राष्ट्रीय अखंडता तथा सुरक्षा के मुद्दे एवं सामाजिक तथा राजनीतिक संघर्ष
पृष्ठभूमि
- भारत एक विविधता मूलक देश है जहाँ पर अनेक धर्म, जाति, भाषा, संस्कृति आदि के लोग निवास करते हैं। राष्ट्रीय अखण्डता से अभिप्राय इस विविधता को समाप्त करना नहीं अपितु विविधता में एकरूपता को कायम करना है। अर्थात् विविधता में एकता की स्थापना ही राष्ट्रीय अखण्डता कहलाती है।
- जब देश आजाद हुआ था तो उस वक्त प्रबुद्ध समझे जाने वाले कई लोगों ने यह घोषणा की थी कि विविधताओं के इस देश का बिखरना तय है। सीधे तौर पर देखें तो आज उनकी बात असत्य मालूम पड़ती है।
परिभाषा
- राष्ट्रीय एकता का मतलब ही होता है, राष्ट्र के सब घटकों में भिन्न-भिन्न विचारों और विभिन्न आस्थाओं के होते हुए भी आपसी प्रेम, एकता और भाईचारे का बना रहना। राष्ट्रीय एकता में केवल शारीरिक समीपता ही महत्वपूर्ण नहीं होती बल्कि उसमें मानसिक,बौद्धिक, वैचारिक और भावात्मक निकटता की समानता भी आवश्यक है।
राष्ट्रीय अखण्डता के लाभ
- लोगों में मनोवैज्ञानिक तथा प्रशासनिक एकरूपता का निर्माण होता है।
- लोगों में परस्पर तनाव दूर होते हैं।
- साम्प्रदायिक एकता का निर्माण होता है।
- यह लोकतंत्र के संरक्षणके लिए आवश्यक होती है।
- प्रस्तावना तथा मूल कर्त्तव्य में राष्ट्रीय अखण्डता के लिए स्थान प्रदान किया गया है जिसे सार्थक बनाने के लिए राष्ट्रीय अखण्डता की आवश्यकता है।
राष्ट्रीय अखण्डता के समक्ष चुनौतियाँ
- भारत का बहुधर्मीय, बहुभाषीय, बहुक्षेत्रीय देश होना।
- भारत का विशाल आकार तथा जनसंख्या काहोना है।
- सामाजिक तथा राजनीतिक संघर्ष के क्षेत्र में हर उस तत्व को सम्मिलित किया जाता है जो कि भारत के विकास में बाधक हो।
- क्षेत्रीयतावाद की भावना का होना जैसे–
1. महाराष्ट्र में भूमि पुत्र आन्दोलन
2. तमिलनाडु में D.M.K. केद्रविडांचल की मांग
3. पंजाब में खालिस्तान की माँग
4. हुर्रियत के द्वारा स्वतंत्र कश्मीर की मांग
- साम्प्रदायिकता, भाषावाद, आतंकवाद, नक्सलवाद, बेरोजगारी, काला धन, अल्पसंख्यकों में असुरक्षा की भावना,जातीय संघर्ष, अन्तर्राज्यीय विवाद, साईबर अपराध, अमीर तथा गरीब के मध्य बढ़ती खाई, मादक पदार्थों की तस्करी आदि।
- भारत में राजनीतिक परिस्थितियाँसंघर्ष का क्षेत्र है जो कि राष्ट्रीय अखण्डता तथा सुरक्षा के समक्ष चुनौती पैदा करते हैं।
राष्ट्रीय अखण्डता को मजबूत करने वाले उपाय
- संविधान में विश्वास को मजबूत किया जाये।
- नागरिकों में समन्वय की भावना को बढ़ावा दिया जाये।
- समाज के सभी वर्गों का राजनीतिक व्यवस्था में प्रवेश सुनिश्चित किया जाए।
- आर्थिक विषमता का उन्मूलन किया जाए।
- सभी क्षेत्रों के सन्तुलित आर्थिक विकास पर बल दिया जाए।
- विघटनकारी तत्वों पर प्रतिबन्ध लगाया जाए।
- राष्ट्र निर्माण की भावना को प्रोत्साहन प्रदान किया जाए।
- लोगों के मध्य सांस्कृतिक आदान-प्रदान को प्रोत्साहित किया जाए।
- 16वें संविधान संशोधन द्वारा यह प्रावधान किया गया हैकि राष्ट्रीय एकता व अखण्डता के आधार पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है।
राजनीतिक दल/दलीय प्रणाली
पृष्ठभूमि
- राजनैतिक दल लोगों का एक ऐसा संगठित गुट होता है जिसके सदस्य किसी साझी विचारधारामें विश्वास रखते हैं या समान राजनैतिक दृष्टिकोण रखते हैं। यह दल चुनावों में उम्मीदवार उतारते हैं और उन्हें निर्वाचित करवा कर दल के कार्यक्रम लागू करवाने के प्रयास करते हैं।
- लोकतांत्रिक शासन प्रणाली के सफल संचालन के लिए राजनीतिक दलों का होना आवश्यक है क्योंकि इनके द्वारा ही प्रतिनिधियों का चयन किया जाता है तथा प्रतिनिधियों के माध्यम से ही शासन सत्ता का संचालन किया जाता है इसलिए राजनीतिक दल को लोकतंत्र से भी प्राचीन माना जाता है।
- शासन का कोई भी रूप चाहे संसदीय शासन प्रणाली हो अथवा अध्यक्षात्मक बिना राजनीतिक दलों के उसका व्यावहारिक संचालन सम्भव नहीं है। इसलिए जैनिंग्स ने राजनीतिक दलों को लोकतांत्रिक व्यवस्था की रीढ़ की हड्डी की संज्ञा दी है।
- राजनीतिक दलों को शासन का चतुर्थ अंग, लोकतंत्र का सार तथा लोकतंत्र के पहिये की भी संज्ञा दी जाती है।
- राजनीतिक दल लोगों का ऐसा समूह या संगठन होता है जो कि समान दृष्टिकोण रखता हो/अथवा जिसकी समान सिद्धान्तों में आस्था हो जिसकी एक सुनिश्चित विचारधारा हो तथा जिसका मुख्य उद्देश्य राजनीतिक सत्ता की प्राप्ति करना हो।
