गुप्तकालीन कला – संस्कृति
- कला, साहित्य, विज्ञान व संस्कृति के चहुमुखी विकास के दृष्टिकोण से गुप्त काल को भारतीय इतिहास का स्वर्णिम युग कहा जाता है तथा इसी काल को क्लासिकल युग या पेरीक्लीन युग के नामों से भी जाना जाता हैं।
गुप्तकालीन कला संस्कृति के स्रोत
→ अभिलेख
- स्तम्भ लेख
- ताम्रलेख
- गुहाभिलेख
- मुद्राभिलेख
→ मंदिर व स्थापत्य कला
→ साहित्य
गुप्तकालीन अभिलेख:
- प्रारंभिक गुप्तशासक जैसे- श्रीगुप्त, घटोत्कच, का स्वयं का कोई भी अभिलेखीय साक्ष्य नहीं मिला है परन्तु सम्पूर्ण गुप्त वंशावली का उल्लेख बिलसड अभिलेख (कुमारगुप्त) में मिलता है लेकिन इसमें रामगुप्त का उल्लेख नहीं मिलता है।
चन्द्रगुप्त प्रथम:-
- चन्द्रगुप्त प्रथम ने अपने राज्यरोहण के दिन 9 मार्च, 319 ई. को गुप्तसवंत चलाया था।
- इसने सोने के सिक्के चलवाए जो कुमारदेवी प्रकार, राजा-रानी प्रकार का सिक्का चलाया।
- चन्द्रगुप्त प्रथम ने लिच्छवी वंश की राजकुमारी कुमारदेवी से विवाह की पुष्टि मिलती है।
समुद्रगुप्त:
- यह प्रथम गुप्त शासक जिसके अभिलेख प्राप्त हुए।
- प्रयाग प्रशस्ति-
- यह प्रशस्ति अशोक के प्रयाग-कौशाम्बी स्तम्भ लेख पर उत्कीर्ण है।
- इसकी रचना हरिषेण द्वारा की गई तथा उत्कीर्णकर्ता तिलभट्ट थे।
- इसकी भाषा विशुद्ध संस्कृत थी व लिपि ब्राह्यी लिपि थी।
- इस प्रशस्ति में समुद्रगुप्त को सौ युद्धों का विजेता तथा उसके शरीर पर सौ घावों का उल्लेख मिलता है।
- प्रयाग-प्रशस्ति में अश्वमेघ यज्ञ का उल्लेख नहीं मिलता है।
नोट:- विसेंट स्मिथ ने समुद्रगुप्त को भारत का नेपोलियन कहा है।
चन्द्रगुप्त II
- महरौली लौह स्तंभ –
- दिल्ली (कुतुब कॉम्पलेक्स, कुतुबमीनार परिसर) में स्थित है। तथा इस पर चन्द्र नामक शब्द का उल्लेख मिलता है।
- उदयगिरी का गुहाभिलेख (विदिशा, मध्य प्रदेश)
- निर्माण: हरिषेण के पुत्र – वीरषेण द्वारा करवाया गया।
- गुफा में शिव मंदिर का निर्माण करवाया गया।
- मथुरा स्तम्भ लेख में जैन तीर्थंकरो का उल्लेख मिलता है।
- चन्द्रगुप्त प्रथम द्वारा प्रचलित गुप्तसंवत की पहली बार जानकारी मिलती है।
- यह अभिलेख चन्द्रगुप्त द्वितीय से समय था।
- पुना ताम्रपत्र (महाराष्ट्र):
- पुना ताम्रपत्र चन्द्रगुप्त द्वितीय की पुत्री प्रभावती गुप्त द्वारा उत्कीर्ण करवाया गया था।
- इसमें धरण गौत्र का उल्लेख मिलता है।
- इसमें शकों पर विजय व वाकाटकों के साथ गठबंधन का उल्लेख मिलता हैं।
नोट:- चन्द्रगुप्त प्रथम ने अपनी पुत्री पभावति का विवाह वाकाटक शासक रुद्रसैन द्वितीय के साथ किया इसी की सहायता से इसने शकों को पराजित किया तथा शकों को पराजित करने के उपलक्ष में चन्द्रगुप्त द्वितीय ने विक्रमादित्य की उपाधि धारण की।
