भारतीय कृषि:-

1. विशेषता कृषि गणना

2. कृषि के प्रकार

3. कृषि वित्त- सब्सिडी मुद्दे

4. हरित क्रांति

5. विपणन

6. विपणन

7. योजनाएँ

विशेषता:-         

1. कृषि की मानसून पर निर्भरता तथा मानसून की अनिश्चिता के

    कारण मानसून का जुआ

2. कृषि जोतों का छोटा व अनार्थिक आकार औसत- 1.08 हैक्टेयर

3. उत्पादन की पुरानी तथा निम्न तकनीक

4. व्यावसायिक फसलों की बजाय खाद्यान्न फसलों का ज्यादा

    उत्पादन

- प्रति श्रमिक उत्पादकता में कमी- आय कम- जीवन स्तर कम-

  कृषि से पलायन

कृषि में क्षेत्रीय विभिन्न्ता

  उत्पादन ज्यादा- हरियाणा, प. उत्तर प्रदेश,

  उत्पादन कम- बंगाल, उड़ीसा, बिहार

- सिंचाई हेतु प्रमुख स्त्रोत कुँए तथा नलकूप

- सम्पूर्ण देश को 185 जलवायु क्षेत्रों में विभाजित किया गया है

- कृषि के ऋणग्रस्तता के कारण, किसानों के आत्महत्या करने की ,

   प्रवृत्ति

- विपणन तथा प्रसंस्करण की सही व्यवस्था नहीं होना

कृषि का योगदान

1 राष्ट्रीय आय में कृषि का योगदान

  1950-51 – 53%

  2018-19 – 17.1%

  2019-20 – 16.5%

2 रोजगार उपलब्धता में कृषि का योगदान

1950-51 में कुल रोजगार का 69.5% हिस्सा कृषि क्षेत्र से

वर्तमान

में 48.9% रोजगार कृषि क्षेत्र से उपलब्ध होते है।

3 बढ़ती जनसंख्या के लिए खाद्याान्न आपूर्ति

   2004-05 खाद्यान्न माँग – 207 M.T

   2011-12 खाद्यान्न माँग – 235 M.T

   2020-21 खाद्यान्न माँग – 200 M.T

4 पूँजी निर्माण में सहयोग

5 औद्योगिक विकास के लिए कृषि का महत्त्व (जूट, चीनी, सूतीवस्त्र

    उद्योग)

- औद्योगिक श्रमिकों के लिए खाद्यान्न की उपलब्धता

- ग्रामीण क्षेत्रों की माँग के कारण विनिर्माण क्षेत्र में वृद्धि

- कुटीर तथा ग्रामोद्योग की कृषि पर निर्भरता

अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में कृषि का योगदान

11.7% हिस्सा कृषि क्षेत्र  चाय, पटसन, काजू, तम्बाकू, सूतीवस्त्र

  चावल आदि का निर्यात

गरीबी निवारण भूमिका

- सस्ती दरों पर अनाज की उपलब्धता

- अकुशल लोगों को श्रय

 कृषि के प्रकार

1. फसल चक्र के आधार पर:- रबी, खरीफ, जायद

2. उपयोग के आधार पर:- खाद्यान्न फसल, व्यापारिक फसल

3. प्रक्रिया के आधार पर:- सीढ़ीदार, झूमिंग, समोच्य रेखीय तर रिले

रबी फसल- अक्टूबर/नवम्बर से मार्च अप्रेल

   प्रमुख फसल- गेहूँ, जौ, मटर, मसूर, सरसों, अलसी, तारामीरा,

   सूरजमूखी, धनिया, जीरा मैथी

   खरीफ की फसल- जून/जुलाई से मार्च अप्रेल

   प्रमुख फसल- चावल, बाजरा, मूँग, मोठ, ज्वार, ग्वार, मूंगफली,

   अरण्डी, गन्ना कपास तिल, सोयाबिन

   जायद की फसल (मार्च- जून)

