वैश्विक पवन तंत्र (Global Wind System)
- पवन - गैसों का क्षैतिज प्रवाह है जो उच्च दाब क्षेत्र से निम्न दाब क्षेत्र की ओर गमन करती है।
- कोरियोलिस बल - पृथ्वी के घूर्णन के कारण पवनें अपनी मूल दिशा से कुछ मुड़ जाती है। पवनों के मुड़ने के लिए जो बल उत्तरदायी है उसे कोरियोलिस बल कहा जाता है।
- फेरेल का नियम - कोरियोलिस बल के कारण पवनें उत्तरी गोलार्द्ध में दायी ओर (Right Side) तथा दक्षिण गोलार्द्ध में बायीं ओर (Left Side) मुड़ जाती हैं। इसे फेरेल का नियम कहा जाता है।
- वायु एक भौतिक वस्तु है जो अनेक प्रकार की गैसों का यांत्रिक मिश्रण होती है। इसका अपना स्वयं का भार होता है। इसी के कारण यह धरातल पर अपने भार द्वारा दबाव डालती हैं।
- सागर तल या धरातल पर क्षेत्रफल की प्रति इकाई पर स्थित वायु मण्डल की समस्त परतों के पड़ने वाले भार को वायु दाब कहते हैं।
- वायु दाब को मापने के लिए इंच, सेंटीमीटर और मिलीबार का प्रयोग किया जाता है।
- किसी मानचित्र पर सागर तल पर समान वायु दाब वाले क्षेत्रों को मिलाने वाली रेखा को समदाब रेखा कहते हैं। सागर तल पर वायु दाब सर्वाधिक होता है। जो सामान्य वायु दाब लगभग 76 सेमी. या 1013.25 मिलीबार के बराबर होता है।
- ऊँचाई के साथ-साथ वायु दाब में प्रति 100 मीटर पर 10 mb वायुदाब घटता है।
- अत्यधिक ऊँचाई पर ऑक्सीजन की कमी तथा वायु दाब की कमी से मानव के नाक से व कान से खून आने लगता है तथा घुटन बढ़ जाती है।
- वायु दाब के वितरण पर जल और स्थल के असमान वितरण और पृथ्वी की घूर्णन गति का भी प्रभाव पड़ता है।
- तापमान व वायुदाब में विपरीत सम्बन्ध होता है अर्थात् जब ताप अधिक होता है तब वायु दाब कम और जब तापमान निम्न होता है तब वायु दाब उच्च होता है। जब थर्मामीटर ऊँचा होता है तब बेरोमीटर नीचा तथा थर्मामीटर नीचा होता है तब बेरोमीटर ऊँचा होता है।
- तापमान में अन्तर के कारण हवा के घनत्व में परिवर्तन होता है और इससे वायुदाब में अन्तर आ जाता है।
- वायु दाब में परिवर्तन के कारण हवा में क्षैतिज गति उत्पन्न हो जाती है अर्थात् हवा उच्च वायु दाब से निम्न वायु दाब की और बहती है जिसे ही पवन कहते हैं।
धरातल पर वायुदाब की पेटियों का वितरण -
- वायुदाब के क्षैतिज वितरण के कारण धरातल पर 4 स्पष्ट पेटियाँ प्रत्येक गोलार्द्ध पाई जाती हैं।
- इन्हें 2 बड़े समूहों में बांटा जाता है।
1. तापजन्य वायुदाब पेटी
(i) भूमध्य रेखीय न्यून वायुदाब पेटी
(ii) ध्रुवीय उच्च वायुदाब पेटी
2. गतिजन्य वायुदाब पेटी
(i) उपोष्ण उच्च वायुदाब पेटी
(ii) उपध्रुवीय रेखीय न्यून वायुदाब पेटी (5°N – 5°S)
