ज्वालामुखी

      - पृथ्वी के आन्तरिक भाग से दरार या छिद्र द्वारा विखण्डित पदार्थों का ऊपरी सतह पर प्रकट होना - ज्वालामुखी कहलाता है।

ज्वालामुखी

      - पृथ्वी के आन्तरिक भाग से मैग्मा सहित समस्त विखण्डित पदार्थों का ऊपरी सतह पर पहुँचना, एवं ठण्डा होकर ठोस होने की समस्त प्रक्रिया शामिल होती है।



 

 

      - ज्वालामुखी उद्गार के फलस्वरूप निकलने वाले पदार्थ़ों में ठोस एवं तरल पदार्थ़ों के अलावा हाइड्रोजन, ऑक्सीजन, कार्बन डाईऑक्साइड, सल्फर डाईऑक्साइड जैसी गैसें भी सम्मिलित होती हैं।

      - ज्वालामुखी लावा दो प्रकार का होता हैं-

1. अम्लीय लावा

      - इसका रंग पीला, भार हल्का तथा द्रव रूप अत्यन्त गाढ़ा होता है जो कि ऊँचे ताप पर पिघलता है।

2. क्षारीय लावा

      - इसका रंग गहरा तथा काला, भार अधिक तथा द्रव रूप पतला होता है। पैठिक लावा कम ताप पर ही पिघल जाता है। चूँकि यह हल्का तथा पतला होता है, अत: उद्गार के बाद धरातल पर शीघ्रता से फैल जाता है, परन्तु सिलिका की कमी के कारण यह शीघ्र जमकर ठोस रूप धारण कर लेता है।

      - ऐसा लावा जिसमें सिलिका की मात्रा अधिक होती है, अम्लीय लावा कहलाता है। अम्लीय लावा की तुलना में क्षारीय लावा पतला होता है।

      - ज्वालामुखी लावा के झाग से बनने वाले हल्के एवं छिद्रदार शिलाखंडों को प्यूमिस कहा जाता है तथा ज्वालामुखी धूल, राख आदि के जमा होने से जो चट्टान बनती है उसे टफ कहा जाता है।

      - हवाई तुल्य ज्वालामुखी में उद्गार कम विस्फोटक होता है, जबकि पीलियन तुल्य ज्वालामुखी में उद्गार सर्वाधिक विस्फोटक रूप में होता है।

ज्वालामुखी के प्रकार

      1. सक्रिय ज्वालामुखी

      2. सुषुप्त ज्वालामुखी

      3. मृत ज्वालामुखी

1. सक्रिय ज्वालामुखी (Active Volcano)

      - जिस ज्वालामुखी से लावा, गैस आदि निरंतर निकलते रहते हैं उन्हें सक्रिय या जाग्रत ज्वालामुखी कहा जाता है। जैसे हवाई द्वीप का मोनालोआ, सिसली (इटली) का एटना, भारत का बैरन द्वीप, इक्वेडोर का कोटोपैक्सी (सबसे ऊँचा सक्रिय ज्वालामुखी) आदि।

      - भू-मध्यसागर में स्थित स्ट्राम्बोली ज्वालामुखी से सदैव प्रज्वलित गैसें बाहर निकलती रहती हैं, अतः इसे भू-मध्यसागर का प्रकाश स्तंभ कहा जाता है।

2. सुषुप्त ज्वालामुखी (Dormant  Volcano)

      - ऐसे ज्वालामुखी जो उद्गार के बाद शांत पड़ जाते हैं, परंतु इनमें कभी भी उद्गार हो सकता है, सुषुप्त ज्वालामुखी कहलाते हैं। जैसे इंडोनेशिया का क्राकातोआ, जापान का फ्यूजीयामा, इटली का विसुवियस आदि।

3. मृत ज्वालामुखी (Extinct  Volcano)

      - ऐसे ज्वालामुखी जिनमें भू-गर्भिक इतिहास के अनुसार काफी लंबे समय से पुनः उद्गार नहीं हुआ है, मृत ज्वालामुखी कहलाते हैं। जैसे- म्यांमार का पोपा ज्वालामुखी, अफ्रीका का किलिमंजारो, ईरान का देमबंद एवं कोह सुल्तान।

