कृषि (Agriculture)
* राजस्थान में लगभग 75 प्रतिशत जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्र में निवास करती है।
* यहाँ कुल कामगारों में 62 प्रतिशत कामगार जीवनयापन के लिए कृषि एवं सम्बद्ध क्षेत्र पर निर्भर है।
* कृषि व सम्बद्ध क्षेत्र में फसल, पशुधन, मत्स्य एवं वानिकी सम्मिलित है। भौगोलिक दृष्टि से देश का सबसे बड़ा राज्य (क्षेत्रफलः 3 करोड़ 42 लाख हैक्टेयर) तथा देश के कुल भू-भाग का दसवाँ हिस्सा (10.41%) होने के बावजूद सतही जल संसाधनों की कमी (देश के जन संसाधनों का मात्र 1.16%) होने के कारण यहाँ कृषि मुख्यतः वर्षा पर निर्भर है।
* राज्य के कुल क्षेत्रफल का लगभग 50-60% कृषि के अधीन है, जबकि प्रदेश के कुल कृषि क्षेत्रफल का लगभग 30 प्रतिशत भाग ही सिंचित है।
* वर्षा पर अधिक निर्भरता के कारण राज्य में बोये जाने वाले (कृषि) क्षेत्र तथा कृषि उत्पादन में वर्ष-दर-वर्ष उतार-चढ़ाव होते रहते हैं। इन्हीं कारणों से राजस्थान में कृषि को ‘मानसून का जुआ’ कहा जाता है।
* राज्य का उत्तर-पश्चिमी भाग, जो कुल क्षेत्रफल का लगभग 61% भाग है, मरुस्थलीय एवं अर्द्धमरुस्थलीय क्षेत्र है, यहाँ सिंचाई हेतु केवल वर्षा पर ही निर्भर रहना पड़ता है। यहाँ के कुछ भागों में अब इंदिरा गाँधी नहर से सिंचाई प्रारंभ हुई है।
* राज्य का शेष पूर्वी एवं दक्षिणी भाग जो कुल क्षेत्रफल का लगभग 39% है, अरावली पर्वतमाला के पूर्व में स्थित है तथा अत्यधिक उपजाऊ है, परन्तु भू जल-स्तर के नीचे चले जाने के कारण यहाँ भी कुओं से सिंचाई में असुविधा हो रही है।
* इन सभी विपरीत परिस्थितियों के बावजूद नहरों द्वारा सिंचाई सुविधाओं में वृद्धि के कारण राज्य कृषि क्षेत्र में विकास की उच्च दर बनाए रखते हुए न केवल कई उपजों में आत्म निर्भर हो गया है बल्कि अनाज, दलहन, तिलहन व मसालों के उत्पादन में सरप्लस की श्रेणी में आ गया है।
उद्देश्य के आधार पर कृषि के प्रकार:-
* जीवन निर्वाह कृषि :-
- यह कृषि परंपरागत तरीके से की जाती है। इसका उद्देश्य मात्र उदर-पूर्ति करना होता है।
* यांत्रिक कृषि :-
- यह कृषि विस्तृत क्षेत्र में होती है तथा इसमें यंत्रों का उपयोग सर्वाधिक होता है।
- राजस्थान का सबसे बड़ा यांत्रिक कृषि फार्म सूरतगढ़ (श्रीगंगानगर) में 15 अगस्त, 1956 को रूस की सहायता से स्थापित किया गया था।
- राज्य का दूसरा यांत्रिक कृषि फार्म जैतसर (श्रीगंगानगर) में स्थापित किया गया।
* व्यापारिक कृषि :-
- इसका प्रमुख उद्देश्य नकदी कमाना होता है। इसकी प्रमुख फसलें गन्ना, कपास एवं तंबाकू हैं।
* मिश्रित कृषि :-
- कृषि एवं पशुपालन कार्य को एक साथ करना मिश्रित कृषि कहलाती है।
* समोच्च कृषि :-
- पहाड़ी क्षेत्रों में समस्त कृषि कार्य और फसलों की बुवाई ढाल की विपरीत करना ताकि वर्षा से होने वाली मृदा क्षरण को न्यूनतम किया जा सके।
* स्थानांतरण कृषि :-
- इसे झूमिंग कृषि भी कहते हैं। यह कृषि सर्वाधिक आदिवासी या जनजातीय लोग करते हैं।
- राजस्थान के आदिवासी क्षेत्रों (डूँगरपुर, बाँसवाड़ा, उदयपुर, बाराँ आदि) में यह कृषि की जाती है।
- भीलों द्वारा की गई झूमिंग कृषि दाजिया व चिमाता तथा सहरियाओं द्वारा की गई कृषि वालरा कहलाती है।
- दक्षिण-पूर्वी राजस्थान में इस कृषि को दीपा या बात्रा नाम से जाना जाता है।
- यह कृषि राज्य के दक्षिण-पूर्वी पठारी क्षेत्र में सर्वाधिक होती है।
- यह कृषि जंगलों को साफ करके की जाती है। यहां पर 3-4 फसलों के बाद नए स्थान की तलाश शुरू कर दी जाती है।
* बारानी कृषि :-
- यह ऐसी कृषि पद्धति है जो पूर्णत: वर्षा जल द्वारा की गई सिंचाई पर निर्भर होती है।
- इसमें सिंचाई हेतु किसी भी कृत्रिम साधन का प्रयोग नहीं किया जाता है।
- इसमें बोई जाने वाले फसलें ज्वार, बाजरा, मक्का, तिलहन, कपास आदि पूर्णत: वर्षा जल पर ही निर्भर रहती है।
* रोपण कृषि :-
- एक विशेष प्रकार की खेती जिसमें रबड़, चाय, कहवा आदि बड़े पैमाने पर उगाए जाते हैं।
* रीले क्रोपिंग :-
- एक ही वर्ष में एक ही खेत में चार फसल उगाना।
फसलों के आधार पर कृषि :- यह कृषि का प्रकार बुवाई व फसलों के आधार पर है। प्रमुख रूप से इसे हम तीन भागों में बांट सकते हैं-
* खरीफ की फसल :-
- इसे स्थानीय भाषा में सियालू की फसल भी कहा जाता है।
- इसकी बुवाई जून-जुलाई में तथा फसल पकने व काटने का समय अक्टूबर-नवंबर (दिपावली के आस-पास) में होता है।
- प्रमुख फसलें – चावल, बाजरा, ज्वार, अरहर, मक्का, रागी, गन्ना, मूंगफली, अरण्डी, तिल, सोयाबीन, ग्वार, कपास, मोठ, मूंग
* रबी की फसल :-
- इसे स्थानीय भाषा में उन्यालू की फसल भी कहते हैं।
- इसकी बुवाई अक्टूबर-नवंबर में तथा फसल पकने व काटने का समय मार्च-अप्रैल (होली के आस-पास) में होता है।
- प्रमुख फसलें – गेहूं, जौ, सरसों, तारामीरा, जीरा, ईसबगोल (घोड़ाजीरा), अफीम, अलसी, मैथी, चना आदि।
* जायद की फसल :-
- इसकी बुवाई मार्च-अप्रैल में तथा फसल पकने व काटने का समय जून-जुलाई में होता है।
- प्रमुख फसलें – तरबूज, खरबूज, ककड़ी, सब्जियाँ।
राजस्थान में कृषि जलवायु प्रदेश :
राजस्थान में कुल 10 कृषि जलवायु प्रदेश हैं।
1. अतिशुष्क आंशिक सिंचित क्षेत्र :-
* यह सबसे बड़ा कृषि जलवायु प्रदेश है।
* इस क्षेत्र में बीकानेर, नागोर, जोधपुर, जैसलमरे और चूरू जिले आते हैं।
2. पश्चिमी शुष्क मैदान :-
* इस क्षेत्र में बाड़मरे और जैसलमेर जिला आता है।
3. लूनी बेसिन मैदानी क्षेत्र :-
