1857 की क्रांति

जानकारी के स्त्रोत :-

1.    माझा प्रवास : 1857 की क्रांति पर लिखी गई प्रथम पुस्तक है, इसकेलेखक विष्णुभट्ट गोडसे है। यह मूलत: एक यात्रा वृतांत है जो मद्रासी भाषा में लिखा गया है। विष्णुभट्ट ने इसमें 84 नियमों का उल्लेख किया है जिसके से अंग्रेज भारतीय लोगों का उत्पीड़न कर रहे थे। विष्णुभट्ट ने सर्वप्रथम लियर व उत्तरी भारत में देखे विद्रोह का उल्लेख किया है।

2.    फ्रॉम स्पॉय टू सुबेदार : यह नारगेट दास द्वारा लिखित ग्रंथ है। इस पुस्तक में 1857 के विद्रोह में भाग लेने वाले एक सैनिक सीताराम पांडे के संस्मरण अवधी भाषा में लिखे गए है। इन्हीं संस्मरणों का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद नारगेट दास द्वारा किया गया।

3.    ए ग्रेट रिबेलियन : अशोक मेहता द्वारा लिखित पुस्तक है।

4. भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम (The First War of Indian Indipendence) : V.D. सावरकर द्वारा 1857 की क्रांति की 50 वीं वर्षगाँठ पर लिखी गई थी।

5.    1857 (Eighteen Fifty Seven) : S.N. सेन द्वारा 1857 की क्रांति के 100 वर्ष (1857 से 1957) पर लिखी गई पुस्तक है।

6.    द स्पॉय म्यूटीनी & रिवाल्ट ऑफ 1857 : R.C. मजूमदार द्वारा लिखित पुस्तक है।

 

1857 के विद्रोह के समय :

 

 

1857 की क्रांति का स्वरूप :-

1. सैनिक विद्रोह:

-        यूरोपीय विद्वान रार्बट्स जॉन लॉरेन्स, सिले, चार्ल्स राइक्स ने इसे सैनिक विद्रोह बताया।

-        इस मत का समर्थन भारतीय इतिहासकार – दुर्गादास बदोंपाध्याय व सैय्यद अहमद खाँ है।

निष्कर्ष : निसंदेह यह एक सैनिक विद्रोह के रूप में प्रारंभ हुआ परन्तु बाद में समाज के प्रत्येक वर्ग ने भाग लिया।

2.    मुस्लिम षड्यंत्र (हिन्दु- मुस्लिम षड्यंत्र) :

- मुस्लिम शासन की पुन: स्थापना का प्रयास था।

- किसने कहा : जेम्स आउट्रम & डबल्यू टेलर

- कथन : हिन्दुओं की आड़ में मुस्लिम षड्यंत्र

- कूपलैंड व मॉरीसन ने इस कथन का समर्थन किया है।

निष्कर्ष: 1857 की क्रांति में हिन्दुओं ने सर्वाधिक भाग लिया- अत: यह कथन गलत।

3.    राष्ट्रीय विद्रोह:

 

1857 से पूर्व हुए विद्रोह –

        2.  1824 का बैरकपुर विद्रोह:

          3.    कांगड़ा विद्रोह – 1848 ई.

4.    1842 फिरोजपुर सैनिक विद्रोह

5.    संथाल विद्रोह: (1855-56 ई.)

 

1857 क्रांति के कारण-

1. राजनैतिक/प्रशासनिक कारण

2. आर्थिक कारण

3. सामाजिक/धार्मिक कारण

4. सैनिक कारण

5. तात्कालिक कारण

1. राजनैतिक कारण:-

1857 से पूर्व भारत में ब्रिटिश सर्वोच्च सत्ता की स्थापना तीन चरणों में हुई जिसका उल्लेख “लीवार्नर” ने अपने ग्रंथ “द नेटिव ऑफ इंडिया” में किया है। यह चरण क्रमश:-

2. 1765-1813 के मध्य :-

Note:- लिवार्नर के अनुसार वारेन हेस्टिंग्स द्वारा अपनाई गई नीति भी रिंग फैज नीति के तहत आती है- क्योंकी हेस्टिंग्स ने भी पड़ौसी राज्यों के साथ सहायक संधियाँ की।

 

  1. हैदराबाद – 1798 ई. में सहायक संधि करने वाली प्रथम रियासत थी।

  2. मैसूर व तंजौर – 1799 ई. में

  3. अवध – 1801 ई. में

  4. पेशवा बाजीराव II – 1801 ई. (मराठा साम्राज्य)

  5. बरार – 1803 ई.

  6. ग्वालियर – 1804 ई.

