1857 की क्रांति
जानकारी के स्त्रोत :-
1. माझा प्रवास : 1857 की क्रांति पर लिखी गई प्रथम पुस्तक है, इसकेलेखक विष्णुभट्ट गोडसे है। यह मूलत: एक यात्रा वृतांत है जो मद्रासी भाषा में लिखा गया है। विष्णुभट्ट ने इसमें 84 नियमों का उल्लेख किया है जिसके से अंग्रेज भारतीय लोगों का उत्पीड़न कर रहे थे। विष्णुभट्ट ने सर्वप्रथम लियर व उत्तरी भारत में देखे विद्रोह का उल्लेख किया है।
2. फ्रॉम स्पॉय टू सुबेदार : यह नारगेट दास द्वारा लिखित ग्रंथ है। इस पुस्तक में 1857 के विद्रोह में भाग लेने वाले एक सैनिक सीताराम पांडे के संस्मरण अवधी भाषा में लिखे गए है। इन्हीं संस्मरणों का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद नारगेट दास द्वारा किया गया।
3. ए ग्रेट रिबेलियन : अशोक मेहता द्वारा लिखित पुस्तक है।
4. भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम (The First War of Indian Indipendence) : V.D. सावरकर द्वारा 1857 की क्रांति की 50 वीं वर्षगाँठ पर लिखी गई थी।
5. 1857 (Eighteen Fifty Seven) : S.N. सेन द्वारा 1857 की क्रांति के 100 वर्ष (1857 से 1957) पर लिखी गई पुस्तक है।
6. द स्पॉय म्यूटीनी & रिवाल्ट ऑफ 1857 : R.C. मजूमदार द्वारा लिखित पुस्तक है।
1857 के विद्रोह के समय :
इंग्लैण्ड की महारानी : विक्टोरिया
इंग्लैण्ड का P.M. : पॉम्स्टर्न
भारत का गवर्नर जनरल : लार्ड कैनिंग
कंपनी का प्रधान सैनिक : एनीसन
बादशाह : मुगलबादशाह बहादुरशाह जफर
प्रथम गवर्नर : 1758- क्लाइव को केवल बंगाल का गवर्नर बना गया।
प्रथम गवर्नर जनरल : 1773 के रेग्यूलेंटिग एक्ट के द्वारा वारेन हेस्टिंगस को बंगाल का प्रथम गवर्नर जनरल बना दिया गया।
1833 के चार्टर से बंगाल के गवर्नर जनरल को सम्पूर्ण भारत का गवर्नर जनरल बना दिया गया, प्रथम विलियम बैंटिक बना।
प्रथम वायसराय :– यह 1857 की क्रांति के बाद सृजित किया गया, प्रथम वायसराय लार्ड कैनिंग था।
1857 की क्रांति का स्वरूप :-
1. सैनिक विद्रोह:
- यूरोपीय विद्वान रार्बट्स जॉन लॉरेन्स, सिले, चार्ल्स राइक्स ने इसे सैनिक विद्रोह बताया।
- इस मत का समर्थन भारतीय इतिहासकार – दुर्गादास बदोंपाध्याय व सैय्यद अहमद खाँ है।
निष्कर्ष : निसंदेह यह एक सैनिक विद्रोह के रूप में प्रारंभ हुआ परन्तु बाद में समाज के प्रत्येक वर्ग ने भाग लिया।
2. मुस्लिम षड्यंत्र (हिन्दु- मुस्लिम षड्यंत्र) :
- मुस्लिम शासन की पुन: स्थापना का प्रयास था।
- किसने कहा : जेम्स आउट्रम & डबल्यू टेलर
- कथन : हिन्दुओं की आड़ में मुस्लिम षड्यंत्र
- कूपलैंड व मॉरीसन ने इस कथन का समर्थन किया है।
निष्कर्ष: 1857 की क्रांति में हिन्दुओं ने सर्वाधिक भाग लिया- अत: यह कथन गलत।
3. राष्ट्रीय विद्रोह:
बेन्जामिन डिजरली ने 1857 की क्रांति को ‘राष्ट्रीय विद्रोह’ बताया, ये ब्रिटेन के राजनेता थे बाद में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बने।
बेन्जामिन ने यह कथन 27, जुलाई 1857 को “हाउस ऑफ कॉमन्स” में चल रही बहस में कहा।
भारत के अशोक मेहता भी इस मत का समर्थन करते हैं।
निष्कर्ष: भारत के लगभग सम्पूर्ण भाग में भारतीय लोगों ने इस क्रांति में भाग लिया अत: इसे राष्ट्रीय विद्राह कहा जा सकता है।
S.N मेहता ने अपनी पुस्तक – 1857 में लिखा की “जो कुछ धर्म की लड़ाई के रूप में शुरू हुआ, वह स्वतंत्रता संग्राम के रूप में समाप्त हुआ”
1857 से पूर्व हुए विद्रोह –
1757 ई. में स्थापित ब्रिटिश साम्राज्य के 100 वर्ष पूर्ण।
इन 100 वर्षों के दौरान अनेक सैनिक व असैनिक विद्रोह हुए।
इनका कारण ब्रिटिश शासन के विरूद्ध असंतोष था। अत: अपदस्य सामंतो व सैनिकों ने विद्रोह किए।
किसानों ने भूराजस्व नीति के विरोध में विद्रोह किया अनेक किसानों से उनकी भूमि छीन ली गई।
1. वैल्लूर का विद्रोह: (1806 ई.)
