स्थानीय स्वशासन-पंचायत
पृष्ठभूमि
- स्थानीय स्वशासन का तात्पर्य शासन-सत्ता को एक स्थान पर केंद्रित करने के बजाय उसे स्थानीय स्तरों पर विभाजित किया जाए, ताकि आम आदमी की सत्ता में भागीदारी सुनिश्चित हो सके और वह अपने हितों व आवश्यकताओं के अनुरूप शासन-संचालन में अपना योगदान दे सके।
- स्थानीय स्वशासन के अन्तर्गत निचले स्तर पर लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण किया जाता है तथा लोगों को अपनी समस्याओं के समाधान के लिए समर्थ बनाया जाता है।
- भारत में आजादी के पूर्व लार्ड रिपन के द्वारा 1882 में स्थानीय स्वशासन का प्रस्ताव रखा गया जिसे ‘स्थानीय स्वशासन का मेग्नाकार्टा’ भी कहा जाता है, इसीलिए लार्ड रिपन को स्थानीय स्वशासन का जनक कहा जाता है।
- 1919 के भारत शासन अधिनियम (माण्टेग्यू चेम्सफोर्ड सुधारों) के अन्तर्गत सर्वप्रथम स्थानीय स्व-शासन को मान्यता प्रदान की गई एवं वर्तमान में स्थानीय स्व-शासन राज्य सूची का विषय माना जाता है।
- लोकतंत्र के सफल होने के लिए स्थानीय जनता को अपनी समस्याओं के समाधान में समर्थ बनाने के लिए, केन्द्र तथा राज्यों की योजनाओं का प्रभावी तरीके से क्रियान्वयन के लिए, वंचिता वर्गों के सशक्तीकरण के लिए एवं लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण को सुनिश्चित करने के लिए स्थानीय स्व-शासन का होना आवश्यक है।
- भारत के संविधान में स्थानीय स्व-शासन के दो रूप प्रचलित हैं-
1. पंचायती राज
2. नगरीय शासन
पंचायती राज
पृष्ठभूमि
- लोकतंत्रीय राजनीतिक व्यवस्था में पंचायती राज वह माध्यम है, जो शासन को सामान्य जनता के दरवाजे तक लाता है। लोकतंत्र की संकल्पना को अधिक यथार्थ में अस्तित्व प्रदान करने की दिशा में पंचायती राज व्यवस्था एक ठोस कदम है। पंचायती राज व्यवस्था में स्थानीय जनता की स्थानीय शासन कार्यों में अनवरत रुचि बनी रहती है, क्योंकि वे अपनी स्थानीय समस्याओं का स्थानीय पद्धति से समाधान कर सकते हैं। अत: इस अर्थ में भागीदारिता की प्रक्रिया के माध्यम से जनता को प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से शासन एवं प्रशासन का प्रशिक्षण स्वत: ही प्रदान किया जाता है।
- महात्मा गांधी के अनुसार- “भारत की आत्मा का निवास गाँवों में है अत: यदि गाँव नष्ट हो जाएंगे तो भारत नष्ट हो जाएगा।” गाँधी जी पंचायतों के माध्यम से ही ग्राम स्वराज्य की प्राप्ति करना चाहते थे तथा संविधान सभा में डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने पंचायती राज के माध्यम से स्वराज्य प्राप्ति का विरोध किया क्योंकि उनके अनुसार इससे दलितों की स्थिति में कोई सुधार नहीं हो पाएगा।
- जवाहर लाल नेहरू ने पंचायतों को लोकतंत्र की प्रथम पाठशाला की संज्ञा दी है।
- भारतीय संविधान के भाग-4 में नीति-निदेशक तत्वों के अन्तर्गत अनु. 40 में राज्य को सर्वप्रथम ग्राम-पंचायतों के गठन का दिशा-निर्देश जारी किया गया एवं पंचायतों को अधिक से अधिक शक्तियाँ एवं संसाधन प्रदान करने की सिफारिश की गई।
- 2 अक्टूबर 1952 को भारत सरकार के द्वारा सामुदायिक विकास कार्यक्रम की शुरूआत की गई परन्तु यह कार्यक्रम असफल हो गया क्योंकि तत्कालीन नौकरशाही के द्वारा इस कार्यक्रम में प्रभावी भूमिका निर्वहन नहीं किया गया।
पंचायती राज के सन्दर्भ में प्रमुख समितियाँ
बलवन्त रॉय मेहता समिति
गठन
- इस समिति का गठन सामुदायिक विकास कार्यक्रम की असफलता की समीक्षा के लिए वर्ष 1957 में किया गया था।
सिफारिश
- लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण की सिफारिश की|
- त्रि-स्तरीय पंचायती राज संस्थाओं के गठन पर बल दिया-
1. ग्राम स्तर पर - ग्राम पंचायत
2. खण्ड स्तर पर - पंचायत सिमिति
3. जिला स्तर पर - जिला परिषद्
- पंचायती राज संस्थाओं में पंचायत समिति पर विशेष बल दिया गया।
- महिलाओं के लिए पंचायती राज संस्थाओं में सीटें आरक्षित करने की सिफारिश की।
- बलवन्त राय मेहता को पंचायती राज का जनक एवं वास्तुकार की संज्ञा दी जाती है। बलवन्त राय मेहता की सिफारिशों को लागू करने के लिए 2 अक्टूबर 1959 को राजस्थान के नागौर जिले में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के द्वारा पंचायती राज का उद्घाटन किया गया तथा इसी के साथ राजस्थान पंचायती राज लागू करने वाला देश का प्रथम राज्य बना।
- राजस्थान के बाद 11 अक्टूबर को आन्ध्रप्रदेश पंचायती राज लागू करने वाला भारत का दूसरा राज्य बना।
सादिक अली समिति
गठन
- राजस्थान में पंचायती राज के प्रभावी तरीके से क्रियान्वयन नहीं हो पाने के कारण उसकी समीक्षा के लिए 1964 में सादिक अली समिति का गठन किया गया था|
सिफारिश
- पंचायती राज के प्रभावी तरीके से क्रियान्वयन नहीं हो पाने का कारण निरक्षरता, जनजातियों का अभाव, गरीबी जातिगत समीकरणों की प्रबलता आदि हैं।
