कृषि
किसी निश्चित क्षेत्र में, एक निश्चित अवधि के अंतर्गत फसलों को ऐसे क्रम में उगाया जाना, जिससे कि भूमि की उर्वरा शक्ति का न्यूनतम हृास हो, फसल चक्र कहलाता है।
फसल चक्र के निर्धारण में यह ध्यान रखा जाता है कि कम गहरी जड़ वाली फसलों के बाद गैर दलहनी फसलें चाहिए। जैसे अरहर के बाद गेहूँ और दलहनी फसल के बाद गैर दलहनी फसल बोना चाहिए। अधिक खाद व कम पानी की आवश्यकता वाली फसलों की खेती करनी चाहिए। फसल चक्र को अपनाने से मृदा की उर्वराशक्ति बनी रहती हैं तथा रोग, कीट एवं खरपतवार के नियंत्रण में सहायता मिलती है। इसके अतिरिक्त सीमित साधनों का अधिकतम उपयोग कर अधिक उत्पादन करना संभव होता है। शस्य प्रतिरूप के आधार पर देश में तीन प्रकार की कृषि पाई जाती है।
भारत में फसलों का वर्गीकरण
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खरीफ |
रबी |
जायद |
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वर्षा काल |
शीतकाल |
ग्रीष्मकाल |
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उष्ण - आर्द्र जलवायु |
शीतोष्ण जलवायु |
शुष्क जलवायु |
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स्यालू |
उनालू |
मतीरे |
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मक्का |
गेहूँ |
सब्जियाँ |
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चावल |
चना |
चारा |
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कपास |
सरसों |
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बाजरा |
इसबगोल |
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सोयाबीन |
अफीम |
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उत्पादन - उद्देश्य के आधार पर
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खाद्यान्न |
तिलहन |
दलहन |
व्यापारिक |
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मक्का |
मूँगफली |
चना |
गन्ना |
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बाजरा |
सरसों |
मूँग |
कपास |
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गेहूँ |
अरण्डी |
उड़द |
चाय |
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चावल |
अलसी |
अरहर |
अफीम |
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रागी |
तिल |
मोठ |
कॉफी |
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होहोबा |
मसूर |
तम्बाकू, मसालें |
रबी की फसल - यह सामान्यतया अक्टूबर - नवम्बर में बो कर अप्रैल - मई तक काट ली जाती है। सिंचाई की सहायता से तैयार होने वाली फसल में मुख्यत: गेहूँ, जौ, चना, मटर, सरसों, राई आदि की कृषि की जाती है।
खरीफ की फसल - यह वर्षा काल की फसल है, जो जून - जुलाई में बुवाई करके सितम्बर - अक्टूबर तक काट ली जाती है। इसके अन्तर्गत चावल, ज्वार, बाजरा, रागी, मक्का, जूट, मूँगफली, कपास, पटसन, तम्बाकू, मूँग, उड़द, लोबिया आदि की कृषि की जाती हैं।
जायद की फसल - यह फसल रबी एवं खरीफ की मध्यवर्ती काल में अर्थात् मार्च में बुवाई करके जून तक काट ली जाती है। इसमें सिंचाई के माध्यम से सब्जियों तरबूज, खरबूज, ककड़ी, खीरा, करेला आदि की कृषि की जाती है। मूँग, उड़द व कुल्थी जैसी दलहनी फसलें भी इस समय उगाई जाती हैं।
आर्द्रता के आधार पर कृषि के प्रकार
तर कृषि - तर कृषि काँप मिट्टी के उन क्षेत्रों में प्रचलित है, जहाँ वर्षा की मात्रा 200 सेमी. से अधिक पाई जाती है। मध्य व पूर्वी हिमालय प्रदेश, प. बंगाल, असम, मेघालय, नागालैण्ड, मणिपुर, त्रिपुरा, मिजोरम तथा पश्चिम समुद्रतटीय मैदान पर इस प्रकार की कृषि का प्रसार है। यहाँ पर वर्ष में एक से अधिक बार भूमि से कृषि उत्पादन प्राप्त किया जाता है। यहाँ बिना सिंचाई के खेती होती है। चावल, जूट इस कृषि की प्रमुख फसलें हैं।
आर्द्र कृषि - यह कृषि काँप तथा काली मिट्टी के उन क्षेत्रों में प्रचलित है जहाँ वर्षा की मात्रा 100 से 200 सेमी. के बीच रहती है। ऐसे क्षेत्र मध्य एवं पूर्वी गंगा का मैदान, ब्रह्मपुत्र की घाटी तथा उत्तरी - पूर्वी पठारी भाग पर विस्तृत है।
- इसमें पूर्वी उत्तरप्रदेश, बिहार, झारखण्ड, छत्तीसगढ़, ओडिशा, प. बंगाल तथा असम राज्यों के भू - भाग शामिल हैं। यहाँ पर वर्ष में दो फसलों के अलावा कभी - कभी जायद फसल भी प्राप्त कर ली जाती है।
शुष्क कृषि - ऐसी भूमि में जहाँ वार्षिक वर्षा 50 सेमी. अथवा इससे कम हो वहाँ बिना किसी सिंचाई साधन के उपयोगी फसलों के आर्थिक उत्पादन को शुष्क कृषि कहते हैं।
- शुष्क कृषि के क्षेत्रों में फसल उत्पादन के लिए भूमि में वर्षा के पानी की अधिक से अधिक मात्रा को सुरक्षित रखा जाता है। संक्षेप में कहा जा सकता है कि शुष्क कृषि उत्पादन की वजह सुधरी प्रणाली है जिसमें किसी निश्चित भूमि पर पानी की अधिकतम मात्रा को सुरक्षित रखकर भरपूर उत्पादन किया जाता है।
सिंचित कृषि - इस कृषि का प्रसार काँप, काली व लाल, पीली मिट्टी के उन क्षेत्रों में मिलता है, जहाँ पर वर्षा की मात्रा 50 - 100 सेमी. के बीच रहती है, जो कि कृषि के लिए अपर्याप्त होती है।
- इन भागों में कृषि प्रमुख रूप से सिंचाई पर निर्भर करती है। इसका विस्तार पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तरप्रदेश, उत्तरी व दक्षिणी तमिलनाडु तथा पूर्वी तट पर नदियों के डेल्टा प्रदेशों तक सीमित हैं। यहाँ पर गेहूँ, चावल व गन्ना की खेती की जाती है।
विशिष्ट कृषि - झूमिंग - वह क्षेत्र जहाँ पर आदिवासियों की अधिकता है, जैसे - नागालैण्ड, त्रिपुरा, मणिपुर, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश और पश्चिमी घाट में झूमिंग कृषि की जाती है, जिसे निम्न नामों से जाना जाता हैं-
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क्र. स. |
नाम |
राज्य |
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1. |
वालरा |
गरासिया जनजाति द्वारा दक्षिण राजस्थान में |
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2. |
चिमाता |
भीलों द्वारा पहाड़ी क्षेत्र पर दक्षिण राजस्थान में |
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3. |
दजिया |
भीलों द्वारा मैदानी क्षेत्र पर दक्षिण राजस्थान में |
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4. |
पौंडू |
आंध्र प्रदेश |
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5. |
दीपा / वीवर |
मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ |
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6. |
बींगा / कोमान |
ओडिशा |
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7. |
कुरुवा |
मुण्डा जनजाति द्वारा झारखण्ड में |
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8. |
खिल |
हिमाचल प्रदेश |
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9. |
पाम्लू |
मणिपुर |
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10. |
बोग्मा |
मेघालय |
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11. |
कुमारी |
केरल (पश्चिम घाट) |
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12. |
झूम |
पूर्वोत्तर भारत मे |
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13. |
डाहिया / देपा |
मध्य प्रदेश |
भारत की प्रमुख खाद्यान्न फसलें
- भारत की भौतिक संरचना जलवायुविक एवं मृदा संबंधी विभिन्नताओं के कारण यहाँ अनेक प्रकार के फसलों की कृषि की जाती है। खाद्यान्न का अभिप्राय घास कुल के उन पौधों से है, जिन्हें खाने के लिए उगाया जाता है। इन्हें तीन वर्गों में विभाजित कर सकते हैं।
प्रमुख खाद्यान्न - इसके अन्तर्गत मक्का, धान एवं जौ को सम्मिलित किया जाता है।
मोटे अनाज - इसके अन्तर्गत मक्का, ज्वार, बाजरा तथा महुआ आते हैं।
लघु खाद्यान्न - इसके अन्तर्गत महुआ या रागी, कोदो, सांवा, काकुन, चना तथा कटुकी को शामिल किया जाता है।
चावल - यह ग्रेमिनी कुल की एक उष्णकटिबंधीय फसल है एवं भारत की मानसूनी जलवायु में इसकी अच्छी कृषि की जाती है। चावल हमारे देश की सबसे प्रमुख खाद्यान्न फसल है। गर्म एवं आर्द्र जलवायु हेतु उपर्युक्त होने के कारण इसे खरीफ की फसल के रूप में उगाया जाता है। देश में सकल बोयी गई भूमि के 23% क्षेत्र में एवं खाद्यान्नों के अन्तर्गत आने वाले कुल क्षेत्र में 47% भाग पर चावल की कृषि की जाती है। विश्व में चावल के अंतर्गत आने वाले सर्वाधिक क्षेत्र (28%) भारत में हैं, जबकि उत्पादन में इसका चीन के बाद दूसरा स्थान है। कृष्णा - गोदावरी डेल्टा क्षेत्र को भारत के चावल के कटोरे के नाम से जाना जाता है। चावल के लिए आवश्यक भौगोलिक दशाएँ निम्नलिखित हैं -
- चिकनी उपजाऊ मिट्टी, गर्म जलवायु
- 75 सेमी. से 200 सेमी. तक वर्षा