* इस क्षेत्र में जोधपुर, पाली, बाड़मेर, जालोर जिले और कुछ हिस्सा सिरोही का भी आता है।
4. उपआर्द्र दक्षिणी मैदान :-
* इस क्षेत्र में भीलवाड़ा, उदयपुर, सिरोही, राजसमंद और चित्तौड़गढ़ जिले आते हैं।
5. उत्तरी सिंचित मैदान :-
* इस क्षेत्र में श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ जिला आता है।
6. आंतरिक जल निकासी शुष्क क्षेत्र :-
* इस क्षेत्र में चूरू, झुंझुनूँ, सीकर और नागौर जिले आते हैं।
7. अर्द्ध शुष्क पूर्वी मैदान :-
* इस क्षेत्र में जयपुर, दौसा, टोंक, अजमेर, सवाई माधोपुर और अलवर जिले आते हैं।
8. बाढ़ संभाव्य पूर्वी मैदान :-
* इस क्षेत्र में अलवर, भरतपुर, करौली, सवाई माधोपुर, धौलपुर और दौसा जिले आते हैं।
9. आर्द्र दक्षिण-पूर्वी मैदान :-
* इस क्षेत्र में बूँदी, कोटा, बारां और झालावाड़ जिले आते हैं।
10. आर्द्र दक्षिणी मैदान :-
* यह सबसे छोटा कृषि जलवायु प्रदेश है।
* इस क्षेत्र में उदयपुर, प्रतापगढ़, डूँगरपुर और बाँसवाड़ा जिले आते हैं।
भू-उपयोग :-
* राज्य का कुल प्रतिवेदित भौगोलिक क्षेत्रफल वर्ष 2017-18 में 342.87 लाख हैक्टेयर हे।
* इसमें से 8.04 प्रतिशत क्षेत्रफल (27.56 लाख हैक्टेयर) वानिकी के अन्तर्गत।
* 5.78 प्रतिशत क्षेत्रफल (19.83 लाख हैक्टेयर) कृषि के अतिरिक्त भूमि के अन्तर्गत।
* 6.95 प्रतिशत क्षेत्रफल (23.83 लाख हैक्टेयर) ऊसर तथा कृषि अयोग्य भूमि के अन्तर्गत।
* 4.88 प्रतिशत क्षेत्रफल (16.73 लाख हैक्टेयर) स्थायी चारागाह तथा अन्य गोचर भूमि के अन्तर्गत।
* 0.07 प्रतिशत क्षेत्रफल (0.24 लाख हैक्टेयर) वृक्षों के झुण्ड तथा बाग के अन्तर्गत।
* 11.17 प्रतिशत क्षेत्रफल (38.31 लाख हैक्टेयर) बंजर भूमि के अन्तर्गत, 5.81 प्रतिशत क्षेत्रफल (19.92 लाख हैक्टेयर) अन्य चालू पतड़ भूमि के अंतर्गत एवं 52.22 प्रतिशत (179.03 लाख हैक्टेयर) शुद्ध बोया गया क्षेत्रफल है।
भू-उपयोग सांख्यिकी 2017-18 :-
* कार्यशील भू जोत-कृषि गणना, 2015-16 के अनुसार कुल प्रचालित भूमि जोतों की संख्या 76.55 लाख है, जबकि वर्ष 2010-11 में यह संख्या 68.88 लाख थी, अर्थात भूमि जोतों की संख्या में 11.14 प्रतिशत की वृद्धि हुई।
* सीमान्त, लघु, अर्द्ध मध्यम, मध्यम एवं बड़े आकार की वर्गीकृत जोत, कुल जोतों का क्रमशः 40.12 प्रतिशत, 21.90 प्रतिशत, 18.50 प्रतिशत, 14.79 प्रतिशत एवं 4.69 प्रतिशत है।
* वर्ष 2010-11 की तुलना वर्ष 2015-16 में सीमान्त, लघु, अर्द्ध मध्यम, एवं मध्यम आकार वर्गों की जोतों में वृद्धि हुई है व बड़े आकार वर्ग़ों की जोतों की कमी हुई है।
* बड़े आकार की भू-जोतों की संख्या में 11.41 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई।
* वर्ष 2010-11 में कुल जोतों का क्षेत्रफल 211.36 लाख हैक्टेयर था, जो वर्ष 2015-16 में घटकर 208.73 लाख हैक्टेयर हो गया, अर्थात् जोतों के कुल क्षेत्रफल में 1.24 प्रतिशत की कमी दर्ज हुई है।
* वर्ष 2010-11 की तुलना में वर्ष 2015-16 में क्षेत्रफल की दृष्टि से सीमांत, लघु व अर्द्ध मध्यम आकार की जोतों के क्षेत्रफल में 19.79 प्रतिशत, 10.50 प्रतिशत व 5.67 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।
* बड़े आकार व मध्यम आकार की जोतों के कुल क्षेत्रफल में 13.20 प्रतिशत एवं 0.27 प्रतिशत की कमी दर्ज हुई है।
* कृषि गणना 2015-16 के अनुसार राज्य में भूमि जोतों का औसत आकार 2.73 हैक्टेयर रहा है, जो वर्ष 2010-11 में 3.07 हैक्टेयर था, जो भूमि जोतों के औसत आकार में 11.07 प्रतिशत की कमी दर्शाता है।
* राज्य में कृषि गणना 2015-16 के अनुसार कुल महिला प्रचालित भूमि जोतों की संख्या 7.75 लाख है, जबकि वर्ष 2010-11 में यह संख्या 5.46 लाख थी, अर्थात् भूमि जोतों की संख्या में 41.94 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।
* सीमांत, लघु, अर्द्ध मध्यम, मध्यम एवं बड़े आकार की वर्गीकृत महिला जोतधारकों का कुल जोतों से 49.55 प्रतिशत, 20.77 प्रतिशत, 14.97 प्रतिशत, 11.74 प्रतिशत एवं 2.97 प्रतिशत है।
* राज्य में वर्ष 2010-11 में महिला भू-जोतों का क्षेत्रफल 13.30 लाख हैक्टेयर था, जो वर्ष 2015-16 में बढ़कर 16.55 लाख हैक्टेयर हो गया, अर्थात् महिला भूमि जोतों के कुल क्षेत्रफल में 24.44 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है।
कृषि की विशेषताएँ :-
* कृषि प्राथमिक रूप से वर्षा पर निर्भर है एवं सिंचाई सुविधाओं की कमी के कारण प्रति हैक्टेयर उत्पादकता कम है।
* राज्य में सर्वाधिक सिंचाई कुँओं व नलकूपों से होती है।
* 90 प्रतिशत वर्षा मानसून सत्र में होती है जिसका क्षेत्रीय वितरण भी अत्यधिक असमान है एवं मानसून की अवधि भी कम है क्योंकि मानसून देर से आता है एवं जल्दी चला जाता है।
* राज्य में कृषि विकास के समक्ष सबसे बड़ी बाधा वर्षा के व्यापक अंतर को दर्शाता है। राजस्थान में चंबल और माही के अलावा कोई भी अन्य बारहमासी नदी नहीं हैं।
* राज्य में भू-जल स्थिति बहुत विषम है। इसकी स्थिति पिछले दो दशकों में बहुत तेजी से बिगड़ी है। राज्य के 249 खंडों में से अंधिकांश ‘डार्क जोन’ में हैं तथा केवल 40 खंड सुरक्षित श्रेणी में हैं।
* सिंचाई सुविधाओं की कमी के कारण अधिकांश क्षेत्रों में वर्ष में केवल एक ही फसल ली जाती है।
* राजस्थान में भारत के कुल कृषि क्षेत्रफल का लगभग 11 प्रतिशत है परन्तु सतही जल की उपलब्धता देश की मात्र 1.16 प्रतिशत ही है।