- पंचायत समिति के प्रधान तथा जिला परिषदों के प्रमुखों का चुनाव उनके सदस्यों के द्वारा नहीं अपितु निर्वाचक मण्डल के द्वारा किया जाना चाहिए।
अशोक मेहता समिति
गठन
- वर्ष 1977 में जनता पार्टी के द्वारा अशोक मेहता समिति का गठन किया गया था।
सिफारिश
- पंचायती राज संस्थाओं का गठन दो-स्तर पर किया जाए-
1. जिला परिषद
2. मण्डल पंचायत
- जिला परिषद् को विकास की मुख्य इकाई बनाने पर बल प्रदान किया।
- पंचायती राज संस्थाओं में राजनीतिक दलों की सहभागिता की सिफारिश की गई।
- अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति को उनकी जनसंख्या के अनुपात में पंचायती राज संस्थाओं में आरक्षण प्रदान करने की सिफारिश की गई।
- राज्य मंत्रिपरिषद में पंचायती राज को लेकर मंत्री पद का गठन किया जाए।
जी.वी. के. रॉव समिति
गठन
- 1985 में योजना आयोग के द्वारा इस समिति का गठन किया गया जिसने पंचायती राज को लेकर निम्न सिफारिशें प्रस्तुत की-
सिफारिश
- पंचायती राज संस्थाओं का गठन चार स्तर पर किया जाए-
(1) राज्य विकास परिषद्
(2) जिला परिषद
(3) पंचायत समिति
(4) ग्राम पंचायत
- पंचायती राज संस्थाओं के कार्यकाल को पाँच वर्ष से बढ़ाकर आठ वर्ष करने की सिफारिश की।
Note- इनकी सिफारिशों को लागू नहीं किया गया।
लक्ष्मीमल सिंघवी समिति
गठन
- वर्ष 1986 में राजीव गाँधी सरकार के द्वारा पंचायती राज संस्थाओं को प्रभावी बनाने के लिए लक्ष्मीमल सिंघवी समिति का गठन किया गया।
सिफारिश
- पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक मान्यता प्रदान की जाए।
- पंचायती राज सस्थाओं में नियमित चुनाव कराए जाए।
- पंचायती राज सस्थाओं का कार्यकाल निश्चित किया जाए।
- ग्राम सभाओं की स्थापना की जाए।
- ग्राम न्यायालयों की स्थापना की जाए।
- पंचायतों को शासन का तीसरा स्तर घोषित किया जाए।
थूगंन समिति तथा गॉडगिल समिति
गठन
- वर्ष 1988 में पहले थूगंन समिति तथा बाद में गॉडगिल समिति का गठन किया गया था।
सिफारिश
- पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक मान्यता प्रदान की जाये।
- पंचायती राज संस्थाओं को अधिक वित्तीय संसाधन प्रदान किये जायें।
64 वाँ संविधान संशोधन विधेयक
- राजीव गाँधी सरकार के द्वारा पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक मान्यता प्रदान करने के लिए सर्वप्रथम 64 वाँ संविधान संशोधन विधेयक संसद में लाया गया था।
- 64 वाँ संविधान संशोधन विधेयक राज्यसभा से पारित नहीं हो सका, परिणामस्वरूप विधेयक समाप्त हो गया।
73वाँ संविधान संशोधन अधिनियम- 1992
- भारत में 73वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 के तहत शासन के तृतीय स्तर की स्थापना की गयी और पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा प्रदान कर स्थानीय स्वशासन को सुनिश्चित किया गया।
- 73वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 का लक्ष्य गाँधीजी के ग्राम स्वराज के दृष्टिकोण को साकार करना था। यह प्रतिनिधि लोकतंत्र को आधारभूत प्रतिभागी लोकतंत्र में परिवर्तित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है जो प्रशासन और निर्णय निर्माण में समुदाय आधारित योगदान है।
- 73वें संविधान संशोधन अधिनियम- 1992 के माध्यम से पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक मान्यता प्रदान की गई तथा राज्यों को एक वर्ष के भीतर पंचायती राज सम्बन्धी प्रावधानों को लागू करने के लिए बाध्य किया गया।
संविधान में स्थान या उल्लेख
- इस संविधान संशोधन अधिनियम को 24 अप्रैल 1993 को लागू किया गया था।
- इस संविधान संशोधन के माध्यम से संविधान में भाग- IX जोड़ा गया जिसे तकनीकी रूप में “पंचायत” नाम प्रदान किया गया। इसके अन्तर्गत संविधान में 11वीं अनुसूची जोड़ी एवं अनुच्छेद-243A से लेकर 243O तक पंचायती राज सम्बंधी प्रावधान किए गए एवं पंचायती राज संस्थाओं को 29 विषय प्रदान किए गए।
73वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 के प्रावधान-
- 73वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 के द्वारा दो प्रकार के प्रावधान किये गये थे|
1. अनिवार्य
2. ऐच्छिक/विवेकाधीन
- कानून के अनिवार्य नियम में सम्मिलित हैं – नई पंचायतीराज पद्धति। दूसरे भाग में स्वैच्छिक प्रावधान को राज्यों के निर्देशानुसार सम्मिलित किया जाता है, अतः स्वैच्छिक प्रावधान राज्य की नई पंचायतीराज पद्धति को अपनाते समय भौगोलिक, राजनीतिक और प्रशासनिक तथ्यों को ध्यान में रखकर अपनाने का अधिकार सुनिश्चित करता है।
अनिवार्य
ग्राम सभा
- इस अधिनियम द्वारा ग्राम सभा को मान्यता प्रदान की गई तथा ग्राम सभा के द्वारा उन्हीं शक्तियों एवं कार्यों का प्रयोग किया जाएगा जिसका निर्धारण राज्य विधानमंडल करें।
- ग्राम सभा के अन्तर्गत एक ग्राम पंचायत क्षेत्र के सभी वयस्क मतदाता सम्मिलित हैं जिनका नाम मतदाता सूची में अंकित है।
