पर्यावरणीय समस्यायें और उनके निदान हेतु वैश्विक रणनीति

(i) निर्जीव भौतिक घटकों - वायु, जल, मृदा आदि।

(ii) जैविक घटकों - पेड़-पौधे, जीव-जंतु, सूक्ष्म जीवाणु आदि के आधार पर पर्यावरण को मुख्यतः दो भागों में विभाजित किया गया है-

(a) भौतिक पर्यावरण (अजैविक पर्यावरण)

(b) जैविक पर्यावरण

पर्यावरण के प्रकार

पर्यावरण की प्रकृति गतिशील है। भौतिक तथा जैविक पर्यावरण के तत्त्वों में सदैव कुछ न कुछ परिवर्तन होता रहता है। पर्यावरण के परिवर्तन का प्रभाव पेड़-पौधों और जीव जन्तुओं पर होता है।

आज से 10 लाख वर्ष पूर्व पर्यावरण में आए परिवर्तन के कारण मनुष्य का विकास हुआ था।

पर्यावरणीय समस्याऐं

समस्याओं का वर्गीकरण :-

इन्हें तीन वर्ग़ों में बाँटा जा सकता है।

(A) स्थलीय वातावरण से संबंधित समस्याएं

(B) वायुमण्डलीय वातावरण से संबंधित समस्याएं

(C) जैविक वातावरण से संबंधित समस्याएं

(A) स्थलीय वातावरण से संबंधित समस्याएं -

1. मृदा प्रदूषण

2. जल प्रदूषण

3. वनों का विनाश

1.मृदा प्रदूषण -

जब भूमि में प्रदूषित जल, रसायनयुक्त कीचड़, कूड़ा, कीटनाशक दवा और उर्वरक अत्यधिक मात्रा में प्रवेश कर जाते हैं तो उससे भूमि की गुणवत्ता घट जाती है। इसे मृदा-प्रदूषण कहा जाता है। मृदा-प्रदूषण की घटना भी आधुनिकता की देन है।

मृदा-प्रदूषण के कारण

(1)कीटनाशक व उर्वरक- कीटनाशक व उर्वरक मृदा-प्रदूषण के प्रमुख कारण हैं। इनके प्रयोग से फसलों की प्राप्ति तो हो जाती है, लेकिन जब वे तत्त्व भूमि में एकत्रित हो जाते हैं तो मिट्टी के सूक्ष्म जीवों का विनाश कर देते हैं। इससे मिट्टी का तापमान प्रभावित होता है और उसके पोषक तत्त्वों के गुण समाप्त हो जाते हैं।

(2)घरेलू अवशिष्ट-कूड़ा-कचरा, गीली जूठन, रद्दी, कागज, पत्तियां, गन्ना-अवशिष्ट, लकड़ी, कांच व चीनी मिट्टी के टूटे हुए बर्तन, चूल्हे की राख, कपड़े, टीन के डिब्बे, सडे-गले फल व सब्जियाँ, अंडों के छिलके आदि अनेक प्रकार के व्यर्थ पदार्थ मिट्टी में मिलकर मृदा-प्रदूषण को बढ़ावा देते हैं।

(3)औद्योगिक अवशिष्ट- उद्योगों से निकल व्यर्थ पदार्थ किसी न किसी रूप में मृदा-प्रदूषण का कारण बनते हैं।

(4)नगरीय अवशिष्ट- इसके अन्तर्गत मुख्यतः कूड़ा-करकट, मानव मल, सब्जी बाजार के सड़े-गले फल व सब्जियों का कचरा, बाग-बगीचों का कचरा, उद्योगों, सड़कों, नालियों व गटरों का कचरा, मांस व मछली बाजार का कचरा, मरे हुए जानवर व चर्मशोधन का कचरा, आदि को सम्मिलित किया जाता है। इन सबसे मृदा-प्रदूषण होता है।

मृदा-प्रदूषण नियंत्रण के उपाय

  1. व्यर्थ पदार्थों व अवशिष्टों का समुचित निक्षेपण किया जाना चाहिए।

  2. कृषि कार्यों में डी.डी.टी., लिण्डेन, एल्ड्रिन तथा डीलिड्रन आदि के प्रयोग पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए।