  1. ज्वालामुखी का वैश्विक वितरण:-

1. परिप्रशान्त महासागरीय मेखला या विनाशी प्लेट किनारे के ज्वालामुखी - विश्व के ज्वालामुखियों का लगभग दो तिहाई भाग प्रशान्त महासागर के दोनों तटीय भागों, द्वीप चापों तथा समुद्रीय द्वीपों के सहारे पाया जाता हैं। ज्वालामुखी की इस शृंखला को प्रशान्त महासागर का ज्वालावृत्त कहते हैं। यह पेटी अन्टार्कटिका के एरेबस पर्वत से शुरू होकर दक्षिणी अमेरिका के पश्चिमी तट के सहारे खास कर एण्डीज पर्वत माला का अनुसरण करती हुई उत्तरी अमेरिका के रॉकीज पर्वत के ज्वालामुखियों को सम्मिलित करके पश्चिमी तटीय भागों के सहारे अलास्का तक पहुँचती है।

2. मध्य महाद्वीपीय मेखला या महाद्वीपीय प्लेट अभिसरण मेखला - इस मेखला का प्रारम्भ रचनात्मक प्लेट किनारों अर्थात् मध्य अटलाण्टिक (महासागरीय कटक, अपसरण मण्डल) से होता है यद्यपि अधिकांश ज्वालामुखी विनाशी प्लेट किनारों के सहारे के रूप में पाए जाते हैं। विश्व के उन महत्त्वपूर्ण ज्वालामुखियों में जो कि समूह में स्थित है।

3. मध्य अटलाण्टिक मेखला या महासागरीय कटक ज्वालामुखी - मध्य महासागरीय कटक के सहारे दो प्लेट का अपसरण होता है जिसके कारण कटक के सहारे दरार या भ्रंश का निर्माण होता है। इस भ्रंश का प्रभाव क्रस्ट के नीचे दुर्बलता मण्डल तक होता है।

  1. ज्वालामुखी क्रिया द्वारा निर्मित स्थलाकृति

1. बाह्य स्थलाकृति

(अ) केन्द्रीय विस्फोट द्वारा निर्मित स्थलरूप

(1) ऊँचे उठे भाग

(2) नीचे धंसे भाग

(ब) दूसरी उद्गार द्वारा निर्मित स्थलरूप

(1) लावा पठार तथा लावा गुम्बद

(2) लावा मैदान

2. आभ्यान्तरिक स्थलाकृति

1. आन्तरिक लावा गुम्बद     5. लोपोलिथ

2. बैकोलिथ                        6. सिल

3. लैकोलिथ                     7. डाइक

4. फैकोलिथ                     8. स्टाक

 

 

 

 

  1. बाह्य स्थलाकृतियाँ

शंकु - जब विखण्डित पदार्थ एक शंकु के रूप में जमा होते हैं तो उसे ज्वालामुखी शंकु कहते हैं।

ये निम्न प्रकार के होते हैं-

1. राख शंकु / सिंडर शंकु - जब विखण्डित पदार्थों में राख की मात्रा अधिक तथा लावा की मात्रा कम होती है।

2. लावा शंकु -

(अ) क्षारीय लावा शंकु - लावा पतला क्षेत्रीय विस्तार अधिक तथा ऊँचाई कम होती है।

(ब) अम्लीय लावा शंकु / पैठिक लावा शंकु - लावा गाढ़ा एवं चिपचिपा क्षेत्रीय विस्तार कम तथा ऊँचाई अधिक है।

      ज्वालामुखी से संबंधित शब्दावली

     - क्रेटर ज्वालामुखी के शीर्ष पर स्थित कीप के आकार के गर्त को क्रेटर कहा जाता है।

     - कॉल्डेरा क्रेटर का विस्तृत रूप कॉल्डेरा कहलाता है। क्रेटर एवं काल्डेरा में जल के भर जाने से यह झील में परिवर्तित हो जाता है।

     - इंडोनेशिया की टोबा, अमेरिका की ओरोगन, राजस्थान की पुष्कर, महाराष्ट्र की लोनार आदि कॉल्डेरा झील के उदाहरण हैं।

     - ऐरा कॉल्डेरा जापान में एवं वेलिस कॉल्डेरा अमेरिका में स्थित हैं।

    - सोल्फतारा जब ज्वालामुखी से राख, लावा आदि का निकलना बंद हो जाता है एवं उसके बाद भी लंबे समय तक उससे विभिन्न प्रकार की गैसें तथा वाष्प निकलती रहती हैं तो यह अवस्था सोल्फतारा कहलाती है।

