गुरुत्वाकर्षण बल (Gravitational force) –
पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र में स्थित प्रत्येक वस्तुएँ अन्य वस्तुओं पर गुरुत्वाकर्षण बल लगाती है तथा स्वयं भी इनसे गुरुत्वाकर्षण बल अनुभव करती है।
दो वस्तुओं के मध्य लगने वाला गुरुत्वाकर्षण बल उनके द्रव्यमानों के गुणनफल के समानुपाती व उनके बीच की दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होता है।
दो वस्तुओं के मध्य लगने वाला गुरुत्वाकर्षण बल उन वस्तुओं के मध्य उपस्थित माध्यम पर निर्भर नहीं करता है।
प्राकृतिक बलों में गुरुत्वाकर्षण बल सबसे दुर्बल होता है, लेकिन इसकी परास/Range सबसे ज्यादा होती है।
Q. यदि पृथ्वी व सूर्य के मध्य लगने वाला गुरुत्वाकर्षण बल F है। अब इनके बीच दूरी आधी कर दें तो गुरुत्वाकर्षण बल क्या होगा?
(a) F/2
(b) 2F
(c) F/4
(d) 4F
\( F_{g} \propto \frac{1}{r^{2}} \quad A \propto \frac{1}{r^{2}} A \propto B \ \frac{F_{1}}{F_{2}}=\frac{r_{2}^{2}}{r_{1}^{2}} \ \frac{F}{F_{2}}=\frac{\left(r / 2^{2}\right)}{r_{1}^{2}} \Rightarrow \frac{F}{F_{2}}=\frac{1}{(2)^{2}} \Rightarrow F_{2}=4 F \) 
विद्युत चुंबकीय बल(Electro magnetic forces) -
\( \text { Fe } \propto \frac{q_{1} q_{2}}{r^{2}} \ \text { Fe }=\frac{1}{4 x E_{0}} \frac{q_{1} q_{2}}{r^{2}} \)
E0 → निर्वात की विद्युतशीलता
सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण नियतांक →
\(\mathrm{F}_{\mathrm{g}}=\mathrm{G}\left[\frac{m_{1} \times m_{2}}{r^{2}}\right]\)
इनका मान \(6.67 \times 10^{-11} \frac{N \times m t r 2}{k g^{2}}\) होता है।
विद्युत चुंबकीय बल –
विद्युत बल दो यो दो से अधिक आवेश एक-दूसरे से प्रतिकर्षण (समान आवेशों में) या आकर्षण (विपरीत आवेशों में) बल का अनुभव करते हैं।
प्रत्येक बिंदु आवेश के चारों ओर विद्युत क्षेत्र पाया जाता है, जिसमें अन्य आवेश बल का अनुभव करता है।
दो स्थिर बिंदु आवेश (q1 एवं q2) एक दूसरे से r मीटर दूरी पर रखे हैं, तो उनके मध्य लगने वाला स्थिर विद्युत बल आवेशों के गुणनफल के समानुपाती व उनके बीच की दूरी के वर्ग से व्युत्क्रमानुपाती होता है अर्थात्
\(F_{e}=\frac{1}{4 \pi \varepsilon} \frac{q_{1} q_{2}}{r^{2}}\)
\(\varepsilon=\) माध्यम की विद्युतशीलता
यदि आवेशों के मध्य निर्वात हो तो \(F_{e}=\frac{1}{4 \pi \varepsilon_{\mathrm{o}}} \frac{q_{1} q_{2}}{r^{2}}\)
\(\varepsilon_{0}=8.85 \times 10^{-12}\) फैराडे/मीटर
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चुंबकीय बल –
चुंबकीय ध्रुवों में भी आवेशों के समान प्रतिकर्षण एवं आकर्षण बल लगते हैं।
यदि दो चुंबकीय ध्रुवों की तीव्रता i1 एवं i2 हो तथा इनके बीच दूरी r मीटर हो तो उनके बीच लगने वाला चुंबकीय बल तीव्रता के गुणनफल के समानुपाती तथा दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होता है।
\( F m \propto \frac{i_{1} \times i_{2}}{r^{2}} \ F m=\frac{1}{4 \pi u} \times \frac{i_{1} \times i_{2}}{r^{2}} \)
u ⇒ माध्यम की चुंबकशीलता (Pemrmeability)
u0 ⇒ निर्वात की चुंबकशीलता = \(4 \pi \times 10^{-7}\) हेनरी/मीटर
नाभिकीय बल (Nuclear Force) –
नाभिकीय बल प्राकृतिक बलों से प्रबल होते हैं (प्रबल नाभिकीय बल) लेकिन इनकी परास/Range सबसे कम (10–15 मीटर/फर्मी कोटि) होती है।
न्यूक्लियॉन्स को नाभिक में बाँधे रखने हेतु एक प्रबल नाभिकीय बल कार्य करता है, जो कि नाभिक (Nucleus) को स्थायित्व प्रदान करता है।
विद्युत चुंबकीय बल, गुरुत्वाकर्षण बल की तुलना में प्रबल होते हैं, जबकि इनकी परास गुरुत्वाकर्षण बल से कम होती है।
प्राकृतिक बलों की परास का क्रम -
गुरुत्वाकर्षण बल > विद्युत चुंबकीय बल > नाभिकीय बल
प्राकृतिक बलों की प्रबलता का क्रम -
नाभिकीय बल > विद्युत चुंबकीय बल > गुरुत्वाकर्षण बल

