भारत के प्रमुख उद्योग

भारत में सबसे प्राचीन उद्योग के साक्ष्य हड़प्पा सभ्यता में मिलते हैं। उस काल में यहाँ सूती कपड़े, मृद भाण्ड उद्योग, कांस्य धातु के उपकरण और जहाजरानी उद्योग के प्रमाण मिलते हैं। इसके बाद गुप्तकाल में चन्द्रगुप्त द्वितीय का बना महरौली का लौह स्तम्भ जो दिल्ली में स्थित है, भारतीय प्राचीन अभियांत्रिकी उद्योग का प्रसिद्ध उदाहरण है। जो आज तक खुले में होने के बावजूद जंग रहित है। मध्यकाल में भारत में अनेक प्रकार के उद्योग विकसित हुए और जिनके कारण भारत का निर्यात बढ़ा और भारत को सोने की चिड़िया कहा जाने लगा। लेकिन आधुनिक भारत के प्रारंभ में यूरोपीय विशेषतः अंग्रेजों के आगमन के पश्चात् उनकी घातक आर्थिक नीति के कारण भारत की औद्योगिक व्यवस्था पिछड़ गई और भारत में कुटीर उद्योगों का पतन हो गया तथा भारत में ब्रिटिश उत्पादों की भरमार हो गई और भारत के औद्योगिक विकास की प्रवृत्ति धीमी हो गई।

19वीं सदी में भारत में नए उद्योगों की स्थापना एवं विकास प्रारंभ हुआ। भारत ने औद्योगिक विकास की रफ्तार पकड़ी। लेकिन देश विभाजन होने से भारत के औद्योगिकीकरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।

1.  उद्योगों के आकार का विषम ढ़ाँचा - आजादी के समय विभाजन के कारण कच्चे माल के उत्पादन स्थल पाकिस्तान में चले गए तथा कारखाने भारत में रह गए जिस कारण औद्योगिक विकास रुका। वहीं दूसरी ओर भारत में स्थापित बड़े उद्योगों में विदेशी उद्योगपतियों का योगदान था तथा लघु एवं कुटीर उद्योगों का विकास की प्रक्रिया धीमी थी। इस समय मध्यम आकार के कारखानों का विकास कम हुआ।

2.  निम्न पूँजी गहनता - स्वतन्त्रता के प्रारंभिक वर्ष़ों में भारतीय उद्योग में पूँजी गहनता कम थी। मजदूरी का स्तर नीचा होने, प्रति व्यक्ति आय कम होने तथा तकनीकी पिछड़ेपन के कारण पूँजी की तीव्रता कम ही रहती थी।

3.  उपभोक्ता वस्तु उद्योगों की प्रधानता - विनिर्माण में पूँजीगत वस्तु उद्योगों की तुलना में उपभोक्ता वस्तु उद्योगों की प्रधानता थी।

     स्वतंत्रता प्राप्ति से अब तक (2011) 6 औद्योगिक नीतियाँ घोषित हो चुकी है-

1. प्रथम औद्योगिक नीति - 1948

2. दूसरी औद्योगिक नीति - 1956

3. तीसरी औद्योगिक नीति - 1977

4. चौथी औद्योगिक नीति - 1980

5. पाँचवीं औद्योगिक नीति - 1990

6. नई औद्योगिक नीति - 1991

  1. एल्कोहल युक्त पेयों का आसवन एवं इनसे शराब बनाना।
  2. तंबाकू के सिगार एवं सिगरेट तथा विनिर्मित तंबाकू के अन्य विकल्प।
  3. इलेक्ट्रॉनिक, एयरोस्पेस तथा रक्षा उपकरण।
  4. डिटोनेटिंग फ्यूज, सेफ्टी फ्यूज, गन पाउडर, नाइट्रोसेल्यूलॉज तथा माचिसों सहित औद्योगिक विस्फोटक सामग्री।
  5. खतरनाक रसायन।
  1. परमाणु ऊर्जा उत्पादन।
  2. रेलवे
  3. परमाणु ऊर्जा विभाग में आण्विक खनिजों से सम्बन्धित उद्योग।
  1. एकल ब्रांड रिटेलिंग को छोड़कर रिटेल ट्रेडिंग
  2. परमाणु ऊर्जा
  3. लॉटरी
  4. गैम्बलिंग तथा बेटिंग।
  1. पिछले तीन वर्ष़ों में वार्षिक शुद्ध लाभ 5000 करोड़ रुपये से अधिक हो।
  2. निवल मूल्य (Net worth) 15000 करोड़ रुपये या अधिक हो।
  3. वार्षिक बिक्री 25000 करोड़ रुपये या अधिक की हो।
  4. वह नवरत्न श्रेणी का उद्यम हो।
  5. भारतीय शेयर बाजार में सूचीबद्ध हो।

     वर्तमान में महारत्न कम्पनियाँ 8 हैं -

     1. IOC Ltd.           2. NTPC Ltd.            3. ONGC Ltd.

     4. SAIL Ltd.         5. CIL Ltd.                 6. GAIL

     7. BHEL                8. BPCL

8.  नवरत्न योजना -

  1. पिछले तीन वर्ष़ों में वार्षिक शुद्ध लाभ 1000 करोड़ रुपये से अधिक हो।
  2. निवल मूल्य (Net worth) 5000 करोड़ रुपये या अधिक हो।
  3. वार्षिक बिक्री 15000 करोड़ रुपये या अधिक की हो।
  4. भारतीय शेयर बाजार में सूचीबद्ध हो।

     वर्तमान में 17 नवरत्न कम्पनियाँ हैं।

9.  मिनीरत्न योजना -

  1. इस सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम को लगातार तीन वर्ष़ों तक मुनाफा होना चाहिए और शुद्ध मूल्य सकारात्मक होना चाहिए।
  2. सरकार द्वारा दिए ऋण पर वापसी या ब्याज अदायगी में अनियमितता नहीं होनी चाहिए।
  3. बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स की पुनर्संरचना गैर कार्यालयी निदेशकों द्वारा होना चाहिए।

     मिनी रत्नों की संख्या वर्तमान में 74 हैं।

1.  प्रथम पंचवर्षीय योजना : (1951-1956)

प्रथम योजना में अर्थव्यवस्था के औद्योगीकरण के लिए बड़े पैमाने पर प्रयास नहीं किया गया। प्रथम योजनाकाल में सिंदरी उर्वरक कारखाना, चितरंजन में रेल इंजन बनाने का कारखाना, भारतीय टेलीफोन उद्योग, इंटीग्रल कोच फैक्ट्री, पिम्परी पेनिसिलीन फैक्ट्री, नेपा न्यूज पिंट, हिन्दुस्तान केबल्स व हिन्दुस्तान मशीन टूल्स (HMT) की स्थापना की गई।

2.  द्वितीय पंचवर्षीय योजना : (1955-1956)

उद्योग को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई। यह योजना पी.सी. महालनोविस के मॉडल पर आधारित थी। राउरकेला इस्पात कारखाना, छत्तीसगढ़ में भिलाई इस्पात कारखाना और पश्चिम बंगाल में दुर्गापुर इस्पात कारखाना स्थापित किया गया।

3.  तृतीय पंचवर्षीय योजना : (1961-66)

औद्योगिक क्षेत्र का और अधिक विस्तार करना था। मशीन निर्माण और तकनीकी व प्रबंधकीय कौशल पर विशेष बल दिया गया।

- तीन एक वर्षीय योजनाएँ एवं औद्योगिक विकास : (1966-69)

4.  चौथी पंचवर्षीय योजना : (1969-74)

तीसरी योजना के अधीन आरम्भ किए गए औद्योगिक प्रोजेक्टों को पूरा करने पर बल दिया गया। इसमें निर्यात-प्रोत्साहन एवं आयात प्रतिस्थापन उद्योगों के विस्तार का लक्ष्य रखा गया।

5.  पाँचवीं पंचवर्षीय योजना : (1974-79)

पाँचवीं योजना के औद्योगिक कार्यक्रम आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के उद्देश्य को ध्यान में रखकर बनाए गए।

6.  छठी योजना : (1980-85)

     छठी योजना में समग्र विकास की रणनीति अपनाई गई थी।

7.  सातवीं योजना : (1985-90)

औद्योगिक उत्पादन बढ़ाने को प्राथमिकता दी गई तथा सामाजिक न्याय सहित विकास पर बल दिया गया।

8.  आठवीं योजना में उद्योग : (1992-97)

आर्थिक उदारीकरण की प्रक्रिया शुरू की गई। यह योजना जॉन डब्ल्यू, मिलर के मॉडल पर आधारित योजना थी।

9.  नौवीं योजना : (1997-2002)

     औद्योगिक विकास की गति मंद रही।

10. दसवीं योजना : (2002-07)

(i) संरचनात्मक विकास को प्राथमिकता प्रदान करना।

(ii) लघु व कुटीर उद्योगों के विकास को प्राथमिकता देना।

(iii) निर्यातोन्मुखी उद्योगों को सर्वोच्च प्राथमिकता प्रदान करना।

(iv) औद्योगिक एवं आर्थिक विकास के मार्ग में आने वाली बाधाओं एवं प्रतिबन्धों को न्यूनतम करना।

11. ग्यारहवीं योजना : (2007-12)