कुमारगुप्त प्रथम (महेन्द्रादित्य प्रथम):
- गुप्त शासकों में सर्वाधिक अभिलेख लगाने का श्रेय कुमारगुप्त प्रथम को दिया जाता है।
- यह एक मात्र ऐसा शासक है जिसके अभिलेख बांग्लादेश से भी मिलते हैं।
- बिलसद अभिलेख: (एटा जिला, उत्तर प्रदेश)-
- इस अभिलेख में सम्पूर्ण गुप्तवंशावली की जानकारी मिलती है परन्तु रामगुप्त का उल्लेख नहीं मिलता है।
- इसमें गुप्तसंवत का प्रयोग किया गया है।
- तुमैन अभिलेख (मध्य प्रदेश)-
- तुमैन अभिलेख में कुमारगुप्त प्रथम को शरदकालीन सूर्य की भाँति शांत बताया गया है।
मंदसौर प्रशस्ति
- यह प्रशस्ति कुमारगुप्त द्वितीय के समय की है, परन्तु कुमारगुप्त प्रथम की जानकारी मिलता है।
- कुमारगुप्त प्रथम के समय मालवा के राज्यपाल ‘बंधवर्मा’ के द्वारा मालवा में ‘सूर्य मंदिर’ के निर्माण का उल्लेख मिलता है।
- इसी अभिलेख में गुप्तकाल में सूर्योपासना का उल्लेख मिलता है।
- कुमारगुप्त प्रथम ऐसा शासक है जिसके तीन ताम्रपत्र बंगाल (बांग्लादेश) से मिलते हैं।
- दामोदरपुर
- धनदैह- इसमें गुप्तकालीन भूमि के क्रय-विक्रय के बारें में जानकारी मिलती है।
- वैग्राम
नोट:- कुमारगुप्त ने अपने सिक्कों पर गरुड़ के स्थान पर मयूर का अंकन करवाया।
स्कन्दगुप्त
1. जूनागढ़ अभिलेख:-
- यह गुजरात, सौराष्ट्र में स्थित है।
- इस अभिलेख में स्कन्दगुप्त व हूणों के मध्य हुए युद्ध की जानकारी मिलती है।
- स्कन्दगुप्त के द्वारा सुदर्शन झील का पुन:निर्माण कराने का उल्लेख मिलता है।
2. भीतरी अभिलेख:-
- यह गाजीपुर, उत्तर प्रदेश में स्थित है।
- इस अभिलेख में स्कन्दगुप्त का हूणों व पुष्यमित्रों के साथ हुए युद्ध की जानकारी मिलती है।
- हूण मध्य एशिया की खानाबदोस जाति थी।
- स्कन्दगुप्त ने हूणों को पराजित करने के बाद दो उपाधियों को धारण किया।
- क्रमादित्य
- विक्रमादित्य
3. गढ़वा अभिलेख:
- यह इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश में स्थित है।
- इसमें परमभागवत उपाधि का उल्लेख मिलता है।
अन्य अभिलेख:-
- कहौम अभिलेख (उत्तर प्रदेश) स्कन्दगुप्त के समय का है।
- सुपिया अभिलेख (मध्य प्रदेश) स्कन्दगुप्त के समय का है।
भानुगुप्त
- भानुगुप्त का एरण व स्कन्दगुप्त का जूनागढ़ अभिलेख भगवान विष्णु की स्तूती से प्रारंभ होते हैं।
ऐरण अभिलेख:-
- ऐरण अभिलेख मध्य प्रदेश के सागर जिले में स्थित है।
- इसमें भानुगुप्त व समुद्रगुप्त की जानकारी मिलती है।
- इसमें भानुगुप्त व हूणों के साथ हुए युद्ध का उल्लेख मिलता है।