* भारत में 77.75 लाख हैक्टेयर क्षेत्र में सूक्ष्म सिंचाई की जाती है। राजस्थान 16.85 लाख हैक्टेयर क्षेत्र में सूक्ष्म सिंचाई के साथ देश में प्रथम स्थान पर हैं। महाराष्ट्र(12.71 लाख) द्वितीय व आंध्रप्रदेश (11.63 लाख) सूक्ष्म सिंचाई की दृष्टि से तृतीय स्थान पर है।
* राज्य के कुल कृषि क्षेत्रफल का 2/3 भाग (लगभग 65 प्रतिशत) खरीफ के मौसम में बोया जाता है तथा शेष 1/3 भाग (लगभग 35%) रबी बोया जाता है।
* राजस्थान में तिलहन फसलों में सर्वाधिक उत्पादन राई व सरसों का, अनाज में गेहूँ का एवं दालों में सर्वाधिक चने का होता है जबकि दालों में सर्वाधिक कृषि क्षेत्रफल मोठ का है तथा तिलहनों में सर्वाधिक क्षेत्र पर राई व सरसों बोई जाती है।
* अस्थिर मौसम की स्थिति होने के कारण किसानों को कृषि हेतु वर्षा और भूमिगत जल दोनों पर निर्भर रहना पड़ता है।
उद्यानिकी :-
* राजस्थान में उद्यानिकी विकास की विपुल संभावनाएं हैं।
* यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था में कृषि प्रसंस्करण एवं अन्य गौण गतिविधियों के माध्यम से ग्रामीण लोगों को अतिरिक्त रोजगार के अवसर उपलब्ध कराती है।
* राज्य योजनान्तर्गत 7 हैक्टेयर क्षेत्र में फल बगीचों की स्थापना, 617 हैक्टेयर क्षेत्र में पौध संरक्षण उपाय एवं सब्जी के 2,072 प्रदर्शन लगाए गए हैं।
राजस्थान में बागवानी फसलों के प्रमुख उत्पादक जिले:-
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क्र.सं. |
फसल |
प्रमुख उत्पादक जिले |
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1. |
आम |
उदयपुर, चित्तौड़गढ़, बाँसवाड़ा |
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2. |
संतरा |
झालावाड़, भीलवाड़ा, कोटा |
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3. |
अमरूद |
सवाई माधोपुर, बूँदी, चित्तौड़गढ़ |
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4. |
आँवला |
जयपुर, चित्तौड़गढ़, भीलवाड़ा |
|
5. |
केला |
चित्तौड़गढ़, उदयपुर, टोंक |
|
6. |
माल्टा |
श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़, जयपुर |
|
7. |
किन्नू |
श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़, झुंझुनूँ |
|
8. |
नींबू |
भरतपुर, चित्तौड़गढ़, दौसा |
|
9. |
पपीता |
चित्तौड़गढ़, सिरोही, दौसा |
|
10. |
नाशपाती |
झालावाड़, सवाई माधोपुर |
|
11. |
अंगूर |
राजसमंद, बाँसवाड़ा |
|
12. |
अनार |
बाड़मेर, जालोर, चित्तौड़गढ़ |
|
13. |
खजूर |
बीकानेर, बाड़मेर, जैसलमेर |
|
14. |
बेर |
जयपुर, चित्तौड़गढ़, श्रीगंगानगर |
|
15. |
जामुन |
अजमेर, कोटा, बाराँ |
|
16. |
मौसमी |
श्रीगंगानगर, चित्तौड़गढ़, झालावाड़ |
|
17. |
सीताफल |
चित्तौड़गढ़, उदयपुर, झालावाड़ |
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18. |
शहतूत |
जयपुर, दौसा, कोटा |
|
19. |
मेंहदी |
सोजत (पाली), गिलूंड (राजसमंद) |
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20. |
चीकू |
कोटा, जयपुर, बाँसवाड़ा |
|
21. |
फालसा |
बाड़मेर, धौलपुर, अजमेर |
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22. |
सर्वाधिक फलोत्पादन |
झालावाड़, श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़ |
राज्य में प्रमुख फसलों की स्थिति:-
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क्र.सं. |
फसल |
सर्वाधिक उत्पादन वाला जिला |
सर्वाधिक क्षेत्र वाला जिला |
अन्य प्रमुख उत्पादक जिले |
जलवायु व मिट्टी |
विशेष विवरण |
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9. |
मूँग |
नागौर, |
जयपुर, जोधपुर, जालोर, अजमेर, टोंक, पाली |
शुष्क व गर्म जलवायु। वर्षा-25 से 40 सेमी. वार्षिक। मिट्टी-दोमट। |
- |
- |
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10. |
उड़द |
बूँदी/भीलवाड़ा |
भीलवाड़ा |
झालावाड़, बाँसवाड़ा, टोंक, बूँदी, कोटा |
उष्ण कटिबंधीय आर्द्र व गर्म जलवायु। वर्षा-40 से 60 सेमी. वार्षिक। मिट्टी-दोमट व चिकनी दोमट। |
- |
|
11. |
चाँवला |
सीकर/झुंझुनूँ |
सीकर |
झुंझुनूँ, नागौर, जयपुर, बूँदी |
- |
- |
|
12. |
मसूर |
बूँदी |
बाराँ |
झालावाड़, भरतपुर, भीलवाड़ा, चित्तौड़गढ़ |
- |
- |
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कुल दलहन |
जयपुर |
चूरू |
झुंझुनूँ, सीकर, बीकानेर |
- |
देश में उत्पादन की दृष्टि से राज्य का दूसरा स्थान है यहाँ देश की 11.34% दाले उत्पादित होती है। सर्वाधिक दलहन उत्पादन मध्य प्रदेश में होता है। सर्वाधिक कृषि क्षेत्र (दलहन) महाराष्ट्र में हैं। |
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कूल खाद्यान्न |
अलवर |
बाड़मेर |
अलवर, श्रीगंगानगर, सीकर |
- |
सर्वाधिक उत्पादन उत्तरप्रदेश व पंजाब में। राजस्थान का चतुर्थ स्थान। |
|
13. |
राई व सरसों |
अलवर |
जयपुर, श्रीगंगानगर |
भरतपुर, बाराँ, कोटा, टोंक, सवाई माधोपुर |
शुष्क व ठण्डी जलवायु। मिट्टी-बलुई व दोमट। |
देश के कुल उत्पादन का एक तिहाई से अधिक अकेले राजस्थान में। राजस्थान का प्रथम स्थान। विश्व में सरसों उत्पादन में चीन के बाद भारत का दूसरा स्थान है। |
|
14. |
मूँगफली |
बीकानेर |
बीकानेर |
सीकर, चूरू, जोधपुर, चित्तौड़गढ़ |
उष्ण कटिबंधीय जलवायु। तापमान- 250-300 से.ग्रे.। वर्षा-50 होती है। 100 सेमी. एवं मिट्टी-बलुई व दोमट। |
भारत में संसार की सर्वाधिक मूँगफली उत्पादित देश में सर्वाधिक उत्पादन गुजरात व आन्ध्रप्रदेश में होता है। राजस्थान का दूसरा स्थान। |
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15. |
