• मेला – किसी विशेष तिथि पर/विशेष देव स्थान पर जहाँ अनेक लोगों का सामूहिक मिलन हो, उसे मेला कहा जाता है।
• उर्स – उर्स का शब्दिक अर्थ – विवाह/मिलन (आत्मा से परमात्मा)
• किसी सूफी संत की आत्मा का मिलन परमात्मा से होता है। उस दिन उस सूफी संत की स्मृति में उर्स का आयोजन किया जाता है।
1. बादशाह मेला – ब्यावर (अजमेर) – चैत्र कृष्ण प्रतिपदा।
2. फूलडोल मेला – रामद्वारा (शाहपुरा, भीलवाड़ा) –चैत्र कृष्ण प्रतिपदा से पंचमी तक – रामस्नेही संप्रदाय से संबंधित।
भीलवाड़ा स्थित ‘शाहपुरा’ नगर अंतर्राष्ट्रीय रामस्नेही संप्रदाय के अनुयायियों का पीठ स्थल है। शाहपुरा में होली के दूसरे दिन प्रसिद्ध वार्षिक फूलडोल का मेला लगता है।
3. धनोप माता का मेला – धनोप गाँव (भीलवाड़ा) – चैत्र कृष्ण एकम् से दशमी तक।
4. शीतला माता का मेला – शील डूँगरी (चाकसू, जयपुर) – चैत्र कृष्ण अष्टमी।
5. ऋषभदेव मेला (केसरिया नाथ जी मेला/काला बावजी का मेला) – धुलेव (उदयपुर) – चैत्र कृष्ण अष्टमी/नवमी।
6. जौहर मेला – चित्तौड़गढ़ दुर्ग (चित्तौड़गढ़) – चैत्र कृष्ण एकादशी।
7. घोटिया अम्बा मेला – (बाँसवाड़ा) – चैत्र अमावस्या।
- यह बाँसवाड़ा जिले का सबसे बड़ा मेला है। यह प्रतिवर्ष चैत्र माह की अमावस्या को भरता है जिसमें राजस्थान, गुजरात तथा मध्यप्रदेश आदि प्रांतों से आदिवासी आते हैं।
8. विक्रमादित्य मेला – उदयपुर – चैत्र अमावस्या।
9. कैलादेवी मेला – कैलादेवी (करौली) – चैत्र शुक्ल एकम् से दशमी (प्रमुख रूप से अष्टमी को), कैलादेवी मेले में भक्तों द्वारा ‘लांगुरिया’ भक्ति गीत गाए जाते हैं।
10. गुलाबी गणगौर – नाथद्वारा – चैत्र शुक्ल पंचमी। – नाथद्वारा वल्लभ सम्प्रदाय का प्रमुख केन्द्र है।
11. श्री महावीरजी मेला – (करौली) – चैत्र शुक्ल त्रयोदशी से वैशाख कृष्ण द्वितीया तक – जैन धर्म का सबसे बड़ा मेला।
यहाँ पर जिनेन्द्र रथ यात्रा मुख्य आकर्षण है।
12. सालासर हनुमान मेला – सालासर (सुजानगढ़, चूरू) – चैत्र पूर्णिमा/हनुमान जयंती।
13. बीजासणी माता का मेला – लालसोट (दौसा) – चैत्र पूर्णिमा।
14. धींगागवर बेंतमार मेला – जोधपुर – वैशाख कृष्ण तृतीया।
जोधपुर नगर में प्रतिवर्ष होली के एक पखवाड़े बाद चैत्र शुक्ल तृतीया को गणगौर का विसर्जन करने के बाद वैशाख कृष्ण पक्ष की तृतीया तक धींगागवर की पूजा होती है। इस अवसर पर महिलाएँ बेंतमार मेला आयोजित करती हैं।
15. गौर मेला – सियावा (आबूरोड, सिरोही) – वैशाख शुक्ल चतुर्थी।
16. नारायणी माता का मेला – सरिस्का (अलवर) – वैशाख शुक्ल एकादशी।
17. बाणगंगा मेला – विराटनगर (जयपुर) – वैशाख पूर्णिमा।
18. मातृकुण्डिया मेला – राश्मी (हरनाथपुरा, चित्तौड़गढ़) – वैशाख पूर्णिमा।
- चित्तौड़गढ़ जिले के राश्मी पंचायत समिति क्षेत्र में स्थित हरनाथपुरा गाँव में प्रतिवर्ष वैशाख पूर्णिमा को यह मेला भरता है।
19. सीतामाता मेला – सीतामाता (प्रतापगढ़) – ज्येष्ठ अमावस्या।
20. सीताबाड़ी का मेला – सीताबाड़ी केलवाड़ा (बाराँ) – ज्येष्ठ अमावस्या।
यह हाड़ौती अंचल का सबसे बड़ा मेला है।
- बाराँ जिले की सहरिया जनजाति का कुंभ कहा जाने वाला सीताबाड़ी मेला केलवाड़ा के निकट सीताबाड़ी में भरता है।
21. कल्पवृक्ष मेला – मांगलियावास (अजमेर) – हरियाली अमावस्या।
22. गुरुद्वारा बुड्ढ़ा जोहड़ मेला – श्रीगंगानगर – श्रावण अमावस्या।
23. लोटियों का मेला – मण्डोर (जोधपुर) – श्रावण शुक्ल पंचमी।
24. परशुराम महादेव मेला – सादड़ी (पाली) – श्रावण शुक्ल सप्तमी।
25. वीरपुरी मेला – मंडोर (जोधपुर) – श्रावण माह का अंतिम सोमवार।
26. कजली तीज – बूँदी – भाद्रपद कृष्ण तृतीया।
27. जन्माष्टमी – नाथद्वारा (राजसमंद) – भाद्रपद कृष्ण अष्टमी।
28. गोगानवमी – गोगामेड़ी (हनुमानगढ़) – भाद्रपद कृष्ण नवमी।
29. राणी सती का मेला – झुंझुनूँ – भाद्रपद अमावस्या।
- झुंझुनूँ में रानी सती के प्रसिद्ध मंदिर में प्रतिवर्ष भाद्रपद मास में मेला भरता है। वर्ष 1988 के बाद से सती निषेध कानून के तहत इस पर रोक लगा दी है।
30. रामदेवरा का मेला – रामदेवरा (रूणेचा) (पोकरण, जैसलमेर)- भाद्रपद शुक्ल द्वितीया से एकादशी तक साम्प्रदायिक सद्भाव का सबसे बड़ा मेला।
31. गणेशजी का मेला – रणथम्भौर (सवाईमाधोपुर) – भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी।
32. हनुमानजी का मेला – पांडुपोल (अलवर) – भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी व पंचमी।
33. भोजन थाली मेला – कामां (भरतपुर) – भाद्रपद शुक्ल पंचमी।
34. सवाई भोज मेला – आसींद (भीलवाड़ा) – भाद्रपद शुक्ल अष्टमी।
35. कल्याणजी का मेला – डिग्गी (टोंक) – भाद्रपद शुक्ल एकादशी।
36. देवझूलनी मेला (चारभुजा मेला) – चारभुजा (राजसमंद)- भाद्रपद शुक्ल एकादशी (जलझूलनी एकादशी)।
37. बाबू महाराज का मेला – बाड़ी (धौलपुर) – भाद्रपद शुक्ल एकादशी।
38. चारभुजा मेला – चारभुजा (उदयपुर) – भाद्रपद शुक्ल एकादशी।
39. दशहरा मेला – कोटा – आश्विन शुक्ल दशमी।
- यह मेल- 1579 ई. में कोटा के प्रथम शासक राव माधोसिंह द्वारा शुरुआत किया गया, जो यह परंपरा 400 वर्षों के बाद आज भी चली आ रही है।
40. मीरा महोत्सव – चित्तौड़गढ़ – आश्विन पूर्णिमा (शरद पूर्णिमा)।
41. अन्नकूट मेला – नाथद्वारा (राजसमंद) – कार्तिक शुक्ल एकम्।
42. गरुड़ मेला – बंशी पहाड़पुर (भरतपुर) – कार्तिक शुक्ल तृतीया।
43. पुष्कर मेला – पुष्कर (अजमेर) – कार्तिक शुक्ल एकादशी से पूर्णिमा – अंतर्राष्ट्रीय स्तर का मेला व राजस्थान का सबसे रंगीन मेला।
44. कपिल धारा का मेला – बाराँ – कार्तिक पूर्णिमा – यह मेला सहरिया जनजाति से संबंधित है।
45. चंद्रभागा मेला – झालरापाटन (झालावाड़) – कार्तिक पूर्णिमा।
46. साहावा सिक्ख मेला – साहवा (चूरू) – कार्तिक पूर्णिमा।
यह राजस्थान में सिक्ख धर्म का सबसे बड़ा मेला है।
- चूरू जिले में साहब का गुरुद्वारा है जिसके साथ सिक्ख धर्म के प्रवर्तक गुरु नानक देव एवं अंतिम गुरु ‘गुरु गोविन्द सिंह’ के आने एवं रहने की स्मृतियाँ जुड़ी हुई हैं।
47. कपिल मुनि का मेला – कोलायत (बीकानेर) – कार्तिक पूर्णिमा – जांगल प्रदेश का सबसे बड़ा मेला
– इसे जांगल प्रदेश का कुंभ कहा जाता है।
– चारण जाति के लोग इस मेले में नहीं आते हैं।