नाभिकीय बल की परास (Range) प्राकृतिक बलों में सबसे कम, जबकि ये सबसे प्रबल है।
घर्षण बल (Friction Force) –
जब दो वस्तुएँ या सतहें एक-दूसरे के संपर्क में रह कर गति करती है, तो उनके मध्य गति की विपरीत दिशा में घर्षण बल कार्य करता है।
घर्षण सामान्यतया गति का विरोध करता है।
घर्षण एक आवश्यक बुराई है क्योंकि घर्षण के कारण ऊर्जा का हृास (ऊष्मा/Heat) के रूप में होता है, लेकिन घर्षण की अनुपस्थिति में गति भी संभव नहीं हो पाती है। जैसे - सड़क पर तेल फैला होने पर गाड़ी का फिसल जाना।
जब कोई वस्तु किसी सतह के संपर्क में होती है तथा अब इस वस्तु पर बाह्य बल आरोपित करें तो यदि वस्तु सतह पर गति करने लगे तो इनके मध्य दो प्रकार के घर्षण बल कार्य करते हैं -
1.स्थैतिक घर्षण/Static Friction – जब वस्तु पर बाह्य बल लगाया जाए तथा वस्तु स्थिर अवस्था में ही रहे। ऐसे में संपर्क सतह पर स्थैतिक घर्षण कार्य करता है। यह स्वत: समायोजित बल होता है तथा आरोपित बल बढ़ने पर यह बढ़ता है।
Fs = UsR
2. गतिक घर्षण/Kinetic Friction – जब वस्तु बाह्य बल के प्रभाव में गति करे तो इस दौरान संपर्क सतह पर गतिक घर्षण कार्य करता है।
गतिक घर्षण बल Fk = UkN
इसका मान तलों के आपेक्षिक वेग के मापांक पर निर्भर नहीं करता है, परंतु अधिकतम वेग पर निर्भर करता है।
यदि घर्षण वेग \(\theta\) हो तो, तब स्थैतिक घर्षण गुणांक
\(=\mathrm{us}=\tan \theta\) होगा।
सीमांत घर्षण (Marginal Friction) –
स्थैतिक घर्षण का अधिकतम मान, जिसके बाद यदि बाह्य बल को और बढ़ाया जाए तो अब वस्तु गतिशील हो जाएगी।
ये स्थैतिक घर्षण का अधिकतम मान है।
सीमांत बल की दिशा सदैव उच्च दिशा के विपरीत होती है, जिसमें वस्तु में गति करने की प्रवृत्ति होती है।
यदि वस्तुओं के मध्य अभिलंब प्रतिक्रिया अपरिवर्तित रहे तो सीमांत घर्षण संपर्क तल के क्षेत्रफल पर निर्भर नहीं करता है।
सीमांत घर्षण बल, संपर्क तलों की प्रकृति अर्थात् खुरदरेपन तथा पदार्थ पर निर्भर करता है।
सर्पी घर्षण (Sliding Friction) –
इसमें वस्तु सतह विसर्पी गति/Sliding motion करती है, जबकि यदि वस्तु सतह पर लुढ़कते हुए (Rolling) गति करे तो ऐसे में संपर्क बिंदु पर लोटनिक घर्षण लगता है।
सीमांत घर्षण > सर्पी घर्षण > लोटनिक घर्षण
लोटनिक घर्षण का मान न्यूनतम होने के कारण गाड़ियों, पुर्जों में गोलाकार बॉल बियरिंग्स का प्रयोग करते हैं।
घर्षण को कम करने की विधियाँ –
(1) पॉलिश द्वारा
(2) स्नेहक (Lubricants)
(3) उचित पदार्थ के प्रयोग से
(4) बॉल बियरिंग द्वारा
अभिकेंद्रीय बल (Centripetal Force) –

