पृथ्वी की आंतरिक संरचना
स्वैस (Suess) का वर्गीकरण -
स्वैस की धारणा है कि पृथ्वी की ऊपरी परत तलछट (Sediments) से निर्मित है। इसमें परतदार शैलों की अधिकता पाई जाती है। इस परत की गहराई व घनत्व बहुत कम है। इस परत में पाई जाने वाली शैलों का औसत घनत्व 2.7 है। इसके निर्माण में सिलिका, फैल्सपार तथा अभ्रक के रवेदार कणों की अधिकता होती है। इसे स्वैस ने भू-पर्पटी (Crust) नाम दिया है। भूपर्पटी के नीचे उन्होंने पृथ्वी के आन्तरिक भाग को निम्नानुसार तीन परतों में विभाजित किया है-
1. सियाल (SIAL)
इस परत के निर्माण में सिलिका (Silica) व एल्युमीनियम (Alluminium) की अधिकता है। इस परत को SIAL कहते हैं। इस परत में शैलों का घनत्व 2.7 से 2.9 तक पाया जाता है। सियाल परत में ग्रेनाइट व नीस शैलें अधिक पाई जाती हैं। इन शैलों में अम्लीय (Acidic) तत्त्वों की अधिकता होती है। स्वैस के अनुसार महाद्वीपों का निर्माण इन्हीं शैलों से हुआ है। सियाल परत की गहराई 50 से 300 किलोमीटर तक अनुमानित की गई है।
2. सीमा (SIMA)
इस परत में सिलिका (Silica) तथा मैग्नीशियम (Magnesium) तत्त्वों की अधिकता होती है, इसी कारण इस परत का नाम सीमा SIMA रखा गया है। इस परत में बैसाल्ट व गैब्रो शैलों की प्रधानता पाई जाती है। इसमें शैलों का घनत्व 2.9 से 4.7 तक पाया जाता है। स्वैस के अनुसार यह परत महाद्वीपों के निचले भागों तक विस्तृत है तथा महासागरीय तली का निर्माण भी सीमा से ही हुआ है। स्वैस की मान्यता थी कि सियाल से निर्मित महाद्वीप सीमा पर तैर रहे हैं। ज्वालामुखी उद्गारों से लावा निकलता है। इस लावा का स्रोत सीमा परत को ही माना जाता है। यह परत एक हजार से दो हजार किलोमीटर की गहराई तक विस्तृत है।
3. निफे (NIFE)
इस परत की संरचना में निकल (Nickel) तथा लोहे (Ferrous) की अधिकता होती है। इसलिये इस परत को निफे (NIFE) कहा जाता है। इसकी संरचना में इन भारी खनिजों का मिश्रण पाया जाता है। अतः स्वैस ने इसका औसत घनत्व 11 से अधिक माना है। इस परत में चुम्बकीय गुण पाया जाता है। इसका घनत्व गहराई की ओर बढ़ता जाता है क्योंकि इसमें लोहे की अधिकता पाई जाती है। इस परत का विस्तार भूतल से नीचे दो हजार किलोमीटर से भू-केन्द्र तक है।
पृथ्वी की आन्तरिक संरचना भूकम्पीय तरंगों के आधार पर-
(i) भू-पर्पटी (Crust) - यह ठोस पृथ्वी का सबसे बाहरी भाग है। इसकी मोटाई महाद्वीपों व महासागरों के नीचे अलग-अलग है। महासागरों के नीचे इसकी औसत मोटाई 5 किमी. है जबकि महाद्वीपों के नीचे यह 30 किमी. तक (IUGG के अनुसार) है। मुख्य पर्वतीय शृंखलाओं के क्षेत्र में यह 70 से 100 किमी. मोटी है। भूकम्पीय लहरों की गति में अन्तर के आधार पर क्रस्ट को भी दो उपविभागों - ऊपरी क्रस्ट तथा निचली क्रस्ट में विभक्त किया जाता है। ऊपरी क्रस्ट में P लहर की गति 6.1 किमी.0 प्रति सेकण्ड तथा निचली क्रस्ट में 6.9 किमी. प्रति सैकण्ड होती है। ऊपरी क्रस्ट का घनत्व 2.8 तथा निचली क्रस्ट का 3.0 है। घनत्व में यह अंतर दबाव के कारण माना जाता है। ऊपरी क्रस्ट एवं निचले क्रस्ट के बीच घनत्व संबंधी यह असंबद्धता ‘कोनार्ड असंबद्धता’ कहलाती है।
(ii) मैंटल (Mantle) - क्रस्ट के निचले आधार पर भूकम्पीय लहरों की गति में अचानक वृद्धि हो जाती है। निचली क्रस्ट में P की 6.9 किमी. प्रति सैकेण्ड की गति बढ़कर 7.9 किमी. से 8.1 किमी. प्रति सेकेण्ड हो जाती है। इस तरह निचली क्रस्ट तथा ऊपरी मैंटल के मध्य एक असम्बद्धता (Discountinuity) का सृजन होता है जिसकी खोज सर्वप्रथम ए. मोहोरोविकिक द्वारों 1909 में की गई। अतः इसे मोहो असम्बद्धता (Moho-discontinuity) कहते हैं। मोहो असम्बद्धता से लगभग 2900 किमी. की गहराई तक मैंटल का विस्तार है। जो आयतन की दृष्टि से पृथ्वी के कुल आयतन (Volume) का 83% एवं द्रव्यमान (Mass) का 68% है। UCG ने भूकम्पीय लहरों की गति के आधार पर मैंटल को तीन भागों में विभक्त किया है- (i) मोहो असम्बद्धता से 200 किमी. की गहराई का भाग, (ii) 200 से 700 किमी. एवं (iii) 700 से 2900 किमी. की गहराई का भाग। ऊपरी मेंटल में 100 से 200 किमी. की गहराई में भूकंपीय लहरों की गति मंद पड़ जाती है एवं यह 7.8 किमी. प्रति सैकण्ड मिलती है। अतः इस भाग को ‘निम्न गति का मंडल (Zone of Low Veocity) कहा जाता है। ज्ञातव्य है कि ऊपरी मैंटल एवं निचले मैंटल के बीच घनत्व संबंधी असंबद्धता को रेपेटी असंबद्धता कहते हैं।
