मारवाड़ के राठौड़
- मारवाड़ को प्राचीन काल में मरुवार, धन्वक्षेत्र, नवसहस्त्र अथवा मरुस्थल कहा जाता था।
- जोधपुर, नागौर, पाली तथा बीकानेर, जैसलमेर, बाड़मेर, जालोर का कुछ क्षेत्र मारवाड़ के अन्तर्गत आता है।
- मारवाड़ की राजधानी मण्डोर थी। मण्डोर को प्राचीन काल में माण्डव्यपुर, मण्डोवर के नाम से जाना जाता था।
राव सीहा (1240–73 ई.) –
- मारवाड़ के राठौड़ वंश का संस्थापक / आदिपुरुष /मूल पुरुष।
- चंदावर के युद्ध में (1194) जयचंद गहड़वाल की मृत्यु के बाद जयचंद गहड़वाल का पौत्र राव सीहा अपने गौत्र से निवृति प्राप्त करने के लिए द्वारका की यात्रा करता है।
- राव सीहा ने सिन्ध के शासक मारुलाखा को मारकर जयसिंह सोलंकी की सहायता की तथा जयसिंह सोलंकी ने अपनी पुत्री पार्वती का विवाह राव सीहा के साथ कर दिया।
लाखा झंवर का युद्ध – 1273 ई. (पाली)
- लाखा झंवर का युद्ध, धौला चोतरा नामक स्थान पर हुआ।
- बीठू गाँव, पाली में एक शिलालेख प्राप्त होता है, जिसके अनुसार राव सीहा मुसलमानों के विरुद्ध गौ रक्षार्थ शहीद हुए तथा उनकी पत्नी पार्वती सौलंकी सती हुई।
राव आसनाथ (1273-91 ई.) –
- खेड़ (बाड़मेर) को अपनी राजधानी बनाया।
- खेड़ में रणछोड़ राय मन्दिर का निर्माण करवाया।
राव धूहड़ –
- चक्रेश्वरी माता की मूर्ति कर्नाटक से लाकर नागाणा गाँव में स्थापित करवाई।
- नागणेची माता – नागाणा गाँव (बाड़मेर) राठौड़ वंश की कुलदेवी (18 भुजाओं वाली देवी)
- राज्य में एकमात्र देवी जिसकी मूर्ति काष्ठ की है।
- राव धूहड़ के पश्चात इनके वंशज रायपाल, कर्णपाल, वीरमदेव इत्यादि शासक बने।
राव मल्ली नाथ –
- राव मल्ली नाथ का योगी के कपड़े पहनाकर राज तिलक किया गया।
- उन्होंने राणी रुपादे के प्रभाव में आकर उगमजी भाटी की शिष्यता ग्रहण कर ली।
- उन्होंने राज-पाट से सन्यास ले लिया।
राव चूंडा (1384-1423 ई.) -
- मारवाड़ के राठौड़ वंश का वास्तविक संस्थापक।
- यह वीरम देव का पुत्र था, वीरम देव की मृत्यु के पश्चात चूंडा की माता ने उसे कलाऊ के आल्हा चारण के संरक्षण में रखा था।
- इसी समय तुर्को ने ईंदा प्रतिहार से मण्डोर दुर्ग छीन लिया।
- राव चूंडा और ईंदा प्रतिहार ने मिलकर तुर्कों से मण्डोर दुर्ग छीन लिया।
- ईंदा ने अपनी पुत्री किशोरी देवी/लालीदेवी का विवाह राव चूंडा के साथ कर दिया तथा मण्डोर दुर्ग राव चूंडा को दहेज में दे दिया। ईंदा प्रतिहार राव चूंडा के सामन्त बन गए।
- यहीं से मारवाड़ में सामन्त प्रथा के बीज बोये गये।
- राव चूंडा ने मण्डोर को अपनी राजधानी बनाया।
- राव चूंडा ने नागौर के शासक जलाल खाँ खोखर को मारकर नागौर पर अधिकार कर लिया तथा नागौर में चुण्डासर नामक नगर बसाया।
- राव चूंडा की दो रानियाँ थी –
- कमला कंवर – रणमल व हंसाबाई (संतान)
- लाली/किशोरी देवी - कान्हा(संतान)
राव कान्हा (1423-27 ई.) -