48. नाकोड़ा जी का मेला – नाकोड़ा तीर्थ (मेवानगर, बाड़मेर) – पौष कृष्ण दशमी।
49. श्री चौथमाता का मेला – चौथ का बरवाड़ा (सवाईमाधोपुर) – माघ कृष्ण चतुर्थी।
50. पर्यटन मरु मेला – जैसलमेर व सम (जैसलमेर) – माघ शुक्ल त्रयोदशी से माघ अमावस्या तक।
51. बेणेश्वर मेला – नवाटापरा, (बेणेश्वर, डूँगरपुर) – माघ पूर्णिमा को यह मेला सोम-माही-जाखम नदियों के संगम पर भरता है। इसे आदिवासियों के कुंभ के नाम से जाना जाता है।
– इस मेला का संबंध संत मावजी से है।
– इस मेले में सर्वाधिक भील जनजाति के लोग आते हैं।
– यहाँ विश्व के एकमात्र खण्डित शिवलिंग की पूजा होती है।
52. शिवरात्रि मेला – शिवाड़ (सवाईमाधोपुर) – फाल्गुन कृष्ण त्रयोदशी।
53. चनणी चेरी मेला – देशनोक (बीकानेर) – फाल्गुन शुक्ल सप्तमी।
54. चन्द्रप्रभु का मेला – तिजारा (अलवर) – फाल्गुन शुक्ल सप्तमी – जैन धर्म से संबंधित।
55. डाडा पम्पाराम का मेला – पम्पाराम का डेरा, विजयनगर (श्रीगंगानगर) – फाल्गुन माह में आयोजित।
56. मेहन्दीपुर बालाजी का मेला – मेहन्दीपुर (दौसा)
– यहाँ पर हनुमान जी की बाल रूप की पूजा होती है।
57. मानगढ धाम पहाडी मेला – मानगढ पहाडी (बाँसवाडा)- मार्गशीर्ष पूर्णिमा।
- यह मेला गुरु गोविन्द गिरी की स्मृति में आयोजित होता है।
- इसे आदिवासियों का मेला कहा जाता है।
- इस मेले में सर्वाधिक भील जाति के लोग आते है।
58. बाणगंगा का मेला – बैराठ/विराटनगर (जयपुर)।
59. डिग्गी कल्याण जी का मेला – डिग्गी सालपुर (टोंक)।
- डिग्गी (टोंक) कस्बे में श्रावणी अमावस्या, भाद्रपद शुक्ल एकादशी व वैशाख पूर्णिमा को यह मेला लगता है।
60. गौतमेश्वर मेला – अरणोद (प्रतापगढ)।
61. गौतमेश्वर का मेला:- सिरोही जिले में पोसालिया नदी के तट पर गौतमेश्वर में प्रतिवर्ष चैत्र शुक्ल एकादशी से पूर्णिमा तक यह मेला लगता है। यह मीणा समाज का मेला है, जिसमें मीणा समाज अपने कुल देवता गौतमेश्वर की पूजा करते हैं।
62. गौतम ऋषि का मेला – सिरोही – फाल्गुन कृष्ण त्रयोदशी।
63. भूरिया बाबा का मेला – नाणा रेल्वे स्टेशन (पाली)।
64. कल्पवृक्ष मेला – मांगलियावास (अजमेर)।
65. सुइयाँ मेला – हल्देश्वर मंदिर (चौहटन)।
66. गधों का मेला – सोरसेन (बाराँ) तथा लुणियावास (जयपुर)।
67. खेजड़ली मेला – खेजड़ली (जोधपुर) – 1730 ई. में मारवाड़ के महाराजा अभयसिंह के काल में खेजड़ली हत्या काण्ड हुआ, जिसमें 84 गाँवों के 363 लोग शहीद हुए।
खेजड़ली मेला विश्व का एकमात्र वृक्ष मेला है।
68. ऊँट मेला – बीकानेर – यह विश्व का एकमात्र ऊँट मेला है।
69. गंगा दशहरा मेला – कामा (भरतपुर)।
70. 12 भाइयों का मेला :- बाड़ी (धौलपुर)।
71. लाल्या व काल्या का मेला – अजमेर।
72. राम-रावण मेला – बडी सादड़ी (चित्तौड़गढ़)।
73. विक्रमादित्य मेला – उदयपुर।
74. बाली मेला – बाली (पाली)।
75. चुंघीतीर्थ मेला – चुंघी (जैसलमेर)।
76. भर्तृहरि मेला – सरिस्का जंगल (अलवर)।
77. हिरण्य महादेव मेला – भीलवाडा।
78. नाग पंचमी का मेला – मंडोर।
79. सम्बोधि धाम मेला – जोधपुर।
80. सतियों का मेला – मेहरानगढ दुर्ग (जोधपुर)।
81. भद्रकाली माता का मेला – हनुमानगढ।
82. बहरोड पशु मेला – बहरोड (अलवर)।
83. भगवान श्री रामचन्द्र जी की सवारी – मेहरानगढ (जोधपुर)।
84. तिलस्वा महादेव मेला – तिलस्वा (माण्डलगढ, भीलवाड़ा)।
85. सेवको/चेनणी चेरी का मेला – करणी माता मंदिर – देशनोक (बीकानेर)।
86. मनसा माता का मेला – झुन्झुनूँ – चैत्र कृष्णा अष्टमी व आश्विन शुक्ल अष्टमी।
87. हाडा पम्पाराम जी का मेला – विजयनगर (श्री गांगानगर)।
88. डोलचीमार होली :- बीकानेर।
89. नीलापानी का मेला :- हाथोड़ (डूँगरपुर)।
90. मलूका मेला :- पाली।
91. छींछ माता का मेला :- बाँसवाड़ा।
92. डोल मेला :- बाराँ।
नोट : वे मेले जो वर्ष में एक बार से ज्यादा भरते हैं –
93. विरात्रा माता का मेला – विरात्रा (बाड़मेर) – चैत्र, भाद्रपद व माघ शुक्ल चतुर्दशी।
94. त्रिपुरा सुंदरी मेला – तलवाड़ा (बाँसवाड़ा) – नवरात्रा (चैत्र व आश्विन)।
95. करणी माता का मेला – देशनोक (बीकानेर) – नवरात्रा (चैत्र व आश्विन)।
96. जीणमाता का मेला – रैवासा ग्राम (सीकर) – नवरात्रा (चैत्र व आश्विन)।
97. दधिमति माता का मेला – गोठ मांगलोद (नागौर) – शुक्ल अष्टमी (चैत्र व आश्विन)।
98. इंद्रगढ़/बीजासन माता का मेला – इंद्रगढ़ (बूँदी) – चैत्र व आश्विन नवरात्रा तथा वैशाख पूर्णिमा।
99. हीरामन बाबा का मेला – नगला जहाजपुर (भरतपुर) – भाद्रपद चतुर्थी व वैशाख चतुर्थी।
100. मारकण्डेश्वर मेला – अंजारी गाँव (सिरोही) – भाद्रपद शुक्ल एकादशी एवं वैशाख पूर्णिमा – यह मेला गरासिया समुदाय का प्रसिद्ध मेला है।
101. चंद्रप्रभु मेला – तिजारा (अलवर) – फाल्गुन शुक्ल सप्तमी व श्रावण शुक्ल दशमी।
102. सैपऊ महादेव – सैपऊ (धौलपुर) – फाल्गुन व श्रावण मास की चतुर्दशी।
नोट : पर्यटन विभाग (राजस्थान) द्वारा आयोजित किए जाने वाले मेले एवं उत्सव –
103. ऊँट महोत्सव – बीकानेर – जनवरी।
104. मरु महोत्सव – जैसलमेर – जनवरी-फरवरी।
105. हाथी महोत्सव – जयपुर – मार्च।
106. मत्स्य उत्सव – अलवर – सितम्बर-अक्टूबर।
107. ग्रीष्म महोत्सव (समर फेस्टिवल) – माउन्ट आबू एवं जयपुर – मई-जून।
108. मारवाड़ महोत्सव – जोधपुर – अक्टूबर।
109. वागड़ मेला – डूँगरपुर – नवम्बर।
110. शरद महोत्सव – माउन्ट आबू – दिसम्बर।
111. डीग महोत्सव – डीग (भरतपुर) – जन्माष्टमी।
112. थार महोत्सव – बाड़मेर।
113. मीरा महोत्सव – चित्तौड़गढ़ – अक्टूबर।
114. गणगौर मेला – जयपुर – मार्च।
115. तीर्थराज मेला :- मचकुण्ड (धौलपुर)।
116. श्री जगदीश महाराज का मेला :- जयपुर।
116. भद्रकाली मेला/पल्लू मेला :- हनुमानगढ़।
117. सारणेश्वर मेला :- सिरोही में (भाद्रपद शुक्ल एकादशी/द्वादशी)
118. बैलून महोत्सव :- बाड़मेर।
119. गरुड़ मेला :- बंशी जहाजपुर (भरतपुर) – कार्तिक माह।
120. राष्ट्रीय जनजाति मेला :- डूँगरपुर।
121. देव सोमनाथ मेला :- डूँगरपुर।
122. हिण्डोला उत्सव :- रंगजी के मंदिर (पुष्कर) में श्रावण मास में छोटी तीज से बड़ी तीज तक आयोजित उत्सव।
123. गणगौर की सवारी (जैसलमेर) :- जैसलमेर की शाही गणगौर दुनिया की निराली गणगौर है। यहाँ गणगौर की सवारी चैत्र शुक्ल तृतीया के स्थान पर चैत्र शुक्ल चतुर्थी को निकाली जाती है।