- ग्राम सभा के द्वारा ग्राम विकास की सभी योजनाओं का कार्यान्वयन तथा मूल्यांकन किया जाएगा।
अध्यक्षता
- ग्राम सभा की अध्यक्षता सरपंच के द्वारा की जाती है एवं इसकी बैठक बुलाने का अधिकार सरपंच में निहित है।
- राज्य विधानमंडल विधि के माध्यम से ग्राम स्तर पर अध्यक्ष के चुनाव की रीति का निर्धारण करता है एवं मध्यवर्ती स्तर तथा जिला स्तर पर अध्यक्षों का चुनाव आपस के निर्वाचित सदस्यों के द्वारा अर्थात् जनता के द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से किए जाने का प्रावधान है।
बैठक की गणपूर्ति
- ग्राम सभा की बैठक के लिए गणपूर्ति 1/10 रखी गई है।
पंचायती राज संस्थाओं का गठन
- इस संशोधन अधिनियम के माध्यम से पंचायती राज संस्थाओं के गठन को मान्यता प्रदान की गई-
1. ग्राम स्तर पर \(\longrightarrow\)
ग्राम पंचायत
2. खण्ड स्तर पर \(\longrightarrow\)
पंचायत समिति
3. जिला स्तर पर \(\longrightarrow\)
जिला परिषद
Note- जिन राज्यों की जनसंख्या बीस लाख से कम है उन्हें मध्यवर्ती स्तर पर पंचायत की स्थापना से छूट प्रदान की गई।
- राज्यों के विधानमंडलों को पंचायतों की संरचना निर्धारित करने की शक्ति प्रदान की गई।
सदस्यों का चयन
- इस संशोधन अधिनियम के द्वारा तीनों स्तर पर पंचायती राज में सदस्यों का चुनाव जनता के द्वारा प्रत्यक्ष रूप से किए जाने का प्रावधान है।
- राज्य विधानमंडल विधि के माध्यम से ग्राम स्तर पर अध्यक्ष के चुनाव की रीति का निर्धारण करेगा एवं मध्यवर्ती स्तर तथा जिला स्तर पर अध्यक्षों का चुनाव आपस के निर्वाचित सदस्यों के द्वारा अर्थात् जनता के द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से किया जाएगा।
अनुसूचित जाति व जनजाति एवं महिलाओं को आरक्षण
- इस संशोधन अधिनियम के द्वारा अनुसूचित जाति व जनजाति एवं महिलाओं को पंचायती राज संस्थाओं में आरक्षण प्रदान किया गया है।
- अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति को उनकी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण प्रदान किया गया तथा उनमें से 1/3 स्थान इस वर्ग की महिलाओं के लिए आरक्षित किये गये हैं।
- सामान्य वर्ग की महिलाओं के लिए भी पंचायती राज संस्थाओं में कुल स्थानों का 1/3 स्थान आरक्षित किया गया जिसे वर्तमान में 20 राज्यों में 50% कर दिया है।
- पंचायती राज संस्थाओं में पिछडे़ वर्गों के आरक्षण का अधिकार राज्य विधानमंडल को प्रदान किया गया है जो विधानमंडल अपने अनुसार निर्धारित करते हैं।
कार्यकाल
- पंचायती राज संस्थाओं का कार्यकाल प्रथम अधिवेशन से पाँच वर्ष तक निर्धारित किया गया तथा यदि इस बीच पंचायत विघटित हो जाती है तो अगले छ: माह के भीतर चुनाव कराया जाना आवश्यक है।
- यदि शेष कार्यकाल छ: माह से अधिक का है तो अगली पंचायत का गठन केवल शेष कार्यकाल के लिए होगा।
चुनाव लड़ने के लिए आयु
- इस संशोधन अधिनियम के माध्यम से पंचायती राज संस्थाओं में चुनाव लड़ने की न्यूनतम आयु 21 वर्ष निर्धारित की गई।
- पंचायती राज संस्थाओं को सामाजिक न्याय तथा आर्थिक विकास के लिए योजनाएँ बनाने का अधिकार प्रदान किया गया।
- पंचायती राज संस्थाओं को कर लगाने का अधिकार प्रदान किया गया है।
राज्य वित्त आयोग
- अनु. 243 [I] के अन्तर्गत 73 वें संशोधन अधिनियम 1992 के माध्यम से पंचायती राज संस्थाओं की वित्तीय स्थिति की समीक्षा के लिए राज्य वित्त आयोग को मान्यता प्रदान की गई।
- इस संशोधन अधिनियम के माध्यम से यह प्रावधान किया गया कि 73 वें संशोधन के लागू होने के एक वर्ष के भीतर तथा उसके पश्चात प्रत्येक पाँच वर्ष में राज्यपाल के द्वारा राज्य वित्त आयोग का गठन किया जाएगा।
- राज्य विधानमंडल विधि के माध्यम से राज्य वित्त आयोग की संरचना, सदस्यों की योग्यता आदि का निर्धारण करेगी तथा आयोग को स्वयं अपनी प्रक्रिया को निर्धारित करने की शक्ति प्राप्त होगी।
- राज्य वित्त आयोग के द्वारा राज्यपाल को निम्न मामलों में सलाह प्रदान की जाएगी-
1. राज्य के कुल शुद्ध आगमों का राज्य तथा पंचायतों के बीच विभाजन को लेकर।
2. राज्य में स्थित पंचायतों के बीच करों के विभाजन को लेकर।
3. राज्य की संचित निधि से पंचायती राज संस्थाओं को दिए जाने वाले अनुदान के सिद्धान्तों को लेकर।
4. उन करों के सम्बन्ध में जिन्हें पंचायती राज संस्थाओं को प्रदान किया जा सकता है।
5. पंचायती राज संस्थाओं की वित्तीय स्थिति को सुदृढ करने को लेकर।
- राज्य वित्त आयोग के द्वारा अपना प्रतिवेदन राज्यपाल को प्रदान किया जाएगा जिसे राज्यपाल द्वारा राज्य विधानमंडल के समक्ष रखा जाएगा।
राज्य निर्वाचन आयोग-
- पंचायती राज संस्थाओं के समस्त चुनावों का सम्पादन करने, उसका निरीक्षण करने, उनका नियंत्रण करने के लिए एवं मतदाता सूची का निर्माण करने के लिए 73 वें संशोधन अधिनियम 1992 के माध्यम से अनुच्छेद- 243 K के अन्तर्गत राज्य निर्वाचन आयोग को मान्यता प्रदान की गई।