(i) लक्ष्य - ‘त्वरित और समावेशी’ विकास रखा गया।

(ii) औद्योगिक वृद्धि दर 10 प्रतिशत के लगभग रखी गई है।

(iii) विभिन्न योजनाओं के आधुनिकीकरण के प्रयास का लक्ष्य।

बारहवीं पंचवर्षीय योजना

(i)प्राकृतिक कारक अथवा भौगोलिक कारक : कच्चा माल, शक्ति के साधन, श्रम, यातायात, बाजार, स्थल, जलापूर्ति,  जलवायु

(ii)मानवकृत कारक : पूँजी, नीति, संस्था, बैंकिंग इन्श्योरेंस और तकनीकी ज्ञान

(iii)अन्य कारक :

             

A. कृषि आधारित उद्योग

1. वस्त्र उद्योग       2. चीनी उद्योग     3. कागज उद्योग

1. वस्त्र उद्योग

इसके अन्तर्गत सूती, ऊनी, रेशमी और कृत्रिम रेशों से बने वस्त्रों का उत्पादन होता है। कपड़ा उद्योग देश का संगठित क्षेत्र का एकमात्र सबसे बड़ा उद्योग है, जिसमें सबसे अधिक लोगों को रोजगार मिला हुआ है।

(i) सूती वस्त्रोद्योग         (ii) पटसन उद्योग

(iii) ऊनी वस्त्रोद्योग       (iv) रेशमी वस्त्रोद्योग        (v) कृत्रिम रेशा

वस्त्र उत्पाद         -    उत्पादक

मुसलीन (मलमल)  -    ढाका

चीनटर                 -    मछलीपट्टनम

मैलिकोस              -     कालीकट

वफ्तास                 -     मुंबई

सूती धागा              -     सूरत

(i) सूती वस्त्रोद्योग

 

1. महाराष्ट्र :

महाराष्ट्र 43% मिल के कपड़े का और 17% यार्न का उत्पादन करता है।

2. गुजरात :

दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है। 23% कपड़े का और 8% यार्न का उत्पादन होता है।

3. मध्य प्रदेश :

इस उद्योग के विकास के पीछे जो महत्त्वपूर्ण कारण है, वह पिछड़ी अर्थव्यवस्था के चलते मिलने वाला सस्ता श्रम और कोयले से मिलने वाली ऊर्जा है।

महत्वपूर्ण केन्द्र :-ग्वालियर, उज्जैन, इंदौर, देवास, रतलाम, जबलपुर आदि।

4. तमिलनाडु :

महत्वपूर्ण केन्द्र :- चेन्नई, मदुरई, तिरुनेलवेली

5. पं. बंगाल :

कोलकाता सबसे महत्त्वपूर्ण केन्द्र है। यहाँ इस उद्योग के विकास में यहाँ की आर्द्र जलवायु, बंदरगाह और समीपवर्ती क्षेत्रों से मिलने वाला कोयला का योगदान है।

केन्द्र :- हावड़ा, मुर्शिदाबाद, हुगली, श्रीरामपुर

6. उत्तरप्रदेश :

कानपुर सबसे बड़ा केन्द्र है और इसे उत्तर भारत का मैनचेस्टर कहा जाता है।

अन्य केन्द्र :-

वाराणसी, अलीगढ़, सहारनपुर, आगरा, बरेली।

7. अन्य प्रदेश :-

(ii)पटसन उद्योग

यह दूसरा सबसे महत्त्वपूर्ण वस्त्रोद्योग है।

प. बंगाल में पटसन उद्योग का सबसे ज्यादा संकेन्द्रण है। यहाँ 59 जूट की मिले हैं और 42615 लूम हैं, जो कुल मिलों का 76% और कुल लूम्स का 80% हैं।

(iii)ऊनी वस्त्रोद्योग

1. पंजाब :

उत्पादन में पंजाब सबसे आगे है। यहाँ देश की कुल मिलों की 72% मिले अवस्थित हैं।

अन्य केन्द्र-अमृतसर, लुधियाना और खारवेर

2. महाराष्ट्र :

3.  उत्तर प्रदेश : शाहजहाँपुर, मिर्जापुर, वाराणसी, कानपुर

4.  गुजरात : जामनगर, अहमदाबाद, वड़ोदरा

5.  हरियाणा : पानीपत, फरीदाबाद, गुरुग्राम

6.  राजस्थान :  बीकानेर, अलवर, भीलवाड़ा

(iv) रेशम वस्त्रोद्योग

मलबरी, टसर, इरी, मूंगा का उत्पादन भारत में होता है। इटली और जापान से मिल रही चुनौतियों के कारण इसके विकास की गति धीमी हैं।

(v) कृत्रिम रेशा

कृत्रिम रेशे के उत्पादन से वस्त्र उद्योग में क्रान्ति आ गई है। यह काफी मजबूत होता है। मानव निर्मित रेशों को दो भागों में बाँटा गया हैं - सेल्यूलोज (रेयन और एसिटेट) और नॉन-सेल्यूलोज (नायलॉन, पॉलिस्टर)

बाँस, यूकलिप्टस और दूसरे मुलायम लकड़ियों से पल्प बनाया जाता हैं।

2. चीनी उद्योग

 

चीनी-उद्योग का कच्चे-माल वाले प्रदेशों में केन्द्रित होने के निम्नलिखित कारण हैः-

  1. चीनी की अपेक्षा गन्ने की ढुलाई कठिन है।
  2. गन्ने की कटाई के 24 घंटों के अंदर इसकी पेराई का लेने से गन्ने से ज्यादा चीनी मिलती है।
  3. चीनी-उद्योग उत्तर प्रदेश और बिहार के मुख्य रूप से केन्द्रित है। इनके अलावा यह महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु, कर्नाटक और आन्ध्रप्रदेश में इसलिए केन्द्रित है क्योंकि ये प्रदेश गन्नों की खेती के लिए उपयुक्त हैं।
  4. इस उद्योग में बाहर से ऊर्जा की आपूर्ति की जरूरत हैं। इस उद्योग में बाहर से ऊर्जा की आपूर्ति की जरूरत नहीं पड़ती है क्योंकि चीनी उत्पादन के क्रम में निकलने वाली खोई ही मशीन चलाने के लिए ऊर्जा देने हेतु पर्याप्त होती है।
  5. इस उद्योग में दक्षिण-भारत की ओर स्थानान्तरित होने की प्रवृत्ति दिख रही है क्योंकि वहाँ के गन्नों में चीनी की मात्रा अधिक होती है, वहाँ पेराई का मौसम ज्यादा लंबा होता है और सहकारी क्षेत्र में वहाँ के मिल अधिक प्रबंधित हैं।

(1)कृषि पर आधारित उद्योग होने के कारण मानसून के अनुसार इसके उत्पादन में परिवर्तन होता रहता है।

(2)चीनी-उत्पादन गन्ने के उत्पादन पर निर्भर करता है, जो खाद्यान्न की तुलना में गन्ना के मूल्य पर निर्भर करता है, जो खाद्यान्न की तुलना में गन्ना के मूल्य पर निर्भर करता है और इसका संबंध गन्ना और गुड़ की कीमतों से भी है।

(3)उत्पादन क्षेत्र से मिल तक पहुँचने की धीमी और लंबी प्रक्रिया से गन्ना के स्तर में गिरावट आ जाती है।

(4)चीनी-मिल केवल पेराई के मौसम में ही चलते हैं और शेष समय बंद रहते हैं क्योंकि दूर से गन्ना लाना मुश्किल है।

(5)गन्नों की गुणवत्ता और मात्रा की कमी।

(6)चीनी को अकुशल एवं अनार्थिक विधि से बनाने, कम उपज, पेराई का छोटा मौसम, गन्नों की ऊँची कीमत और ज्यादा उत्पाद-कर के कारण चीनी का उत्पादन महंगा हो जाता है।

(7)पुरानी तथा अक्षम मशीनरी।

3. कागज उद्योग

  1. कच्चे माल की कमी
  2. उद्योग में लगने वाले रसायनों की कमी
  3. श्रम-समस्या, निम्न-किस्म के कोयले के उपयोग, ढुलाई की ऊँची कीमत, आदि के कारण ऊँचा उत्पादन मूल्य
  4. मिल लगाने में ऊँचा निवेश
  5. छोटी इकाइयों का बीमार होना
  6. अखबारी कागज की समय-समय पर होने वाली कमी।

B. खनिज आधारित उद्योग

1.  लौह-इस्पात उद्योग

लौह-इस्पात उद्योग औद्योगिक विकास की आधारशिला है, लौह-इस्पात का प्रति व्यक्ति उपभोग औद्योगिक विकास का सूचक भी है।

 

(i)TISCO (स्थापना 1907) - भारत का सबसे बड़ा उपक्रम है।

वर्ष1912 में स्टील का उत्पादन प्रारम्भ हुआ।

कच्चे माल का स्रोत-हेमेटाइट (नोआमुंडी);कोयल-रानीगंज, झरिया; मैंगनीज-जोड़ा (ओडिशा), डोलोमाइट, लाइमस्टोन, फायरक्ले-सुन्दरगढ़ (ओडिशा); जल-स्वर्णरेखा नदी, ऊर्जा-खरकाई डेम; सस्ता श्रम-बिहार, ओडिशा, बंगाल। टिस्को गोपालपुर (ओडिशा) में एक कांपलेक्स का विकार कर रहा है। यह तटीय भाग में अवस्थित है और भारत का सबसे अधिक सक्षम प्लान्ट होगा।

 

