आमेर राज्य का इतिहास
- कच्छवाह भगवान राम के ज्येष्ठ पुत्र कुश के वंशधर है।
- सुर्यमल्ल मिश्रण के अनुसार ये कूर्मवंशीय कहलायें।
• तेजकरण-
- तेजकरण या दुल्हेराय इस वंश का संस्थापक था। इसने कच्छवाह वंश की कुल देवी जमवाय माता का मंदिर व रामगढ़ दुर्ग बनवाया ।
- कच्छवाहों की प्रारम्भिक राजधानी – दौसा
- कच्छवाहों की दूसरी राजधानी – जमवारामगढ़
- ढुढाड़ का पुष्कर – रामगढ़
- कोकिल देव ने अम्बावती (आमेर) नगर बसाया।
• राजदेव/रामदेव-
- आमेर किले में 1237 ई. में सबसे पुराने महल ‘कदमी महल’ में आमेर के शासको का राजतिलक होता था।
• पृथ्वीराज कच्छवाह-
- इनका विवाह बीकानेर के राव लूणकरण की पुत्री बालाबाई से हुआ। बालाबाई व पृथ्वीराज कच्छवाह का गुरू- संत कृष्णदास पयहारी।
- कृष्णदास पयहारी ने शास्त्रार्थ में कपालिक सम्प्रदाय के गुरु चतुरनाथ को हराकर गलताजी जयपुर में रामानुज सम्प्रदाय की पीठ स्थापित की।
- पृथ्वीराज ने आमेर में लक्ष्मीनारायण मंदिर बनवाया
- इसने आमेर को 12 भागों में बाटकर अपने पुत्रों को दिया जिससे आमेर 12 कोटड़ी रियासत कहलाया।
- पृथ्वीराज कच्छवाह खानवा युद्ध में सांगा की तरफ से वीरगति को प्राप्त हुआ।,
• रतनसिंह कच्छवाह-
- 1544 ई. में शेरशाह सुरी की अधीनता स्वीकार की यह आमेर का प्रथम शासक था जिसने मुसलमानों की दिल्ली साम्राज्य की अधीनता स्वीकार की।
- इसके चाचा सांगा ने ‘सांगानेर कस्बा’ बसाया जो ब्लू पॉटरी के लिए प्रसिद्ध है।
• भारमल-
- मुगलों से वैवाहिक सम्बन्ध व उनकी अधीनता स्वीकार करने वाला राजस्थान का प्रथम शासक भारमल था।
- भारमल 1556 में मजनू खां की सहायता से पहली बार दिल्ली जाकर अकबर से मिला।
- अकबर व हरखा बाई का विवाह 1562 में सांभर में हुआ।
- अकबर ने भारमल को ‘अमीर उल उमरा’ की उपाधि दी।
- भारमल ने ‘लवाण’ कस्बा बसाया।
• भगवन्त दास (1573-1589)
- इसने अपनी पुत्री मानबाई का विवाह जहांगीर से करवाया जिसे जहांगीर ने सुल्तान निशा की उपाधि दी।
- अकबर ने भगवन्तदास को सुबेदार के साथ-साथ सिपहसालार का पद भी प्रदान किया गया। यह दोनों पद प्रथम बार किसी एक ही व्यक्ति को प्रदान किया जो गौरव की बात है।
• ‘फर्जन्द’ राजा मानसिंह प्रथम (1589-1614)
- अकबर ने इसे फर्जन्द (दत्तक पुत्र) की उपाधि दी।
- मानसिंह ने मुगल बादशाहा अकबर व जहांगीर के साथ कार्य किया।
- मानसिंह राणा प्रताप को समझाने के लिए भेजे जाने वाले दूसरे व्यक्ति थे।
- हल्दीघाटी युद्ध में मानसिंह मुगल सेना का मुख्य सेनापति था।
- मानसिंह के छोटे भाई माधोसिंह ने अलवर का दौसा के बीच 1631 ई. में ‘भानगढ’ नगर बसाया।
- मानसिंह को 3 बार बंगाल की सुबेदारी मिली।
• निर्माण स्थापत्य व साहित्य-
- मानसिंह ने जैस्सोर से शिलादेवी की मूर्ति लाकर आमेर में ईष्टदेवी का मंदिर आमेर में बनवाया।
- इनकी रानी कनकावति ने अपने पुत्र जगतसिंह की याद में जगतिशिरोमणी मंदिर का निर्माण करवाया। जिसे मीरा मंदिर भी कहते है।
- इसने भवानी शंकर मंदिर- पटना (बिहार), राधा गोविन्द मंदिर – वृंदाव, महादेव मंदिर- गया (बिहार) आदि मंदिरों का निर्माण करवाया।