     - धुआँरे (गंधकीय धुआँ) का विस्तृत क्षेत्र अलास्का में कटमई ज्वालामुखी के समीप स्थित है, जिसे ‘दस हजार धुआँरे की घाटी’ कहा जाता है।

     - गेसर धुआँरे गर्म जल का एक ऐसा प्राकृतिक स्रोत जिससे समय-समय पर गर्म जल तथा जलवाष्प फव्वारे के रूप में निकलता रहता है गेसर कहलाता है।

     - अमेरिका (येलोस्टोन पार्क), आइसलैंड (ग्रेंड गेसर) एवं न्यूजीलैंड में गेसर के उदाहरण देखने को मिलते हैं।

     - गर्म झरना एक ऐसा झरना जिससे गर्म जल निरंतर निकलता रहता है गर्म झरना कहलाता है।

     - गर्म झरना मुख्यतः ज्वालामुखी क्षेत्रों में पाए जाते हैं। भारत में मुंगेर, जगीर, हजारीबाग में भी ये पाए जाते हैं।

     - जहाँ ज्वालामुखी का नामोनिशान नहीं पाया जाता है। इसका कारण चट्टानों में रेडियो सक्रिय पदार्थ़ों की उपस्थिति है।

     - विश्व में सर्वाधिक ज्वालामुखी (लगभग दो-तिहाई) परि-प्रशांत पेटी में पाए जाते हैं, जिसे प्रशांत महासागर की अग्नि शृंखला भी कहा जाता है।

     - ये ज्वालामुखी प्लेटों के अभिसरण क्षेत्र में स्थित हैं।

     - चिली का एकांकागुआ मेक्सिको का पापोकैटपेटल, जापान का फ्यूजीयामा, अमेरिका का शास्ता, रेनियर एवं हुड, फिलीपींस का मेयॉन तथा माउंट ताल आदि इस पेटी के प्रमुख ज्वालामुखी पर्वत हैं।

     - परिप्रशांत पेटी के अलावा ज्वालामुखी पर्वत मुख्यतः हिमालय को छोड़कर शेष नवीन मोड़दार पर्वतों, सागरों के मध्यवर्ती भाग एवं भ्रंश घाटियों में पाए जाते हैं।

     - स्ट्राम्बोली, विसुवियस, एटना, देमबन्द, कोह सुल्तान, एलबुर्ज (काकेशस), अरारात (अर्मीनिया), क्राकातोआ आदि ज्वालामुखी पर्वत मध्य महाद्वीपीय पेटी में स्थित हैं, जिसका विस्तार केनारी द्वीप के निकट से लेकर इंडोनेशिया तक है।

     - अफ्रीका के कीनिया एवं किलिमंजारो जैसे ज्वालामुखी पर्वत दरार घाटी में स्थित हैं।

     - आइसलैंड, एजोर्स, सेंट हेलेना आदि अटलांटिक महासागर के मध्य महासागरीय कटक पर स्थित हैं।

     - हवाई द्वीप के ज्वालामुखी प्लेट के मध्यवर्ती भाग में स्थित हैं, जिनकी उत्पत्ति का कारण गर्म स्थल (Hot Spot) हैं।

     - भारत में ज्वालामुखी क्रिया के प्राचीनतम प्रमाण झारखंड के डालमा क्षेत्र में पाए जाते हैं।

     - जुरैसिक काल में राजमहल के पहाड़ी क्षेत्र एवं क्रिटेशस काल में दक्कन के पठार पर ज्वालामुखी क्रिया काफी वृहत पैमाने पर हुई।


भूकम्प

भूकम्प भू-पृष्ठ पर होने वाला आकस्मिक कंपन है जो भू-गर्भ में चट्टानों के लचीलेपन या समस्थिति के कारण होने वाले समायोजन का परिणाम होता है। यह प्राकृतिक व मानवीय दोनों ही कारणों से हो सकता है। भूकंप आने के पहले वायुमंडल में ‘रेडॉन’ गैसों की मात्रा में वृद्धि हो जाती है। अतः इस गैस की मात्रा में वृद्धि का होना उस प्रदेश विशेष में भूकंप आने का संकेत होता है।

