गुप्त काल
विकेद्रीकरण की शुरूआत
गुप्त की उत्पत्ति
- मौर्यों के पतन के बाद: सम्पूर्ण उत्तरी भारत की राजनैतिक एकता समाप्त हो गई। इस दौरान उत्तर भारत में कुषाण, दक्षिण भारत में सातवाहन, पश्चिमी भारत में शक और पूर्वी भारत में शुंग।
- इन सभी ने राजनैतिक एकता स्थापित करने का प्रयास किया परन्तु असफल रहें। केवल अपने क्षेत्र तक ही सीमित रहे।
- गुप्त सम्भवतः कुषाणों के सामन्त थे।
- काशी प्रसाद जायसवाल के अनुसार गुप्त सम्राट जाट और मूलतः पंजाब के निवासी थे। गौरी शंकर ओझा इन्हें क्षत्रिय तथा राय चौधारी ने ब्राह्मण माना। स्मृतियों में गुप्तों को वैश्य कहा गया है।
- गुप्तकालीन अभिलेखों के आधार 'श्री गुप्त' गुप्तों के आदिराजा थे। इन्होंने 275 ई. से 300 ई. तक शासन किया तथा 'महाराज' की उपाधि धारण की। श्रीगुप्त के पश्चात उसका पुत्र घटोत्कच शासक हुआ जिसने 300 ई. से 319 ई. तक शासन किया।
- चन्द्रगुप्त द्वितीय की पुत्री प्रभावती गुप्ता ने अपने पूजा ताम्रपत्र में धरण गौत्र (ब्राह्मण) का उल्लेख किया है।
- नोट:-चन्द्रगोमिन के व्याकरण में गुप्तों को ‘जर्ट’ अथवा ‘जाट’ कहा गया है।
- इतिहासकारों के अनुसार यह धरण गौत्र उसके पिता की गौत्र थी। क्योंकि उसके पति वाकाटक नरेश रूद्रसेन द्वितीय विष्णु व्द्धिय गौत्र के ब्राह्मण थे।
- अत: गुप्तों के ब्राह्मण होने के मत को सर्वाधिक प्रमाणिक माना जाता है।
श्रीगुप्त:- गुप्तकालीन अभिलेखों के आधार 'श्री गुप्त' गुप्तों के आदिराजा थे।
श्रीगुप्त को गुप्तों का आदिपुरूष/गूढ़ पुरूष भी कहते हैं।
- गुप्त वंश के संस्थापक माने जाते है।
- सम्पूर्ण गुप्त वंशावली में प्रथम शासक जिसने महाराज की उपाधि धारण की।
- चीनी यात्री ‘इत्सिंग’ ने श्रीगुप्त को ‘चेलीकेतो’ कहा है।
- श्रीगुप्त ने ‘श्रृपतनमृगदाय’ में चीनी भिक्षुओं हेतु एक मंदिर का निर्माण करवाया।
- कुछ ग्रंथों के अनुसार श्रीगुप्त ने 274 ई. से लेकर 300 ई. तक शासन किया।
घटोत्घच:- (300ई. – 319ई.)
