मृदा -

-        चट्‌टानों के अपक्षय से प्राप्त वे असंगठित पदार्थ जिसमें कार्बनिक, अकार्बनिक, जल तथा वायु का मिश्रण पाया जाता है, उसे मृदा कहते हैं।

-        मृदा एक बहुमूल्य प्राकृतिक संसाधन है। मृदा की उत्पत्ति लैटिन भाषा के शब्द सोलम से हुई है, जिसका अर्थ है – फर्श
          मृदा अनेक प्रकार के खनिजों, पौधों और जीव जन्तुओं के अवशेषों से निर्मित होती है। 

-        पृथ्वी के पृष्ठ की ऊपरी परत पर असंगठित दानेदार कणों के आवरण वाली परत मृदा कहलाती है।

-        भारत में पाई जाने वाली चट्टानों की संरचना एवं भारत की जलवायु में पर्याप्त विविधता पाई जाती है।

-        अतः भारत की विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार की मिट्टियों का विकास हुआ है।

-        भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् ने भारत की मिट्टियों को 8 वर्गों में विभाजित किया हैं-

 

1.  जलोढ़ मिट्टी

(1) उत्तर का विशाल मैदान

(2) तटवर्ती मैदान

  1. बांगर
  2. खादर

(i)   बांगर

(ii)   खादर

2.  काली मिट्टी

3.  लाल एवं पीली मिट्टी

4.  लैटेराइट मिट्टी

5.  पर्वतीय मिट्टी

6.  मरुस्थलीय मिट्टी

7.  नमकीन एवं क्षारीय मिट्टी

  1. हरी खाद एवं जिप्सम का प्रयोग
  2. जल निकासी की उत्तम व्यवस्था
  3. खेतों को जल से भर कर, लवण के घुल जाने के पश्चात् जल को बहाकर।
  4. नहरों से रिसने वाले जल पर काबू पाना एवं समुचित सिंचाई व्यवस्था अपनाना।

8.  पीट या जैविक मिट्टी

 

क्र. सं

क्रम

क्षेत्र (हजार हैक्टेयरों में)

प्रतिशत

1.

इंसेप्टीसोल्स

130372.90

39.74%

2.

एंटीसोल्स

92131.71

28.08%

3.

एल्फीसोल्स

44448.68

13.55%

4.

वर्टीसोल्स

27960.00

8.52%

5.

एरीडीसोल्स

14069.00

4.28%

6.

अल्टीसोल्स

8250.0

2.61%

7.

मॉलीसोल्स

1320.0

0.40%

8.

अन्य

9503.10

2.92%

योग

 

100

 

 

भारत की मृदा : एक दृष्टि में

मृदा

क्षेत्र

प्रमुख फसलें

पोषकों की प्रचुरता

जलोढ़ मृदा (देश के 43.4% भू-क्षेत्र)

सिंधु-गंगा-ब्रह्मपुत्र का दोआब तथा समुद्र तटीय क्षेत्र

आलू, गेहूँ, धान, गन्ना, तिलहनी एवं दलहनी फसलें

पोटाश व चूने की प्रचुरता

लाल मृदा (देश के 18.6% भू-क्षेत्र)

सम्पूर्ण तमिलनाडु, कर्नाटक, दक्षिण पूर्व महाराष्ट्र, ओडिशा एवं मध्य प्रदेश का द.पू. भाग

गेहूँ, कपास, मूंगफली, केला, तंबाकू, रागी, ज्वार, मक्का

लौह तत्त्वों की प्रचुरता

काली मृदा (देश के  15.24% भू-क्षेत्र)

महाराष्ट्र, गुजरात, मध्यप्रदेश, तमिलनाडु का लावा क्षेत्र

  कपास, गेहूँ, सोयाबीन, चना, ज्वार

पोटाश, चूना, मैग्नीशियम की प्रचुरता

लैटेराइट मृदा (देश के  3.74% भू-क्षेत्र)

कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, असम, महाराष्ट्र, ओडिशा के पर्वतपदीय क्षेत्र

चाय, काफी, रबर, सिनकोना, काजू

लोहा व एल्युमिनियम की प्रचुरता

मरुस्थलीय मृदा

पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, पश्चिमी उत्तर-प्रदेश

बाजरा, ज्वार, मोटा अनाज, सरसों जौ

लवण व फास्फोरस की प्रचुरता

पर्वतीय मृदा

कश्मीर से अरुणाचल प्रदेश

सेब, नाशपाती, आलू

पोटाश, फास्फोरस

 