(ii)IISCO इंडियन आयरन एंड स्टील कंपनी -

वर्ष1937 में बर्नपुर में और वर्ष1908 में हीरापुर में प्लान्ट स्थापित किए गए। इन सबको मिलाकर IISCO की स्थापना हुई वर्ष1972 में इसको सरकार के नियंत्रण में लाया गया। हीरापुर में पीग आयरन का उत्पादन होता है, जिसको स्टील के उत्पादन हेतु कुल्टी भेजा जाता है।

 

लौह अयस्क   - गुआ माइन्स (झारखंड), मयूरभंज

कोयल- झारिया

ऊर्जा - दामोदर घाटी परियोजना

डोलोमाइट, लाइमस्टोम      - सुन्दरगढ़

(iii)MISCO : मैसूर आयरन एंड स्टील कम्पनी

हेमाटाइट आयरन - केमनगुंडी (चिकमंगलूर)

ऊर्जा - श्रावती पॉवर प्रोजेक्ट

लाइमस्टोन - मुंडीगुडा

मैंगनीज - सिमोगा, चित्रदुर्ग

लाइमस्टोम, डोलोमाइट - स्थानीय क्षेत्रों में उपलब्ध

(iv) SAIL हिन्दुस्तान स्टील लिमिटेड

यह सार्वजनिक क्षेत्र का उपक्रम है। द्वितीय पंचवर्षीय परियोजना में भिलाई, राऊरकेला और दुर्गापुर में प्लान्ट की स्थापना हुई।

भिलाई : दुर्ग जिले में इसकी स्थापना 1957 में सोवियत संघ के सहयोग से हुई। स्थापना का उद्देश्य इस क्षेत्र को विकसित करना था।

हेमेटाइट  - डाली-राजहजरा रेंज

कोयला - कोरबा, करगली फिल्ड्स

लाइमस्टोन - नंदिनी माइन्स

मैंगनीज - भंडारा (महाराष्ट्र), बालाघाट (मध्य प्रदेश)

ऊर्जा - कोरबा थर्मल पॉवर

डोलोमाइट - विलासपुर

लौह अयस्क - सुन्दरगढ़, क्योंझर

कोयला - झरिया, तालचेर

ऊर्जा  - हीराकुंड, पॉवर प्रोजेक्ट

मैंगनीज - बरागमयला

डोलोमाइट - बराडवार

लाइमस्टोन - पूर्णपाली

 

लौह अयस्क - बोलनी माइन्स और मयुरभंज

कोयला - झरिया, रानीगंज

लाइमस्टोन - वीरमित्रपुर (ओडिशा)

मैंगनीज - क्योंझर (ओडिशा)

डोलोमाइट - वीरमित्रपुर

ऊर्जा  - दामोदर घाटी कॉरर्पाोरेशन

जल - दामोदर नदी

बोकारो : वर्ष 1972 में इस प्लान्ट का प्रारम्भ सोवियत सहयोग से हुआ। यह बोकारो और दामोदर नदियों के संगम के पास हजारीबाग जिले में स्थित है।

लौह अयस्क - किरिबुरू (ओडिशा)

कोयला - झरिया

लाइमस्टोन - पलामू

ऊर्जा - दामोदर घाटी परियोजना

चतुर्थ योजना में तीन नए प्लांट स्थापित हुए : सलेम (तमिलनाडु) विशाखापट्टनम (आंध्र प्रदेश), विजयनगर (कर्नाटक)।

2.  एल्युमिनियम उद्योग

लौह-इस्पात उद्योग के बाद यह दूसरा सबसे महत्त्वपूर्ण उद्योग है। 50% के लगभग एल्युमिनियम की खपत विद्युत ऊर्जा के उत्पादन एवं वितरण से होती है। दूसरे अन्य क्षेत्र जहाँ एल्युमिनियम की खपत होती है वे हैं- बर्तन उद्योग (20%), ट्रांसपोर्ट (12%) और पैकिंग (8%)।

एक टन एल्युमिनियम के उत्पादन में 18573 kwh विद्युत ऊर्जा की आवश्यकता हाती है। उत्पादन व्यय का 70% भाग सिर्फ इसी मद में खर्च होता है। अतः ऊर्जा और बाॅक्साइट की प्राप्ति से ही यह निर्धारित होता है कि एल्युमिनियम संयंत्र की स्थापना कहाँ हो।

 

INDALCO. एल्युमिनियम कारर्पोरेशन ऑफ इंडिया की स्थापना  वर्ष 1937 मे हुई। इसके संयंत्र ने जयकर्णनगर (JK Nagar) (प.बंगाल) में कार्य करना प्रारम्भ किया।

INDAL Co. (इंडियन एल्युमिनियम कम्पनी लिमिटेड) अलुपुरम (केरल) में अपना संयंत्र वर्ष 1938 में स्थापित किया।

दूसरी पंचवर्षीय योजना में हीराकुंड (ओडिशा), रेनुकुट (उत्तर प्रदेश) की स्थापना INDAL Co. और HINDALCO द्वारा।

वर्ष 1965 में कोरबा में BALCO के द्वारा रत्नागिरि में भी संयंत्र स्थापित किया गया।

वर्ष 1965 MALCO मेट्टूर में

वर्ष 1981 में NALCO दमनजोड़ी (कोरापुट) में

भारत का सबसे बड़ा संयंत्र अन्गुल, धोन्डानल जिला में।

3.  ताम्र उद्योग (कॉपर स्मेलटिंग)

वर्ष 1924 में इंडियन कॉपर कारर्पोरेशन की स्थापना हुई।

पहला संयंत्र घाटशिला (सिंहभूम में)

वर्ष 1967 में हिन्दुस्तान कॉपर लिमिटेड की स्थापना।

वर्ष 1972 में इंडिया कॉपर लिमिटेड की स्थापना।

वर्तमान में केवल दो संयंत्र काम कर रहे हैं :

1. घाटशिला (सिंहभूम)     2. खेतड़ी (झुंझुनूँ)

4.  लेड और जस्ता उद्योग

पहला लेड स्मेलटिंग प्लान्ट टून्डु (धनबाद) में स्थापित हुआ।

राजस्थान के जावर और राजपुर दरीबा के अयस्क की प्राप्ति होती है।

देश में चार जिंक स्मेल्टर हैं :-

1. अलवाई - केरल

2. देबारी (उदयपुर) - राजस्थान

3. चन्देरिया (चित्तौड़गढ़)  - राजस्थान

4. विशाखापट्टनम - आंध्र प्रदेश

5.  सीमेन्ट उद्योग

यह कच्चे माल पर आधारित उद्योग है। चूना-पत्थर मुख्य कच्चा माल है। कुल उत्पाद का 66% (1.5 टन) चूना-पत्थर का उपयोग एक टन सीमेंट के उत्पादन में होता है।

वर्ष 1904 में पहली मिल चेन्नई में। प्रयास असफल साबित हुआ।

वर्ष 1912-13 में पोरबंदर में इंडियन सीमेन्ट क. लिमिटेड की स्थापना।

वर्ष 1915-कटनी में, वर्ष 1915-16 में लाखेरी (बूँदी) में क्लिक निक्सन कम्पनी द्वारा सीमेन्ट का कारखाना स्थापित किया गया।

जपला (बिहार), शाहाबाद (कर्नाटक) कैगोर, बानमोर, मेहगाँव, द्वारका। प्रथम राजस्थान - राजस्थान 11%, तमिलनाडु  8.5%, गुजरात 8.5%।

 

C. इंजीनियरिंग आधारित उद्योग

1.  मशीन उपकरण

मशीन टूल्स का उत्पादन वर्ष 1932 में प्रारंभ हुआ किर्लोस्कर ब्रदर्स लिमिटेड के द्वारा।

वर्ष 1953 में हिन्दुस्तान मशीन टूल्स की स्थापना सार्वजनिक उपक्रम के रूप मे बेंगलुरू में हुई, स्विट्जरलैंड के सहयोग से स्थापना हुई।

हैवी इंजीनियरिंग निगम लि. रांची की स्थापना वर्ष 1958 में रूस के सहयोग से की गई।

वर्ष 1966 में विशाखापट्टनम में भारी मशीनरी उद्योग की स्थापना चेक सहयोग से हुई।

प्रजा टूल्स लिमिटेड, सिकंदराबाद में रक्षा उपकरण का उत्पादन होता है।

जादवपुर इकाई (कोलकाता) में बहुमूल्य उपकरणों का निर्माण होता है।

टेल्को (TELCO) - वर्ष 1951 में, जमशेदपुर

भेल (BHEL) - भोपाल, इलेक्ट्रिक लोकोमोटिव

2.  रेलवे लोकोमोटिव्स

चितरंजन लोकोमोटिव्स वर्क (CLW) : यह वर्धमान जिले (पश्चिम बंगाल) में है जिसकी स्थापना वर्ष 1950 में हुई। वर्ष 1972 से पहले यहाँ स्टीम लोकोमोटिव बनती थी। डीजल इंजन का कारखाना वाराणसी में है, जहाँ अब इलेक्ट्रिक लोकोमोटिव का निर्माण होता है।

1. इंटीग्रल कोच फैक्ट्री, पेराम्बुर (तमिलनाडु) वर्ष 1955 में स्थापित।

2. कपूरथला कोच फैक्ट्री, कपूरथला (पंजाब)