- भानुगुप्त के सेनापति गोपराज की पत्नि के सती होने का उल्लेख मिलता है जो भारतीय इतिहास में सती होने का प्रथम प्रमाण है।
- इस अभिलेख में समुद्रगुप्त की पत्नि दत्तदेवी का उल्लेख मिलता है तथा इसमें पसन्द समुद्रगुप्त को कुबैर व नाराज समुद्रगुप्त को यमराज कहा गया है।
वास्तुकला (मंदिर निर्माण कला)
- गुप्तकाल में मंदिर निर्माण कला का जन्म हुआ।
- पहली बार शिखर युक्त मंदिर बनाए गए व सभा मंडपों का प्रयोग किया गया।
मंदिर निर्माण की प्रमुख शैलियाँ:-
- नागर शैली:
- यह शैली उत्तरी भारत में प्रचलित थी।
- इसे आर्य शैली भी कहा जाता है।
इस शैली की विशेषता:-
- इस शैली में विशाल शिखर व सभामंडलों का प्रयोग होता था।
- भारत में प्रथम विशाल शिखरयुक्त मंदिर झाँसी स्थित देवगढ़ का दशावतार मंदिर माना जाता है।
दशावतार मंदिर:-
- यह मंदिर पंचायत शैली में निर्मित है।
- इसमें 12 मीटर ऊँचे शिखर का निर्माण किया गया है।
- इसमें 4 सभा मंडपों का निर्माण किया गया है।
- इसमें भगवान विष्णु को शेषसैय्या पर विराजमान व नाभी से कमल निकलता हुआ तथा माता लक्ष्मी को पैर दबाते हुए दिखाया गया है।
द्रविड़ शैली:-
- यह शैली मूलत: दक्षिण भारत में प्रचलित थी।
विशेषता:-
- इस शैली में मंदिरों के विशाल प्रवेश द्वार हुआ करते थे जिन्हें गोपुरम कहा जाता था।
- इन मंदिरों का आकार पिरामिड के समान व निर्माण बड़ी-बड़ी चट्टानों को काटकर किया जाता था।
- पल्लव व चौल शासकों द्वारा इस शैली में मंदिरों का निर्माण करवाया गया था।
बेसर शैली:-
- यह शैली नागर व द्रविड़ शैली दोनों का मिला-जुला रूप था तथा इसे खच्चर या चच्चर शैली भी कहा जाता है।
- चालुक्य शासकों ने इस शैली का विशेष प्रयोग किया।
- चालुक्य संरक्षण के कारण इस शैली का प्रयोग उत्तर पश्चिमी क्षेत्र, दक्षिणी-पूर्वी क्षेत्रों में किया गया।
एकायतन शैली:-
- ऐसा मंदिर जिसके गर्भगृह में एक ही प्रतिमा/मूर्ति हो, उसे एकायतन शैली कहा जाता है।
- नागर शैली- गुप्तकाल के मंदिर इसी शैली में निर्मित है।
- द्रविड़- दक्षिण भारत की प्रमुख शैली है।
- बेसर- नागर व द्रविड़ शैली का मिला-जुला रूप है।
- एकायतन- गर्भगृह में – 1 प्रतिमा होती है।
- पंचायतन- गर्भगृह में 1-5 प्रतिमा तक होती है।
- पंचायतन शैली में मूलत: भगवान विष्णु के मंदिर होते हैं।
- महामारू शैली- एक ही स्थान पर एक से अधिक (अनेक) मंदिरों का निर्माण किया जाता है।
- तक्षण कला- छैनी व हथौड़े के माध्यम से मूर्ति निर्माण का कार्य किया जाता था।
- सिलावट- मूर्ति निर्माण करने वाले कलाकारों को कहा जाता था।