   प्रमुख फसल- तरीया, खीरा, ककड़ी, तरबूज,सब्जियाँ, खरबूजा

   उपयोग के आधार पर- खाद्यान्न फसलें, व्यापारिक फसलें

   खाद्यान्न फसलें:- अनाज, दलहन

   अनाज- गेहूँ, चावल, जौ, बाजरा, मक्का, ज्वार, रागी

   दलहन- मूंग, मोठख् चवला, अरहर

   व्यापारिक फसलें:- तिहन, रेशदार, मसाला, अन्य फसले

   तिलहन- तिल, मूंगफली, सोयाबीन, अलसी, अरण्डी, तारामीरा,

   सूरजमूखी,

   रेशेदार- कपास, पटसन/जूट

   मसाला- सौंफ, अदरक, मिर्च, धनिया, हल्दी

   अन्य फसल- गन्ना, ग्वार, गुलाब

फसल चक्र के आधार पर:-रबी, खरीफ, जायद

फसल उपयोग के आधार पर:-खाद्यान्न फसल, व्यापारिक फसल

प्रकिया के आधार पर:- शुष्क कृषि, तर कृषि, झूमिंग कृषि, समोच्य रेखीय, सीढ़ीदार कृषि, रिले क्रॉपिंग, विस्तृत कृषि, गहन कृषि, जैविक कृषि

शुष्क कृषि- उन फसलों का उत्पादन करना जिनके लिए जल की आवश्यकता कम होती है जैसे बाजरा।

तर कृषि- जल की अधिक उपलब्धता वाले क्षेत्रों में उन फसलों का उत्पादन करना जिन्हें जल की अधिक आवश्यकता होती है जैसे चावल, जूट

मिश्रित कृषि (Mixed Agriculture):-

शुष्क तथा अर्द्धशुष्क क्षेत्रों में कृषि आय को बढ़ाने के लिए कृषि के साथ-साथ पशुपालन के कार्य भी किए जाते हैं, अर्थात् जब कृषि तथा पशुपालन एक साथ किए जाए मिश्रित कृषि कहलाती है।

सीढ़ीदार कृषि (Strip agriculture)

पहाड़ी ढ़लान के विपरीत दिशा में मिट्‌टी के कटाव को रोकने के लिए सीढी़दार आकृति बनाकर कृषि कार्य करना।

समोच्चय रेखीय कृषि (Counter Framing):- पहाड़ी ढ़लान के विपरीत दिशा में मिट्टी के कटाव को रोकने के लिए समान उँचाई पर पेड़ों की कतार लगाकर किए जाने वाले कृषि कार्य

गहन कृषि:- भूमि उपलब्धता कम एवं जन आधिक्य

छोटी कृषि जोतों पर अधिक मानवीय श्रम की सहायता से किए जाने वाले कृषि कार्य

विस्तृत कृषि:- भूमि की अधिक उपलब्धता एवं जनसंख्या कम

बड़े-बड़े कृषि फार्मों पर अधिक मशीनीकरण की सहायता से किए जाने वाले कृषि कार्य

झूमिंग/स्थानान्त्तरित कृषि (slash and bran agri):- आदिवासी क्षेत्रों में जंगलों को जलाकर या काटकर प्राप्त किए गए कृषि क्षेत्रों को बदल-बदल कर किए जाने वाले कृषि कार्य

रिले क्रॉपिंग:- कृषि क्षेत्रों पर 1 वर्ष में एक साथ 3-4 फसलों के उत्पादन के कार्य रिलें क्रॉपिंग कहलाते हैं।

ट्रक फार्मिंग:- फार्म- परिवहन- बाजार

फल तथा सब्जियों के उत्पादन में परिवहन साधनों का अधिक महत्त्व होता है अत: इस प्रकार उत्पादन कार्यों को ट्रक फार्मिंग कहा जाता है।

संविदा कृषि (Contract farming):-

किसान/उत्पादक- उत्पादन की अनिश्चितता, विपणन व्यवस्था का अभाव, निवेश की कमी, आय स्तर कम, श्रहबों से ग्रसित, मूल्यों की अनिश्चितता

कम्पनी- खरीद आवश्यकता के अनुसार- किसान तथा कृषि उत्पादों की खरीद करने वाली कम्पनी के मध्य हुए निर्धारित समझोते के अनुसानर किसानों द्वारा अपनी भूमि पर कम्पनी की मांग के अनुसार किए जाने वाले कृषि कार्य संविदा कृषि कहलाते हैं।

जैविक कृषि (organic agri) zero budget natural farming

 लागत (input):- भूमि, सिंचाई, बीज, उर्वरक, कीटनाशक, श्रम

कृषि:- श्रदण ग्रस्त, लवणीकरण, रेह, बंजर

उत्पाद(output):- आयकम, स्वास्थ्य के लिए हानिकारक, वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा लायक नहीं

जैविक खेती/organic farming:-दीर्घकालीन व स्थिर उपज प्राप्त करने के लिए हाइब्रिड बीज, रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक, खरपतवार नाशी, आदि का उपयोग ना करते हुए, जैविक खाद, कम्पोस्ट या हरित खाद का प्रयोग करके किए जाने वाले कृषि कार्य जैविक खेती/zero budget natural farmimng.