- विषुवतीय निम्न वायुदाब की पेटी (10°N -10°S) - इस पेटी का विस्तार भूमध्य रेखा के दोनों और 5° अक्षांशों तक मिलता है लेकिन यह स्थिति स्थायी नहीं होती है। क्योंकि सूर्य उतरायण और दक्षिणायन जाता है।
- यह अत्यधिक निम्न वायुदाब का कटिबंध है। इस कटिबंध में धरातलीय क्षैतिज पवनें नहीं चलती क्योंकि इस कटिबंध की ओर जाने वाली पवनें इसकी सीमाओं के समीप पहुँचते ही गर्म होकर ऊपर उठने लगती हैं।
- परिणामस्वरूप इस कटिबंध में केवल ऊर्ध्वाधर वायुधाराएँ ही पाई जाती हैं।
- वायुमंडलीय दशाएँ अत्यधिक शांत होने के कारण इस कटिबंध को डोलड्रम या शांत कटिबंध कहते हैं।
- उपोष्ण उच्च वायुदाब की पेटी (30°-35°N-S) इसके निर्माण के पीछे तापीय के साथ-साथ गतिक कारकों की भी भूमिका है।
- विषुवतीय निम्नदाब क्षेत्र से ऊपर उठी हवाएँ ऊपरी वायुमंडल में ध्रुवों की ओर प्रवाहित होती हैं।
- परन्तु पृथ्वी के घूर्णन बल के कारण ये पूर्व की ओर विक्षेपित होने लगती हैं।
- इस बल की मात्रा का सबसे पहले आकलन फ्रांसिसी वैज्ञानिक कॉरिऑलिस ने किया था, इसी कारण इस बल का नाम ‘कॉरिऑलिस बल’ पड़ा।
- विषुवत रेखा से बढ़ती दूरी के साथ-साथ इस बल की मात्रा भी बढ़ती है। परिणामस्वरूप ध्रुवों की ओर बढ़ने वाली वायु जब तक 25° अक्षांश पर पहुँचती है तब तक इसकी दिशा में इतना अधिक विक्षेप हो चुका होता है कि वह पश्चिम से पूर्व की ओर बहने लगती है व आगे आने वाली हवाओं के लिए अवरोधक का कार्य करने लगती है जिसके परिणामस्वरूप हवा वहीं ऊँचाई में जमा होने लगती है।
- हवा के क्रमशः ठंडा होने पर इसका घनत्व बढ जाता है एवं भार बढ़ने के कारण हवा वहीं नीचे उतरने लगती है।
- इस प्रकार कर्क और मकर रेखाओं तथा 35° उत्तरी व दक्षिणी अक्षांशों के मध्य उच्च वायुदाब कटिबंध का निर्माण हो जाता है। अत्यधिक क्षीण और परिवर्तनशील पवनों के कारण यहाँ वायुमंडल बहुत शांत रहता है।
- इस वायुदाब कटिबंध को अश्व अक्षांश भी कहा जाता है क्योंकि पुराने जमाने में घोड़ो को ले जाने वाली नौकाओं को यहाँ की शांत वायुमंडलीय दशाओं के कारण काफी कठिनाई होती थी एवं नौकाओं का भार हल्का करने के लिए घोड़ों को कई बार समुद्र में भी फेंकना पड़ता था, इसीलिए इस कटिबंध का नाम अश्व अक्षांश पड़ा।
- उपध्रुवीय निम्न वायुदाब की पेटी (60° - 65° N-S) इसके निर्माण में भी गतिजन्य कारण अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
- ध्रुवीय उच्च वायुदाब की पेटी (उत्तरी व दक्षिणी ध्रुवों के निकट) - अत्यधिक निम्न तापमान के कारण यहाँ वायुमंडल की ठंडी व भारी हवाएँ सतह पर उतरती रहती हैं, परिणास्वरूप यहाँ उच्च वायुदाब क्षेत्र का निर्माण होता है।