गुप्तकालीन मंदिरों की विशेषताएँ:-
- ईंट व पत्थर से निर्माण
- गर्भगृह का भीतरी भाग- सादा
- निर्माण सपाट चबूतरे पर
- द्वारपाल के रूप में मकरवाहीनी(गंगा) व कुम्रवाहीनी(यमुना)
गुप्तकालीन मूर्तिकला(मूर्ति निर्माण) के प्रमुख केन्द्र:-
- मथुरा:- इस मूर्तिकला में खड़े बुद्ध की प्रतिमा को दर्शाया गया है।
- सारनाथ:- इस मूर्तिकला में बैठे हुए बुद्ध की प्रतिमा को दर्शाया गया है।
- पाटलीपुत्र:- सुल्नातगंज (बिहार) से बुत्र की 7.5 फीट ऊँची ताँबे की प्रतिमा प्राप्त हुई है।
गुप्तकालीन अन्य मंदिर:-
- देवगढ़ का दशावतार मंदिर – झाँसी (उत्तर प्रदेश)
- भूमरा शिव मंदिर – सतना (मध्य प्रदेश)
- नचना-कुठार पार्वती मंदिर – पन्ना (मध्य प्रदेश)
- तिगवा विष्णु मंदिर – (मध्य प्रदेश)
- ऐरण विष्णु मंदिर – सागर जिला (मध्य प्रदेश)
- खोह शिव मंदिर – (मध्य प्रदेश)
- उदयगिरी शिव मंदिर – विदिशा – (मध्य प्रदेश)
- साँची का मंदिर – (मध्य प्रदेश)
1. भीतरगाँव(उत्तर प्रदेश)- विष्णु मंदिर
- ईंटो से निर्मित प्रथम हिंदू मंदिर।
- भारत में पहली बार इसके शिखर में “महराबों” का प्रयोग।
2. सिरपुर का लक्ष्मण मंदिर:- (छत्तीसगढ़)
गुहा/गुफा:-
अजंता की गुफाएँ:-
- यह महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले के अनिष्ठा गाँव में स्थित है।
- यहाँ कुल 29 गुफाएँ है।
- गुप्तकालीन गुफा संख्या 16 व17 है।
- खोज- 1819 ई. में मद्रास रेजीमेन्ट के एक सैनिक कनिघम के द्वारा की गई।
- इन गुफाओं का निर्माण वाकाटक नरेश पृथ्वीसेन के सामन्त वराहदेव/व्याघ्रदेव द्वारा करवाया गया था।
- इस गुफाओं का आकार घोड़ें के पैर के नाल के आकार की है।
- चैत्य गुफाएँ (पूजा घर) की संख्या चार है जो गुफा संख्या 9, 10, 19 और 26 में स्थित हैं।
- पहले सर्वाधिक चित्र गुफा संख्या-16 में थे, परन्तु अब सर्वाधिक चित्र गुफा संख्या -17 में हैं, 17 इसे चित्रशाला कहा जाता है।
- Note- कई इतिहासकारों के अनुसार गुफा संख्या 16,17 व 19 गुप्तकालीन मानी गई है। लेकिन प्रामाणिक पुस्तको में केवल गुफा संख्या- 16 व 17 का उल्लेख।
- अंजता गुफाओं के चित्र पारलौकिक (धार्मिक) है।
- गुफा संख्या- 8 व 13 हीनयान(बौद्ध) से संबधित हैं।
- इन समस्त गुफाओं में गुफा संख्या-13 सबसे प्राचीन गुफा है।
- गुफा संख्या-16
- भगवान बुद्ध के वैराग्य उत्पन्न होने के 4 दृश्य मिलते हैं।
- उपदेश सुनते हुए भक्तगण।
- मरणासन्न अवस्था में राजकुमारी का चित्र सबसे प्रसिद्ध चित्र। इस गुफा का सबसे प्रसिद्ध चित्र।
- यह राजकुमारी भगवान बुद्ध के भाई नंदीवर्धन की पत्नी-सौन्दरी।
- गुफा संख्या-17