- प्रारंभ में तापमान 20°C तथा बाद में 27°C
- भारत में चावल की तीन फसलें होती हैं, जो मुख्यत: पश्चिम बंगाल में वर्षभर बोयी जाती है।
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किस्म |
ऋतु |
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अमन |
शीतकालीन |
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ओस |
शरदकालीन |
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बोरा |
ग्रीष्मकालीन |
- भारत की प्रमुख फसलें -
- खरीफ में सर्वाधिक उत्पादन - चावल
- चावल भारत में वर्ष भर बोयी जाने वाली फसल है।
- वर्ष भर सर्वाधिक उत्पादन की जाने वाली फसल चावल है।
- रबी - गेहूँ
- अनाज - चावल
- दलहन - चना
- तिलहन - मूँगफली
- व्यापारिक फसल - चाय
चावल - उष्ण - आर्द्र जलवायु की फसल है।
सर्वाधिक उत्पादन -
(1) प. बंगाल
(2) उत्तर प्रदेश
(3) पंजाब - उत्पादकता में पंजाब का प्रथम स्थान है।
- चावल उत्पादन में चीन के बाद भारत का दूसरा स्थान है, लेकिन निर्यात में भारत प्रथम स्थान पर है।
- प. बंगाल में चावल वर्ष भर बोया जाता है।
- ग्रीष्म काल - बोरा
- शीतकाल - औंस
- वर्षा काल - अमन
पद्मा, जमुना, जगन्नाथ, गोदावरी - चावल की अन्य किस्में हैं।
- छत्तीसगढ़ को चावल का कटोरा कहा जाता है।
- थंजाबुर (तमिलनाडु)- दक्षिण भारत का चावल का कटोरा (कावेरी डेल्टा)
विश्व में सर्वाधिक कृषि क्षेत्र :- (प्रतिशत के आधार पर)
(1) भारत - 51 %
(2) USA - 20 %
(3) चीन - 11 %
(4) कनाडा - 5 %
- देश में सबसे अधिक अमन का उत्पादन होता है, जो जून से अगस्त तक बोकर नवम्बर से जनवरी तक काट ली जाती है। यहाँ विभिन्न राज्यों में उगाई जाने वाली चावल की कुछ विशेष किस्में इस प्रकार हैं - साम्बा, कुर्रुवई, कामिनी, कालाजीय गोंविद भोग (पश्चिम बंगाल), जरीसाल (गुजरात), बासमती (छत्तीसगढ़), वैज्ञानिकों ने जीन परिवर्तन (आनुवांशिक परिवर्तन) करके विटामिन A की कमी को दूर करने वाले चावल का विकास किया है। इस चावल का नाम गोल्डन राइस रखा गया है। गोल्डन राइस में पर्याप्त मात्रा में बीटा - कैरोसीन पाया जाता है। देश में चावल का प्रति हेक्टेयर उत्पादन अभी भी विकसित देशों की तुलना में बहुत कम है, जबकि जापान में 6240 किग्रा. प्रति हेक्टेयर चावल का उत्पादन किया जाता है। उत्पादन की दृष्टि से पश्चिम बंगाल 13.26% पंजाब 11.85% तथा उत्तर प्रदेश 11.75% का क्रमश: प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय स्थान है।
- एग्रो उद्योग द्वारा वर्ष 2018 - 19 में चावल उत्पादन का लक्ष्य 113 मिलियन टन था। जो कि 2017 - 18 में 112.9 मिलियन टन उत्पादन हुआ था, जबकि भारत का कुल खद्यान्न उत्पादन लक्ष्य 2018 - 19 में 285.2 मिलियन टन था जबकि उत्पादन 2017 - 18 में 248.8 मिलियन टन था।
गेहूँ - यह ग्रेमिनी कुल का पौधा है। विश्व में गेहूँ उत्पादन में चीन के बाद भारत का दूसरा स्थान है। चावल के बाद यह देश की दूसरी महत्त्वपूर्ण खाद्यान्न फसल है। देश की कुल कृषि योग्य भूमि के लगभग 10% एवं कुल बोए गए क्षेत्र के 13% भाग पर गेहूँ की कृषि की जाती है। चावल की अपेक्षा इसका प्रति हेक्टेयर उत्पादन अधिक है। इसकी अधिकांश कृषि सिंचाई के सहारे की जाती है। भारत में विश्व के लगभग 12.5% गेहूँ का उत्पादन होता है। हरित क्रांति के पश्चात गेहूँ में उच्च उत्पादकता एवं उत्पादन प्राप्त किया गया है। गेहूँ के लिए आवश्यक भौगोलिक दशाएँ निम्न हैं-
- जलोढ़ मृदा
- 50 सेमी. से 75 सेमी. तक वर्षा
- आरंभ से तापमान 10°C से 15°C तथा बाद में 20°C से 25°C हैं।
- गेहूँ में सामान्यत: प्रोटीन 8 - 15% कार्बोहाइड्रेट, 65 - 70%, वसा - 1.5% तथा खनिज 2.0% पाए जाते हैं।
- गेहूँ में ग्लूटिन नामक प्रोटीन अधिक मात्रा में पाई जाती है। गेहूँ के सबसे प्रमुख उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश (31.98%), मध्य प्रदेश (15.96%) तथा पंजाब (17.90%) है। हरियाणा, राजस्थान व बिहार अन्य प्रमुख उत्पादक राज्य है। उत्पादकता की दृष्टि से प्रथम स्थान पंजाब राज्य का है। गेहूँ की प्रमुख किस्में प्रताप, अर्जुन, जनक, कल्याण, सोना, गिरिजा 335 आदि प्रमुख हैं।
- ICAR द्वारा पूसा बेकर नामक गेहूँ की नई प्रजाति विकसित की गई है। बिस्कुट के लिए विकसित यह किस्म यूरोपीय देशों द्वारा निर्धारित मानक के अनुसार हैं।
जौ - यह भी देश की एक महत्त्वपूर्ण खाद्यान्न फसल है। इसकी गणना मोटे अनाजों में की जाती है। यह सामान्यतया शुष्क एवं बलुई मिट्टी में बोया जाता है। हरित एवं नमी सहन करने की क्षमता अधिक होती है। जौ के लिए आवश्यक भौगोलिक दशाएँ निम्न हैं-
- 70 सेमी से 100 सेमी. तक वर्षा
- 15°C से 18°C का तापमान
जलोढ़ मृदा - जौ का सबसे प्रमुख उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश है। राजस्थान, मध्यप्रदेश, हरियाणा एवं हिमाचल प्रदेश अन्य उत्पादक राज्य हैं।,
- जौ की प्रमुख किस्में, हिमानी, ज्योति, कैलाश आदि।
ज्वार - ज्वार भी एक मोटा अनाज है। जिसकी कृषि सामान्य वर्षा वाले क्षेत्रों में बिना सिंचाई की जाती है। इसके लिए उपजाऊ जलोढ़ अथवा चिकनी मिट्टी काफी उपर्युक्त होती है। इसकी वृद्धि के लिए तापमान 25°C से 30°C के बीच होना चाहिए। देश में ज्वार का तीन - चौथाई से अधिक क्षेत्र मात्र तीन राज्यों महाराष्ट्र, कर्नाटक और तमिलनाडु में विस्तृत है। देश का लगभग 80% ज्वार का उत्पादन भी इन्हीं तीनों राज्यों में होता है। इसका बड़ा उत्पादक भी इन्हीं तीन राज्यों में होता है। इसका सबसे बड़ा राज्य महाराष्ट्र है। इसके बाद कर्नाटक एवं तमिलनाडु का स्थान आता है।
प्रमुख किस्में - CSV - 1, CSV - 7, CSH - 1, CSH - 8 आदि हैं।
बाजरा - बाजरे की गणना भी मोटे अनाजों में की जाती है। यह वास्तव में शुष्क दशाओं में पैदा किया जाता है। बाजरा के लिए आवश्यक भौगोलिक दशाएँ निम्नवत् हैं -
- बलुई मिट्टी
- 50 सेमी. से 70 सेमी. तक वर्षा
- तापमान 20°C से 30°C के बीच होना चाहिए।
- राजस्थान, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, गुजरात, हरियाणा में बाजरे की खेती बड़े पैमाने पर की जाती हैं।
प्रमुख किस्में - बावापुरी, मोती, HB - 3, HB - 4, T - 55, C01 आदि हैं।
मक्का - मक्के की उत्पत्ति पॉपकार्न से हुई है। यह एक उभयलिंगी पौधों में से हैं। हमारे देश के अपेक्षाकृत शुष्क भागों में मक्के लिए आवश्यक भौगोलिक दशाएँ, गर्मी का लंबा मौसम, साफ आकाश तथा अच्छी वर्षा 25°C से 30°C तापमान, 50 सेमी. से 80 सेमी. तक वर्षा, नाइट्रोजन युक्त गहरी दोमट मिट्टी है। अन्य धान्य फसलों की अपेक्षा इसमें स्टार्च की मात्रा सबसे अधिक पाई जाती है। देश में मक्के का सर्वाधिक उत्पादन कर्नाटक में होता है। इसके बाद महाराष्ट्र व मध्य प्रदेश का स्थान आता है। मक्के के उत्पादन में भारत का विश्व में 7 वाँ स्थान है। मक्के के उत्पादन में भारत का विश्व में 7 वाँ स्थान है। मक्के की प्रमुख किस्में - गंगा, गंगा 101, विजय, जवाहर, विक्रम रतन आदि।
कपास - भारत, कपास के पौधों का मूल स्थान है। यह एक उष्ण कटिबंधीय फसल है जो देश के अर्द्ध शुष्क भागों में खरीफ ऋतु में बोई जाती है।
- भारत में कपास की खेती 60 से 85 सेमी औसत वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्रों तक सीमित है। कम वर्षा वाले क्षेत्र यथा, पंजाब में यह एक सिंचित फसल है। परम्परागत रूप से कपास की खेती दक्कन के सिंचित फसल है। परम्परागत रूप से कपास की खेती दक्कन के लावा पठार पर की जाती है। यही कारण है कि यहाँ पाई जाने वाली मृदा को काली कपासी मृदा भी कहा जाता है।
- उच्च तापमान, हल्की वर्षा, पाला रहित मौसम एवं चमकीली धूप कपास की कृषि हेतु अनुकूल दशाएँ हैं। कपास पर फूल आने के समय आकाश का बादल रहित होना आवश्यक है।
- कपास के उत्पादन में भारत का चीन के बाद विश्व में दूसरा स्थान है। देश के बोए गए क्षेत्र के लगभग 4.86% भाग पर कपास की खेती की जाती है।
- कपास के तीन प्रमुख उत्पादक क्षेत्र हैं-
1. उत्तर - पश्चिम भारत में पंजाब, हरियाणा एवं उत्तरी राजस्थान
2. पश्चिम भारत में गुजरात तथा महाराष्ट्र
3. दक्षिण भारत में आंध्र प्रदेश, कर्नाटक एवं तमिलनाडु
- भारत में कपास उत्पादन में गुजरात (36.22%) का स्थान प्रथम है, दूसरे एवं तीसरे स्थान पर क्रमश: महाराष्ट्र (18.76%) एवं तेलंगाना (13.63%) है। चौथे, पाँचवें व छठें स्थान पर क्रमश: हरियाणा, मध्य प्रदेश एवं पंजाब हैं।
- भारत में छोटे रेशे वाले एवं लम्बे रेशे वाले दोनों प्रकार के कपास का उत्पादन होता है। अमेरिकन कपास को देश के उत्तर पश्चिमी भाग में 'नरमा' कहा जाता है।
जूट - जूट भारत की प्रमुख नगदी फसल है।
- उच्च तापमान 20°C - 30°C, भारी वर्षा 125 सेमी. - 200 सेमी.