(iii) क्रोडे (Core) - पृथ्वी के क्रोड का विस्तार 2900 किमी. से 6371 किमी. अर्थात् पृथ्वी के केन्द्र तक है। निचले मैंटल के आधार पर 'P' तरंगों की गति में अचानक वृद्धि होती है और यह 13.6 किमी. प्रति सैकण्ड हो जाती है। ध्यातव्य है कि गति में यह वृद्धि चट्टानों के घनत्व में एकाएक परिवर्तन (5.5 से 10.0) को दर्शाता है जिससे एक प्रकार की असंबद्धता उत्पन्न होती है। इसे ‘गुटेनबर्ग-विसार्ट असंबद्धता’ कहते हैं।
गुटेनबर्ग-असम्बद्धता से लेकर पृथ्वी के केन्द्र तक के भाग को दो उपभागों में विभक्त किया गया है-
(i) बाह्य क्रोड (Outer Core)
(ii) आन्तरिक क्रोड (Inner Core)
बाह्य क्रोड का विस्तार 2900 किमी. से 5150 किमी. की गहराई के बीच है। इस मण्डल में भूकम्पीय S लहरें प्रविष्ट नहीं हो पाती है, अतः इस मण्डल को तरल अवस्था में होना चाहिए। 5150 से 6371 किमी. की गहराई तक का भाग आन्तरिक क्रोड के अन्तर्गत आता है जो ठोस अथवा प्लास्टिक अवस्था में है एवं घनत्व 13.6 है। यहाँ P लहरों की गति 11.23 किमी. प्रति सैकण्ड होती है। ज्ञातव्य है कि बाह्य क्रोड (10) एवं आन्तरिक क्रोड (13.6) के बीच पायी जाने वाली घनत्व सम्बन्धी असम्बद्धता को ‘लैहमेन’-असम्बद्धता’ की संज्ञा से अभिहित किया जाता है। दृष्टव्य है कि क्रोड का आयतन पूरी पृथ्वी का मात्र 16% है परंतु इसका द्रव्यमान पृथ्वी के कुल द्रव्यमान का लगभग 32% है। क्रोड के आंतरिक भागों का निर्माण मुख्य रूप से निकल और लोहे से हुआ है।
पृथ्वी की आंतरिक शक्तियाँ
भूकम्प
भूकम्प भू-पृष्ठ पर होनेवाला आकस्मिक कंपन है जो भूगर्भ में चट्टानों के लचीलेपन या समस्थिति के कारण होने वाले समायोजन का परिणाम होता है। यह प्राकृतिक व मानवीय दोनों ही कारणों से हो सकता है। भूकंप आने के पहले वायुमंडल में ‘रेडॉन’ गैसों की मात्रा में वृद्धि हो जाती है। अतः इस गैस की मात्रा में वृद्धि का होना उस प्रदेश विशेष में भूकंप आने का संकेत होता है।
जिस जगह से भूकंपीय तरंगें उत्पन्न होती हैं उसे ‘भूकंप मूल’ (Focus) कहते हैं तथा जहाँ सबसे पहले भूकंपीय लहरों का अनुभव किया जाता है उसे भूकंप अधिकेन्द्र (Epi Centre) कहते हैं। यह भूकंप मूल के ठीक ऊपर भू-पर्पटी पर स्थित होता है।
भूकंप के इस दौरान जो ऊर्जा भूकम्प मूल से निकलती है, उसे ‘प्रत्यास्थ ऊर्जा’ (Elastic Energy) कहते हैं। भूकंप के दौरान कई प्रकार की भूकंपीय तरंगें (Seismic Waves) उत्पन्न होती हैं जिन्हें तीन श्रेणियों में रखा जा सकता हैः-
(i) प्राथमिक अथवा लम्बात्मक तरंगें (Primary or Longitudinal Waves) : इन्हें 'P' तरंगें भी कहा जाता है। ये अनुदैर्ध्य तरंगें हैं एवं ध्वनि तरंगों की भाँति चलती हैं। तीनों भूकंपीय लहरों में सर्वाधिक तीव्र गति इसी की होती है। यह ठोस के साथ-साथ तरल माध्यम में भी चल सकती है, यद्यपि ठोस की तुलना में तरल माध्यम में इसकी गति मंद हो जाती है। 'S' तरंगों की तुलना में इसकी गति 40% अधिक होती है।
(ii) अनुप्रस्थ अथवा गौण तरंगें (Secondary or Transverse Waves) इन्हें 'S' तरंगें भी कहा जाता है। ये प्रकाश तरंगों की भाँति चलती हैं। ये सिर्फ ठोस माध्यम में ही चल सकती है, तरल माध्यम में प्रायः लुप्त हो जाती है। चूंकि ये पृथ्वी के क्रोड से गुजर नहीं पाती, अतः 'S' तरंगों से पृथ्वी के क्रोड के तरल होने के संबंध में अनुमान लगाया जाता है।
(iii) धरातलीय तरंगें (Surface or Long Period Waves) : इन्हें 'L' तरंगें भी कहा जाता है। ये पृथ्वी के ऊपरी भाग को ही प्रभावित करती है। ये अत्यधिक प्रभावशाली तरंगें हैं एवं सबसे अधिक लंबा मार्ग तय करती है। यद्यपि इनकी गति काफी धीमी होती है और यह सबसे देर में पहुँचती है परंतु इनका प्रभाव सबसे विनाशकारी होता है।
P, S व L तरंगों का पथ एवं पृथ्वी की आंतरिक संरचना
भूकम्पमूल की गहराई के आधार पर भूकम्पों को तीन वर्ग़ों में रखा जाता हैः (1) सामान्य भूकम्प- 0-50 कि.मी. (2) मध्यवर्ती भूकम्प- 50-250 कि.मी. (3) गहरे या पातालीय भूकम्प- 250-700 कि.मी.। जिन संवेदनशील यंत्रों द्वारा भूकम्पीय तरंगों की तीव्रता मापी जाती है उन्हें ‘भूकम्प लेखी’ या ‘सीस्मोग्राफ’ (Seismograph) कहते हैं, इसके तीन स्केल (Scale) हैं-