लाभ:-

1. किसान की लागत में कमी

2. भूमि की उर्वरा शक्ति में वृद्धि- दीर्घकालीन कृषि

3. सिंचाई की कम आवश्यकता

4. बाजार माँग- किसान आय में वृद्धि

5. स्वास्थ्यवर्धक व पोषक तत्वों की उपलब्धता के कारण पोषण-

   सुरक्षा प्राप्त होती हैं।

मिट्टी:-

- मिट्‌टी की उर्वरता में वृद्धि

- मिट्‌टी की जलधारण करने की क्षमता में वृद्धि

  पर्यावरण:-

- भू-जल स्तर मे वृद्धि

- जल प्रदुषण में कमी

विदेशी उत्पादों से प्रतिस्पर्द्धा में वृद्धि अत: निया्रत वृद्धि

- जनवरी-2016 में सिक्किम राज्य को पूर्ण जैविक राज्य का दर्जा

संगठन- एपीडा (कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात प्राधिकरण) स्थापना-1985, वाणिज्य व उद्योग मंत्रालय के अधीन

कार्य- कृषि उत्पादों के निर्यात को बढ़ाना

प्रमुख फसल उत्पादन संभावना में वृद्धि करना कृषि प्रसंस्करण को बढ़ाना

योजना

परम्परागत कृषि विकास योजना-2015-16

उद्देश्य-

10000 जैविक खेती समूह (कल्स्टर) का विकास करना

5 लाख एकड़ भूमि पर जैविक खेती

दीर्घकालीन व सतत खेती का विकास

किसानों की आय में वृद्धि

भागीदारी- केंन्द्र 60%, राज्य 40%

योजना

कलस्टर आधारित योजना- 50 एकड़ या 20 हेक्टेयर, 50 या ज्यादा किसान

10000 कलस्टर

किसानों को प्रति एकड़ 20 हजार की सहायता

फलदार पौधे खरीद

परम्परागत बीज खरीद

कृषि विपणन सुविधा

कृषि वित्त:-

1. उपयोग के आधार पर

2. समयावधि के आधार पर

3. स्त्रोत के आधार पर

1. उपयोग के आधार पर-

कृषि कार्यों हेतु- बीज, उर्वरक, ट्रेक्टर, जमीन

किसान की दैनिक जीवन हेतु- सामाजिक कार्यो शादी-समारोह

2. समायावधि कि आधार- अल्पकालीन (15 महीने तक), मध्यकालीन(15 महीने से 5 वर्ष), दीर्घकालीन (5 वर्ष से अधिक)

3. स्त्रोत के आधार पर-

गैर संस्थागत (72%)- सेठ-साहुकार, मित्र-साहुकार, आढतिये/बिचौलिए

संस्थागत(28%)- व्यापारिक/वाणिज्यिक बैंक(75%), क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक (12.2%), सहकारी बैंक (12.8%)

संस्थागत ऋण:-

1. व्यापारिक बैंक

2. सहकारी बैंक

3. क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक

नाबार्ड (12 जुलाई 1982) क्षेत्र-कृषि, पुर्नवित्त बैंक

शेयरधारिता- भारत सरकार (99%), रिजर्व बैंक (1%)

नाबार्ड द्वारा सीधे किसानों को ऋण सुविधा उपलब्ध नहीं कराई जाती है।

प्रयास:-

1969 में 14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण

1969 लीड बैंक योजना- जिला स्तर पर विकास कार्यो का संचालन

2 oct 1975- क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की स्थापना बजटीय प्रावधान- 15 हजार करोड़ ऋण सुविधा

1960-61 (गहन कृषि कार्यक्रम)एव

हरित क्रांति (1966-67)