राजनीतिक दल के लिए आवश्यक तत्व
(1) संगठन
(2) समान सिद्धांतों में आस्था
(3) सुनिश्चित विचारधारा
(4) राजनीतिकसत्ता प्राप्ति का लक्ष्य
(5) संवैधानिक साधनों में आस्था
राजनीतिक दलों के कार्य
(1) जनमत का निर्माण करना।
(2) चुनावों में प्रतिनिधि खडे़ करना तथा उनके पक्ष में प्रचार - प्रसार करना।
(3) चुनावों का संचालन करना।
(4) सरकार का निर्माण करना।
(5) विपक्ष के माध्यम से शासन सत्ता को प्रतिबन्धित करना।
(6) जनता तथा सरकार के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाना।
दलीय प्रणाली के प्रकार
- दलीय प्रणाली को तीन भागों में बाँटा गया है-
1. एक-दलीय प्रणाली
2. द्वि-दलीय प्रणाली
3. बहुदलीय प्रणाली
एक दलीय प्रणाली
- इसके अन्तर्गत शासन सत्ताका समस्त सूत्र एक ही दल में निहित होता है।
- एक दलीय प्रणाली में विपक्ष को मान्यता प्राप्त नहीं होती है।
- एक दलीय प्रणाली में शासन में ऊपर से लेकर नीचे तक सभी प्रतिनिधियों का सम्बन्ध एक ही दल से होता है।
- एक दलीय प्रणाली वाले देश–
1. चीन
2. रूस
3. क्यूबा
4. मेडागास्कर।
द्वि-दलीय प्रणाली
- इसके अन्तर्गत शासन सत्ता की प्राप्ति के लिए मुख्यत: दो दलों के बीच प्रतिस्पर्धा रहती है। यद्यपि अन्य दलों के गठन पर कोई प्रतिबन्ध नहीं होता है।
- इसके अन्तर्गत सत्तारूढ़ दल सरकार का निर्माण करता है एवं अन्य दल के द्वारा विपक्ष की भूमिका का निर्वहन किया जाता है। यदि सत्तारूढ़ दल जनता के हितों की अनदेखी करता है तो विपक्ष के द्वारा उसके स्थान को ग्रहण कर लिया जाता है।
- द्वि-दलीय प्रणाली को सर्वश्रेष्ठ दलीय प्रणाली की संज्ञा दी जाती है। तथा इसमें निरंकुशता का अभाव पाया जाता है।
- द्वि-दलीय प्रणाली वाले देश–
ब्रिटेन -
(1) लेबर पार्टी
(2) कंजरवेटिव पार्टी
अमेरिका -
(1) डेमोक्रेटिक पार्टी
(2) रिपब्लिकन पार्टी।
बहुदलीय प्रणाली
- इसके अन्तर्गत विभिन्न राजनैतिक दलों के मध्य शासन सत्ता की प्राप्ति के लिए प्रतिस्पर्धा विद्यमान बनी रहती है।
- बहुदलीय प्रणाली में दलों के गठन पर कोई प्रतिबन्ध नहीं होता है तथा बहुमत नहीं होने की स्थिति में आपसी समझौते के माध्यम से गठबन्धन सरकार का निर्माण किया जाता है।
- बहुदलीय प्रणाली वाले देश–
1. भारत
2. फ्रांस
3. पाकिस्तान
4. स्विटजरलैण्ड।
विचारधारा के आधार पर राजनीतिक दलोंकावर्गीकरण
1. प्रतिक्रियावादी राजनीतिक दल
2. रूढिवादी दल
3. उदारवादी दल/ मध्यम मार्गी दल
4. सुधारवादी दल/ वामपंथी
(1) प्रतिक्रियावादी
- ये प्राचीन राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक संस्थाओं से चिपके रहना चाहते हैं।
- भारतीय जनता पार्टी को प्रतिक्रियावादी दल के रूप में माना जाता है।
(2) रूढिवादी दल
- ये यथास्थिति के समर्थक होते हैं।
(3) उदारवादी दल
- ये वर्तमान संस्थाओं तथा व्यवस्था में सुधार के समर्थक होते हैं।
- कांग्रेस को मध्यमवर्गीय दल में सम्मिलित किया जाता है।
(4) सुधारवादी दल
- ये वर्तमान व्यवस्था के स्थान पर एक नवीन व्यवस्था की स्थापना करना चाहते हैं।
- भारत में सुधारवादी दलों को वामपंथी दलों के रूप में सम्मिलित किया जाता है तथा इसके अन्तर्गत भारतीय साम्यवादी दल (CPI) तथा भारतीय साम्यवादी दल [मार्क्सवादी CPI (m)] सम्मिलित हैं।
भारतीय दलीय प्रणाली के प्रकार
- भारत के केन्द्रीय निर्वाचन आयोग के द्वारा राजनीतिक दलों की प्रदर्शन क्षमता के आधार पर दल को राष्ट्रीय अथवा क्षेत्रीय दल के रूप में मान्यता प्रदान की जाती है।
राष्ट्रीय दल
- केन्द्रीय निर्वाचन आयोग के द्वारा किसी राजनीतिक दल को राष्ट्रीय दल के रूप में तब मान्यता दी जाएगी जब वह निम्नलिखित अहर्ताओं में से किसी एक को पूरा करता हो-
1. लोकसभा चुनावों में कुल लोकसभा सीटों की 2 प्रतिशत सीटों पर जीत हासिल करता हो तथा ये सीटें कम-से-कम तीन अलग-अलग राज्यों से हों।
2. लोकसभा या राज्यों के विधानसभा चुनावों में 4 अलग-अलग राज्यों से कुल वैध मतों के 6 प्रतिशत मत प्राप्त करे तथा इसके अतिरिक्त 4 लोकसभा सीटों पर जीत दर्ज करे।
3. यदि कोई दल चार या इससे अधिक राज्यों में राज्य स्तरीय दल के रूप में मान्यता प्राप्त करे।
4. किसी भी राजनीतिक दल के लिये राष्ट्रीय या राज्य स्तरीय दलों की श्रेणी में बने रहने हेतु यह आवश्यक है कि वह आगामी चुनावों में भी उपरोक्त अहर्ताओं को पूरा करे अन्यथा उससे वह दर्जा वापस ले लिया जाएगा।