1. रॉसी - फेरल स्केल (Rossy Feral Scale) : इसके मापक 1 से 11 रखे गए थे।
2. मरकेली स्केल (Mercall Scale) : यह अनुभव प्रधान स्केल है। इसके 12 मापक हैं।
3. रिक्टर स्केल (Richter Scale) : यह गणितीय मापक है, जिसकी तीव्रता 0 से 9 तक होती है और प्रत्येक बिन्दु, दूसरे बिन्दु की तीव्रता का 10 गुना अधिक तीव्रता रखता है।
समान भूकम्पीय तीव्रता वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा को ‘समभूकम्पीय रेखा’ या ‘भूकम्प समाघात रेखा’ (Isoseismal Lines) कहते हैं। एक ही समय पर आने वाले भूकम्पीय क्षेत्रों को मिलाने वाली रेखा होमोसीस्मल लाइन (Homoseismal Lines) कहलाती है।
भूकम्पों का विश्व वितरण : विश्व में भूकम्पों का वितरण उन्हीं क्षेत्रों से संबंधित है जो अपेक्षाकृत कमजोर तथा अव्यवस्थित हैं। भूकम्प के ऐसे क्षेत्र मोटे तौर पर दो विवर्तनिकी घटनाओं से संबंधित है-
(1) प्लेट के किनारों के सहारे तथा (2) भ्रंशों के सहारे।
विश्व में भूकम्प की कुछ विस्तृत पेटियाँ इस प्रकार हैः
प्रशान्त महासागरीय तटीय पेटी (Circum Pacific Belt) : यह विश्व का सबसे विस्तृत भूकम्प क्षेत्र है जहाँ पर सम्पूर्ण विश्व के 63% भूकम्प आते हैं। इस क्षेत्र में चिली, कैलिफोर्निया, अलास्का, जापान, फिलीपींस, न्यूजीलैंड आदि आते हैं। यहाँ भूकम्प का सीधा संबंध भू-पर्पटी के चट्टानी संस्तरों में भ्रंशन तथा ज्वालामुखी सक्रियता से है।
मध्य महाद्वीपीय पेटी (Mid-continental Belt) : इस पेटी में विश्व के 21% भूकम्प आते हैं। इसमें आने वाले अधिकांश भूकम्प संतुलनमूलक तथा भ्रंशमूलक हैं। यह पट्टी केपवर्डे से शुरू होकर अटलांटिक महासागर, भूमध्यसागर को पारकर आल्प्स, काकेशस, हिमालय जैसी नवीन पर्वतश्रेणियों से होते हुए दक्षिण की ओर मुड़ जाती है और दक्षिणी पूर्वी द्वीपों में जाकर प्रशान्त महासागरीय पेटी में मिल जाती है। भारत का भूकम्प क्षेत्र इसी पेटी के अन्तर्गत सम्मिलित किया जाता है।
मध्य अटलांटिक पेटी (Mid-Atlantic Belt) : यह मध्य अटलांटिक कटक में स्पिटबर्जन तथा आइसलैंड (उत्तर) से लेकर बोवेट द्वीप (दक्षिण) तक विस्तृत है। इनमें सर्वाधिक भूकम्प भूमध्यरेखा के आसपास पाये जाते हैं।
अन्य क्षेत्र : इसमें पूर्वी अफ्रीका की लंबी भू-भ्रंश घाटी, अदन की खाड़ी से अरब सागर तक का क्षेत्र तथा हिन्द महासागर की भूकम्पीय पेटी सम्मिलित की जाती है।
सुनामी (Tsunami) : स्यू-ना-मी जापानी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है तट पर आती समुद्री लहरें। ये बहुत लंबी व कम कंपन वाली समुद्री लहरें हैं जो महासागरीय भूकंपों के प्रभाव से महासागरों में उत्पन्न होती हैं। सुनामी लहरों के साथ जल की गति संपूर्ण गहराई तक होती है, इसलिए ये अधिक प्रलयकारी होती हैं। सुनामी लहरों की दृष्टि से प्रशांत महासागर सबसे खतरनाक स्थिति में है। महासागरीय प्लेटों के अभिसरण क्षेत्रों में ये सर्वाधिक शक्तिशाली होती है। इंडोनेशिया के सुमात्रा द्वीप में 26 दिसंबर, 2004 को हिंद महासागर के तली के नीचे उत्पन्न सुनामी लहरें भारतीय प्लेट के बर्मी प्लेट के नीचे क्षेपण का परिणाम थी। भूकंप की तीव्रता रिक्टर स्केल पर 8.9 थी जिसके कारण प्रलयकारी सुनामी लहरों की उत्पत्ति हुई। इंडोनेशिया, मलेशिया, श्रीलंका व भारत समेत कुल 11 देश इन लहरों की चपेट में आए। भारत में तमिलनाडु का नागपट्टनम जिला सर्वाधिक प्रभावित क्षेत्र था।
भूकम्प से सम्बन्धित महत्वपूर्ण तथ्य -
- समान भूकंपीय तीव्रता अर्थात् समान बर्बादी वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा को समभूकंप रेखा (Homoseismal Line) कहा जाता है।
- समभूकंप रेखा का आकार प्रायः अनियमित होता है।
- भूकंप का अध्ययन सिस्मोलॉजी तथा भूकंपीय तरंगों का आकलन करने वाला यंत्र सिस्मोग्राफ कहलाता है।
- मरकेली मापक भूकंप की तीव्रता को मापने का एक यंत्र है। यह मापक गुणात्मक है तथा इंद्रियों द्वारा प्राप्त अनुभव, भूकंप द्वारा होने वाला विनाश आदि के आधार पर विकसित किया गया है।
- रिक्टर स्केल भूकंप को मापने का एक यंत्र है। यह एक लोगारिथमिक स्केल हैं, जिसमें 1 से 9 तक की संख्याएं होती हैं।