- घटोत्घच का ज्यादा विवरण नहीं मिलता है।
- श्रीगुप्त के पुत्र थे।
- महाराज की उपाधि धारण की थी।
नोट:- श्रीगुप्त व घटोत्घच की किसी भी प्रकार की मुद्रा (सिक्के) नहीं मिलते हैं।
चद्रगुप्त प्रथम (319-350 ई.) :
- चन्द्रगुप्त प्रथम गुप्तवंश का प्रथम प्रसिद्ध राजा हुआ। इसने 'महाराजाधिराज' की उपाधि धारण की चन्द्रगुप्त ने वैशाली के प्राचीन लिच्छवि वंश की राजकुमारी कुमारदेवी के साथ विवाह किया। इन्होंने अपने राज्यारोहण की स्मृति में 319-320 ई. में गुप्त संवत आरम्भ किया।
- गुप्तों के वास्तविक संस्थापक थे।
- सम्पूर्ण गुप्तों में प्रथम शासक जिसने महाराधिराज की उपाधि धारण की थी।
- चन्द्रगुप्त प्रथम ने अपने राज्यरोहण के दिन ‘9 मार्च, 319 ई.’ को एक नया संवत् प्रचलित किया जिसे गुप्त संवत् कहा जाता है।
- वैशाली की लिच्छवी वंश की राजकुमारी कुमारदेवी से विवाह किया और दहेज स्वरूप वैशाली के कुछ क्षेत्र मिले।
नोट:- इस विवाह का प्रमाण चन्द्रगुप्त प्रथम द्वारा प्रचलित सोने के कुमारदेवी प्रकार के सिक्कों से मिलता है। इन सिक्कों को राजा-रानी प्रकार के सिक्के कहा जाता था।
कुमारदेवी प्रथम ऐसी राजकुमारी थी जिसके नाम के सिक्के प्रचलित हुए।
- चन्द्रगुप्त प्रथम के दो पुत्र थे- तुल्यकुलुज और समुद्रगुप्त।
- चन्द्रगुप्त प्रथम की मृत्यु के बाद इन दोनों में उत्तराधिकार संघर्ष हुआ जिसमें समुद्रगुप्त ने तुल्यकुलुज को मार डाला व 335 ई. में शासक बना।
समुद्रगुप्त (350-375 ई.) :
चन्द्रगुप्त के पश्चात उसका पुत्र समुद्रगुप्त शासक बना। समुद्रगुप्त के दरबारी कवि हरिषेण द्वारा रचित प्रयाग (इलाहाबाद) प्रशस्ति लेख समुद्रगुप्त के शासन में खुदा है जिस पर अशोक का स्तम्भ काल से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है। इसकी भाषा विशुद्ध संस्कृत में है।
- विसेंट स्मिथ ने समुद्रगुप्त को 'भारत का नेपोलियन' कहा है।
- प्रयाग प्रशस्ति संस्कृत के चम्पू शैली (प्रारम्भिक पंक्ति पद्यात्मक तथा बाद वाली गद्यात्मक) में है। इसमें समुद्रगुप्त के अतिरिक्त अशोक, जहांगीर तथा बीरबल का उल्लेख है।
- समुद्रगुप्त द्वारा जारी किये गये सिक्के में कुछ पर 'अश्वमेध पराक्रम' खुदा है तो कुछ पर सम्राट को वीणा वादन करते हुए दिखाया गया है।
- चीनी स्रोत के अनुसार श्रीलंका के शासक मेघवर्मन ने समुद्रगुप्त से गया में बौद्धमठ बनाने की अनुमति मांगी।
पूर्व- सर्वकारदनम् आज्ञाकरणम् – प्रणामआगमनम्: कर देकर तथा आदेश देने पर गुप्त दरबार में प्रणाम करने हेतु – उपस्थित।
पश्चिम-
- आत्मनिवेदन- स्वयं दरबार में
- कन्योपायन: अपनी कन्याओं का विवाह- गुप्तों के साथ।