- राव चूंडा ने अपने ज्येष्ठ पुत्र राव रणमल को राज्य से वंचित करके लाली/किशोरी देवी के प्रेम प्रभाव में आकर कान्हा को मारवाड़ का शासक बना दिया।
- राव कान्हा अत्याचारी और अयोग्य शासक था।
- इतिहासकारों के अनुसार जोहियावाही में सांखला राजपूतों के विरुद्ध लड़ता हुए मारा गया।
- ख्यात साहित्य के अनुसार राव कान्हा ने करणी माता की गायों की हत्या करवाई इसलिए करणी माता ने कान्हा का वध कर दिया।
राव रणमल (1427-38 ई.) -
- राव रणमल चूंडा का ज्येष्ठ पुत्र था, लेकिन राव चूंडा ने जब अपने पुत्र कान्हा को मारवाड़ का उत्तराधिकारी नियुक्त किया तो रणमल मेवाड़ के महाराणा लाखा की सेवा में चला गया। लाखा ने उसे 'धणला' नामक जागीर प्रदान की।
- रणमल ने अपनी बहिन हंसा बाई का विवाह राणा लाखा से इस शर्त पर किया की हंसा बाई से उत्पन्न पुत्र मेवाड़ का अगला शासक होगा।
- राणा लाखा व हंसा बाई का पुत्र मोकल था, जबकि लाखा का बड़ा पुत्र कुंवर चूंडा था। जिसे मेवाड़ का भीष्म कहा जाता है। कुंवर चूंडा ने अपने पिता लाखा के कहने पर मेवाड़ पर से अपना अधिकार मोकल के समर्थन में त्याग दिया।
- राणा मोकल की हत्या चाचा व मेरा ने की जो कि राणा खेता की दासी के पुत्र थे।
- मोकल की हत्या के बाद कुंभा मेवाड़ के शासक बने तब तक रणमल मेवाड़ में अपना हस्तक्षेप बढ़ा चुका था। जिससे मेवाड़ के सामंत रणमल से नाराज थे इसलिए कुंभा ने भारमली की मदद से रणमल की हत्या करवा दी।
- रणमल की पत्नी कोड़मदे ने कोड़मदेसर, बीकानेर में बावड़ी बनवाई। यह राजस्थान की सबसे प्राचीन बावड़ी है।
राव जोधा (1438-89 ई.) -
- राव जोधा रणमल व कोड़मदे का पुत्र था।
- रणमल की हत्या के दौरान जोधा मेवाड़ से भागकर मारवाड़ की तरफ आया लेकिन मारवाड़ पर कुंवर चूंडा पहले ही अधिकार कर चुका था। अत: जोधा मारवाड़ से भागकर बीकानेर से 20 मील दूर काहूनी गाँव चला गया।
- हड़बू सांखला की मदद से राव जोधा ने लगातार 15 वर्षों के अथक परिश्रम के पश्चात् 1453 ई. में मारवाड़ पर अधिकार कर लिया क्योंकि उस वक्त कुंभा मालवा व गुजरात अभियानों में व्यस्त था।
- कुंभा ने गुजरात से निपटने के पश्चात मारवाड़़ पर आक्रमण कर दिया लेकिन हंसा बाई की मध्यस्थता से कुंभा व जोधा के बीच आंवल-बांवल की संधि हुई।
- आवल-बावल संधि के द्वारा मारवाड़ तथा मेवाड़ की सीमाओं का निर्धारण किया गया। इस सीमा निर्धारण का मुख्य बिन्दु सोजत था। इसी दौरान जोधा ने अपनी पुत्री श्रृंगार देवी का विवाह कुंभा के पुत्र रायमल से किया।
- श्रृंगार देवी ने घोसुंडी नामक स्थान पर बावड़ी का निर्माण करवाया।
- जोधा ने 12 मई, 1459 ई. में जोधपुर नगर की स्थापना की तथा चिड़ियाटूंक पहाड़ी पर दुर्ग (मेहरानगढ़/मयूरध्वज/गढ़चिन्तामणि) बनवाया।
- मेहरानगढ़ की नींव करणी माता के हाथों रखी गई थी।
- मेहरानगढ़ दुर्ग निर्माण के समय राजाराम कड़ेला नामक व्यक्ति को जिंदा चुनवाया गया था।
- राव जोधा को मारवाड़ में सामंत प्रथा का वास्तविक संस्थापक माना जाता है।