- पहले राष्ट्रीय दलों की संख्या 07 थी परन्तु 2019 में केन्द्रीय निर्वाचन आयोग के द्वारा नेशनल पीपुल्स पार्टी को राष्ट्रीय दल के रूप में मान्यता प्रदान की गई तथा इसी के साथ वर्तमान में राष्ट्रीय दलों की संख्या 08 है।
(1) भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
(2) भारतीय जनता पार्टी
(3) भारतीय साम्यवादी दल
(4) भारतीय साम्यवादी दल [मार्क्सवादी]
(5) बहुजन समाजवादी पार्टी
(6) तृणमूल कांग्रेस पार्टी
(7) राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी
(8) नेशनल पीपुल्स पार्टी
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
- भारत के राजनीतिक दलों में कांग्रेस को सबसे प्राचीन दल माना जाता है।
स्थापना
- जिसकी स्थापना 28 दिसम्बर, 1885 को ए.ओ. ह्यूम के द्वारा की गई।
- स्वतन्त्रता के पश्चातकांग्रेस का ही केन्द्र तथा राज्य दोनों जगह वर्चस्व विद्यमान था इसलिए मोटिस जोन्स ने भारतीय दलीय प्रणाली को कांग्रेस प्रणाली अथवा एक दलीय प्रभुत्व की संज्ञा दी है।
- रजनी कोठारी ने कांग्रेस को छाताधारी दल की संज्ञा दी है तथा उनके अनुसार भारत में अन्य राजनीतिक दलों का निर्माण कांग्रेस में बिखराव से ही हुआ है।
- स्वतंत्रता के पश्चात भारत में केन्द्र तथा राज्यों में कांग्रेस के वर्चस्व का मुख्य कारण भारत को उपनिवेशवादी ताकतों से कांग्रेस द्वारा मुक्त कराना, सभी वर्गों को साथ लेकर चलना, प्रभावशाली नेतृत्व जैसे जवाहर लाल नेहरू, इन्दिरा गांधी आदि का होना था।
वैचारिक आधार-
- कांग्रेस मूल रूप में एक मध्यममार्गी दल है।
- कांग्रेस में समाज के सभी वर्गों के लोगों को शामिल करने काप्रयास किया जाता है।
प्रकृति
- कांग्रेस की प्रकृति सामाजिक रूप में इन्द्रधनुषीय थी।
- उसमें प्रत्येक क्षेत्र, वर्ग और विचारधारा के लोगसम्मिलित थे।
कामराज योजना
- 1963 में कांग्रेस को शक्तिशाली तथा प्रभावी बनाने के लिए एक संगठन को मजबूत करने के लिए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कुमारस्वामी कामराज के द्वारा एक योजना प्रस्तुत की गई जिसे कामराज योजना की संज्ञा दी जाती है। इसके अन्तर्गत संघ सरकार के वरिष्ठ मंत्रियों तथा मुख्यमंत्रियों को कांग्रेस में संगठन का कार्य सौंपा गया। मोरारजी देसाई, बाबू जगजीवन राम, लाल बहादुर शास्त्री, बीजू पटनायक आदि इसमें शामिल थे।
युवा तुर्क
- 1967 में कांग्रेस में उदारवादी तथा समाजवादी नीति को लेकर मतभेद उत्पन्न हुए। चन्द्रशेखर, कृष्णकान्त आदि ने कांग्रेस में समाजवादी नीति का समर्थन किया जिसेयुवा तुर्क की संज्ञा दी गई।
वर्तमान में कांग्रेस
- वर्तमान समय में कांग्रेस की भूमिका में अत्यधिक गिरावट आ गई। इसका संगठन राष्ट्रीय तथा क्षेत्रीय स्तर पर अत्यधिक कमजोर हो गया है परिणामस्वरूप राज्यों में क्षेत्रीय दल का उदय हुआ है तथा उनके प्रभाव में वृद्धि हो रही है।
- 17वीं लोकसभा में कांग्रेस को मात्र 52 सीटें प्राप्त हुई हैं तथा इसे वर्तमान में विपक्षी दल का भी दर्जा प्राप्त नहीं है क्योंकि विपक्ष का दर्जा प्राप्त करने के लिए लोकसभा के कुल सदस्य संख्या का 1/10 सीटें प्राप्त करना आवश्यक होता है। कांग्रेस को वर्तमान में संसदीय समूह के रूप में मान्यता प्राप्त है।
भारतीय जनता पार्टी (BJP)
- जनसंघ से अलग होकर 6 अप्रेल 1980 को भारतीय जनता पार्टी का निर्माण हुआ था।
- 17वीं लोकसभा के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने कुल 303 स्थान प्राप्त कर स्पष्ट बहुमत से सरकार का निर्माण किया तथा इसी के नेतृत्व में वर्तमान में केन्द्र में N.D.A. का शासन चल रहा है।
विचारधारा
- एकात्म मानववाद (दीन दयाल उपाध्याय) पर आधारितविचारधारा जिसके अनुसार, 'समाज और व्यक्ति में किसी प्रकार का विरोध नहीं है तथा समाज में प्रत्येक व्यक्ति कामहत्व समान है।'
- हिन्दू राष्ट्रवाद और गाँधीवादी विचारधारा का समन्वय।
- सकारात्मक पंथनिरपेक्षता पर बल व तुष्टिकरण का विरोध।
- सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और हिन्दुत्व पर बल प्रदान करना।
- समान नागरिक संहिता अपनाना। (अनुच्छेद-44)
भारतीय साम्यवादी दल (CPI)
- 26 दिसम्बर 1925 को ताशकन्द में डॉ. M.N. रॉय के द्वारा भारतीय साम्यवादी दल (CPI) की स्थापना की गई तथा 17 वीं लोकसभा के चुनाव में इसके द्वारा मात्र – 02 सीटों पर विजय प्राप्त की गई।
