन के दौरान 80% जूट उत्पादक क्षेत्र पूर्वी पाकिस्तान में चले गए। इससे भारतीय जूट मिलों को कच्चे माल की कमी हो गई। बाद में जूट खेती को भारत में प्रोत्साहित किया गया जिससे इसके उत्पादन में वृद्धि हुई।
- भारत में जूट के उत्पादन में पश्चिम बंगाल (76%), बिहार (14.7%), असम (7%) है। ओडिशा के महानदी के डेल्टाई क्षेत्र में भी इसकी खेती की जाती है। 'मेस्टा' जूट की एक किस्म है।
रबड़ - रबड़ का जन्मस्थान ब्राजील है। यह उष्ण कटिबंधीय पौधा है। रबड़ वृक्ष के दूध से रबड़ प्राप्त होता है। वर्ष 1902 में केरल में पेरियार नदी के किनारे इनके वृक्ष लगाए गए। इसकी उत्तम कृषि के लिए 25°C से 32°C का उच्च तापमान अत्यधिक वर्षा, लाल, लैटेराइट, चिकनी एवं दोमट मिट्टी तथा अधिक मानव श्रम की आवश्यकता होती है। दक्षिण के कूल उत्पादन का लगभग 1.7% प्राकृतिक रबड़ प्राप्त किया जाता है। रबड़ की प्रति हेक्टेयर उपज की दृष्टि से भारत विश्व के अग्रणी देशों में से एक है। इसके प्रमुख उत्पादक राज्य केरल, तमिलनाडु तथा कर्नाटक हैं। अंडमान निकोबार द्वीप समूह में भी रबड़ का उत्पादन किया जाता है।
मसाले - भारत विश्व में मसालों का सबसे बड़ा उत्पादक, उपभोक्ता एवं निर्यातक है। यहाँ उष्ण कटिबंधीय काली मिर्च से लेकर शीतोष्ण कटिबंधीय केसर तक की खेती की जाती है। भारत में मसाले की खेती मुख्यत: केरल तथा कर्नाटक के मालाबार तट पर की जाती है।
- भारतीय मसाला शोध संस्थान कोझिकोड (केरल) में है।
- काली मिर्च के उत्पादन के केरल का प्रथम स्थान (76%) है।
- लाल मिर्च के उत्पादन में आंध्र प्रदेश का प्रथम स्थान (लगभग 40%) है।
- हल्दी के उत्पादन में तमिलनाडु का प्रथम स्थान (लगभग 29%) है।
- इलायची के वृक्ष के लिए 14°C - 32°C का तापमान एवं 150 सेमी. - 600 सेमी. वार्षिक वर्षा उपर्युक्त है।
चाय - वर्तमान समय में यह भारत की प्रमुख पेय फसल है। इसकी भौगोलिक दशाएँ 150 - 250 सेमी. वार्षिक वर्षा, 24° से - 30° से का उच्च तापमान, हरी एवं मथक युक्त मिट्टी आदि है। यह एक श्रम प्रधान कृषि है एवं इसमें पत्तियों की चुनाई के लिए सस्ते श्रम की आवश्यकता होती है। जल प्रिय पौधे के बावजूद इसकी जड़ों में पानी नहीं लगना चाहिए। इसी कारण इसकी खेती पहाड़ी ढालों पर की जाती है। ठण्डी हवा व पाला चाय की कृषि के लिए हानिकारक है। देश में चाय उत्पादन में असम का प्रथम स्थान है। यहाँ ब्रह्मपुत्र नदी की घाटी व सुरमा नदी की घाटी में चाय की उन्नत कृषि की जाती है। असम में देश के कुल चाय उत्पादन का 50% भाग प्राप्त होता है। दक्षिण भारत में तमिलनाडु सर्वाधिक चाय उत्पादन करने वाला राज्य है। केरल, कर्नाटक तथा महाराष्ट्र के पर्वतीय ढालों पर भी चाय की कृषि की जाती है। भारत विश्व में काली चाय का सबसे बड़ा उत्पादक और उपभोक्ता देश है। भारत चाय के वैश्विक उत्पादन का 27% भाग उत्पादित करता है तथा चाय के विश्व व्यापार में इसका हिस्सा 9% है। विश्व में चाय उत्पादन में भारत का चीन के बाद दूसरा स्थान है। वर्ष 2013 को अंतर्राष्ट्रीय चाय उत्पादक मंच का गठन किया गया है। इसमें भारत के अतिरिक्त केन्या, श्रीलंका, इंडोनेशिया, खाण्डा, मलावी, ईरान तथा चीन शामिल हैं। इसका मुख्यालय कोलम्बो है।