- गुरूत्मंदक स्वविषय/युक्ति शासन याचना: अपने विषय, प्रांत का शासन-गुप्तों से आदेश (मोहर) लेकर।
उत्तर- प्रसभीद्धरण- जड़ से उखाड़ फेंकना- समूल विनाश (4 प्रत्यक्ष शासन)
दक्षिण- अप्रत्यक्ष शासन नीति- गृहणमोक्षानुग्रह- विजित करने के बाद-उपहार लेकर- युक्त कर संग्रह
युद्ध वर्णन
- आर्यावृत्त II- 9 राजाओं को पराजित प्रयाग प्रशस्ति की 21वीं पंक्ति- आटविक राज्यों पर विजय का उल्लेख
- दक्षिणापथ विजय – 19, 20 वी पंक्ति
- द.पू. – सिमान्त राज्यों पर विजय- 22 वीं पंक्ति
- शक- कुषाण पर विजय- 23 व 24वीं पंक्ति
उतरापथ
दक्षिणापथ
Note: समुद्रगुप्त की समस्त विजयों का उद्देश्य ‘धरणीबंध’ था अर्थात् सम्पूर्ण भारत को राजनैतिक एकता के सूत्र में
बांधना।
- प्रयाग प्रशस्ति में समुद्रगुप्त के अश्वमेध यज्ञ का उल्लेख नहीं।
Note: प्रयाग प्रशस्ति में समुद्रगुप्त की ‘धर्मप्रचार बंधु’ की उपाधि का उल्लेख मिलता है।
- उत्तर भारत:- प्रत्यक्ष शासन नीति
- दक्षिण भारत:- अप्रत्यक्ष शासन
- समुद्रगुप्त को ऐरण अभिलेख (M.P.) में- प्रसन्न होने पर- कुबेर के समान- रूष्ट (क्रोधित) होने पर- यमराज के समान बताया है।
- समुद्रगुप्त के सिक्के: 6 प्रकार के सोने के सिक्के चलाए – लच्छवी दौहित्र की उपाधि सिक्कों से प्राप्त होती है।
- इसी अभिलेख में समुद्रगुप्त की पत्नी का नाम दत्तदेवी।
- 6 प्रकार के सिक्के:
- गरूड़:- गरूड़ का अंकन – पराक्रमांक उपाधि।
- धनुर्धारी – अप्रतिरथ उपाधि – अद्वितीय यौद्धा/जिसके विजय रथ को रोका नहीं जा सके।
- परशु – परशुकृतांत उपाधि।
- अश्वमेध – यज्ञ करते हुए दिखाया गया है। पृष्ठ भाग पर राजमहिर्षि – दत्तदेवी का अंकन – अश्वमेध पराक्रमांक उपाधि।
- व्याघ्रहनन – व्याघ्र का शिकार – व्याघ्रहंता उपाधि।
- वीणावादन – वीणा बजाते हुए दिखाया गया है – वीणादिन: उपाधि।
Note: सम्पूर्ण गुप्त शासकों में केवल – समुद्रगुप्त व चन्द्रगुप्त II ही ऐसे शासक है जिन्होंने अप्रतिरथ की उपाधि धारण की।
- समुद्रगुप्त ने दो बौद्धभिक्षुक – वसुबंधु व असंग को संरक्षण प्रदान किया।
- समुद्रगुप्त के दो पुत्रों का उल्लेख –
- रामगुप्त: समुद्रगुप्त की मृत्यु के बाद शासक बना।
Note: रामगुप्त का उल्लेख:
- विशाखदन द्वारा रचित – देवीचन्द्रगुप्त्तम में ग्रंथों में मिलता है।
- राजशेखर – काव्यमिमांशा
- बाणभट्ट – हर्ष चरित्तम
- अबुल हसन – मजुमल – उल – तवारीख
- चन्द्रगुप्त II – रामगुप्त को मारकर शासक बना।
-
चन्द्रगुप्त द्वितीय (375-412 ई.) :
- समुद्रगुप्त व चन्द्रगुप्त II के मध्य रामगुप्त (375-380 ई.) नामक निर्बल शासक।
- रामगुप्त के समय शकों का आक्रमण – रामगुप्त ने अपनी पत्नी – ध्रुवस्वामीनी को – शकों के शिविर में भेज दिया।
