गुप्त काल

विकेद्रीकरण की शुरूआत

गुप्त की उत्पत्ति

    श्रीगुप्त:- गुप्तकालीन अभिलेखों के आधार 'श्री गुप्त' गुप्तों के आदिराजा थे।

       श्रीगुप्त को गुप्तों का आदिपुरूष/गूढ़ पुरूष भी कहते हैं।

         - गुप्त वंश के संस्थापक माने जाते है।

- सम्पूर्ण गुप्त वंशावली में प्रथम शासक जिसने महाराज  की उपाधि धारण की।

- चीनी यात्री ‘इत्सिंग’ ने श्रीगुप्त को ‘चेलीकेतो’ कहा है।

- श्रीगुप्त ने ‘श्रृपतनमृगदाय’ में चीनी भिक्षुओं हेतु एक मंदिर का निर्माण करवाया।

- कुछ ग्रंथों के अनुसार श्रीगुप्त ने 274 ई. से लेकर 300 ई. तक शासन किया।

 

     घटोत्घच:- (300. – 319ई.)

- घटोत्घच का ज्यादा विवरण नहीं मिलता है।

- श्रीगुप्त के पुत्र थे।

- महाराज की उपाधि धारण की थी।

    नोट:- श्रीगुप्त व घटोत्घच की किसी भी प्रकार की मुद्रा (सिक्के) नहीं मिलते हैं।

चद्रगुप्त प्रथम (319-350 ई.) :

- गुप्तों के वास्तविक संस्थापक थे।

- सम्पूर्ण गुप्तों में प्रथम शासक जिसने महाराधिराज की उपाधि धारण की थी।

- चन्द्रगुप्त प्रथम ने अपने राज्यरोहण के दिन ‘9 मार्च, 319 ई.’ को एक नया संवत् प्रचलित किया जिसे गुप्त संवत् कहा जाता है।

- वैशाली की लिच्छवी वंश की राजकुमारी कुमारदेवी से विवाह किया और दहेज स्वरूप वैशाली के कुछ क्षेत्र मिले।

नोट:- इस विवाह का प्रमाण चन्द्रगुप्त प्रथम द्वारा प्रचलित सोने के कुमारदेवी प्रकार के सिक्कों से मिलता है। इन सिक्कों को राजा-रानी प्रकार के सिक्के कहा जाता था।

कुमारदेवी प्रथम ऐसी राजकुमारी थी जिसके नाम के सिक्के प्रचलित हुए।

- चन्द्रगुप्त प्रथम के दो पुत्र थे- तुल्यकुलुज और समुद्रगुप्त।

- चन्द्रगुप्त प्रथम की मृत्यु के बाद इन दोनों में उत्तराधिकार संघर्ष हुआ जिसमें समुद्रगुप्त ने तुल्यकुलुज को मार डाला व 335 ई. में शासक बना।

 

समुद्रगुप्त (350-375 ई.) :

चन्द्रगुप्त के पश्चात उसका पुत्र समुद्रगुप्त शासक बना। समुद्रगुप्त के दरबारी कवि हरिषेण द्वारा रचित प्रयाग (इलाहाबाद) प्रशस्ति लेख समुद्रगुप्त के शासन में खुदा है जिस पर अशोक का स्तम्भ काल से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है। इसकी भाषा विशुद्ध संस्कृत में है।

 

पूर्व- सर्वकारदनम् आज्ञाकरणम् – प्रणामआगमनम्: कर देकर तथा आदेश देने पर गुप्त दरबार में प्रणाम करने हेतु – उपस्थित।

पश्चिम-

  1. आत्मनिवेदन- स्वयं दरबार में
  2. कन्योपायन: अपनी कन्याओं का विवाह- गुप्तों के साथ।
  3. गुरूत्मंदक स्वविषय/युक्ति शासन याचना: अपने विषय, प्रांत का शासन-गुप्तों से आदेश (मोहर) लेकर।

उत्तर- प्रसभीद्धरण- जड़ से उखाड़ फेंकना- समूल विनाश (4 प्रत्यक्ष शासन)

दक्षिण- अप्रत्यक्ष शासन नीति- गृहणमोक्षानुग्रह- विजित करने के बाद-उपहार लेकर- युक्त कर संग्रह

 

                  युद्ध                                                                      वर्णन

  1. आर्यावृत्त II- 9 राजाओं को पराजित                          प्रयाग प्रशस्ति की 21वीं पंक्ति- आटविक राज्यों पर विजय का उल्लेख
  2. दक्षिणापथ विजय –                                               19, 20 वी पंक्ति
  3. द.पू. – सिमान्त राज्यों पर विजय-                             22 वीं पंक्ति
  4. शक- कुषाण पर विजय-                                         23 व 24वीं पंक्ति

 

 

उतरापथ

दक्षिणापथ

Note: समुद्रगुप्त की समस्त विजयों का उद्देश्य ‘धरणीबंध’ था अर्थात् सम्पूर्ण भारत को राजनैतिक एकता के सूत्र में

बांधना।                        

Note: प्रयाग प्रशस्ति में समुद्रगुप्त की ‘धर्मप्रचार बंधु’ की उपाधि का उल्लेख मिलता है।