- वर्तमान में सर्वाधिक चित्र इसी गुफा में है इसलिए इसे चित्रशाला भी कहा जाता है।
- इसमें बुद्ध के गृहत्याग का (महाभीनिष्क्रमण) का चित्रण किया गया है।
- भगवान बुद्ध की पत्नी यशोधरा द्वारा अपने पुत्र “राहुल” को दान में देते हुए (त्याग) का चित्रण किया गया है।
अजन्ता की खुफाओं के अन्य चित्र:-
- झुला-झूलते राजकुमारी का चित्रण – गुफा संख्या – 2
- बैठी हुई स्त्री का चित्र – गुफा संख्या – 9
- पुजारियों का दल स्तूप की ओर जाते हुए – गुफा संख्या – 9
- साण्डों की लड़ाई – गुफा संख्या – 1
नोट:- गुफा संख्या 1 में पुलकेशिन द्वितीय द्वारा ईरानी शासक परवेज शाह खुसरों का स्वागत करते हुए दिखाया गया है।
गुप्तकालीन साहित्य-
- प्रारंभिक जीवन महामूर्ख, अनपढ़ थे।
- इन्हें भारत का शेक्सपीयर कहा जाता है।
- इनका जन्म कहाँ- मधुबनी (बिहार) में हुआ था। यहाँ से कालीदास के निवास स्थान के साक्ष्य प्राप्त हुए है।
- इनकी पत्नी का नाम विद्योत्तमा जो तत्कालीन समय की सबसे विदुशी राजकुमारी थी।
- इनकी कुल 7 रचनाएँ मानी जाती हैं।
- 3 नाटक, 2 महाकाव्य, 2 खण्डकाव्य
Note: क्षेमेन्द्र की वृहत्कथामंजरी के अनुसार ‘कालीदास की कुल 8 रचनाएँ’।
- प्रेम प्रधान
- सुखान्त
- मध्य भाग-विरेह
- दो प्रकार के पात्र (किरदार)
- उच्चवर्ण – संस्कृत भाषा
- निम्नवर्ण – प्राकृत भाषा
- मालविकाग्निमित्र – 5 सर्ग (अध्याय)
- कथा: शुंग वंश के शासक अग्निमित्र मालवदेश की राजकुमारी के प्रेम का वर्णन – (मालविका)
- विक्रमोर्वशियम – 5 सर्ग – राजा पूरुरवा व उर्वशी
- अभिज्ञान शाकुन्तलम् – 7 सर्ग – कालीदास की सर्वश्रेष्ठ रचना मानी जाती है।
- राजा दुष्यंत व कण्व ऋषि की पालिता पुत्री शकुंतला (मेनका की पुत्री) के प्रेम संयोग व वियोग का वर्णन है।
- यह कालीदास का अंतिम नाटक माना जाता है, इसका अंग्रेजी भाषा में अनुवाद 1792 ई. ‘सर विलियम जोंस’ के द्वारा किया गया।
- इसके सातवें सर्ग में राजा दुष्यंत, शकुंतला व इनके पुत्र ‘भरत’ के ‘हेमकूट पर्वत’ पर स्थित आश्रम में मिलन का सजीव चित्रण किया है – भारत के सबसे प्रतापी शासक – इन्हीं के नाम पर देश का नाम भारत पड़ा।
- विलियम जोंस ने ‘ऋतुसंहार’ का भी अंग्रेजी भाषा में अनुवाद किया।
- कुमारसंभवम् – हिमालय पर्वत का वर्णन इसमें 17 सर्ग हैं –
- इसमें भगवान शिव व माता पार्वती (गौरी) की प्रणय कथा है।
- इस प्रणय से उत्पन्न पुत्र (कार्तिकेय, स्कन्द) के जन्म का वर्णन मिलता है।
- रघुवंशम्- 19 सर्ग हैं – रघुवंश के कुल 40 (29 + मूलत: रघु, 11 अन्य) राजाओं का वर्णन हैं।
- राजा दिलीप, रघु, दशरथ, राम, कुश, अति …….. अग्निवर्ण तक का उल्लेख है।