- निम्न समतल भूमि जूट की कृषि हेतु अनुकूल भौगोलिक दशाएँ हैं।
- भारत विश्व में जूट का सबसे बड़ा (विश्व का 75%) उत्पादक देश है।
- स्वतंत्रता से पूर्व जूट एवं जूट के सामानों पर भारत का विश्व में एकाधिकार था, लेकिन विभाजन के दौरान 80% जूट उत्पादक क्षेत्र पूर्वी पाकिस्तान में चले गए। इससे भारतीय जूट मिलों को कच्चे माल की कमी हो गई। बाद में जूट खेती को भारत में प्रोत्साहित किया गया जिससे इसके उत्पादन में वृद्धि हुई।
- भारत में जूट के उत्पादन में पश्चिम बंगाल (76%), बिहार (14.7%), असम (7%) है। ओडिशा के महानदी के डेल्टाई क्षेत्र में भी इसकी खेती की जाती है। 'मेस्टा' जूट की एक किस्म है।
रबड़ - रबड़ का जन्मस्थान ब्राजील है। यह उष्ण कटिबंधीय पौधा है। रबड़ वृक्ष के दूध से रबड़ प्राप्त होता है। वर्ष 1902 में केरल में पेरियार नदी के किनारे इनके वृक्ष लगाए गए। इसकी उत्तम कृषि के लिए 25°C से 32°C का उच्च तापमान अत्यधिक वर्षा, लाल, लैटेराइट, चिकनी एवं दोमट मिट्टी तथा अधिक मानव श्रम की आवश्यकता होती है। दक्षिण के कूल उत्पादन का लगभग 1.7% प्राकृतिक रबड़ प्राप्त किया जाता है। रबड़ की प्रति हेक्टेयर उपज की दृष्टि से भारत विश्व के अग्रणी देशों में से एक है। इसके प्रमुख उत्पादक राज्य केरल, तमिलनाडु तथा कर्नाटक हैं। अंडमान निकोबार द्वीप समूह में भी रबड़ का उत्पादन किया जाता है।
मसाले - भारत विश्व में मसालों का सबसे बड़ा उत्पादक, उपभोक्ता एवं निर्यातक है। यहाँ उष्ण कटिबंधीय काली मिर्च से लेकर शीतोष्ण कटिबंधीय केसर तक की खेती की जाती है। भारत में मसाले की खेती मुख्यत: केरल तथा कर्नाटक के मालाबार तट पर की जाती है।
- भारतीय मसाला शोध संस्थान कोझिकोड (केरल) में है।
- काली मिर्च के उत्पादन के केरल का प्रथम स्थान (76%) है।
- लाल मिर्च के उत्पादन में आंध्र प्रदेश का प्रथम स्थान (लगभग 40%) है।
- हल्दी के उत्पादन में तमिलनाडु का प्रथम स्थान (लगभग 29%) है।
- इलायची के वृक्ष के लिए 14°C - 32°C का तापमान एवं 150 सेमी. - 600 सेमी. वार्षिक वर्षा उपर्युक्त है।
चाय - वर्तमान समय में यह भारत की प्रमुख पेय फसल है। इसकी भौगोलिक दशाएँ 150 - 250 सेमी. वार्षिक वर्षा, 24° से - 30° से का उच्च तापमान, हरी एवं मथक युक्त मिट्टी आदि है। यह एक श्रम प्रधान कृषि है एवं इसमें पत्तियों की चुनाई के लिए सस्ते श्रम की आवश्यकता होती है। जल प्रिय पौधे के बावजूद इसकी जड़ों में पानी नहीं लगना चाहिए। इसी कारण इसकी खेती पहाड़ी ढालों पर की जाती है। ठण्डी हवा व पाला चाय की कृषि के लिए हानिकारक है। देश में चाय उत्पादन में असम का प्रथम स्थान है। यहाँ ब्रह्मपुत्र नदी की घाटी व सुरमा नदी की घाटी में चाय की उन्नत कृषि की जाती है। असम में देश के कुल चाय उत्पादन का 50% भाग प्राप्त होता है। दक्षिण भारत में तमिलनाडु सर्वाधिक चाय उत्पादन करने वाला राज्य है। केरल, कर्नाटक तथा महाराष्ट्र के पर्वतीय ढालों पर भी चाय की कृषि की जाती है। भारत विश्व में काली चाय का सबसे बड़ा उत्पादक और उपभोक्ता देश है। भारत चाय के वैश्विक उत्पादन का 27% भाग उत्पादित करता है तथा चाय के विश्व व्यापार में इसका हिस्सा 9% है। विश्व में चाय उत्पादन में भारत का चीन के बाद दूसरा स्थान है। वर्ष 2013 को अंतर्राष्ट्रीय चाय उत्पादक मंच का गठन किया गया है। इसमें भारत के अतिरिक्त केन्या, श्रीलंका, इंडोनेशिया, खाण्डा, मलावी, ईरान तथा चीन शामिल हैं। इसका मुख्यालय कोलम्बो है।
चाय - चीन का मूल पौधा है। - (टियानसेन पर्वत)
- बौद्ध धर्म का पवित्र पेय पदार्थ है।
- भारत में चाय का व्यावसायिक उत्पादन 1834-35ई. में असमें में शुरू किया गया।
- भौगोलिक स्थिति -
(1) सूर्य की तिरछी / सुनहरी किरणें
(2) ढालू भूमि
(3) लैटेराइट मृदा

कहवा - विश्व के कुल कहवा उत्पादन का मात्र 4% उत्पादन भारत में किया गया है। किन्तु इसका स्वाद उत्तम होने के कारण इसकी मांग विदेशों में अधिक रहती है। कहवा उत्पादन की अनुकूल भौगोलिक दशाएँ 15° - 18° से औसत वार्षिक तापमान तथा 150 - 250 सेमी. की औसत वार्षिक वर्षा है। पर्वतीय तथा दोमट अथवा लावा निर्मित मिट्टी इसके लिए उपर्युक्त होती है। हमारे देश में दो प्रकार के कहवा की कृषि की जाती है। अरेबिका कॉफी व रोबस्टा कॉफी। अरेबिका कहवा देश के कहवा के अंतर्गत आने वाले कुल क्षेत्रफल के 60% भाग पर कर्नाटक, केरल तथा तमिलनाडु राज्यों में बोया जाता है, जबकि शेष भूमि पर रोबस्टा कहवा की कृषि की जाती है। कहवा की खेती दक्षिण भारत के पर्वतीय ढालों तक ही सीमित हैं।
गन्ना = गन्ना उत्पादन में प्रथम स्थान उत्तर प्रदेश का है। लेकिन उत्तम किस्म का गन्ना महाराष्ट्र में उत्पादित किया जाता है। गन्ना उत्पादन में भारत का ब्राजील के बाद में दूसरा स्थान है, जबकि खपत और कृषि क्षेत्र की दृष्टि से भारत का विश्व में प्रथम स्थान है। यहाँ विश्व का 40 प्रतिशत गन्ना उत्पादित किया जाता है। गन्ने की फसल तैयार होने में लगभग 1 वर्ष का समय लगता है। उष्ण कटिबंधीय तथा उपोष्ण कटिबंधीय फसल होने के कारण इसके लिए 20° से 27° से. का औसत वार्षिक तापमान तथा 100 - 200 सेमी. की औसत वार्षिक वर्षा उपर्युक्त होती है। गन्ने की फसल तैयार होते समय वर्षा अभाव काफी लाभदायक होता है। क्योंकि इससे शर्करा की मात्रा में वृद्धि होती है। उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु देश के प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्य हैं। उत्तर प्रदेश अकेले ही देश के लगभग 45 प्रतिशत गन्ने का उत्पादन करते हैं।

- चीनी के उत्पादन में महाराष्ट्र का प्रथम स्थान है।
- "चीनी का कटोरा" = उत्तर प्रदेश
- मसाले - केरल - केरल को कोच्चि बन्दरगाह / अरब सागर की रानी (Queen of Arabian sea) - मसाला - - - बन्दरगाह (spice port of india)
- प्याज - नासिक (महाराष्ट्र)
- तम्बाकू - आंध्र प्रदेश (गुंटूर प्रसिद्ध) - तम्बाकू अनुसंधान केन्द्र
- (Central Drug Research Institute = luck noW 'UP')
- चावल अनुसंधान केन्द्र = कटक (ओडिशा)
- गन्ना अनुसंधान केन्द्र = कानपुर (UP)
- आलू अनुसंधान केन्द्र = शिमला (HP)
- ईसबगोल - राजस्थान
- ज्वार (गरीब की रोटी) - 1. महाराष्ट्र 2. गुजरात
- नारियल - 1. मध्य प्रदेश 2. राजस्थान 3. उत्तर प्रदेश - सूखे-मेवे - जम्मू-कश्मीर
- मूँग दाल - 1. महाराष्ट्र - मसाले - केरल
- मोठ दाल - 1. राजस्थान - अनाज - उत्तर प्रदेश