- रूडयार्ड किपलिंग ने मेहरानगढ़ किले के लिए कहा, “यह किला परियों व अप्सराओं द्वारा निर्मित किला है।”
- मेहरानगढ़ दुर्ग में मेहरसिंह व भूरे खाँ की मजार है।
- मेहरानगढ़ दुर्ग में शम्भू बाण, किलकिला व गज़नी खाँ नामक तोपे हैं।
- राव जोधा ने मेहरानगढ़ किले में चामुण्डा देवी का मन्दिर बनवाया जिसमें 30 सितम्बर, 2008 को दुर्घटना हुई जिसकी जाँच के लिए जसराज चौपड़ा कमेटी गठित की गयी।
राव सातलदेव (1489-92 ई.) -
- सातलदेव राव जोधा तथा हाड़ी रानी जसमा दे का पुत्र था।
- जोधा ने अपने बड़े पुत्रों को उत्तराधिकार से वंचित रख सातलदेव को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। जिससे उसका दूसरा बड़ा पुत्र बीका जांगल देश की तरफ चला गया व बीकानेर नाम का अलग राज्य स्थापित किया।
- सातलदेव के समय जोधपुर के पीपाड़ नामक स्थान पर 140 कुंवारी कन्याएँ गणगौर पूजा कर रही थी तब अजमेर के हाकिम मल्लु खाँ के सेनापति घुड़ले खाँ ने उनका अपहरण कर लिया।
- राव सातलदेव ने घुड़ले खाँ पर आक्रमण कर उन कन्याओं को मुक्त करवाया तथा घुड़ले खाँ का सर काटकर उसे छिद्रित कर कन्याओं को दे दिया।
- सातलदेव घुड़ले खाँ की पुत्री गींदोली को अजमेर से उठा लाया तथा अपने रंग महल में रख लिया इसी गींदोली ने सातलदेव की अनुमति प्राप्त कर अपने पिता घुड़ले खाँ की याद में घुड़ला त्यौहार शुरु करवाया।
- घुड़ला त्यौहार चैत्र कृष्ण अष्टमी को मनाया जाता है। इस दौरान किया जाने वाला लोक नृत्य घुड़ला नृत्य है इसमें छिद्रित मटके में दीपक रखकर नृत्य किया जाता है।
- पीपाड़ के युद्ध के दौरान राव सातलदेव बुरी तरह घायल हो गया था। अत: 1492 ई. में उसकी मृत्यु हो गई।
राव सूजा (1492-1515 ई.) -
- राव सूजा के शासन के दौरान बीका ने अपने पिता जोधा के कहे अनुसार सूजा से राजचिह्न, छत्र आदि वस्तुओं की मांग थी। जिसे देने से सूजा ने मना कर दिया अत: बीका ने जोधपुर पर आक्रमण कर दिया।
- रानी जसमादे ने मध्यस्थता करते हुए राजचिह्न व छत्र आदि वस्तुएँ बीका को दिलाते हुए संघर्ष को टाला।
- सूजा के शासन काल में ही मेड़ता पर वीरमदेव ने अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिया।
राव गांगा (1515-32 ई.)
- राव गांगा बाघा जी के पुत्र तथा राव सूजा के पौत्र थे।
- राव बाघा की मृत्यु 1510 ई. में सोजत के युद्ध में हो गई थी अत: गांगा को मारवाड़ का शासक बनाया गया।
- 17 मार्च, 1527 को खानवा के युद्ध में गांगा ने अपने पुत्र मालदेव के नेतृत्व में 4000 की सेना भेजकर राणा सांगा की मदद की थी।
- राव गांगा ने गांगलाव तालाब, गांगा की बावड़ी व गंगाश्याम जी के मंदिर का निर्माण करवाया।
- सन् 1529 ई. में गांगा व नागौर के दौलत खाँ की तरफ से गांगा के चाचा शेखा के मध्य सेवकी का युद्ध हुआ, जिसमें शेखा मारा गया।
- कुछ इतिहासकारों के अनुसार राव गांगा की हत्या उसी के पुत्र मालदेव ने की थी।
राव मालदेव (1532-62 ई.)