- रिक्टर स्केल में प्रत्येक आगे की संख्या अपनी ठीक पीछे वाली संख्या के 10 गुने परिमाण को बताती हैं। यह स्केल भूकंप की ऊर्जा पर आधारित है।
- अंतः सागरीय भूकंपों के कारण उत्पन्न समुद्री लहरों को सुनामी कहा जाता हैं।
- प्लेटों का अपसरण, अभिसरण, आपसी रगड़, ज्वालामुखी, समस्थितिक समायोजन, भ्रंशन आदि भूकंप के कारण हैं।
- भूकंप की व्याख्या के लिए एच.एफ रीड द्वारा प्रत्यास्थ पुनश्चलन सिद्धांत (Elastic rabound Theory) का प्रतिपादन किया गया है।
ज्वालामुखी
- ज्वालामुखी उद्गार के फलस्वरूप निकलने वाले पदार्थ़ों में ठोस एवं तरल पदार्थ़ों के अलावा हाइड्रोजन, ऑक्सीजन, कार्बन डाइऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड जैसी गैसें भी सम्मिलित होती हैं।
- ज्वालामुखी लावा दो प्रकार का होता है-
1. अम्लीय लावा
2. क्षारीय लावा
- ऐसा लावा जिसमें सिलिका की मात्रा अधिक होती है, अम्लीय लावा कहलाता है। अम्लीय लावा की तुलना में क्षारीय लावा पतला होता है।
- ज्वालामुखी लावा के झाग से बनने वाले हल्के एवं छिद्रदार शिलाखंडों को प्यूमिस कहा जाता है तथा ज्वालामुखी धूल, राख आदि के जमा होने से जो चट्टान बनती है, उसे टफ कहा जाता है।
- हवाई तुल्य ज्वालामुखी में उद्गार कम विस्फोटक होता है, जबकि पीलियन तुल्य ज्वालामुखी में उद्गार सर्वाधिक विस्फोटक रूप में होता है।
ज्वालामुखी के प्रकार
1. सक्रिय ज्वालामुखी
2. सुप्त ज्वालामुखी
3. मृत ज्वालामुखी
1. सक्रिय ज्वालामुखी (Active Volcano)
- जिस ज्वालामुखी से लावा, गैस आदि निरंतर निकलते रहते हैं उन्हें सक्रिय या जाग्रत ज्वालामुखी कहा जाता है। जैसे हवाई द्वीप का मोनालोआ, सिसली (इटली) का एटना, भारत का बैरन द्वीप, इक्वेडोर का कोटोपैक्सी (सबसे ऊँचा सक्रिय ज्वालामुखी) आदि।
- भू-मध्यसागर में स्थित स्ट्राम्बोली ज्वालामुखी से सदैव प्रज्ज्वलित गैसें बाहर निकलती रहती हैं, अतः इसे भू-मध्यसागर का प्रकाश स्तंभ कहा जाता है।
2. सुसुप्त ज्वालामुखी (Dormant Volcano)
- वैसे ज्वालामुखी जो उद्गार के बाद शांत पड़ जाते हैं, परंतु इनमें कभी भी उद्गार हो सकता है, सुप्त ज्वालामुखी कहलाते हैं। जैसे इंडोनेशिया का क्राकातोआ, जापान का फ्यूजीयामा, इटली का विसुवियस आदि।
3. मृत ज्वालामुखी (Extinct Volcano)
- वैसे ज्वालामुखी जिनमें भू-गर्भिक इतिहास के अनुसार काफी लंबे समय से पुनः उद्गार नहीं हुआ है, मृत ज्वालामुखी कहलाते हैं। जैसे- म्यांमार का पोपा ज्वालामुखी, अफ्रीका का किलिमंजारो, ईरान का देमबंद एवं कोह सुल्तान।
ज्वालामुखी से संबंधित शब्दावली
- क्रेटर ज्वालामुखी के शीर्ष पर स्थित कीप के आकार के गर्त्त को क्रेटर कहा जाता है।
- कॉल्डेरा क्रेटर का विस्तृत रूप कॉल्डेरा कहलाता है। क्रेटर एवं कॉल्डेरा में जल के भर जाने से यह झील में परिवर्तित हो जाता है।
- इंडोनेशिया की टोबा, अमेरिका की ओरोगन, राजस्थान की पुष्कर, महाराष्ट्र की लोनार आदि कॉल्डेरा झील के उदाहरण हैं।
- ऐरा कॉल्डेरा जापान में एवं वेलिस कॉल्डेरा अमेरिका में स्थित हैं।
- सोल्फतारा जब ज्वालामुखी से राख, लावा आदि का निकलना बंद हो जाता है एवं उसके बाद भी लंबे समय तक उससे विभिन्न प्रकार की गैसें तथा वाष्प निकलती रहती हैं तो यह अवस्था सोल्फतारा कहलाती है।
- घुँआरे (गंधकीय धुँआ) का विस्तृत क्षेत्र अलास्का में कटमई ज्वालामुखी के समीप स्थित है, जिसे ‘दस हजार घुँआरे की घाटी’ कहा जाता है।
- गेसर घुँआरे गर्म जल का एक ऐसा प्राकृतिक स्रोत जिससे समय-समय पर गर्म जल तथा जलवाष्प फव्वारे के रूप में निकलता रहता है, गेसर कहलाता है।
- अमेरिका (येलोस्टोन पार्क), आइसलैंड (ग्रेंड गेसर) एवं न्यूजीलैंड में गेसर के उदाहरण देखने को मिलते हैं।
- गर्म झरना एक ऐसा झरना जिससे गर्म जल निरंतर निकलता रहता है गर्म झरना कहलाता है।
- गर्म झरना मुख्यतः ज्वालामुखी क्षेत्रों में पाए जाते हैं। भारत में मुंगेर, जगीर, हजारीबाग में भी ये पाए जाते हैं।
- जहाँ ज्वालामुखी का नामोनिशान नहीं पाया जाता है। इसका कारण चट्टानों में रेडियो सक्रिय पदार्थों की उपस्थिति है।
- विश्व में सर्वाधिक ज्वालामुखी (लगभग दो-तिहाई) परि-प्रशांत पेटी में पाए जाते हैं, जिसे प्रशांत महासागर की अग्नि शृंखला भी कहा जाता है।