- आमेर में स्थापत्य कला का स्वर्णकाल – मानसिंह प्रथम
- जमवारामगढ़ प्रशस्ति में मानसिंह को आमेर का प्रथम दत्तक पुत्र कहा है।
- प्रमुख रचानाएं
मान प्रकाश – मुरारीदान
मानसिंह कीर्ति मुक्तावली – जगन्नाथ
पत्र प्रशस्ति- दलपतराज
पवन पश्चिम - दलपतराज
• ‘मिर्जा राजा’ जयसिंह (1621-1667)
- इसने सबसे लम्बे समय तक आमेर पर राज किया। (46 वर्ष)
- इसने तीन मुगल बादशाहों- जहांगीर, शाहजहां, व औरंगजेब की सेवा की।
- शाहजहां ने कंधार अभियान 1637 ई. में 1637 ई. के समय जयसिंह को ‘मिर्जा राजा’ की उपाधि दी।
- उत्तराधिकारी संघर्ष में मिर्जा जयसिंह ने पहले दाराशिकोह व बाद में औरंगजेब का साथ दिया।
- जयसिंह ने शिवाजी को पुरन्दर की संधि करने पर विवश किया। बर्नियर जयसिंह के दरबार में भी रहा, जो पुरन्दर की संन्धि का साक्षी था।
- जयसिंह ने जयसिंह पुरा कस्बा, शीशमहल, दिवाने आम, दिवाने खास, दिले आराम बाग का निर्माण करवाया।
- मिर्जा जयसिंह के समय कवि बिहारीमल ने ‘बिहारी सतसई’ की रचना की।
• सवाई जयसिंह:-
- सवाई जयसिंह राजस्थान का अंतिम शासक था जिसने अश्वमेद्य यज्ञ का आयोजन करवाया।
- सवाई जयसिंह ने खगोलिय गणना पर 2 किताबे- ‘जयसिंह कारिका’ व जीज ए मुहम्मदशाही की रचना की।
- सवाई जयसिंह ने नाहरगढ़,जलमहल, चन्द्रमहल सिसोदिया रानी का महल का निर्माण करवाया।
- राजस्थान में गौडीय सम्प्रदाय की प्रधानपीठ- गोविन्द देव जी का मंदिर का निर्माण सवाई जयसिंह ने करवाया।
- जयसिंह –II ने जयनगर/जयपुर की स्थापना कर अपनी राजधानी बनायी।
- जयपुर को एडवर्ड पंचम ने गोल्डन बर्ड, स्टेनले रीड ने पींक सिटी तथा सी.वी. रमन ने रंग श्री द्वीप की उपमा दी।
- सवाई जयसिंह ने दिल्ली, जयपुर, मथुरा, उज्जैन बनारस में पाँच वैद्यशालाओं का निर्माण करवाया।
- जयपुर की जंतर-मंतर भारत की सबसे बड़ी है जिसे 2010 में UNESCO ने विश्व विरासत सुची में शामिल किया।
- सवाई जयसिंह ने साहित्यकारों के लिए ‘ब्रह्मपुरी’ की स्थापना की।
- मथुरा में सन्यासियों के लिए ‘वैराग्यपुरा’ नामक बस्ती बसायी।
- जयसिंह ने मोहम्मद शाह रंगीला से जजिया कर समाप्त करवाया। (1720)
- गया में तीर्थकर (1728) एवं इलाहाबाद सुबे में गंगा स्नान पर आने वाले यात्रियों का कर समाप्त करवाया।
• सवाई ईश्वरी सिंह (1743-1750)
- राजपुताने का एकमात्र शासक जिसने मराठो के दबाव में आत्महत्या की।
- सवाई माधोंसिंह व सवाई ईश्वरी सिंह के मध्य उत्तराधिकारी युद्ध हुआ।
- सवाई ईश्वरी सिंह (राजमहल का युद्ध 1 मार्च, 1747) सवाई माधोसिंह
विजय – सवाई ईश्वरी सिंह
- युद्ध में विजयोपरान्त ईश्वरी सिंह ने त्रिपोलिया बाजार में ईसरलाट या सरगासुली का निर्माण करवाया।
• सवाई माधासिंह प्रथम (1750-1768)
- मल्हार राव होल्कर व जयप्पा सिंधिया ने 2 जनवरी,1751 को जयपुर का शासक माधोसिंह केा बनाया।
- रणथम्भौर दुर्ग को लेकर सवाई माधोसिंह प्रथम व कोटा के महाराव शत्रुशाल के बीच भटवाडा का युद्ध (30 नवम्बर,1761) हुआ जिसमें शत्रुशाल विजयी हुआ। जालिम सिंह का उदय इसी युद्ध में हुआ।