- चन्द्रगुप्त II ने – ध्रुवस्वामीनी को मुक्त कराया।
- रामगुप्त की हत्या कर – 380 ई. में शासक बना।
- ध्रुवस्वामीनी से विवाह किया।
- अन्यनाम: देवगुप्त, देवश्री, देवविक्रमांक, देवराज।
- उपाधीयाँ- विक्रमादित्य, शकारी, श्रीविक्रमांक, श्रीविक्रमसिंह, परमभट्टारक, परमभागवत, नरेन्द्रचन्द्र।
दो पत्नीयाँ:
1. ध्रुवस्वामिनी- पुत्र- कुमारगुप्त Ist(महेन्द्रादित्य)
2. नागवंश की राजकुमारी- कुबेरनागा से विवाह- पुत्री- प्रभावती का विवाह- वाकाटक वंश के – रूद्रसेन II के साथ किया (गुप्तवाकाटक गठबंधन का निर्माण)
- इसी गठबंधन की सहायता से- शकों को पुर्णत पराजित किया।
- (शक शासक- रूद्रसिंह III को- चन्द्रगुप्त II वकाटकों की सहायता से हराया)
- शकों का उन्मूलन करने के बाद-
1. चन्द्रगुप्त II ने- विक्रमादित्य की उपाधी
2. चन्द्रगुप्त II को इसी कारण से- शकारी(शकों को खा जाने वाला)
3. इसी उपलक्ष में- व्याघ्र प्रकार के चाँदी के सिक्के चलाए।
- चाँदी के सिक्के चलाने वाला प्रथम गुप्त शासक।
Note- हाल ही में MP से एक चाँदी का सिक्का मिला है जिस पर राजा-रानी का अंकन है अत: यह सिक्का चन्द्रगुप्त I के समय का माना जा सकता है- परन्तु अभी प्रमाणिक नहीं।
- चन्द्रगुपत II के दरबार में- नौ विद्वानों की एक मंडली निवास करती थी-
- जिसे नवरत्न कहा गया:
1. अमरसिंह- अमरकोष के रचियता
2. धन्वंतरी- चिकित्सक
3. कालीदास- कवि/लेखक
4. वराहमिहिर- ज्योतिष
5. वररूची- व्याकरणाचार्य
6. वेतालभट्ट – ज्योतिष/तंत्रविद्या
7. घटकर्पर- वास्तुकार
8. क्षपणक- लेखक/कवि
9. शंकु- वास्तुकार
- आर्यभट्ट नवरत्नों में शामिल नहीं थे।
- महरोली के लौह स्तंभ में “चंन्द्र” नामक राजा का उल्लेख मिलता है।
- “इतिहासकारों के अनुसार” यह शब्द- चन्द्रगुप्त II के लिए प्रयोग।
- Note- गुप्त संवत् का श्रेय- चन्द्रगुप्त Ist को जाना जाता है।
- परन्तु इस संवत का सर्वप्रथम प्रयोग “चन्द्रगुप्त II के समय के” ”मथुरा अभिलेख” में किया गया है।
- चन्द्रगुप्त II ने “कालीदास” को अपना दूत बनाकर “कुतल” देश भेजा।
- फहियान- चन्द्रगुप्त II के शासनकाल के दौरान – भारत आया।
- कब- 399 ई.- 414 ई. तक भारत में रहा।
- “फाहियान” भारत में धर्माचार्य के रूप में आया।
- बोद्ध धर्म का विशद ज्ञान प्राप्त हेतु भारत।
- ग्रंथ: “फो-को-की”
- अपने इस ग्रंथ में “चन्द्रगुपत II” के बारे में उल्लेख नहीं किया है।
- मध्यदेश(पाटलीपुत्र (मगध)) को- ब्राह्मणों का देश बताया।
- माँस, लहुसन नहीं खाते।
- लोग अपने घरों में ताले नहीं लगाते थे।
- मध्यदेश के लोग व्यापार हेतु “कोड़ियों” का प्रयोग करते थे।