- संतरा - नागपुर (महाराष्ट्र) - दलहन - मध्य प्रदेश
- सेव - 1. हिमाचल प्रदेश 2. J&K - तिलहन - राजस्थान
तिलहन - हमारे देश में तिलहनी फसलों की कृषि प्राय: अनुपजाऊ मिट्टी एवं वर्षा की कमी वाले क्षेत्रों में ही की जा रही है। रबी एवं खरीफ दोनों समयों में तिलहनों की कृषि की जाती है। सरसों रबी की प्रमुख फसल है, जबकि मूँगफली की कृषि खरीफ के समय की जाती है। तिलहनों के उत्पादन में मध्य प्रदेश अग्रणी राज्य हैं। सरसों, मूँगफली, सूर्यमुखी, सोयाबीन व नारियल तेल के उत्पादन में क्रमश: राजस्थान, गुजरात, कर्नाटक, मध्यप्रदेश एवं तमिलनाडु भारत में प्रथम स्थान रखते हैं।
- भारत एक कृषि प्रधान देश है, जिसकी 54.6% जनसंख्या कृषि पर निर्भर करती है, परन्तु कृषि का GDP में योगदान बहुत कम है।
- GVA (सकल मूल्य संवर्धन) में यह क्षेत्र 17% का योगदान रखता है।
- भारत का कुल क्षेत्रफल 328.7 मिलियन हेक्टेयर Net sown area शुद्ध बोया गया क्षेत्र = 141.4 mi. Hec.
Total Gross Crop Area सकल फसलकृत क्षेत्र = 208.9 mi. Hec.
- भारत का शुद्ध बोया गया क्षेत्र कुल क्षेत्रफल का 43% है।
- फसल गहनता =
- भारत की फसल गहनता = 142%
- Net irrigated area शुद्ध सिंचित क्षेत्र – 68.2 mi.Hec. यह शुद्ध बोए गए क्षेत्र का 48.23% है।
अत: लगभग 52% (51.77%) NSA वर्षा पर निर्भर करता है।
सिंचाई के साधन:- क्षेत्रफल प्रतिशत
कुआँ, नलकूप – 64% UP G.J.
नहर – 26% UP J&K
तालाब – 3% आंध्र प्रदेश T.N.
अन्य – 7%
निर्वाह कृषि :-
इस कृषि का उद्देश्य मुनाफा कमाना नहीं होकर परिवार का भरण – पोषण करना होने से इसमें कम तकनीकों के साथ घरेलू श्रम का अधिक उपयोग किया जाता है। इस प्रकार की कृषि विकासशील देशों में होती है। इस कृषि के 2 प्रमुख प्रकार हैं -
A) गहन निर्वहन कृषि:- यह कृषि अधिक जनसंख्या – घनत्व वाले क्षेत्रों में बोई जाती है। कृषि जोतों का आकार छोटा होता है। कम तकनीक व घरेलू श्रम से उपयोग /उत्पादित की जाती है। 1 वर्ष में 1 से अधिक फसलें, गेहूँ, चावल, मक्का आदि प्रमुख फसल हैं।
ex.- दक्षिणी एशिया, द.पू. व पूर्वी एशिया।
B) आदिम निर्वाह कृषि:- यह कृषि जनजातीय लोगों द्वारा परम्परागत तरीकों से की जाती है। यह कृषि 2 प्रकार की होती हैं।
स्थानान्तरण कृषि:- यह कृषि उन क्षेत्रों में की जाती है जहाँ वर्षा अधिक होती है तथा वनस्पति की पुर्न विकास क्षमता भी अधिक होती है।
इस कृषि के अंतर्गत वनों में कुछ पेड़ों को काटकर जलाया जाता है तथा कृषि भूमि प्राप्त की जाती है। इस प्रकार प्राप्त भूमि पर 3 से 5 वर्षों तक कृषि करने के बाद भूमि की उत्पादकता कम होने के कारण कृषि को अन्य स्थान पर स्थानान्तरित किया जाता है। यह कृषि पर्यावरण के लिए हानिकारक होती है। इसे कर्तन व दहन Slash and bruin agrio भी कहते हैं।
क्षेत्रीय नाम :-
क्षेत्र नाम
राजस्थान वालरा
दजिया – मैदान
चिमाता – पर्वत
उ.पू. भारत झूमिंग
ब्राजील रोका
श्रीलंका चेन्ना
मलेशिया, इण्डोनेशिया लदांग
थाइलैण्ड तुमुरी
चलवासी (Nomadic) :-
यह कृषि शुष्क व अर्द्धशुष्क क्षेत्रों में की जाती है। इसमें पशुपालन किया जाता है। इसमें स्थानीय लोग अपने पशुओं के साथ चारे तथा जल की तलाश में एक स्थान से दूसरे स्थान पर प्रवास करते हैं।
यह कृषि भारत में मुख्यत: पश्चिमी राजस्थान तथा J&K में की जाती है।
अफ्रीका – सहारा मरुस्थल
वाणिज्यिक कृषि:-
इस प्रकार की कृषि में अधिक निवेश के साथ बहुत बड़े भू-भाग पर कृषि की जाती है। इसमें तकनीकों व मशीनों का अधिक उपयोग करके मुनाफा कमाना प्रमुख उद्देश्य होता है।
इसके अंतर्गत बडे स्तर पर उत्पादन किया जाता है। इसके 3 प्रकार हैं।
अनाज कृषि
रोपण कृषि
मिश्रित कृषि
- दालों के उत्पादन में भारत में मध्यप्रदेश का प्रथम स्थान है।
चना - उत्पादन
(1) मध्यप्रदेश
(2) राजस्थान
मटर / मसूर - मध्यप्रदेश
सोयाबीन - सर्वाधिक प्रोटीन पाया जाता है।
- मालवा का पठार सोयाबीन के उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है।
- सर्वाधिक उत्पादन
(1) मध्यप्रदेश
(2) महाराष्ट्र
सरसों -
सर्वाधिक उत्पादन
(1) राजस्थान
(2) पंजाब
मूँगफली -
(1) गुजरात (राजकोट सर्वाधिक मूँगफली उत्पादक क्षेत्र)
(2) राजस्थान
- भारत की प्रमुख फसलें और उनका मूल स्थान
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फसल |
मूल स्थान |
मृदा |
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चावल |
सिन्धु घाटी सभ्यता (भारत) |
जलोढ़ मृदा |
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कपास |
मिश्र (Egypt) |
काली मृदा / रेगूर मृदा |
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गेहूँ |
मध्य एशिया |
दोमट / पुरानी जलोढ़ मृदा |
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सरसों |
मध्य एशिया |
दोमट / पुरानी जलोढ़ मृदा |
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मक्का |
मध्य अमेरिका |
लाल-पीली मृदा |
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चाय नोट :- चाय बौद्ध धर्म का पवित्र पेय पदार्थ है |
टियानसेन पर्वतमाला (चीन) |
लैटेराइट मृदा |
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कॉफी |
इथोपिया / अबीसीनिया |
लैटेराइट मृदा |
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गन्ना |
भारत |
जलोढ़ मृदा |
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रबर |
ब्राजील |
लैटेराइट मृदा |
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तम्बाकू |
अरब |
लाल-पीली मृदा |
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बाजरा |
जिम्बाब्वे (अफ्रीका) |
रेतीली-भूरी मृदा |
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बाजरा - अफ्रीका - जिम्बाबे - सर्वाधिक उत्पादक राज्य (1) राजस्थान (2) गुजरात
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जौ - - सर्वाधिक उत्पादक राज्य (1) महाराष्ट्र (2) गुजरात
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नोट :- भारत विश्व में सर्वाधिक बाजरा उत्पादन करता है। |
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1. उच्च उत्पादक क्षमता वाले बीजों का प्रयोग High Yeilding VarietySeeds (HYV)
2. गहन कृषि प्रणाली का उपयोग
3. सिंचाई साधनों का विस्तार
4. मशीनरी द्वारा खेती
5. रासायनिक खाद, कीटनाशकों का उपयेाग
परिवहन
सड़क परिवहन