मिट्टी की समस्याएँ

वर्तमान समय में हमारे देश की मिट्टी निम्न समस्याओं के दौर से गुजर रही है :

(1) मृदा अपरदन

(2) जल जमाव

(3) अम्लीयता, लवणीयता एवं क्षारीयता

(4) बंजर भूमि की समस्या

(5) मरुस्थलीकरण

(6) मानव द्वारा भूमि का अत्यधिक शोषण

मृदा अपरदन की समस्या

मृदा अपरदन के प्रकार

(1) परत अपरदन (Sheet Erosion) : जब जल या वायु, मिट्टी की ऊपरी परत को बहाकर या उड़ाकर ले जाते हैं तो इसे परत अपरदन कहा जाता है, जैसे- पश्चिमी भारत में।

(2) अवनलिका अपरदन : जब तीव्र गति से बहता हुआ जल, मिट्टी को काटकर गहरी नालियों, खड्डों का निर्माण कर देता है, तो इसे अवनलिका अपरदन कहा जाता है, जैसे - चम्बल क्षेत्र में।

मृदा अपरदन के कारक

भारत में जल एवं वायु दोनों ही कारकों द्वारा मृदा अपरदन का कार्य होता है।

जल अपरदन से प्रभावित क्षेत्र

  1. शिवालिक एवं हिमालय पर्वत, मुख्यतः मध्य एवं पूर्वी भाग में।
  2. यमुना एवं चम्बल नदी की घाटी
  3. उत्तर-पूर्वी भारत
  4. उत्तर-प्रदेश का ब्रज भूमि क्षेत्र
  5. पश्चिमी घाट पर्वतीय क्षेत्र
  6. तमिलनाडु एवं पश्चिम बंगाल के कुछ क्षेत्र।

वायु अपरदन से प्रभावित क्षेत्र

  1. पश्चिमी राजस्थान     
  2. दक्षिण पंजाब
  3. दक्षिणी हरियाणा
  4. पश्चिमी उत्तर प्रदेश

वायु एवं जल दोनों के अपरदन से प्रभावित क्षेत्र

भारत के मैदानी भागों में वर्षा ऋतु में जल द्वारा एवं शुष्क मौसम में वायु द्वारा अपरदन का कार्य होता है।

मृदा अपरदन के कारण

(1) तीव्र एवं मूसलाधार वर्षा

(2) तीव्र वायु

(3) भूमि का तीव्र ढाल

(4) मिट्टी का हल्कापन

(5) वनों की कटाई

(6) अतिचारण

(7) अवैज्ञानिक कृषि जैसे ढाल के समानांतर खेत की जुताई, फसल चक्र न अपनाना, अत्यधिक सिंचाई एवं उर्वरक का प्रयोग आदि।

(8) झूम कृषि

(9) विकास कार्य, जैसे-खनिजों की खुदाई, सड़क, बाँध आदि का निर्माण।

मृदा अपरदन की समस्या से प्रभावित प्रमुख क्षेत्र

(1) मध्य भारत में चंबल, यमुना एवं उसकी सहायक नदियों की घाटीः

(2) उत्तर-पूर्वी भारत :

(3) हिमालय एवं शिवालिक क्षेत्र :

(4) छोटा नागपुर प्रदेश :

(5) मरुस्थलीय क्षेत्र :

मृदा अपरदन रोकने के उपाय

(1) वृक्षारोपण, विशेषकर पहाड़ी ढालों, बंजर भूमि एवं नदियों के किनारे।

(2) अतिचारण को नियंत्रित करना।

(3) फसल चक्र की कृषि पद्धति को अपनाना।

(4) जल के तीव्र वेग को रोकने के लिए मेड़बन्दी करना।

(5) समोच्च रेखीय (Contour) एवं ढाल के लंबवत् जुताई करना।

(6) ऊबड़-खाबड़ भूमि को समतल करना।

(7) स्थानांतरित कृषि पर रोक लगाना।

(8) पट्टीदार कृषि अपनाना।

(9) कृषित भूमि को परती एवं खुला हुआ कम से कम छोड़ना। भूमि को वनस्पतियों पुआल आदि के आवरण से ढक कर रखा जाए (Milching) ताकि मृदा में नमी की मात्रा बनी रहे।

(10) समुचित उर्वरक एवं सिंचाई द्वारा मृदा की उपजाऊ शक्ति को बनाए रखना।