- फाहियान ने न्याय व्यवस्था का उल्लेख करते हुए लिखा है कि- “राज्य में अपराध नहीं के बराबर।
- ”प्रथम राजधानी- पाटलीपुत्र।
- ब्राह्मणों को दंउ नहीं दिया जाता था।
- बार-बार अपराध करने पर “अपराधी का दाहिना हाथ काट लिया जाता था।”
- Note- चन्द्रगुप्त II के समय साम्राज्य की दूसरी राजधानी ”उज्जैन ”।
कुमारगुप्त (415-455 ई.) :
- ह्वेनसांग ने कुमारगुप्त का नाम 'शक्रादित्य' बताया है। इसने बड़ी संख्या में मुद्रायें जारी करवायी। इसके द्वारा जारी की गयी मुद्राओं का एक बड़ा भंडार (भरतपुर) में मिला जिसमें चांदी की मयूरशैली की मुद्राएं सर्वोत्कृष्ट थी।
- स्कंदगुप्त के भीतरी स्तम्भ लेख से ज्ञात होता है कि पुस्यभूतियों का आक्रमण कुमारगुप्त के समय हुआ।
- नालन्दा विश्वविद्यालय का संस्थापक कुमारगुप्त था।
- कुमारगुप्त तक के शासकों की जानकारी “बिलसड अभिलेख” (m.p) से प्राप्त होती है।
- उपाधीयाँ: मेहन्द्रादित्य, श्रीमहेन्द्र, अश्वमहेन्द्र
- सम्पुर्ण गुप्तशासकों में- सर्वाधिक अभिलेख- कुमारगुप्त के समय के हैं।
- “तुमैन” अभिलेख में कुमारगुप्त को “शरदकालीन सूर्य की भाँति शांत”
- कुमारगुप्त- प्रथम शासक जिसके अभिलेख बंगाल से प्राप्त होते है।
- तीन ताम्रपत्र-
- दामोदरपुर
- वैग्राम
- धनदैह
- इन तीनों गुप्तकालीन- भूमि के क्रय विक्रय व राजस्व के बारे में जानकारी मिलती है।
- कुमारगुप्त ने अपने सिक्कों पर “गरूड़ के स्थान – मयूर का अंकन”
- जिससे उसके ”शैव अनुयायी” होने के प्रमाण मिलते हैं।
- कुमारगुप्त के शासनकाल के अंतिम समय- हूणों का आक्रमण जिसे उसके पुत्र “स्कन्दगुपत” ने विफल कर दिया।
- नालदां को महायान बौद्ध धर्म का “ऑक्सफोर्ड” कहा जाता है।
- नालंदा विहार में सबसे बड़ा पुस्तकालय ‘धर्मगंज’ – तीन भाग है।
- रत्नोदधि
- रत्नरंजक
- रत्नसागर
स्कंदगुप्त (455-467 ई.) :
- राज्यारोहण के तुरन्त बाद इसे हुणों के आक्रमण का सामना करना पड़ा। स्कंदगुप्त के भीतरी स्तम्भ लेख तथा जूनागढ़ शिलालेख में हुणों पर स्कंदगुप्त की विजयों का उल्लेख है।
- कहौम स्तम्भ लेख में स्कंदगुप्त को 'शक्रोपम' कहा गया है। स्कंदगुप्त ने पर्णदत्त को सौराष्ट्र का राज्यपाल नियुक्त किया।
- जूनागढ़ शिलालेख से ज्ञात होता है कि स्कंदगुप्त ने सुदर्शन झील का पुनर्निर्माण करवाया था। इस झील का पुनर्निर्माण पर्णदत्त और उसके पुत्र चक्रपालित के निगरानी में करवाया गया था।
- परवर्ती गुप्त शासक नरसिंहगुप्त, कुमारगुप्त द्वितीय, बुद्धगुप्त, वैन्यगुप्त, भानुगुप्त, कुमारगुप्त तृतीय, विष्णुगुप्त आदि ने मिलकर 467 ई. से 550 ई. तक शासन किया।
- स्कन्दगुप्त की मृत्यु के साथ ही गुप्तों का पतन प्रारम्भ हो गया।
- नरसिंह बलादित्य: (500 ई. 510 ई.)