- ये ज्वालामुखी प्लेटों के अभिसरण क्षेत्र में स्थित हैं।
- चिली का एकांकगुआ मैक्सिको का पापोकैटपेटल, जापान का फ्यूजीयामा, अमेरिका का शास्ता, रेनियर एवं हुड, फिलीपींस का मेयॉन तथा माउंट ताल आदि इस पेटी के प्रमुख ज्वालामुखी पर्वत हैं।
- परिप्रशांत पेटी के अलावा ज्वालामुखी पर्वत मुख्यतः हिमालय को छोड़कर शेष नवीन मोड़दार पर्वतों, सागरों के मध्यवर्ती भाग एवं भ्रंश घाटियों में पाए जाते हैं।
- स्ट्राम्बोली, विसुवियस, एटना, देमबन्द, कोह सुल्तान, एलबुर्ज (काकेशस), अरारात (अर्मीनिया), क्राकातोआ आदि ज्वालामुखी पर्वत मध्य महाद्वीपीय पेटी में स्थित हैं, जिसका विस्तार केनारी द्वीप के निकट से लेकर इंडोनेशिया तक है।
- अफ्रीका के कीनिया एवं किलिमंजारो जैसे ज्वालामुखी पर्वत दरार घाटी में स्थित हैं।
- आइसलैंड, एजोर्स, सेंट हेलेना आदि अटलांटिक महासागर के मध्य महासागरीय कटक पर स्थित हैं।
- हवाई द्वीप के ज्वालामुखी प्लेट के मध्यवर्ती भाग में स्थित हैं, जिनकी उत्पत्ति का कारण गर्म स्थल (Hot Spot) हैं।
- भारत में ज्वालामुखी क्रिया के प्राचीनतम प्रमाण झारखंड के डालमा क्षेत्र में पाए जाते हैं।
- जुरैसिक काल में राजमहल के पहाड़ी क्षेत्र एवं क्रिटेशस काल में दक्कन के पठार पर ज्वालामुखी क्रिया काफी वृहत पैमाने पर हुई।
वेगनर का महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धान्त
(Wegener' s Theory of Continental Drift)
प्रोफेसर अल्फ्रेड वेगनर (Alfred Wegener) एक जर्मन विद्वान थे जिन्होंने सन् 1912 मे महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धान्त का प्रतिपादन किया तथा सन् 1924 मे इसका संशोधित रूप प्रस्तुत किया। वेगनर ने अटलांटिक महासागर के पूर्वी और पश्चिमी तटों के बीच अद्भूत समानता देखी । उसने स्पष्ट किया कि दक्षिणी अमेरिका मे ब्राजील का उभार अफ्रीका की गिनी की खाड़ी मे भली भाँति सटाया जा सकता है। इसी प्रकार उत्तरी अमेरिका के पूर्वी तट का सम्बन्ध पश्चिमी यूरोप के तट के साथ जोड़ा जा सकता है। पूर्वी अफ्रीका मे इथोपिया तथा इरीटीरिया का उभार पश्चिमी भारत तथा पाकिस्तान की तट रेखा से संयुक्त किया जा सकता है। आस्ट्रेलिया बंगाल की खाड़ी मे जुड़ सकता है। वेगनर ने इसे साम्य स्थापना(Jigsaw Fit) का नाम दिया।
साम्य स्थापना सिद्धांत को स्पष्ट करने के लिए वेगनर ने यह मान लिया कि कार्बनीफेरस युग मे सभी भाग एक बड़े स्थल भाग के रूप मे एक दूसरे से जुड़े हुए थे। इस विशाल स्थलीय भाग को वेगनर ने पैंजिया(Pangaea) का नाम दिया। पैंजिया के चारों ओर एक विशाल महासागर था। जिसे पैन्थालासा (Panthalasa) का नाम दिया गया। पैंजिया के उत्तरी भाग मे उत्तरी अमेरिका यूरोप तथा एशिया थे जिन्हे संयुक्त रूप से लारेशिया (Panthalasa) कहा जाता है। पैंजिया के दक्षिणी भाग मे दक्षिणी अमेरिका अफ्रीका प्रायद्वीपीय भारत, ऑस्ट्रेलिया तथा अण्टार्कटिक महाद्वीप थे जिन्हें गौंडवानालैड(Gondwanaland) कहा जाता है। इन दोनों स्थलीय भागों के बीच एक उथला एवं संकीर्ण महासागर था जिसे टेथिस सागर (Tethys sea) कहते हैं।
वेगनर का विचार है कि पैंजिया के कुछ भाग भूमध्य रेखा की ओर खिसकने लगे जबकि कुछ अन्य भाग पश्चिमी दिशा मे विस्थापित होने लगे। यह प्रक्रिया आज से लगभग 30 करोड़ वर्ष पूर्व अन्तिम कार्बनीफेरस युग मे आरम्भ हुई। इसके बाद पैंजिया का टूटना आरम्भ हो गया । उत्तर मे स्थित लारेशिया तथा दक्षिण में स्थित गौंडवानालैड एक दूसरे के निकट आ गए और टेथिस सागर का आकार छोटा हो गया। प्रायद्वीपीय भारत ने भी उत्तर की ओर खिसकाना शुरू कर दिया इससे टेथिस सागर मे निक्षेपित अवसाद मे वलन पड़ गए और हिमालय तथा आल्प्स पर्वतों का निर्माण हुआ। लगभग 15 करोड़ वर्ष पूर्व इयोसीन युग मे उत्तरी तथा दक्षिणी अमेरिका के पश्चिमी दिशा में खिसकने से अटलांटिक महासागर बना और यह लगभग 1000 कि.मी. चौड़ा हो गया। उत्तरी तथा दक्षिणी अमेरिका के पश्चिम की ओर विस्थापित हो जाने से इन महाद्वीपों के पश्चिमी किनारे में वलन पड़ गए और रॉकी तथा एण्डीज पर्वतमालाओं का निर्माण हुआ। लगभग 5-6 करोड़ वर्ष पूर्व प्लीस्टोसीन युग में महाद्वीपों ने वर्तमान स्थिति से लगभग मिलता-जुलता आकार धारण किया।
महाद्वीप संचलन के प्रमाण
(Evidence of Movement of Continents)