3. रायबरेली कोच फैक्ट्री, रायबरेली (उत्तरप्रदेश) निर्माण कार्य प्रगति पर।

3.  ऑटोमोबाइल्स उद्योग

सर्वप्रथम जेनेरल मोटर्स लि. की स्थापना वर्ष 1928 में मुम्बई में हुई।

फोर्ड मोटर्स, वर्ष 1980 में चेन्नई में।

प्रीमियर ऑटोमोबाइल्स लिमिटेड कुर्ला (मुंबई)

हिन्दुस्तान मोटर लि. उत्तरपुरा (कोलकता)

मोटर साईकिल    - फरीदाबाद, मैसूर

स्कूटर  - लखनऊ, सतारा, आकुर्दी (पूना)

मारुती  - गुरुग्राम

टेल्को - भारी और मध्यम कॉमर्शियल वाहन

4.  हवाई जहाज उद्योग

वर्ष 1940 में बेंगलुरू में हिन्दुस्तान एयरोनोटिक्स लिमिटेड उद्योग की स्थापना हुई। नासिक, कोयम्बटूर, हैदराबाद, कानपुर, लखनऊ अन्य महत्त्वपूर्ण केन्द्र हैं।

5.  जलयान निर्माण उद्योग

आधुनिक ढंग का जलयान बनाने का पहला कारखाना सिंधिया नेवीगेशन कम्पनी द्वारा वर्ष 1941 में विशाखापट्टनम में स्थापित किया। वर्ष 1952 में इसे केन्द्र सरकार ने अधिगृहित किया। अब इसे हिन्दुस्तान शिपयार्ड कम्पनी चला रही है।

D. रसायन आधारित उद्योग

वस्त्रोद्योग, लौह इस्पात उद्योग और मेटालॉजिकल उद्योग के बाद यह चौथा बड़ा उद्योग है। इस उद्योग में सल्फ्यूरिक अम्ल का प्रयोग सबसे ज्यादा होता है। मुख्यतः उर्वरक, प्लास्टिक, पेंट, कृत्रिम रेशे के उत्पादन में 90% सल्फर आयात करना पड़ता है। मुख्यतः केरल, महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु और प. बंगाल में इकाइयाँ हैं।

1.  उर्वरक

पेट्रो रसायन उत्पादित करने वाले क्षेत्रों के समीप इस उद्योग को स्थापित किया जाता है।

नाइट्रोजन उर्वरक का उत्पादन करने वाली इकाइयों में से 70% इकाईयाँ नेप्था का उपयोग कच्चे माल के रूप में करती हैं। नेप्था तेलशोधक इकाइयों का उप-उत्पाद होता है।

नाइट्रोजन का उपयोग करने वाले संयंत्रों का चलन बढ़ रहा है।

वर्ष 1906 में रानीपेट (तमिलनाडु) में पहला सुपर फाॅस्फेट प्लान्ट स्थापित किया गया था।

वर्ष 1951 में सिन्दरी (झारखण्ड) में पहला उर्वरक कारखाना आजादी के बाद स्थापित हुआ।

भारत नाइट्रोजन उर्वरक का चौथा बड़ा उत्पादक देश है।

FCI - फर्टिलाइजर कॉरर्पोरेशन ऑफ इंडिया : इसकी चार इकाइयाँ हैं : सिंदरी, तालचेर, गोरखपुर और रमागुंडम (आंध्र प्रदेश)।

NFL - (नेशनल फर्टिलाइजर लिमिटेड) इसके निम्न संयंत्र हैं - भटिन्डा, पानीपत, विजयपुर तथा अन्य केन्द्र उदयगमनडलम, कोचीन, थाल, नामरूप, बरौनी, पारादीप, आमालोर आदि-

HBJ गैस पाइपलाइन के माध्यम से हजीरा, विजयपुर, जगदीशपुर, आँवला, बाबराला और शाहजहाँपुर में प्लान्ट की स्थापना हुई है।

उद्योगों के विकास और वितरण में काफी क्षेत्रीय असमानता है। कहीं-कहीं समूह में उद्योग लगे हैं जिसका प्रमुख कारण कच्चे माल की समीपता और अन्य दूसरी सुविधा का होना है। इसको उद्योगों का जमघट कहते हैं। जिन क्षेत्रों में उद्योगों का संकेन्द्रण ज्यादा है, उसे औद्योगिक क्षेत्र कहते हैं।

खनिज

खनिज पदार्थ प्राकृतिक रूप से निकलने वाला वह पदार्थ है, जिसकी अपनी भौतिक विशेषताएँ होती हैं और जिसकी प्रकृति को रासायनिक गुणों  द्वारा व्यक्त किया जा सकता है। मोटे तौर पर खनिजों को चार भागों में विभाजित किया जा सकता है-

(1) ईंधन खनिज (Fuel Mineral)- कोयला, लिग्नाइट, कच्चा तेल एवं प्राकृतिक गैस

(2) धात्विक खनिज (Metallic Minerals)- बॉक्साइट, लौह अयस्क, ताम्र अयस्क, मैंगनीज आदि।

(3) अधात्विक खनिज (Non-Metallic Minerals) - बेराइट्स, एपेटाइट, एंडुलासाइट, कायनाइट आदि।

(4) लघु खनिज (Minor Minerals) – मिट्‌टी तकी ईंट, कंकड़, भवन निर्माण, कायनाइट इत्यादि।

 

नोट:-

- राष्ट्रीय खनिज नीति , 2019 (NMP,2019)

केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने 28 फरवरी, 2019 को राष्ट्रीय खनिज नीति को मंजूरी दी, उस नीति में प्रस्तावित किया गया है, कि खनन  गतिविधि को उद्योग का दर्जा दिया जाता है।

- NMP 2019 का उद्देश्य निजी निवेश को आकर्षित करना है। इसके लिए प्रोत्साहन देने की व्यवस्था की गई है। नई नीति में खनिजों के परिवहन को सुविधाजनक बनाने के लिए समर्पित खनिज कॉरिडोर बनाने का उल्लेख  किया गया है।

- राष्ट्रीय खान खनिज सम्मेलन (NSMM)

खान मंत्रालय ने 13 जुलाई, 2018 को मध्यप्रदेश के इंदौर में चौथे राष्ट्रीय खान व खनिज सम्मेलन का आयोजन किया, तीसरा सम्मेलन नई दिल्ली में 20 मार्च, 2018 को आयोजित किया गया था।

- नमस्या (नाल्को सूक्ष्म, लघु उद्यम योगायोग अनुप्रयोग)

नाल्को द्वारा सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों के लिए लॉन्च किया गया मोबाइल एप्प।

- खनन निगरानी प्रणाली (MSS)

खनन निगरानी प्रणाली (MSS) एक सैटेलाइट आधारित निगरानी व्यवस्था है जिससे रिमोट संवेदी खोज तकनीक के जरिए अवैध खनन को रोका जा सकता है। (MSS) के लिए 24 जनवरी, 2017 को गाँधीनगर, गुजरात में एक मोबाइल एप्प का शुभारंभ किया गया।

लौह अयस्क खनिज :- भारत में एशिया का विशालतम लौह – अयस्क संरक्षित हमारे यहाँ चार प्रकार के लौह-अयस्क पाए जाते हैं-

 1. मैग्नेटाइट

 2. हेमेटाइट

 3. लिमोनाइट

 4. सिडेराइट

- भारत में मुख्यत: हेमेटाइट व मैग्नेटाइट किस्म का लोहा पाया जाता है।

- लौह अयस्क उत्पादन में भारत का स्थान विश्व में चौथा स्थान है।

- विश्व में लौह अयस्क के सर्वाधिक भंडार ऑस्ट्रेलिया में है वर्ष 2017 में भारत का लौह – अयस्क के उत्पादन में चीन के बाद दूसरा स्थान है।

1. मैग्नेटाइट (Fe3O4)

- यह सर्वोत्तम प्रकार का लौह अयस्क है यह काले रंग का होता है तथा इसमें धातु की मात्रा 72% तक होती है।

 प्रमुख क्षेत्र :-

 1. झारखंड – सिंह भूम, बाराजामदा

 2. कर्नाटक – बेल्लारी - हॉस्पेट

 3. छत्तीसगढ़ – बैलाडिला

2. हेमेटाइट (Fe2O3)

- यह लाल एवं भूरे रंग का होता है। इसमें धातु का अंश 60 से 70 प्रतिशत के बीच होता है तथा भारत का अधिकतर (लगभग 58%) लौह अयस्क इसी श्रेणी का है।

 प्रमुख क्षेत्र :-

 1. झारखंड – सिंह भूम

 2. ओडिशा – मयूरभंज, क्योंझर, सुन्दरगढ़

 3. कर्नाटक, गोवा आदि जगहों में पाया जाता है।

3. लिमोनाइट –

- यह प्राय: पीले रंग का होता हैं, इसमें धातु का अंश 10% से 40% होता है।

- पश्चिम बंगाल के रानीगंज क्षेत्र में इस प्रकार के लौह अयस्क मिलते हैं।

4. सिडेराइट –

- इस अयस्क में अशुद्धियाँ अधिक पाई जाती है। धातु का अंश 48% तक होता है। इसका रंग भूरा होता है। इसमें लोहा एवं कार्बन का मिश्रण होता है।

- लिमोनाइट तथा सिडेराइट निम्न कोटि का लौह अयस्क है।

- लौह अयस्क के संचित भंडार का क्रम (राज्यवार)