  3. नागरीकों को चाहिए कि वे कूड़ा-कचरा सड़क पर न फैंके।

  4. अस्वच्छ शौचालयों के स्थान पर स्वच्छ शौचालयों का निर्माण करना चाहिए।

  5. अवशिष्टों के निक्षेपण को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

  6. नागरिकों में सफाई के प्रति चेतना जागृत करनी चाहिए।

  7. मृदा-क्षरण को रोकने के उपाय करने चाहिए।

2.जल प्रदूषण -

जल प्रदूषण के स्रोत अथवा कारण -

जल प्रदूषण के सेतों अथवा कारणों को दो वर्ग़ों में बांटा जा सकता है-

1. प्राकृतिक स्रोत             2. मानवीय स्रोत।

जल प्रदूषण के प्राकृतिक स्रोत -

 जल प्रदूषण के मानवीय स्रोत -

जल प्रदूषण के मानवीय स्रोत अथवा कारण हैं-

1. घरेलू बहिःस्राव (Domestic effluent)

2. वाहित मल (Sweage)

3. कृषि बहिःस्राव (Agricultural effluent)

4. औद्योगिक बहिःस्राव (Industrial effluent)

5. तेल प्रदूषण (Oil pollution)

6. तापीय प्रदूषण (Thermal pollution)

7. रेडियोधर्मी अपशिष्ट एवं अव्पात (Radioactive wastes and fall outs)

8. अन्य कारण (Other causes of pollution)

जल प्रदूषण का प्रभाव (Effect of Water Pollution)

जल प्रदूषण का प्रभाव बहुत ही खतरनाक होता है। इससे मानव तो बुरी तरह प्रभावित होता ही है, जलीय जीव-जन्तु, जलीय पादप तथा पशु-पक्षी भी प्रभावित होते हैं।

1. जलीय जीव-जन्तुओं पर प्रभाव

2. जलीय पादपों पर प्रभाव

3. पशु-पक्षियों पर प्रभाव

4. मानव पर प्रभाव

5. जल प्रदूषण के कुछ अन्य प्रभाव

(i) पेयजल का अरुचिकर तथा दुर्गन्धयुक्त होना

(ii) सागरों की क्षमता में कमी

(iii) उद्योगों की क्षमता में कमी

जल में विद्यमान रोगकारक तथा उनसे होने वाले रोग

रासायनिक अवयव तथा स्वास्थ्य पर उनका प्रभाव

3.  वनों का विनाश -

(B) वायुमण्डलीय वातावरण से संबंधित समस्याएं -

(क)ओजोन छिद्र (Ozone Hole)

(ख)भूमंडलीय तापन (Global Warming)

(ग)अम्लीय वर्षा (Acid Rain)

(क)ओजोन छिद्र (Ozone Hole) -

(ख)भूमंडलीय तापन (Global waming) -

(ग) अम्लीय वर्षा (Acid Rain)

(C)जैविक वातावरण से संबंधित समस्याएँ -

पर्यावरणीय समस्याओं के निदान हेतु

वैश्विक रणनीति

1.  पर्यावरण पर स्टाकहोम सम्मेलन(Stockholm Conference on Environment)

2.  रियो पृथ्वी सम्मेलन

3.  संयुक्त राष्ट्र पृथ्वी शिखर सम्मेलन

4.  ग्लोबल वार्मिंग पर क्योटो प्रोटोकाल

तक ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी करके इसे 1990 के स्तर तक ले जाएंगे।

  1. कार्बनडाई आक्साइड

  2. मीथेन

  3. नाइट्रस आक्साइड

  4. हाइड्रोफ्लोरो कार्बन्स

  5. परफ्यूरोकार्बन्स

  6. सल्फर हैक्साफ्लोराइड के उत्सर्जन में कमी करेंगे।

5.  पर्यावरण पर बैंकाक सम्मेलन

6.  नूसादुआ-बाली सम्मेलन

बाली रोडमैप में यह किए गए लक्ष्य :-

वर्ष 2009 में कोपेनहेगन में होने वाली बैठक में क्योटो संधि के स्थान पर एक अन्य संधि का प्रावधान किया जाएगा जिस पर हस्ताक्षर करने वाले देशों को इसे मानने के लिए 2-3 वर्ष का समय दिया जायेगा।

विकासशील देशों से उत्सर्जन में कमी लाने के साथ-साथ वित्त एवं तकनीक संबंधी सहायता उपलब्ध किए जाने की अपील की गई।

बाली रोडमैप पर जारी प्रस्तावों की प्रगति के संदर्भ में वर्ष 2008 में चार बैठकों का आयोजन किया जायेगा।

प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने की दिशा में जंगलों के क्षय पर विशेष कदम उठाने की योजना है।

ग्लोबल वार्मिंग की समस्या को देखते हुए इससे संबंधित सभी दुष्परिणामों एवं उपायो पर ध्यान दिया जायेगा।

कार्बन प्रदूषण को खत्म करने के लिये उच्चतम तकनीक के इस्तेमाल को प्राथमिकता दी जायेगी।

ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन की दर को 2050 तक वर्ष 2000 तक के स्तर पर लाने की बात कही गई है।

इस सम्मेलन के अंतर्गत UNFCC के विशेषज्ञों को स्वच्छ वातावरण हेतु विभिन्न योजनाओं पर अपनी रिपोर्ट पेश करने को कहा गया है।

अविकसित देशों को जलवायु समस्या से निपटने के लिए सहायता हेतु अनुकूलन फंड की देखरेख पर सहमति हुई है।

इसके अंतर्गत स्वच्छ वातावरण क्रियान्वयन वाली परियोजनाओं पर 2% का कर लगाया जाने का प्रावधान है।

7.  कोपेनहेगन सम्मेलन

जैव विविधता

  1. आनुवांशिक विविधता

  2. प्रजाति विविधता

(a) प्रजातियों की प्रचुरता किसी स्थान विशेष में प्रजातियों की कुल संख्या

 (b) प्रजातियों की एकरूपता (प्रजातियों की आपेक्षिक बाहुल्य)

 (c) प्रजातियों की प्रभाविता (सर्वाधिक बहुल प्रजाति)

1.  आनुवांशिक विविधता (Genetic Diversity) - आनुवांशिक विविधता का अर्थ किसी विशेष प्रजाति में जीनों (आनुवांशिक गुणों) की विविधता से है। उदाहरणस्वरूप किसी गांव या शहर में कुल अलग-अलग नस्लों के कुत्ते होते हैं। दिखने पर प्रत्येक नस्ल का कुत्ता दूसरे नस्ल के कुत्ते से काफी भिन्न होता है, किन्तु वे सभी कुत्ते एक ही प्रजाति के जीव हैं, क्योंकि ये सभी विभिन्न नस्लों के कुत्तों के साथ प्रजनन करके ऐसी संतान उत्पन्न कर सकते हैं जो स्वयं भी संतान उत्पन्न करने में सक्षम हों।

मनुष्यों की विभिन्न जातियों नीग्रायॅड, कॉकेसॉयड, मंगोलॉयड जातियां एक-दूसरी जातियों से शारीरिक गठन, रंग, अभिलक्षण, ऊंचाई और स्वभाव आदि में भिन्न होती है, किन्तु ये सभी जातियाँ एक ही प्रजाति होमोसेपिएन्स के जीव है। जातियों के बीच का अंतर जीवों की प्रजाति के भीतर आनुवांशिक संघटन में अंतर के कारण दृष्टिगोचर होते हैं।

आनुवांशिक संघटन के अंतर निम्नलिखित कारणों में से किसी भी एक के परिणाम स्वरूप हो सकता है।

(a) एलील्स में भिन्नता (एक ही जीन के विभिन्न प्रारूपों में)

(b) संपूर्ण जीन में भिन्नता जिसमें किसी विशिष्ट अभिलक्षण को निर्धारित करने वाले लक्षण प्रभावित होते हैं, या

(c) गुणसूत्रों की संरचना में परिवर्तन आनुवांशिक भिन्नता प्रजाति विशेष को किसी विशिष्ट पर्यावरण के साथ अनुकूलन स्थापित करने में सहायता करती है। इससे उस प्रजाति की उत्तरजीविता-दर में वृद्धि होती है ओर ऐसा प्राकृतिक चयन को प्रभावित करने वाले कारकों के अनुरूप भी है। यदि किसी प्रजाति में अधिक आनुवांशिक भिन्नता है तो बदलते पर्यावरण में उस प्रजाति की उत्तरजीविता दर उस प्रजाति के जीवों की तुलना में अधिक है जिसमें अपेक्षाकृत कम आनुवांशिक भिन्नता पाई जाती है।

आनुवांशिक भिन्नता से जैविक विकास की प्रक्रिया में अत्यधिक महत्वपूर्ण सहायता प्राप्त हुई है। यह नई प्रजातियों के जाति उद्भवन का मूल आधार है। यह प्रजाति और समुदाय के स्तर पर जैविक विविधता को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

जिस समुदाय में बहुत अधिक संख्या में प्रजातियां निवास करती है उसमें कुल आनुवांशिक भिन्नता उस समुदाय की तुलना में अधिक होती है। जिसमें निवास करने वाली प्रजातियों की संख्या अपेक्षाकृत कम होती है।

2.  प्रजाति विविधता (Species Diversity) - प्रजाति विविधता का आशय किसी क्षेत्र विशेष में पाए जाने वाले विभिन्न प्रजातियों के जीवों से है। प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र और कृषि पारिस्थितिक तंत्र में प्रजाति विविधता का अंतर स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।