- जिस जगह से भूकंपीय तरंगें उत्पन्न होती हैं उसे भूकंप मूल’ (Focus) कहते हैं तथा जहाँ सबसे पहले भूकंपीय लहरों का अनुभव किया जाता है उसे भूकंप अधिकेन्द्र (Epi Centre) कहते हैं। यह भूकंप मूल के ठीक ऊपर भू-पर्पटी पर स्थित होता है।

 - भूकंप के इस दौरान जो ऊर्जा भूकम्प मूल से निकलती है, उसे ‘प्रत्यास्थ ऊर्जा’ (Elastic Energy) कहते हैं। भूकंप के दौरान कई प्रकार की भूकंपीय तरंगें (Seismic Waves) उत्पन्न होती हैं जिन्हें  तीन श्रेणियों में रखा जा सकता हैं:-

(i) प्राथमिक अथवा लम्बात्मक तरंगें (Primary or Longitudinal Waves):-

 - इन्हें 'P' तरंगें भी कहा जाता है। ये अनुदैर्ध्य तरंगें हैं एवं ध्वनि तरंगों की भांति चलती हैं। तीनों भूकंपीय लहरों में सर्वाधिक तीव्र गति इसी की होती है। यह ठोस के साथ-साथ तरल माध्यम में भी चल सकती है, यद्यपि ठोस की तुलना में तरल माध्यम में इसकी गति मंद हो जाती है। 'S' तरंगों की तुलना में इसकी गति 40% अधिक होती है।

(ii) अनुप्रस्थ अथवा गौण तरंगें (Secondary or Transverse Waves):-  

 - इन्हें "S' तरंगें भी कहा जाता है। ये प्रकाश तरंगों की भांति चलती हैं। ये सिर्फ ठोस माध्यम में ही चल सकती है, तरल माध्यम में प्रायः लुप्त हो जाती है। चूँकि ये पृथ्वी के क्रोड से गुजर नहीं पाती, अतः 'S' तरंगों से पृथ्वी के क्रोड के तरल होने के संबंध में अनुमान लगाया जाता है।

 (iii) धरातलीय तरंगें (Surface or Long Period Waves):-

   - इन्हें 'L' तरंगें भी कहा जाता है। ये पृथ्वी के ऊपरी भाग को ही प्रभावित करती है। ये अत्यधिक प्रभावशाली तरंगें हैं एवं सबसे अधिक लंबा मार्ग तय करती है। यद्यपि इनकी गति काफी धीमी होती है और यह सबसे देर में पहुँचती है परंतु इनका प्रभाव सबसे विनाशकारी होता है।

    - पृथ्वी के अन्दर ऊपरी परतदार चट्‌टान की पतली परत के नीचे विभिन्न परतें पाई जाती हैं, जिनके घनत्व में अन्तर पाया जाता है।

    (1) ऊपरी परत = जेफ्ररीज ने क्रोशिया की कल्पा घाटी के वर्ष 1906 के भूकम्प के आधार पर P तथा S के अलावा एक ऐसे लहर युग्म का पता लगाया, जिसकी गति सब लहरों से कम थी। pg लहर 5.4 किलोमीटर sg लहर 3.3 किलोमीटर प्रति सेकेण्ड की गति से पृथ्वी के ऊपरी धरातल में यात्रा करती है। ये लहरें जिन शैलों से होकर गुजरती हैं, उनका धनत्व 2.7 होता है। इस आधार पर यह प्रमाणित होता है कि पृथ्वी की ऊपरी परत ग्रेनाइट नामक चट्‌टान की बनी है। इन दो लहरों से पूर्व P तथा S लहरों को अंकन किया जाता है, जो न्यून वेग से ऊपरी भाग में प्रवाहित होती हैं। इससे यह निष्कर्ष निकाला जाता है कि पृथ्वी का सबसे ऊपरी भाग परतदार शैल का बना है।

    (2) मध्यवर्ती परत = कोनार्ड ने टायर्न के वर्ष 1932 के भूकम्प के धक्के के आधार पर भूकम्पीय लहरों के तृतीय युग्म का पता लगाया। इनकी गति Pg - Sg तथा P - S के बीच की होती है तथा इनका नामकरण P - S किया गया है।इनमें P लहरें 6 से 7 सेकेण्ड की गति से पृथ्वी के मध्यवर्ती भाग में प्रवाहित होती हैं। इन लहरों के मध्यवर्ती गति के आधार पर यह निष्कर्ष निकलता है कि पृथ्वी में एक मध्यवर्ती परत है जिसका घनत्व 3 (ऊपरी सतह से अधिक, परन्तु निचली परत से कम) है। इस परत की वास्तविक चट्‌टानों के विषय में विद्वानों में मतभेद है। डाली तथा जेफरीज के अनुसार मध्यवर्ती परत बेसाल्ट की है, जबकि वेगनर तथा होम्स इसे एम्फीबोलाइट बताते हैं। परन्तु अधिकांश विद्वानों के अनुसार यह परत बेसाल्ट की ही बनी हुई है। इसकी मोटाई 20 से 30 किलोमीटर बताई जाती है, यद्यपि यह भी विवाद का विषय है।