वेगनर ने अपने महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत के पक्ष में कई प्रमाण एकत्रित किए। कुछ महत्वपूर्ण प्रमाणों का संक्षिप्त विवरण नीचे दिया गया है :
1. पर्वत पट्टी :- भू-वैज्ञानिक क्रियाओं के फलस्वरूप 47 करोड़ से 35 करोड़ वर्ष पुरानी पट्टी का निर्माण एक अविच्छिन्न कटिबन्ध के रूप में हुआ था। ये पर्वत अब अटलांटिक महासागर द्वारा पृथक् कर दिए गए हैं।
2. जीवाश्म :- वेगनर ने अपने महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत को जीवाश्मों के वितरण के आधार पर स्पष्ट करने का प्रयास किया। उदाहरणतया, ग्लोसोप्टैरिस नामक पौधे तथा मैसोसौरस एवं लिस्ट्रोसौरस नामक जंतुओं के जीवाश्म भारत,ऑस्ट्रेलिया, दक्षिणी अफ्रीका, दक्षिणी अमेरिका, फॉकलैण्ड द्वीप, अण्टार्कटिक महाद्वीप आदि में पाए जाते हैं। वर्तमान समय में ये सभी प्रदेश एक-दूसरे से बहुत दूर हैं और इस प्रकार का वितरण महाद्वीपों के विस्थापन द्वारा ही स्पष्ट हो सकता है।
3. भू-वैज्ञानिक अनुरूपता :- अफ्रीका के घाना तट पर नदी जलोढ़ में स्वर्ण निक्षेपों की उपस्थिति तथा उसी क्षेत्रों में इन निक्षेपों की उद्गम शैलों की अनुपस्थिति एक महत्वपूर्ण तथ्य है। लगभग 5,000 कि.मी. चौड़े अटलांटिक महासागर के पार दक्षिणी अमेरिका में ब्राजील के बेलेन साओ में स्वर्ण-युक्त शिराओं वाले शैल मिलते हैं, परंतु निकटवर्ती तटीय पट्टी के जलोढ़ में सोने के निक्षेप नहीं हैं। इतने दूर स्थित क्षेत्रों में इतनी समानताएँ महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत के अनुरूप हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि दक्षिणी अमेरिका तथा अफ्रीका पैंजिया के भाग थे, जो बाद में एक-दूसरे से दूर चले गए। इस तथ्य की पुष्टि अफ्रीका तथा दक्षिणी अमेरिका के मानचित्रों को एक साथ व्यवस्थित करके की जा सकती है ब्राजील में सोनायुक्त अवसाद ढाल के नीचे परिवाहित करके लाया गया और मिट्टी में जमा किया गया। यह पट्टी वर्तमान घाना तट है।
4. पुराजलवायवी एकरूपता- पुराजलवायु का अर्थ पृथ्वी के भू-गर्भिक इतिहास के किसी प्राचीन काल मे पाई जाने वाली जलवायु है। पर्मोकार्बनी काल के मोटे हिमानी निक्षेप उरुग्वे ब्राजील, अफ्रीका, दक्षिणी भारत, दक्षिणी ऑस्ट्रेलिया तथा तस्मानिया में दिखाई देते हैं इन अवसादों की प्रकृति मे एकरूपता पाई जाती है जिससे यह सिद्ध होता है की भू वैज्ञानिक अतीत काल मे ये समस्त महाद्वीप देश एक दूसरे से जुड़े हुए थे और इनमे एक जैसी जलवायु पाई जाती है। आज ये भू -भाग भिन्न - भिन्न जलवायु क्षेत्रों - उष्णकटिबंधीय से शीतोष्ण मे स्थित हैं और बड़े बड़े महासागरों द्वारा एक दूसरे से पृथक् किए गए है।
5. प्रवाल- प्रवाल एक प्रकार की कैल्सियम युक्त चट्टान है जो पोलिप नामक सूक्ष्म समुद्री जीव के अस्थिपंजर से बनती है । ये लगभग 200 से. मी. से तापमान वाले गर्म जल से पनपते हैं। अतः ये मुख्यतः 30° उत्तर तथा 30° दक्षिण अक्षांशों के बीच ही रहते हैं। इस क्षेत्रों से बाहर के महाद्वीपों पर प्रवालों को पाया जाना इस बात का ठोस प्रमाण है कि प्राचीन भू वैज्ञानिक काल मे ये महाद्वीप भूमध्य रेखा के निकट स्थित थे। महाद्वीपो का संचालन उत्तर दिशा की ओर हुआ है जिस कारण ये प्रवाल वर्तमान शीत एवं उष्ण जलवायु का अनुभव करते हैं।
6. ध्रुवों का घूमना (Polar Wandering) पुरा चुम्बत्कव भू वैज्ञानिक प्राचीन काल मे पृथ्वी का चुम्बकत्व से हमे महाद्वीपों के पैंजिया के रूप मे एक दूसरे से जुड़े होने का सबसे शक्तिशाली प्रमाण मिला है मैग्मा, लावा, तथा असंगत अवसाद ने उपस्थित चुम्बकीय प्रवृति वाले खनिज जैसे मेग्नेटाइट, हमेटाइट, इल्मेनाइट, तथा पाइरोटाइट इसी प्रवृति के कारण उस समय के चुंबकीय क्षेत्रों के समानान्तर एकत्रित हो गए। यह गुण शैलों मे स्थायी चुम्बकत्व के रूप मे अभिलेखित किया जाता है । इसे ध्रुवों का घूमना कहते हैं।
धुवों का घूमना यह सिद्ध करता है कि महाद्वीपों का समय समय पर संचालन होता रहा है और वे अपनी गति की दिशा भी बदलते रहे है।