 1. ओडिशा  

 2. झारखंड

 3. छत्तीसगढ़  

 4. कर्नाटक

- लौह अयस्क में छत्तीसगढ़ राज्य में बैलाडिला की लौह अयस्क खान तथा कर्नाटक में डोनीमलाई की खान प्रसिद्ध है।

 

मैंगनीज:-

 मैंगनीज खनिज धारवाड़ शैलों से प्राप्त होता हैं। मुख्य अयस्क – साइलोमैलीन, पाइरोलूसाइट, ब्रोनाइट

- भारत में इसका प्रयोग मुख्य रूप में अपघर्षक जंगरोधी इस्पात बनाने, लोहे और मैंगनीज के मिश्रधातु बनाना, शुष्क बैटरी, रंग एवं काँच उद्योग में किया जाता है।

- भारत 90% मैंगनीज धारवाड़ शैल – समूह के गोंडाइट तथा कोडुराइट शृंखला में पाया जाता है।

- मध्यप्रदेश 38% एवं महाराष्ट्र 24% दोनों मिलकर देश के लगभग आधे से अधिक मैंगनीज का उत्पादन करते हैं।

- देश में मैंगनीज अयस्क की सबसे बड़ी उत्पादक कंपनी मैंगनीज ओर इंडिया लिमिटेड (MOIL) नागपुर है।

- मैंगनीज मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र की सीमा पर देश की सबसे महत्त्वपूर्ण मैंगनीज पेटी पाई जाती है।

- यह पेटी मध्य प्रदेश के बालाघाट – छिंदवाड़ा से लेकर महाराष्ट्र के नागपुर एवं भंडारा जिले तक है।

 

प्रमुख क्षेत्र:-

 1. मध्यप्रदेश – बालाघाट - छिंदवाड़ा

 2. महाराष्ट्र – नागपुर, भंडारा एवं रत्नागिरी

 3. ओडिशा – क्योंझर, सुंदरगढ़, बोनाई, कालाहांडी, कोरापुर

 4. कर्नाटक – बेल्लारी, शिमोगा, उत्तरी कन्नड़

 5. आंध्र प्रदेश- विजयनगर, आदिलाबाद (तेलंगाना)

 6. झारखण्ड – सिंह भूम

 7. राजस्थान – बाँसवाड़ा, उदयपुर

 8. गुजरात – बड़ोदरा एवं पंचमहल क्षेत्र

- मैंगनीज का उत्पादन क्रम (राज्यवार)

 1. मध्यप्रदेश (38%)

 2. महाराष्ट्र (29%)

 3. ओडिशा(14%)

 4. आंध्रप्रदेश (8%)

- मैंगनीज के संचित भंडार का क्रम (राज्यवार)

 1. ओडिशा (45%)

 2. कर्नाटक (20%)

 3. मध्यप्रदेश (11%)

 4. महाराष्ट्र (02%)

बॉक्साइट –

- बॉक्साइट अयस्क का प्रयोग एल्युमिनियम बनाने चमड़ा रंगने, पेट्रोल एवं नमक साफ करने में किया जाता है।

- भारत में यह क्रिटेशस युगीन संरचना में पाया जाता है। इसकी उत्पत्ति का संबंध क्रिटेशस युगीन चट्टानों के लैटेराइजेशन से है।

 

प्रमुख क्षेत्र :-

1. ओडिशा – कालाहांड़ी, रायगढ़, कंधामल तथा कोरापुट जिला

2. तेलंगाना – उत्तर – पूर्वी क्षेत्र

3. मध्यप्रदेश –

 1. कटनी- जबलपुर- बरगावान पहाड़ी क्षेत्र

 2. अमरकंटक – राहडोर क्षेत्र तथा मांडला जिला 4. झारखंड – पलामू एवं लोहरदगा जिला

 5. गुजरात – जामनगर, कच्छ एवं जूनागढ़

 6. तमिलनाडु – सेलाम (शिवराय पहाड़ी) एवं नीलगिरी सेलम।

बॉक्साइट का संचित भंडार क्रम (राज्यवार)

 1. ओडिशा (53%)

 2. आंध्रप्रदेश (16%)

 3. गुजरात (8%)

 4. झारखंड (5%)

बॉक्साइट का उत्पादन क्रम (राज्यवार)

 1. ओडिशा (42%)

 2. गुजरात (25%)

 3. महाराष्ट्र (12%)

 4. झारखंड (9%)

ताँबा-

- ताँबा का प्रयोग बिजली के तार, मशीन, रेडियो, टेलीफोन, मिश्र धातु आदि बनाने में किया जाता है।

- भारत में ताँबा प्राचीन रवेदार कुडप्पा एवं अरावली संरचना (धारावाड़ क्रम) में पाए जाते हैं।

ताँबा उत्पादन के प्रमुख क्षेत्र:-

 1. झारखंड – मोसाबनी, राखा, सोनामाखी, घाटशिला, पथरगोड्डा, सुरदा (पूर्वी सिंह भूम जिला)

 2. राजस्थान – खेतड़ी का मंडन – कूंदन क्षेत्र (झुंझुनूँ जिला) खो- दरीबा क्षेत्र (अलवर)

 3. आंध्रप्रदेश – अग्निगुंडाला क्षेत्र (गूंटुर जिला)

 4. मध्यप्रदेश – मलजखंड क्षेत्र (बालाघाट जिला)

 5. सिक्किम – रांगपो, डिक्यू क्षेत्र

- घाटशिला, खेतड़ी, मलजखंड में खनन के अलावा – ताम्रशोधन केन्द्र भी है।

ताँबा संचित भंडार क्रम (राज्यवार)

  1. राजस्थान - (53.5%)
  2. झारखंड़ - (20%)
  3. मध्यप्रदेश - (19%)
  4. आंध्रप्रदेश  

ताँबा उत्पादन क्रम (राज्यवार)

  1. तमिलनाडु - (63%)
  2. झारखंड़ - (36%)
  3. ओडिशा

- भारत में ताँबे की कमी है।

- USA, कनाडा, जाम्बिया आदि देशों से इसका आयात किया जाता है।

अभ्रक :-

 भारत में विश्व के लगभभ 60% अभ्रक का उत्पादन होता है। अभ्रक आग्नेय एवं कायांतरित चट्टानों में शीट के रूप में पाया जाता है।

- उपयोग – इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माण, ताप भट्टियों में, सजावटी सामान बनाने व सुरक्षा उद्योग में प्रयुक्त होता है।

- अभ्रक के तीन प्रकार है-

 1. रूबी अभ्रक – सफेद अभ्रक

 2. मस्कोवाइट अभ्रक – हल्का गुलाबी

 3. बायोटाइट अभ्रक काला या गहरे रंग का अभ्रक

अभ्रक के प्रमुख क्षेत्र:-

1. झारखंड – कोडरमा, गिरिडीह एवं हजारीबाग

2. बिहार – नवादा – गया क्षेत्र में जो कोडरमा से सटा है।

3. आंध्रप्रदेश – नेल्लौर, विशाखापट्टनम एवं कृष्णा

4. राजस्थान – जयपुर, उदयपुर एवं भीलवाड़ा जिला

अभ्रक संचित भंडार क्रम (राज्यवार)

 1. आंध्रप्रदेश (41%)
 2. राजस्थान (21%)
 3. ओडिशा (20%)

 

अभ्रक उत्पादन क्रम (राज्यवार)

 1. आंध्रप्रदेश (99%)

 2. राजस्थान

 3. झारखंड

सोना:-

 भारत का अधिकतर सोना धारवाड़ संरचना के शिष्ट शैलों की क्वार्ट्स शिराओं में मिलता है।

- इसे धातु रेखा भंडार कहा जाता है।

- देश का कुछ सोना नदियों के बालू में पाया जाता है, इन्हें प्लेसर भंडार कहते हैं।

- प्लेसर सोना भंडार – स्वर्ण रेखा नदी, सोन नदी, स्वर्णवत्ती नदी, सिंधु नदी से प्राप्त होता है।

सोना उत्पादन के प्रमुख क्षेत्र-

1. कर्नाटक

- चैम्पियन एवं ओरोगन रीफ (कोलार जिला)

- ओकले रीफ (हट्टी क्षेत्र, रायचूर जिला)

- देश का लगभग 99% सोना कर्नाटक के खानों से प्राप्त होता है।

2. आन्ध्र प्रदेश – रामगिरी स्वर्ण क्षेत्र (अनंतपुर जिला)

चाँदी:-

- चाँदी विद्युत की सर्वोत्तम सुचालक होती है।

- मुख्य अयस्क – अर्गनाहाइट, पाइराजाइराइट व हार्न सिल्वर है।

- चाँदी सामान्यत: जस्ता, सीसा एवं ताँबा आदि अयस्कों के साथ मिश्रित रूप में पाई जाती है।

- राजस्थान का जावर क्षेत्र, कर्नाटक का कोलार एवं चित्रदुर्ग क्षेत्र, आन्ध्रप्रदेश का कुड़प्पा, गुंटूर एवं कुर्नूल क्षेत्र चाँदी के उत्पादन हेतु प्रसिद्ध है।

- वर्तमान में देश के 99% चाँदी का उत्पादन राजस्थान से हो रहा है।

हीरा:-

- हीरा एक बहुमूल्य पत्थर है जो रासायनिक रूप से कार्बन का शुद्धत्तम रूप है।

- हीरा उत्पादन का कार्य देश में राष्ट्रीय खनिज विकास निगम लिमिटेड द्वारा पन्ना (मध्यप्रदेश) में किया जाता है।