- भारत में प्राचीनकाल से सड़क परिवहन (Road Transport) का अधिक महत्त्व रहा है। भारत की सड़क प्रणाली विश्व की दूसरी सबसे बड़ी प्रणाली है। यहाँ प्रतिवर्ष सड़कों द्वारा 65% प्रतिशत माल ढुलाई और 80% सवारी यात्री तथा 70% भार यातायात का परिवहन किया जाता है। सड़कों का निर्माण एवं रख-रखाव रेल परिवहन की तुलना में सस्ता है और यह छोटी दूरियों की यात्रा के लिए अपेक्षाकृत अधिक अनुकूल होता है।
- देश के सड़क नेटवर्क को पाँच भागों में बाँटा गया हैं-
- राष्ट्रीय राजमार्ग/एक्सप्रेस मार्ग
- राज्यों के राजमार्ग
- जिला सड़कें
- ग्रामीण सड़कें
- सीमावर्ती सड़कें
राष्ट्रीय राजमार्ग/एक्सप्रेस मार्ग
- राज्यों की राजधानियों, बड़े-बड़े औद्योगिक नगरों तथा प्रमुख पोताश्रयों को मिलाने वाला यह मार्ग केन्द्र सरकार के नियन्त्रण में होता है, जिसका विकास तथा रख-रखाव का कार्य भारतीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) करता है। भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण का प्रचालन वर्ष 1995 में हुआ था। राष्ट्रीय राजमार्ग़ों की लम्बाई देश की सड़कों की लम्बाई का मात्र 1.7% है, परन्तु देश के कुल यातायात का 40% इन्हीं राष्ट्रीय राजमार्ग़ों के माध्यम से होता है।
राष्ट्रीय राजमार्गों का वितरण
- हमारे देश में सड़कों का वितरण समरूप नहीं है। भू-भाग की प्रकृति तथा आर्थिक विकास का स्तर सड़कों के घनत्व के प्रमुख निर्धारक हैं। मैदानी क्षेत्र में सड़कों का निर्माण आसान एवं सस्ता होता है, जबकि पहाड़ी एवं पठारी क्षेत्रों में कठिन एवं महँगा होता है। इसलिए, मैदानी क्षेत्रों की सड़कें न केवल घनत्व, बल्कि सड़कों की गुणवत्ता की दृष्टि से अधिक ऊँचाई वाले क्षेत्रों, बरसाती तथा वनीय क्षेत्रों की तुलना में अपेक्षाकृत बढ़िया होती है।
- राष्ट्रीय राजमार्ग़ों की सर्वाधिक लम्बाई उत्तर प्रदेश (6,774 किमी) में पाई जाती है, इसके बाद राजस्थान (5585 किमी), तमिलनाडु (4832 किमी), मध्यप्रदेश (4670 किमी) और आन्ध्रप्रदेश (4537 किमी) का स्थान है।
- प्रति 1000 व्यक्तियों पर राष्ट्रीय राजमार्ग़ों की लम्बाई के सन्दर्भ में प्रथम स्थान अरुणाचल प्रदेश का है, जहाँ यह आँकड़ा 1,816 किमी है। दूसरे स्थान पर मिजोरम (1,044 किमी) है।
1. राष्ट्रीय राजमार्ग सं. 1 (NH-1)
यह ऊरी, बारामुला, श्रीनगर, कारगिल और लेह से गुजरता है। (जम्मू - कश्मीर एवं लद्दाख), यह भारत की उत्तरी सीमा के समानांतर है। कुल लम्बाई 535 किमी. है।
2. राष्ट्रीय राजमार्ग सं. 2 (NH-2)
लम्बाई - 1,214 किमी.। यह डिब्रुगढ़ से शुरू होता है और असम, नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम राज्यों को शिवसागर, कोहिमा, इम्फाल, और ट्यूपेंग के साथ जोड़ता है। यह उत्तर - पूर्व भारत का दूसरा लम्बा राजमार्ग है। यह भारत म्यांमार सीमा के समानांतर है।
3. राष्ट्रीय राजमार्ग सं. 3 (NH-3)
अटारी, अमृतसर, जालंधर, अवादेवी, मण्डी, कुल्लू मनाली (पंजाब, जम्मू - कश्मीर, हिमाचल प्रदेश) कुल लम्बाई 427 किमी.।
4. राष्ट्रीय राजमार्ग सं. 4 (NH-4)
मयाबंदर से पोर्ट ब्लेयर (अण्डमान निकोबार) लम्बाई 230 किमी.
5. राष्ट्रीय राजमार्ग सं. 5 (NH-5)
सेपड से शिमला (पंजाब, हिमाचल प्रदेश) कुल लम्बाई 182 किमी.
6. राष्ट्रीय राजमार्ग सं. 6 (NH-6)
लम्बाई - 1,945 किमी.। यह मेघालय के जोरबट के पास से शुरू होकर मिजोरम के शिलांग में समाप्त होता है। यह उत्तर - पूर्व भारत का सबसे लंबा राष्ट्रीय राजमार्ग है। यह मेघालय, असम और मिजोरम राज्यों से होकर गुजरता है। यह पूर्वोत्तर राज्यों में बांग्लादेश सीमा के समानांतर है।
7. राष्ट्रीय राजमार्ग सं. 7 (NH-7)
फजिल्का, भटिण्डा, पटना, शाहीद, देवप्रयाग, रूद्रप्रयाग, प्रणप्रयाग, चमोली, बद्रीनाथ, माना दर्रा (पंजाब, चंडीगढ, हिमालय, उत्तराखण्ड) कुल लम्बाई - 770 किमी.
8. राष्ट्रीय राजमार्ग सं. 9 (NH-9)
सिरशाह, दिल्ली, बिलासपुर, पीसोरगढ़ से गुजरता है। (पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तराखण्ड) कुल लम्बाई 811 किमी. है।
9. राष्ट्रीय राजमार्ग सं. 10 (NH-10)
सिलीगुड़ी, कलीम्पाग, गंगटोंक (सिक्किम, पश्चिम बंगाल) लम्बाई - 174 किमी.।
10. राष्ट्रीय राजमार्ग सं. 11 (NH-11)
जैसलमेर, पोखरण, बीकानेर, फतेहपुर (सीकर) कुल लम्बाई 495 किमी.।
11. राष्ट्रीय राजमार्ग सं. 12 (NH-12)
यह ढोलका, रानीगंज, मालदा व कोलकाता के मध्य है। (पश्चिम बंगाल) यह भारत बांग्लादेश सीमा के समानांतर स्थित है।
12. राष्ट्रीय राजमार्ग सं. 13 (NH-13)
लम्बाई - 1150 किमी. (पुराना NH-229) यह अरुणाचल प्रदेश के तवांग से शुरू होकर असम के पासीघाट तक जाता है। यह राजमार्ग सेला झील के खूबसूरत कस्बे, दिरांग, बोमडिला, जीरो टाउन, बीरू और असम के पासीघाट से गुजरता है।
13. राष्ट्रीय राजमार्ग सं. 16 (NH-16)
लम्बाई - 1659 किमी. (पुराना NH-5) यह स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना का हिस्सा है जो पश्चिम बंगाल, ओडिशा, तमिलनाडु और आंध्रप्रदेश के पूर्वी तट के साथ - साथ चलता है। यह चेन्नई में समाप्त होता है।
14 राष्ट्रीय राजमार्ग सं. 19 (NH-19)
लम्बाई - 1435 किमी. (पुराना NH-2) इसे दिल्ली - कोलकाता रोड भी कहते हैं। यह भारत के व्यस्ततम राजमार्गों में से एक है जो दिल्ली, आगरा, वाराणसी, बरही, आसनसोल और कोलकाता के प्रमुख शहरों से गुजरता है। इसे ग्राण्ड ट्रंक रोड भी कहते हैं एवं यह स्वर्णिम चतुर्भुज योजना का एक हिस्सा है।
15. राष्ट्रीय राजमार्ग सं. 27 (NH-17)
(लम्बाई - 3507 किमी.) यह राष्ट्रीय राजमार्ग उत्तर - दक्षिण व पूर्व पश्चिम गलियारे का भाग है। जो पोरबंदर से शुरू होकर सिलचर में समाप्त होता है। यह गुजरात, राजस्थान, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, असम राज्यों से गुजरता है। झांसी, उत्तर - दक्षिण व पूर्व - पश्चिम गलियारों का जंक्शन है।
16. राष्ट्रीय राजमार्ग सं. 30 (NH-30)
लम्बाई - 2,010 किमी. (पुराना NH-221) यह उत्तराखण्ड के सितारगंज को आंध्रप्रदेश के इब्राहिम पट्टनम से जोड़ता है। NH-30 लखनऊ, प्रयागराज, जवलपुर, रायपुर और भद्राचलम शहरों के माध्यम से 2,010 किमी. की दूरी तय करते हुए भारत के 6 प्रमुख राज्यों से होकर गुजरती है।
17. राष्ट्रीय राजमार्ग सं. 31 (NH-31)
यह उत्तरप्रदेश से शुरू होकर, पश्चिम बंगाल में समाप्त हो जाता है।
18. राष्ट्रीय राजमार्ग सं. 34 (NH-34)