कारण: Nov 1805 ई. में पारित एक अधिनियम द्वारा “सिपाही ड्रेस कोड” में बदलाव किया गया।
हिंदुओं को माथे पर तिलक लगाने व धार्मिक वस्त्र पहनने से मना कर दिया गया। मुस्लिम को दाढ़ी व मूंछ रखने पर पाबंदी लगा दी गई।
मद्रास रेजीमेंट के मेजर जेनरल ‘जॉन क्रैडेक’ ने एक आदेश देकर भारतीय सैनिकों को यूरोपियों व इसाई धर्म में परिवर्तित लोगों द्वारा पहनी जाने वाली एक टोपी पहनने का फरमान जारी किया।
10 जुलाई 1806 ई. को मद्रास (तमिलनाडु) के वैल्लूर में भारतीय हिंदु व मुस्लिम सैनिकों ने विद्रोह कर दिया वैल्लूर छावनी पर अधिकार कर लिया व 200 ब्रिटिश सैनिकों को मार डाला।
B. I.C. ने अर्काट (आरकाटा) से ब्रिटिश घुड़सवार सैनिकों व तोपखाने की मदद से इस विद्रोह का दमन कर दिया
वैल्लूर विद्रोह भारतीय सैनिकों द्वारा B.I.C के खिलाफ किया गया प्रथम बड़ा हिंसक विद्रोह था।
2. 1824 का बैरकपुर विद्रोह:
गवर्नर जनरल “लार्ड एमहर्स्ट” के समय बैरकपुर की 47 वीं रेजिमेंट को समुद्री मार्ग से बर्मा जाने का आदेश दिया गया। सैनिकों ने समुद्री मार्ग द्वारा बर्मा जाने से इनकार कर दिया और विद्रोह कर दिया क्योंकि तत्कालीन समाज में समुद्र पर यात्रा करना धर्म के विरूद्ध माना जाता था।
3. कांगड़ा विद्रोह – 1848 ई.
1848-49 ई. का द्वितीय पंजाब युद्ध भी अंग्रेजों के खिलाफ जनता और सेना का विद्रोह था
4. 1842 फिरोजपुर सैनिक विद्रोह
5. संथाल विद्रोह: (1855-56 ई.)
1857 की क्रांति से पूर्व प्रथम हिंसक जनजातिय विद्रोह था जो मुर्शिदाबाद से लेकर बिहार के भागलपुर व राजमहल की पहाड़ियों तक केन्द्रित था।
राजमहल की पहाड़ियों में होने के कारण 'पहाड़िया विद्रोह' भी कहा जाता है।
आदिवासियों के विद्रोह में सबसे जबरदस्त विद्रोह माना जाता है इस विद्रोह का नेतृत्व “सिद्धु व कान्हु” ने किया
Note : राजमहल की पहाड़ियों में इससे पूर्व 1778 ई. में वहाँ निवास कर रही जनजातियों ने खूनी संघर्ष किया अंग्रेजों ने मजबूर होकर उनसे समझौता कर उनके क्षेत्रों को “दामन-ए-कौह” घोषित किया, इस विद्रोह को भी पहाड़िया विद्रोह के नाम से जाना जाता है।
1857 क्रांति के कारण-
1. राजनैतिक/प्रशासनिक कारण
2. आर्थिक कारण
3. सामाजिक/धार्मिक कारण
4. सैनिक कारण
5. तात्कालिक कारण
1. राजनैतिक कारण:-
1857 से पूर्व भारत में ब्रिटिश सर्वोच्च सत्ता की स्थापना तीन चरणों में हुई जिसका उल्लेख “लीवार्नर” ने अपने ग्रंथ “द नेटिव ऑफ इंडिया” में किया है। यह चरण क्रमश:-
1740 ई. से 1764 की नीति : रियासतों के समक्ष आने की नीति
1765 ई. से 1813 की नीति : अधीनस्थ घेरा (रिंग फेज) नीति
1814 ईं. से 1857 तक की नीति : अधीनस्थ पार्थक्य की नीति
1. 1740 ई. से 1764 की नीति :-
प्रारंभ में केवल एक व्यापारिक कंपनी के रूप में भारत आए परन्तु धीरे-धीरे राजनीति में हस्तक्षेप करना प्रारंभ किया।
1740-1764 के दौरान रियासतों के समकक्ष आने की नीति अपनाई।
1757 – प्लासी के युद्ध के बाद
क्लाइव ने मीर जाफर को हिंदुओं के खिलाफ भड़काकर “फूट डालो व राज करो” की नीति प्रारंभ की।
1764- बक्सर के युद्ध के बाद अंग्रेजों ने बंगाल में अपने आप को पूर्ण रूप से स्थापित कर लिया व राजस्व के सम्पूर्ण अधिकार प्राप्त कर लिए।
2. 1765-1813 के मध्य :-
अधीनस्थ घेरे की नीति/ (रिंग फैज की नीति)- इस नीति का अनुसरण सर्वप्रथम लार्ड वेलेजली (1798- 1805 ई.) द्वारा अनुसरण किया था