समुद्र अधस्थल का विस्तार (Sea Floor Spreading) महाद्वीपों का वर्तमान स्वरूप पैंजिया के विघटन से पिछले 65 करोड़ वर्षों मे हुआ महाद्वीपों का विस्थापन अब भी जारी है । महासागर अधस्थलों के मध्य स्थित कटक लावा निष्कासन मे सक्रिय हैं । ये मध्यवर्तीय महासागरीय कटक महासागर के अधस्तल पर स्थित दरारें हैं। जहाँ पर पिघले शैल बाहर निकल कर नवीन भू-पर्पटी का निर्माण करते रहे हैं। कटकों से बाहर की ओर भू-पर्पटी का विस्तार होता जाता हैं और महासागरों द्रोणी चौड़ी होती जाती हैं इसे समुद्र अधस्थल विस्तार कहते हैं।
अधस्थल विस्तार की तीन अवस्थाएँ थी। सबसे पहले भू-पर्पटी मे उत्थान होता है और इसमे खिंचाव पैदा होता है। इसके पश्चात् एक लम्बी रिफ्ट घाटी का निर्माण होता है। यह दरार अधस्थल के मध्य मे होती है और इसमे मैटल से मैग्मा निरंतर भरता रहता है । यह मैग्मा ठोस रूप धारण करता है और रिफ्ट घाटी के तल में एक नए अधस्थल का निर्माण होता हैं । अधस्थल के खण्ड कई भ्रंशो के तल के साथ नीचे की ओर खिसकते हैं और ब्लॉक पर्वत का निर्माण होता है ज्यों -ज्यों अधस्थल का विस्तार होता जाता है त्यों-त्यों एक नए सागर का निर्माण होता जाता है।अधस्थल का विस्तार तब तक होता रहता है जब तक एक विशाल महासागर का निर्माण नहीं हो जाता और महाद्वीप एक दूसरे से बहुत दूर नहीं चले जाते हैं।
समुद्र अधस्थल के विस्तार से अटलांटिक महासागर की चौड़ाई प्रतिवर्ष कई से. मी. की दर से बढ़ रही है, जबकि प्रशांत महासागर छोटा हो रहा है । लाल सागर भू-पर्पटी मे एक दरार का भाग है, जो भविष्य मे करोड़ों वर्ष पश्चात् एक नए सागर की रचना करेगा । दक्षिणी अटलांटिक महासागर के चौड़ा होने से अफ्रीका तथा दक्षिणी अमेरिका एक दूसरे से दूर हो गए हैं।
पृथ्वी का बाहरी भाग दृढ़ खण्डों का बना हुआ है ।इन दृढ़ खण्डों को प्लेटे कहते हैं । पृथ्वी का स्थलमण्डल कई प्लेटों मे बँटा हुआ हैं। किसी भी प्लेट की पर्पटी महाद्वीपीय महासागरीय अथवा दोनों ही प्रकार की हो सकती है। सभी प्लेटें स्वतन्त्र रूप मे पृथ्वी के दुर्बलतामण्डल(Asthenosphere) पर भिन्न - भिन्न दिशाओं मे भ्रमण करती हैं। इनके भ्रमण के लिए ऊर्जा पृथ्वी के आन्तरिक भागों मे ऊष्मा की भिन्नता के कारण उत्पन्न होने वाली संवहन धाराओं से प्राप्त होती है ।
प्लेटों की गति (Movements the plates)- प्लेटों मे तीन प्रकार की गति होती हैं।
1. दो प्लेट एक दूसरे के पास से ट्रांसफॉर्म भ्रंश (Transform Fault) के साथ क्षैतिज दिशा मे आगे बढ़ती है। जिस किनारे के साथ - साथ ये आगे बढ़ती हैं उसे ट्रासफॉर्म (Transform Boundary) कहते हैं। इन किनारों पर बहुत से भूकम्प आते हैं।
2. कुछ प्लेटे एक दूसरे के निकट आती हैं। और आपस मे टकराती हैं । ऐसी प्लेटों को अभिसरण प्लेट (Converging Plates) कहते हैं। इन दो प्लेटों के बीच वाले किनारे को अभिसरण किनारा कहते है । जब एक महासागरीय प्लेट किसी महाद्वीपीय प्लेट से टकराती है तो महासागरीय प्लेट भारी होने के कारण महाद्वीपीय हल्की प्लेट के नीचे धँस जाती है। अधिक गहराई पर जाने से इसका कुछ भाग पिघल जाता है। और यह मैटल मे विलीन हो जाती है इसे प्रविष्ठन कहते हैं। ऊपर की चट्टानों के दबाब के कारण भी ऊष्मा पैदा होती है। जिसमे धँसी हुई प्लेटें पिघल जाती है। पिघला हुआ मैग्मा महाद्वीपीय किनारे के निकट ऊपर को उठता है जिससे ज्वालामुखी पर्वतों का निर्माण होता है दूसरे विकल्प के रूप मे एक खाई बन जाती है। पेरु की खाई, नाजका (Nazca) महासागरीय प्लेट तथा दक्षिणी अमेरिकी महाद्वीपीय प्लेट के टकराव का परिणाम है। जब दो प्लेटें एक दूसरे के निकट आती हैं और कोई भी प्लेट नीचे नहीं धँसती तो उनके बीच स्थित अवसाद में उत्थान की प्रक्रिया शुरू होती है। और पर्वतों का निर्माण होता हैं हिमालय तथा आल्प्स जैसे पर्वतों का निर्माण इसी प्रकार से हुआ हैं।
3. कुछ ऐसी प्लेटें भी हैं जो एक दूसरे से दूर जाती हैं। इन्हे अपसारी(Diverging)प्लेट कहते हैं। ये प्लेटे अपसारी किनारों का निर्माण करती हैं। विश्व के अधिकांश अपसारी किनारे महासागरीय मध्य कटकों (Mid Oceanic Ridges) के साथ- साथ हैं। इन किनारों के साथ - साथ पृथ्वी के भीतरी भाग से लावा निरन्तर ऊपर को उठता रहता हैं।
प्लेटों के गति के उपर्युक्त विवरण से यह बात स्पष्ट हो जाती हैं कि भूकम्प तथा ज्वालामुखी विस्फोट सहित अधिकांश भूगर्भीय घटनाएँ प्लेटों के किनारों पर होती हैं।