चाय - चीन का मूल पौधा है। - (टियानसेन पर्वत)
- बौद्ध धर्म का पवित्र पेय पदार्थ है।
- भारत में चाय का व्यावसायिक उत्पादन 1834-35ई. में असमें में शुरू किया गया।
- भौगोलिक स्थिति -
(1) सूर्य की तिरछी / सुनहरी किरणें
(2) ढालू भूमि
(3) लैटेराइट मृदा

कहवा - विश्व के कुल कहवा उत्पादन का मात्र 4% उत्पादन भारत में किया गया है। किन्तु इसका स्वाद उत्तम होने के कारण इसकी मांग विदेशों में अधिक रहती है। कहवा उत्पादन की अनुकूल भौगोलिक दशाएँ 15° - 18° से औसत वार्षिक तापमान तथा 150 - 250 सेमी. की औसत वार्षिक वर्षा है। पर्वतीय तथा दोमट अथवा लावा निर्मित मिट्टी इसके लिए उपर्युक्त होती है। हमारे देश में दो प्रकार के कहवा की कृषि की जाती है। अरेबिका कॉफी व रोबस्टा कॉफी। अरेबिका कहवा देश के कहवा के अंतर्गत आने वाले कुल क्षेत्रफल के 60% भाग पर कर्नाटक, केरल तथा तमिलनाडु राज्यों में बोया जाता है, जबकि शेष भूमि पर रोबस्टा कहवा की कृषि की जाती है। कहवा की खेती दक्षिण भारत के पर्वतीय ढालों तक ही सीमित हैं।
गन्ना = गन्ना उत्पादन में प्रथम स्थान उत्तर प्रदेश का है। लेकिन उत्तम किस्म का गन्ना महाराष्ट्र में उत्पादित किया जाता है। गन्ना उत्पादन में भारत का ब्राजील के बाद में दूसरा स्थान है, जबकि खपत और कृषि क्षेत्र की दृष्टि से भारत का विश्व में प्रथम स्थान है। यहाँ विश्व का 40 प्रतिशत गन्ना उत्पादित किया जाता है। गन्ने की फसल तैयार होने में लगभग 1 वर्ष का समय लगता है। उष्ण कटिबंधीय तथा उपोष्ण कटिबंधीय फसल होने के कारण इसके लिए 20° से 27° से. का औसत वार्षिक तापमान तथा 100 - 200 सेमी. की औसत वार्षिक वर्षा उपर्युक्त होती है। गन्ने की फसल तैयार होते समय वर्षा अभाव काफी लाभदायक होता है। क्योंकि इससे शर्करा की मात्रा में वृद्धि होती है। उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु देश के प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्य हैं। उत्तर प्रदेश अकेले ही देश के लगभग 45 प्रतिशत गन्ने का उत्पादन करते हैं।

- चीनी के उत्पादन में महाराष्ट्र का प्रथम स्थान है।
- "चीनी का कटोरा" = उत्तर प्रदेश
- मसाले - केरल - केरल को कोच्चि बन्दरगाह / अरब सागर की रानी (Queen of Arabian sea) - मसाला - - - बन्दरगाह (spice port of india)
- प्याज - नासिक (महाराष्ट्र)
- तम्बाकू - आंध्र प्रदेश (गुंटूर प्रसिद्ध) - तम्बाकू अनुसंधान केन्द्र
- (Central Drug Research Institute = luck noW 'UP')
- चावल अनुसंधान केन्द्र = कटक (ओडिशा)
- गन्ना अनुसंधान केन्द्र = कानपुर (UP)
- आलू अनुसंधान केन्द्र = शिमला (HP)
- ईसबगोल - राजस्थान
- ज्वार (गरीब की रोटी) - 1. महाराष्ट्र 2. गुजरात
- नारियल - 1. मध्य प्रदेश 2. राजस्थान 3. उत्तर प्रदेश - सूखे-मेवे - जम्मू-कश्मीर
- मूँग दाल - 1. महाराष्ट्र - मसाले - केरल
- मोठ दाल - 1. राजस्थान - अनाज - उत्तर प्रदेश
- संतरा - नागपुर (महाराष्ट्र) - दलहन - मध्य प्रदेश
- सेव - 1. हिमाचल प्रदेश 2. J&K - तिलहन - राजस्थान