मानव द्वारा विकसित एक ही प्रजाति के पौधों के वनक्षेत्र की तुलना में प्राकृतिक वन पारिस्थितिक तंत्र से होने वाले आर्थिक लाभ कहीं अधिक है।

प्रजातियां प्रकृति में देखी जाने वाली विविधता की सुस्पष्ट इकाइयां है। वे पारिस्थितिक तंत्र को नियमित करने में एक महत्वपूर्ण और विशिष्ट भूमिका निभाती है। इनकी इस विशिष्ट भूमिका के कारण ही यदि किसी कारणवश कोई प्रजाति पारिस्थितिक तंत्र से विलुप्त हो जाती है तो संपूर्ण पारिस्थितिक तंत्र के स्थायित्व पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

(a) प्रजातियों की प्रचुरता - प्रति इकाई क्षेत्र में रहने वाली प्रजातियों की कुल संख्या को प्रजातियों की प्रचुरता कहते हैं।

(b) प्रजातियों की एकरूपता - इसका आशय किसी क्षेत्र विशेष में प्रजातियों के आपेक्षिक बाहुलय या उनकी विविधता से है। प्रकृति में प्रजातियों की संख्या और प्रकार में व्याप्त भिन्नता है जिसके कारण प्रकृति में अत्यधिक जैव-विविधता पाई जाती है।

(c) प्रजातियों की प्रभाविता - किसी क्षेत्र विशेष में रहने वाली अनेक प्रजातियों में से जिस प्रजाति की संख्या अन्यों की तुलना में अधिक हो वह प्रजाति प्रभावी मानी जाती है।

इसका अर्थ है जीवित प्रजातियों में विविधता। इस विविधता के मूल्यांकन और सूचकांक में प्रजातियों की प्रचुरता (एक सीमित क्षेत्र में प्रजातियों की संख्या), प्रजातियों की बहुलता (प्रजातियों के बीच सापेक्षिक संख्या) और जातिवृत्ति संबंधी विविधता (विभिन्न प्रजाति समूहों के बीच संबंधी सूत्रता)। भूमध्य क्षेत्र धरती के अन्य भागों की तुलना में प्रजातियों की दृष्टि से अधिक समृद्ध है। समुदायों की सुचारू कार्यप्रणाली और सामुदायिक स्तर के गुणों के विकास के लिए प्रजाति विविधता उसी तरह अनिवार्य है, जैसे एक जीव समूह (कॉम्पलेक्स आर्गेनिज्म) के ठीक से कार्य करने के लिए अलग-अलग तरह के डीएनए ऐनकोडिड ऐन्जाइम जरूरी होते हैं।

3.  पारिस्थितिक तंत्र की विविधता - जीवमंडल में एक साथ बहुत से पारिस्थितिक तंत्र पाए जाते हैं। प्रत्येक पारिस्थितिक तंत्र में विभिन्न प्रकार के पौधों और जीव-जन्तुओं की अनेकानेक प्रजातियाँ निवास करती है जो एक-दूसरे पर परस्पर निर्भर होते हैं और विभिन्न प्रकार के वास स्थान में निवास करने के लिए अनुकूलित होती हैं। पारिस्थितिक तंत्र को भौगोलिक क्षेत्र या देश आदि के आधार पर परिभाषित किया जाता है। भू-दृश्य, मरुभूमि, घास के मैदान, पर्वत, वन, नदियाँ, झील, तालाब, समुद्र आदि सभी प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र के उदाहरण हैं। पारिस्थितिक तंत्र की विविधता संघटकों का वर्णन करती है, जैसे पारिस्थितिक तंत्र में निवास करने वाली प्रजातियों के लिए उपयुक्त पर्यावरण की विभिन्न पारिस्थितियां, विभिन्न पोषण स्तर तथा पारिस्थितिक तंत्र के भीतर ऊर्जा का प्रवाह, आहार जालों की संख्या और पोषक तत्वों के पुनर्चक्रण को बनाए रखने वाली प्रक्रिया आदि।

पारिस्थितिक तंत्र की विविधता के निम्नलिखित तीन संघटक हैं-

1.ऐल्फा विविधता - यह किसी वास स्थान में प्रजातियों की संख्या को निरूपित करती है।

2.बीटा विविधता - यह किसी भौगोलिक क्षेत्र में प्रजातियों के आवागमन की दर अर्थात् भौगोलिक क्षेत्र के भीतर किसी एक वास स्थान में प्रजातियों के प्रवेश करने और निकास की दर को दर्शाती है।

3.गामा विविधता - यह भिन्न-भिन्न भौगोलिक क्षेत्रों के एक जैसे वास स्थानों के बीच प्रजातियों के आवागमन या प्रतिस्थापन की दर को निरूपित करती है।