124. सांगोद का न्हाण (कोटा) :- कोटा जिले में ही ‘सांगोद का न्हाण’ भी प्रसिद्ध है। न्हाण का प्रचलन नवीं शताब्दी से माना जाता है। होली के अवसर पर मनाए जाने वाले इस उत्सव में ग्रामवासी विचित्र वेशभूषा में सज कर अखाड़े निकालते हैं। सांगोद के न्हाण का प्रचलन वीरवर सांगा गुर्जर की पुण्य स्मृति में 9वीं शताब्दी से माना जाता है।
125. ‘मारगपाली’ की सवारी :- जयपुर में अन्नकूट यानी कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा के दिन यह सवारी निकलती थी।
126. वरकाणा का मेला :- पाली जिले में रानी के पास वरकाणा जैन तीर्थस्थल पर प्रतिवर्ष पौष शुक्ल दशमी को यह मेला भरता है।
127. गोरिया गणगौर का मेला :- आदिवासियों का यह गणगौर मेला बाली तहसील (पाली) के गोरिया ग्राम में प्रतिवर्ष वैशाख शुक्ल सप्तमी को भरता है।
128. चमत्कारजी का मेला :- आलनपुर (सवाईमाधोपुर) में श्री चमत्कारजी (ऋषभदेवजी) जैन मंदिर में प्रतिवर्ष शरद पूर्णिमा को यह प्रसिद्ध मेला लगता है।
129. सलक :- दशहरे के अगले दिन जयपुर में होने वाला विशिष्ट समारोह।
130. खंग स्थापन :- आश्विन शुक्ल प्रतिपदा को मेवाड़ में मनाया जाने वाला सामरिक समारोह।
Note:-
- राज्य में सर्वाधिक मेले :- डूँगरपुर में (21 मेले)।
- राज्य में सर्वाधिक पशु मेले :- नागौर में।
राज्य-स्तरीय पशु मेले :-
1. श्री मल्लीनाथ पशु मेला – तिलवाड़ा, (बाड़मेर) – यह मेला लूनी नदी के किनारे भरता है।– चैत्र कृष्ण एकादशी से चैत्र शुक्ल एकादशी (अप्रैल) तक यह मेला भरता है।
2. श्री बलदेव पशु मेला – मेड़ता (नागौर) – चैत्र शुक्ल एकम् से पूर्णिमा तक (अप्रैल) यह मेला भरता है।
3. श्री तेजाजी पशु मेला – परबतसर (नागौर) –श्रावण पूर्णिमा से भाद्रपद अमावस्या (अगस्त) तक यह मेला भरता है।
4. श्री गोमतीसागर पशु मेला – झालरापाटन (झालावाड़) – वैशाख शुक्ल त्रयोदशी से ज्येष्ठ कृष्ण पंचमी तक (मई) यह मेला भरता है।
5. चन्द्रभागा पशु मेला – झालरापाटन (झालावाड़) – कार्तिक शुक्ल एकादशी से मार्गशीर्ष कृष्ण पंचमी तक (नवम्बर) यह मेला चन्द्रभागा नदी के किनारे भरता है।
6. जसवंत पशु मेला – भरतपुर – आश्विन शुक्ल पंचमी से चतुर्दशी तक (अक्टूबर) यह मेला भरता है।
7. कार्तिक पशु मेला – पुष्कर (अजमेर) - कार्तिक शुक्ल अष्टमी से मार्गशीर्ष द्वितीया तक (नवम्बर) यह मेला भरता है।
8. महाशिवरात्रि पशु मेला – करौली – फाल्गुन कृष्ण त्रयोदशी से यह मेला प्रारंभ (मार्च) होता है।
9. सेवाड़िया पशु मेला – रानीवाड़ा (जालोर)।
10. गोगामेड़ी पशु मेला – हनुमानगढ़।
11. रामदेव पशु मेला – नागौर।
12. बदराना पशु मेला :- शेखावाटी का प्रसिद्ध पशु मेला, जो नवलगढ़ (झुंझुनूँ) में आयोजित होता है।
13. बजरंग पशु मेला – उच्चैन (भरतपुर) – आश्विन कृष्ण द्वितीया से अष्टमी तक यह मेला भरता है।
14. बजरंग पशु मेला – सिणधरी (बाड़मेर)
मुस्लिम समाज के प्रमुख उर्स-
1. उर्स गरीब नवाज-अजमेर :- ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती का 1256 ई. में एकांत वास में 6 दिन की प्रार्थना के पश्चात् स्वर्गवास हो गया।
अजमेर में ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती की मृत्यु की बरसी के रूप में 1 से 6 रज्जब तक ख्वाजा का उर्स मनाया जाता है।
अजमेर के ऐतिहासिक बुलंद दरवाजे पर झंडा चढ़ने के साथ ही उर्स की अनौपचारिक शुरुआत होती है।
अजमेर में इस उर्स के दौरान सामाजिक सद्भाव व राष्ट्रीय एकता का अनूठा संगम दिखाई देता है।
2. तारकीन का उर्स-नागौर :- नागौर में सूफियों की चिश्ती शाखा के संत काजी हमीदुद्दीन नागौरी की दरगाह है जहाँ पर अजमेर के बाद सबसे बड़ा उर्स भरता है।
3. गलियाकोट का उर्स-डूँगरपुर :- माही नदी के निकट स्थित गलियाकोट ने दाऊदी बोहरों का प्रमुख तीर्थ स्थान है।
यहाँ फखरुद्दीन पीर की मजार भी है।
यहाँ पर प्रतिवर्ष उर्स आयोजित किया जाता है।
4. नरहड़ की दरगाह का मेला-झुंझुनूँ:- झुंझुनूँ जिले के नरहड़ गाँव में ‘हजरत हाजिब शक्कर बादशाह’ की दरगाह है जो शक्कर पीर बाबा की दरगाह के नाम से प्रसिद्ध है।
यहाँ कृष्ण जन्माष्टमी के दिन विशाल मेला लगता है।
5. ख्वाजा नजमुद्दीनशाह का उर्स :- फतेहपुर (सीकर)।
हिन्दू समाज के त्योहार
राष्ट्रीय पंचांग : - भारत का राष्ट्रीय पंचांग शक संवत् पर आधारित है।
- ग्रिगेरियन कैलेण्डर का आधार भी शक संवत् ही है। शक संवत् का पहला महीना चैत्र का एवं अंतिम महीना फाल्गुन का होता है।
- भारतीय संविधान ने शक संवत् को राष्ट्रीय पंचांग के रूप में ’22 मार्च, 1957’ को अपनाया था।
- सामान्यत: चैत्र माह का पहला दिन 22 मार्च को पड़ता है, यदि अधिवर्ष है तो 21 मार्च को पड़ेगा, लेकिन हमेशा ही ऐसा हो, यह आवश्यक नहीं है।
शक संवत् : - शक संवत् का प्रारम्भ 78 ई. (78A.D.) में कुषाण शासक कनिष्क के काल में हुआ था। यह ग्रिगेरियन कैलेण्डर वर्ष से 78 वर्ष पीछे रहता है।
नव संवत् (विक्रम संवत् - भारत में हिन्दू पंचांग विक्रम संवत् पर आधारित है। विक्रम संवत् का प्रारम्भ 57 ई. पू. (B. C.) में हुआ था। इस संवत् के वर्ष का प्रारम्भ चैत्र शुक्ल एकम् से होता है एवं समाप्ति फाल्गुन अमावस्या को होती है। यह वर्ष ग्रिगेरियन कैलेण्डर से 57 वर्ष आगे रहता है।
12 हिन्दी महीनों के नाम – हिन्दू धर्म में हिन्दी पंचांग के अनुसार : -
1. चैत्र 7. आश्विन
2. वैशाख 8. कार्तिक
3. ज्येष्ठ 9. मार्ग शीर्ष
4. आषाढ़ 10 पौष
5. श्रावण 11. माघ
6. भाद्रपद 12. फाल्गुन
प्रत्येक माह में दो पक्ष होते हैं : -
1. कृष्ण पक्ष/बदी पक्ष – 15 दिन - अमावस्या अंतिम दिन।
2. शुक्ल पक्ष/सुदी पक्ष – 15 दिन - पूर्णिमा अंतिम दिन।
- प्रत्येक माह में 30 दिन होते हैं।
- नव वर्ष का प्रथम माह – चैत्र
- नव वर्ष का अंतिम माह – फाल्गुन
- नव वर्ष का प्रथम दिन – चैत्र शुक्ल प्रतिपदा
- नव वर्ष का अंतिम दिन – चैत्र अमावस्या
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हिन्दी माह |
अंग्रेजी माह |
हिन्दी माह |
अंग्रेजी माह |
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1. पौष - माघ |
जनवरी |
2.माघ - फाल्गुन |
फरवरी |
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3. फाल्गुन - चैत्र |
मार्च |
4. चैत्र - वैशाख |
अप्रैल |