- यह विदेश में स्थापित होने वाला राजनीतिक दल है। यह भारतीय स्वतंत्राता आन्दोलन तथा भारत छोड़ो आन्दोलन का विरोधी दल है। इसके द्वारा भारतीय संविधान की आलोचना कर उसे दासता का प्रतीक माना गया है।
- इसने सर्वप्रथम केरल में गैर-कांग्रेसी सरकार का निर्माण किया था।
सामाजिक आधार
- वामपंथी दलों का मुख्य सामाजिक आधार मजदूर, किसान, दलित एवं अल्पसंख्यक हैं।
विचारधारा
- सांप्रदायिक नीतियों का विरोध करना।
- गुटनिरपेक्ष विदेश नीति का समर्थन।
- भूमि-सुधार का समर्थन।
- श्रमिकों के कल्याण का समर्थन।
- महिलाओं का संसद में आरक्षण का समर्थन।
- कृषि क्षेत्र का विकास।
क्षेत्रीय दल/राज्यस्तरीय दल
- वे दल जिनके पास एक राज्य में पर्याप्त वोट या सीटें हों, उन्हें चुनाव आयोग द्वारा राज्य पार्टी के रूप में अधिकृत किया जा सकता है।
- संबंधित राज्य में राज्य दल के रूप में मान्यता मिलने से दल को एक विशेष चुनाव चिन्ह आरक्षित करने का विकल्प मिल सकता है।
- केन्द्रीय निर्वाचन आयोग के द्वारा निम्न में से एक शर्त पूर्ण करने पर किसी भी दल को क्षेत्रीय दल का दर्जा प्रदान किया जाता है-
1. दल ने राज्य की विधानसभा के लिये हुए चुनावों में कुल सीटों का 3 प्रतिशत या 3 सीटें, जो भी अधिक हो, प्राप्त किया हो।
2. लोकसभा के लिये हुए आम चुनाव में दल ने राज्य के लिये निर्धारित प्रत्येक 25 लोकसभा सीटों में 1 सीट पर जीत दर्ज की हो।
3. राज्य में हुए लोकसभा या विधानसभा के चुनावों में दल ने कुल वैध मतों के 6 प्रतिशत मत प्राप्त किये हों तथा इसके अतिरिक्त उसने 1 लोकसभा सीट या 2 विधानसभा सीटों पर जीत दर्ज की हो।
4. राज्य में लोकसभा या विधानसभा के लिये हुए चुनावों में दल ने कुल वैध मतों के 8 प्रतिशत मत प्राप्त किये हों।
भारतीय दलीय प्रणाली की प्रमुख विशेषताएँ
(1) बहुदलीय प्रणाली
(2) एक दलीय प्रभुत्व
(3) स्पष्ट विचारधारा का अभाव
(4) दलों में लोकतंत्र का अभाव तथा व्यक्तियों की पूजा
(5) प्रभावशाली विपक्ष का अभाव
(6) राजनीतिक दलों में विभाजन, बिखराव तथा अवसरवादिता की प्रवृत्ति
(7) क्षेत्रीय दलों का उद्भव तथा गठबन्धन की सरकार
(8) दल-बदल
दल-बदल विरोधी अधिनियम
पृष्ठभूमि
- लोकतांत्रिक प्रक्रिया में राजनीतिक दल सबसे अहम हैं और वे सामूहिक आधार पर फैसले लेते हैं। लेकिन आजादी के कुछ साल बाद ही राजनीतिक दलों को मिलने वाले सामूहिक जनादेश की अनदेखी की जाने लगी। विधायकों और सांसदों के जोड़-तोड़ से सरकारें बनने और गिरने लगीं। इस स्थिति ने राजनीतिक व्यवस्था में अस्थिरता ला दी।
- वर्ष 1967 में हरियाणा के एक विधायक 'गयालाल' ने एक दिन में तीन बार पार्टी बदली। इस मौकापरस्ती की प्रथा को बंद करने के लिए 1985 में 52वाँ संविधान संशोधन किया गया और संविधान में 10वीं अनुसूची जोड़ी गई जिससे कि पार्टी छोड़कर भागने की प्रथा पर काबू पाया जा सके।
संविधान संशोधन
- 52वें संविधान संशोधन अधिनियम 1985 के माध्यम से दल-बदल विरोधी अधिनियम राजीव गांधी सरकार के द्वारा लाया गया ताकि स्थिर सरकारों का निर्माण किया जा सके तथा राजनीति में अवसरवादिता में कमी लाई जा सके।
- इसके माध्यम से संविधान के चार अनुच्छेदों 101, 102, 190 तथा 191 में परिवर्तन किए गए तथा सांसदों एवं विधायकों के एक दल से दूसरे दल में परिवर्तन को रोकने के लिए दसवीं अनुसूची को जोड़ा गया।
- Note - 91 संविधान संशोधन अधिनियम 2003 के माध्यम से दसवीं अनुसूची में परिवर्तन किया गया तथा यह निर्धारित किया गया कि अब विभाजन के मामले में दल-बदल सम्बन्धी निर्योग्यता लागू नहीं होगी।
अधिनियम में प्रावधान
निर्योग्यता सम्बन्धी प्रावधान
राजनीतिक दल के सदस्य के लिए प्रावधान
- किसी भी राजनीतिक दल के सदस्य की जो सदन का भी सदस्य है उसकी सदन से सदस्यता समाप्त हो जाएगी यदि –
(1) वह स्वेच्छा से अपने राजनीतिक दल का परित्याग कर देता है।
(2) यदि वह सदन में अपने राजनीतिक दल के द्वारा दिए गए निर्देशों के विपरीत मतदान करता है अथवा अनुपस्थित रहता है तथा दल के द्वारा 15 दिनों के भीतर क्षमादान प्राप्त नहीं कर पाता है।
निर्दलीय सदस्य के लिए प्रावधान
- किसी भी निर्दलीय सदस्य के द्वारा सदन में स्थान ग्रहण करनेके बाद यदि किसी भी राजनीतिक दल की सदस्यता को ग्रहण कर लिया जाता है तो उसकी सदन से सदस्यता समाप्त हो जाएगी।
नाम-निर्देशित या मनोनीत सदस्य