अरण्डी |
जालोर |
जालोर |
पाली, बाड़मेर, सिरोही |
- |
देश में उत्पादन में राज्य का तीसरा स्थान। प्रथम-गुजरात, भारत का विश्व में ब्राजील के बाद दूसरा स्थान। |
|
16. |
तारामीरा |
जयपुर |
जयपुर |
बीकानेर, भरतपुर, टोंक,नागौर, भीलवाड़ा |
- |
- |
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17. |
तिल |
पाली |
पाली |
भीलवाड़ा, जोधपुर, सिरोही, सवाई माधोपुर, टोंक, हनुमानगढ़, करौली |
उष्ण व समोष्ण जलवायु। तापमान 250-270 से.ग्रे., वर्षा- 30-100 सेमी.। मिट्टी- हल्की बलुई दोमट। |
राजस्थान का सम्पूर्ण भारत में तिल के कृषित क्षेत्रफल की दृष्टि से दूसरा स्थान है एवं उत्पादन में पाँचवाँ स्थान है। |
राज्य की प्रमुख व्यापारिक फसलों की स्थिति:-
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राजस्थान के कृषि विकास हेतु प्रयासरत संस्थाएँ:-
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क्र.सं. |
नाम |
स्थापना वर्ष उद्देश्य व अन्य विवरण |
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1. केन्द्रीय कृषि फार्म, सूरतगढ़ (श्रीगंगानगर) |
अगस्त, 1956 |
एशिया का सबसे बड़ा फार्म। सोवियत रूस के सहयोग से स्थापित किया गया। |
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2. केन्द्रीय कृषि फार्म, जैतसर (श्रीगंगानगर) |
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कनाडा देश के सहयोग से स्थापित किया गया। |
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3. काजरी (Central Arid Zone Research Institute-CAZARI), जोधपुर |
1959 |
काजरी की स्थाना वर्ष 1959 में मरुस्थल वनीकरण शोध केन्द्र का पुनर्गठन कर भारत सरकार द्वारा की गई। वर्ष 1966 में इसे ICAR के अधीन किया गया। काजरी का मुख्य उद्देश्य शुष्क एवं अर्द्धशुष्क क्षेत्रों में वन सम्पदा व कृषि का विकास करने हेतु पेड़-पौधों, मिट्टी, हल व भूमि के संबंध में व्यापक सर्वेक्षण, शोध एवं अध्ययन करना है। काजरी के क्षेत्रीय अनुसंधान केन्द्र- जैसलमेर, बीकानेर, पाली व भुज (गुजरात) में है, कृषि विज्ञान केन्द्र पाली व जोधपुर में तथा क्षेत्रीय प्रबंध व मृदा संरक्षण क्षेत्र-चाँदन गाँव (जैसलमेर) व बीछवाल (बीकानेर) में स्थापित है। |
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4. राजस्थान राज्य कृषि विपणन बोर्ड (Rajasthan State Agriculture Marketing Board) |
06-06-1974 |
किसानों को कृषि का उचित मूल्य दिलाने के उद्देश्य से कृषि उपज मंडियों की स्थापना, मंडी प्रांगणों व ग्रामीण सम्पर्क सड़कों का निर्माण व रखरखाव करना। |
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5. बेर अनुसंधान केन्द्र एवं खजूर अनुसंधान केन्द्र, बीकानेर |
1958 |
‘हिलावी’ खजूर की किस्म और ‘मेंजुल’ किस्म का छुआरा का उत्पादन। |
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6. राजस्थान राज्य बीज संस्था एवं जैविक उत्पादन प्रमापीकरण |
28-03-1978 |
विश्व बैंक की राष्ट्रीय बीज परियोजना के द्वितीय चरण में उत्तम गुणवत्ता वाले बीजों के उत्पादन, विधायन एवं विपणन करने के उद्देश्य से 28 मार्च, 1978 को राजस्थान राज्य बीज निगम के नाम से गठित। अब इसका नाम राजस्थान राज्य बीज एवं जैविक उत्पादन प्रमापीकरण संस्था कर दिया गया है। |
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7. AFRI (Aried Forest Research Institute), जोधपुर |
1988 |
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8. राष्ट्रीय बीजीय मसाला अनुसंधान केन्द्र |
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तबीजी (अजमेर) में स्थापित। |
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9. राष्ट्रीय सरसों अनुसंधान संस्थान, सेवर, भरतपुर |
1993 |
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10. केन्द्रीय कृषि अनुसंधान केन्द्र, दुर्गापुरा (जयपुर) |
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11. राजस्थान उद्यानिकी एवं नर्सरी विकास समिति (राजहंस) |
2006-07 |
राज्य में उद्यानिकी विकास को बढ़ावा देने हेतु उत्तम गुणवत्ता के पौधे के उत्पादन कार्य व आपूर्ति हेतु राज्य सरकार द्वारा गठित। |
कृषि से संबंधित विभिन्न क्रांतियाँ:-
1. हरित क्रांति:- वर्ष 1966-67 से कृषि उत्पादन में तीव्र वृद्धि लाने हेतु अधिक उपज देने वाले बीजों, रासायनिक खादों, कीटनाशकों व नई कृषि तकनीकों के प्रयोग को बढ़ावा दिया गया, इसे ही हरित क्रांति कहते हैं। हरित क्रांति के जनक नोरमन बोरलॉग है तथा भारत में इसका श्रेय ‘श्री एम.एस. स्वामीनाथन’ को जाता है।
2. पीली क्रांति:- इस क्रांति का संबंध तिलहन उत्पादन से है।
3. भूरी क्रांति:- रासायनिक उर्वरक।
4. इंद्रधनुषी क्रांति:- कृषि व संबद्ध क्षेत्रों के विकास हेतु अपनाए गए उपाय।
5. श्वेत क्रांति:- दुग्ध उत्पादन (1970)। श्वेत क्रांति के जनक डॉ. वर्गीज कुरीयन थे।
6. नीली क्रांति:- मछली उत्पादन।
7. लाल क्रांति:- इस क्रांति का संबंध टमाटर व माँस उत्पादन से है।
8. रजत क्रांति:- अण्डा उत्पादन।
9. गोल क्रांति:- आलू उत्पादन।
10. सुनहरी क्रांति:- बागवानी।
11. परभनी क्रांति:- भिण्डी उत्पादन।
12. कृष्णा क्रांति:- बायोडीजल उत्पादन।
13. गुलाबी क्रांति:- झींगा मछली उत्पादन।
14. बादामी क्रांति:- मसाल उत्पादन।
15. धूसर क्रांति:- सीमेंट उत्पादन।
16. सेफ्रॉन क्रांति:- केसर उत्पादन।