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5. वैशाख - ज्येष्ठ |
मई |
6. ज्येष्ठ - आषाढ़ |
जून |
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7. आषाढ़ - श्रावण |
जुलाई |
8. श्रावण - भाद्रपद |
अगस्त |
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9. भाद्रपद - आश्विन |
सितम्बर |
10. आश्विन - कार्तिक |
अक्टूबर |
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11. कार्तिक - मार्गशीर्ष |
नवम्बर |
12.मार्गशीर्ष - पौष |
दिसम्बर |
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पूर्णिमा के दिन आने वाले पर्व - 1. चैत्र पूर्णिमा – हनुमान जयंती। 2. वैशाख पूर्णिमा – बुद्ध/पीपल पूर्णिमा। 3. आषाढ़ पूर्णिमा – गुरु पूर्णिमा। 4. श्रावण पूर्णिमा – रक्षाबन्धन/नारियल पूर्णिमा। 5. भाद्रपद पूर्णिमा – श्राद्ध पक्ष का आरम्भ। 6. आश्विन पूर्णिमा – शरद पूर्णिमा। 7. कार्तिक पूर्णिमा – त्रिपुर पूर्णिमा। 8. मार्गशीर्ष पूर्णिमा – मानगढ़ धाम पर्व। 9. माघ पूर्णिमा – बेणेश्वर पर्व। 10. फाल्गुन पूर्णिमा – होली। |
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अमावस्या के दिन आने वाले पर्व - 1. श्रावण अमावस्या – हरियाली अमावस्या 2. भाद्रपद अमावस्या – सतिया अमावस्या 3. आश्विन अमावस्या – श्राद्ध पक्ष का समाप्त 4. कार्तिक अमावस्या – दीपावली 5. माघ अमावस्या – मौनी अमावस्या |
नवरात्र : -
- नवरात्र वर्ष में चार बार आते हैं।
- दो शक्तिपीठ नवरात्र होते हैं अर्थात् देवियों को समर्पित होते हैं जबकि दो गुप्त नवरात्र होते हैं अर्थात् तांत्रिकों को समर्पित होते हैं।
शक्तिपीठ/देवियों को समर्पित नवरात्र : -
- इन नवरात्रों में 9 दिनों तक व्रत किया जाता हैं तथा माँ दुर्गा के 9 रूपों की पूजा की जाती हैं।
1. चैत्र नवरात्रा/बसन्तीय नवरात्र – चैत्र शुक्ल एकम् से चैत्र शुक्ल नवमी तक।
2. आश्विन नवरात्रा/शरदीय नवरात्र – आश्विन शुक्ल एकम् से आश्विन शुक्ल नवमी तक।
गुप्त नवरात्रा/तांत्रिक नवरात्र : -
- यह नवरात्र तांत्रिकों को समर्पित होते हैं तथा तन्त्र और मन्त्रों की उपासना करते हैं।
1. आषाढ़ नवरात्र – आषाढ़ शुक्ल एकम् से आषाढ़ शुक्ल नवमी तक।
2. माघ नवरात्र – माघ शुक्ल एकम् से माघ शुक्ल नवमी तक।
- राजस्थान में त्योहारों का आरम्भ छोटी तीज (श्रावण शुक्ल तृतीया) से तथा त्योहारों का समाप्त गणगौर (चैत्र शुक्ल तृतीया) से माना जाता है।
कहावत– ‘तीज त्योहारा बावड़ी, ले डूबी गणगौर’।
सिंजारा : -
- छोटी तीज, बडी तीज, गणगौर, हर तालिका तीज इनसे एक दिन पूर्व सिंजारा का त्योहार मनाया जाता हैं।
- सिंजारा का अर्थ – शृंगार की सामग्री।
- अविवाहित और नवविवाहित महिलाओं के लिए इस दिन ससुराल पक्ष की ओर से जो शृंगार का सामान आता है उसे सिंजारा/शृंगारा कहा जाता है।
- इस शृंगार की सामग्री से विवाहित और अविवाहित महिलाएँ 16 शृंगार करती है।
धींगा गणगौर : - वैशाख कृष्ण तृतीया को उदयपुर में ‘धींगा गणगौर’ का त्योहार मनाया जाता है।
श्रावण माह के त्योहार
कृष्ण पक्ष : -
निडरी नवमी - श्रावण कृष्ण नवमी - सांपों के आक्रमण से बचने के लिए श्रावण कृष्ण नवमी को नेवलों का पूजन किया जाता है।
कामिका एकादशी - श्रावण कृष्ण एकादशी - इस व्रत में विष्णु भगवान की पूजा की जाती है। कामिका एकादशी को विष्णु का सबसे उत्तम व्रत माना जाता है।
हरियाली अमावस्या/श्रावण अमावस्या : - यह त्योहार सावन में प्रकृति पर आई बहार की खुशी में मनाया जाता है।
- हरियाली अमावस्या पर पीपल के वृक्ष की पूजा की जाती हैं तथा मालपूए का भोग चढ़ाए जाने की परम्परा है।
- इस दिन मांगलियावास (अजमेर) में कल्पवृक्ष का मेला भी भरता है।
शुक्ल पक्ष : -
श्रावणी तीज/छोटी तीज - श्रावण शुक्ल तृतीया - छोटी तीज ही अधिक प्रसिद्ध है।
कहावत - ‘तीज त्योहारा बावड़ी, ले डूबी गणगौर’ अर्थात् तीज त्योहारों को लेकर आती है जिनको गणगौर अपने साथ वापस ले जाती है।
- तीज का त्योहार मुख्यत: बालिकाओं और नवविवाहिताओं का त्योहार है।
- जयपुर की तीज की सवारी विश्व प्रसिद्ध है।
इस दिन का प्रतीक – सुहाग पिहारी, नवग्रह।
इस तीज के उपनाम – श्रावण तीज, हरियाली तीज, शृंगारिक तीज।
इस दिन सावन के गीत गाए जाते हैं।
इस दिन का प्रिय वस्त्र – लहरिया – (जयपुर का प्रसिद्ध)।
नाग पंचमी - श्रावण शुक्ल पंचमी - इस दिन नाग देवता या सर्प की पूजा की जाती है।
- इस दिन अष्ट नागों की पूजा की जाती है।
- इस दिन जोधपुर में नाग पंचमी का मेला लगता है।
रक्षाबंधन : - भाई - बहन के स्नेह का त्योहार।
- इस दिन घर के प्रमुख द्वार के दोनों ओर श्रवण कुमार के चित्र बनाकर पूजन करते हैं।
- भारत के प्रसिद्ध तीर्थ अमरनाथ में बर्फ का शिवलिंग रक्षाबन्धन के त्योहार पर ही अपने पूर्ण आकार का बनता है।
- यह त्योहार श्रावण पूर्णिमा को मनाया जाता है।
- इसे नारियल पूर्णिमा/सत्य पूर्णिमा भी कहा जाता है।
भाद्रपद के त्योहार
कृष्ण पक्ष : -
बड़ी तीज / सातुड़ी तीज / कजली तीज - भाद्रपद कृष्ण तृतीया - यह त्योहार अखंड सुहाग व मनोनुकूल वर की कामना से जुड़ा हुआ है।
- इस पर्व पर सत्तू से बने विशेष व्यंजनों का आदान - प्रदान होता है।
- इस दिन नीम की पूजा की जाती है। बूँदी की ‘कजली तीज की सवारी’ प्रसिद्ध ।
हल षष्ठी - भाद्रपद कृष्ण षष्ठी - यह त्योहार भगवान कृष्ण के बड़े भाई बलरामजी के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है।
- इस दिन हल की पूजा की जाती है व गाय के दूध ओर दही का प्रयोग वर्जित होता है।
ऊब छठ - भाद्रपद कृष्ण षष्ठी - ऊब छठ का व्रत और पूजा विवाहित स्त्रियाँ पति की लम्बी आयु व कुंवारी लड़कियाँ अच्छे पति की कामना के लिए करती हैं।
- इस व्रत को ‘चंदन षष्ठी व्रत’ भी कहा जाता है।
कृष्ण जन्माष्टमी - भाद्रपद कृष्ण अष्टमी - यह भगवान कृष्ण का जन्मोत्सव है।
- इस दिन मंदिरों में श्रीकृष्ण के जीवन से संबंधित झाँकियाँ सजाई जाती हैं और पूरे दिन उपवास के बाद रात के बारह बजे श्रीकृष्ण का जन्म होने पर श्रीकृष्ण की आरती व विशेष पूजा - अर्चना करके भोजन ग्रहण किया जाता है।
गोगा नवमी - भाद्रपद कृष्ण नवमी - इस दिन लोकदेवता गोगाजी की पूजा की जाती है।
- हनुमानगढ़ जिले में ‘गोगामेड़ी’ नामक स्थान पर मेला भरता है।
- इस दिन का प्रतीक – गोगाजी की मृणमूर्ति।