कृष्य पौधों में विविधता (Diversity in Cultivated Plants) -

जैव-विविधता का मूल्य (Value of Biodiversity) -

मनुष्य भी जैव-विविधता का एक अंग है और प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से दूसरे जीवों से जुड़ा हुआ है। जीवमंडल में स्थायित्व बनाये रखने के अतिरिक्त जैव-विविधता का हमारे लिए निम्नलिखित रूप में महत्व है-

1.  उपभोग मूल्य (Consumpative Value) - भोजन मनुष्य की मूलभूत आवश्यकता है। आदिकाल से ही मनुष्य भोजन की आवश्यकता को पूरा करने के लिए दूसरे जीव-जन्तुओं पर आश्रित रहा है। मनुष्य फल, अनाज, कंद-मूल, दूध, दवाईयां और मांस आदि प्रकृति में उपस्थित दूसरे जीव-जन्तुओं से प्राप्त करता है।

उदाहरण के लिए - आम, सेब, संतरा, केला, अंगूर आदि फल हमें वृक्षों से प्राप्त होते हैं। गाय, भैंस, बकरी, भेड़ आदि से हम दूध प्राप्त करते हैं। गाजर, लहसुन, अदरक, मूली, चकुन्दर आदि कंद-मूल हमें पौधों से मिलते हैं। खाने के अनाज चावल, गेहूं, मक्का, ज्वार, बाजरा आदि भी हमें पौधों से प्राप्त होते हैं। विभिन्न जन्तुओं, पक्षियों, मछलियों, आर्थोपोड्स के मांस को संसार के विभिन्न भागों में खाया जाता है। तुलसी, पुदीना, मुलहठी, करीपत्ता नीम, पत्थरचट्ट, आक् आदि पौधों के पत्तों के टहनियों का विभिन्न रोगों जैसे- खांसी, जुकाम, अपच, त्वचा रोग, चोट, मोच आदि के उपचार में प्रयोग किया जाता है।

2.  उत्पादक मूल्य (Productive Value) - विभिन्न जीव उत्पादन की दृष्टि से मनुष्य के लिए उपयोगी हैं। कई पौधों से रासायनिक पदार्थ निकाल कर उनका उपयोग दवाइयां बनाने में किया जाता है। जैसे-सिनकोना वृक्ष से ‘कुनीन’, पोस्त से मार्फीन, अजवाइन के पौधे से ‘थाईमोल’, पुदीने से ‘मैन्थॉल’ आदि निकाल कर दवाइयां बनाने में उपयोग किया जाता है। जीवाणुओं से पेनिसिलिन जैसी एंटीबायटिक दवाइयां बनाई जाती हैं। मछलियों से Cod Liver Oil जिसका उपयोग कमजोरी दूर करने तथा केकड़ों, चिगटा और लोबस्टर के कंकालों से निकाल रसायन का उपयोग कवकीय संक्रमण को रोकने की दवाइयां बनाने में किया जाता है। वनों से प्राप्त होने वाली लकड़ी, गोंद, रेशे, रेसिन, लाख, शहद आदि पदार्थ़ों का उपयोग भी उत्पादन कार्य़ों में किया जा रहा है।

3.  सामाजिक मूल्य (Social Value) - जैव-विविधता मनोरंजन व पर्यटन उद्योग के लिए आय का मुख्य स्रोत है। ऑस्ट्रेलिया के ‘ग्रेट बैरियर रीफ’, सिंगापुर के द्वीपों में पाई जाने वाली जैव-विविधता, गोवा के समुद्र तट, राजस्थान के टीले, राज्य उद्यान, कुल्लू-मनाली की पहाड़ियों आदि सभी क्षेत्र जैव-विविधता के कारण लोकप्रिय हैं। जैव-विविधता को देखने के लिए आये विदेशी पर्यटकों द्वारा जो मुद्रा आती हैं, वह अर्थव्यवस्था के विभिन्न अंगों में प्रवाहित होकर उसे शक्तिशाली बनाती है।

इसके अतिरिक्त विभिन्न जीवों में उपस्थित जीन या आनुवांशिक भंडार का उपयोग नई प्रजातियों के विकास एवं उत्पादन बढ़ाने में किया जा रहा है जिससे समाज के लोगों की आवश्यकताओं की पूर्ति की जा सके।