17. मूक क्रांति:- मोटे अनाज उत्पादन।
18. सदाबहार क्रांति:- इस क्रांति का संबंध जैव तकनीकी द्वारा कृषि कार्य से है।
19. हरित सोना क्रांति:- बाँस उत्पादन।
20. खाकी क्रांति:- चमड़ा उत्पादन।
कृषि विज्ञान की शाखाएँ:-
* वनस्पति विज्ञान:- पौधों के जीवन से संबंधित प्रत्येक विषय का अध्ययन।
* एग्रोस्टोलॉजी:- भूमि व फसलों के प्रबंधन का अध्ययन।
* एग्रोस्टोलॉजी:- घासों के अध्ययन का विज्ञान।
* एपीकल्चर:- व्यापारिक स्तर पर शहद उत्पादन हेतु किया जाने वाला मधुमक्खी या मौन पालन कार्य।
* आर्बोरीकल्चर:- विशेष प्रकार के वृक्षों तथा झाड़ियों की कृषि जिसमें उनका संरक्षण और संवर्द्धन भी शामिल है।
* उद्यान विज्ञान:- फल-फूल, सब्जियों सजावटी पौधों आदि के उगाने एवं प्रबंधन का अध्ययन।
* हाइड्रोपोनिक्स:- पौधों की उत्पत्ति एवं उनके विकास के अध्यन का विज्ञान।
* पैलियोबॉटनी:- पौधों के जीवाश्मों के अध्ययन का विज्ञान।
* फाइटोजेनी:- पौधों की उत्पत्ति एवं उनके विकास के अध्ययन का विज्ञान।
* पॉमोलॉजी:- इसके अंतर्गत फूलों के उत्पादन, वृद्धि, सुरक्षा एवं उनकी नस्ल सुधार का अध्ययन किया जाता है।
* सेरीकल्चर:- व्यापारिक स्तर पर की जाने वाली रेशम पालन की क्रिया जिसमें शहतूत आदि की कृषि भी सम्मिलित होती है।
* फ्लोरीकल्चर:- व्यापारिक स्तर पर फूलों की कृषि।
* मेरीकल्चर:- व्यापारिक उद्देश्यों की पूर्ति हेतु समुद्री जीवों उत्पादन की क्रिया।
* ओलेरीकल्चर:- जमीन पर फैलने वाली विभिन्न प्रकार की सब्जियों की कृषि।
* पीसकल्चर:- व्यापारिक स्तर पर की जाने वाली मछली पालन की क्रिया।
* सिल्वीकल्चर:- वनों के संरक्षण एवं संवर्द्धन से संबंधित विज्ञान।
* विटीकल्चर:- व्यापारिक स्तर पर की जाने वाली अंगूर उत्पादन (अंगूर की खेती) की क्रिया।
* वेजी कल्चर:- दक्षिण पूर्व एशिया में आदि मानव द्वारा सर्वप्रथम की गई वृक्षों की आदिम कृषि।
* ओलिविकल्चर:- व्यापारिक स्तर पर जैतून की कृषि।
* वर्मीकल्चर:- व्यापारिक स्तर पर की जाने वाली केंचुआ पालन की क्रिया।
कृषि विपणन बोर्ड :-
* राज्य में एक व्यापक नीति ‘राजस्थान कृषि प्रसंस्करण’, ‘कृषि व्यवसाय’ एवं ‘कृषि निर्यात प्रोत्साहन नीति 2019’ दिनांक 17 दिसंबर, 2019 से आरंभ की गई।
* इस योजना के अंतर्गत समूह आधारित कार्य प्रणाली के द्वारा फसल के बाद की हानियों को कम करना।
* कृषकों एवं उनके संगठनों की सहभागिता बढ़ाना।
* कृषकों एवं उनेकं संगठनों की आपूर्ति एवं मूल्य संवर्द्धन श्रृंखल में प्रत्यक्ष भागीदारी बढ़ाते हुए उनकी आय में वृद्धि के उपाय करना।
* राज्य की उत्पादन बहुलता वाली विशिष्ट फसलों जैसे – जीरा, धनिया, सौंफ, अजवाइन, ग्वार, ईसबगोल, दलहन, तिलहन, मेहंदी, किन्नू, सेन्ना अनार एवं ताजा सब्जियों आदि के मूल्य संवर्द्धन तथा निर्यात को प्रोत्साहन देना।
* खाद्य प्रसंस्करण के क्षेत्र में प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों के द्वारा कौशल विकास कर रोजगार का सृजन करना।
कृषक कल्याण कोष का गठन :-
* किसानों के लिए व्यापार व खेती करने में आसानी की तर्ज पर प्रमुख पहल करते हुए ₹1,000 करोड़ की राशि से दिनांक 16 दिसंबर, 2019 को ‘कृषक कल्याण कोष’ ” का गठन किया गया।
* इस कोष को किसानों को उनके उत्पादों का यथोचित मूल्य दिलाने हेतु काम में लिया जाएगा।
* इस कोष के अन्तर्गत मंडी यार्डों, उप यार्डों एवं सड़क निर्माण का कार्य किया गया है।
विशिष्ट कृषि जिन्सों की मण्डियों की स्थापना:- ‘उत्पादन वहाँ विपणन’ के सिद्धान्त को दृष्टिगत रखते हुए राज्य में पहली बार निम्नलिखित विशिष्ट मण्डियाँ स्थापित की गई हैं-
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क्र.सं. |
नाम मुख्य/गौण मण्डी |
जिन्स का नाम |
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1. |
मेड़ता सिटी (नागौर) |
जीरा |
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2. |
भवानी मण्डी (झालावाड़) |
सन्तरा |
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3. |
अलवर |
प्याज |
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4. |
सवाई माधोपुर |
अमरूद |
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5. |
अजमेर |
फूल |
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6. |
चौमूँ (जयपुर) |
आँवला |
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7. |
बस्सी-जयपुर फ.स. |
टमाटर |
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8. |
सोजत सिटी-सोजत रोड़ (पाली) |
सोनामुखी |
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9. |
भीनमाल (जालोर) |
ईसबगोल |
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10. |
बीकानेर (अनाज मंडी) |
मूँगफली |
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11. |
कपासन |
अजवादन |
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12. |
रसीदपुरा |
प्याज |
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13. |
जोधपुर |
जीरा |
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14. |
टोंक |
मिर्च |
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15. |
श्रीगंगानगर |
किन्नू, माल्टा |
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16. |
रामगंज मण्डी (कोटा) |
धनिया |
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17. |
पुष्कर-अजमेर फ.स. |
फूल |
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18. |