वृत्ताकार पथ पर गति के दौरान वस्तु पर इस पथ के केंद्र बिंदु की ओर लगने वाला बल अभिकेंद्रीय बल कहलाता है, जिसका मान -
\(F_{e}=\frac{m v^{2}}{r}\)
V = रेखीय वेग
r = वृत्ताकार पथ की त्रिज्या
m = वस्तु का द्रव्यमान
उदाहरण - सड़क पर मुड़ने के लिए कार को अभिकेंद्र बल सड़क एवं टायरों के बीच के घर्षण से प्राप्त होता है। यदि सड़क की बाहरी सतह मोड़ पर कुछ ऊँची होती है, जिससे वाहन स्वत: अंदर की ओर झुक जाते हैं।
अपकेन्द्रीय बल -
अभिकेंद्रीय बल की विपरीत दिशा में लगने वाला आभासी बल अपकेंद्रीय बल कहलाता है तथा वॉशिंग मशीन में कपड़ों की धुलाई इसी अपकेंद्रीय बल/Centrifugal force के प्रभाव में होती है।
क्रीम निकालने की मशीन (Cream separator) अपकेंद्रीय बल पर आधारित है।
दही में से मक्खन निकालने की प्रक्रिया भी अपकेंद्रीय बल पर आधारित है।
ऊर्जा (Energy)
कार्य करने की क्षमता ही ‘ऊर्जा’ कहलाती है।
ऊर्जा संरक्षण के नियमानुसार, जब कोई वस्तु कार्य करती है, तो वस्तु की ऊर्जा में कमी आती है तथा जिस वस्तु पर कार्य किया जाता है, उस वस्तु की ऊर्जा में उतनी वृद्धि हो जाती है। अर्थात् ऊर्जा न तो उत्पन्न की जा सकती है ना ही नष्ट की जा सकती है।
ऊर्जा एक सदिश राशि है।
ऊर्जा के मात्रक – जूल, कैलोरी, अर्ग (C.G.S.)
\(\begin{array}{|l|} \hline \text { 1 Joule }=10^{7} \text { Aarg } \ \hline 1 \text { Cal. }=4.2 \text { Joule } \ \hline 1 \text { Joule }=\frac{1}{4.2} \text { Cal. } \ \hline \end{array}\)
ऊर्जा के विभिन्न प्रकार
सौर ऊर्जा (Solar Energy) –
पृथ्वी पर सौर ऊर्जा का सबसे बड़ा व अंतिम स्रोत सूर्य है।
ये सौर-ऊर्जा पृथ्वी पर जीवन का आधार है।
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द्रव्यमान ऊर्जा (Mass Energy) –


वस्तु के द्रव्यमान के कारण उसमें उपस्थित ऊर्जा।
द्रव्यमान एवं ऊर्जा मंे संबंध आइंस्टीन ने बताया, जो इस प्रकार है -
\(E=M \times C^{2}\)
M = वस्तु का द्रव्यमान
C = प्रकाश का वेग (3 × 108 मीटर/सैकण्ड)
द्रव्यमान ऊर्जा का रूपांतरण सूर्य की सतह पर