4.  नैतिक मूल्य (Ethical Value) - प्रकृति में प्रत्येक जाति को अपना अस्तित्व बनाए रखने का मौलिक अधिकार है। मनुष्य को अपने लाभ के लिए किसी जाति का नुकसान पहुंचाने या लुप्त करने का कोई अधिकार नहीं है। यदि कोई जाति मनुष्य के अनुकूल नहीं हैं तो भी उसका प्राकृतिक मूल्य कम नहीं होता क्योंकि जीवमंडल में प्रत्येक जाति अपने स्तर पर स्थिरता बनाए रखने में सहायता करती है। इसलिए हमें ‘जिओ और जीने दो’ की नीति का पालन करते हुए दूसरे जीवों का संरक्षण करना चाहिए।

5.  सौन्दर्यात्मक मूल्य (Aesthetic Value) - बहुत-सी जातियों का सौन्दर्यात्मक मूल्य है। उनको देखने व अनुभव करने से हमें शान्ति, स्फूर्ति एवं संतोष का अनुभव होता है। उदाहरण के लिए जंगली रसीले फलों का स्वाद, जंगली फूलों की महक, मॉस-बेड की कोमलता पक्षियों का मधुर कलरव का कोई आर्थिक मूल्य नहीं परन्तु उनका सौंदर्य-मूल्य हमें उनके संरक्षण के लिए प्रेरित करता है।

भारत का जैव-भौगोलिक वर्गीकरण (Bio-Geographical Classification of India) -

(I) हिमालय पर्वतीय खण्ड

(II) प्रायद्वीपीय पठार और पहाड़ियां

(III) उत्तर का विशाल मैदान

(IV) पश्चिमी तटीय मैदान

(V) पूर्वी तटीय मैदान एवं द्वीप समूह

जैव-विविधता का महत्व

जैव-विविधता के आर्थिक लाभ (Economic Potential of Biodiversity) –

जैव-विविधता को खतरा -

जैव-विविधता के हास के प्रभाव -

जैव-विविधता और आईपीआर

जैव-विविधता बनाए रखने के उपाय -

जैव-विविधता के समक्ष उत्पन्न संकट

जैव विविधता के लिए वर्तमान संकट

1. मानव जनसंख्या में वृद्धि।

2. प्राकृतिक वास-स्थान का नष्ट होना।

3. भोजन और वन्य वाणिज्यिक उत्पादों को प्राप्त करने के लिए वन्य जंतुओं का शिकार

4. प्राकृतिक संसाधनों का दोहन।

5. किसी पारिस्थितिक तंत्र में अन्य पारिस्थितिक तंत्र से नई प्रजाति के जीवों का प्रवेश।

संकटग्रस्त जातियाँ -

1. संकटापन्न

2. दुर्लभ

3. अवक्षयित और

4. अनिर्धारित

1.  संकटापन्न जाति - एक जाति को संकटग्रस्त तब माना जाता है तब इसके सदस्य इतने कम या और इसका गृहक्षेत्र इतना छोटा है कि अगर इसे विशेष रक्षण नहीं दिया गया तो यह विलुप्त हो सकती है।

इस श्रेणी में पौधों और जंतुओं की ऐसी प्रजातियों को रखा गया है जिन पर लुप्त होने का संकट मंडरा रहा है और यदि उनके अस्तित्व को संकट में डालने वाली परिस्थितियां बनी रहीं तो उन्हें लुप्त होने से बचा पाना संभव नहीं होगा। इनमें ऐसे जीव भी शामिल हैं जिनकी संख्या वास-स्थानों की कमी के कारण अत्यधिक कम हो गई हैं। ऐसे जीव विलुप्त होने की कगार पर हैं।

बाघ, हाथी, गैंडा, भारतीय जंगली गधा, हंगुल (कश्मीरी हिरन), सुनहरा लंगूर, बौना सूअर, साइबेरियाई सारस, सोहन चिड़िया, गिद्ध, बाज, उल्लू आदि शिकारी पक्षी, सरीसृपों, उभयचरों और अनेक अकशेरूकी जंतुओं की प्रजातियाँ।

दक्षिण भारत के वर्ष़ों वनों और “शोलाज” में रहने वाले सिंह-पृच्छी बंदर विश्व का सर्वाधिक संकटग्रस्त प्राइमेट है। ऐसा माना जाता है कि वनों में इस सुंदर प्राणियों की संख्या 195 से ज्यादा नहीं बची हैं क्योंकि इसके आवास स्थल का विस्तार पिछले 3 वर्ष़ों में तेजी से घट गया है। इन वर्षा वनों में रहने वालों के आवास प्रमुख रूप से डिप्टेरोकार्पस पेड़ों पर था जिन्हें बेरहमी से काट डाला गया है। कॉफी और चाय सम्पदाओं के स्थापन के लिए देशज वनस्पति को साफ करने से स्थिति और बिगड़ गई है। उनकी संख्या को पर्याप्त रूप से करने के लिए अनाधिकृत शिकार भी जिम्मेदार है। मांस के लिए भी इस प्राणी का शिकार किया जाता है। इन्हें पालतू बनाने और चिड़ियाघर में भेजने के लिए पकड़ने का व्यापार भी फल-फूल रहा है।