- देश में हीरे का संपूर्ण उत्पादन मध्यप्रदेश में ही होता है।

- मध्यप्रदेश में पन्ना की मझगवां (majhgawan) खान से हीरे का उत्पादन करता है।

हीरा के प्रमुख उत्पादन क्षेत्र हैं:-  

1.मध्यप्रदेश – पन्ना (जिला)

2. आंध्र प्रदेश –

 1. मुनीमाडुगु – बंगन मिश्र पिंडाश्म (कुर्नूल - जिला)

 2. वज्र करूर वक्री पादप (अनन्तपुर जिला)

 3. कृष्णा नदी घाटी का रेतीला क्षेत्र

सीसा:-

 सीसा का मुख्य अयस्क, गैलेना, पाइरोटाइट है। यह चूना पत्थर एवं बलुआ पत्थर के परतदार चट्टानों में पाया जाता है।

- सीसा उत्पादन हेतु राजस्थान का जावर क्षेत्र (उदयपुर) प्रसिद्ध है।

- देश में सीसे का सम्पूर्ण उत्पादन राजस्थान से होता है।

जस्ता:-

- जस्ते के अयस्क – कैलेमीन, जिंकाइट व विलेमाइट

- इसका उपयोग गेलवेलाइजेशन में, टायर एवं शुष्क – बैटरी उद्योग में किया जाता है।

- राजस्थान का उदयपुर (मोछिया – मगरा क्षेत्र)

 राजसमंद एवं चित्तौड़ प्रमुख जस्ता उत्पादक क्षेत्र हैं।

- देश में जस्ते का लगभग सम्पूर्ण उत्पादन राजस्थान में ही होता है।

क्रोमाइट:-

- क्रोमाइट क्रोमियम का प्रमुख अयस्क है।

- क्रोमाइट रिफ्रेक्टरी उद्योग व धातुकर्म उद्योग में प्रयुक्त होता है।

- भारत का लगभग 96% क्रोमाइट भंडार ओडिशा के कटक जिले का सुकिंदा क्षेत्र उच्च कोटि के क्रोमाइट हेतु प्रसिद्ध है। क्योंझर एवं धेनक सीमित मात्रा में क्रोमाइट मिलता है।

- क्रोमाइट के उत्पादन में ओडिशा की भागीदारी लगभग 90% है। शेष उत्पादन कर्नाटक के हसन जिले से होता है।

एस्बेस्टॉस:-

- यह खनिज सीमेंट की चादरें, भवन निर्माण सामग्री व रासायनिक उद्योगों में प्रयुक्त होता है। इसे Rockwool या Mineral Silk भी कहा जाता है।

- एस्बेस्टॉस एक रेशेदार सिलिकेट खनिज है। यह अग्नि एवं विद्युत का कुचालक होता है।

- एस्बेस्टॉस के उत्पादन हेतु राजस्थान का अजमेर, भीलवाड़ा, अलवर एवं उदयपुर क्षेत्र

- आंध्र प्रदेश का कुडप्पा, अनंतपुर, तेलंगाना का महबूबनगर तथा झारखंड – सिंह भूम क्षेत्र प्रमुख है।

डोलोमाइट:-

 यह चूना-पत्थर  एवं मैग्नीशियम का मिश्रण होता है।

 प्रमुख क्षेत्र:-

 1. आंध्रप्रदेश – कुडप्पा, कुर्नूल, अनन्तपुर

 2. ओडिशा- बीरमित्रपुर (सुंदरगढ़) सम्बलपुर, कोरापुट

 3. मध्यप्रदेश – झाबुआ, बालाघाट, जबलपुर

 4. छत्तीसगढ़- विलासपुर, दुर्ग

- डोलोमाइट के उत्पादन में छत्तीसगढ़ (36%) का प्रथम स्थान है। इसके बाद क्रमश: आन्ध्रप्रदेश (10%) एवं ओडिशा (9%) का स्थान है।

चूना-पत्थर:-

- चूना-पत्थर प्राय: कुडप्पा एवं विंध्यन शैल समूहों में मिलते हैं। इसका उपयोग मुख्यत: सीमेंट उद्योग में होता है।

- मध्यप्रदेश का सतना, जबलपुर, कटनी क्षेत्र

- छत्तीसगढ़ का रायपुर, महासमंद, दुर्ग एवं विलासपुर क्षेत्र

- आंध्रप्रदेश का कुडप्पा एवं गुंटूर क्षेत्र

- तेलंगाना का आदिलाबाद एवं करीमनगर क्षेत्र

- राजस्थान - चित्तौड़गढ़, अजमेर, सिरोही एवं उदयपुर

- गुजरात – जूनागढ़ एवं जामनगर क्षेत्र चूना – पत्थर उत्पादन हेतु प्रमुख है।

चूना-पत्थर का उत्पादन क्रम (राज्यवार)

1. राजस्थान (21%)

2. मध्यप्रदेश (18%)

3. आन्ध्रप्रदेश (12%)

4. गुजरात (9%)

जिप्सम :-

 जिप्सम को हरसौंठ, सेलेनाइट, खड़िया भी कहा जाता है। यह एक परतदार खनिज है।

उपयोग:-

 इस खनिज का उपयोग मुख्यत: - उर्वरक, प्लास्टर ऑफ पेरिस, गंधक के अम्ल, सीमेंट रासायनिक पदार्थों के निर्माण तथा क्षारीय भूमि के उपचार हेतु प्रयुक्त होता है।

उत्पादन:-

 जिप्सम के उत्पादन में राजस्थान का देश में प्रथम स्थान है, देश का 99% उत्पादन यही पर होता है।

- राजस्थान के बाद जम्मू-कश्मीर का द्वितीय स्थान है। गुजरात, तमिलनाडु अन्य उत्पादक राज्य हैं।

प्रमुख उत्पादन केन्द्र :-

 1. राजस्थान – नागौर, बीकानेर, जैसलमेर, बाड़मेर, श्री गंगानगर जिला।

 2. जम्मू-कश्मीर – उरी, बारामूला, डोडा जिला।

 3. तमिलनाडु – तिरूचिरापल्ली, कोयम्बटूर जिला।

संगमरमर:-

- संगमरमर प्रमुख इमारती पत्थर है। यह 'लघु खनिज' की श्रेणी में आता है। यह एक कायान्तरित चट्टान है।

- इसका उपयोग मुख्यत: भवन निर्माण में होता है।

प्रमुख क्षेत्र :-

 राजस्थान – मकराना (नागौर), राजसमंद, जैसलमेर, अजमेर

 मध्यप्रदेश – जबलपुर, बैतूल

 आंध्रप्रदेश – विशाखापट्‌टम

 हरियाणा – महेन्द्रगढ़

ग्रेनाइट:-

 ग्रेनाइट 'लघु खनिज' है। इसके सर्वाधिक भंडार कर्नाटक में है। इसके बाद क्रमश: राजस्थान, झारखंड एवं गुजरात का स्थान आता है।

- वर्ष 2017-18 में ब्लैक/रंगीन ग्रेनाइट का सर्वाधिक उत्पादन क्रमश: राजस्थान, तेलंगाना, आंध्रप्रदेश व गुजरात में हुआ है।

- विश्व में ग्रेनाइट का सर्वाधिक उत्पादन क्रमश: चीन, ब्राजील व भारत में होता है।

टंगस्टन:-

 टंगस्टन का मुख्य अयस्क वोलफ्रामाइट या शीलाइट है। टंगस्टन कठारे, भारी एवं उच्च गलनांक वाली नाली धातु है, जिसका मुख्य उपयोग विद्युत बल्बों में एवं कठोर धातुओं को काटने वाले यंत्रों में किया जाता है।

- टंगस्टन के उत्पादन हेतु राजस्थान का डेगाना (नागौर), बाल्दा (सिरोही) प्रसिद्ध है।

- भारत में टंगस्टन के सर्वाधिक भंडार- कर्नाटक, राजस्थान व आंध्र प्रदेश में है।

टिन:-

 टिन का मुख्य अयस्क केसीट्राइट (Sno2) है टिन मुख्यत: ग्रेनाइट, पैग्मेटाइट व क्वाटर्ज के साथ पाया जाता है।

- टिन कन्सन्ड्रेड का भारत में एकमात्र उत्पादन राज्य छत्तीसगढ़ है।

- टिन के भंडार भारत में केवल छत्तीसगढ़ में बस्तर व दाँतेवाड़ा (जिला) में होता है।

- भिवानी (हरियाणा) व मलकानगिरी (ओड़िशा) में पाए जाते हैं।

रॉक फॉस्फेट:-

 रॉक फॉस्फेट एक उर्वरक खनिज है। रासायनिक खाद (सुपर फॉस्फेट) के निर्माण तथा लवणीय भूमि के उपचार में इसका उपयोग होता है।

- देश में रॉक फॉस्फेट के सर्वाधिक भंडार क्रमश: झारखंड, राजस्थान व मध्यप्रदेश में है।

- रॉक फॉस्फेट के उत्पादन में देश में राजस्थान का प्रथम एवं मध्यप्रदेश का द्वितीय स्थान है।

- राजस्थान में उदयपुर में व मध्यप्रदेश में छतरपुर में सर्वाधिक उत्पादन होता है।

नमक:-

 नामक का उत्पादन समुद्र एवं खारी झीलों के जल से किया जाता है। हमारे देश के कुल नमक उत्पादन का लगभग दो तिहाई भाग समुद्री जल से उत्पादित होता है। शेष भाग आंतरिक खारे पानी की झीलों से