- यदि सदन में कोई भी मनोनीत सदस्य नाम-निर्देशन के छ: माह के पश्चात किसी भी राजनीतिक दल की सदस्यता को ग्रहण कर लेता है तो उसकी सदन से सदस्यता समाप्त हो जाएगी।
दल-बदल विरोधी अधिनियमकेअपवाद
- यदि किसी राजनीतिक दल से टूट हो गई हो तथा दल के 2/3 सदस्य किसी भी अन्य राजनीतिक दल में विलय कर लिए हों अथवा नए दल का गठन कर लिए गए हों।
- यदि राजनीतिक दल के द्वारा अपने किसी सदस्य को दल से निष्कासित कर दिया गया हो।
- यदि सदन के पीठासीन अधिकारी ने अपने दल का परित्याग कर दिया हो।
दल-बदल विरोधी अधिनियमकेसन्दर्भ मेंनिर्णायक प्राधिकारी
- दल-बदल से सम्बन्धित निर्योग्यता का निर्धारण सदन केपीठासीन अधिकारी के द्वारा किया जाता है तथा उसका निर्णय अन्तिम माना जाता है।
- परन्तु 1992 में किहोतो-होलोइन वाद में उच्चतम न्यायालय के द्वारा यह निर्णय दिया गया कि स्पीकर या पीठासीन अधिकारी के निर्णय की न्यायालय के द्वारा समीक्षा की जा सकती है क्योंकि न्यायालय के अनुसार स्पीकर अर्द्ध न्यायिक पदाधिकारी के रूप में कार्य करता है। अर्थात् वर्तमान में पीठासीन अधिकारी के दल-बदल के निर्णय की न्यायिक समीक्षा की जा सकती है।
निष्कर्ष
- दलबदल विरोधी कानून निश्चित तौर पर काफी हद तक दलबदल पर अंकुश लगाने में सक्षम है। लेकिन, हालिया माहौल को देखें तो निजी लाभ के लिए निर्वाचित सदस्यों के समूहों में दूसरे दल में शामिल हो जाना लोकतंत्र के लिए खतरनाक है। राज्य विधानसभाओं और यहाँ तक कि राज्यसभा में दलबदल के हालिया उदाहरणों में यह बात सामने आई है। ऐसे मामले बताते हैं कि कानून की खामियों को दूर करने के लिए इस पर एक बार फिर विचार करने की जरूरत है।
- हालांकि, यह तय है कि समाज हित में ये कानून काफी कारगर रहा है। निर्वाचित सदस्यों की दलगत आस्था डगमगाने से राजनीतिक अस्थिरता की स्थिति पैदा होती है। गोवा, तेलंगाना और कर्नाटक इसके ताजा उदाहरण हैं।
राजस्थान में दलीय प्रणाली की प्रतिस्पर्धा के विभिन्न चरण
- राजस्थान में दलीय प्रणाली की प्रतिस्पर्धा के विभिन्न चरणों को तीन भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है-
प्रथम चरण (1952-77)- कांग्रेस का प्रभुत्व
द्वितीय चरण (1977-89)- प्रतियोगी दलीय प्रणाली
तीसरा चरण (1989-अब तक)- संघात्मक दलीय प्रणाली
प्रथम चरण [1952-77]-
- राजस्थान में 1952 में विधानसभा के प्रथम आम चुनाव सम्पन्न हुए। 29 पर 1952 को राजस्थान विधानसभा का गठन हुआ। प्रथम विधानसभा में राजस्थान में कुल 160 सीटों के लिए मतदान हुआ जिसमें कांग्रेस को 82 सीटें,राम राज्य परिषद को 24 सीटें जनसंघ को 08 सीटें प्राप्त हुई।
- टीकाराम पालीवाल के नेतृत्व में राजस्थान में पहली बार लोकतांत्रिक सरकार का गठन हुआ।
- राम राज्य परिषद में प्रथम विपक्षी दल बना।
- प्रथम चरण में राजस्थान की राजनीति में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का ही वर्चस्व विद्यमान रहा तथा जयनारायण व्यास, मोहनलाल सुखाड़िया आदि के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकारें गठित हुई।
- इस दौर में राज्य की राजनीति में अन्य दलों में स्वतंत्र पार्टी, जनसंघ, टिपटिलकन पार्टी, राम राज्य परिषद़ की भी भूमिका विद्यमान थी।
- 1967 में राजस्थान विधानसभा के आम-चुनाव में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं हुआ परिणामस्वरूप राज्य के अस्थिर राजनीति की शुरूआत हुई।
- राज्यपाल सम्पूर्णानन्द के द्वारा मोहनलाल सुखाड़िया को सबसे बड़े दल के नेता के कारण मुख्यमंत्री नियुक्त किया गया जिसका गैर-कांग्रेसी दलों के द्वारा विरोध किया गया।
- महारावल लक्ष्मणसिंह के नेतृत्व में स्वतंत्र पार्टी, जनसंघ एवं अन्य राजनितिक दलों ने मिलकर संयुक्त विधायक दल के माध्यम से कांग्रेस का विरोध किया परिणामस्वरूप राज्य में प्रथम राष्ट्रपति शासन की उद्घोषणा की गई।
द्वितीय चरण [1977-89]-
- 1977 में परिसीमन के कारण राज्य विधानसभा की सीटों की संख्या 200 हुई तथा केन्द्र में मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार का गठन हुआ।
- राजस्थान में 1977 में छठी विधानसभा में जनता पार्टी को 150 सीटें तथा कांग्रेस को मात्र 41 सीटें प्राप्त हुई परिणामस्वरूप भेरोसिंह शेखावत के नेतृत्व में राज्य में पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार का गठन हुआ अर्थात् राजस्थान में प्रतियोगी दलीय प्रणाली की शुरूआत हुई।