बछबारस - भाद्रपद कृष्ण द्वादशी - इसे वत्स द्वादशी भी कहते हैं।
- इस दिन का व्रत संतान की लम्बी आयु व उसके उज्ज्वल भविष्य के लिए किया जाता है।
- इस दिन गाय व बछड़े का पूजन किया जाता है तथा महिलाएँ चाकू से कटी भोजन सामग्री का उपयोग नहीं करती।
- इस दिन गाय के दूध, दही ओर इससे निर्मित पदार्थों का सेवन वर्जित है।
- इस त्योहार के उपनाम – वत्स/वैदिक धेनु द्वादशी।
भाद्रपद अमावस्या/सतियाँ अमावस्या -
- इस दिन सतियों की पूजा होती है।
शुक्ल पक्ष : -
बाबा री बीज - भाद्रपद शुक्ल द्वितीया – इस दिन रामदेव जी का मेला आरम्भ होता है।
हरतालिका तीज - भाद्रपद शुक्ल तृतीया - इस दिन रेत के शंकर - पार्वती बनाकर उन्हें फूलों से सजाया जाता है।
- इस दिन पार्वती व शंकर की पूजा होती है।
- यह महिलाओं का प्रमुख त्योहार है।
शिवा चतुर्थी - भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी - इस दिन स्त्रियाँ उपवास करती हैं तथा अपने सास - ससुर को घी, गुड़, लवण आदि से बना भोजन कराती हैं।
‘चतड़ा/चतरा चौथ’/गणेश चतुर्थी - भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी - भगवान गणेश के जन्मदिन के उत्सव को गणेश चतुर्थी के रूप में जाना जाता है।
- गणेश - चतुर्थी का उत्सव 10 दिन के बाद अनन्त चतुर्दशी के दिन समाप्त होता है।
- यह त्योहार ‘चतरा चौथ’ के नाम से भी जाना जाता है।
ऋषि पंचमी - भाद्रपद शुक्ल पंचमी - इस दिन गंगा स्नान का विशेष महात्म्य है।
- इस दिन विशेष रूप से सप्त ऋषियों का पूजन किया जाता है।
- माहेश्वरी समाज में राखी इसी दिन मनाई जाती है।
- भूल – चूक में हुए पापों से मुक्ति – व्रत
इस दिन भगवान विष्णु की पूजा की जाती है।
राधाष्टमी - भाद्रपद शुक्ल अष्टमी - कृष्ण जन्माष्टमी के 15 दिन बाद राधाजी के जन्म के रूप में मनाया जाता है।
- इस दिन अजमेर की निम्बार्क पीठ ‘सलेमाबाद’ में मेला भरता है।
तेजा दशमी - भाद्रपद शुक्ल दशमी
- इसे तेजाजी का निर्वाण दिवस के रूप में मनाया जाता है।
- इस दिन मेला – खड़नाल (नागौर)।
- इस दिन विश्वकर्मा जयंती भी मनाते हैं।
डोल ग्यारस/जलझूलनी/देवझूलनी एकादशी - भाद्रपद शुक्ल एकादशी - इस दिन भगवान विष्णु के वामन अवतार का व्रत व पूजन किया जाता है।
- इस दिन देव प्रतिमाओं को तालाब के शाही स्नान करवाया जाता है।
- इस दिन ठाकुर जी की सवारी निकलती है जिसे रेवाड़ी कहा जाता है।
अनंत चतुर्दशी - भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी - इसे ‘अनंत व्रत’ भी कहते हैं जिसका अनुष्ठान स्त्री - पुरुष दोनों ही करते हैं।
- अनंत देव भगवान विष्णु का एक विशेषण है।
- अनंत व्रत के प्रभाव से ही पांडव महाभारत युद्ध में विजयी हुए थी ।
- इस दिन गणेश जी की मूर्ति का विसर्जन होता है।
- इस दिन का व्रत दोपहर तक ही किया जाता है।
श्राद्धपक्ष -भाद्रपद पूर्णिमा - भाद्रपद पूर्णिमा से लेकर आश्विन अमावस्या तक सनातन में पित्ररों/पूर्वजों की पूजा की जाती हैं।
- इन दिनों में ब्राह्मणों को भोजन करवाना ही श्राद्ध पक्ष कहलाता है।
साँझी :- इस त्योहार में 15 दिन (भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या) तक कुँवारी कन्याएँ भाँति - भाँति की साँझी बनाती है व पूजा करती हैं।
आश्विन माह के त्योहार
कृष्ण पक्ष : -
आश्विन कृष्ण प्रतिपदा : - श्राद्ध पक्ष का दूसरा दिन।
अहोई अष्टमी : - कार्तिक कृष्ण अष्टमी।
- इस दिन पुत्रवती स्त्रियाँ निर्जल व्रत रखती है।
आश्विन अमावस्या : - श्राद्ध पक्ष का अंतिम दिन ।
शुक्ल पक्ष : -
नवरात्रा - प्रारम्भ ।
दुर्गाष्टमी - आश्विन शुक्ल अष्टमी – इस दिन नौ कन्याओं को भोजन करवाया जाता है।
- दुर्गाष्टमी का त्योहार बंगालियों का प्रसिद्ध पर्व है।
आश्विन शुक्ल नवमी : - नवरात्रा का नवाँ दिन।
दशहरा - आश्विन शुक्ल दशमी - दशहरा/विजय दशमी/आयुध पूजा हिन्दुओं का एक प्रमुख त्योहार है।
- दशहरे के दिन जगह - जगह रावण, कुंभकर्ण व मेघनाथ के पुतले जलाए जाते हैं।
- भारत में मैसूर तथा कुल्लू का दशहरा प्रसिद्ध है।
- राजस्थान में कोटा का दशहरा मशहूर है।
- दशहरे पर शमी वृक्ष (खेजड़ी) की पूजा की जाती है और लीलटांस पक्षी का दर्शन शुभ माना जाता है।
- इस दिन भगवान राम ने रावण का वध किया था अर्थात् बुराई पर अच्छाई की विजय हुई इस लिए इसे विजय दशमी कहा जाता है।
इस दिन खेजड़ी की पूजा की जाती है तथा शस्त्र व शस्त्रों की पूजा की जाती है।
इस दिन राजस्थान में दशहरा का सबसे बडा मेला कोटा में भरता है।
इस दिन लीलटांस पक्षी का दर्शन करना शुभ माना जाता है।
शरद पूर्णिमा - आश्विन पूर्णिमा - इसे ‘कोजागरी पूर्णिमा’ या ‘रास पूर्णिमा’ भी कहते हैं।
इस दिन चन्द्रमा अपनी 16 कलाओं से परिपूर्ण होता है।
इस दिन रात्रि में खीर बनाकर छत पर रखी जाती है तथा प्रात: काल इस खीर का सेवन किया जाता है।
इसे सभी पूर्णिमाओं में से सर्वश्रेष्ठ पूर्णिमा मानी जाती है।
कार्तिक माह के त्योहार
कृष्ण पक्ष : -
करवा चौथ - कार्तिक कृष्ण चतुर्थी - करवा चौथ को कर्क चतुर्थी भी कहा जाता है।
- इस दिन करवा/दीपक भेंट किए जाते हैं।
तुलसी एकादशी - कार्तिक कृष्ण एकादशी - तुलसी एकादशी को रमा एकादशी भी कहते हैं।
- इस दिन तुलसी का व्रत व पूजन किया जाता है।
- तुलसी को विष्णु प्रिया भी माना जाता है।
धनतेरस - कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी - इस दिन को भगवान धन्वंतरी के जन्म दिवस के रूप में भी मनाया जाता है।
- इस दिन यमराज की पूजा की जाती है।
- इस दिन नए बर्तन खरीदना शुभ माना जाता है।
- इस दिन दक्षिण दिशा में दीपक जलाया जाता है।
रूप चतुर्दशी - कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी - इसे ‘नरक चतुर्दशी’ भी कहते हैं क्योंकि यह माना जाता है कि इस दिन जो व्यक्ति स्नान - ध्यान व दीपदान करता है उसे नरक नहीं जाना पड़ता है।
- विष्णु पुराण के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु ने नरकासुर का वध किया था।
- इसे छोटी दिपावली भी कहा जाता है।
- इस दिन का सम्बन्ध सुन्दरता और सौन्दर्य से है इसलिए इसे रूप चुतुर्दशी कहा जाता है।
- इस पर्व का संबंध स्वच्छता व सौन्दर्यता का है।
दीपावली - कार्तिक अमावस्या - यह हिन्दुओं का सबसे बड़ा त्योहार है।