Note:- लिवार्नर के अनुसार वारेन हेस्टिंग्स द्वारा अपनाई गई नीति भी रिंग फैज नीति के तहत आती है- क्योंकी हेस्टिंग्स ने भी पड़ौसी राज्यों के साथ सहायक संधियाँ की।
रिंग फैज/अधीनस्थ घेरे की नीति:-
सर्वप्रथम वेलेजली ने अनुसरण किया था।
उद्देश्य : अप्रत्यक्ष रूप से रिसायतों पर नियंत्रण स्थापित करना। अपने राज्य को सुरक्षित रखना है तो पड़ौसी राज्य की भी सुरक्षा करनी होगी।
वेलेजली की सहायक संधि की निम्न शर्तेँ थी-
अंग्रेजों के साथ संधि करने वाले भारतीय शासक को अपने क्षेत्रों में ब्रिटिश सेना को स्वीकारना होगा।
सैनिकों के वेतन का भुगतान – राजा करेंगे व वेतन भुगतान नहीं कर पाने पर क्षेत्र का एक भाग- अंग्रेजों के अधीन हो जाएगा।
संधि के बदले अंग्रेज (B.I.C.) विदेशी आक्रमण व आंतरिक रियासतों के आक्रमण से सुरक्षा करेगी।
बिना अनुमति के अन्य विदेशी शक्तियों से संधि नहीं कर सकेंगे।
अन्य रियासतों के राजनैतिक संबध स्थापित नहीं करेंगे।
वेलेजली द्वारा की गई सहायक संधियाँ:
हैदराबाद – 1798 ई. में सहायक संधि करने वाली प्रथम रियासत थी।
मैसूर व तंजौर – 1799 ई. में
अवध – 1801 ई. में
पेशवा बाजीराव II – 1801 ई. (मराठा साम्राज्य)
बरार – 1803 ई.
ग्वालियर – 1804 ई.
3. 1814 ई. से 1857 तक:
अधीनस्थ पार्थक्य की नीति का अनुसरण किया।
इसी नीति के द्वारा अंग्रेजों ने अधीन की गई रियासतों को अपनी ताकत दिखाई।
लार्ड डलहौजी की राज्य हड़प (व्यपगत नीति) :
लार्ड डलहौजी (1848-56) ई. के दौरान गवर्नर जनरल बनकर भारत आया। डलहौजी ने गोद निषेध प्रथा लागू की। जिसका उद्देश्य साम्राज्य विस्तार, रियासतों व राजाओं को अपने अधीन करना।
राजा के संतान नहीं होने पर दत्तक पुत्र ग्रहण करने पर रोक लगा दी तथा उनके क्षेत्र अंग्रेज (ब्रिटिश भारत ) के अधीन विलय कर दिया गया। अंग्रेजों का आश्रित राज्य बना दिया गया।
डलहौजी द्वारा हड़पे गए क्षेत्र :
सतारा- 1848
राजा अप्पा के कोई संतान नहीं थी।
1848 ई. में सतारा को आश्रित राज्य घोषित कर ब्रिटिश भारत में विलय कर दिया गया।
ब्रिटिश राजनेता व इतिहासकार- जोसेफ ह्यूम ऑफ कॉमन्स में सतारा विलय को जिसकी लाठी उसकी भैंस कहा।
संभलपुर
राजा – राजा नारायण
1849 ई. में अंग्रेजी सत्ता में विलय
जैतपुर – 1849 ई. में विलय
1856 ई. में कैनिंग गवर्नर जेनरल बनकर आया तो संम्भलपुर व जैतपुर की रियासते राजा को पुन: लौटा दी।
बघाट – 1850 ई. में विलय
उदयपुर – 1852 ई. में विलय
बरार- 1853 ई. में विलय
हैदराबाद का निजाम कर्ज चुकाने में असफल रहा अत: डलहौजी ने बरार को हड़प लिया।
झाँसी: 1853 ई. विलय
वारेन हेस्टिंग्स ने पेशवा की मृत्यु के बाद झाँसी के राजा “रामचन्द्र” से संधि कर उसके दत्तक पुत्र व उत्तराधिकारियों को यह राज्य अधिनस्थ सेवाओं की शर्तों पर दे दिया।
राजा की मृत्यु के बाद कंपनी ने राजा के वंशज गंगाधर राव को उत्तराधिकारी स्वीकार कर राजा मान लिया।
गंगाधर राव की मृत्यु के बाद रानी “लक्ष्मीबाई” ने “दामोदर राव” को दत्तक घोषित किया।
डलहौजी ने दामोदर राव को झाँसी का राजा अस्वीकार कर दिया तथा फरवरी 1853 ई. में झाँसी को हड़प लिया।
राज्य हड़प नीति को डॉक्टरीन सिद्धांत भी कहा जाता है।
नागपुर :- भारत का महत्वपूर्ण कपास उत्पादक क्षेत्र था।