- 1989 में नौवीं विधानसभा में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं हुआ। जनसंघ से अलग होकर भारतीय जनता पार्टी का निर्माण हो चुका था। भैरोसिंह शेखावत जनता पार्टी के सहयोग से राज्य में दूसरी बार मुख्यमंत्री बने।
तीसरा चरण [1989-अब तक]-
-1998 के आम चुनाव को राजस्थान की राजनीति का मील का पत्थर माना जा सकता है जहाँ से राज्य राजनीति में द्वि-ध्रुवीकरण की शुरूआत होती है। ग्यारहवीं विधानसभा 1998 में कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत प्राप्त हुआ तथा अशोक गहलोत के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार बनी।
- 12वीं विधानसभा 2003 में भारतीय जनता पार्टी के द्वारा स्पष्ट बहुमत प्राप्त किया गया तथा वसुन्धरा राजे के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी की सरकार गठित हुई।
- 13वीं विधानसभा 2008 में राजस्थान में सबसे बड़े दल के रूप में कांग्रेस उभरी तथा उसने बहुजन समाजवादी पार्टी के सहयोग से अशोक गहलोत के नेतृत्व में राज्य ने सरकार का गठन किया।
- 14वीं विधानसभा 2013 में राजस्थान में भारतीय जनता पार्टी को प्रचण्ड बहुमत प्राप्त हुआ तथा श्रीमती वसुन्धरा राजे के नेतृत्व में राजस्थान में भारतीय जनता पार्टी की सरकार गठित हुई।
- 2018 में राजस्थान में 15वीं विधानसभा के लिए आम चुनाव आयोजित किए गए तथा 199 सीटों के लिए चुनाव हुए जिसमें कांग्रेस को 99 सीटें भारतीय जनता पार्टी को 73 सीटें, बहुजन समाजवादी पार्टी को 06 सीटें प्राप्त हुई।
- अशोक गहलोत के नेतृत्व में राजस्थान में तीसरी बार कांग्रेस की सरकार स्थापित हुई।
- उपर्युक्त विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि राजस्थान की राजनीति का द्वि-ध्रुवीकरण हो गया है तथा राजस्थान में दलीय प्रतिस्पर्धा मुख्यत: कांग्रेस तथा भारतीय जनता पार्टी में ही विद्यमान है।
राजस्थान में गठबन्धन सरकार का अभाव-
- राजस्थान में यद्यपि अनेक क्षेत्रीय दल विद्यमान हैं परन्तु राज्य राजनीति में उनकी प्रभावी भूमिका का अभाव पाया जाता है। इसी कारण राजस्थान में गठबन्धन सरकार का गठन नहीं हो पा रहा है जिसके मुख्य कारण निम्न हैं-
1.राजस्थान में भारतीय जनता पार्टी तथा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के द्वारा पिछड़ी जातियों एवं पिछड़े वर्गों को पर्याप्त मात्रा में राजनीतिक दल के अन्तर्गत प्रतिनिधित्व प्रदान किया गया है।
2.राजस्थान में अग्रणी तथा पिछड़ी जातियों के बीच सामाजिक तथा आर्थिक विषमता बहुत गहरी विद्यमान नहीं है।
3.राजस्थान में अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जन-जाति का स्वतंत्र नेतृत्व विकसित नहीं हो पाया है।
4.राजस्थान में विभिन्न वर्गों के हितों के मध्य विभाजन तथा सन्तुलन कायम है।
राम राज्य परिषद्-
- 1948 में स्वामी करपात्री जी के द्वारा राम राज्य की परिषद् की स्थापना की गई तथा इस दल का मुख्य बल हिन्दुत्व पर था।
- इसके द्वारा समान नागरिक संहिता की माँग की गई।
- राजस्थान के प्रथम आम चुनाव में इसने कुल 24 सीटों पर विजय प्राप्त की तथा राज्य का प्रथम विपक्षी दल बना।
- भारतीय जनसंघ में इसके विलय के साथ ही राम राज्य परिषद् का अस्तित्व समाप्त हो गया।
स्वतंत्र पार्टी-
- 1959 में चक्रवर्तीराजगोपालाचारी के द्वारा जवाहर लाल नेहरू की समाजवादी नीतियों के विरोध में स्वतंत्र पार्टी की स्थापना की गई।
- यह मुक्त बाजार व्यवस्था तथा उदारवादी नीतियों का समर्थन करता था। इसे जमींदारों उघोगपतियों, एवं पूंजीपतियों का समर्थन प्राप्त हुआ।
- मध्यप्रदेश, गुजरात तथा राजस्थान में इस दल के द्वारा महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- राजस्थान में सर्वप्रथम महारावल लक्ष्मणसिंह ने इसकी सदस्यता ग्रहण की तथा राजमाता गायत्री देवी ने इसका नेतृत्व भी किया।
- राजस्थान में चतुर्थ विधानसभा में स्वतंत्र पार्टी ने 49 सीट तथा पाँचवीं विधानसभा में कुल 11 सीटों पर विजय प्राप्त की।
- भारतीय लोक-दल में विलय के साथ ही स्वतंत्र पार्टी का अस्तित्व समाप्त हो गया।
राजस्थान विधानसभा
प्रथम चरण (1952-77) कांग्रेस प्रणाली (एक दलीय प्रभुत्व)
प्रथम विधानसभा –
- प्रथम विधानसभा का गठन 23 फरवरी 1952 को हुआ तथा पहली बैठक 29 मार्च 1952 को हुई। इसमें टीकाराम पालीवाल पहले मुख्यमंत्री बने।