- राज्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति राज्यपाल के द्वारा की जाएगी तथा इसकी नियुक्ति के पश्चात सेवा शर्तों एवं कार्यकाल में कोई भी अलाभकारी परिवर्तन नहीं किया जा सकेगा।
- राज्य निर्वाचन आयुक्त राज्यपाल को अपना त्यागपत्र सम्बोधित करता है एवं इसे उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समान पद से हटाया जा सकेगा अर्थात् साबित कदाचार या अक्षमता के आधार पर संसद द्वारा विशेष बहुमत से पारित संख्या के पश्चात राष्ट्रपति के आदेश के माध्यम से।
- पंचायती राज से सम्बन्धित प्रावधान मिजोरम, मेघालय, नागालैण्ड, जम्मू-कश्मीर, मणिपुर के पर्वतीय प्रदेश, पश्चिम बंगाल के गोरखालैण्ड क्षेत्र, अनुसूचित क्षेत्रों में लागू नहीं होगें।
परन्तु संसद के द्वारा कानून के माध्यम से इसे अनुसूचित क्षेत्रों में लागू किया जा सकता है तथा संसद के द्वारा इस दिशा में 1996 में पेसा [पंचायती राज अनुसूचित क्षेत्र विस्तार अधिनियम] का निर्माण किया गया।
निर्वाचन संबंधी मामलों में न्यायालय के हस्तक्षेप पर रोक
- पंचायतों के निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन और उन क्षेत्रों में सीटों के आवंटन से सम्बन्धित किसी विधि की विधिमान्यता को किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।
- निर्वाचन की विधिमान्यता को राज्य विधानमण्डल द्वारा निर्धारित विधिक प्राधिकारी अथवा चिह्नित रीति के अनुसार चुनौती दी जा सकती है।
लेखा परीक्षण
- राज्य विधानमण्डल विधि बनाकर पंचायतों के लेखों यानी खातों की देखभाल व परीक्षण के लिए उपबंध कर सकती है।
संघ राज्य क्षेत्रों पर लागू होना
- भारत का राष्ट्रपति किसी भी संघ राज्यक्षेत्र में इस अधिनियम के प्रावधान अपवादों अथवा संशोधनों के साथ लागू करने के लिए निर्देश दे सकता है।
अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायती राज का विस्तार (The Panchayats (Extension to the Scheduled Areas Act 1996 (PESA)
- पंचायती राज से जुडे़ भाग-9 के प्रावधान पाँचवीं अनुसूची अर्थात अनुसूचित क्षेत्रों में लागू नहीं होते हैं परन्तु संसद कानून के माध्यम से इसे अनुसूचित क्षेत्रों में लागू करा सकती है।
- संविधान के नौवें भाग के प्रावधानों को अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार देने के लिए सिफारिशें करने के लिए 1994 में दिलीप सिंह भूरिया की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया, जिसे 'भूरिया समिति' कहा जाता है। 1995 में प्रस्तुत 'भूरिया समिति' की रिपोर्ट के आधार पर 'PESA' अधिनियम, 1996 बनाया गया।
- वर्तमान 2016 में दस राज्यों में पाँचवीं अनुसूची क्षेत्र आते हैं-
1. आंध्रप्रदेश
2. तेलंगाना
3. छत्तीसगढ़
4. गुजरात
5. हिमाचल प्रदेश
6. झारखण्ड
7. मध्य प्रदेश
8. महाराष्ट्र
9. ओडिशा
10. राजस्थान
- इन दस राज्यों में अपने पंचायती राज अधिनियमों में संशोधन कर अपेक्षित अनुपालन कानून अधिनियम किए गये हैं।
- PESA का मुख्य उद्देश्य संविधान के भाग-9 के पंचायतों से जुडे़ प्रावधानों को अनुसूचित क्षेत्रों में लागू कराना, वहाँ के जनजातियों के परम्परागत अधिकारों को मान्यता प्रदान करना, उनके शोषण को रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाना, उन्हें स्व-शासन प्रदान करना तथा ग्रामसभा को मजबूत करना था।
- राजस्थान में इस सम्बन्ध में वर्ष 1999 में पेसा अधिनियम को लागू किया गया तथा डूंगरपुर एवं बाँसवाड़ा दो जिलों में यह पूर्ण रूप से लागू हो गया है।
- वर्तमान में पेसा अधिनियम प्रभावी रूप से लागू नहीं हो पा रहा है क्योंकि अनुसूचित क्षेत्रों में जनजातियों के अपने परम्परागत कानून विद्यमान हैं जिसको लेकर पेसा से विरोधाभास की स्थिति उत्पन्न होती है अर्थात उनमें आवश्यक सन्तुलन का अभाव पाया जाता है एवं पेसा से सम्बन्धित प्रावधानों को लागू कराने के लिए वित्त की दृष्टि से पंचायतों को राज्य सरकार के उपर निर्भर रहना पड़ता है।
ऐच्छिक या विवेकाधीन प्रावधान-
1. पंचायती राज संस्थाओं के विभिन्न स्तर पर नामकरण
2. ग्राम सभा की शक्तियाँ एवं कार्य
3. ग्राम पंचायत के अध्यक्ष के चुनाव की रीति
4. ग्राम पंचायत के अध्यक्ष को मध्यवर्ती स्तर या उसके अभाव में जिला स्तर पर प्रतिनिधित्व प्रदान करना
5. मध्यवर्ती स्तर के अध्यक्ष को जिला स्तर पर प्रतिनिधित्व प्रदान करना।
6. लोकसभा तथा राज्य विधानसभाओं के सदस्यों को मध्यवर्ती तथा जिला स्तर पर प्रतिनिधित्व प्रदान करना।
7. पंचायती राज संस्थाओं में पिछडे़ वर्ग को आरक्षण।
8. पंचायती राज संस्थाओं को शक्तियों तथा अधिकारों का हस्तान्तरण।
पंचायती राज संस्थाओं के समक्ष समस्याएँ
कार्य का अस्पष्ट विभाजन