-  नमक का खनिज 'हेलाइट' है। नमक का रासायनिक नाम सोडियम क्लोराइड (Nacl) है।

- देश में सर्वाधिक नमक गुजरात, राजस्थान, तमिलनाडु से प्राप्त होता है।

- सैंधा नमक भारत में हिमाचल प्रदेश के मण्डी जिलें की द्रांग व गूया खान

इल्मैनाइट :-

 इल्मैनाइट अयस्क से टाइटेनियम तथा टिटौनियम डाइऑक्साइड प्राप्त की जाती है।

- यह आग्नेय, कायान्तरित शैलो एवं समुद्रतटीय बालू मिट्टी से प्राप्त की जाती है।

- टाइटेनियम सफेद रंग की हल्की धातु है जो दृढ़, कठोर और घिसावट की प्रतिरोधी होती है। इसका सबसे अधिक उपयोग लैंपों में किया जाता है।

उत्पादक क्षेत्र :-

 महाराष्ट्र, केरल, ओडिशा, तमिलनाडु, आन्ध्रप्रदेश बिहार व पश्चिमी बंगाल उत्पादक राज्य है।

बैराइट:-

 यह खनिज बेरियम सल्फेट का मिश्रण है जिसमें लगभग 66% बेरियम ऑक्साइड होता है। यह भारी और सफेद रंग या रंगहीन रंग का होता है। इससे बेरियम धातु प्राप्त की जाती है।

उत्पादक क्षेत्र:-

 मंगोपट भंडार आंध्रप्रदेश के कड़प्पा जिले में स्थित है जो विश्व में बैराइट का एकमात्र सर्वाधिक बड़ा भण्डार है।

- आंध्रप्रदेश देश में अकेले 90% से अधिक बैराइट्स का उत्पादन करता है।

- अन्य उत्पादक राज्य राजस्थान, पश्चिम बंगाल, मध्यप्रदेश, तमिलनाडु, हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र आदि है।

मैग्नेसाइट:-

 यह एक रिफेक्टरी (उष्मासंघ) खनिज है, इसका उपयोग रिफेक्टरी ईंटों के निर्माण में किया जाता है। मैग्नेसाइट मैग्नीशियम का कार्बोनेट है, इसी से मैग्नीशियम प्राप्त होता है।

उत्पादक क्षेत्र :-

 भारत में मैग्नेसाइट का विशाल भण्डार है।

 1. उत्तराखंड (59%)

 2. तमिलनाडु (25%)

 3. राजस्थान (14%)

सिलीमैनाइट:-

 सिलीमैनाइट एल्यूमिनो सिलिकेट है। यह भी एक रिफेक्टरी खनिज है तथा यह एक प्रकार का एल्युमिनियम का सिलिकेट है।

- यह शिष्ट और नाइसा चट्टानों से प्राप्त किया जाता है।

- सिलीमैनाइट का उपयोग तापरोधी ईंटों के निर्माण में किया जाता है।

उत्पादक क्षेत्र :-

 मेघालय की खासी पहाड़ियों में सोना पहाड़ से सिलीमैनाइट प्राप्त किया जाता है।

- मध्य प्रदेश के रीवा एवं सिद्धि जिले तथा केरल के समुद्री बालू में यह प्रमुख रूप से मिलता है।

 अन्य राज्य महाराष्ट्र, केरल, ओडिशा, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश आदि हैं।

यूरेनियम :-

 यूरेनियम एक मुख्य आण्विक खनिज है। भारत में यूरेनियम की खानें निम्न हैं-

- यू रेनियम की जादूगुड़ा की खान (झारखंड) भारत की यूरेनियम की पहली खान है।

उत्पादक क्षेत्र :-

- झारखंड – तुरूमडीह, भाटीन, नरवापहाड़,

- आन्ध्र प्रदेश – तुमलापल्ली, कड़प्पा,

- तेलंगाना – लाम्बापुर खान

ग्रेफाइड :-

 यह अणुशक्ति में मंदक व भारी मशीनों में स्नेहक के रूप में प्रयुक्त होता है।

- ग्रेफाइट को ‘Black head’ या ‘mineral carbon’ भी कहा जाता है।

- देश में ग्रेफाइट सर्वाधिक कुल भंडार अरुणाचल प्रदेश जम्मू कश्मीर, ओडिशा व झारखंड है।

थोरियम :-  

 भारत में दक्षिणी व पूर्वी तटीय क्षेत्रों में मोनाजाइट रेत के रूप में थोरियम के प्रचुर भंडार है। थोरियम एक आण्विक खनिज है।

- विश्व में सर्वाधिक थोरियम भंडार भारत में पाए जाते हैं। ब्राजील द्वितीय स्थान पर है।

- भारत में थोरियम के भंडार आन्ध्र प्रदेश, केरल, तमिलनाडु, ओडिशा व प. बंगाल में है।

ईंधन खनिज

कोयला :-

 परम्परागत ऊर्जा स्त्रोतों में सबसे प्रथम और सर्वाधिक उपयोग में लाया जाने वाला संसाधन कोयला है।

- कोयला भूमि की परतों में दबी हुई वनस्पति का रूप है। आज से लगभग 25 करोड़ वर्ष पूर्व गोंडवाना लैण्ड पर कार्बोनिफेरस युग में वनस्पति का विशाल और व्यापक आवरण छाया हुआ था।

- पृथ्वी की आन्तरिक हलचलों के कारण अधिकांश विस्तृत वनस्पति भूमि के अन्दर परतों के रूप में समा गई।

- पृथ्वी की ऊपरी परतों के दबाव, गर्मी और गतिक कायान्तरण से वनस्पति लाखों वर्षों में कोयले के रूप में परिवर्तित हो गई।

- गोंडवाना युग का कोयला अब हमारे प्रायद्वीपीय भारत में कई स्थानों पर पेटियों के रूप में पाया जाता है। यह कोयला अवसादी चट्‌टानों के बीच परतों के रूप में पाया जाता है।

- कार्बोनीफेरस युग के बाद कोयले का निर्माण जुरासिक युग, क्रिटेशियस युग तथा टर्शियरी युग में भी हुआ।

- भारत कोयला उत्पादन में वर्ष 2017-18 में 675.40 मिलियन टन व लिग्नाइट 46.26 मिलियन टन हुआ।

- कोयला उत्पादन में भारत विश्व में दूसरा स्थान रखता है।

- भारतीय भूगर्भ सर्वेक्षण (GSI) के अनुसार भारत में 1200 मीटर की गहराई तक सुरक्षित कोयले का भण्डार 285870 मिलियन टन (285.87 अरब टन) था इसमें से कोकिंग कोयला (33.47 अरब टन) तथा नान कोकिंग कोल 252.40 अरब टन था।

कोयले के प्रकार :-

 कार्बन की मात्रा, जल तथा वाष्प की मात्रा के आधार पर कोयला के चार प्रकार है-

प्रकार

कार्बन की मात्रा

क्षेत्र

एन्थ्रेसाइट

(चमकीला कोयला)

80%-95%

रियासी (जम्मू कश्मीर)

बिटुमिनस (चमकीला कोयला)

60%-80%

झरिया, बोकारो (झारखंड), तलचर(ओडिशा), रानीगंज, डाल्टनगंज(प. बंगाल)

लिग्नाइट (भूरा कोयला)

40%-60%

ओर्काट(तमिलनाडु), पलाना, गिरल, रानेरी(राजस्थान), दार्जिलिंग(प. बंगाल), लखीमपुर(असम)

पीट(जैविक कोयला)

40%से कम

ब्रह्मपुत्र नदी घाटी

भारत के कोयला भण्डार :-

- भारत के कोयला भण्डार मुख्यत: आन्ध्र प्रदेश, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, ओडिशा, महाराष्ट्र, प. बंगाल में पाए जाते है।

- इसके अतिरिक्त कोयला अरुणाचल प्रदेश, असम, मेघालय, नागालैण्ड, उत्तर प्रदेश आदि राज्यों में भी पाया जाता है।

- भारत में 98% कोयला गोंडवाना चट्‌टानों में तथा शेष तृतीय महाकल्प की चट्‌टानों में पाया जाता है।

भारत में कोयले का वितरण:-

 

1. गोंडवाना कोयला क्षेत्र:-

 गोंडवाना क्षेत्र का अधिकांश कोयला दामोदर, सोन, महानदी, गोदावरी, वर्धा आदि नदी घाटियों के बेसिनों में पाया जाता है। सतपुड़ा एवं पूर्वी हिमालय के पर्वतीय क्षेत्रों में भी कोयला प्राप्त होता है।

- उत्तम प्रकार का कोयला पश्चिम बंगाल, झारखण्ड, बिहार, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश एवं ओडिशा राज्यों में मिलता है।