- नरोत्तम लाल जोशी को प्रथम विधानसभा अध्यक्ष बनाया गया। लालसिंह शक्तावत को उपाध्यक्ष बनाया गया।
- राजस्थान विधानसभा की पहली महिला विधायक श्रीमती यशोदा देवी को बनाया गया था।
- राजस्थान विधानसभा की पहली महिला मंत्री कमला बेनीवाल को बनाया गया था।
द्वितीय विधानसभा – (1957-1962):
- मोहनलाल सुखाड़िया मुख्यमंत्री बने।
तृतीय विधानसभा – (1962-1967):
- मोहनलाल सुखाड़िया तीसरी बार मुख्यमंत्री बने।
चतुर्थ विधानसभा – (1967-1972):
- इस दौरान पहली बार राष्ट्रपति शासन लगाया गया। जिस समय राज्यपाल संपूर्णानंद थे तथा राष्ट्रपति शासन के बाद सुखाड़िया के नेतृत्व में सरकार बनी। राज्य में राज्यमंत्री तथा संसदीय सचिव पद की व्यवस्था की गई। 1971 में सुखाड़िया ने त्याग पत्र दिया व बरकतुल्लाह खाँ मुख्यमंत्री बने।
पंचम̖ विधानसभा – (1972-1977)
- राज्य में दूसरी बार राष्ट्रपति शासन लगाया गया।
- इस विधानसभा का कार्यकाल 5 वर्ष से ज्यादा था। अधिक कार्यकाल वाली यह एकमात्र विधानसभा थी।
षष्ठम̖ विधानसभा – (1977-80)
- भैरोसिंह शेखावत पहले गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री बनाए गए।
- 1980 में तीसरी बार राष्ट्रपति शासन लगाया गया।
- राज्य में पहली बार विधानसभा 5 वर्ष से पहले भंग कर दी गई।
सप्तम̖ विधानसभा (1980-1985)
- पहली बार मध्यावधि चुनाव हुए।
- इसमें जगन्नाथ पहाड़िया शिवचरण माथुर, हीरालाल देवपुरा मुख्यमंत्री पद पर रहे।
अष्ठम̖ विधानसभा (1985-1990)
- हरिदेव जोशी व शिवचरण माथुर दूसरी बार मुख्यमंत्री बने।
नवम̖ विधानसभा (1990-92)
- चौथी बार राष्ट्रपति शासन लगाया गया उस समय राज्यपाल चेन्नारेड्डी थे।
- भैरोसिंह शेखावत दूसरी बार मुख्यमंत्री बने।
दसवीं विधानसभा (1993-1998)
- भैरोसिंह शेखावत तीसरी बार मुख्यमंत्री बने।
ग्यारहवीं विधानसभा (1998-2003)
- अशोक गहलोत मुख्यमंत्री बने।
बारहवीं विधानसभा (2003-2008)
- पहली बार इलेक्ट्रानिक मशीनों से मतदान हुआ।
- इसमें राज्य की पहली महिला मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे बनी।
तेरहवीं विधानसभा (2008-2013)
- अशोक गहलोत दूसरी बार मुख्यमंत्री बने।
चौदहवीं विधानसभा (2013-2018)
- वसुन्धरा राजे दूसरी बार मुख्यमंत्री बनी।
पन्द्रहवीं विधानसभा (2018 to)
- इसमें कांग्रेस को 107 निर्दलीय को 13, भारतीय जनता पार्टी को 72 सीटें मिली, RLP=3, माकपा-2
- इसमें महिला विधायकों की संख्या 25 है।
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काल |
कुल सीटें |
दलगत सीटें |
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पहली विधानसभा (1952 - 57) |
160 |
कांग्रेस – 82, भारतीय जनसंघ – 8, कृषिकार लोक पार्टी- 7, रामराज्य परिषद् – 24, हिन्दु महासभा – 2, कृषक मजदूर प्रजा पार्टी – 1, निर्दलीय – 36 |
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दूसरी विधानसभा (1957 - 62) |
176 |
कांग्रेस – 119, भारतीय जनसंघ – 6, प्रजासमाज वादी दल - 1, रामराज्य परिषद् – 17, भारतीय कम्यूनिष्ट पार्टी – 1, निर्दलीय - 32 |
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तीसरी विधनसभा (1962 - 67) |
176 |
कांग्रेस – 89, भारतीय जनसंघ – 15, प्रजासमाज वादी दल - 2, रामराज्य परिषद् – 3, भारतीय कम्यूनिष्ट पार्टी – 5, निर्दलीय – 22, समाजवादी दल – 5, स्वतंत्र पार्टी - 36 |
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चौथी विधानसभा (1967 - 72) |
184 |
कांग्रेस – 89, भारतीय जनसंघ – 22, संयुक्त समाजवादी दल – 8, स्वतंत्र पार्टी – 49 |
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पाँचवी विधानसभा (1972 - 77) |
184 |
कांग्रेस – 145, भारतीय जनसंघ – 8, स्वतंत्र पार्टी – 11, सोशलिस्ट पार्टी – 4, भाकपा – 4, निर्दलीय - 11 |
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छठी विधानसभा (1977 - 80) |
200 |
जनता पाटी – 150, कांग्रेस – 41, भाकपा – 1, माकपा – 1, निर्दलीय - 6 |
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सातवीं विधानसभा (1980 - 85) |
200 |
कांग्रेस (इ) – 133, कांग्रेस (एस) – 6, भारतीय जनता पाटी – 32, जनता पार्टी - 8, जनता पार्टी (एस. चरण सिंह) – 7, जनता पार्टी (एस. राज नारायण) – 1, माकपा – 1, निर्दलीय - 12 |
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आठवीं विधानसभा (1985 - 90) |