1853 ई. में राजा रघुजी तृतीय की मृत्यु हुई तो रानी ने यशवंत राव को उत्तराधिकारी बनाया, परन्तु डलहौजी ने अस्वीकार कर दिया।
1854 ई. में नागपुर का B.I.C साम्राज्य में विलय कर दिया।
1855 ई. में तंजौर व करौली को अंग्रेजी साम्राज्य में मिलाया।
Note:- करौली (राज) विलय को “कोर्ट ऑफ डायरेक्ट्स” ने यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया की “करौली सरंक्षित मित्र था न की आश्रित राज्य”।
कैनिंग ने उदयपुर व बघाट के विलय के निर्णय को भी बदल दिया।
अवध का विलय 1856-
अवध का नवाब “वाजीद अली शाह” की पत्नी हजरत महल थी। (जिसे महक परी कहा जाता है)
डलहौजी ने कुशासन का आरोप लगया तथा लखनऊ के रेजीडेनट “आउट्रम” की सहायता से अवध का विलय अंग्रेजी साम्राज्य में कर दिया जबकि अवध अंग्रेजों का मित्र संरक्षक राज्य था।
1857 की क्रांति में सर्वाधिक सैनिक ‘अवध’ से शामिल हुए थे।
झांसी की रानी लक्ष्मीबाई को “महल परी” कहते थे।
पद व पेंशन:-
1848 ई. में डलहौजी ने अंतिम मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर को बादशाह की उपाधि त्यागने का आदेश दे दिया।
सिक्कों पर प्रचलित बादशाह के नाम को हटवा दिया।
लालकिला खाली करने का आदेश जारी कर कहा कि अब बादशाह को कुतुबमिनार के समीप मकान में निवास करना होगा।
कैनिंग ने बहादुर शाह को कहा “वह भारत में अंतिम मुगल सम्राट होगा”।
अन्य तथ्य –
भारतीय सैनिकों को उच्च पदो पर आसीन नही किया जाता था तथा पदोन्नती नहीं की जाती थी।
भारतीय सुबेदार को वेतन 35 रू ही मिलता था जबकि अंग्रेजी सुबेदार को वेतन 195 रू मासिक मिलता था।
पेंशन:-
अंग्रेज कानपुर के पेशवा बाजीराव II को 8 लाख रूपये पेंशन के रूप में देते थे, पेशवा बाजीराव की मृत्यु के बाद उनके उत्तराधिकारी नानासाहेब (वास्तविक नाम धोधुं पंत) को अंग्रेजो ने पेंशन देने से मना कर दिया।
पेशवा बाजीराव II ने अंग्रेजों के साथ “बसई“ की संधि (31-12-1802) के द्वारा B.I.C. का आश्रित होना स्वीकार किया।
आर्थिक कारण-
कैलिको :- औधोगिक क्रांति के दौरान यूरोपियन लोग भारतीय सूती वस्त्र, जिसे कालीकट बंदरगाह के माध्यम से अन्य देशों में ले जाते थे अत: इसे कैलिको कहा गया।
1764 ई. बक्सर युद्ध के पूर्व अंग्रेज भारतीयों से खरीदे समान के बदले- सोना-चाँदी देते थे।
बंगाल की दीवानी मिलने से भारतीयों से वसूले गए राजस्व से ही सामान खरीदने लगे।
भारतीय व्यापारियों से 95 प्रतिशत चुंगी वसूलते थे जबकि अंग्रेजी व्यापारियों से मात्र 2,3,3.5% ही चुंगी वसूली जाती थी।
भू राजस्व व्यवस्था:-
1. स्थाई बंदोबस्त-
2. रैय्यतवाड़ी-
3. महालवाड़ी-
राजस्व व्यवस्था की पृष्ठभूमि :-
B.I.C ने इलाहाबाद संधि द्वारा 1765 ई. में बंगाल के दीवानी अधिकार प्राप्त कर 1765 ई. में राजस्व वसूलना प्रारंभ किया।
- B.I.C ने दो नायब दीवानों की नियुक्ति की। 1769 ई. में वसूली निरीक्षण के लिए जिला निरीक्षकों की नियुक्ती।

- मुगलकाल पतन के बाद ऐसे लोगों के हाथों में जो स्थानीय क्षेत्रों में प्रभाव रखते थे। फलत: दूरस्थ क्षेत्रों का राजस्व सीमित होता गया। किसान भूमि के वंशानुगत मालिक बनने लगे।
- 1770 दो भू राजस्व नियंत्रण परिषदें स्थापित –
1. बंगाल – मुख्यालय - मुर्शिदाबाद
2. बिहार – मुख्यालय - पटना
- दोनों मिलकर नायब दीवानों के कार्य का निरीक्षण, कलकता में “भू-राजस्व नियंत्रण समिति” – दोनों परिषदों का निरीक्षण