यह उत्तराखंड के गंगोत्री धाम से चलता है एवं NH-44 पर लखनादौन, जबलपुर के पास समाप्त होता है। इसके मार्ग में उत्तरकाशी, ऋषिकेश, हरिद्वार, गाजियाबाद, बुलंदशहर, अलीगढ़, दमोह और जबलपुर शामिल हैं।
19. राष्ट्रीय राजमार्ग सं. 44 (NH-44)
लम्बाई - 3,745 किमी. यह भारत का सबसे लम्बा राष्ट्रीय राजमार्ग है। यह श्रीनगर से कन्याकुमारी तक जाता है। यह जम्मू - कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु राज्य से गुजरता है। यह भारत में सर्वाधिक राज्यों से गुजरने वाला राष्ट्रीय राजमार्ग है। NH-44 पुराने को मिलाकर अस्तित्व में लाया गया है। जिसमें NH-1A, NH-1, NH-2, NH-3, NH-75, NH-26 और NH-7 शामिल है। यह स्वर्णिम चतुर्भुज व उत्तर - दक्षिण कॉरिडोर का भाग है।
20. राष्ट्रीय राजमार्ग सं. 47 (NH-47)
लम्बाई - 1080 किमी. यह बामनबोर, गुजरात से शुरू होकर नागपुर महाराष्ट्र तक जाता है। इस राजमार्ग के पथ में बामनबोर, लिम्बड़ी गोधरा, इंदौर, हरदा, बेतुल आते हैं तथा यह नागपुर में NH-44 से जुड़ जाता है।
21. राष्ट्रीय राजमार्ग सं. 48 (NH-48)
लम्बाई - 2,807 किमी. (पुराना NH-8) यह दिल्ली से शुरू होकर चेन्नई तक जाता है। राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या - 8 दिल्ली से जयपुर तक किशनगढ़ एक्सप्रेस वे, नेशनल एक्सप्रेस वे 1, उदयपुर से बड़ोदरा और बड़ौदा से बॉम्बे सहित अन्य राष्ट्रीय राजमार्गों का विलय किया जाता है।
22. राष्ट्रीय राजमार्ग सं. 52 (NH-52)
लम्बाई - 2,317 किमी. यह हिसार, जयपुर, कोटा, इंदौर, धुले, औरंगाबाद, बीजापुर से हुबली तक के प्रमुख शहरों से गुजरता हुआ, उत्तर से दक्षिण भारत को जोड़ता है।
23. राष्ट्रीय राजमार्ग सं. 53 (NH-53)
लम्बाई - 1781 किमी. यह गुजरात में हजीरा को ओडिशा के पराद्वीप बंदरगाह को जोड़ने वाला राजमार्ग है।
यह गुजरात, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ और ओडिशा के चार राज्यों से होकर गुजरता है।
24. राष्ट्रीय राजमार्ग सं. 66 (NH-66)
लम्बाई - 1593 किमी. (पुराना NH-17) NH-17 भारत के पश्चिमी घाट के समानांतर चलता है यह पनवेल से कन्याकुमारी तक जाता है।
एक्प्रेस राजमार्ग
- तेज व्यापारिक वाहनों को कम अवधि में गन्तव्य तक पहुँचाने हेतु एक्सप्रेस राजमार्ग बनाया गया है। ये राजमार्ग प्रायः 4 एवं 6 लेन वाले होते हैं। एक्सप्रेस राजमार्ग के कुछ उदाहरण-पुणे-मुम्बई एक्सप्रेस राजमार्ग, दिल्ली-मुम्बई एक्सप्रेस राजमार्ग (वाया-जयपुर), यमुना एक्सप्रेस राजमार्ग आदि हैं।
स्वर्णिम चतुर्भुज योजना
- इसके अन्तर्गत देश के चार महानगरों-दिल्ली, मुम्बई, चेन्नई तथा कोलकाता को उच्च गुणवत्ता युक्त सड़कों से जोड़ा गया है। इसकी कुल लम्बाई 5846 किमी है।
उत्तर-दक्षिण, पूर्व पश्चिम कॉरिडोर योजना
- उत्तर-दक्षिण कॉरिडोर का निर्माण कन्याकुमारी (तमिलनाडु) से श्रीनगर (जम्मू-कश्मीर) तक तथा पूर्व-पश्चिम कॉरिडोर का निर्माण पोरबन्दर (गुजरात) से सिल्चर (असम) तक किया गया है। यह भी उच्च गुणवत्ता युक्त महामार्ग है, जिसकी कुल लम्बाई 7300 किमी है। पूर्व-पश्चिम तथा उत्तर-दक्षिण कॉरिडोर एक-दूसरे से झाँसी में मिलते हैं।
राज्यों के राजमार्ग
- राज्यों के राजमार्ग़ों के निर्माण तथा रख-रखाव का दायित्व राज्य सरकार पर होता है। ये राज्य के प्रमुख शहरों, जिला मुख्यालयों एवं राष्ट्रीय राजमार्ग़ों को जोड़ता है।
- प्रान्तीय राजमार्ग़ों की सबसे अधिक लम्बाई महाराष्ट्र में है।
जिला सड़कें
- लगभग 4.7 लाख किमी लम्बी जिला सड़कें जिला मुख्यालय से जिले के सभी पुलिस स्टेशन को जोड़ती है। ये सड़के जिला बोर्ड़ों के अधीन होती है।
ग्रामीण सड़कें
- ग्राम पंचायत के द्वारा ग्रामीण सड़कें बनाई जाती हैं। वर्तमान समय में भी देश की आधी से अधिक ग्रामीण सड़कें कच्ची हैं, जो वर्षा के मौसम में परिवहन के लिए कठिनाई उत्पन्न करती है।
प्रधानमन्त्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY)
- 500 व्यक्तियों या इससे अधिक आबादी वाले मैदानी क्षेत्रों तथा 250 व्यक्तियों या इससे अधिक आबादी वाले पहाड़ी, रेगिस्तानी एवं जनजातीय क्षेत्रों में सभी मौसम में सिंगल कनेक्टिविटी देने के लिए दिसम्बर, 2000 में प्रधानमन्त्री ग्राम सड़क योजना प्रारम्भ की गई थी।
भारत निर्माण योजना (BNY)
- 1000 की आबादी वाले मैदानी क्षेत्रों तथा 500 की आबादी वाले पहाड़ी तथा जनजातीय क्षेत्रों में भारत निर्माण योजना सभी मौसमों वाली सड़कों से सम्बद्धता प्रदान करता है।
- इस सड़कों का सामरिक महत्त्व होता है। इस कारण इन सड़कों के रख-रखाव पर सरकार का विशेष ध्यान है।
सीमावर्ती सड़कें
- अन्तर्राष्ट्रीय सीमाओं के सहारे बनाई गई सड़कों को सीमावर्ती सड़कें कहा जाता है। ये सड़कें सुदूर क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को प्रमुख नगरों से जोड़ने और प्रतिरक्षा प्रदान करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इनका निर्माण सीमा सड़क संगठन (BRO) करता है।
- सीमावर्ती सड़कों का निर्माण सभी देशों में गाँवों एवं सैन्य शिविरों तक वस्तुओं को पहुँचाने के लिए ऐसी सड़कें पाई जाती हैं।
रेल परिवहन
- भारत में पहली रेलगाड़ी 16 अप्रैल, 1853 ई. को मुम्बई से थाणे के मध्य लॉर्ड डलहौजी के काल में चलाई गई थी। तदुपरान्त 1854 ई. में कलकत्ता से रानीगंज के मध्य रेल सेवा की शुरुआत हुई।
- भारतीय रेल नेटवर्क एशिया का सबसे बड़ा नेटवर्क है तथा एकल प्रबन्धनाधीन यह विश्व का दूसरा सबसे बड़ा नेटवर्क है। यह विश्व का सबसे बड़ा नियोक्ता है, इसके 16 लाख से भी अधिक कर्मचारी हैं। यह भारत में माल और यात्रियों के परिवहन का मुख्य साधन है।
- रेलवे पटरी की चौड़ाई के आधार पर भारतीय रेल के तीन वर्ग बनाए गए हैं-
- बड़ी लाइन (Broad gauge) - ब्रॉड गेज में रेल पटरियों के बीच की दूरी 1.616 मी. होती है। ब्रॉड गेज लाइन की कुल लम्बाई वर्ष 2011 में 55188 किमी थी।
- मीटर लाइन (Meter gauge) - इसमें दो रेल पटरियों के बीच की दूरी एक मीटर होती है। इसकी कुल लम्बाई वर्ष 2011 में 6809 किमी थी।
- छोटी लाइन (Narrow gauge) - इसमें दो रेल पटरियों के बीच की दूरी 0.762 मीटर या 0.610 मी होती है। इसकी कुल लम्बाई वर्ष 2011 में 2463 किमी थी। यह प्रायः पर्वतीय क्षेत्रों तक सीमित है।
कोंकण रेलवे -
- कोंकण रेलवे का प्रारम्भ मार्च, 1990 में गोवा, महाराष्ट्र, कर्नाटक तथा केरल के बीच छोटे-से-छोटे रेलवे मार्ग द्वारा एक लिंक प्रदान करने के लिए प्रारम्भ की गई। रोहा से मंगलौर के बीच 760 किमी की दूरी इस परियोजना में सम्मिलित है।