    2.  दुर्लभ जाति - ये जातियाँ वे हैं जिनकी संख्या थोड़ी-सी है या वे इतने छोटे क्षेत्रों में रहती हैं या ऐसे असामान्य पर्यावरणों (विशेष क्षेत्री) में रहती हैं कि वे जल्दी विलुप्त हो सकती है।

इस श्रेणी में पौधों और जंतुओं की ऐसी प्रजातियों का रखा गया है जिनकी विश्व में बहुत कम संख्या पाई जाती है। वर्तमान में ये संकटापन्न या असुरक्षित नहीं है किंतु कम संख्या में पाए जाने के कारण इनके संकटापन्न या असुरक्षित हो जाने का खतरा मंडरा रहा है। जंतुओं और पौधों की ये प्रजातियाँ एक विशेष भौगोलिक क्षेत्र या वास-स्थान में ही निवास करती हैं या किसी अधिक बड़े क्षेत्र में कम संख्या में निवास करती हैं।

उदाहरण- सूअर के समान पूंछ वाला लघुपुच्छ वानर, मलय देश में पाया जाने वाला भालू (पूर्वोत्तर क्षेत्र), साह (हिमाचल क्षेत्र), छत्रयुक्त सारस (मैदानी और दलदली क्षेत्रों में पाया जाने वाला) आदि।

दुर्लभ जाति का एक उदाहरण है- हवाई मॉन्क सील है। यह केवल हवाई द्वीप समूह से उत्तर-पश्चिम में फैले छः छोटे-छोटे द्वीपों पर पाई जाती है। इनकी संख्या शायद 1500 से ज्यादा नहीं है। 1800 सदी के उत्तरार्ध में इन्हें वसा (चर्बी) के लिए मारा जाता था और वे लगभग विलुप्त हो गई। 1909 में इनकी रक्षा की जा रही है और धीरे-धीरे इनकी संख्या बढ़ी है। दुर्भाग्यवश अब स्थिति यह है कि इनका मारना बंद करना भी शायद इन्हें बचाने के लिए पर्याप्त न हो। जिन पुलिनों पर मादाएँ अंडे देती हैं अगर वहाँ इन्हें क्षुब्ध कर दिया जाए तो वे दूर पानी में भाग जाती हैं। पीछे जो बच्चे छोड़ जाते हैं उनमें से अधिकांश मर जाते हैं। सारी हवाई मॉन्क सील केवल इन कुछ द्वीपों पर ही सिमटकर रह गई हैं इसलिए यह संभव है कि कोई भी प्राकृतिक महाविपत्ति इनका नामो-निशान मिटा दे। उदाहरण के लिए तेल चिकनापृष्ठ ऐसी घोर विपत्ति है। कुछ सील बंदीगृहों में हैं लेकिन वहाँ उन्होंने कभी भी प्रजनन नहीं किया।

दूसरा उदाहरण महान भारतीय सारंग (बस्टर्ड) है का है। दुनिया के सबसे दुर्लभ पक्षियों में यह भी एक है जो भारतवासी है। पहले यह पूर्वी पाकिस्तान से पश्चिम बंगाल तक तथा दक्षिण दिशा में दक्षिणी मद्रास के प्रायद्वीपीय क्षेत्रों तक वितरित था।

आजकल यह गुजरात, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, कर्नाटक, हरियाणा और उत्तरप्रदेश के बड़े-बड़े घासस्थलों, शुष्क और अर्ध-शुष्क भूमियों तथा बोए हुए खेतों में छोटे-छोटे समूहों में रहता है। ऐसा विश्वास है कि अब केवल 750 पक्षी ही बचे हैं और आज भी इनका मुख्य आवास गुजरात है। हाल ही के वर्ष़ों में अनाधिकृत शिकार और इसके प्राकृतिक आवास के नष्ट हो जाने के कारण इस दुर्लभ और घटती जा रही जाति का विनाश हुआ। इसके प्राकृतिक आवास के चारों और कीटनाशकों तथा पीड़कनाशकों के अंधाधुंध उपयोग के कारण भी इन पर प्रभाव पड़ा है। खाने के लिए भी इन्हें मारा जाता रहा है