- 1772-73 वारेन हेस्टिग्स ने नायबों का पद समाप्त कर जिले के निरीक्षकों को यह कार्य सौंपा। इन्हें कलेक्टर कहा गया। (जॉन कैंपवेल)
कलेक्टर :- इसकी सहायता हेतु भारतीय दीवान नियुक्त किए। इसके कार्य निम्नलिखित थे-
- लगान वसूल करना { 1772-73 पंचवर्षीय बंदोबस्त }
- लगान पंजिका तैयार करना
- दीवानी न्याय प्रदान करना
⇒ 1772-73 ई. का रेग्यूलेटिंग एक्ट –
→ इसके तहत वारेन हेस्टिंग्स सम्पूर्ण बंगाल के गवर्नर जनरल बने।
5 वर्षीय बंदोबस्त :-
→ 1772-73 से 1778 ई. तक लागू किया गया।
→ उच्च बोली लगाने वाले भू-स्वामी को 5 वर्ष हेतु लगान वसूलने का अधिकार दिया गया था।
→ राजस्व का 9/10 भाग B.I.C को दिया गया।
→ 1778 ई. इसे एक वर्षीय बंदोबस्त बना दिया गया।
→ 1781 ई. में प्रांतीय परिषदों को समाप्त कर दिया। राजस्व समिति का पुर्नगठन कर राजस्व मंडल बना दिया। गवर्नर के काउंसिल के एक सदस्य को इनका अध्यक्ष बना दिया (कुल 5 सदस्य)।
→ फरवरी 1785 ई. में वारेन हेस्टिंग्स का कार्यकाल समाप्त तथा मेकफर्सन कार्यवाहक गर्वनर बनाये गये।
→ जुलाई 1786 ई. में नया पद “शिरस्तेदार” सृजित किया गया; जिसका कार्य कानूनगो से राजस्व अभिलेख व सूचनाएँ प्राप्त करना था।
⇒ 1784 ई. में पिट्स इंडिया एक्ट –
→ इसमें पहली बार भूमि के स्थाई बंदोबस्त करने का आदेश दिया गया।
→ जमीदारों के सद्भावना पूर्वक व्यवहार करके उन्हें B.I.C. के समर्थकों के रूप में परिवर्तित किया जाए।
→ सितम्बर 1786 ई. में लार्ड कार्नवालिस गवर्नर जनरल बनकर भारत आया। कलेक्टरों को जिले में पुन: नियुक्त किया गया। इनके कार्य -
लगान वसूलने का कार्य
जिले के दीवानी मामलों के निपटारे का अधिकार
वेतन वृद्धि
अतिरिक्त राजस्व वसूलने (कमीशन)
कलेक्टरों की सहायता हेतु भारतीय “रजिस्ट्रार” नियुक्त किए गए। इन्हें 200 रू तक के मामलों को निपटाने का अधिकार दिया गया।
राजस्व मंडल के अध्यक्ष- जॉन शोर ने स्थाई बंदोबस्त का समर्थन किया था।
लार्ड कॉर्नवालिस ने 1790 ई. में जमीदारों को स्थाईत्व प्रदान करने हेतु “जमीदारों से 10 वर्षीय बंदोबस्त(समझौता) कर लिया (स्थाई बंदोबस्त)” तथा अपनी घोषणा में कहा की इसे स्थाई भी किया जा सकता है।
B.O.C. के अध्यक्ष “डूण्डास” ने 1793 ई. में तत्कालीन ब्रिटिश P.M. “विलियम पिट्” को इस समझौते हेतु राजी कर लिया।
1793 के एक्ट के द्वारा सम्पूर्ण बंगाल में लागू।
स्थाई बंदोबस्त-
22 मार्च, 1793 ई. लागू किया गया। इसका श्रेय लार्ड कॉर्नवालिस को दिया जाता है। तत्कालीन ब्रिटिश P.M. विलियम पिट् थे।
यह सर्वप्रथम विजित क्षेत्रों पर जैसे बंगाल, बिहार व उड़िसा में लागू किया गया।
यह सम्पूर्ण ब्रिटिश भारत के 19 प्रतिशत क्षेत्र पर लागू था।
इसके अन्य नाम- जमीदारी व्यवस्था, इस्तमरारी बंदोबस्त, बिस्वेदारी है।
भूमि का उपयोग लोगों द्वारा – अंग्रेज
जमीदार
किसान
इस व्यवस्था के अन्तर्गत भूमि का स्वामी, जमीदार को बना दिया गया जो कि राजस्व वसूल कर अंग्रेजों को जमा करवाता था।
स्थाई बंदोबस्त के उद्देश्य – B.I.C. हेतु स्वामीभक्त वर्ग तैयार करना, सामन्तवादी व्यवस्था को बढ़ावा देना, एक नवीन दास वर्ग (किसान) का उदय हुआ।
मेटकॉफ का कथन – "हमने एक स्वामीभक्त वर्ग तैयार करके देश की समस्त संपत्ति को नष्ट कर दिया है, दूसरों की संपत्ति उस स्वामीभक्त के अधीन कर दी है।"
स्थायी बंदोबस्त की शर्ते:-