- वायुदाब कटिबंधों की स्थिति स्थिर नहीं है। ये वायुदाब कटिबंध सूर्य के आभासी संचरण के कारण गर्मियों में उत्तर की ओर एवं सर्दियों में दक्षिण की ओर खिसकते रहते हैं।
- सूर्यताप की मात्रा में असमानता एवं जल व स्थल का असमान रूप से गर्म होना भी इनकी स्थिति को प्रभावित करते हैं।
पवन
- वायुदाब में क्षैतिज विषमताओं के कारण हवा उच्च वायुदाब क्षेत्र से निम्नवायुदाब क्षेत्र की ओर बहती है।
- क्षैतिज रूप से गतिशील इस हवा को पवन कहते हैं।
- यह वायुदाब की विषमताओं को संतुलित करने की दिशा में प्रकृति का प्रयास है।
- लगभग ऊर्ध्वाधर दिशा में गतिमान हवा को वायुधारा कहते हैं। पवन और वायुधाराएँ दोनों मिलकर एक चक्रीय प्रक्रिया को पूरा करते हैं जिसे हेडली सेल कहते हैं।
- पृथ्वी के घूर्णन के कारण पवन दाबप्रणवता द्वारा निर्देशित दिशा में समदाब रेखाओं के समकोण पर नहीं बहती बल्कि अपनी मूल दिशा से विक्षेपित हो जाती है। ऐसा कॉरिऑलिस बल के प्रभाव के कारण होता है।
- वायु में गति बढ़ने के साथ-साथ इस बल की मात्रा में भी वृद्धि हो जाती है। कॉरिऑलिस बल के प्रभाव के कारण उत्तरी गोलार्द्ध की पवनें भूमध्य रेखा की ओर मुँह करके खड़े होने पर पीठ के पीछे से आती हुई अपनी दाहिनी ओर तथा दक्षिणी गोलार्द्ध मे ऐसे ही खड़े होने पर पवनें बायीं ओर विक्षेपित हो जाती हैं।
- चूंकि इस विशेषता को फेरल नामक फ्रांसीसी वैज्ञानिक ने सिद्ध किया था, अतः इसे फेरल का नियम भी कहते हैं।
- पवन के प्रकार - अपनी विशेषताओं के आधार पर पवनों को तीन प्रकारों में बांटा जा सकता है-
1. प्रचलित पवन या भूमंडलीय पवन (Permanent or planentary Winds)
2. मौसमी पवन या सामयिक पवन
3. स्थानीय पवन (Local Winds)
प्रचलित पवन
- ये वर्ष भर बहने वाली पवनें हैं। ये तीन प्रकार की होती हैं-
(i) व्यापारिक पवनें (Trade Winds)
(ii) पछुआ पवनें (Westerlies Winds)
(iii) ध्रुवीय पवनें (Polar Winds)
(i) व्यापारिक पवन (Trade Winds) - ये उपोष्ण उच्च वायुदाब कटिबंधों से विषुवतीय निम्न वायुदाब की ओर दोनों गोलार्द्ध़ों में निरंतर बहने वाली पवनें हैं।
- ट्रेड शब्द जमर्न भाषा का है। जिसका अर्थ है ‘निर्दिष्ट पथ’।
- अतः ट्रेड पवनें एक निर्दिष्ट पथ पर चलने वाली पवनें हैं।
- उत्तरी गोलार्द्ध में ये पवनें उ.पू. व्यापारिक पवन के रूप में उ.पू. से दक्षिण पश्चिम की ओर बहती हैं।
- जबकि दक्षिण गोलार्द्ध में द.पू. व्यापारिक पवन के रूप में द.पू. से उ.प. की ओर लगातार बहती हैं।
- विषुवत रेखा के समीप ये दोनों पवनें टकराकर ऊपर उठती हैं और घनघोर संवहनीय वर्षा करती हैं।
- महासागरों के पूर्वी भाग में ये व्यापारिक पवनें ठंडी समुद्री धाराओं से संपर्क के कारण पश्चिमी भाग की व्यापारिक पवनों की अपेक्षा शुष्क होती हैं।