- सवाई माधोसिंह प्रथम ने 1763 में सवाई माधोपुर शहर बसाया।
- निर्माण कार्य – शील की डुंगरी, चाकसु में शीतला माता मंदिर
• ‘ब्रजनिधि’ सवाई प्रताप सिंह (1778-1803)
- प्रतापसिंह गोविन्द देव जी को जयपुर का वास्तविक शासक एव स्वयं को उनका दीवान मानता था। इनके आदेशें का आरम्भ ‘श्री दीवान बचनात’ शब्दों से होता था।
- सवाई प्रतापिसंह ने तुंगा के युद्ध (28 जूलाई, 1787) में मराठा महादजी सिंधिया को पराजित किया।
- महादजी सिंधिया ने डी-बोई को सेनापति बनाकर पाटन के युद्ध (20 जून, 1790) में सवाई प्रताप सिंह को पराजित किया।
- प्रतापसिंह ब्रजनीधि नाम से कविता लिखता था। इन्होंने ‘ब्रजनीध ग्रंथावली’ प्रताप चंद्रिका ब्रज श्रृंगार ग्रन्थों की रचना की।
- प्रतापिसंह के दरबार में बाईस विद्वानों की ‘गंधर्व बाईसी’ थी। जिसका प्रधान ‘चांद खां’ था।
प्रताप सिंह का संगीत गुरु – चांद खा
प्रताप सिंह का काव्य गुरु – गणपति भारति
- चांद खां को प्रकाशिसंह (प्रतापसिंह का दरबारी) न बुद्ध प्रकाश की उपाधि दी।
- सवाई प्रतापसिंह ने 1799 ई. में हवामहल का निर्माण करवाया हवामहल का वास्तुकार- लालचंद
• सवाई जगतसिंह- II (1803-1818)
- जयपुर का बदनाम शासक
- अप्रैल 1818 में जगतिसंह ने ईस्ट इंडिया कम्पनी से संधि की।
- जगतसिंह का सम्बन्ध ‘रसकपुर’ नामक वैश्या के साथ था जिसको आधा राज्य दिया व सिक्कों पर उसका नाम लिखवाया।
- गिगौली का युद्ध, परबतस नागौर 12 मार्च 1807
- मेवाड़ की राजकुमारी कृष्णा कुमारी के विवाह के लिए जयपुर के जगत संह व जोधपुर के महाराजा मानसिंह के मध्य लड़ा गया।
- अमीर खा पिण्डारी की सहायता से जगतसिंह-II विजय रहा।
• सवाई रामसिंह द्वितीय (1835-1880)
- पॉलिटकल एजेन्ट जॉन लुडलो ने सति प्रथा, समाधि प्रथा, दास प्रथा, कन्या वध पर रोक लगायी।
- रामसिंह-II ने रामप्रकाश थियेटर,अल्बर्ट हॉल, मौन मंदिर आदि का निर्माण करवाया।
- रामसिंह – II का काल ‘संस्कृत भाषा की रचनाओं’ एवं ‘ब्लू पॉटरी’ का स्वर्णकाल कहलाता है।
- रामसिंह ने झाडशाही सिक्के (वजन 167 ½ ग्रेन) चलाये।
- प्रिंस ऑफ वेल्स के आगमन पर 1868 ई. में जयपुर को गेरूए रंग से रंगवाया।
• ‘बब्बर शेर’ सवाई माधोसिंह- द्वितीय (1880-1922)
- ब्रिटिश सम्राट एडवर्ड सत्पम् के राज्यभिषेक में इग्लैण्ड गये साथ में गंगाजल के दो चाँदी के जार लेकर गये।
- ये संसार के सबसे बडे चांदी के पात्र हो है जो वर्तमान में सिटी पैलेस में है।
- सवाई माधोसिंह-II ने हिन्दू,मुस्लिम ईसाई शैली में ‘मुबारक महल’ बनवाया।
- माधोसिंह ने अपनी 9 पासवानों के लिए नाहरगढ़ में एक जैसे 9 महल बनवाये, जिसे माधवेन्द्र भवन कहते है।
• सवाई मानसिंह द्वितीय - (1922-1956)
- इनके प्रधानमंत्री मिर्जा इस्माइल को आधुनिक जयपुर का निर्माता कहते है।
- मानसिंह द्वितीय के समय जयपुर में पहली बार विद्युत सेवा शुरु क एंव जयपुर मे पंचायती कानुन बने।
- वृहद राजस्थान निर्माण के समय आजीवन राजप्रमुख बने।
- राजप्रमुख का पद 1 नवम्बर, 1956 को समाप्त हुआ।