शाहपुरा-जयपुर फ.स. |
टिण्डा |
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19. |
छीपाबड़ौद-छबड़ा (बाराँ) |
लहसुन |
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20. |
सोजत सिटी-सोजत रोड़ (पाली) |
मेहन्दी |
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21. |
झालरापाटन (झालावाड़) |
अश्वगंधा |
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22. |
बसेड़ी (जयपुर) |
मटर |
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23. |
मंदगज (किशनगढ़) |
दलहन |
कृषि एवं उद्यानिकी हेतु शोध एवं प्रशिक्षण संस्थान:-
1. सेंटर ऑफ ऐक्सीलेंस फॉर सिट्रस, प्रजनन फलोद्यान, नान्ता (कोटा)।
2. सेंटर ऑफ ऐक्सीलेंस फॉर अनार, ढिढोंल फार्म, बस्सी (जयपुर)।
3. सेंटर ऑफ ऐक्सीलेंस फॉर खजूर, सगरा-भोजका फार्म (जैसलमेर)।
4. सेंटर ऑफ ऐक्सीलेंस फॉर जैतून, बस्सी फार्म (जयपुर)।
5. अंतर्राष्ट्रीय उद्यानिकी नवाचार एवं प्रशिक्षण केन्द्र- जयपुर।
6. हाइटेक एग्रो हार्टी रिसर्च एंड डेमोन्ट्रेशन सेंटर- बस्सी (जयपुर)।
7. सेंटर ऑफ ऐक्सीलेंस फॉर संतरे (झालावाड़)।
8. सेंटर ऑफ ऐक्सीलेंस फॉर अमरूद, देवड़ावास (टोंक)।
9. सेंटर ऑफ ऐक्सीलेंस फॉर आम, खेमरी (धौलपुर)।
10. सब्जी फसलों का उत्कृष्टता केन्द्र – बूँदी।
11. सीताफल उत्कृष्टता केन्द्र – चित्तौड़गढ़।
12. फूलों का उत्कृष्टता केन्द्र – सवाई माधोपुर।
13. औषधीय फसलों का उत्कृष्टता केन्द्र, मावली (उदयपुर)।
कृषि विश्वविद्यालय :-
* स्वामी केशवानन्द कृषि विश्वविद्यालय बीकानेर में स्थित है। इसकी स्थापना वर्ष 1962 में की गई। वर्ष 1987 में इसे बीकानेर स्थानान्तरित किया गया। 2009 में इसका नामकरण स्वामी केशवानन्द किया गया।
* महाराणा तकनीकी एवं कृषि विश्वविद्यालय उदयपुर में स्थित है। इसकी स्थापना 1999 में की गई।
* नरेंद्र कृषि विश्वविद्यालय जोबनेर (जयपुर) में स्थित है। इसकी स्थापना 2013 में की गई।
* जोधपुर कृषि विश्वविद्यालय जोधपुर में स्थित है। इसकी स्थापना 2013 में की गई।
* कोटा कृषि विश्वविद्यालय कोटा में स्थित है। इसकी स्थापना 2013 में की गई।
कृषि विशिष्ट तथ्य:-
1. बाणियाँ-कपास को राजथान में ग्रामीण भाषा में बाणियाँ कहते हैं।
2. कांगणी-कांगणी दक्षिणी राजस्थान के गरीब व आदिवासी बाहुल्य शुष्क क्षेत्रों की फसल है। कांगणी सूखे की स्थिति में पशुओं के लिए चारा प्रदान करती है।
3. चैती (दमिश्क) गुलाब-खमनौर (राजसमंद) एवं नाथद्वारा में इसकी खेती होती है। यह सर्वश्रेष्ठ किस्म का गुलाब है। यह किंवदन्ती है कि मेवाड़ के महाराणा रतनसिंह के शासनकाल में इसे मुगलों से मँगाकर यहां लाया गया है।
4. लीलोण-रेगिस्तानी क्षेत्रों (विशेषकर जैसलमेर) में पाई जाने वाली बहुपयोगी सेवण घास का स्थानीय नाम।
5. घोड़ा जीरा-पश्चिमी राजस्थान (जालौर-बाड़मेर के क्षेत्र) में बहुतायत से उत्पादित ईसबगोल का स्थानीय नाम।
6. पादप क्लीनिक-राज्य सरकार ने राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय में मंडोर स्थित कृषि अनुसंधान केन्द्र में राज्य के पहले पादप क्लीनिक को खोलने की मंजूरी दी है। राज्य में राष्ट्रीय बागवानी मिशन के तहत एक करोड़ रुपये की लागत से पाँच स्थानों पर पादप क्लीनिक खोलना प्रस्तावित है।
7. राजस्थान में कृषि जलवायु जोनों की संख्या-10 है। इनमें तीन नये जोन जालोर, श्री गंगानगर, सीकर है।
8. राजस्थान में ICAR (भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद्) द्वारा नौ कृषि विज्ञान केन्द्र खोले जाने प्रस्तावित है।
9. राजस्थान में संविदा खेती पहले चरण में केवल पांच जिंसों (फल, फूल, सब्जी, Medicinal Plant एवं सुगन्धित पौधों) के लिए लागू की गई है।
10. राजस्थान में फूल मंडी पुष्कर में है। जबकि पुष्प पार्क (फ्लोरिकल्चर कॉम्प्लेक्स) खुशखेड़ा, भिवाड़ी, अलवर में है।
11. सोयाबीन - तिलहनी और दलहनी गुणों से युक्त फसल है।
12. होहोबा (जोजोबा) - पीला सोना नाम से प्रसिद्ध, का वानस्पतिक नाम Simmondesia Chinensis है। उत्पत्ति स्थान सोनारन मरूस्थल, मैक्सिको। जबकि भारत में यह इजरायल के सहयोग से सबसे पहले काजरी द्वारा बोया गया। इसकी खेती को राजस्थान में बढ़ावा देने के लिए 1996-97 में एक प्रोजेक्ट एजोर्प (Association of the Rajasthan Zozoba Plantation & Research Project) द्वारा इजरायल की तकनीकी मदद से ढूंड (जयपुर) में 5.45 हैक्टेयर क्षेत्र एवं फतेहपुर (सीकर) 70 हैक्टेयर क्षेत्र में जोजोबा फार्म स्थापित किये गये हैं।
13. अफीम को काला सोना कहते हैं। इसका उत्पादन सर्वाधिक मध्यप्रदेश में होता है। राजस्थान में चित्तौड़गढ़, प्रतापगढ़, कोटा, झालावाड़ में होता है।
14. देश का 50% धनिया, 60% जीरा, 47% मेथी, 33% बाजरा, 29% जौ, 40% मोठ, 7% दलहन, 9% गेहूँ, 8.4% मक्का का उत्पादन राजस्थान में होता है।
कृषि संबंधित योजनाएँ:-
राष्ट्रीय बागवानी मिशन (एन.एच.एम.) :-
- राज्य के चयनित 24 जिले क्रमश: जयपुर, अजमेर, अलवर, चित्तौड़गढ़, कोटा, बाराँ, झालावाड़, जोधपुर, पाली, जालोर, बाड़मेर, नागौर, बाँसवाड़ा, टोंक, करौली, सवाई माधोपुर, उदयपुर, डूँगरपुर, भीलवाड़ा, बूँदी, झुंझुनूँ, सिरोही, जैसलमेर एवं श्रीगंगानगर में विभिन्न उद्यानिकी फसलों यथा – फल, मसाला एवं फलों के क्षेत्रफल, उत्पादन एवं उत्पादकता में वृद्धि की गई है।
- इस मिशन के अंतर्गत 3,155 हैक्टेयर में फलों के बगीचे स्थापित किए गए हैं।