तिलहन - हमारे देश में तिलहनी फसलों की कृषि प्राय: अनुपजाऊ मिट्टी एवं वर्षा की कमी वाले क्षेत्रों में ही की जा रही है। रबी एवं खरीफ दोनों समयों में तिलहनों की कृषि की जाती है। सरसों रबी की प्रमुख फसल है, जबकि मूँगफली की कृषि खरीफ के समय की जाती है। तिलहनों के उत्पादन में मध्य प्रदेश अग्रणी राज्य हैं। सरसों, मूँगफली, सूर्यमुखी, सोयाबीन व नारियल तेल के उत्पादन में क्रमश: राजस्थान, गुजरात, कर्नाटक, मध्यप्रदेश एवं तमिलनाडु भारत में प्रथम स्थान रखते हैं।
- भारत एक कृषि प्रधान देश है, जिसकी 54.6% जनसंख्या कृषि पर निर्भर करती है, परन्तु कृषि का GDP में योगदान बहुत कम है।
- GVA (सकल मूल्य संवर्धन) में यह क्षेत्र 17% का योगदान रखता है।
- भारत का कुल क्षेत्रफल 328.7 मिलियन हेक्टेयर Net sown area शुद्ध बोया गया क्षेत्र = 141.4 mi. Hec.
Total Gross Crop Area सकल फसलकृत क्षेत्र = 208.9 mi. Hec.
- भारत का शुद्ध बोया गया क्षेत्र कुल क्षेत्रफल का 43% है।
- फसल गहनता =
- भारत की फसल गहनता = 142%
- Net irrigated area शुद्ध सिंचित क्षेत्र – 68.2 mi.Hec. यह शुद्ध बोए गए क्षेत्र का 48.23% है।
अत: लगभग 52% (51.77%) NSA वर्षा पर निर्भर करता है।
सिंचाई के साधन:- क्षेत्रफल प्रतिशत
कुआँ, नलकूप – 64% UP G.J.
नहर – 26% UP J&K
तालाब – 3% आंध्र प्रदेश T.N.
अन्य – 7%
निर्वाह कृषि :-
इस कृषि का उद्देश्य मुनाफा कमाना नहीं होकर परिवार का भरण – पोषण करना होने से इसमें कम तकनीकों के साथ घरेलू श्रम का अधिक उपयोग किया जाता है। इस प्रकार की कृषि विकासशील देशों में होती है। इस कृषि के 2 प्रमुख प्रकार हैं -
A) गहन निर्वहन कृषि:- यह कृषि अधिक जनसंख्या – घनत्व वाले क्षेत्रों में बोई जाती है। कृषि जोतों का आकार छोटा होता है। कम तकनीक व घरेलू श्रम से उपयोग /उत्पादित की जाती है। 1 वर्ष में 1 से अधिक फसलें, गेहूँ, चावल, मक्का आदि प्रमुख फसल हैं।
ex.- दक्षिणी एशिया, द.पू. व पूर्वी एशिया।
B) आदिम निर्वाह कृषि:- यह कृषि जनजातीय लोगों द्वारा परम्परागत तरीकों से की जाती है। यह कृषि 2 प्रकार की होती हैं।
स्थानान्तरण कृषि:- यह कृषि उन क्षेत्रों में की जाती है जहाँ वर्षा अधिक होती है तथा वनस्पति की पुर्न विकास क्षमता भी अधिक होती है।
इस कृषि के अंतर्गत वनों में कुछ पेड़ों को काटकर जलाया जाता है तथा कृषि भूमि प्राप्त की जाती है। इस प्रकार प्राप्त भूमि पर 3 से 5 वर्षों तक कृषि करने के बाद भूमि की उत्पादकता कम होने के कारण कृषि को अन्य स्थान पर स्थानान्तरित किया जाता है। यह कृषि पर्यावरण के लिए हानिकारक होती है। इसे कर्तन व दहन Slash and bruin agrio भी कहते हैं।
क्षेत्रीय नाम :-
क्षेत्र नाम
राजस्थान वालरा
दजिया – मैदान
चिमाता – पर्वत
उ.पू. भारत झूमिंग
ब्राजील रोका
श्रीलंका चेन्ना
मलेशिया, इण्डोनेशिया लदांग
थाइलैण्ड तुमुरी
चलवासी (Nomadic) :-
यह कृषि शुष्क व अर्द्धशुष्क क्षेत्रों में की जाती है। इसमें पशुपालन किया जाता है। इसमें स्थानीय लोग अपने पशुओं के साथ चारे तथा जल की तलाश में एक स्थान से दूसरे स्थान पर प्रवास करते हैं।