- राव मालदेव राव गांगा व मणिक देवी (सिरोही के राव जगमाल की पुत्री) का सबसे बड़ा पुत्र था।
- राव मालदेव को 'मारवाड़ का पितृहंता' कहा जाता है।
- राव मालदेव का राज्याभिषेक 21 मई, 1532 ई. को सोजत में किया गया।
- राव मालदेव जब जोधपुर का शासक बना तब उसके पास मात्र जोधपुर व सोजत के परगने थे।
- हिन्दुओं का सहयोगी होने के कारण मालदेव को 'हिन्दू बादशाह' भी कहा जाता है।
- मालदेव की पत्नी उमादे (जो जैसलमेर के राव लूणकर्ण की पुत्री थी) को रूठीरानी के नाम से जाना जाता है।
- अबुल फज़ल ने मालदेव को ‘हशमत वाला’ शासक कहा था।
- बदायूँनी ने इसे 'भारत का महान पुरुषार्थी राजकुमार' तथा फरिस्ता ने 'हिन्दुस्तान का सबसे शक्तिशाली राजा' कहा है।
- मारवाड़ शैली का उद्भव मालदेव के काल में हुआ।
- मालदेव ने अपना प्रथम अभियान भाद्राजून के शासक वीरा के विरूद्ध 1531 ई. में किया जिसमें वीरा मारा गया तथा भाद्राजून पर मालदेव का अधिकार हो गया।
- 1533 ई. में नागौर के शासक दौलत खाँ व मालदेव के मध्य हीराबाड़ी (नागौर) का युद्ध हुआ। इसमें मालदेव विजयी हुआ व नागौर पर अधिकार करके वीर मांगलियोत को नागौर का सुबेदार बनाया।
- 1535 ई. में मेड़ता पर आक्रमण कर वीरमदेव को पराजित किया तथा अजमेर व मेड़ता पर अधिकार कर लिया। वीरमदेव भागकर शेरशाह की शरण में चला गया।
- 1538 ई. में मालदेव ने सिवाणा, जालोर व सांचोर पर अधिकार कर लिया।
- 1541 ई. में मालदेव के सेनापति जेता व कूंपा के नेतृत्व में राव जैतसी के साथ पाहेबा/साहेबा का युद्ध जोधपुर के फलौदी नामक स्थान पर हुआ इस युद्ध में राव जैतसी मारा गया तथा बीकानेर का प्रबंध कूंपा को सौंपा गया।
- 4 जनवरी, 1544 ई. में मालदेव के सेनापति जेता व कूंपा तथा अफगान शासक शेरशाह सूरी के बीच गिरी सुमेल का युद्ध हुआ। इसे जैतारण का युद्ध भी कहा जाता है।
- युद्ध से पूर्व शेरशाह ने कूटनीति का परिचय देते हुए मालदेव के शिविर में यह अफवाह फैला दी की सेनापति जैता व कूंपा शेरशाह से मिले हुए है। इस बात की पुष्टि के लिए शेरशाह ने कुछ धन जैता व कूंपा के शिविरों में रखवा दिया अत: मालदेव रात्रिकाल में ही युद्ध भूमि से चला गया।
- जैता व कूंपा ने अपनी स्वामिभक्ति का परिचय देते हुए अपने 8000 सैनिकों के साथ शेरशाह से युद्ध किया यह आक्रमण इतना भयंकर था कि युद्ध समाप्त होते-होते शेरशाह सूरी को यह कहना पड़ा कि "एक मुठ्ठी भर बाजरे के लिए मैं हिन्दुस्तान की बादशाहत खो बैठता।"
- इस युद्ध में जैता व कूंपा मारे गये शेरशाह सूरी की विजय हुई। मालदेव सूरी के आक्रमण से बचने के लिए सिवाणा दुर्ग (मारवाड़ के राजाओं की शरणस्थली) चला गया।
- राव मालदेव के समय सिवाणा पर राणा डूँगरसी का अधिकार था।
- राव मालदेव के समय बीकानेर का शासक राव जैतसी था।
- 1545 ई. में कालिंजर युद्ध के दौरान शेरशाह सूरी की मृत्यु हो गई तथा जोधपुर पर मालदेव ने पुन: अधिकार कर लिया।
- 7 दिसम्बर 1562 ई. में मालदेव की मृत्यु के पश्चात उसकी पत्नी उमा दे मालदेव की पगड़ी के साथ सती हुई। पति की किसी वस्तु के साथ सती होना अनुमरण प्रथा कहलाती है।
- मालदेव की रानी उमादे (रूठी रानी) को अजमेर से मनाकर ईश्वरदास जी जोधपुर लाये लेकिन आसा बारहठ ने रानी को एक दोहा सुनाया जिससे वह वापस नाराज हो गई।
- मालदेव के शासनकाल में नरसेन ने 'जिन रात्रि' ग्रंथ की रचना की।
राव चन्द्रसेन (1562-81 ई.)