  1. गरूड़:- गरूड़ का अंकन – पराक्रमांक उपाधि।
  2. धनुर्धारी – अप्रतिरथ उपाधि – अद्वितीय यौद्धा/जिसके विजय रथ को रोका नहीं जा सके।
  3. परशु – परशुकृतांत उपाधि।
  4. अश्वमेध – यज्ञ करते हुए दिखाया गया है। पृष्ठ भाग पर राजमहिर्षि – दत्तदेवी का अंकन – अश्वमेध पराक्रमांक उपाधि।
  5. व्याघ्रहनन – व्याघ्र का शिकार – व्याघ्रहंता उपाधि।
  6. वीणावादन – वीणा बजाते हुए दिखाया गया है – वीणादिन: उपाधि।

Note: सम्पूर्ण गुप्त शासकों में केवल – समुद्रगुप्त व चन्द्रगुप्त II ही ऐसे शासक है जिन्होंने अप्रतिरथ की उपाधि धारण की।

Note: रामगुप्त का उल्लेख:

चन्द्रगुप्त द्वितीय (375-412 ई.) :

दो पत्नीयाँ:
1. ध्रुवस्वामिनी- पुत्र- कुमारगुप्त Ist(महेन्द्रादित्य)

2. नागवंश की राजकुमारी- कुबेरनागा से विवाह- पुत्री- प्रभावती का विवाह- वाकाटक वंश के – रूद्रसेन II के साथ किया (गुप्तवाकाटक गठबंधन का निर्माण)

1. चन्द्रगुप्त II ने- विक्रमादित्य की उपाधी

2. चन्द्रगुप्त II को इसी कारण से- शकारी(शकों को खा जाने वाला)

3. इसी उपलक्ष में- व्याघ्र प्रकार के चाँदी के सिक्के चलाए।

- चाँदी के सिक्के चलाने वाला प्रथम गुप्त शासक।

Note- हाल ही में MP से एक चाँदी का सिक्का मिला है जिस पर राजा-रानी का अंकन है अत: यह सिक्का चन्द्रगुप्त I के समय का माना जा सकता है- परन्तु अभी प्रमाणिक नहीं।
 

1. अमरसिंह- अमरकोष के रचियता

2. धन्वंतरी- चिकित्सक

3. कालीदास- कवि/लेखक

4. वराहमिहिर- ज्योतिष

5. वररूची- व्याकरणाचार्य

6. वेतालभट्‌ट – ज्योतिष/तंत्रविद्या

7. घटकर्पर- वास्तुकार

8. क्षपणक- लेखक/कवि

9. शंकु- वास्तुकार

 

कुमारगुप्त (415-455 ई.) :

  1.  दामोदरपुर
  2.  वैग्राम
  3.  धनदैह

- इन तीनों गुप्तकालीन- भूमि के क्रय विक्रय व राजस्व के बारे में जानकारी मिलती है।

  1. रत्नोदधि     
  2. रत्नरंजक
  3. रत्नसागर

 

स्कंदगुप्त (455-467 ई.) :

गुप्तकालीन स्मारक

मंदिर

स्थान

पार्वती मंदिर

नचना कुठार (मध्यप्रदेश)

शिव मंदिर

भूमरा (नागोद, मध्य प्रदेश)

दशावतार मंदिर

देवगढ़

विष्णु मंदिर

तिगवां (जबलपुर, मधयप्रदेश)

गुप्तकालीन कला :

मूर्तिकला एवं चित्रकला :

विज्ञान एवं तकनीकी विकास :

                  गुप्तकालीन प्रशासन

  1. प्रतिहार                   :                       अन्त: पुर का रक्षक
  2. महाप्रतिहार             :                       राजप्रासाद का रक्षक
  3. महाबलाधिकृत         :                       सेनापति
  4. महादण्डनायक        :                       मुख्य न्यायाधीश
  5. महासंधिविग्राहिक     :                       युद्ध में शांती/संधि करना – विदेश मंत्री
  6. कुमारामात्य             :                       सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी

Note: समुद्रगुप्त के समय, महादण्डनायक, महासंधिविग्राहक व कुमारामात्य – तीनों पद ‘हरिषेण’ के पास थे।

      - जबकि चन्द्रगुप्त II के समय यह तीनों पद हरिषेण के पूत्र ‘वीरषेण’ के पास थे।

  1. अमात्य                    :                       गुप्तकालीन नौकरशाह
  2. पुस्तपाल                  :                       भूमि का लेखा-जोखा रखने वाला
  3. दण्डपाशिक             :                       गुप्तकालीन पुलिस अधिकारी
  4.  गोल्मिक                 :                       वन अधिकारी
  5.  विनयस्थिति स्थापक  :                       सर्वोच्च धार्मिक अधिकारी
  6.  महाअक्षपाटलिक      :                       आय-व्यय का ब्यौरा रखने वाला (वित्त मंत्री)
  7.  शोल्किक                 :                      सीमा शुल्क वसूलने वाला अधिकारी।
  8.  ध्रुवाधिकरणिक         :                       राजस्व संगृह करने वाला अधिकारी।
  9.  रणभंडागारिक          :                       सेना की सामग्री जुटाने वाला अधिकार।
  10.  महाभंडाराधिकृत       :                       राजकोषीय अधिकारी (कोषाध्यक्ष)
  11.  अग्रहारिक                :                       दानविभाग का प्रमुख
  12.  करणिक                  :                       लिपिक

 

गुप्त साम्राज्य का पतन :