200 |
कांग्रेस (इ) – 113, भारतीय जनता पाटी सहित अन्य दल– 87 |
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नौंवी विधानसभा (1990 - 92) |
200 |
कांग्रेस (इ) – 50, जनता दल – 54, भाजपा– 84, अन्य - 12 |
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दसवीं विधानसभा (1993 - 98) |
200 |
भाजपा – 95, कांग्रेस (इ) – 76, जनता दल – 6, निर्दलीय – 23 |
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ग्यारहवीं विधानसभा (1998 - 2003) |
200 |
कांग्रेस – 152, भाजपा सहित अन्य – 48 |
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बारहवीं विधानसभा (2003 - 2008) |
200 |
भाजपा – 120, कांग्रेस – 56, अन्य - 24 |
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तेरहवीं विधानसभा (2008 - 2013) |
200 |
कांग्रेस – 102, भाजपा सहित अन्य – 98 |
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चौदहवीं विधानसभा (2013 - 2018) |
200 |
भाजपा – 163, कांग्रेस – 21, राजपा – 4, बसपा – 3, जमींदारा पार्टी – 2, अन्य - 7 |
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पन्द्रहवीं विधानसभा (2018 - ......) |
200 |
कांग्रेस – 99, बसपा – 6, निर्दलीय - 13, भाकपा – 2, भाजपा – 72, भारतीय ट्राइबल पार्टी– 2, राष्ट्रीय लोकदल – 1, रालोपा - 3 |
“राजनीति जनांकिकी”
Poltical Domography
- जनांकिकी ग्रीक भाषा के ‘डेमोग्राफी’शब्द का हिन्दी स्थानान्तरण है जिसका अभिप्राय है- “जनता का वर्णन।”
- इसके अन्तर्गत जनता की संरचना, उसका वर्गीकरण, जनसंख्या घनत्व, साक्षरता दर, लिंगानुपात आदि को सम्मिलित किया जाता है।
- राजनीतिक जनांकिकी के अन्तर्गत दलीय संरचना, दलों का वर्गीकरण, राजनीतिक दलों में अलगाव तथा विभाजन, दलीय प्रतिस्पर्धा को शामिल किया जाता है।
- राजस्थान में प्रथम लोकसभा 1952 के लिए 22 सीटों पर चुनाव हुए थे जिसमें कांग्रेस ने 11 सीटों पर तथा राम राज्य परिषद् ने 03 सीटों पर विजय प्राप्त की थी।
- 1977 में राजस्थान में परिसीमन से लोकसभा की सीटों की संख्या 25 हुई तथा 24 सीटों पर जनता पार्टी के द्वारा विजय प्राप्त की गई।
- 17 वीं लोकसभा के लिए 2019 में चुनाव हुए जिसमें राजस्थान में 24 सीटों पर भारतीय जनता पार्टी तथा एक सीट राष्ट्रीय लोकतांत्रिक दल ने प्राप्त की।
- राजस्थान में 25 सीटों में से 04 सीटे अनुसूचित जाति के लिए [श्री गंगानगर, बीकानेर, भरतपुर, धौलपुर-करोली] आरक्षित है तथा अनुसूचित जनजातियों के लिए तीन सीटें [दौसा, बाँसवाड़ा तथा उदयपुर] आरक्षित की गई हैं।
- राज्य विधानसभा में 34 सीटें अनुसूचित जाति के लिए तथा 25 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं।
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कुल |
अधिकतम |
न्यूनतम |
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क्षेत्रफल |
3,42,239 वर्ग कि.मी. (भारत का 10.41%) |
जैसलमेर (38,401) (11.22%) |
धौलपुर (3,033) (0.88%) |
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जनसंख्या |
6,85,48,437 (भारत का 5.66%) |
जयपुर (9.67%) |
जैसलमेर (0.98%) |
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जनघनत्व |
200 (भारत में 18वां स्थान) |
जयपुर (595) |
जैसलमेर (17) |
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साक्षरता |
66.1 % (भारत में 23वां स्थान) |
कोटा (76.60%) |
जालौर (54.9%)
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सर्वाधिक पुरुष साक्षरता – झुन्झुनूं (86 .9 %) |
न्यूनतम साक्षरता पुरुष– प्रतापगढ़ (69.5 %) |
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सर्वाधिक महिला साक्षरता – कोटा (65.9%) |
न्यूनतम महिला साक्षरता – जालौर (38.5%) |
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लिंगानुपात |
928 (भारत में 21वां स्थान) |
डुंगरपुर (994) |
धौलपुर (846) |
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अनुसूचित जाति |
122.21 लाख (राजस्थान की जनसंख्या का 17.8%) |
जयपुर (10.03 लाख) |
डुंगरपुर (52,267) |
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अनुसूचित जनजाति |
92.38 लाख (राजस्थान की जनसंख्या का 13.5%) |
उदयपुर (15.25 लाख) |
बीकानेर (7.7 हजार) |