1. सम्पूर्ण भूमि का स्वामी जमीदार होता था। परन्तु राजस्व वसूलने/जमा करवाने में असमर्थ रहने पर उस राजस्व की वसूली हेतु जमींदारी निलाम कर दी जाती थी ।
सूर्यास्त कानून :- 1794 ई. में एक संशोधन द्वारा लागू किया गया इस कानून के अनुसार यदि जमीदार नियत दिन के सूर्यास्त होने तक राजस्व जमा करवाने में असमर्थ रहता है तो इस कानून के द्वारा उसकी जमींदारी निलाम/छीन ली जाती थी।
2. B.I.C. भू-राजस्व के अधिकार से मुक्त-
भू-राजस्व को 20 वर्षों हेतु स्थाई बना दिया गया।
इस दौरान जमीदारों पर किसी अन्य कर वसूली हेतु दबाव नही
राजस्व दर 1765 ई. के राजस्व दर से दुगुना ,
भू-राजस्व दर परिवर्तन न्यायालय की बिना स्वीकृति के नही किया जा सकता था।
3. जमीदारों के न्यायिक अधिकार छीन लिए गए। जमीदारों को आदेश दिया कि वह अपने रैय्यत (किसान) को पट्टे जारी करेंगे, इन पट्टो में रय्यतों व जमीदारों के बीच के सम्बन्धो का उल्लेख किया जायेगा।
रय्यतों का पट्टे में दिए गए अधिकारों के हनन पर न्यायालय जाने का अधिकार परन्तु जमीदारों ने किसानों को पट्टे जारी किए परन्तु न्यायालय जाने के साधन उपलब्ध नहीं थे।
कॉर्नवालिस ने भूमि को जमीदारों की संपत्ति मानते हुए उसे बेचने व स्थानान्तरित करने का अधिकार दे दिया।
किसान भूमि के वास्तविक स्वामी होते हूए भी एक किरायेदार की भाँति हो गये। यही इस व्यवस्था का सबसे बड़ा दोष था।
अंग्रेजों ने इस व्यवस्था में राजस्व लम्बे समय हेतु स्थायी बना दिया था ज्यादा उपज होने व अनाज के मुल्य परिवर्तन के कारण इस व्यवस्था से बाद में नुकसान हुआ। अत: इसे बंगाल के अलावा कहीं पर भी लागू नही किया।
⇒ संथाल विद्रोह :- 1855-56 ई.
यह आदिवासी और जनजातिय लोगों द्वारा किया गया था जो बंगाल की राजमहल पहाड़ियों में पहाड़िया जनजाति “कुदाली” से खेती करते थे, अंग्रेजों ने इन्हें हटा दिया।
संथालों को बसाया हल के माध्यम से खेती करते थे।
संथालों पर अंग्रेजों ने अत्यधिक कर लगाए।
1855-56 ई. में “सिद्धु व कान्हु” के नेतृत्व में संथालों ने विद्रोह कर दिया।
⇒ रैय्यतवाड़ी व्यवस्था – (रैय्यत - किसान)
1792 ई. में कैप्टेन रीड ने सर्वप्रथम मद्रास (तमिलनाडु) के “बारामहल” नामक क्षेत्र में लागू किया था।
1809 ई. में रीड ने इसे कुछ अन्य प्रांतो में लागू किया।
इस व्यवस्था के तहत भूमि का स्वामी किसानों का बना दिया गया, किसान अपना राजस्व सीधे कंपनी को जमा करवा सकता था।
उद्देश्य – किसानों के साथ प्रत्यक्ष रूप से सम्पर्क स्थापित कर अधिक से अधिक राजस्व वसूलना।
1820 ई.में मद्रास का गवर्नर “टॉमस मुनरो” बना। मुनरो ने यह व्यवस्था सम्पूर्ण मद्रास व बम्बई में लागू की।
यह व्यवस्था स्थाई बंदोबस्त वाले क्षेत्रों को छोड़कर 51 प्रतिशत ब्रिटिश भारत में लागू की गई।
नोट – मुंबई में यह व्यस्था पुर्णत: एलफिंसटन द्वारा लागू की गई।
शर्तें-
1. किसान को भूमि का स्वामी बनाया गया।
राजस्व जमा नहीं करवाने पर उसकी भूमि पर राज्य का अधिकार होगा।
Sunset Law (सूर्यास्त कानून) द्वारा भूमि निलाम कर दी जाती थी।
राजस्व: उपज के आधार पर निर्धारित होता था।
उपज का ¾ भाग राजस्व के रूप में लिया जाता था। (तीसरा भाग)
वस्तुत: यह राजस्व 95 प्रतिशत तक वसूला जाता था ,
भूमि की उत्पादन क्षमता की जांच हेतु प्रशासनिक अधिकारी नियुक्त किए,
अधिकारी किसानों द्वारा रिश्वत नहीं दिए जाने पर मनमर्जी से उत्पादन क्षमता दर्शाते थे।