(ii) पछुआ पवनें (Westerlies Winds) - उपोष्ण उच्च वायुदाब कटिबंध से उपध्रुवीय निम्न वायुदाब कटिबंध की ओर चलने वाली पश्चिमी पवनों को पछुआ पवन कहते हैं।
- उत्तरी गोलार्द्ध में ये दक्षिण-पश्चिम से उत्तर पूर्व की ओर बहती है एवं दक्षिणी गोलार्द्ध में उ.प. से द.पू. की ओर बहती हैं।
- पछुआ पवनों का सर्वश्रेष्ठ विकास 40° S - 60° S अक्षांशों के मध्य होता है। क्योंकि थल भाग की अपेक्षा जल भाग की अधिकता है और रूकावट नहीं है।
अतः इन अक्षांशों में
- 40° S अक्षांश पर इन्हें गरजती चालीसा (Roaring Fourties)
- 50° S अक्षांश पर इन्हें प्रचण्ड पचासा (Furious Fifties)
- 60° S अक्षांश पर चीखता साठा (Shrieking Sixties) कहा जाता है।
- ये नाम नाविकों के लिए भयानक हैं और उन्हीं के द्वारा दिए गए हैं।
(iii) ध्रुवीय पवनें - ध्रुवीय पवनें उच्च वायुदाब से उपध्रुवीय निम्न वायुदाब की ओर बहने वाली पवनें हैं।
- उत्तरी गोलार्द्ध में इनकी दिशा उ.पू. से द.प. की ओर एवं दक्षिणी गोलार्द्ध में द.पू. से उ.प. की ओर है।
- तापमान कम होने से इनकी जलवाष्प धारण करने की क्षमता अत्यंत कम होती है।
- उपध्रुवीय निम्न वायुदाब कटिबंध में जब पछुआ पवनें इस ध्रुवीय पवनों से टकराती हैं तो पछुआ पवन के ध्रुवीय वाताग्र पर शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवातों की उत्पत्ति होती है।
2. मौसमी या सामयिक पवन : जिन पवनों की दिशा मौसम या समय के अनुसार परिवर्तित हो जाती है उन्हें सामयिक पवन कहते हैं।
- पवनों के इस वर्ग में निम्न पवनें हैं-
(i) मानसून पवनें
(ii) स्थल समीर-जल समीर
(iii) पर्वत समीर व घाटी समीर
(i) मानसून पवनें : धरातल की वे सभी पवनें जिनकी दिशा में मौसम के अनुसार पूर्ण परिवर्तन आ जाता है, मानसून पवनें कहलाती हैं। ये पवनें ग्रीष्म ऋतु के छह माह समुद्र से स्थल की ओर चलती हैं तथा शीत ऋतु के छह माह स्थल से समुद्र की ओर बहती हैं। ऐसा स्थल व जल के गर्म होने की अलग-अलग प्रवृत्ति के कारण होता है। इनकी उत्पति कर्क व मकर रेखाओं के बीच की व्यापारिक पवनों की पेटी में होती है। दक्षिणी एवं दक्षिणी-पूर्वी एशिया में इनकी सबसे आदर्श दशाएँ मिलती हैं।
मानसून अरबी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ - मौसम होता है।
प्रथम सदी में एक अरबी नाविक ‘हिप्पौलस‘ ने मानसून की खोज की (अवधारणा दी) थी।
भारतीय मानसून की उत्पत्ति- इसकी उत्पत्ति हिन्दमहासागर में मेडागास्कर द्वीप के पास से मानी जाती है क्योंकि मई के माह में उच्च ताप व निम्न वायुदाब होता है इस कारण हवाएँ मेडागास्कर के पास से दक्षिण-पश्चिम दिशा बहती हुई भारत की ओर आती हैं तथा सबसे पहले केरल तट पर वर्षा करती हैं। यहाँ मानसून दो भागों में बंट जाता है-