   (3) निचली परत = P तथा S लहरें सबसे अधिक गहराई में प्रवेश करती हैं। इनमें P लहर 7.8 किलोमीटर तथा S लहर 4.5 किलामीटर प्रति सेकेण्ड की चाल से पृथ्वी के आन्तरिक भाग में प्रवाहित होती हैं। इसके आधार पर पृथ्वी में एक निचली परत का आभास होता है। सम्भवत: यह अधिक घनत्व वाली चट्‌टानों की बनी है। इसका निर्माण डूनाइट अथवा पेरिडोटाइट से हुआ है। धरातल से इनकी गहराई 2900 किलोमीटर बताई जाती है।     

P, S व L तरंगों का पथ एवं पृथ्वी की आंतरिक संरचना

- भूकम्प मूल की गहराई के आधार पर भूकम्पों को तीन वर्ग़ों में रखा जाता हैं:-

(1) सामान्य भूकम्प- 0-50 कि.मी.।

(2) मध्यवर्ती भूकम्प- 50-250 कि.मी.।

(3) गहरे या पातालीय भूकम्प- 250-700 कि.मी.।

- जिन संवेदनशील यंत्रों द्वारा भूकम्पीय तरंगों की तीव्रता मापी जाती है उन्हें ‘भूकम्प लेखी’ या ‘सीस्मोग्राफ’ (Seismograph) कहते हैं, इसके तीन स्केल (scale) हैं-

          1. रॉसी - फेरल स्केल (Rossy Feral Scale) : इसके मापक 1 से 11 रखे गए थे।

          2. मरकेली स्केल (Mercali Scale) : यह अनुभव प्रधान स्केल है। इसके 12 मापक हैं।

          3. रिक्टर स्केल (Richter Scale) : यह गणितीय मापक है, जिसकी तीव्रता 0 से 9 तक होती है और प्रत्येक बिन्दु दूसरे बिन्दु की तीव्रता का 10 गुना अधिक तीव्रता रखता है।

- समान भूकम्पीय तीव्रता वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा को ‘समभूकम्पीय रेखा’ या ‘भूकम्प समाघात रेखा’ (Isoseismal Lines) कहते हैं। एक ही समय पर आने वाले भूकम्पीय क्षेत्रों को मिलाने वाली रेखा होमोसीस्मल लाइन (Homoseismal Lines) कहलाती है।

भूकम्पों का विश्व वितरण : विश्व में भूकम्पों का वितरण उन्हीं क्षेत्रों से संबंधित है जो अपेक्षाकृत कमजोर तथा अव्यवस्थित हैं। भूकम्प के ऐसे क्षेत्र मोटे तौर पर दो विवर्तनिकी घटनाओं से संबंधित है-

(1) प्लेट के किनारों के सहारे तथा

(2) भ्रंशों के सहारे।

विश्व में भूकम्प की कुछ विस्तृत पेटियाँ इस प्रकार हैः-

          प्रशान्त महासागरीय तटीय पेटी (Circum Pacific Belt) : यह विश्व का सबसे विस्तृत भूकम्प क्षेत्र है जहाँ पर सम्पूर्ण विश्व के 63% भूकम्प आते हैं। इस क्षेत्र में चिली, कैलिफोर्निया, अलास्का, जापान, फिलीपींस, न्यूजीलैंड आदि आते हैं। यहाँ भूकम्प का सीधा संबंध भू-पर्पटी के चट्टानी संस्तरों में भंशन तथा ज्वालामुखी सक्रियता से है।