यह सबसे भ्रष्ट व्यवस्था थी।
⇒ महालवाड़ी व्यवस्था –
महाल-गाँव + वाड़ी-बंदोबस्त
इसे B.O.C. सचिव हाल्टमैंकेजी ने 1819 ई. में ब्रिटिश अधिकारीयों को एक पत्र लिखकर (उ.प्र.) भारत में राजस्व व्यवस्था हेतु निम्न सुझाव दिए:-
1. भूमि का सर्वेक्षण किया जाए,
2. भूमि से संबंधित व्यक्तियों के अधिकारों का अभिलेख तैयार किया जाए
3. ग्राम से राजस्व संग्रह की व्यवस्था मुखिया (लम्बरदार) के माध्यम से करवाई जाए।
1822 ई. के रेग्यूलेशन 7 के माध्यम से इस सुझाव को कानूनी रूप दिया गया।
अवध व पंजाब के प्रांतो में मैकेन्जी ने इसे लागू कर दिया गया सम्पूर्ण भाग (मध्यप्रांत) व पंजाब के कुछ हिस्सों को मिलाकर ब्रिटिश भारत के 30 प्रतिशत भू-भाग पर लागू किया गया।
अन्य नाम - अवध में ताल्लुकेदारी, मध्यप्रांत में मालगुजारी
नोट- यह व्यवस्था सर्वप्रथम अवध व आगरा के कुछ क्षेत्रों में लगाई गई।
राजस्व :- भूमि की उत्पादन शक्ति के आधार पर भूमि का वर्गीकरण- उपजाऊ, मध्यम, बंजर
उसका किराया नियत करते थे,
राजस्व 66 प्रतिशत(ज्यादा वसूल)
अत: 1833 ई. में बैटिंक ने इस व्यवस्था में कुछ सुधार किए।
1. अलग-अलग भूमि हेतु औसत किराया नियत।
2. पहली बार राजस्व वसूलने हेतु मानचित्रों व पत्रिकाओं का उपयोग किया गया।
यह व्यवस्था 30 वर्षों हेतु लागू की गई। इसका कार्य “मार्टिन बर्ड” के निर्देशन में किया गया अत: मार्टिन बर्ड को उ.पश्चिम भारत की राजस्व व्यवस्था का जनक कहा जाता है।
1855 ई. में लार्ड डलहौजी राजस्व दर को 50 प्रतिशत कर दिया। प्रारंभिक 3 वर्षों में हीं केवल कानपुर क्षेत्र के 238 किसानों अपनी जमीन गवानी पड़ी। किसानों की भूमि व्यवसायियों व साहुकारों के हाथों में चली गई अत: यह व्यवस्था किसानों हेतू कारगर नहीं रही। 1857 ई. में ताल्लुकेदारों ने विद्रोह कर दिया।
ताल्लुकेदार :- जमीदार वर्ग अत्यधिक धनी होने के कारण शहरों में बस गए राजस्व संग्रह हेतु एक एजेण्ट नियुक्त कर दिया जो इन्हें ही ताल्लुकेदार कहा गया।
नोट :- अवध में इन्होंने किसानों को भड़काने का कार्य किया।
⇒ अनौद्योगिकरण:- (1800 से 1850 के दौरान)
इसका कारण इंग्लैण्ड की औद्योगिक क्रांति थी। अंग्रेज भारत से कच्चामाल प्राप्त कर उसे पुन: मशीनों से तैयार कर भारत में ही भेजते थे, तथा उन्हें भारत में ऊँची दर पर बेचते थे।
इस दौर में भारतीय हस्तशिल्प उद्योग समाप्त हो गये। इस संबंध में बैंटिक का कथन “भारतीय बुनकरों की हड्डियाँ मैदानों में पड़ी है”
जॉन सुलीवान(सॉवलिन) के अनुसार अंग्रेजो की यह प्रणाली “स्पंज” की तरह कार्य करती है जो गंगा घाटी का माल चूसकर लंदन की टेम्स नदी के किनारे “उड़ेल” देती है।
भारतीय लोगों के निर्यात पर B.I.C. 95 प्रतिशत तक टेक्स वसूलती थी जबकि ब्रिटिश व्यापारियों से भारत से माल निर्यात करने पर क्रमश: 2.3,3.5 प्रतिशत ही टेक्स लिया जाता था।
⇒कृषि का वाणिज्यीकरण:-
खाने योग्य फसलों के स्थान पर वाणिज्यक फसलों का उत्पादन, इसे भारतीय किसानों पर थौंपा गया।
जैसे – 1. महाराष्ट्र में कपास उत्पादन के लिए प्रोत्साहन दिया गया।
2. चीन में अफीम की आदतों को बढ़ावा देने हेतु मालवा (M.P.) में अफीम की खेती की गई।
कृषि का वाणिज्यीकरण 1813 से प्रारंभ हुआ। 1853 के बाद ब्रिटिश पूंजीपतियों ने भारत में निवेश करना प्रारंभ किया अत: भारतीय नगदी फसले ही तैयार कराई गई जैसे – कपास, नील, रेशम, शौरा, अफीम, चाय कॉफी, रबर, गन्ना, तंबाकु इत्यादि।