 हमारे देश में कोयला निम्न क्षेत्रों से पाया जाता है।

दामोदर घाटी कोयला क्षेत्र:-

- दामोदर घाटी का कोयला क्षेत्र झारखण्ड और पश्चिम बंगाल राज्यों में फैला हुआ है।

- यहाँ गोंडवाना प्रदेश का 70% कोयला उत्पन्न होता है।

- दामोदर घाटी के प्रमुख कोयला क्षेत्र/खदानें

 1. प. बंगाल – रानीगंज

 2. झारखण्ड – झरिया, बोकारो, गिरिडीह, कर्णपुरा

- 1774 ई. में रानीगंज में ही भारत का सर्वप्रथम कोयला उत्पादन प्रारम्भ हुआ।

सोना घाटी क्षेत्र:-

 यह क्षेत्र मध्य प्रदेश में फैला है। यह राहडोल और सिंधी जिलों में विस्तृत है।

प्रमुख क्षेत्र:-

 मध्य प्रदेश – उमरिया, सोहागपुर, सिंगरौली

 छत्तीसगढ़ – ताता-पानी, राम कोला

 झारखण्ड – औरंगाबाद, हटारा, डाल्टनगंज

वर्धा घाटी कोयला क्षेत्र:-

- महाराष्ट्र राज्य में वर्धा नदी घाटी में इसका विस्तार है।

- यहाँ से भारत के कुल कोयला भण्डार का 3% कोयले का उत्पादन होता है।

- इसके प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों में बल्लारपुर, चन्द्रपुर, जिले में घुंघरू, बटोरा स्थानों के क्षेत्र आते हैं।

सतपुड़ा कोयला क्षेत्र:-

 इस क्षेत्र का विस्तार मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र दोनों राज्यों के समीपवर्ती क्षेत्रों में पाया जाता है।

- नरसिंहपुर जिले में महपानी क्षेत्र, छिन्दबाड़ा, जिलें में कान्हम तथा पेंच घाटी क्षेत्र, बेतूल जिले के पाथर खेड़ा क्षेत्र में कोयले का उत्खनन किया जाता है।

महानदी घाटी कोयला क्षेत्र:-

- महानदी घाटी क्षेत्र मध्य प्रदेश के कोरबा, सोनहटी चिरमिरी, विश्रामपुर, रामगढ़, लखनपुर आदि तथा

- ओडिशा का तलचर व सम्भलपुर की खदानें स्थित है।

गोदावरी घाटी कोयला क्षेत्र:-

 यह क्षेत्र आन्ध्र प्रदेश और महाराष्ट्र में फैला हुआ है। आन्ध्र प्रदेश खदानें सिंगरैनी की है।

- महाराष्ट्र की खानों में चन्द्रपुर, बरोरा, यवतमाला, बल्लारपुर चांदा आदि की खानें प्रमुख हैं।

पूर्वी हिमालय क्षेत्र:-

 पश्चिम बंगाल और भूटान की सीमाओं के समीप दार्जिलिंग क्षेत्र में गोंडवाना काल का कोयला पाया जाता है। जो कम क्षेत्र और कम मात्रा में ही पाया जाता है।

टर्शियरी युग या तृतीय महाकल्प के कोयला क्षेत्र:-

 यह भूरा कोयला या लिग्नाइट कोयला भी कहलाता है।

- टर्शियरी युग के कोयले के भण्डार भारत में लगभग 38,756 करोड़ टन पाए जाते हैं।

- यह सम्पूर्ण कोयला भारत के कुल भण्डार का 2% है। इसका अधिकतम भण्डार और उत्पादन राजस्थान को छोड़कर दक्षिणी भारत में ही पाया जाता है।

प्रमुख उत्पादक क्षेत्र:-

1. असम – माकूम, डीसाई, जाजी, नाजीरा

2. जम्मू कश्मीर- कालाकोट, महोकाला, चटक, मेटका

3. तमिलनाडु- बेल्लोर, तिरूवल्लोर, नवेली

4. राजस्थान- बीकानेर, बाड़मेर, नागौर

5. मेघालय – बायोयोग, बलजिंग, दोगरिंग, नरीगाँव

6. गुजरात- कच्छ, भड़ौच

7. केरल – अलारपुजा, तिरूवनंतपुरम, कोल्लम कोझिकोड़

पेट्रोलियम या खनिज तेल -

- पेट्रोलियम एक महत्त्वपूर्ण ऊर्जा संसाधन या खनिज तेल है। जो हाइड्रोजन, सल्फर, नाइट्रोजन तथा ऑक्सीजन का सम्मिश्रण है। इसकी प्राप्ति अवसादी चट्टानों से होती है।

- खनिज तेल का निर्माण जीवों तथा वनस्पतियों के ऊपर निक्षेपण क्रिया तथा आन्तरिक ताप एवं दबाव के फलस्वरूप लाखों वर्षों में होता है।

- वर्तमान युग में पेट्रोलियम अथवा तेल का महत्त्व सर्वविदित है औद्योगिक मशीनों, कल कारखानों, मोटरकारों, रेल जहाज आदि परिवहन साधनों को चलाने के लिए पेट्रोलियम का प्रयोग व्यापक रूप में होता है।

- भारत में सबसे पहले खनिज तेल असम में 1825 ई. में ब्रह्मपुत्र की घाटी से प्राप्त किया गया।

- 1867 ई. में असम के माकूम नामक स्थान से 300 गैलन तेल निकाला गया।

- 1890 ई. में डिग्बोई में तेल निकाला गया।

- तेल निकालने का व्यापक और व्यवस्थित कार्य सन् 1956 में तेल और प्राकृतिक गैस की ऑफिस की स्थापना  के बाद प्रारंभ हुआ।

- वर्ष 1994 से इसका नाम तेल और प्राकृतिक गैस निगम कर दिया गया है।

 तेल क्षेत्र:-  भारत में 17.2 लाख वर्ग कि. मी. पर तेल क्षेत्र विस्तृत है, जो अवसादी शैलों में पाया जाता है। भारत में 28 अरब टन पेट्रोलियम तथा प्राकृतिक गैस भंडारों का अनुमान है। प्राप्ति योग्य हाइड्रोकार्बन (पेट्रोलियम तथा प्राकृतिक गैस) भंडार की मात्रा 260 करोड़ टन है।

वर्तमान समय में निम्नलिखित क्षेत्रों से तेल प्राप्त हो रहा है-

1.  असम और मेघालय के तेल क्षेत्र

(a) डिग्बोई क्षेत्र

(b) सुरमा घाटी क्षेत्र

(c) बह्मपुत्र घाटी  के नवीन क्षेत्र

2. गुजरात तेल क्षेत्र

(a) खंभात या खनिज तेल क्षेत्र

(b) अंकलेश्वर तेल क्षेत्र

(c) कलोल एवं पादरा तेल क्षेत्र

3. मुम्बई हाई क्षेत्र

4. पंजाब क्षेत्र

5. गंगा की घाटी का तेल क्षेत्र

6. पश्चिम बंगाल में सुंदरवन का तेल क्षेत्र

7. राजस्थान में मंगला, भाग्यम् एवं ऐश्वर्य तेल क्षेत्र

8. नवीन तेल क्षेत्र

खनिज तेल परिशोधन शालाएँ :- भारत में वर्तमान में तेल शोधन के लिए 19 तेल परिशोधनशालाएँ कार्य कर रही है, जिनमें 17 सार्वजनिक क्षेत्र की एक निजी क्षेत्र तथा एक संयुक्त क्षेत्र की है।

- भारत में पहली तेल शोधनशाला सन् 1901 में असम डिग्बोई स्थान पर स्थापित की गई।

- देश की दूसरी महत्त्वपूर्ण तेल शोधन शाला सन् 1954 में तारापुर (मुम्बई) में स्थापित की गई है। इसके बाद सार्वजनिक क्षेत्र में क्रमश: 23 तेल परिशोधन शालाएँ

 

प्राकृतिक गैस- प्राकृतिक गैस का प्रयोग विविध कार्यों में निरंतर बढ़ता जा रहा है। यह रसोई में ईंधन, मोटर गाड़ियों में परिवहन, विद्युत उत्पादन, उद्योगों में चालक शक्ति आदि के रूप में उपयोग में लाई जाती है। गैस तेल के कुओं से प्राप्त होती है।

- स्वतंत्रता प्राप्ति के लगभग 40 वर्षों बाद गैस की खोज में आश्चर्यजनक वृद्धि हुई।

- सन् 1988-89 में कावेरी अपतटीय क्षेत्र, खंभात  की खाड़ी में नंदा, राजस्थान में जैसलमेर जिले में घोटारु स्थान पर, दक्षिण बेसिन, तमिलनाडु, गुजरात, असम ,आंध्रप्रदेश, कच्छ, मुंम्बई अपतटीय  क्षेत्रों , मुंबई हाई आदि में गैस की खोज हुई।

- सन् 2002 में रिलायंस कंपनी ने कृष्णा-गोदावरी अपतटीय बेसिन में देश के सर्वाधिक बड़े गैस की खोज हुई।

- राजस्थान में बाड़मेर – सांचौर बेसिन क्षेत्र में तेल के साथ –साथ गैसें भी प्राप्त हो रही है।

- सन् 2004 में रिलायंस कंपनी ने ओडिशा तट पर 5 खरब घन फुट तथा सन् 2005 में ओ. एन. जी.सी. ने कृष्णा, गोदावरी डेल्टा अपतटीय क्षेत्रों में अलामपुर तट से 12 कि. मी. दूर 14 खरब घन फुट गैस का अनुमान लगाया है।

भारत में प्राकृतिक गैस उत्पादन के प्रमुख क्षेत्र:-

(1) असम- मेघालय क्षेत्र

(2) खंभात की खाड़ी

(3) राभा क्षेत्र (कृष्णा, गोदावरी बेसिन)

(4) मुम्बई हाई

(5) गुजरात क्षेत्र