हरित क्रांति के जनक- नॉरमन ई बोरलॉग (1970 का नोबेल पुरस्कार)

भारत में हरित क्रांति के जनक- एम.एस.स्वामीनाथन

हरित क्रांति संज्ञा- विलियम गौड़

हरित क्रांति की परिभाषा:- उन्नत बीज, रासायनिक उर्वरक, कीटनाशी खरपतवार नाशी सिंचाई व मशीनीकरण के उपयोग से कृषि उत्पादन में वृद्धि की प्रक्रिया हरित क्रांति कहलाती है।

प्रभावित फसलें- गेहूँ, चावल

लाभांवित क्षेत्र- पंजाब, हरियाणा, पं. उत्तर प्रदेश

कारक- उच्च् गुणवत्ता वाले बीज, रासायनिक उर्वरक, पूँजी, सिंचाई, मशीनीकरण

प्रभाव

सकारात्मक प्रभाव-

खाद्य सुरक्षा की उपलब्धता

राष्ट्रीय आय में वृद्धि

खाद्यान्न में आत्मनिर्भरता

किसानों के जीवन में सुधार

रोजगार में कृषि

कच्चे माल की उपलब्श्धता के कारण कृषि आधारित उद्योग में वृद्धि

नकारात्मक प्रभाव-

केवल गेहूँ तथा चावल फसलें लाभांवित अनय पर नकारात्मक प्रभाव

केवल बड़े किसानों द्वारा रहित क्रांति के लाभों की प्राप्ति, अर्थात् कृषि में क्षेत्रीय विषमता बढ़ी

किसान की लागत में वृद्धि, जिससे किसानों की ऋण ग्रस्तता में वृद्धि

अधिक रासायनिक अर्वरक उपयोग से भूमि बंजर हो रही है।

सिंचाई हेतु जल की अधिक मांग

भूजल स्तर में गिरावट

जलप्रदुषण की समस्या

कृषि व्यवसायीकरण के कारण मूल्यों में गिरावट

अन्य क्रांति

नीली क्रांति – मछली

गोल क्रांति – आलू

रजत क्रांति – अण्डा

मूक क्रांति – सरसों

पीली क्रांति – दुग्ध

बादामी क्रांति – मसाला

लाल क्रांति – टमाटर/मांस

भूरी क्रांति – उर्वरक

कृष्ण् क्रांति – पेट्रोलियम

गुलाबी क्रांति – झींगा

 परभनी क्रांति – भिण्डी

सुनहरी क्रांति – बागवानी

द्वितीय हरित क्रांति (एवर ग्रीन रिवोल्यूशन) 2006

प्रणेता- एम.एस.स्वामीनाथन, ए.पी.जे अब्दुल कलाम

उद्देश्य-

लैण्ड-टु लेब एप्रोच

कृषि में वित्तिय सुविधा उपलब्ध कराना

जैविक खेती का विकास

पर्यावरण तथा जलसंसाधनों का संरक्षण

नियत समय में कृषि उत्पादन को दुगुना करना

कृषि विपणन(Agriculture marketing)