- - गुप्त साम्राज्य तीन भागों में विभाजित हो गया।
- - हुण शासक मिहीरकुल व उसे पुत्र तोरमाण को पराजित कर – बंदी बनाकर अपनी माता के सम्मुख प्रस्तुत किया।
- - माता के कहने पर मिहीरकुल को मुक्त कर दिया।
- चीनी यात्री ह्वेनसांग के अनुसार हूणों को पूर्णत: पराजित करने का श्रेय – स्कन्दगुप्त।
- भानुगुप्त:
- - 510 ई. में शासक बना-
- - भानुगुप्त के समय – मालवा पर हुणों का अधिकार था।
- - भानुगुप्त ने अपने सेनापति ‘गोपराज’ की सहायता से हुणों को पराजित किया।
- - हूणों के साथ इस युद्ध में ‘गोपराज’ वीरगति को प्राप्त हुआ।
- - गोपराज की पत्नी ने ‘सती प्रथा का वरण’ किया।
- इस सती प्रथा का उल्लेख – भानुगुप्त के ऐरण अभिलेख (M.P.) – 510 ई. का है में मिलता है।
- भारतीय इतिहास में यह सती प्रथा का प्रथम उल्लेख माना जाता है।
- भानुगुप्त ने गोपराज की स्मृति में ‘M.P.’ में एक विजय स्तम्भ का निर्माण करवाया तथा एक सती स्तम्भ (चबुतरा) का निर्माण भी करवाया।
गुप्तकालीन स्मारक
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मंदिर
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स्थान
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पार्वती मंदिर
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नचना कुठार (मध्यप्रदेश)
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शिव मंदिर
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भूमरा (नागोद, मध्य प्रदेश)
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दशावतार मंदिर
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देवगढ़
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विष्णु मंदिर
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तिगवां (जबलपुर, मधयप्रदेश)
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- गुप्तकाल में अनुदान में प्राप्त भूमि के गृहीता को सामंत कहा गया। धीरे-धीरे सामंत भूमि पर वास्तविक शासक बन गया।
- गुप्त शासकों ने सर्वाधिक स्वर्ण के सिक्के जारी किये। सोने के सिक्कों को 'दीनार' कहा गया।
- फाहयान के अनुसार विनिमय का साधान 'कौड़ी' था।
- गुप्तकालीन समाज में स्त्रियों का स्थान गौण था। स्त्रियां व्यक्तिगत सम्पत्ति समझी जाती थीं। बाल - विवाह का प्रचलन था तथा पर्दाप्रथा केवल उच्च वर्ग में प्रचलित थी। सती प्रथा का प्रचलन था।
- सती प्रथा का प्रथम उल्लेख 510 ई. के एरण अभिलेख से मिलता है।
- गुप्तकाल में नारद ने 15 प्रकार के दासों का उल्लेख किया है। दासों की स्थिति दयनीय थी। दासत्व से मुक्ति का पहला प्रयास नारद ने किया।
गुप्तकालीन कला :
- गुप्तकाल में कला की विविध विधाओं स्थापत्यकला, मूर्तिकला तथा चित्रकला में अभूतपूर्व विकास हुआ।
- मंदिर निर्माण की शुरुआत गुप्तकाल में ही हुई।
- गुप्तकालीन मंदिरों में सर्वोत्कृष्ट देवगढ़ का दशावतार मंदिर है। उत्तर भारत का यह पहला मंदिर है जिसमें शिखर का निर्माण किया गया।
- सारनाथ के धामेख स्तूप का निर्माण गुप्तकाल में किया गया। इसका निर्माण धरातल पर ईंटों द्वारा किया गया है।
मूर्तिकला एवं चित्रकला :
- गुप्तकालीन धातु मूर्तिकला में नालन्दा तथा सुल्तानगंज की बुद्ध की मूर्ति उल्लेखनीय है। गुप्तकाल की मूर्तियों में कुषाणकालीन नग्नता एवं कामुकता का पूर्णतः लोप हो गया था।