(A) अरब सागर का मानसून- यह भारत के पश्चिमी तट पर वर्षा करता हुआ गुजरात काठियावाड़ में वर्षा कर राजस्थान में प्रवेश करता है।
राजस्थान में प्रवेश करता है परन्तु राजस्थान में वर्षा नहीं करता क्योंकि अरावली पर्वतमाला की स्थिति इसके समानान्तर है। इसके पश्चात् हिमालय की तराई क्षेत्र पंजाब व हिमाचल में वर्षा करता है।
(B) बंगाल की खाड़ी का मानसून- यह तमिलनाडु में वर्षा कर बंगाल की खाड़ी की आर्द्रता को ग्रहण कर उत्तर-पूर्व के राज्यों में घनघोर वर्षा करता है। मासिनराम विश्व का सर्वाधिक वर्षा वाला स्थान यहीं है।
चेरापूंजी का नाम अब सोहरा कर दिया गया है।
इसके पश्चात् पश्चिम बंगाल, बिहार व उत्तरप्रदेश व मध्यप्रदेश में वर्षा करता हुआ, झालावाड़ जिले से राजस्थान में प्रवेश करता है।
(ii) जल समीर व स्थल समीर –
जल समीर - दिन के समय निकटवर्ती समुद्र की अपेक्षा स्थल भाग पर उच्च तापमान होने से वहाँ निम्न वायुदाब की स्थिति उत्पन्न हो जाती है जबकि समुद्री भाग के अपेक्षाकृत ठंडा रहने के कारण वहाँ उच्च वायुदाब की स्थिति रहती है।
- अतः स्थल की गर्म वायु जब ऊपर उठती है तो समुद्र की आर्द्र तथा ठंडी वायु उस रिक्त स्थान को भरने के लिए स्थल की ओर चलती है जिसे जल समीर कहते हैं।
स्थल समीर - रात्रि के समय स्थिति उपरोक्त से विपरीत होती है। इस समय समुद्र पर स्थल की अपेक्षा अधिक तापमान तथा निम्न वायुदाब मिलता है। फलस्वरूप वायु स्थल से समुद्र की ओर चलती है जिसे ‘स्थल समीर’ कहते हैं।
घाटी समीर व पर्वत समीर -
घाटी समीर - दिन के समय में पर्वतीय भागों का क्षेत्र घाटी की अपेक्षा गर्म हो जाता है। अतः वहाँ निम्न वायुदाब का क्षेत्र बन जाता है। जबकि घाटी का क्षेत्र कम गर्म रहता है और वहाँ उच्च वायुदाब रहता है। अतः पवनें घाटी से पर्वत की ओर बहती हैं और इसे घाटी समीर कहते हैं।
पर्वत समीर - रात्रि के समय पर्वत के ऊपर की वायु शीघ्र ठंडी होकर भारी हो जाती है तथा वहाँ उच्च वायुदाब का क्षेत्र बन जाता है जबकि घाटी में उच्च तापमान (उमस) की स्थिति रहती है अर्थात् निम्न वायु दाब रहता है इसलिए पवनें पर्वत की ढलान के सहारे नीचे की ओर उतरना शुरू कर देती हैं। इसे ‘पर्वत समीर’ कहते हैं।
3. स्थानीय पवनें : ये पवनें धरातलीय बनावट, तापमान तथा वायुदाब के स्थानीय अंतर से चला करती हैं और बहुत छोटे क्षेत्र को प्रभावित करती हैं। जहाँ गर्म स्थानीय पवन किसी विशेष प्रदेश के तापमान में वृद्धि लाती है।
- वहीं ठंडी स्थानीय पवनें कई बार तापमान को हिमांक से भी नीचे कर देती हैं। ये स्थानीय पवनें क्षोभमंडल की निचली परतों तक ही सीमित रहती हैं। कुछ प्रमुख पवने इस प्रकार हैं।