- पंचायती राज संस्थाओं के लिए संविधान की 11वीं अनुसूची में उल्लेखित किए गए 29 विषयों के सम्बन्ध में तीनों स्तर की पंचायती राज संस्थाओं के बीच स्पष्ट विभाजन नहीं है।
वित्तीय संसाधनों की अपर्याप्तता
- पंचायती राज संस्थाओं के पास स्वयं के वित्तीय संसाधनों की अत्यधिक कमी है।
- उन्हें राज्य सरकार द्वारा अल्पमात्रा में दी गई वित्तीय सहायता व अनुदानों पर ही निर्भर रहना पड़ता है।
अशिक्षा
- पंचायती राज अधिनियम में निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के लिए साक्षर होना आवश्यक नहीं है। अतः अशिक्षा व अज्ञानता की वजह से नियोजन व क्रियान्वयन सुचारू रूप से नहीं हो पाता है।
ग्राम सभा की कमजोर स्थिति
- ग्राम सभाओं के अधिकारों को स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किया गया है इसलिए वे प्रभावशाली भूमिका नहीं निभा पा रही हैं।
स्वायत्तता का अभाव
- ग्रामीण विकास योजनाओं के निर्माण व क्रियान्वयन में पंचायती राज संस्थाओं को भागीदारी व स्वायत्तता प्राप्त नहीं है। उनका कार्य केवल सरकार द्वारा बनाई गई योजनाओं का सरकारी आदेशों के अनुरूप क्रियान्वयन करना है।
महिला प्रतिनिधियों का पुरुषों पर निर्भर होना
- इन संस्थाओं में निर्वाचित अधिकांश महिलाएँ निरक्षरता, सामाजिक रूढ़िवादिता, पर्दाप्रथा आदि कई कारणों से अपने कार्यों के सम्बन्ध में सक्रिय भूमिका नहीं निभा पा रही हैं तथा अधिकांशतः उनका कार्य परिवार के पुरुष सदस्यों द्वारा किया जा रहा है। इस प्रकार समाज में सरपंचपति, अध्यक्षपति की एक अनौपचारिक जमात उत्पन्न हो गई है।
नौकरशाही का अत्यधिक नियंत्रण
- कुछ राज्यों में ग्राम पंचायतों को अधीनस्थ स्थान प्रदान किया गया इसलिए उनमें पंचायती राज संस्थाओं पर अत्यधिक नियंत्रण स्थापित हो गया।
पंचायती राज संस्थाओं को मजबूत करने के उपाय /सुझाव
1. राज्य सरकार तथा पंचायती राज संस्थाओं के मध्य विषयों तथा कार्यों का स्पष्ट विभाजन किया जाए।
2. पंचायती राज संस्थाओं को और अधिक वित्तीय संसाधन प्रदान किए जाएँ।
3. पंचायतों के सम्बन्ध में न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता सम्बन्धी प्रावधान को लागू किया जाए।
4. नौकरशाही के नियंत्रण को कम किया जाए तथा जनप्रतिनिधियों एवं नौकरशाही के मध्य समन्वय स्थापित करने के लिए समय-समय पर सेमीनार, वेमीनार आदि आयोजित किए जाएँ।
5. पंचायत बजटिंग का प्रावधान किया जाए।
6. ग्राम सभा को सशक्त बनाया जाए तथा उसे विधायिका का दर्जा प्रदान किया जाए।
7. पंचायती राज संस्थाओं में भ्रष्टाचार को दूर करने के लिए स्थानीय स्तर पर लोकपाल जैसी संस्था का गठन किया जाए।
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संवैधानिक प्रावधान भाग-9: पंचायतें |
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243 |
परिभाषाएँ |
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243क(A) |
ग्राम सभा |
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243ख(B) |
पंचायतों का गठन |
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243ग(C) |
पंचायतों की संरचना |
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243घ(D) |
स्थानों का आरक्षण |
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243ङ(E) |
पंचायतों की अवधि, आदि |
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243च(F) |
सदस्यता के लिए निरर्हताएँ |
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243छ(G) |
पंचायतों की शक्तियाँ, प्राधिकार और उत्तरदायित्व |
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243ज(H) |
पंचायतों द्वारा कर अधिरोपित करने की शक्तियाँ और उनकी निधियाँ |
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243झ(I) |
वित्तीय स्थिति के पुनर्विलोकन के लिए वित्त आयोग का गठन |
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243ञ(J) |
पंचायतों के लेखाओं की संपरीक्षा |
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243ट(K) |
पंचायतों के लिए निर्वाचन |
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243ठ(L) |
संघ राज्यक्षेत्रों को लागू होना |
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243ड़(M) |
इस भाग का कतिपय क्षेत्रों में लागू न होना |
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243ढ़(N) |
विद्यमान विधियों और पंचायतों का बने रहना |
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243ण(O) |
निर्वाचन संबंधी मामलों में न्यायालयों के हस्तक्षेप का वर्जन |
पंचायतीराज संस्थाओं के कार्य (11वीं अनुसूची एवं अनुच्छेद 243 छ: के अनुसार) – 29 विषय
1. कृषि, जिसके अंतर्गत कृषि विस्तार है।
2. भूमि विकास, भूमि सुधार का कार्यान्वयन, चकबंदी और भूमि संरक्षण।