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नाभिकीय ऊर्जा (Nuclear Energy) –
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दो हल्के नाभिकों के मिलने से (Nuclear Fusion/नाभिकीय संयोजन) या एक बड़े नाभिक के टूटने से (Nuclear Fission/नाभिकीय विखंडन)
नाभिकीय ऊर्जा के दो मुख्य स्त्रोत हैं –
1. नाभिकीय विखण्डन
2. नाभिकीय संलयन
1. नाभिकीय विखण्डन
यह वह प्रक्रिया है जिसमें एक भारी नाभिक दो छोटे भिन्न-भिन्न नाभिकों में टूटता हैं।
नाभिकीय विखण्डन की खोज वर्ष 1939 में जर्मन के दो वैज्ञानिक ऑटो होन तथा फ्रिज स्ट्रास मैन ने की थी।
इन्होंने यूरेनियम – 235 पर न्यूट्रॉन की बमबारी की जिसमें प्राप्त अभिक्रिया में एक विखण्डन से लगभग 0.215 amu द्रव्यमान की हानि हुई।
यह अभिक्रिया दो भागों में बाँटी जा सकती है –
(i) अनियंत्रित शृंखला अभिक्रिया में प्रत्येक विखण्डन से प्राप्त नए न्यूट्रॉन नए नाभिकों का विखण्डन करते हैं। परमाणु बम इसी अभिक्रिया पर आधारित है। परमाणु बम में यूरेनियम-235 का प्रयोग ईंधन के रूप में किया जाता है। जापान के हिरोशिमा नगर पर यूरेनियम-235 से युक्त परमाणु बम को गिराया गया था।
(ii) नियंत्रित शृंखला अभिक्रिया में मंदक एवं नियंत्रक पदार्थों की सहायता से नए न्यूट्रॉन नाभिकों का विखण्डन करते हैं। नाभिकीय रिएक्टर अथवा परमाणु भट्टी इसी अभिक्रिया पर आधारित है।
नाभिकीय रिएक्टर –
यह एक ऐसी युक्ति है जिसकी सहायता से नाभिकीय ऊर्जा का उपयाेग विद्युत उत्पादन में किया जाता है।
इसके निम्न भाग होते हैं –
(i) नाभिकीय ईंधन – जैसे यूरेनियम-235
(ii) मन्दक – मन्दक के रूप में भारी जल (D2O), ग्रेफाइट, बेरीलियम का प्रयोग किया जाता है। ये न्यूट्रॉन के मन्दक के रूप में कार्य करते हैं।
(iii) शीतलक – शीतलक के रूप में वायु, ठण्डा जल, भारी जल, हीलियम, पारा तथा CO2 को रिएक्टर के अन्दर पाइपों द्वारा प्रवाहित करके विखण्डन के फलस्वरूप अत्यधिक मात्रा में उत्पन्न ऊष्मा को नियंत्रित किया जा सकता है।
(iv) नियंत्रक छड़ें – नाभिकीय विखण्डन की दर न्यूट्रॉनों की संख्या पर निर्भर करती हैं। विखण्डन की दर को नियंत्रित करने के लिए कैडमियम की छड़ों का प्रयोग किया जाता है।
(v) परिरक्षक
Note – नाभिकीय भट्ठी का प्रयोग विद्युत ऊर्जा के उत्पादन में, रेडियो समस्थानिकों के उत्पादन में, Pu239 के निर्माण में, तीव्रग्रामी न्यूट्रॉनों के उत्पादन में किया जाता हैं।
ध्वनि ऊर्जा (Sound Energy) –
ध्वनि तरंगें (Souve waves) यांत्रिक तरंगें होती हैं, जिनमें ध्वनि ऊर्जा उपस्थित।

रासायनिक ऊर्जा (Chemical Energy) –
पदार्थ के रासायनिक गुणधर्मों के कारण उनमें पाई जाने वाली ऊर्जा रासायनिक ऊर्जा कहलाती है।

प्रकाश ऊर्जा –

प्रकाश विद्युत-चुंबकीय तरंग दृश्य भाग होता है, जिसमंे ऊर्जा पाई जाती है।
ऊष्मा ऊर्जा (Heat Energy) –
पदार्थों के दहन या घर्षण के कारण मुक्त होने वाली ऊर्जा ऊष्मा ऊर्जा कहलाती है।

विद्युत ऊर्जा –
आवेशों/e–s/इलेक्ट्रॉन्स की गति से विद्युत धारा प्रवाहित होती है तथा इसमें विद्युत ऊर्जा पाई जाती है।

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यांत्रिक ऊर्जा (Mechanical Energy) |
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गतिज ऊर्जा (Kinetic Energy) |
स्थितिज ऊर्जा (Potential Energy) |
V → वस्तु का वेग
उदाहरण –
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m → वस्तु का द्रव्यमान g → गुरुत्वीय त्वरण = 9.8 m/sec2 h → वस्तु की ऊँचाई उदाहरण -
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कार्य (Work) –
किया गया कार्य = बल × विस्थापन × Cos \(\theta\)
q = बल व विस्थापन के मध्य कोण
\( \theta=90^{\circ} \rightarrow \cos 90 \rightarrow 0 \ \theta=0 \rightarrow \cos 0=1 \)
बल एवं बल के प्रभाव में होने वाले विस्थापन का गुणनफल कार्य कहलाता है।
W=F. S
यह एक अदिश राशि है।
मात्रक :
- जूल, कैलोरी, अर्ग (ऊर्जा के ही मात्रक)
- न्यूटन × मीटर
व्यक्ति किसी सामान/वस्तु को लेकर स्थिर खड़ा है तो किया गया कार्य शून्य (क्योंकि d = 0)
व्यक्ति क्षैतिज दिशा वस्तु/सामान को लेकर गति करे तो किया गया कार्य शून्य होगा। (q = 90o अत: Cos 90 = 0)
यदि व्यक्ति वस्तु/सामान को लेकर ऊर्ध्वाधर ऊपर या नीचे गति करे तो किया गया कार्य शून्य नहीं होगा। (क्योंकि \(\theta\) ¹ 90o )
Note :
एक स्प्रिंग की स्थितिज ऊर्जा \(\mathrm{PE}=\frac{1}{2} \mathrm{kx}^{2}\)होती है।
कार्य - ऊर्जा प्रमेय के अनुसार किसी कण पर आरोपित बल द्वारा किया गया कार्य गतिज ऊर्जा के बराबर होता है।