1. चिनूक (Chinook) : इसका अर्थ होता है हिमभक्षी। ये रॉकी पर्वत के पूर्वी ढालों के सहारे चलने वाली गर्म तथा शुष्क हवा है जो दक्षिण में कोलोरैडो के दक्षिणी भाग से उतर में कनाडा के ब्रिटिश कोलंबिया तक प्रवाहित होती हैं। इसके प्रभाव से बर्फ पिघल जाती है एवं शीतकाल में भी हरी भरी घासें उग आती हैं। यह पशुपालकों के लिए लाभदायक है क्योंकि इससे चारागाह बर्फमुक्त हो जाता है।
2. फोन - यह चिनूक के समान ही आल्प्स पर्वत के उत्तरी ढाल के सहारे उतरने वाली गर्म व शुष्क हवा है। इसका सर्वाधिक प्रभाव स्विट्जरलैण्ड में होता है। इसके आने से बर्फ पिघल जाती है, मौसम सुहावना हो जाता है और अंगूर की फसल शीघ्र पक जाती है।
3. सिरॉको - यह गर्म, शुष्क तथा रेत से भरी हवा है जो सहारा के रेगिस्तानी भाग से उत्तर की ओर भूमध्यसागर होकर इटली और स्पेन में प्रविष्ट होती है। इनका वनस्पतियों, कृषि व फलों के बागों पर विनाशकारी प्रभाव पड़ता है। इनका नाम अलग-अलग देशों में भिन्न-भिन्न है-
i. खमसीन-मिस्र,
ii. गिबिली-लीबिया
iii. चिली-ट्यूनीशिया
iv. लेस्ट-मैडिरा और कनारी द्वीपों में
v. लेवेश-स्पेन में
4. ब्लैक रोलर - ये उत्तरी अमेरिका के विशाल मैदानों में चलनेवाली गर्म एवं धूलभरी शुष्क हवाएँ हैं।
5. योमा - यह जापान में सेंटाएना के समान ही चलनेवाली गर्म व शुष्क हवा है।
6. टेम्पोरल - यह मध्य अमेरिका में चलनेवाली मानसूनी हवा है।
7. सिमून - अरब के रेगिस्तान में चलनेवाली गर्म व शुष्क हवा जिससे रेत की आँधी आती है व दृश्यता समाप्त हो जाती है।
8. सामुन - यह ईरान व ईराक के कुर्दिस्तान में चलने वाली स्थानीय हवा है जो फोन के समान विशेषताएँ रखती है।
7. शामल - यह इराक, ईरान और अरब के मरुस्थलीय क्षेत्र में चलने वाली गर्म, शुष्क व रेतीली पवनें हैं।
8. सीस्टन - यह पूर्वी ईरान में ग्रीष्मकाल में प्रवाहित होने वाली तीव्र उत्तरी पवन है।
9. हबूब - उत्तरी सूडान में मुख्यतः खारतून के समीप चलने वाली यह धूलभर आंधियाँ हैं जिनसे दृश्यता कम हो जाती है ओर कभी-कभी तड़ित झंझा सहित भारी वर्षा होती है।
10. काराबुरान - यह मध्य एशिया के तारिम बेसिन में उ.पू. की ओर प्रवाहित होनेवाली धूल भरी आधियाँ हैं।
11. कोइम्बैंग - फोन के समान जावा द्वीप (इंडोनेशिया) में चलने वाली पवनें हैं जो तंबाकू आदि फसलों को नुकसान पहुँचाती हैं।
12. हरमट्टन - सहारा रेगिस्तान के पूर्वी भाग में उ.पू. तथा पूर्वी दिशा से पश्चिमी दिशा में चलने वाली यह गर्म तथा शुष्क हवा है जो अफ्रीका के पश्चिमी तट की उष्मा व आर्द्र हवा में शुष्कता लाती है इससे मौसम सुहावना व स्वास्थ्यप्रद हो जाता है। इसी कारण गिनी तट पर इसे ‘डॉक्टर’ हवा कहा जाता है।