प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना – सूक्ष्म सिंचाई
(पी.एम.के.एस.वाई. – एम.आई.) :-
- राज्य में जल एक सीमित एवं बहुमूल्य संसाधन है। इस दृष्टि से फसल उत्पादकता बढ़ाने एवं पानी को बचाने के लिए लघु सिंचाई पद्धति में ड्रिप एवं फव्वारा सिंचाई पद्धति, प्रभावी जल प्रबंधन की व्यवस्था है।
- इसमें सभी श्रेणी के कृषकों के लिए केंद्र एवं राज्य सरकार का अनुपात 60:40 है।
- राज्य का दिसंबर 2019 तक 11,190 हैक्टेयर क्षेत्र ड्रिप, मिनी फव्वारा संयंत्रों एवं 25,612 हैक्टेयर क्षेत्र फव्वारा सिंचाई के अंतर्गत आता है।
राष्ट्रीय कृष विकास योजना (आर.के.वी.वाई.) :-
- इस योजना के अंतर्गत खजूर की खेती, राष्ट्रीय उद्यानिकी मिशन से वंचित जिलों में उद्यानिकी विकास कार्यक्रम, शहरी क्षेत्रों में वेजिटेबल क्लस्टर, झालावाड़, धौलपुर, टोंक, बूँदी, चित्तौड़गढ़ व सवाई माधोपुर में उत्कृष्टता केंद्र की स्थापना।
- बस्सी (जयपुर) में अनार व नान्ता (कोटा) खट्टे फलों के उन्नत उत्पादन केंद्रों का सुदृढ़ीकरण, संरक्षित खेती का विकास आदि।
- राज्य के उद्यानिकी विभाग की स्थापना के बाद बागावानी फसलों के क्षेत्रफल, उत्पादन और उत्पादकता में वृद्धि हुई है।
कृषि विस्तार हेतु योजनाएँ एवं कार्यक्रम:-
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (एन.एफ.एस.एम.):-
• केन्द्रीय सरकार द्वारा केन्द्र प्रवर्तित योजना के रुप में वर्ष 2007-08 से राज्य में गेहूं एवं दलहन पर राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन प्रारम्भ किया गया था।
• भारत सरकार ने वर्ष 2015-16 के दौरान वित्त पोषण पैटर्न में परिवर्तन कर केन्द्रीय एवं राज्य के अंश का अनुपात 60:40 कर दिया है।
• वर्ष 2015-16 में गेहूं एवं दलहन पर राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (एन.एफ.एस.एम.) के अन्तर्गत प्रमाणित बीजों का वितरण, उन्नत उत्पादन तकनीक का प्रदर्शन, समेकित पोषण प्रबन्धन (आई.एन.एम.), जैविक खाद, सूक्ष्म तत्वों, जिप्सम, समन्वित कीट प्रबन्धन (आई.पी.एम.), कृषि यंत्रों, फव्वारा, पम्प सैट, सिंचाई जल हेतु पाइप लाईन, मोबाईल रेनगन एवं फसल तंत्र आधारित प्रशिक्षण आदि महत्वपूर्ण कार्यक्रम हैं।
* राज्य में गेहूँ के लिए 14 जिलों-बाँसवाड़ा, भीलवाड़ा, बीकानेर, जयपुर, झुंझुनूँ, जोधपुर, करौली, नागौर, पाली, प्रतापगढ़, सवाई माधोपुर, सीकर, टोंक एवं उदयपुर में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन को लागू किया गया था।
* राज्य में मोटा अनाज मक्का के लिए पांच जिलों- बाँसवाड़ा, भीलवाड़ा, चित्तौड़गढ़, डूँगरपुर तथा उदयपुर में एन.एफ.एस.एम. क्रियान्वित किया जा रहा है।
* मोटा अनाज जौ के लिए सात जिलों- अजमेर, भीलवाड़ा, हनुमानगढ़, जयपुर, नागौर, श्रीगंगानगर तथा सीकर में एन.एफ.एस.एम. क्रियान्वित किया जा रहा है।
* राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन न्यूट्रिसीरियल योजना एक केन्द्रीय प्रवर्तित योजना के रूप में राज्य में वर्ष 2018-19 में प्रारंभ किया गया है। इस योजना में चयनित जिलों में भारत सरकार द्वारा ज्वार फसलें दस जिलों में- अजमेर, अलवर, भरतपुर, भीलवाड़ा, चित्तौड़गढ़, जयपुर, जोधपुर, नागौर, पाली, टोंक।
* बाजरा फसल के लिए 21 जिलों – अजमेर, अलवर, बाड़मेर, भरतपुर, बीकानेर, चूरू, दौसा, धौलपुर, हनुमानगढ़, जयपुर, जैसलमेर, जालोर, झुंझुनूँ, जोधपुर, करौली, नागौर, पाली, सवाई माधोपुर, सीकर, सिरोही व टोंक में सम्मिलित की गई है।
राष्ट्रीय तिलहन एवं ऑयल पॉम मिशन (एन.एम.ओ.ओ.पी.):-
• राष्ट्रीय तिलहन एवं ऑयल पाम मिशन का मुख्य उद्देश्य तिलहन फसलों एवं वृक्ष जनित पौधों, खाद्यान्न की उत्पादकता में वृद्धि, गुणवत्ता में सुधार कर राज्य को खाद्य सुरक्षा में आत्मनिर्भर बनाना है।
• राजस्थान में मिशन के अन्तर्गत दो सब मिनी मिशन (मिनी मिशन-I तिलहनी फसलों एवं मिनी मिशन-III वृक्ष जनित तिलहनी फसलों के लिए) क्रियान्वित किये जा रहे हैं।
• इस मिशन की मुख्य गतिविधियाँ आधारभूत एवं प्रमाणित बीज का उत्पादन, प्रामाणित बीज का वितरण, फसल प्रदर्शन, समन्वित कीट प्रबन्धन, पौध संरक्षण उपकरण, जैव उर्वरक, जिप्सम, जल वितरण के लिए पाइन लाईन, कृषक प्रशिक्षण, कृषि सृधार, नवाचार, फव्वारा सेट तथा आधारभूत विकास आदि हैं।
• भारत सरकार ने वर्ष 2015-16 में वित्त पोषण पैटर्न में परिवर्तन कर केन्द्र एवं राज्य का अनुपात 60:40 कर दिया है।
राष्ट्रीय कृषि विस्तार एवं तकनीकी मिशन (एन.एम.ए.ई.टी.):-
• इस मिशन का उद्देश्य कृषि विस्तार का पुनर्गठन एवं सशक्तिकरण करना है, जिसके द्वारा किसानों को उचित तकनीक एवं कृषि विज्ञान की अच्छी आदतों का हस्तांतरण किया जा सके।
• भारत सरकार ने वर्ष 2015-16 में वित्त पोषण पैटर्न में परिवर्तन कर केन्द्र एवं राज्य का अनुपात 60:40 कर दिया है।
राष्ट्रीय टिकाऊ खेती मिशन (एन.एम.एस.ए.):-
• भारत सरकार द्वारा पूर्व में संचालित चार योजनाओं- राष्ट्रीय सूक्ष्म सिंचाई मिशन, राष्ट्रीय जैविक खेती परियोजना, राष्ट्रीय मृदा स्वास्थ्य एवं उर्वरता प्रबन्ध परियोजना तथा वर्षा आधारित क्षेत्र विकास कार्यक्रम का समावेश कर एक नया कार्यक्रम राष्ट्रीय टिकाऊ खेती मिशन, वर्ष 2014-15 से क्रियान्वित किया जा रहा है।
• वर्ष 2015-16 में इसके वित्त पोषण हेतु केन्द्र एवं राज्य का अनुपात 60:40 है।
• राष्ट्रीय टिकाऊ खेती मिशन के अन्तर्गत तीन सब-मिशन सम्मिलित किए गए है :
1. वर्षा आधारित क्षेत्र विकास (आर.ए.डी.)