- मेघदूतम्
- पूर्वमेघदूत
- (रामगिरी से अलकापुरी के रास्ते का विवरण)
- उत्तरमेघदूत
- ऋतुसंहार
- 6 सर्ग
- षड्ऋतु का वर्णन किया गया।
- कालीदास की प्रथम रचना मानी जाती है।
- ग्रीष्म, वर्षा, शरद्, शिशिर, हेमंत, वसंत।
Note: अलकापुरी के शासक ‘कुबेर’ द्वारा यक्ष को निष्कासित करने पर दक्षिणी विरह की कथा।
Note: चन्द्रगुप्त द्वितीय कालीदास को अपने राजदूत के रूप में कुंतल नरेश के दरबार में भेजा जहाँ कालीदास ने
- ‘कौन्तलेश्वरम् दौत्यम’ नामक ग्रंथ की रचना की।
- इसका उल्लेख क्षेमेन्द्र ने अपने ग्रंथ ‘वृहत्कथा मंजरी’ में किया है।
- कुछ इतिहासकारों के अनुसार ज्योतिष विद्या पर लिखा गया ग्रंथ कालामृतम भी कालिदास द्वारा रचित है।
- कालीदास की रचनाओं में हेमकूट, हिमालय व रामगिरी पर्वत का उल्लेख है।
विशाखदत्त:
- गुप्त राजवंश से संबंधित है।
- मुद्राराक्षस: नंदों व मौर्यों का उल्लेख।
- देवी चन्द्रगुप्तम्: रामगुप्त व ध्रुवस्वामिनी की कथा है।
- अमरसिंह: - चन्द्रगुप्त द्वितीय के नवरत्नों व ध्रुवस्वामिनी की कथा है।
- ग्रंथ: अमरकोश
- व्याकरण ग्रंथ
- संस्कृत का विश्वकोष
- गुप्तकालीन 12 प्रकार की भूमियों का वर्णन मिलता है।
- चन्द्रगोमिन:
- ग्रन्थ – चन्द्रव्याकरण
- गुप्तों को जर्ट (जाट) कहा गया।
- स्कन्दगुप्त के समय हूण आक्रमण का उल्लेख
- किरातार्जुनियम
- भगवान शिव द्वारा किरात के वेश में अर्जुन के साथ युद्ध का वर्णन।
- 1912 ई. में इस ग्रंथ का जर्मन अनुवाद ‘कार्ल कैप्पलर’ द्वारा।
- ग्रंथ: मृच्छकटिकम्
- (मिट्टी की गाड़ी)
- गुप्तकाल में जनसामान्य पर लिखा गया प्रथम ग्रंथ माना जाता है।
- दण्डी: - ग्रन्थ:-
- कुमारचरित
- काव्यादर्श
- विष्णु शर्मा: - पंचतंत्र – सर्वाधिक भाषाओं में अनुवादित ग्रंथ है।
- वत्सभट्टि: - रावणवध – ग्रंथ
- बुद्धघोष: - ग्रंथ – विशुद्धीमग्ग
- वात्स्यायन – कामसूत्र
- कामंदक: - नीतिसार
गुप्तकालीन विज्ञान:
- आर्यभट्ट: - खगोल शास्त्री, ज्योतिषाचार्य, गणितज्ञ
- इनका जन्म – 398 शक संवत में कुसुमपुर (बिहार) में हुआ था।
- आर्यभट्टीयम:- आर्यभट्टीयम में कुल 108 छन्द हैं साथ ही 4 पदों अथवा अध्याय में विभाजित है।
1. गणितपाद
2. काल क्रियापाद
3. गोलापाद
4. दशगतिका पाद
- आर्यभट्ट ने साबित किया कि पृथ्वी गोल है और वह अपनी धुरी पर घूर्णन करती है जिससे दिन-रात बनते हैं।
- आर्यभट्ट ने ही गृह नक्षत्रों व सूर्य ग्रहण, चन्द्रग्रहण की अवधारणा दी।
- इन्होंने ही दशमलव पद्धति (शून्य) की अवधारणा दी।
\(\pi\)(पाई) का मान \(\frac{22}{7}\) = 3.144 ……………….