रेलवे जोन -
- भारतीय रेल को 17 रेलवे जोनों में बाँटा गया है, ताकि प्रशासनिक कार्य सुचारू रूप से किया जा सके। ये सत्रह रेलवे जोन निम्नलिखित हैं-
रेलवे जोन
जोन मुख्यालय
मध्य रेलवे (CR) मुम्बई वी टी
पूवी रेलवे (ER) कोलकाता
उत्तरी रेलवे (NR) नई दिल्ली
उत्तरी-पूर्वी रेलवे (NER) गोरखपुर
उत्तरी-पूर्वी सीमान्त प्रान्त रेलवे (NEFR) मालेगाँव गुवाहाटी
दक्षिणी रेलवे (SR) चेन्नई
दक्षिणी-मध्य रेलवे (SCR) सिकन्दराबाद
दक्षिण-पूर्वी रेलवे (SER) कोलकाता
पश्चिमी रेलवे (WR) मुम्बई चर्चगेट
पूर्वी-मध्य रेलवे (ECR) हाजीपुर
उत्तरी पश्चिमी रेलवे (NWR) जयपुर
पूर्वी तटवर्ती रेलवे (ECR) भुवनेश्वर
उत्तरी-मध्य रेलवे (NCR) इलाहाबाद
दक्षिण-पश्चिम रेलवे (SWR) हुगली
पश्चिमी-मध्य रेलवे (ECR) जबलपुर
दक्षिण-पूर्व मध्य रेलवे (SECR) विलासपुर
कोलकाता मेट्रो (KMR) कोलकाता (नवीनतम)
डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर
- डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर रेलवे की एक महत्त्वाकांक्षी योजना है, जिसके पूरा हो जाने से माल वाहन क्षमता में अभूतपूर्व वृद्धि हो जाएगी। इस याजना के अन्तर्गत दो गलियारे बनाए गए हैं- प्रथम दादरी (दिल्ली के निकट) मुम्बई के बीच है जिसे पश्चिमी गलियारा (Western Corridor) कहा जाता है। दूसरा लुधियाना से दानुकुनी (हावड़ा के निकट) के बीच पूर्वी गलियारा (Estern Corridor) है।
- पश्चिमी गलियारे की कुल लम्बाई 1469 किमी है, जबकि पूर्वी गलियारा 1280 किमी. लम्बा है।
ट्वाय ट्रेन्स
- भारतीय रेल द्वारा निम्न ट्वाय ट्रेन्स भी चलाई जाती हैं
- दार्जिलिंग ट्वाय ट्रेन - इसे वर्ष 1999 से यूनेस्को द्वारा विश्व विरासत का दर्जा हासिल है।
- शिमला ट्वाय ट्रेन-कालका से शिमला तक।
- माथेरान ट्वाय ट्रेन।
- नीलगिरी माउण्टेन ट्रेन-इसे विश्व धरोहर का दर्जा प्राप्त है।
भारत में रेलवे की उत्पादन इकाइयाँ
|
कारखाना |
स्थापना वर्ष |
स्थान |
राज्य |
विवरण |
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चितरंजन |
1950 |
चितरंजन |
पश्चिम बंगाल |
रेलवे विद्युत इन्जन बनाने का सबसे पुराना कारखाना |
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इण्टीग्रल कोच फैक्ट्री |
1950 |
पेराम्बदूर |
तमिलनाडु |
सवारी डिब्बे का निर्माण |
|
रेल कोच फैक्ट्री |
1985 |
कपूरथला |
पंजाब |
रेल डिब्बे का निर्माण |
|
डीजल लोकोमोटिव वर्क्स |
1956 |
वाराणसी |
उत्तरप्रदेश |
डीजल इन्जन व विद्युत शटर्स का निर्माण |
|
डीजल इन्जन आधुनिकीकरण कारखाना |
1983 |
पटियाला |
पंजाब |
डीजल इन्जन के संघटकों का निर्माण |
भारत में मेट्रो रेल
- भारत में मेट्रो रेल का शुभारम्भ कोलकाता में वर्ष 1972 में तात्कालीन प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी द्वारा किया गया। इस भूमिगत रेलमार्ग की कुल लम्बाई 16.45 किमी है।
- वर्ष 1996 में दिल्ली मेट्रो रेल की स्वीकृति दी गई तथा 25 सितम्बर, 2002 से इसका व्यावसायिक परिचालन प्रारम्भ हुआ। दिल्ली मेट्रो भारत सरकार तथा राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार का संयुक्त उपक्रम है।
- देश के पाँच महानगरों में वर्ष 2010 में सरकार ने नई मेट्रो परियोजना को मन्जूरी दी है।
- ये महानगर - जयपुर, मुम्बई, चेन्नई, पुणे एवं लखनऊ है।
वायु परिवहन
- वायु परिवहन का व्यापक महत्त्व होता है। इससे किसी देश के आर्थिक विकास में मदद के अलावा युद्ध, प्राकृतिक आपदाओं के समय लोगों को शीघ्र सहायता पहुँचाने में सुविधा होती है।
- एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इण्डिया (AAI) - भारतीय वायुक्षेत्र में सुरक्षित, सक्षम वायु यातायात एवं वैमानिकी संचार सेवाएँ प्रदान करने के लिए उत्तरदायी है।
- मुक्त आकाश की नीति (Open Sky Policy) को अप्रैल, 1992 में सरकार द्वारा अपनाया गया। भारतीय निर्यात को सहायता देना तथा उसके निर्यात को विश्व बाजार में अधिक प्रतियोगितापूर्ण बनाना इसका मुख्य उद्देश्य था। इस नीति के तहत वायु परिवहन में निजी क्षेत्र को पुनः वर्ष 1992 में अनुमति दी गई।
ग्रीन फील्ड हवाई अड्डा -
- जब पुराने हवाई अड्डे में विस्तार द्वारा यातायात को सुगम बनाने की गुंजाइश नहीं रह जाती है, तब उसके निकट बिल्कुल नए और आधुनिक हवाई अड्डे का निर्माण किया जाता है, जिसे ग्रीन फील्ड हवाई अड्डा कहते हैं।
- निजी क्षेत्र के सहयोग से कोच्चि में एक अन्तर्राष्ट्रीय ग्रीन फील्ड हवाई अड्डा बनाया गा है। शमशाबाद (हैदराबाद) एवं देवनहल्ली (बेंगलुरू) में भी ग्रीन फील्ड हवाई अड्डे का निर्माण किया गया है।
भारत की प्रमुख परिवहन वायु कम्पनी
- भारत की प्रमुख वायु परिवहन कम्पनियाँ निम्नलिखित हैं-
एअर इण्डिया और इण्डियन एअर लाइन्स
- वर्ष 1953 में सभी विमान कम्पनियों का राष्ट्रीयकरण (Nationalisation) कर दिया गया तथा ‘एयर इण्डिया’ और ‘इण्डियन एयरलाइन्स’ अस्तित्व में आई।
- एयर इण्डिया को अन्तर्राष्ट्रीय उड़ानों का दायित्व सौंपा गया जबकि इण्डियन एयरलाइन्स को अन्तर्देशीय तथा पड़ोसी देशों की सेवाओं की जिम्मेदारी सौंपी गई। बाद में इण्डियन एयरलाइन्स को इण्डियन नाम दे दिया गया।
- केन्द्र सरकार ने 21 फरवरी, 2007 को दोनों सरकारी वायु सेवाओं के विलय को मंजूरी दे दी। विलय के बाद नई कम्पनी का नाम एयर इण्डिया रखा गया।
पवनहंस हेलीकॉप्टर सेवा
- भारत की इस अग्रणी हेलीकॉप्टर कम्पनी की स्थापना वर्ष 1985 में की गई थी। यह पर्यटन को बढ़ावा देने के साथ-साथ पेट्रोलियम क्षेत्र के लिए देश के दुर्गम क्षेत्रों को जोड़ने के लिए सेवाएँ उपलब्ध कराती हैं।
GAGAN परियोजना
- भारतीय विमान पत्तन प्राधिकरण तथा इसरो द्वारा तैयार इस परियोजना का पूरा नाम GAGAN (Global Positioning Systems Added Geo Synchronous Augmented Navigation) है। पहाड़ी और रुकावट वाले क्षेत्रों में भी इसकी सहायता से हवाई यातायात बिना किसी जोखिम के संचालित किए जा सकेंगे।
जल परिवहन
- भारत में परिवहन का सबसे पुराना साधन सबसे सस्ता एवं पर्यावरण के अनुकूल साधन है। आकार में बड़े एवं भारी सामानों के परिवहन हेतु यह सर्वाधिक उपयुक्त साधन है।
- जल परिवहन दो प्रकार का होता है-
- आन्तरिक जल परिवहन
- महासागरीय जल परिवहन
आन्तरिक जल परिवहन
- भारतीय अन्तर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण (INWA) की स्थापना राष्ट्रीय जलमार्ग़ों के विकास, रख-रखाव तथा नियमन के लिए 27 अक्टूबर, 1986 को की गई।