- हिंदू मान्यता है कि त्रेतायुग में भगवान श्रीराम चौदह वर्ष के वनवास के पश्चात लंका पर विजय प्राप्त करके अयोध्या आए थे जब अयोध्या में घर - घर घी के दीपक जलाए गए थे।
- सिक्खों की मान्यता है कि जहाँगीर ने गुरु हरगोविंद को इसी दिन कैद से मुक्त किया। इस पर्व को दीपोत्सव के रूप में मनाया जाता है।
- इस दिन आर्य समाज संस्थापक स्वामी दयानन्द सरस्वती एवं भगवान महावीर का निर्वाण दिवस भी मनाया जाता है।
शुक्ल पक्ष
गोवर्धन पूजा व अन्नकूट - कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा - दीपावली की अगली सुबह गोवर्धन पूजा होती है।
- इस दिन गायों की पूजा की जाती है। मान्यता है कि गाय देवी लक्ष्मी का स्वरूप है।
- राजस्थान में नाथद्वारा का अन्न कूट प्रसिद्ध है।
इस दिन गाय के गोबर से गोवर्धन पर्वत बनाकर पूजा की जाती है।
इस दिन वल्लभ सम्प्रदाय के सभी मंदिरों में अन्नकूट महोत्सव मनाया जाता है।
भारत में सबसे बडा अन्नकूट महोत्सव – श्रीनाथ मंदिर (नाथद्वारा, राजसमन्द)
इस दिन भीलों की लूट प्रसिद्ध है।
भैयादूज - कार्तिक शुक्ल द्वितीया - यह पर्व दीपावली के दो दिन बाद मनाया जाता है।
- यह भाई - बहन के प्यार का प्रतीक है।
- इसे यम द्वितीया के रूप में भी मनाया जाता है।
- इस दिन बहन भाई के तिलक लगाकर पूजा करती है तथा मंगलकामना करती है।
गोपाष्टमी - कार्तिक शुक्ल अष्टमी - यह हमारी कृषि संस्कृति की देन है।
- गायों के आदर सत्कार व शृंगार हेतु यह पर्व मनाया जाता है।
- इस दिन गाय व बछड़ों की पूजा तथा गाय के दूध व दूध के बने पदार्थों का सेवन नहीं किया जाता है।
आँवला नवमी/अक्षय नवमी - कार्तिक शुक्ल नवमी - इसे ‘धात्री नवमी’ या ‘कूष्माण्ड नवमी’ भी कहते हैं।
- इस दिन आँवले के वृक्ष का पूजन तथा उसकी परिक्रमा की जाती है।
देवउठनी ग्यारहस - कार्तिक शुक्ल एकादशी - इसे प्रबोधिनी एकादशी भी कहते हैं।
- इस दिन भगवान विष्णु चार माह उपरांत जागे थे।
- इस दिन से ही समस्त मांगलिक कार्य/शादी - विवाह शुरू किए जाते हैं।
- इस दिन तुलसी और शालिग्राम के विवाह का आयोजन भी होता हैं।
- इसे ‘तुलसी एकादशी’ भी कहा जाता है।
- इसके उपनाम – प्रबोधिनी/अल्पनिद्रा/देवोत्थान एकादशी।
देव दीपावली - कार्तिक पूर्णिमा - इस दिन भगवान शिव द्वारा त्रिपुरासुर नामक राक्षस का वध किए जाने के कारण इसे ‘त्रिपुरा पूर्णिमा’ भी कहते हैं।
- इस दिन पुष्कर (अजमेर) में मेला भरता है।
मार्गशीर्ष माह के त्योहार
कृष्ण पक्ष : -
काल भैरव जयंती/अष्टमी - मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी ।
इस दिन भैरव की पूजा की जाती है।
इस दिन भगवान शिव भैरव के रूप में प्रकट हुए थे।
दत्तात्रेय जन्मोत्सव - मार्गशीर्ष कृष्ण दशमी।
माघ माह के त्योहार
कृष्ण पक्ष : -
मकर संक्रांति : - यह पर्व माघ माह में कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा को जब सूर्य मकर राशि में प्रविष्ट होता है उस दिन मनाया जाता है।
- सामान्यत: यह त्योहार 14 जनवरी को मनाया जाता है।
- सक्रांति के एक दिन पूर्व तिल के लड्डू, पपड़ी, बरफी, फीनी इत्यादि बनाए जाते हैं।
- इस दिन दान पुण्य का विशेष महत्त्व होता है।
- इस दिन रूठी सास को मनाए जाने की भी प्रथा है।
तिल चौथ - माघ कृष्ण चतुर्थी - इसे संकट चौथ, वक्रतुण्डी चतुर्थी तथा तिलकुटा चौथ भी कहते हैं।
- इस दिन सवाईमाधोपुर में चौथ माता का भव्य मेला भरता है।
षट्तिला एकादशी - माघ कृष्ण एकादशी - इस दिन 6 प्रकार के तिलों का प्रयोग किया जाता है जिसके कारण इसका नामकरण षट्तिला एकादशी पड़ा है।
मौनी अमावस्या - माघ अमावस्या - इस दिन मौन व्रत रखा जाता है।
- यह दिन मनु के ‘जन्म दिवस’ के रूप में भी मनाया जाता है।
- इस दिन पवित्र नदी खासतौर पर गंगा का जल अमृत बन जाता है।
- माघ स्नान के लिए मौनी अमावस्या को बहुत ही प्रसिद्ध है।
- इस दिन मनुस्मृति के लेखक आचार्य मनु का जन्म हुआ था।
शुक्ल पक्ष : -
बसंत पंचमी - माघ शुक्ल पंचमी - बसंत पंचमी को ज्ञान की देवी सरस्वती और प्रेम के देवता रतिदेव (कामदेव) का पूजन करने की परम्परा रही है।
- यह दिन ऋतुराज बसंत के आगमन का प्रथम दिवस माना जाता है।
इस दिन माँ सरस्वती की पूजा की जाती है।
- इस पर्व के अधिदेवता भगवान कृष्ण है।
- यह पर्व ब्रज क्षेत्र में धूमधाम से मनाया जाता है।
- इस दिन पीले रंग का विशेष महत्त्व होता है।
– इस दिन लोग पीले कपड़े धारण करते हैं और पीले रंग के चावलों का सेवन करते हैं।
अचला सप्तमी / सौर सप्तमी / भानु सप्तमी / बसंत सप्तमी - माघ शुक्ल सप्तमी - भगवान सूर्य नारायण को प्रसन्न करने के लिए इस दिन सप्तमी का व्रत किया जाता है।
- जयपुर का सूर्य सप्तमी का मेला राजस्थान में प्रसिद्ध है।
माघ पूर्णिमा : - स्नान पर्वों का यह अंतिम पर्व है।
- इस दिन गंगा स्नान का भी विशेष महत्त्व होता है।
- इस दिन बेणेश्वर धाम में विशाल मेला भरता है।
फाल्गुन माह के त्योहार
कृष्ण पक्ष : -
महाशिवरात्रि - फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी - इसी दिन भगवान शिव का ब्रह्मा से रूद्र रूप में अवतरण हुआ था।
- इस दिन शिव की दुग्ध व बिल पत्रों से पूजा - अर्चना की जाती है।
- इस दिन भगवान शिव व पार्वती का विवाह हुआ था।
- इस दिन भगवान शिव ने राक्षसों द्वारा तैयार किया गया जहर को अपने कंठों में रखा इसलिए भगवान शिव नीलकंठ कहलाए।
इस दिन के मेलें -
शुक्ल पक्ष : -
- ढूँढ़ - फाल्गुन शुक्ल एकादशी - बच्चा होने पर ढूँढ़ होली से पहले वाली ग्यारहस को पूजते हैं।
- इस दिन छोटे बच्चों के लिए ननिहाल से नानी के द्वारा जो मिठाई कपडे़ खिलोनें लाए जाते हैं उसे ढूँढ़ कहते हैं।
आँवल / आमलकी एकादशी - फाल्गुन शुक्ल एकादशी - इस दिन आँवले के वृक्ष की पूजा की जाती है।
होली - फाल्गुन पूर्णिमा - रंगों का त्योहार।
- इस दिन हिरण्यकश्यप की आज्ञा पर उसकी बहन होलिका अपने भतीजे प्रहलाद को गोद में लेकर अग्नि में प्रविष्ट हुई थी लेकिन प्रहलाद बच गया था तथा होलिका जल गई थी।
- यह फाल्गुन माह में मनाए जाने के कारण इसे फाल्गुनी भी कहते हैं।
चैत्र माह के त्योहार
कृष्ण पक्ष : -
धुलंडी - चैत्र कृष्ण प्रतिपदा - होली के दूसरे दिन धुलंडी मनाई जाती है।
- इसी दिन गणगौर पूजन प्रारम्भ होता है।