- वर्ष का मान 365 दिन जो कि आज भी प्रामाणिक है।
- आर्यभट्ट चन्द्रगुप्त द्वितीय के नवरत्नों में शामिल नहीं थे।
Note: इन्होंने गणित को ज्योतिष से अलग किया ऐसा करने वाले प्रथम व्यक्ति थे।
- वराहमिहीर:- गणितज्ञ, ज्योतिषाचार्य वराहमिहीर चन्द्रगुप्त द्वितीय के नौ रत्नों में शामिल थे।
- इनका जन्म 505 ई. में उज्जैन के कायथा नामक ग्राम (मध्य प्रदेश) में हुआ था।
- इनके पिता का नाम आदित्य दास निषाद (शुद्र वर्ण के) था जो आर्यभट्ट से बेहद प्रभावी थे।
- वराहमिहीर, आर्यभट्ट से ‘कुसुमपुर’ में मिले तथा इन्होंने आर्यभट्ट के सिद्धान्तों का समर्थन किया।
- वराहमिहीर ने कहा कि ‘पृथ्वी गोल’ है।
- गृह-नक्षत्रों की अवधारणा का समर्थन किया-
- 12 राशियों की जानकारी दी।
- वर्गमूल व घनमूल निकालने का सूत्र दिया।
- वराह का ग्रंथ – पंचसिद्धांतिका:- पंचसिद्धांतिका में वराहमिहीर से पूर्व प्रचलित पाँच सिद्धान्तों का वर्णन है। यह सिद्धान्त निम्न हैं-
- पितामह
- सूर्य
- पॉलिश
- रोमक
- विशिष्ट
- अन्य ग्रंथ
- लघुजातक
- लघुविवाह पटल
- टिकनिक यात्रा
- वृहत संहिता
- वराहमिहीर प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने कहा कि पृथ्वी में कोई ऐसी शक्ति जो चीजों को अपनी ओर आकर्षित करता है।
Note: 800 ई. में आर्यभट्ट के ग्रंथ आर्य भट्टीयम् का अरबी भाषा में अनुवाद (800 ई.) ‘जीज-अल-बहर’ के नाम से – जार्ज बूलर के द्वारा किया गया।
- बह्मगुप्त:
- जन्म 598 ई. में – जालोर (भीनमाल) में माना जाता है।
- मृत्यु – 668 ई.
- पिता – जिष्णु
- ग्रंथ :
- ब्रह्मस्फुटसिद्धान्त (ब्रह्मसिद्धांतिका)
- खण्डखाद्यक
- ब्रह्मगुप्त प्रथम ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने गुरुत्वाकर्षण सिद्धान्त प्रतिपादित किया।
- अरबों के आक्रमण के समय ‘अरब आक्रांता मोहम्मद बिन कासिम’ इन दोनों ग्रंथों को अपने साथ- (अरब ले गया)
- जहाँ खलीफा मंसूर के समय इन दोनों ग्रंथों का अरबी भाषा में अनुवाद किया गया।
- ब्रह्मगुप्त के अन्य ग्रंथ।
- ब्रह्मफुटसिद्धान्त: सिंदाहिंद के नाम से।
- खण्डधारक: अल अकरंद के नाम से।
- वेदांग ज्योतिष टीका
- ध्यानग्रहोपदेश- ब्रह्मस्फूट सिद्धान्त का भाग माना जाता है।
- भास्कर प्रथम:
- यह आर्यभट्ट से प्रभावित थे।
- इनके ग्रंथ
- आर्यभट्टीयम भाष्य:
- संस्कृत भाषा में गणित व खगोल शास्त्र पर लिखा गया प्रथम ग्रंथ माना जाता है।
- लघुभास्कर्य
- महाभास्कर्य (वृहतभास्कर)
- अणु सिद्धान्त (परमाणु) प्रतिपादित करने वाले प्रथम व्यक्ति
- आयुर्वेद व चिकित्सा से संबंधित ग्रंथ:
- असंग – योगाचरभमिशास्त्र
- धनवंतरी- चन्द्रगुप्त II के नवरत्नों में शामिल थे लोग इन्हें ‘विष्णु का अवतार’ देवताओं के वैद्य कहते थे।
- ग्रंथ – आयुर्वेद संहिता
- महर्षिचरक: - चरक संहिता
- सुश्रुत: - सुश्रुत संहिता
- पालकाव्य: हस्तिआयुर्वेद: राजा रोमथार व महर्षि काव्य के बीच संवाद का वर्णन।
- शालीहौत्र: - अश्वलायन
- वागभट्ट:
- अष्टांग हृदय
- अष्टांग संगृह
- नागार्जुन: सोना, चाँदी, ताँबा, लोहा आदि में रोग प्रतिरोधक क्षमता पाई जाती है, इनकी भस्म से रोग निवारण किया।
- ग्रंथ – रसचिकित्सा सिद्धांत
- पारे की खोज
- अन्य ग्रंथ : लोहाशास्त्र, रसरत्नाकर, आरोग्यमंजरी
- दर्शन से संबंधित ग्रंथ:
- महर्षि कणाद:
- वैशेषिक दर्शन
- अणुसिद्धांत