2. जलवायु परिवर्तन तथा टिकाऊ खेती
3. मृदा स्वास्थ्य प्रबन्धन
परम्परागत कृषि विकास योजना:-
• जैविक खेती में पर्यावरण आधारित न्यूनतम लागत तकनीक के प्रयोग से रसायनों एवं कीटनाशकों का प्रयोग कम करते हुए कृषि उत्पादन किया जाता है।
• राष्ट्रीय टिकाऊ खेती मिशन (एन.एम.एस.ए.) के अन्तर्गत मृदा स्वास्थ्य प्रबन्धन का ही विस्तार परम्परागत कृषि विकास योजना है।
• परम्परागत कृषि विकास योजना के अन्तर्गत कलस्टर एवं प्रमाणन के माध्यम से जैविक खेती को प्रोत्साहित किया जाता है।
• भारत सरकार के द्वारा वित्त पोषण पैटर्न को 60 प्रतिशत केन्द्र एवं 40 प्रतिशत राज्य को दिया गया है।
प्रधामंत्री फसल बीमा योजना (पी.एम.एफ.बी.वाई) :-
• राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना (NAIS) और संशोधित कृषि बीमा योजना (MNAIS) को रबी 2015-16 के बाद बंद कर किसानों को अधिक सुरक्षा देने के लिए 2016 से प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) शुरू की जा रही है।
• यह योजना प्रधानमंत्री श्री मोदी ने 15 जनवरी, 2016 को जारी की है। 13 जनवरी, 2016 को इसे कैबिनेट ने मंजूरी दे दी।
• इसमें सभी खरीफ फसलों पर 2% प्रीमियम, सभी रबी फसलों पर 1.5% प्रीमियम तथा वाणिज्यिक व बागवानी फसलों के लिए 5% प्रीमियम होगा। शेष प्रीमियम सरकार वहन करेगी।
• यह नई बीमा योजना ‘एक राष्ट्र-एक योजना थीम (One Nation-One Scheme Theme) के अनुरूप है।
• प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना भारतीय कृषि बीमा कम्पनी लि. (AIC-Agriculture Insurance Company of India Ltd.) द्वारा संचालित की जा रही है।
प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई परियोजना:-
• यह योजना वर्ष 2015-16 में आरम्भ हुई।
• यह योजना 1 जुलाई, 2015 को शुरू की गई।
• इसमें केन्द्र व राज्य का 60:40 का अंश है।
• इसके अंतर्गत सुनिश्चित सिंचाई के लिए स्त्रोतों का सृजन करना।
• हर बूँद के उपयोग से अधिक फसल हो तथा ‘जल संचय’ एवं ‘जल सिंचन’ के माध्यम से माइक्रो लेवल पर जल संचयन करने का लक्ष्य है।
मृदा स्वास्थ्य कार्ड (Soil Health Care):-
• यह योजना 19 फरवरी, 2015 को सूरतगढ़ (गंगानगर, राजस्थान) में प्रारंभ हुई।
• इस योजना का उद्देश्य देशभर में कृषि क्षेत्र में मिट्टी की सेहत पर ध्यान देकर मिट्टी को आवश्यक पोषण उपलब्ध कराना है। ताकि मिट्टी की उत्पादन क्षमता को बढ़ाया जा सके।
• इस योजना के तहत् प्रत्येक
किसान को कृषि भूमि की मिट्टी की जांच हेतु कार्ड उपलब्ध कराये जायेंगे, जिसमें मिट्टी की उत्पादकता से जुड़ी जानकारि
यों के साथ भूमि में उर्वरकों के समुचित उपयोग संबंधी सलाह भी उपलब्ध करायी जायेगी। इस कार्ड का 3 वर्ष के
अंतराल पर नवीनीकरण किया जा सकेगा।
प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY):-
• प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजनान्तर्गत वर्तमान में संचालित योजनाओं का समावेश किया गया है जैसे- त्वरित सिंचाई लाभ कार्यक्रम (ए.आई. बी.पी.), समन्वित जलग्रहण प्रबन्ध कार्यक्रम (आई. डबल्यू.एम.पी.) तथा ऑन फार्म जल प्रबन्ध (ओ.एफ.डबल्यू. एम.)आदि। प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना पूरे राज्य में वर्ष 2015-16 से क्रियान्वित की जा रही है। प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना का वित्त पोषण पैटर्न केन्द्र एवं राज्य के बीच अनुपात 60:40 हैं।
प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना-सूक्ष्म सिंचाई (PMKSY-M.I.):-
• फसल उत्पादकता बढ़ाने एवं पानी को बचाने के लिए लघु सिंचाई पद्धति में ड्रिप एवं फव्वारा सिंचाई, प्रभावी जल प्रबंधन की व्यवस्था है।
• भारत सरकार द्वारा इन पद्धतियों के समुचित उपयोग को बढ़ावा देने के लिए प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के अन्तर्गत सूक्ष्म सिंचाई योजना प्रांरभ की गई है।
• इसमें सभी श्रेणी के कृषकों के लिए केन्द्रीय एवं राज्य सरकार का अनुपात 60 : 40 है।
• दिसंबर,2016 तक 3748 हैक्टेयर क्षेत्र में फव्वारा सिंचाई एवं 6,235 हैक्टेयर क्षेत्र में ड्रिप संयंत्रों की स्थापना की गई है।
ग्लोबल राजस्थान एग्रीटेक मीट (ग्राम):-
• ग्लोबल राजस्थान एग्रीटेक मीट 9-11 नवम्बर, 2016 को जयपुर एग्जिबिशन एण्ड कन्वेंशन सेन्टर (जे.ई.सी.सी.), सीतापुरा, जयपुर में हुआ। इस आयोजन में कृषि एवं सम्बद्ध क्षेत्रों में लगभग रु. 4400 करोड़ के निवेश के 38 एम.ओ.यू. हस्ताक्षरित किए गए।
• इस सम्मेलन में इजराइल ने पार्टनर देश के रूप में भाग लिया, जबकि नीदरलैंड ईरान, कजाकिस्तान, पापुआन्यूगिनी, नाईजीरिया, एवं जापान आदि देशों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इस सम्मेलन में लगभग 58000 किसानों ने भाग लिया।
कृषि विपणन (Agriculture Marketing):-
• राज्य के कृषकों को उनकी उपज का उचित मूल्य दिलाने अच्छी विपणन की सुविधा उपलब्ध कराने तथा राज्य में मंडी नियामक एवं प्रबंधन को प्रभावी ढंग से लागू करने हेतु कृषि विपणन निदेशालय कार्यरत है।
• राज्य में ‘सुपर‘, ‘अ‘ एवं ‘ब‘ श्रेणी की मंडियों में अपनी उपज विक्रय करने हेतु आने वाले कृषकों को सस्ती दर पर गुणवत्ता भोजन उपलब्ध कराने के उद्देश्य से ‘किसान कलेवा योजना’ प्रांरभ की गई है।
• 21 चयनित कृषि उपज मंडी समितियों में तेल परीक्षण प्रयोगशालाएं कार्य कर रही है।
राज्य में ‘महात्मा ज्योतिबा फुले मंडी श्रमिक कल्याण योजना 2015’ लागू की गयी है। इस योजना की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित है:-
1. प्रसूति सहायता:- महिला हम्माल एवं पल्लेदार को अधिकतम दो प्रसूतियों के लिए राज्य सरकार द्वारा अकुशल श्रमिक के रूप में निर्धारित प्रचलित मजदूरी दर अनुसार 45 दिवस की मजदूरी के समतुल्य सहायता राशि का भुगतान किया जा रहा है।
पितृत्व अवकाश के रूप में निर्धारित प्रचलित मजदूरी दर अनुसार 15 दिन की मजदूरी के समतुल्य राशि का भुगतान किया जा रहा है।
2. विवाह के लिए सहायता :- महिला हम्मालों की पुत्रियों के विवाह के लिए राशि रू 20,000 की सहायता राशि का प्रावधान है। यह सहायता अधिकतम दो पुत्रियों के लिए ही देय है।
3. छात्रवृति/मेधावी छात्र पुरस्कार योजना :- ऐसे कर्मचारी जिसके पुत्र/पुत्री, जो 60 प्रतिशत एवं उससे अधिक अंक प्राप्त करता है, को इस योजना के अन्तर्गत छात्रवृति दी जा रही है।
4. चिकित्सा सहायता :- हम्माल को गंभीर बीमारी (केन्सर, हार्ट अटैक, लीवर, किडनी, आदि) होने की दशा में सरकारी अस्पताल में भर्ती रहने पर चिकित्सा व्यय हेतु अधिकतम रु. 20,000 की राशि का प्रावधान है।