यह कृषि भारत में मुख्यत: पश्चिमी राजस्थान तथा J&K में की जाती है।
अफ्रीका – सहारा मरुस्थल
वाणिज्यिक कृषि:-
इस प्रकार की कृषि में अधिक निवेश के साथ बहुत बड़े भू-भाग पर कृषि की जाती है। इसमें तकनीकों व मशीनों का अधिक उपयोग करके मुनाफा कमाना प्रमुख उद्देश्य होता है।
इसके अंतर्गत बडे स्तर पर उत्पादन किया जाता है। इसके 3 प्रकार हैं।
अनाज कृषि
रोपण कृषि
मिश्रित कृषि
- दालों के उत्पादन में भारत में मध्यप्रदेश का प्रथम स्थान है।
चना - उत्पादन
(1) मध्यप्रदेश
(2) राजस्थान
मटर / मसूर - मध्यप्रदेश
सोयाबीन - सर्वाधिक प्रोटीन पाया जाता है।
- मालवा का पठार सोयाबीन के उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है।
- सर्वाधिक उत्पादन
(1) मध्यप्रदेश
(2) महाराष्ट्र
सरसों -
सर्वाधिक उत्पादन
(1) राजस्थान
(2) पंजाब
मूँगफली -
(1) गुजरात (राजकोट सर्वाधिक मूँगफली उत्पादक क्षेत्र)
(2) राजस्थान
- भारत की प्रमुख फसलें और उनका मूल स्थान
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फसल |
मूल स्थान |
मृदा |
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चावल |
सिन्धु घाटी सभ्यता (भारत) |
जलोढ़ मृदा |
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कपास |
मिश्र (Egypt) |
काली मृदा / रेगूर मृदा |
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गेहूँ |
मध्य एशिया |
दोमट / पुरानी जलोढ़ मृदा |
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सरसों |
मध्य एशिया |
दोमट / पुरानी जलोढ़ मृदा |
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मक्का |
मध्य अमेरिका |
लाल-पीली मृदा |
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चाय नोट :- चाय बौद्ध धर्म का पवित्र पेय पदार्थ है |
टियानसेन पर्वतमाला (चीन) |
लैटेराइट मृदा |
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कॉफी |
इथोपिया / अबीसीनिया |
लैटेराइट मृदा |
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गन्ना |
भारत |
जलोढ़ मृदा |
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रबर |
ब्राजील |
लैटेराइट मृदा |
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तम्बाकू |
अरब |
लाल-पीली मृदा |
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बाजरा |
जिम्बाब्वे (अफ्रीका) |
रेतीली-भूरी मृदा |
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बाजरा - अफ्रीका - जिम्बाबे - सर्वाधिक उत्पादक राज्य (1) राजस्थान (2) गुजरात
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जौ - - सर्वाधिक उत्पादक राज्य (1) महाराष्ट्र (2) गुजरात
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नोट :- भारत विश्व में सर्वाधिक बाजरा उत्पादन करता है। |
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1. उच्च उत्पादक क्षमता वाले बीजों का प्रयोग High Yeilding VarietySeeds (HYV)
2. गहन कृषि प्रणाली का उपयोग
3. सिंचाई साधनों का विस्तार
4. मशीनरी द्वारा खेती
5. रासायनिक खाद, कीटनाशकों का उपयेाग