स्थिति

दोष

उपाय- संस्थागत, योजनागत

स्थिति-

गाँव के महाजन या व्यापारी को बिक्री

ग्रामीण हाट में बिक्री

सहकारी समितियों के माध्यम से बिक्री

विपणन में दोष

दोष पूर्ण संग्रहण प्रणाली

श्रैणी विभाजन का अभाव व दड़ा प्रणाली

अल्प विकसित परिवहन अवसंरचना

मध्यस्थों की अधिक संख्या में उपलब्धता

 विपणन हेतु वित्त का अभाव

कृषि मूल्य तथा सूचनाओं का अनाज

विपरीत परिस्थिति में विपणन

कृषि विपणन मे सुधार हेतु उपाय

नियमित कृषि मण्डियपों की स्थापना

कृषि में श्रेणी विभाजन तथा मानकीकरण

1937- कृषि विपणन निदेशालय एवं एगमार्क चिन्ह जारी

मानक मापतौल की प्रणाली

1958 से मिट्रिक प्रणाली स्वीकार 1962 से सम्पूर्ण देश में लागू

संग्रहण के लिए गोदामों की स्थापना

केन्द्रीय भण्डारण निगम-1957 त्रिस्तरीय- केन्द्र, राज्य, ग्रामीण

सरकारी खरीद तथा न्यूनतम समर्थन मूल्य MSP-23

F.C.I भारतीय खाद्य निगम- 1965

सहकारी क्षेत्र में विपणन प्रोत्साहन हेतु नेफेड व ट्राइफेड की स्थापना

नेफेड- नेशनल एग्रीकन्ल्चर कॉपरेटिव मार्केटिंग फेडरेशन

स्थापना- 2 अक्टूबर 1958

शीर्ष सहकारी (कृषि) विपणन संगठन

कार्य-

कृषि उत्पादों की खरीद

कृषि बागवानी व वन उपजों का विपणन भण्डारण व प्रसंस्करण

कृषि में मशीनों की उपलब्धता

ट्राइफेड- ट्राइबल कॉपरेटिव मार्केटिंग डवलपमेंट फेडरेशन ऑफ इण्डिया लिमिटेड

स्थापना- 1987

मुख्यालय- नई दिल्ली

कार्य- आदिवासी उपजों का विपणन भण्डारण व प्रसंस्करण करने हेतु नॉडल एजेन्सी

आदिवासी उपजों सही मूल्य उपलब्ध करवाना

आदि महोत्सव

चावल एवं गेहूँ की खरीद – F.C.I के एजेण्ट के रूप में कार्य

मोटा अनाज एवं वन उपज- कृषि वह सहकारिता विभाग नेफेड

APMC Act 2003 कृषि उत्पाद विपणन समिति अधिनियम 2003

राज्यो को अपने-अपने मण्उी एक्ट बदलाव

उद्देश्य-

सक्षम व प्रभावी विपणन व्यवस्था के विकास को सुनिश्चित करना

कृषि प्रसंस्करण के साथ-साथ कृषि निर्यात में वृद्धि

प्रभावी विपणन अवसंरचना का विकास

कृषि वस्तुओं का विपणन राज्यों द्वारा अधिनियमित मण्उरी एक्ट के अनुसार

प्रथम बिक्री कृशि मण्डियों में ही

 

मॉडल APLM Act 2017-

एकल मण्डरी शुल्क द्वारा अन्तर्राजयीय व्यापार की छूट

कृषि उत्पादों में ई-ट्रेडिंग को प्रोत्साहन

राज्य किसी कृषि बाजार को राष्ट्रीय महत्त्व का कृषि बाजार घोषित कर सकते है।

कृषि उत्पाद विपणान पर अधिरोपित शुल्क की अधिकतम सीमा का निर्धारण खाद्यान्न-1%, फल/सब्जी-2%

व्यापारियों तथा नए अभिकर्ता को लाइसेनस जारी करने की शकति कृ
षि विपणन निदेशक कार्यालय को।

E-NAM राष्ट्रीय कृषि बाजार

शुरूआत- 14 अप्रेल 2016 को प्रारम्भ

वर्तमान में 1000 कृषि मण्डियों को ई-नाम प्लेटफार्म पर जोउ़ा गया

E-NAM की टैग लाइन- उत्तम फसल उत्तम ईनाम

NAM- एक राज्य एक बाजार की अवधारणा की बदलकर एक देश एक बाजार की अवधारणा

E-NAM पोर्टल- व्यापारी, बाजार, किसान

उद्देश्य-

किसानों के विक्रय तथा बाजार पहुँच हेतु विकल्प उपलब्ध कराना

लाइसेंस प्रणाली के आसान बनाना तथा व्यापारी को एकल लाइसेंस के माध्यम से सम्पूर्ण देश में व्यापार करने की छूट प्रदान करना

किसानों को सुसंगत मूल्य उपलब्ध कराना

E-NAM की विशेषता-

अखिल भारतीय इले. ट्रेडिंग पॉर्टल

एकीकृत कृषि बाजार जिसमें APM व अन्य कृषि बाजारों को जोड़ा जाएग

SAFC स्मॉल फारमर्स एग्री कंर्सोटियम का E-NAM संचालन की एजेन्सी नियुक्त किया गया है।

केन्द्र सरकार द्वारा राज्यों को निशुल्क सॉफ्टवेयर उपलब्धता

कृषि निर्यातक, कृषि प्रोसेसर, व थोक विक्रेता को मण्डी में भाग लेने हेतु सक्षम बनाया गया है।