पूर्वी क्षेत्र में नील, चाय, रेशम की खेती तथा गुजरात में तंबाकु की खेती को प्रोत्साहन दिया गया।
वाणिज्यीकरण के कारण- B.I.C. के कर्मचारी भी धनवान बन गए। यह लोग ब्रिटेन में जाकर राजशाही (भव्य जीवन) जीते थे, अत: ब्रिटेन में इन्हे “भारतीय नवाब” कहकर पुकारा जाता था।
धार्मिक कारण:-
⇒धार्मिक निर्योग्यता अधिनियम :-
1813 ई. के एक्ट द्वारा ईसाई मिशनरियों को भारत में ईसाई धर्म के प्रचार का अधिकार मिल गया।
1830 ई. तक ईसाई बनाने का अधिकार मिल गया।
1850 ई. इस एक्ट द्वारा भारतीय व्यक्ति के धर्म परिवर्तन करने पर उसे उसकी पैतृक संपत्ति से वंचित नहीं किया जायेगा।
भारतीयों को ईसाई बनाने हेतु दो पद सृजित किए गए – 1. पादरी लेफ्टीनेण्ट 2. कर्नल मिशनरी
सरकारी स्कूलों में “बाइबिल” को अनिवार्य विषय के रूप में शामिल किया गया।
इन्होंने बेरोजगार, गरीब, अनाथ बालक, विधवाओं इत्यादि को ईसाई बनाने का कार्य किया।
सती प्रथा निषेध – 1829 ई. में शुरूआत, लार्ड विलियम बैटिंक व राजा राम मोहन राय के प्रयासों से रेग्यूलेशन 1829 के भाग (XVII) के द्वारा सती प्रथा को सर्वप्रथम बंगाल में निषेध घोषित किया गया। 1830 ई.में. बम्बई व मद्रास के प्रातों में भी इसे निषेध कर दिया गया।
विधवा पुर्नविवाह अधिनियम – 1856 ये अधिनियम लार्ड डलहौजी व ईश्वर चन्द्र विद्यासागर के प्रयासों से यह अधिनियम लागू किया गया, विधवाओं को पुन:विवाह कर नए जीवन का अधिकार प्रदान किया गया।
⇒ प्रशासनिक कारण:-
भारतीय परम्परागत शिक्षा को समाप्त कर अंग्रेजी शिक्षा को बढ़ावा देने का प्रयास क्रमश:
1. 1813 का चार्टर – भारतीयों की शिक्षा हेतु पहली बार 1 लाख रू व्यय करने का प्रावधान
2. मार्च – 1835 ई. में “मैकाले आयोग” इसके संस्मरण पत्र में कहा गया की भारत में अंग्रेजी शिक्षा को अनिवार्य रूप से लागू किया जाए।
अंग्रेजी शिक्षा व साहित्य के विकास हेतु धन खर्च का प्रावधान किया गया।
1854 ई. लाई डलहौजी के समय – 'चार्ल्स वुड डिस्पेच अधिनियम' पारित किया गया जिसे "भारतीय शिक्षा का मैग्नाकार्ट" कहा जाता है। इसके तहत प्राथमिक स्तर से लेकर विश्व-विद्यालय स्तर तक अंग्रेजी शिक्षा की बात कही गई।
भारतीयों हेतु अलग न्याय व्यवस्था की स्थापना की गई जो भारतीयों को पसन्द नहीं आई।
⇒ तात्कालिक कारण:-
1854 का डाक सेवा अधिनियम लार्ड डलहौजी द्वारा दिया गया। भारतीय सैनिकों के नि:शुल्क डाक सेवा पर रोक लगा दी गई।
1856 सामान्य भर्ती सेवा अधिनियम कैनिंग द्वारा लागू किया गया। इसके तहत भारतीय सैनिकों को समुद्र पार कहीं पर भी युद्ध में भेजा जा सकता था। भारतीय सैनिक वेतन 9रू प्रतिमाह था जबकि ब्रिटिश सैनिक का वेनत 50-60 रू प्रतिमाह था इसमें भारतीय सैनिकों के मन में B.I.C. के विरूद्ध विद्रोह की भावना जागी।
नोट – इससे पूर्व वैल्लूर विद्रोह, 1806 ई. में जातिसूचक, धर्म चिन्ह पर रोक से 1856 ई. में पूर्व में प्रचलित – ”ब्राउनबेस” राइफल के स्थान पर नई “एनफील्ड” नामक राइफले मंगवाई गई।
इन कारतूसों में गाय-सुअर की चर्बी का प्रयोग किया जाता था
सर्वप्रथम दमदम के सैनिकों को कारतूसों के बारे में जानकारी प्राप्त हुई। कारतूसों का प्रयोग करने से मना कर दिया और अंग्रेजी सत्ता के विरूद्ध क्रांति का बिगुल बजा दिया।