- इस दिन होलिका की राख की पूजा और वंदना की जाती है तथा रंग और गुलाल से होली खेलते हैं।
राजस्थान की प्रसिद्ध होलीयाँ –
जमरा बीज - चैत्र कृष्ण द्वितीय ।
घुड़ला का त्योहार - चैत्र कृष्ण अष्टमी - यह त्योहार राजस्थान के मारवाड़ क्षेत्र में चैत्र कृष्ण अष्टमी से लेकर चैत्र शुक्ल तृतीया तक 16 दिनों तक मनाया जाता है।
- इस त्योहार पर घुड़ला नृत्य तथा घुड़ला गीत गाया जाता है।
शीतलाष्टमी - चैत्र कृष्ण अष्टमी - इस दिन शीतला माता का व्रत व पूजन किया जाता है।
- शीतलाष्टमी के एक दिन पूर्व उन्हें भोग लगाने के लिए बासी खाने का भोग यानि बास्योड़ा तैयार किया जाता है।
- शीतलाष्टमी के दिन चाकसू (जयपुर) में शीतला माता का विशाल मेला भरता है।
- इस दिन गाँवों में महिलाएँ खेजड़ी की पूजा करती है।
शुक्ल पक्ष : -
नवसंवत्सर - चैत्र शुक्ल प्रतिपदा – इस दिन नया विक्रम संवत् का पहला दिन होता है।
- हिन्दुओं का नववर्ष इसी दिन से प्रारम्भ होता है।
- महाराष्ट्र में इस दिन ‘गुडी पड़वा’, आंध्र प्रदेश में उगादि (युगादि), कश्मीर में ‘नवरेह’ के नाम से नववर्ष मनाया जाता है।
- ऐतिहासिक दृष्टि से सम्राट चंद्रगुप्त विक्रमादित्य ने इसी दिन शकों पर विजय प्राप्त की थी।
नवरात्रा आरम्भ – इस दिन/नवरात्रों में माँ दुर्गा के नव रूपों की नव दिनों तक पूजा कि जाती है : -
अरुन्धती व्रत - चैत्र शुक्ल प्रतिपदा - यह व्रत चैत्र शुक्ल की प्रतिपदा से आरम्भ होता है और चैत्र शुक्ल तृतीया को समाप्त होता है।
गणगौर - चैत्र शुक्ल तृतीया - यह ‘सौभाग्य तृतीया’ के रूप में भी प्रसिद्ध है।
- यह सुहागिन स्त्रियों का सर्वाधिक प्रिय त्योहार है।
- यह शिव व पार्वती के अखंड प्रेम का प्रतीक पर्व है।
- गणगौर में ‘गण’ महादेव का व ‘गौर’ पार्वती का प्रतीक है।
- इस दिन गणगौर माता की सवारी निकाली जाती है।
- गणगौर का त्योहार राजस्थानी त्योहारों में सबसे अधिक गीतों वाला त्योहार हैं।
अशोकाष्टमी - चैत्र शुक्ल अष्टमी - इस दिन अशोक के वृक्ष का पूजन किया जाता है।
रामनवमी - चैत्र शुक्ल नवमी - भगवान श्रीराम के जन्मोत्सव के रूप में यह त्योहार मनाया जाता है।
- महाकवि तुलसीदास ने भी इसी दिन रामचरितमानस की रचना प्रारंभ की।
- इस दिन सरयू नदी में स्नान का महत्त्व है।
- इस दिन नवरात्रा समाप्त होते हैं।
- इस दिन रामायण का पाठ किया जाता है।
हनुमान जयंती - चैत्र पूर्णिमा - इस दिन हनुमानजी का जन्म हुआ।
- इस दिन रामचरित मानस एवं हनुमान चालीसा का पाठ होता है।
वैशाख माह के त्योहार
कृष्ण पक्ष : -
आखा तीज / अक्षय तृतीया - वैशाख शुक्ल तृतीया - इस तिथि को सतुआतीज, परशुराम जयंती एवं देव - पितृतारिणी पर्व भी मनाया जाता है।
- आर्यसमाजी अक्षय तृतीया को दीक्षा पर्व, ज्ञानपर्व तथा ज्योतिपर्व के रूप में मनाते हैं।
- राजस्थान में यह पर्व नई फसल के स्वागत का अवसर होता है।
- सम्पूर्ण वर्ष में यह एकमात्र अबूझ सावा है।
- इस दिन राज्य में हजारों विवाह विशेषत: बाल विवाह सम्पन्न होते हैं।
- इस दिन से सतयुग एवं त्रेतायुग का प्रारम्भ माना जाता है।
बीकानेर नगर तथा आधुनिक मेड़ता की स्थापना इसी दिन हुई थी।
इस दिन किसान सात अन्नाजों की खेत में बुवाई करता है और अच्छी वर्षा की कामना करता है।
इस दिन दिया गया दान हमेशा फलित होता है।
राजस्थान में सर्वाधिक बाल - विवाह इसी दिन होता है।
शुक्ल पक्ष : -
पीपल पूर्णिमा : - यह वैशाख पूर्णिमा (बुद्ध पूर्णिमा) को मनाई जाती है।
- इस दिन पीपल पूजा का महत्त्व है।
- इस दिन गौतम बुद्ध का जन्म, ज्ञान की प्राप्ति और निर्वाण हुआ था।
ज्येष्ठ माह के त्योहार
कृष्ण पक्ष : -
वट सावित्री व्रत/बड़ अमावस्या - ज्येष्ठ अमावस्या - यह सौभाग्यवती स्त्रियों का प्रमुख पर्व है।
- इस व्रत के अंतर्गत स्त्रियाँ वट वृक्ष की पूजा करती है।
- इस दिन वे सत्यवान सावित्री की कथा सुनती है।
- इसे बड़ अमावस्या कहा जाता है।
शुक्ल पक्ष : -
गंगा दशहरा - ज्येष्ठ शुक्ल दशमी।
निर्जला एकादशी - ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी - सम्पूर्ण एकादशियों में यह सर्वोत्तम हैं। इसका व्रत करने से अन्य सभी एकादशियों का पुण्य फल प्राप्त हो जाता है।
- इस दिन निर्जल रहकर व्रत किया जाता है।
आषाढ़ माह के त्योहार
कृष्ण पक्ष : -
योगिनी एकादशी - आषाढ़ कृष्ण एकादशी - इस एकादशी का व्रत करने से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं।
शुक्ल पक्ष : -
देवशयनी एकादशी - आषाढ़ शुक्ल एकादशी - इस दिन से चार महीनों तक भगवान विष्णु क्षीर सागर में अन्नत शैय्या पर शयन करते हैं। इसलिए इस दिन से चार महीने तक कोई भी मांगलिक कार्य विवाहादि सम्पन्न नहीं किए जाते हैं।
– इस दिन भगवान विष्णु 4 माह के लिए पाताल चले जाते हैं।
गुरु पूर्णिमा - आषाढ़ पूर्णिमा - इस दिन गुरु - पूजन की विशेष महत्ता है।
- इस दिन गुरु - पूजन होता है।
- इसे व्यास पूर्णिमा भी कहते हैं।
मुस्लिम समाज के त्योहार
हिजरी सन् : - हिजरी सन् चन्द्रमा पर आधारित होता है।
- हिजरी सन् का पहला महीना मुहर्रम तथा अंतिम महीना जिलहिज होता है।
हिजरी सन् के 12 माह है –
1. मुहर्रम – मुल- हराम = नवम्बर
2. सफी- उल- सफर = दिसम्बर
3. रबी –उल- अव्व = जनवरी
4. रबी- उलसानि = फरवरी
5. जमादि -उल -अव्वल = मार्च
6. जमादि- उलसानि = अप्रैल
7. रज्जब –उल- मुज्जबर = मई
8. शाबान –उल- मुहाज्ज = जून
9. रमजान- उल -मुबारक = जुलाई
10. सव्वाल –उल- मुर्करम = अगस्त
11. जिल्काद = सितम्बर
12. जिलहिज = अक्टूबर
मोहर्रम : - यह इस्लामी वर्ष यानि हिजरी सन् का पहला महीना है।
- इसे ‘अल्लाह का महीना’ भी कहा जाता है।
- इस माह में हजरत मोहम्मद साहब के नवासे हजरत इमाम हुसैन और उनके 72 अनुयायियों ने सत्य और इंसाफ के लिए यजदी की फौज से लड़ते हुए कर्बला के मैदान में शहादत पाई थी लेकिन धर्म विरोधियों के आगे सिर नहीं झुकाया था। उसी की याद में मोहर्रम माह की 10 तारीख को यह त्योहार मनाया जाता है।
- इस दिन को ‘अशुरा’ कहा जाता है।
- इस दिन ताजिए निकाले जाते हैं। इन ताजियों को कर्बला के मैदान में दफनाया जाता है।
इद - उल - मिलादुलनबी (बारावफात) (रबी उल - अव्वल माह की 12वीं तारीख - यह त्योहार पैगम्बर हजरत मोहम्मद के जन्मदिन की याद में मनाया जाता है।