- राव चन्द्रसेन मालदेव का तीसरा पुत्र था लेकिन अपनी पत्नी स्वरूप देवी के कहने पर मालदेव ने अपने बड़े पुत्रों राम तथा उदय को उत्तराधिकार से वंचित कर दिया।
- चन्द्रसेन के सत्तारुढ़ होते ही राम ने सोजत में तथा उदयसिंह ने फलौदी में विद्रोह कर दिया जिसे चन्द्रसेन ने नाड़ोल में राम को तथा लोहावट युद्ध में उदय को पराजित कर दिया।
- राम व उदय अकबर की शरण में चला गया।
- सन् 1570 ई. के नागौर दरबार में वह अकबर से मिला था लेकिन शीघ्र ही उसने नागौर छोड़ दिया।
- चन्द्रसेन को मूहणौत नैणसी ने मारवाड़ का भूला बिसरा राजा कहा है।
- अकबर ने राम व उदय का पक्ष लेते हुए हुसैन कुली खाँ के नेतृत्व में सेना भेजकर मारवाड़ पर आक्रमण कर दिया यहाँ चन्द्रसेन को पीछे हटना पड़ा तथा वह भाद्राजून चले गए। 1571 ई. में अकबर ने खानकलां को भाद्राजून पर आक्रमण के लिए भेजा अत: चन्द्रसेन अपने भतीजे कल्ला राठौड़ के पास सोजत चले गए।
- सोजत से चन्द्रसेन सिवाणा आ गये उधर अकबर ने 1532 ई. में बीकानेर के रायसिंह को जोधपुर का शासक बना दिया। रायसिंह ने 1574 ई. में सिवाणा पर आक्रमण कर दिया। लेकिन सिवाणा पर अंतिम रूप से 1576 ई. में शाहबाज खाँ द्वारा अधिकार किया गया।
- चन्द्रसेन मारवाड़ का प्रथम शासक था जिसने छापामार युद्ध प्रणाली का प्रयोग किया। मुगलों से संघर्ष हेतु धन की आवश्यकता होने पर चन्द्रसेन ने जैसलमेर के हरराय भाटी को पोकरण का दुर्ग 1 लाख फदिये में गिरवी रखा।
- 11 जनवरी, 1581 ई. में विष दिये जाने के कारण सच्चियाप, जोधपुर में चन्द्रसेन की मृत्यु हो गई।
- चन्द्रसेन मारवाड़ का पहला राजपूत शासक था जिसने अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की और मरते दम तक संघर्ष किया। ‘मारवाड़ का भूला बिसरा नायक’ नाम से प्रसिद्ध।
- चन्द्रसेन को ‘मारवाड़ का प्रताप’ कहा जाता है।
मोटा राजा उदयसिंह (1583-95 ई.)
- राव चन्द्रसेन का भाई।
- चन्द्रसेन की मृत्यु के बाद अकबर ने जोधपुर को 1581 ई. से 1583 ई. के मध्य खालसा घोषित कर दिया। अगस्त, 1583 ई. में उदयसिंह को मारवाड़ का राज्य प्रदान किया तथा मोटाराजा की उपाधि प्रदान की।
- मोटाराजा उदयसिंह जोधपुर का प्रथम शासक था जिसे मुगल मनसबदारी (1000) प्राप्त हुई तथा यह मारवाड़़ का पहला शासक था जिसने मुगलों से वैवाहिक संबंध स्थापित करते हुए अधीनता स्वीकार की।
- उदयसिंह ने अपनी पुत्री जोधाबाई (जगत गुंसाई/भानमती) का विवाह 1587 ई. में शहजादे सलीम (जहाँगीर) के साथ किया।
- शहजादा खुर्रम इसी जोधाबाई का पुत्र था।
- उदयसिंह की मृत्यु 1595 ई. लाहौर अभियान के दौरान हो गई।
- उदयसिंह के पुत्र किशनसिंह ने किशनगढ़ में राठौड़ वंश की स्थापना की।
सवाई सूरसिंह (1595-1619 ई.)
- सूरसिंह का राज्याभिषेक लाहौर में किया गया तथा अकबर ने उसे 'सवाई' की उपाधि प्रदान की।
- यह मारवाड़ के शासकों को प्रदान की गई प्रथम सवाई की उपाधि थी।
महाराजा गजसिंह (1619-1638 ई.)
- गजसिंह का राज्याभिषेक बुरहानपुर ( महाराष्ट्र) में हुआ व जहाँगीर ने इसे 'राजा' की उपाधि प्रदान की।
- दक्षिण अभियानों के दौरान इसकी वीरता से प्रसन्न होकर जहाँगीर ने इसे दलथम्भन की उपाधि दी।
- उसकी मृत्यु 1638 ई. को आगरा में हुई।
महाराजा जसवंतसिंह (प्रथम) (1638-78 ई.)