13. ब्रिकफिल्डर - आस्ट्रेलिया के विक्टोरिया प्रांत में चलने वाली यह उष्ण व शुष्क हवा है।
14. नार्वेस्टर - यह उ. न्यूजीलैंड में चलनेवाली गर्म शुष्क हवा है।
15. लू - यह उ. भारत में गर्मियों में उ.प. तथा पश्चिम से पूर्व दिशा में चलनेवाली प्रचंड व शुष्क हवा है जिसे वस्तुतः तापलहरी भी कहा जाता है।
16. सेंटाएना - यह कैलिफोर्निया में चलने वाली गर्म व शुष्क हवा है।
17. जोन्डा - ये अर्जेंटिना और उरूग्वे में एंडीज से मैदानी भागों की ओर चलने वाली कोष्ण शुष्क पवनें हैं। इसे शीत फोन भी कहा जाता है।
18. मिस्ट्रल - यह ठंडी ध्रुवीय हवाएँ हैं जो रोन नदी की घाटी से होकर चलती हैं एवं रूमसागर के उ.प. भाग विशेषकर स्पेन व फ्रांस को प्रभावित करती हैं। इसके आने से तापमान हिमांक के नीचे गिर जाता है।
19. बोरा - मिस्ट्रल के समान ही यह भी एक शुष्क व अत्यधिक ठंडी हवा है एवं एड्रियाटिक सागर के पूर्वी किनारों पर चलती है। इससे मुख्यतः इटली व यूगोस्लाविया प्रभावित होते हैं।
20. ब्लिजर्ड या हिम झंझावात - ये बर्फ के कणों से युक्त ध्रुवीय हवाएँ हैं। इससे साइबेरियाई क्षेत्र, कनाडा प्रभावित होता है। इनके आगमन से तापमान हिमांक से नीचे गिर जाता है। रूस के टुंड्रा प्रदेश एवं साइबेरिया क्षेत्र में ब्लिजर्ड का स्थानीय नाम क्रमशः पुरगा व बुरान है।
21. नार्टे - ये मध्य अमेरिका में शीत ऋतु में प्रवाहित होने वाली ध्रुवीय पवनें हैं। द. USA मे शीत ऋतु में प्रवाहित होने वाली ध्रुवीय पवनों को नार्दर या नार्दर्न पवनें कहा जाता हैं।
22. पैंपेरो - ये अर्ज़ेंटीना, चिली व उरूग्वे में बहने वाली तीव्र ठंडी ध्रुवीय हवाएँ हैं।
23. ग्रेगाले - ये द. यूरोप के भूमध्यसागरीय क्षेत्रों के मध्यवर्ती भाग में बहने वाली शीतकालीन पवनें हैं।
24. जूरन ये जूरा पर्वत (स्विट्जरलैंड) से जेनेवा झील (इटली) तक रात्रि के समय चलने वाली शीतल शुष्क पवनें हैं।
25. मैस्ट्रो - ये भूमध्यसागरीय क्षेत्र के मध्यवर्ती भाग में चलने वाली उ.प. पवनें हैं।
26. पुना - यह एंडीज क्षेत्र में चलनेवाली स्थानीय ठंडी पवन है।
27. पापागयो : यह मैक्सिको के तट पर चलनेवाली तीव्र शुष्क और शीतल उ.पू. पवनें हैं।
28. पोन्त - ये भूमध्यसागरीय क्षेत्र में विशेषकर कोर्सिका तट एवं भूमध्यसागरीय फ्रांस में चलनेवाली ठंडी पश्चिमी हवाएँ हैं।
29. विरासेन - ये पेरू तथा चिली के पश्चिमी तट पर चलने वाली समुद्री पवनें हैं।
30. सदर्न बर्स्टर - ये न्यू साउथ वेल्स आस्ट्रेलिया में चलने वाली तेज व शुष्क ठंडी पवनें हैं।
31. ट्रेमोन्टेना - उत्तरी इटली में चलने वाली ठण्डी हवा।