बीसवी शताब्दी के आरंभिक चरणों मे महाद्वीपीय विस्थापन के सिद्वांत को स्वीकार करने मे सबसे बड़ी बाधा यह थी कि विद्वान यह नहीं समझ पा रहे थे कि सियाल के बने हुए महाद्वीपीय सीमा पर कैसे तैरते हैं और उसे विस्थापित करते हैं। उस समय विद्वानों का यह विचार था कि महासागरीय भू - पर्पटी बैसाल्टिक स्तर का ही विस्तार है। आर्थर होम्स (Arthur Holmes) ने सन् 1928 में ग्लासको की भूगर्भिक सोसाइटी (Geological society of Glasgow) में भाषण देते हुए इस समस्या का हल सुझाया उन्होने बताया कि अधोपर्पटी संवहन धाराएँ तापीय संवहन की क्रियाविधि आरंभ करती है जो प्लेटों के संचालन के लिए प्रेरक बल का काम करती है। उष्ण धाराएँ ऊपर उठती हैं जैसे ही वे ठंडी हो जाती है। और नीचे की ओर चलना शुरू कर देती है इस प्रकार यह संवहनी संचालन भू पर्पटी प्लेटों को गतिशील कर देता हैं। स्थलमण्डल की प्लेटें नीचे स्थित अधिक गतिशील एस्थेनोस्फेयर पर तैरती रहती है और संचलन के कारण सदा गतिशील रहती है। अतीत मे हुई ज्वालामुखी क्रिया के सामान्यतः किसी सक्रिय प्लेट की सीमा की दूर स्थ्लमंडल पर स्थित होते हैं । ये संवहन धाराओं के प्रभाव की ओर संकेत करते है। ज्वालामुखी क्रिया के यह केन्द्र तप्त स्थल (Hot spot)कहलाते हैं। डब्लू जैसन मॉर्गन (W. jason Margon) ने सन् 1971 मे तप्त स्थल की कल्पना की । उन्होंने विचार व्यक्त किया कि मैटल मे मैग्मा का स्रोत अपने स्थान पर स्थिर रहता है, जबकि इसके ऊपर स्थित स्थलमंडलीय प्लेटे निरंतर संचालित होती है इस प्रकार किसी तप्त स्थल के ऊपर ज्वालामुखियों की रचना होती है। परंतु वे उसके बाद मैग्मा स्रोत से दूर खिसक जाते हैं और मृत हो जाते हैं। ये मृत ज्वालामुखी एक श्रृखला की रचना करते हैं जो प्लेट संचालन के अभिलेख हैं।
प्लेट सीमाएँ पृथ्वी के सर्वाधिक रचनात्मक लक्षण है। प्लेट सीमाओं की पहचान प्रमुख स्थलाकृतिक लक्षणों से की जाती है से स्पष्ट होता हैं की पृथ्वी की बाहरी दृढ़ परत स्थलमंडल - सात मुख्य प्लेटों तथा कई अन्य छोटी प्लेटों मे विभक्त हैं। मुख्य प्लेटों की बहिर्रेखा नवीन पर्वत तरंगों, महासागरीय कटकों तथा खाईयों से बनी हैं। मुख्य सात प्लेटों के नाम इस प्रकार हैं :
1. प्रशांत प्लेट
2. यूरेशियन प्लेट
3. इंडो-ऑस्ट्रेलियन प्लेट
4. अफ्रीकन प्लेट
5. उत्तरी अमेरिकन प्लेट
6. दक्षिणी अमेरिकन प्लेट
7. अंटार्कटिक प्लेट
विश्व की मुख्य प्लेटें तथा उनकी दिशा एवं गति सेंटीमीटर प्रतिवर्ष में
उपर्युक्त सभी प्लेटों में प्रशांत प्लेट नवीनतम प्लेट हैं। यह लगभग पूर्णतया सागरीय पटल से बनी है और भूपृष्ठ के लगभग 20 प्रतिशत भाग पर विस्तृत है । अन्य प्लेटों का निर्माण महासागरीय तथा महाद्वीपीय दोनों ही प्रकार के पटलों से हुआ हैं। कोई भी प्लेट केवल महाद्वीपीय पटल से निर्मित नहीं है। प्लेटों की मोटाई महासागरो के नीचे लगभग 70 कि. मी. तथा महाद्वीपों के नीचे 150 कि.मी. होती हैं।
लगभग सभी विवर्तनिक क्रियाएँ प्लेट की सीमाओं पर होती हैं यही कारण है कि प्लेट की सीमाएँ भूवैज्ञानिक तथा भूगोलवेताओं के अध्ययन का केन्द्र बिंदु हैं।
भारतीय प्लेट (Indian Plate):
हिन्द महासागर के अधस्तल पर विभिन्न प्रकार की अद्भुत स्थालाकृतियाँ है जिनमे बेसिन कटक तथा पठार प्रमुख है। इनमें से दो महासागरीय कटक तप्त स्थलों के ज्वालामुखी मार्ग माने जाते है। इन कटको के नाम नाइंटी - ईस्ट कटक (Ninety east ridge) एवं मैस्केरेन पर तथा चेगोस - मालद्वीप लक्षद्वीप द्वीपीय कटक है । नाइंटी- ईस्ट कटक का उतरी विस्तार एक महासागरीय खाई मे समाप्त हो जाता है । जिसने भारतीय महाद्वीपों खंड के उत्तर मे स्थित समुद्र अधस्तल को अपने मे विलीन कर लिया है । चैगोस लक्षद्वीप कटक आदि नूतन कल्प(5 करोड़ वर्ष पूर्व ) मे पुरातन कार्ल्सबर्ग कटक को दक्षिणी - पूर्व इंडियन कटक से जोड़ती थी। मध्य हिंद महासागर कटक का विस्तार तेजी से हो रहा है। एक अनुमान के अनुसार इसकी गति लगभग 14 से 20 से. मी. प्रतिवर्ष है। कार्ल्सबर्ग दक्षिण पूर्व हिंद महासागर कटक के पश्चात् भारतीय प्लेट तथा यूरेशियन प्लेट का टकराव भारतीय प्लेट के उत्तर मे हुआ जिससे हिमालय की उत्पत्ति हुई । हिमालय प्रदेश मे भारतीय प्लेट तथा यूरेशियन प्लेट के बीच का जोड़ सिंधु तथा ब्रह्मपुत्र नदियों के साथ- साथ है।