- जसवंतसिंह महाराजा गजसिंह का दूसरा पुत्र था गजसिंह का बड़ा पुत्र अमरसिंह राठौड़ था।
- अमरसिंह राठौड़ शाहजहाँ की सेवा में चला गया शाहजहाँ ने अमरसिंह को राव की उपाधि प्रदान की अमरसिंह के पास नागौर की जागीर थी। 1644 ई. में अमरसिंह व बीकानेर के करणसिंह के मध्य मतीरे की राड़ नामक युद्ध हुआ जिसमें अमरसिंह विजयी हुआ।
- महाराजा जसवंत सिंह प्रथम का जन्म 26 दिसम्बर, 1626 ई. में बुहरानपुर में हुआ था।
- गजसिंह के पुत्र जसवन्तसिंह की गिनती मारवाड़ के सर्वाधिक प्रतापी राजाओं में होती है।
- शाहजहाँ ने उसे ‘महाराजा’ की उपाधि प्रदान की थी। वह जोधपुर का प्रथम महाराजा उपाधि प्राप्त शासक था।
- जसवंतसिंह का राज्याभिषेक आगरा में हुआ शाहजहाँ ने इसे 4000 का मनसब प्रदान किया।
- शाहजहाँ की बीमारी के बाद हुए उत्तराधिकार युद्ध में वह शहजादा दाराशिकोह की ओर से धरमत (उज्जैन) के युद्ध (1657 ई.) में औरंगजेब व मुराद के विरुद्ध लड़कर हारा था।
- वीर दुर्गादास इन्हीं का दरबारी व सेनापति थे।
- मुहणोत नैणसी इन्हीं के दरबार में रहता था। नैणसी ने ‘मारवाड़ री परगना री विगत’ तथा ‘नैणसी री ख्यात’ नामक प्रसिद्ध ग्रंथ लिखे। इसे ‘मारवाड़ का अबुल फजल‘ कहा जाता है।
- उसने मुगलों की ओर से शिवाजी के विरुद्ध भी युद्ध में भाग लिया था।
- महाराजा जसवंत सिंह ने ‘भाषा-भूषण’ नामक प्रसिद्ध ग्रंथ की रचना की।
- जसवंतसिंह द्वारा रचित अन्य ग्रंथ 'अपरोक्ष सिद्धान्त सार' व 'प्रबोध चन्द्रोदय' नाटक हैं।
- जसवंतसिंह की हाड़ी रानी जसवंतदे ने जोधपुर में राई का बाग तथा कागा उद्यान लगवाया।
- जसवंतसिंह का समय मारवाड़ चित्रशैली का स्वर्णकाल था।
- जसवंतसिंह की मृत्यु 1678 ई. में जमरूद, अफगानिस्तान में हो गई उस समय जसवंतसिंह की रानियाँ जादम और नरूकी दोनों गर्भवती थी।
- जादम रानी से अजीतसिंह और नरूकी रानी से दलथम्भन का जन्म हुआ।
- जसवंतसिंह की मृत्यु के बाद औरंगजेब का कथन – 'आज कुफ्र का दरवाजा टूट गया'।
- जसवंतसिंह की मृत्यु के बाद औरंगजेब ने मारवाड़ को खालसा भूमि घोषित कर दिया।
अजीतसिंह (1678-1724 ई.)
- अजीतसिंह जसवन्त सिंह प्रथम का पुत्र था।
- औरंगजेब ने अजीतसिंह व उसकी माँ को दिल्ली के नूरगढ़ किले में नजरबंद कर दिया था। लेकिन दुर्गादास राठौड़ ने अपने साथियों रघुनाथ भाटी, रणछोड़ राठौड़, रूपसिंह राठौड़ आदि को साथ लेकर अजीतसिंह को दिल्ली से निकालकर मुकुंददास खींची के यहाँ रखा।
- मुकुंददास खींची ने अजीतसिंह को कालिंद्री के (सिरोही) के जयदेव ब्राह्मण के यहाँ छोड़ा जहाँ इनका लालन-पालन गौराधाय ने किया।
- मेवाड़ के महाराणा राजसिंह ने संधि के तहत अजीतसिंह को केलवा की जागीर प्रदान की। औरंगजेब ने मेवाड़-मारवाड़ के इस संगठन को तोड़ने हेतु अपने पुत्र शहजादे अकबर द्वितीय को भेजा। लेकिन राजपूतों ने उसे लालच देकर अपनी और मिला लिया तथा अकबर द्वितीय ने 1681 ई. में पाली के नाड़ोल में स्वयं को भारत का सम्राट घोषित कर दिया।
- 1707 ई. में औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात बहादुरशाह प्रथम शासक बना। बहादुरशाह पहले के शासकों की तरह योग्य नहीं था अत: इस मौके को देखते हुए आमेर के जयसिंह मारवाड़ के अजीतसिंह मेवाड़ के महाराणा अमरसिंह द्वितीय के पास गये तथा बहादुरशाह के विरूद्ध मदद मांगी।
- अमरसिंह द्वितीय ने इस शर्त पर उन्हें मदद का आश्वासन दिया कि यदि सवाई जयसिंह मेरी पुत्री चन्द्र कुंवरी से विवाह करे व उनकी होने वाली संतान जयपुर की भावी शासक बने। इस समझौते को देबारी का समझौता कहा जाता है।