3. लघु सिंचाई, जल प्रबंध और जलविभाजक क्षेत्र का विकास।
4. पशुपालन, डेयरी उद्योग और कुक्कुट-पालन।
5. मत्स्य उद्योग।
6. सामाजिक वानिकी और फार्म वानिकी।
7. लघु वन उपज।
8. लघु उद्योग, जिनके अंतर्गत खाद्य प्रसंस्करण उद्योग भी है।
9. खादी, ग्रामोद्योग और कुटीर उद्योग
10. ग्रामीण आवासन।
11. पेयजल।
12. ईंधन और चारा।
13. सड़कें, पुलिया, पुल, फेरी, जलमार्ग और अन्य संचार साधन।
14. ग्रामीण विद्युतीकरण, जिसके अंतर्गत विद्युत का वितरण है।
15. अपारंपरिक ऊर्जा स्त्रोत।
16. गरीबी, उन्मूलन कार्यक्रम।
17. शिक्षा, जिसके अंतर्गत प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालय भी हैं।
18. तकनीकी प्रशिक्षण और व्यावसायिक शिक्षा।
19. प्रौढ़ और अनौपचारिक शिक्षा।
20. पुस्तकालय।
21. सांस्कृतिक क्रियाकलाप।
22. बाजार और मेले।
23. स्वास्थ्य और स्वच्छता, जिनके अंतर्गत अस्पताल, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और औषधालय भी हैं।
24. परिवार कल्याण।
25. महिला और बाल विकास।
26. समाज कल्याण, जिसके अंतर्गत विकलांगों और मानसिक रूप से मंद व्यक्तियों का कल्याण भी है।
27. दुर्बल वर्गों का और विशिष्टतया, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों का कल्याण।
28. सार्वजनिक वितरण प्रणाली।
29. सामुदायिक आस्तियों का अनुरक्षण।
स्थानीय स्वशासन-शहरी शासन
पृष्ठभूमि
- स्थानीय शासन की ग्रामीण इकाईयों की भाँति नगरीय स्थानीय शासन भी भारत में प्राचीन काल से ही चला आ रहा है। मैगस्थनीज व अबुल फजल की रचना में नगरीय शासन का विवरण दिया गया है।
- ब्रिटिश काल में नगरीय शासन का विशेष उल्लेख आता है क्योंकि प्रारंभ में अंग्रेजों ने ग्रामीण शासन की तुलना में नगरीय शासन में अपेक्षाकृत ज्यादा रुचि ली। 1687 में मद्रास में प्रथम नगर निगम की स्थापना की गई। इसके पश्चात् कई अन्य नगरों में स्थानीय शासन काफी परिपक्व हो चुका था।
- इसके पश्चात 1726 में मुम्बई तथा कलकत्ता में नगर निगम की स्थापना की गई।
- लार्ड रिपन के द्वारा 1882 में स्थानीय स्वशासन का प्रस्ताव पारित किया गया एवं 1919 के भारत शासन अधिनियम के अन्तर्गत स्थानीय स्व-शासन को मान्यता प्रदान की गई। नगरीय शासन राज्य सूची का विषय है।
- शहरी स्थानीय शासन राज्य सूची का विषय होने के कारण राज्यों द्वारा अपनी सुविधानुसार इस पर कानून बनाया गया जिससे संपूर्ण देश में एकरूपता का अभाव रहा। शहरी स्थानीय शासन का संवैधानीकरण करने के उद्देश्य से 1989 में राजीव गाँधी सरकार द्वारा 65वां संविधान संशोधन विधेयक पेश किया गया। जो पारित नहीं किया जा सका।
स्थानीय नगर शासन विषय पर नियुक्त समितियाँ एवं आयोग-
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वर्ष |
समिति/आयोग का नाम |
अध्यक्ष |
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1. |
1949-1951 |
स्थानीय वित्तीय जाँच समिति |
पी.के. वट्टाल |
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2. |
1953-1954 |
करारोपण जाँच आयोग |
जॉन मथायी |
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3. |
1963-1965 |
नगर निगम कर्मचारियों के प्रशिक्षण पर गठित समिति |
नुरुद्दीन अहमद |
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4. |
1963-1966 |
ग्रामीण नगरीय संबंध समिति |
ए.पी. जैन |
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5. |
1963 |
स्थानीय नगर निकायों के वित्तीय संसाधनों के संवर्द्धन के लिए मंत्रियों की समिति |
रफीक जकारिया |
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6. |
1965-1968 |
नगर निगम कर्मचारियों की कार्यदशाओं पर समिति |
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7. |
1974 |
नगर प्रशासन में बजटीय सुधार पर समिति |
गिरिजापति मुखर्जी |
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8. |
1982 |
स्थानीय नगर निकायों तथा नगर निगमों के गठन, शक्तियों तथा कानूनों पर गठित अध्ययन दल |
के.एन.सहाय |
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9. |
1985-1988 |
नगरीयकरण पर राष्ट्रीय आयोग |
सी.एन. कुरिया |
74 वाँ संशोधन अधिनियम 1992
- 74वें संविधान संशोधन अधिनियम को 1 जून 1993 को लागू किया गया तथा इसके माध्यम से संविधान में भाग IX (A) में नगरपालिका शब्द जोड़ा गया। इसके अन्तर्गत 12 वीं अनुसूची जोड़ी गई एवं अनु. 243P से लेकर अनु. 243ZG तक नगरीय संस्थाओं के सम्बन्ध में प्रावधान किए गए व नगरीय संस्थाओं को 18 विषय प्रदान किए गए।
- इस संशोधन अधिनियम के माध्यम से तीन स्तर पर नगरीय संस्थाओं को संवैधानिक मान्यता प्रदान की गई-
1. नगर निगम
बडे़ नगरों के लिए
2. नगर परिषद
छोटे नगरों के लिए
3. नगर पंचायत
ग्रामीण क्षेत्रों से शहरी क्षेत्रों में परिवर्तित होने वाले कस्बों के लिए
सदस्यों का चयन