- गुप्तकाल में चित्रकला के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति हुई। इस काल की चित्रकला के अवशेष अजन्ता (महाराष्ट्र के औरंगाबाद में) तथा बाघ (मध्यप्रदेश) गुफाओं से प्राप्त होते हैं।
- अजन्ता गुफा की चित्रकारी को सर्वप्रथम 1919 में सर जेम्स अलेक्जेण्डर ने देखा। अजन्ता की गुफायें बौद्ध धर्म के महायान शाखा से संबंधित है। कुल 29 गुफाओं में वर्तमान में केवल 6 ही शेष है जिसमें गुफा संख्या 16 तथा 17 को गुप्तकालीन माना जाता है। गुफा संख्या 16 में 'मरणासन्न राजकुमारी' का चित्र प्रशंसनीय है। गुफा संख्या 17 के चित्र जिसे 'चित्रशाला' कहा गया है। इसमें बुद्ध के जन्म, जीवन, महाभिनिक्रमण एवं महापरिनिर्वाण की घटनाओं से सम्बन्धित चित्र उकेरे गये हैं।
- बाघ की गुफायें ग्वालियर के समीप विंध्यपर्वत को काट कर बनाई गयी थी। 1818 ई. में डैजरफील्ड ने इन गुफाओं को खोजा, जहां से 9 गुफायें मिली है। बाघ गुफा के चित्र आम जन - जीवन से संबंधित है।
विज्ञान एवं तकनीकी विकास :
- इस काल के आर्यभट्ट, वराहमिहिर एवं ब्रह्मगुप्त संसार के प्रसिद्ध नक्षत्र, वैज्ञानिक और गणितज्ञ थे।
- आर्यभट् ने अपने ग्रंथ 'आर्यभट्टीयान' में सर्वप्रथम प्रस्तुत किया कि पृथ्वी गोल है, वह अपनी धुरी पर घूमते हुए सूर्य का चक्कर लगाती है जिससे सूर्यग्रहण और चन्द्रग्रहण होते हैं। आर्यभट्ट ने दशमलव प्रणाली का विकास किया।
- वराहमिहिर की वृहत संहिता खगोलशात्र, वनस्पति विज्ञान तथा प्राकृतिक इतिहास का विश्वकोश है।
- चन्द्रगुप्त द्वितीय के दरबार का प्रसिद्ध आयुर्वेदाचार्य धन्वंतरि था।
- गुप्तकाल में सत्ता का विकेन्द्रीकरण प्रारंभ हुआ।
- प्राचीन भारत पहली बार सत्ता का विकेन्द्रीकरण प्रारंभ।
गुप्तकालीन प्रशासन
- प्रतिहार : अन्त: पुर का रक्षक
- महाप्रतिहार : राजप्रासाद का रक्षक
- महाबलाधिकृत : सेनापति
- महादण्डनायक : मुख्य न्यायाधीश
- महासंधिविग्राहिक : युद्ध में शांती/संधि करना – विदेश मंत्री
- कुमारामात्य : सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी
Note: समुद्रगुप्त के समय, महादण्डनायक, महासंधिविग्राहक व कुमारामात्य – तीनों पद ‘हरिषेण’ के पास थे।
- जबकि चन्द्रगुप्त II के समय यह तीनों पद हरिषेण के पूत्र ‘वीरषेण’ के पास थे।
- अमात्य : गुप्तकालीन नौकरशाह
- पुस्तपाल : भूमि का लेखा-जोखा रखने वाला
- दण्डपाशिक : गुप्तकालीन पुलिस अधिकारी
- गोल्मिक : वन अधिकारी
- विनयस्थिति स्थापक : सर्वोच्च धार्मिक अधिकारी
- महाअक्षपाटलिक : आय-व्यय का ब्यौरा रखने वाला (वित्त मंत्री)
- शोल्किक : सीमा शुल्क वसूलने वाला अधिकारी।
- ध्रुवाधिकरणिक : राजस्व संगृह करने वाला अधिकारी।
- रणभंडागारिक : सेना की सामग्री जुटाने वाला अधिकार।
- महाभंडाराधिकृत : राजकोषीय अधिकारी (कोषाध्यक्ष)
- अग्रहारिक : दानविभाग का प्रमुख
- करणिक : लिपिक
गुप्त साम्राज्य का पतन :
- गुप्त साम्राज्य का पतन विभिन्न कारणों का परिणाम था। इसके पतन के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं-
- आनुवांशिक शासकीय पद
- अयोग्य तथा दुर्बल अधिकारी
- शासन व्यवस्था का सामंतीकरण
- वाह्य आक्रमण
- आर्थिक संकट