- 30 वर्षोँ के निरंतर संघर्ष के पश्चात 1708 ई. में देबारी समझौते के तहत अमरसिंह को मारवाड़ का राज्य मिला।
- अजीतसिंह ने अपनी पुत्री इन्द्रकुंवरी का विवाह मुगल बादशाह फर्रूखशियर से किया तथा फर्रूखशियर की हत्या करवा दी एवं इन्द्रकुंवरी का पुनर्विवाह एक हिन्दू युवक के साथ कर दिया।
- अजीतसिंह ने मंडोर के जनाना महल व घनश्यामजी के मंदिर का निर्माण करवाया।
- अजीतसिंह के काल में जगजीवन भट्ट ने 'अजीतोदय' नामक ग्रंथ की रचना की।
- अजीतसिंह की हत्या उसके पुत्र बख्तसिंह द्वारा 1724 ई. में की गयी।
- अजीतसिंह के दाह संस्कार के समय अनेक मोर तथा बन्दरों ने स्वेच्छा से अपने प्राणों की आहुति दी।
वीर दुर्गादास राठौड़
- वीर दुर्गादास जसवन्त सिंह के मंत्री आसकरण का पुत्र था।
- उसने अजीतसिंह को मुगलों के चंगुल से मुक्त कराया।
- उसने मेवाड़ व मारवाड़ में सन्धि करवाई।
- अजीतसिंह ने दुर्गादास को देश निकाला दे दिया तब वह उदयपुर के महाराजा अमर सिंह द्वितीय की सेवा में रहे।
- दुर्गादास का निधन उज्जैन में हुआ और वहीं क्षिप्रा नदी के तट पर उनकी छतरी (स्मारक) बनी हुई है।
महाराजा अभयसिंह (1724-1749 ई.)
- अभयसिंह अजीतसिंह का पुत्र था।
- अभयसिंह के शासनकाल में हाकिम गिरधरदास को खेजड़ली गाँव में खेजड़ी का वृक्ष काटने का आदेश दिया गया।
- खेजड़ी के वृक्षों को बचाने के लिए अमृता देवी बिश्नोई के नेतृत्व में 363 लोगों (69 महिलाएँ व 294 पुरुष) ने बलिदान दिया। यह घटना 1730 ई. में हुई। प्रतिवर्ष भाद्रपद शुक्ल दशमी को इस बलिदान की याद में खेजड़ली गाँव (जोधपुर) में मेला भरता है।
- 12 सितम्बर को 'खेजड़ली दिवस' मनाया जाता है।
- अभयसिंह के समय चारण कवि करणीदान ने 'सूरज प्रकाश' नामक ग्रंथ की रचना की थी।
- अभयसिंह के पश्चात उसका पुत्र रामसिंह तथा भाई बख्तसिंह कुछ समय के लिए शासक बने।
महाराजा विजयसिंह (1752-1793 ई.)
- विजयसिंह ने जोधपुर में विजयशाही नाम से चाँदी के सिक्के चलवाए।
- विजयसिंह गुलाबराय नामक दासी के अत्यधिक प्रभाव में आ गया था तथा उसे अपनी पासवान बना लिया।
- गुलाबराय ने जोधपुर में रानीसर तालाब व महिलाबाग झालरा का निर्माण करवाया। गुलाबराय को जोधपुर की नूरजहाँ कहा जाता था।
महाराजा भीमसिंह (1793-1803 ई.)
महाराजा मानसिंह (1804-1843 ई.)
- मानसिंह भी महाराजा विजयसिंह के पौत्र तथा गुमानसिंह के पुत्र थे।
- मानसिंह नाथ सम्प्रदाय का अनुयायी था तथा इसे सन्यासी राजा के नाम से जाना जाता था।
- मानसिंह का दरबारी कवि बांकीदास था।
- मानसिंह ने आयसदेव नाथ की प्रेरणा से जोधपुर में महामंदिर का निर्माण करवाया यह राजस्थान में नाथ सम्प्रदाय का केन्द्र तथा प्रमुख पीठ है।
- मेवाड़ के महाराणा भीमसिंह की पुत्री कृष्णा कुमारी का विवाह मारवाड़ के महाराजा भीमसिंह से तय हुआ था। लेकिन भीमसिंह की मृत्यु के पश्चात कृष्णा कुमारी का संबंध जयपुर के जगतसिंह द्वितीय से तय कर दिया गया था। जिसे लेकर जयपुर व जोधपुर के मध्य विवाद उत्पन्न हो गया।
- कृष्णा कुमारी विवाद को लेकर मारवाड़ तथा जयपुर के मध्य गिंगोली नामक स्थान पर युद्ध(1807 ई. में) हुआ जिसमें जगतसिंह द्वितीय विजयी हुआ। गिंगोली परबतसर, नागौर में स्थित है। विवाद बढ़ता देख अमीर खाँ पिण्डारी की सलाह पर राणा भीमसिंह ने कृष्णा कुमारी को 1810 ई. में जहर देकर मार दिया।
- मानसिंह ने मेहरानगढ़ किले में मानसिंह पुस्तक प्रकाश नामक पुस्तकालय 1805 ई. में बनवाया।
- 1818 ई. में ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ संधि कर ली।
- मानसिंह ने 1841 ई. में मारवाड़ में त्याग प्रथा पर रोक लगाई।
महाराजा तख्तसिंह (1843-1873 ई.)