- इस संशोधन अधिनियम के द्वारा तीनों स्तर पर सदस्यों का चुनाव जनता के द्वारा प्रत्यक्ष रूप से किए जाने का प्रावधान है।
- अध्यक्ष के चुनाव की रीति का निर्धारण राज्य विधानमंडल के द्वारा किया जाएगा।
- राज्य विधानमंडल के द्वारा ऐसे व्यक्तियों को जिन्हें नगरीय प्रशासन का विशेष ज्ञान अथवा अनुभव प्राप्त हो एवं लोकसभा तथा राज्य विधानसभाओं के सदस्यों को नगरीय संस्थाओं में प्रतिनिधित्व प्रदान किया जा सकता है।
- ऐसे नगरीय क्षेत्र जिनकी जनसंख्या तीन लाख से अधिक है, वहाँ पर वार्ड समिति का गठन किया जाएगा। वार्ड समिति की संरचना, सदस्यों के चुनाव की रीति, अध्यक्ष के चुनाव की प्रक्रिया आदि का निर्धारण राज्य विधानमंडल के द्वारा किया जाएगा।
अनुसूचित जाति व जनजाति एवं महिलाओं को आरक्षण
- इस संशोधन अधिनियम के द्वारा अनुसूचित जाति व जनजाति एवं महिलाओं को नगरीय संस्थाओं में आरक्षण प्रदान किया गया है।
- अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति को उनकी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण प्रदान किया है।
- सामान्य वर्ग की महिलाओं के लिए भी नगरीय संस्थाओं में कुल स्थानों का 1/3 स्थान आरक्षित किया गया है।
- नगरीय संस्थाओं में पिछडे़ वर्गों के आरक्षण का अधिकार राज्य विधानमंडल को प्रदान किया गया है जो विधानमंडल अपने अनुसार निर्धारित करता है।
कार्यकाल
- नगरीय संस्थाओं का कार्यकाल प्रथम अधिवेशन से पाँच वर्ष तक निर्धारित किया गया तथा यदि इस बीच नगरीय संस्थाओं में विघटित हो जाते हैं तो अगले छ: माह के भीतर चुनाव कराया जाना आवश्यक है।
- यदि शेष कार्यकाल छ: माह से अधिक का है तो अगली नगरीय संस्था का गठन केवल शेष कार्यकाल के लिए होगा।
चुनाव लड़ने के लिए आयु
- इस संशोधन अधिनियम के माध्यम से नगरीय संस्थाओं में चुनाव लड़ने की न्यूनतम आयु 21 वर्ष निर्धारित की गई।
- नगरीय संस्थाओं को सामाजिक न्याय तथा आर्थिक विकास के लिए योजनाएँ बनाने का अधिकार प्रदान किया गया।
- नगरीय संस्थाओं को कर लगाने का अधिकार प्रदान किया गया है।
राज्य वित्त आयोग
- नगरीय संस्थाओं की वित्तीय स्थिति की समीक्षा के लिए राज्य वित्त आयोग को मान्यता प्रदान की गई।
- इस संशोधन अधिनियम के माध्यम से यह प्रावधान किया गया कि इस संशोधन के लागू होने के एक वर्ष के भीतर तथा उसके पश्चात प्रत्येक पाँच वर्ष में राज्यपाल के द्वारा राज्य वित्त आयोग का गठन किया जाएगा।
- राज्य विधानमंडल विधि के माध्यम से राज्य वित्त आयोग की संरचना, सदस्यों की योग्यता आदि का निर्धारण करेगी तथा आयोग को स्वयं अपनी प्रक्रिया को निर्धारित करने की शक्ति प्राप्त होगी।
- राज्य वित्त आयोग के द्वारा राज्यपाल को निम्न मामलों में सलाह प्रदान की जाएगी-
1. राज्य के कुल शुद्ध आगमों का राज्य तथा नगरीय संस्थाओं के बीच विभाजन को लेकर।
2. राज्य में स्थित नगरीय संस्थाओं के बीच करों के विभाजन को लेकर।
3. राज्य की संचित निधि से नगरीय संस्थाओं को दिए जाने वाले अनुदान के सिद्धान्तों को लेकर।
4. उन करों के सम्बन्ध में जिन्हें नगरीय संस्थाओं को प्रदान किया जा सकता है।
5. नगरीय संस्थाओं की वित्तीय स्थिति को सुदृढ करने को लेकर।
- राज्य वित्त आयोग के द्वारा अपना प्रतिवेदन राज्यपाल को प्रदान किया जाएगा जिसे राज्यपाल द्वारा राज्य विधानमंडल के समक्ष रखा जाएगा।
राज्य निर्वाचन आयोग-
- नगरीय संस्थाओं के समस्त चुनावों का सम्पादन करने, उसका निरीक्षण करने, उनका नियंत्रण करने के लिए एवं मतदाता सूची का निर्माण करने के लिए इस संशोधन अधिनियम के माध्यम से राज्य निर्वाचन आयोग को मान्यता प्रदान की गई।
- राज्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति राज्यपाल के द्वारा की जाएगी तथा इसकी नियुक्ति के पश्चात सेवा शर्तों एवं कार्यकाल में कोई भी अलाभकारी परिवर्तन नहीं किया जा सकेगा।
- राज्य निर्वाचन आयुक्त राज्यपाल को अपना त्यागपत्र सम्बोधित करता है एवं इसे उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समान पद से हटाया जा सकेगा अर्थात् साबित कदाचार या अक्षमता के आधार पर संसद द्वारा विशेष बहुमत से पारित संख्या के पश्चात राष्ट्रपति के आदेश के माध्यम से।
लेखा परीक्षण
- राज्य विधानमण्डल विधि बनाकर नगरीय संस्थाओं के लेखों यानी खातों की देखभाल व परीक्षण के लिए उपबंध कर सकती है।
निर्वाचन संबंधी मामलों में न्यायालय के हस्तक्षेप पर रोक
- नगरीय संस्थाओं के निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन और उन क्षेत्रों में सीटों के आवंटन से सम्बन्धित किसी विधि की विधिमान्यता को किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।
- निर्वाचन की विधिमान्यता को राज्य विधानमण्डल द्वारा निर्धारित विधिक प्राधिकारी अथवा चिह्नित रीति के अनुसार चुनौती दी जा सकती है।
संघ राज्य क्षेत्रों पर लागू होना