 

3. 1814 ई. से 1857 तक:

 

लार्ड डलहौजी की राज्य हड़प (व्यपगत नीति) :

 डलहौजी द्वारा हड़पे गए क्षेत्र :

राज्य हड़प नीति को डॉक्टरीन सिद्धांत भी कहा जाता है।

 

Note:- करौली (राज) विलय को “कोर्ट ऑफ डायरेक्ट्स” ने यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया की “करौली सरंक्षित मित्र था न की आश्रित राज्य”।

आर्थिक कारण-

1. स्थाई बंदोबस्त-

2. रैय्यतवाड़ी-

3. महालवाड़ी-

राजस्व व्यवस्था की पृष्ठभूमि :-

-      1770 दो भू राजस्व नियंत्रण परिषदें स्थापित –

       1. बंगाल – मुख्यालय - मुर्शिदाबाद

       2. बिहार – मुख्यालय - पटना

-      दोनों मिलकर नायब दीवानों के कार्य का निरीक्षण, कलकता में “भू-राजस्व नियंत्रण समिति” – दोनों परिषदों का निरीक्षण 

-      1772-73 वारेन हेस्टिग्स ने नायबों का पद समाप्त कर जिले के निरीक्षकों को यह कार्य सौंपा। इन्हें कलेक्टर कहा गया। (जॉन कैंपवेल)

 

कलेक्टर :- इसकी सहायता हेतु भारतीय दीवान नियुक्त किए। इसके कार्य निम्नलिखित थे-

             - लगान वसूल करना  { 1772-73 पंचवर्षीय बंदोबस्त }

             - लगान पंजिका तैयार करना

             - दीवानी न्याय प्रदान करना 
 

 

⇒ 1772-73 ई. का रेग्यूलेटिंग एक्ट –

→ इसके तहत वारेन हेस्टिंग्स सम्पूर्ण बंगाल के गवर्नर जनरल बने।

5 वर्षीय बंदोबस्त :-
→    1772-73 से 1778 ई. तक लागू किया गया।

→    उच्च बोली लगाने वाले भू-स्वामी को  5 वर्ष हेतु लगान वसूलने का अधिकार दिया गया था।

→    राजस्व का 9/10 भाग B.I.C को दिया गया।

→   1778 ई. इसे एक वर्षीय बंदोबस्त बना दिया गया।

→   1781 ई. में प्रांतीय परिषदों को समाप्त कर दिया। राजस्व समिति का पुर्नगठन कर राजस्व मंडल बना दिया। गवर्नर के काउंसिल के एक सदस्य को इनका अध्यक्ष बना दिया (कुल 5 सदस्य)।

→    फरवरी 1785 ई. में वारेन हेस्टिंग्स का कार्यकाल समाप्त तथा मेकफर्सन कार्यवाहक गर्वनर बनाये गये।

→    जुलाई 1786 ई. में नया पद “शिरस्तेदार” सृजित किया गया; जिसका कार्य कानूनगो से राजस्व अभिलेख व सूचनाएँ प्राप्त करना था।

⇒ 1784 ई. में पिट्स इंडिया एक्ट –

→   इसमें पहली बार भूमि के स्थाई बंदोबस्त करने का आदेश दिया गया।

→    जमीदारों के सद्भावना पूर्वक व्यवहार करके उन्हें B.I.C. के समर्थकों के रूप में परिवर्तित किया जाए।

→    सितम्बर 1786 ई. में लार्ड कार्नवालिस गवर्नर जनरल बनकर भारत आया। कलेक्टरों को जिले में पुन: नियुक्त किया गया। इनके कार्य -

स्थाई बंदोबस्त-

1. सम्पूर्ण भूमि का स्वामी जमीदार होता था। परन्तु राजस्व वसूलने/जमा करवाने में असमर्थ रहने पर उस राजस्व की             वसूली हेतु जमींदारी निलाम कर दी जाती थी ।

2. B.I.C. भू-राजस्व के अधिकार से मुक्त-

3. जमीदारों के न्यायिक अधिकार छीन लिए गए। जमीदारों को आदेश दिया कि वह अपने रैय्यत (किसान) को पट्टे जारी       करेंगे, इन पट्टो में रय्यतों व जमीदारों के बीच के सम्बन्धो का उल्लेख किया जायेगा।

 

 

       यह व्यवस्था स्थाई बंदोबस्त वाले क्षेत्रों को छोड़कर 51 प्रतिशत ब्रिटिश भारत में लागू की गई।

नोट – मुंबई में यह व्यस्था पुर्णत: एलफिंसटन द्वारा लागू की गई।

    

       1.  किसान को भूमि का स्वामी बनाया गया।

1. भूमि का सर्वेक्षण किया जाए,

2. भूमि से संबंधित व्यक्तियों के अधिकारों का अभिलेख तैयार किया जाए

3. ग्राम से राजस्व संग्रह की व्यवस्था मुखिया (लम्बरदार) के माध्यम से करवाई जाए।

1822 ई. के रेग्यूलेशन 7 के माध्यम से इस सुझाव को कानूनी रूप दिया गया।

नोट- यह व्यवस्था सर्वप्रथम अवध व आगरा के कुछ क्षेत्रों में लगाई गई।

1. अलग-अलग भूमि हेतु औसत किराया नियत।

2. पहली बार राजस्व वसूलने हेतु मानचित्रों व पत्रिकाओं का उपयोग किया गया।

नोट :- अवध में इन्होंने किसानों को भड़काने का कार्य किया।

     ⇒ अनौद्योगिकरण:- (1800 से 1850 के दौरान)

जैसे – 1. महाराष्ट्र में कपास उत्पादन के लिए प्रोत्साहन दिया गया।

       2. चीन में अफीम की आदतों को बढ़ावा देने हेतु मालवा (M.P.) में अफीम की खेती की गई।

 

⇒ प्रशासनिक कारण:-

 

⇒ तात्कालिक कारण:-