- 1857 की क्रांति के समय तख्तसिंह जोधपुर का शासक था।
- तख्तसिंह के राज्याभिषेक में पॉलिटीकल एजेण्ट लूडलो ने भाग लिया।
- बिथौड़ा का युद्ध – 8 सितम्बर, 1857 ई. को आउवा के ठाकुर कुशालसिंह चम्पावत व जोधपुर के तख्तसिंह तथा कैप्टन हीथकोट के बीच पाली के बिथौड़ा नामक स्थान पर युद्ध हुआ जिसमें कुशालसिंह चंपावत की विजय हुई। ओनाड़सिंह (तख्तसिंह का सेनापति) मारा गया और हीथकोट भाग गया।
- चेलावास का युद्ध – 18 सितम्बर, 1857 ई. को जोधपुर के गर्वनर मैकमोसन व क्रांतिकारियों के मध्य पाली में चेलावास नामक स्थान पर युद्ध हुआ था इसमें क्रांतिकारियों ने मैकमोसन का सिर काटकर आउवा के किले के दरवाजे पर लटका दिया। इस युद्ध को गोरों –कालों का युद्ध कहा जाता है।
- तख्तसिंह ने जोधपुर में श्रृंगार चौकी व बिजोलाई महल का निर्माण करवाया।
महाराजा जसवंतसिंह द्वितीय (1873-1895 ई.)
- जसवंत सिंह द्वितीय के शासनकाल में महर्षि दयानंद सरस्वती जोधपुर आए।
- दयानंद जी द्वारा जसवंत सिंह को नन्ही जान नामक वैश्या के साथ बैठने पर फटकार लगाई, जिसकी वजह से नन्ही जान/नन्ही भगतन ने महर्षि दयानंद को उनके रसोईए के हाथों 29 सितम्बर,1883ई. को जहर तथा काँच मिश्रित दूध पिला दिया, जिसकी वजह से महर्षि दयानंद की मृत्यु 30 अक्टूबर, 1883ई. को अजमेर में हो गई।
सर प्रताप सिंह
- सरप्रताप सिंह जसवंत सिंह के छोटे भाई थे। उन्होंने जोधपुर में कायलाना झील का निर्माण करवाया। अत: कायलाना झील को प्रताप सागर झील भी कहा जाता है।
- महारानी विक्टोरिया के स्वर्ण जुबली समारोह में भाग लेने हेतु 1887 ई . में सर प्रताप सिंह को मारवाड़ के प्रतिनिधि के रूप में भेजा गया।
महाराजा सरदार सिंह (1895-1911 ई.)
- सरदार सिंह ने जसवंत सिंह द्वितीय की याद में 'राजस्थान का ताजमहल' के नाम से प्रसिद्ध जसवंत थड़ा का निर्माण करवाया।
- घंटाघर का निर्माण भी सरदार सिंह ने करवाया।
महाराजा सुमेर सिंह (1911-1918 ई.)
- सुमेर सिंह के समय 'सुमेर कैमल कोर' की स्थापना की गई।
- टेलीफोन लाइनें जोधपुर में सुमेर सिंह के समय (जोधपुर से लाड़नूं) खुली।
- इनकी मृत्यु 21 वर्ष की आयु में इन्फ्लुएंजा नामक रोग से हुई।
महाराजा उम्मेद सिंह (1918-1947 ई.)
- उम्मेद सिंह को आधुनिक मारवाड़ का निर्माता कहा जाता है।
- उम्मेद सिंह ने पाली के सुमेरपुर में जवांई बाँध का निर्माण करवाया।
- अकाल राहत कार्यों के तहत 1929 ई . में उम्मेद भवन पैलेस / छीतर पैलेस का निर्माण शुरू करवाया , जो कि वर्ष 1938 तक चला।
महाराजा हनुमंत/ हनुवंत सिंह (1947ई.)
- एकीकरण के समय मारवाड़ का शासक हनुवंत सिंह था।
- हनुवंत सिंह जोधपुर रियासत को स्वतंत्र रखना चाहता था। अत: उसने एक बार रियासती विभाग के सचिव वी. पी. मेनन के सिर पर बंदूक तान दी थी।