- भारत का राष्ट्रपति किसी भी संघ राज्यक्षेत्र में इस अधिनियम के प्रावधान अपवादों अथवा संशोधनों के साथ लागू करने के लिए निर्देश दे सकता है।
जिला योजना समिति
- 74 वें संशोधन अधिनियम 1992 के माध्यम से यह प्रावधान किया गया कि प्रत्येक राज्य में जिला स्तर पर अनु. 243 ZD के अन्तर्गत योजना समिति का गठन किया जाएगा|
- पंचायतों तथा नगरपालिकाओं के द्वारा तैयार योजनाओं को संगठित करेगी तथा जिला स्तर पर विकास योजना के प्रारूप का निर्माण करेगी।
- जिला योजना समिति की संरचना सदस्यों के चुनाव की रीति, अध्यक्ष के चुनाव की प्रक्रिया आदि का निर्धारण राज्य विधानमंडल के द्वारा विधि के माध्यम से किया जाएगा।
- जिला योजना समिति के 4/5 सदस्य पंचायतों तथा नगरपालिकाओं के निर्वाचित सदस्यों के द्वारा स्वयं में से चुने जाएंगे।
महानगर योजना समिति
- 74 वें संशोधन अधिनियम 1992 के माध्यम से अनु. 243 ZE के अन्तर्गत महानगर योजना समिति को मान्यता प्रदान की गई तथा यह निर्धारित किया गया कि प्रत्येक महानगर के विकास के लिए महानगर योजना समिति का गठन किया जाएगा।
- महानगर योजना समिति की संरचना, उसके सदस्यों के चुनाव की रीति, अध्यक्ष के चुनाव की प्रक्रिया का निर्धारण राज्य विधानमंडल के द्वारा किया जाएगा।
- महानगर योजना समिति के 2/3 सदस्य नगरपालिकाओं एवं पंचायतों के अध्यक्षों के द्वारा चुने जाएंगे।
छावनी बोर्ड-
- छावनी बोर्ड का वर्ष 1924 में संसद तथा रक्षा मंत्रालय के द्वारा गठन किया गया था। तथा 2006 में इसे पुनर्संशोधित किया।
- वर्तमान में यह रक्षा मंत्रालय के अन्तर्गत कार्य करता है।
- इसका गठन ऐसे क्षेत्रों के लिए किया जाता है जहाँ पर सेना के साथ-साथ सिविल लोग भी निवास करते हैं।
- इसका अध्यक्ष छावनी बोर्ड का कमांडिग ऑफिसर होता है। उपाध्यक्ष का चुनाव जनता के द्वारा तीन वर्षों के लिए किया जाता है।
- राजस्थान में नसीराबाद में छावनी बोर्ड स्थित है।
12वीं अनुसूची: नगरपालिकाओं के अधिकार
- संविधान के 74वें संशोधन द्वारा 12वीं अनुसूची (अनुच्छेद-243ब) में 18 विषयों को सम्मिलित किया गया है। राज्य विधानमण्डल विषयों पर नगरपालिकाओं को अधिकार दे सकता है-
1. नगर योजना।
2. भूमि प्रयोग व भवन निर्माण।
3. सामाजिक विकास हेतु योजनाएँ।
4. सड़कें और पुल निर्माण।
5. घरेलू, वाणिज्य एवं औद्योगिक प्रयोजनार्थ जलापूर्ति।
6. स्वास्थ्य, सफाई सेवा और कूड़ा-करकट का प्रबंधन।
7. अग्निशमन सेवाएँ
8. नगरीय, वानिकी, पर्यावरण संरक्षण आदि पहलुओं का प्रबंधन।
9. विकलांग व मंदबुद्धि आदि के सामाजिक हितों की सुरक्षा।
10. बस्तियों का सुधार-उन्नयन।
11. शहरी गरीबी कम करने का प्रयास।
12. बाग-बगीचे, खेल-मैदान की सुविधाएँ।
13. सांस्कृतिक व कला पक्षों का संवर्धन।
14. कब्रों, श्मशानों तथा उनके लिए भूमि व्यवस्था।
15. जन्म-मृत्यु पंजीकरण।
16. पशुओं पर क्रूरता की रोकथाम।
17. सड़कों का विद्युतीकरण, बस स्टॉप, वाहन पार्किंग व्यवस्था का संधारण।
18. बूचड़खानों का विनियमन।
राजस्थान में नगरीय शासन व्यवस्था –
- माउण्ट आबू में 1864-65ई. में राज्य की पहली नगरपालिका जोड़ी गई। 1866 में अजमेर के ब्यावर में नगरपालिका की स्थापना की गई।
- स्वतंत्रता के पश्चात राजस्थान में नगरपालिका कस्बा अधिनियम पारित किया गया लेकिन 1959 में इस अधिनियम को समाप्त कर राजस्थान नगरपालिका अधिनियम लागू किया गया।
- 74वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा राजस्थान में नगरीय शासन को तीन स्तर पर मान्यता मिल गई।
(A) नगर पंचायत - वह क्षेत्र जो ग्रामीण क्षेत्र से शहरी क्षेत्र में परिवर्तित हो रहा है।
(B) नगरपरिषद् – छोटे शहरी क्षेत्र के लिए।
(C) नगर निगम – बड़े शहरी क्षेत्रों के लिए।
नगरीय शासन सम्बन्धी संवैधानिक उपबंध
अनुच्छेद विवरण
अनुच्छेद 243 P- परिभाषा
अनुच्छेद 243 Q- नगरपालिकाओं का गठन
अनुच्छेद 243 R- नगरपालिकाओं की संरचना
अनुच्छेद 243 S- वार्ड समितियों आदि का गठन और संरचना
अनुच्छेद 243 T- स्थानों का आरक्षण
अनुच्छेद 243 U- नगरपालिकाओं की अवधि आदि
अनुच्छेद 243 V- सदस्यता के लिए निरर्हताएँ
अनुच्छेद 243 W- नगरपालिकाओं आदि की शक्तियाँ, प्राधिकार और उत्तरदायित्व
अनुच्छेद 243 X- नगरपालिकाओं द्वारा कर अधिरोपित करने की शक्ति और उनकी निधियाँ
अनुच्छेद 243 Y- वित्त आयोग
अनुच्छेद 243 Z- नगरपालिकाओं के लेखाओं की संपरीक्षा
अनुच्छेद 243 ZA- नगरपालिकाओं के लिए निर्वाचन
अनुच्छेद 243 ZB- संघ राज्य क्षेत्रों को लागू होना
अनुच्छेद 243 ZC- इस भाग का कतिपय क्षेत्रों को लागू न होना
अनुच्छेद 243 ZD- जिला योजना के लिए समिति
अनुच्छेद 243 ZE- महानगर योजना के लिए समिति
अनुच्छेद 243 ZF- विद्यमान विधियों पर नगर पालिकाओं का बना रहना
अनुच्छेद 243 ZG- निर्वाचन सम्बन्धी मामलों में न्यायालयों के हस्तक्षेप का वर्णन