          मध्य महाद्वीपीय पेटी (Mid-continental Belt) : इस पेटी में विश्व के 21% भूकम्प आते हैं। इसमें आने वाले अधिकांश भूकम्प संतुलन मूलक तथा भंशमूलक हैं। यह पट्टी केपवर्डे से शुरू होकर अटलांटिक महासागर, भूमध्यसागर को पारकर आल्प्स, काकेशस, हिमालय जैसी नवीन पर्वत श्रेणियों से होते हुए दक्षिण की ओर मुड़ जाती है और दक्षिणी पूर्वी द्वीपों में जाकर प्रशान्त महासागरीय पेटी में मिल जाती है। भारत का भूकम्प क्षेत्र इसी पेटी के अन्तर्गत सम्मिलित किया जाता है।

          मध्य अटलांटिक पेटी (Mid-Atlantic Belt) : यह मध्य अटलांटिक कटक में स्पिटबर्जन तथा आइसलैंड (उत्तर) से लेकर बोवेट द्वीप (दक्षिण) तक विस्तृत है। इनमें सर्वाधिक भूकम्प भूमध्यरेखा के आसपास पाए जाते हैं।

     अन्य क्षेत्र : इसमें पूर्वी अफ्रीका की लंबी भू-भंश घाटी, अदन की खाड़ी से अरब सागर तक का क्षेत्र तथा हिन्द महासागर की भूकम्पीय पेटी सम्मिलित की जाती है।

सुनामी (Tsunami): स्यू-ना-मी जापानी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है तट पर आती समुद्री लहरें। ये बहुत लंबी व कम कंपन वाली समुद्री लहरें हैं जो महासागरीय भूकंपों के प्रभाव से महासागरों में उत्पन्न होती हैं। सुनामी लहरों के साथ जल की गति संपूर्ण गहराई तक होती है, इसलिए ये अधिक प्रलयकारी होती हैं। सुनामी लहरों की दृष्टि से प्रशांत महासागर सबसे खतरनाक स्थिति में है। महासागरीय प्लेटों के अभिसरण क्षेत्र में ये सर्वाधिक शक्तिशाली होती है। इंडोनेशिया के सुमात्रा द्वीप में 26 दिसंबर, 2004 को हिंद महासागर के तली के नीचे उत्पन्न सुनामी लहरें भारतीय प्लेट के बर्मी प्लेट के नीचे क्षेपण का परिणाम थी। भूकंप की तीव्रता रिक्टर स्केल पर 8.9 थी जिसके कारण प्रलयकारी सुनामी लहरों की उत्पत्ति हुई। इंडोनेशिया, मलेशिया, श्रीलंका व भारत समेत कुल 11 देश इन लहरों की चपेट में आए। भारत में तमिलनाडु का नागपट्टनम जिला सर्वाधिक प्रभावित क्षेत्रा था।

      भूकम्प से सम्बन्धित महत्त्वपूर्ण तथ्य -

      - समान भूकंपीय तीव्रता अर्थात् समान बर्बादी वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा को समभूकंप रेखा (Homoseismal Line) कहा जाता है।

      - समभूकंप रेखा का आकार प्रायः अनियमित होता है।

      - भूकंप का अध्ययन सिस्मोलॉजी तथा भूकंपीय तरंगों का आकलन करने वाला यंत्र सिस्मोग्राफ कहलाता है।

      - मरकेली मापक भूकंप की तीव्रता को मापने का एक यंत्र है। यह मापक गुणात्मक है तथा इंद्रियों द्वारा प्राप्त अनुभव, भूकंप द्वारा होने वाला विनाश आदि के आधार पर विकसित किया गया है।

      - रिक्टर स्केल भूकंप को मापने का एक यंत्र है। यह एक लोगारिथमिक स्केल हैं, जिसमें 1 से 9 तक की संख्याएँ होती हैं।

      - रिक्टर स्केल में प्रत्येक आगे की संख्या अपनी ठीक पीछे वाली संख्या के 10 गुने परिमाण को बताती है। यह स्केल भूकंप की ऊर्जा पर आधारित है।

      - अंतः सागरीय भूकंपों के कारण उत्पन्न समुद्री लहरों को सुनामी कहा जाता हैं।

      - प्लेटों का अपसरण, अभिसरण, आपसी रगड़, ज्वालामुखी, समस्थितिक समायोजन, भ्रंशन आदि भूकंप के कारण हैं।

      - भूकंप की व्याख्या के लिए एच.एफ रीड द्वारा प्रत्यास्थ पुनश्चलन सिद्धांत (Elastic rabound Theory) का प्रतिपादन किया गया है।