- केन्द्रीय अन्तर्देशीय जल परिवहन निगम की स्थाना मई, 1967 में की गई जिसका मुख्यालय कोलकाता में है। यह निगम गंगा-भागीरथी, हुगली तथा ब्रह्मपुत्र नदियों में अन्तर्देशीय माल ढुलाई का प्रबन्ध करता है।
भारत की नाव्य नहरें
- नाव्य नहरें का भारत में अभाव है। मुख्य नहरें जिसका प्रयोग आन्तरिक जल परिवहन के रूप में किया जाता है, निम्नलिखित हैं
- गंगा नदी की नहरों में नौकाएँ 584 किमी तक चलती है।
- कुर्नूल कुड़प्पा नहर (आन्ध्र प्रदेश) - 117 किमी
- मिदनापुर नहर (पश्चिम बंग) - 459 किमी
भारत के प्रमुख राष्ट्रीय जलमार्ग
जलमार्ग लम्बाई विस्तार नदी
संख्या
NW I 1620 किमी इलाहाबाद से गंगा
हल्दिया तक
NW II 891 किमी सदिया से ब्रह्मपुत्र
धुवरी तक
NW III 205 किमी कोट्टापुरम से चम्पाकारा
वुल्लम तक नहर
NW IV 1095 किमी काकीनाडा से कृष्णा
पुडुचेरी नहर गोदावरी
NW V 623 किमी पूर्वी तट नहर ब्राह्मणी
NW VI 121 किमी लखीमपुर से बराक
मंगा
महासागरीय जल परिवहन
- भारत के पास द्वीपों सहित लगभग 7517 किमी लम्बा समुद्र तट है। 13 प्रमुख तथा 185 गौण पत्तन समुद्री परिवहन को संरचनात्मक आधार प्रदान करते हैं। भारत की अर्थव्यवस्था के परिवहन सेक्टर में महासागरीय मार्ग़ों की महत्त्वपूर्ण भूमिका है।
- भारत में भार के अनुसार लगभग 95% तथा मूल्य के अनुसार 70% विदेशी व्यापार महासागरीय मार्ग़ों द्वारा होता है। अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के साथ-साथ इन मार्ग़ों का उपयोग देश की मुख्य भूमि तथा द्वीपों के बीच परिवहन के लिए भी होता है।
भारत के प्रमुख बन्दरगाह
- देश में कुल 13 बड़े बन्दरगाह है, इनमें काण्डला, मुम्बई, जवाहरलाल नेहरू (न्हावाशेवा), मार्मागाव, न्यू मंगलौर और कोच्चि पश्चिमी तट के सहारे, जबकि पूर्वी तट के सहारे तूतीकोरिन, चेन्नई, एन्नोर, विशाखापट्टनम, पाराद्वीप और कोलकाता-हल्दिया हैं। वर्ष 2010 में पोर्ट ब्लेयर को मुख्य बन्दरगाह के रूप में घोषित किया गया है।
बड़े पत्तनों को विवरण निम्नलिखित हैं-
प्रमुख बन्दरगाह विवरण
मुम्बई प्राकृतिक बन्दरगाह, भारत का सबसे बड़ा बन्दरगाह। पेट्रोलियम उत्पादन तथा शुष्क माल का कारोबार प्रमुख रूप से।
काण्डला गुजरात के कच्छ की खाड़ी में स्थित एक ज्वारीय पत्तन, मुक्त व्यापार क्षेत्र घोषित।
मार्मागाव गोवा में स्थित प्राकृतिक पोताश्रय, लौह-अयस्क का प्रमुख बन्दरगाह।
न्हावाशेवा मुम्बई से दक्षिण सहायक बन्दरगाह के तौर
(जवाहरलाल नेहरू पर निर्मित, नवीनतम आधुनिक सुविधाओं
पत्तन) से युक्त भारत का सबसे बड़ा कण्टेनर पत्तन।
कोच्चि केरल तट के सहारे लैगून पर स्थित एक प्राकृतिक बन्दरगाह।
चेन्नई कृत्रिम बन्दरगाह। पूर्वी तट पर देश का सबसे पुराना बन्दरगाह।
विशाखापट्टनम आन्ध्रप्रदेश के तट पर स्थित देश का सबसे गहरा बन्दरगाह।
पाराद्वीप ओडिशा तट पर स्थित गहरा बन्दरगाह। लैगून सदृश पोताश्रय।
एन्नोर चेन्नई के उत्तर में स्थित देश का प्रथम निगमित बन्दरगाह।
हल्दिया-कोलकाता हुगली नदी पर बंगाल की खाड़ी में स्थित एक नदी पत्तन।
तूतीकोरिन तमिलनाडु में दक्षिणी छोर पर स्थित। मुख्य रूप से कोयले का निर्यात।
पोर्टब्लेयर देश का नवीनतम अधिसूचित प्रमुख बन्दरगाह।
सेतु समुद्रम परियोजना
- सेतु समुद्रम एक ऐसी महत्त्वाकांक्षी परियोजना का नाम है, जो बंगाल की खाड़ी और अरब सागर के बीच समुद्री मार्ग को सीधी आवाजाही के लिए खोल देगी। इस मार्ग के शुरू होने से जहाजों को करीब 400 समुद्री मीलों की यात्रा कम करनी होगी, जिससे लगभग 36 घण्टे समय की बचत होगी।
- इस समय भारत के पश्चिमी तट से चलने वाले जहाजों को श्रीलंका का चक्कर काट कर जाना पड़ता है। यह परियोजना पूरी होने पर वे सीधे ही सेतु समुद्रम नहर से होकर बंगाल की खाड़ी में पहुँच जाया करेंगे।
सागरमाला परियोजना
- इस परियोजना की घोषणा प्रधानमन्त्री द्वारा वर्ष 2003 में की गई थी। सागरमाला परियोजना को जहाजरानी के क्षेत्र में कार्यान्वित किया जा रहा है, जिसमें सरकार के साथ-साथ निजी क्षेत्र की भी भागीदारी है।
- इस परियोजना के तहत पश्चिमी तट के प्रमुख बन्दरगाहों का आधुनिकीकरण व क्षमता विस्तार नए बन्दरगाहों का निर्माण व आन्तरिक जल परिवहन तन्त्र का उन्नयन किया जाएगा।
पाइप लाइन परिवहन
- पाइप लाइन परिवहन तरल पदार्थ़ों और गैस की लम्बी दूरियों के परिवहन के लिए सबसे सुविधाजनक साधन है।
- ठोस पदार्थ़ों का भी गाद के रूप में पाइप लाइनों द्वारा परिवहन होता है जो भारत में पाइप लाइन परिवहन एक नई उपलब्धि है।
कुछ प्रमुख पाइप लाइन
नाहरकटिया नूनमती-बरौनी पाइप लाइन
- तेल परिवहन के लिए भारत में सबसे पहले पाइप लाइन असम में बनाई गई थी। असम के तेलकूपों से नूनमाटी तेल परिशोधनशाला तक 443 किमी पाइपलाइन द्वारा तेल से जाया जाता है। इस पाइप लाइन का विस्तार करके इसे बिहार में स्थित बरौनी ले जाया गया।
- नूनमाटी से बरौनी तक पाइप लाइन की कुल लम्बाई 724 किमी है। इस प्रकार इस पाइप लाइन को कानपुर तक ले जाया गया है।
सलाया-कोयली-मथुरा पाइप लाइन
- कच्छ की खाड़ी के किनारे पर स्थित एक महत्त्वपूर्ण पाइप लाइन जो सलाया से मथुरा के बीच बिछाई गई है। 1256 किमी लम्बी यह पाइप लाइन मुम्बई हाई से प्राप्त तेल को मथुरा तेल शोधनशाला तक ले जाती है। इस पाइप लाइन को कोयली से जोड़कर पंजाब के जालन्धर तक ले जाया गया है।
मुम्बई हाई-मुम्बई-अंकलेश्वर कोयली पाइप
- 210 किमी लम्बी यह पाइप लाइन मुम्बई हाई को कोयली से जोड़ती है और कोयली तेल परिष्करणशाला को मुम्बई हाई का तेल उपलब्ध कराती है।
हजीरा-विजयपुर-जगदीशपुर (HVJ) गैस पाइप लाइन
- हजीरा-विजयपुर-जगदीशपुर देश की सबसे लम्बी गैस पाइप लाइन का निर्माण किया गया है। 1750 किमी लम्बी यह पाइप लाइन विश्व की सबसे लम्बी भूमिगत पाइप लाइन है। यह छह रासायनिक उर्वरक कारखानों को गैस प्रदान करेगी।
काण्डला-भटिण्डा पाइप लाइन
- 1454 किमी लम्बी यह पाइप लाइन गुजरात में काण्डला से पंजाब में भटिण्डा तक विस्तृत होगी। यह अभी प्रस्तावित है। इससे राजस्थान, हरियाणा तथा पंजाब राज्यों को लाभ होगा।
जामनगर-लोनी एलपीजी पाइप लाइन
- 1269 किमी लम्बी इस पाइप लाइन का निर्माण गैस अथॉरिटी ऑफ इण्डिया लिमिटेड (GAIL) ने किया है। यह गुजरात के जामनगर को दिल्ली के निकट लोनी (उत्तरप्रदेश) के साथ मिलाती है।
मुन्द्रा-दिल्ली पाइप लाइन
- गुजरात में स्थित मुन्द्रा को दिल्ली से मिलाने वाली यह पाइप लाइन 1054 किमी लम्बी है।