मोहम्मद साहब का जन्म 570 ई. में मक्का (सउदी अरब) में हुआ था।
- यह दिन इबादत दान - पुण्य, भलाई और पैगम्बर साहब की नेकियों पर मनन करने और उन्हें जीवन में उतारने का दिन है।
इद - उल - फितर (मीठी ईद)- सव्वाल माह की पहली तारीख - इसे ‘सिवैयों की ईद’ भी कहा जाता है।
- ‘ईद’ शब्द का अर्थ ‘खुशी’ या ‘हर्ष’ होता है।
- मुस्लिम लोग रमजान के पवित्र माह में 30 दिन तक रोजे करने के बाद शुक्रिया के तौर पर इस त्योहार को मनाते हैं।
- मीठी सिवैयाँ व अन्य पकवान बनाकर खिलाये जाते हैं।
- यह भाईचारे का त्योहार है।
- ईद का अर्थ – खुशी/हर्ष।
इदुलजुहा -जिल्हिज की 10वीं तारीख- इसे ‘बकरीद’ के नाम से भी जाना जाता है।
- यह कुर्बानी का त्योहार है जो पैगम्बर हजरत इब्राहिम द्वारा अपने लड़के हजरत इस्माइल की अल्लाह को कुर्बानी देने की स्मृति में मनाया जाता है।
- इदुलजुहा के माह में ही मुसलमान हज करते हैं।
शबे बारात : - यह त्योहार शाबान माह की 14वीं तारीख की शाम को मनाया जाता है।
- इस दिन हजरत मुहम्मद साहब की आकाश में ईश्वर से मुलाकात हुई थी।
शबे कद्र - यह रमजान की 27वीं तारीख को मनाया जाता है।
- इस्लाम के मुताबिक अकीदत और ईमान के साथ कद्र की शब (रात) में इबादत करने वालों के पिछले गुनाह माफ कर दिये जाते हैं।
चेहल्लुम : - यह मोहर्रम के चालीस दिनों के बाद सफर माह की बीसवीं तारीख को मनाया जाता है।
- हजरत इमाम हुसैन की शहादत की याद में शाहदत के 40वें दिन चहेल्लुम मनाया जाता है।
हजरत ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती का जन्मदिवस- हिजरी सन् के जमादि उलसानि माह की 8 तारीख को मनाया जाता है।
जैन समाज के पर्व
दशलक्षण पर्व : - प्रतिवर्ष चैत्र, भाद्रपद व माघ माह की शुक्ल पंचमी से पूर्णिमा तक दिगम्बर जैनों में दशलक्षण पर्व मनाया जाता है।
- यह पर्व किसी व्यक्ति से संबंधित न होकर आत्मा के गुणों से संबंधित है।
- भाद्रपद माह में दशलक्षणों का विशेष महत्त्व है।
पर्युषण पर्व : - जैन धर्म में पर्युषण पर्व महापर्व कहलाता है।
- पर्युषण का शाब्दिक अर्थ है निकट बसना।
- दिगम्बर परम्परा में इस पर्व का नाम दशलक्षण के साथ जुड़ा हुआ है। जिसका प्रारंभ भाद्रपद सुदी पंचमी से होता है और समापन चतुर्दशी को।
- श्वेताम्बर परम्परा में इस पर्व का प्रारम्भ भाद्रपद कृष्ण बारस से होता है व समापन भाद्रपद शुक्ल पंचमी को होता है।
- इसके दूसरे दिन अर्थात आश्विन कृष्ण एकम को क्षमापणी पर्व मनाया जाता है तथा जैन समाज के सभी लोग आपस में अपनी गलतियों के लिए क्षमा याचना करते हैं।
ऋषभ जयन्ती : - प्रतिवर्ष चैत्र कृष्ण नवमी को ऋषभ जयन्ती पर्व मनाया जाता है।
- इस दिन जैन समाज के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव (आदिनाथ) का जन्म हुआ था।
- इस दिन धुलेऋव (उदयपुर) कोयल नदी के किनारे मेला लगता है।
महावीर जयन्ती : - जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर का जन्मदिन चैत्र शुक्ल त्रयोदशी को महावीर जयन्ती के रूप में मनाते हैं।
- इस दिन भगवान महावीर के जीवन से संबंधित झाँकियाँ निकाली जाती हैं।
- श्री महावीर जी (करौली) में इस दिन विशाल मेला भरता है।
सुगंध दशमी पर्व - भाद्रपद शुक्ल की दशमी - सुगंध दशमी के अलावा इसे धूप दशमी भी कहा जाता है।
रोट तीज : - भाद्रपद शुक्ल तृतीया को जैन मतानुयायी रोट तीज का पर्व मनाते हैं जिसमें खीर व रोटी (मोटी मिस्सी रोटियाँ) बनाई जाती है।
रत्नत्रय : - भाद्रपद शुक्ल त्रयोदशी से पूर्णमासी तक रत्नत्रय का त्योहार मनाया जाता है।
- इन तीन दिनों में सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चरित्र के स्वरूप पर प्रकाश डाला जाता है।
अष्टाह्रिका : - जैनी लोग प्रति चौथे माह आषाढ़, कार्तिक एवं फाल्गुन शुक्ल पक्ष में अष्टमी से पूर्णमासी तक अष्टाह्रिका का त्योहार मनाते हैं।
पड़वा ढ़ोक : - यह दिगम्बर जैन समाज का क्षमायाचना पर्व है जो आश्विन कृष्ण प्रतिपदा (एकम्) को मनाया जाता है।
सिंधी समाज के पर्व
थदड़ी / बड़ी सातम - भाद्रपद कृष्ण सप्तमी - इस दिन सिंधी समाज के लोग पूरे दिन गर्म खाना नहीं खाते है।
चालीहा महोत्सव : - सिंध प्रांत के बादशाह मृखशाह के जुल्मों से परेशान होकर सिन्धी समाज के लोगों ने 40 दिन तक व्रत किया तथा चालीसवें दिन झूलेलाल का अवतार हुआ।
- झूलेलाल की स्मृति में प्रतिवर्ष सूर्य के कर्क राशि में आ -जाने पर 16 जुलाई से 24 अगस्त तक की अवधि में चालीहा महोत्सव मनाया जाता है।
चेटीचण्ड या झूलेलाल जयन्ती : - सिंध प्राप्त के थट्टा नगर में झूलेलाल जी का चैत्र माह में जन्म हुआ।
- झूलेलाल वरुण के अवतार माने जाते हैं।
- सिंधी समाज द्वारा उनका जन्मदिवस ‘चेटीचण्ड’ के पर्व के रूप में मनाया जाता है।
असूचंड पर्व : - फाल्गुन शुक्ल चतुर्दशी के दिन भगवान झूलेलाल के अंतर्धान होने पर यह पर्व मनाया जाता है।
सिक्ख समाज के पर्व
लोहड़ी : - लोहड़ी का त्योहार मकर संक्रान्ति की पूर्व संध्या पर 13 जनवरी के दिन मनाया जाता है।
वैशाखी : - सिक्खों के 10वें गुरु गोविन्द सिंह द्वारा इसी दिन आनन्दपुर साहिब, रोपड़ (पंजाब) में खालसा पंथ की स्थापना (13 अप्रैल, 1699) की गई थी। इसलिए 13 अप्रैल को यह त्योहार मनाया जाता है।
सिक्खों के 10वें गुरु गोविन्द सिंह ने ‘गुरु ग्रन्थ साहिब’ को 13 अप्रैल, 1669 सिक्खों का धार्मिक ग्रन्थ घोषित किया ।
गुरुनानक जयन्ती : - कार्तिक पूर्णिमा
गुरु गोविन्द सिंह जयन्ती : - गुरु गोविन्द सिंह सिक्खों के 10वें व अंतिम गुरु थे।
- पौष शुक्ल सप्तमी को इनका जन्म दिवस मनाया जाता है।
ईसाई समाज के त्योहार
क्रिसमस : - 25 दिसम्बर को ईसा मसीह का जन्मदिन क्रिसमस के रूप में मनाया जाता है।
नववर्ष दिवस : - ईस्वी सन् की पहली जनवरी को नववर्ष मनाया जाता है।
ईस्टर : - ईसाईयों की मान्यता है कि इस दिन ईसा मसीह पुनर्जीवित हुए थे।
यह पर्व रविवार (इस दिन ईसा मसीह का पुनजीर्वित हुआ) को मनाया जाता है।
गुड फ्राइडे : - ईस्टर के रविवार के पूर्व वाले शुक्रवार को यह त्योहार मनाया जाता है।
- इस दिन ईसा मसीह को सूली पर लटकाया गया था।
- असेन्सन डे - ईस्टर के 40 दिन बाद ईसा मसीह के स्वेच्छा से पुन: स्वर्ग लौट जाने के उपलक्ष्य में ईसाई समाज द्वारा हर्षोल्लास के साथ यह दिन मनाया जाता है।