3.  अवक्षयित (अतिसंवेदनशील) जातियाँ - इनमें वे जातियाँ शामिल हैं जिनकी संख्या पहले की अपेक्षा बहुत कम हो गई है और अभी भी लगातार घट रही है। यह लगातार हो रही कमी ही चिंता का कारण है। इस श्रेणी के प्राणी जल्दी ही दुर्लभ या संकटापन्न श्रेणी में आ सकते हैं।

उत्तरी अफ्रीका का ऐडैक्स बारहसींगा (ऐन्टिलोप) कुल (फैमिलि) का सदस्य है। यह मूल रूप से मिस्र से लेकर मॉरीटिना के रेगिस्तान में रहता था। इस प्राणी का इतना अधिक शिकार किया जाता रहा कि अपने पहले वाले निवास के सारे क्षेत्रफल में 5,000 से भी कम जीवित बचे हैं। 1900 से ही मिस्र में तो इनका नामो-निशान ही नहीं रहा और ट्यूनीशिया से भी ये अलविदा हो गए हैं। लीबिया, स्पैनी सहारा, ऐल्जीरिया या सूडान में भी इनके अस्तित्व के बारे में संदेह है। लगता है उनका अंतिम जमावड़ा मॉरीटिना और माली में था जहाँ के खनाबदोश मूल निवासी उनका अभी भी शिकार करते हैं और उनके माँस को खाने के लिए सुखाते हैं। ऐडैक्स बारहसींगा की संख्या दिनोदिन घट रही है। अगर इनकी आबादी का कम होना लंबे समय तक जारी रहा तो जाति विलुप्त हो जाएगी। लेकिन, अगर आज इनका शिकार करना बंद कर दिया जाए तो जीवित बने रहने के लिए इनकी संख्या अभी भी पर्याप्त रहेगी और आवास भी काफी फैला हुआ मिल जाएगा।

पिछले कुछ वर्ष़ों में कुपीत चीता का फर कश्मीर में अवैध रूप से बेचा जाता था। हिमालय प्रदेशों में इनकी संख्या इतनी घट गई है कि इसके दर्शन ही दुर्लभ हो गए हैं। सदाबहार वनों की बिगड़ती हालत इनकी अवक्षयित स्थिति के लिए उत्तरदायी है। इस सुंदर प्राणी का क्षेत्र नेपाल, भूटान, सिक्किम से लेकर असम तक फैला हुआ है। इसलिए इसके संरक्षण के लिए उचित कदम उठाने चाहिए ताकि यह विलुप्ति के कगार पर न पहुँचने पाए।

     4. अनिर्धारित जातियाँ - चौथी श्रेणी में वे जातियाँ आती हैं जो खतरे में पड़ी हुई लगती हैं, लेकिन उनके बारे में पर्याप्त जानकारी के अभाव में उनकी सही स्थिति का विश्वसनीय आकलन करना संभव नहीं है।

इस श्रेणी में आने वाली जातियों के अनेक उदाहरण हैं। एक उदाहरण उत्तर-पूर्वी ब्राजील के तीन-तट्टी वाले आर्मेडिलो है जिसका माँस के लिए शिकार किया जाता है।

दूसरा उदाहरण सुमात्रा के छोटे कान वाले शश निसोलैगस नेत्स्चेरी का है जहाँ खेती-बाड़ी के लिए जंगलों के काटे जाने से यह गायब होता जा रहा है। तीसरा उदाहरण मेक्सिको के प्रेअरी कुत्ते का है जिसे खाने के लिए मारा जाता है और इसके आवास पर खेती-बाड़ी के लिए कब्जा कर लिया जाता है।

आम तौर पर किसी अनिर्धारित जाति, इसके परिवर्तनों और इसकी स्थिति पर निर्भर करते हुए जब विस्तृत जानकारी एकत्रित की जाती है तब इसे ऊपर दी गई किन्हीं भी तीन श्रेणियों में रखा जा सकता है अथवा इसे सुरक्षित जाति घोषित किया जा सकता है। उदाहरण के लिए एक अलवणजल  समुद्र गौ (अमेजॉन मैनैटी) ट्राइकिकस इनन्गुइस की स्थिति 1966 में अनिर्धारित समझी जाती थी। दो वर्ष़ों के भीतर ही इसकी स्थिति संकटापन्न निर्धारित की गई। मांस के लिए शिकार किए जाने के कारण अब यह सर्वाधिक संकटापन्न जाति हो गई है। 1968 में हिम चीता को अनिर्धारित जाति के रूप में वर्गीकृत किया गया और 1970 में इसे संकटापन्न घोषित किया गया। आप शायद जानते होंगे कि हिम चीते का शिकार इसके सुंदर मोटे फर के लिए किया जाता है।

विलुप्त प्राणी हमेशा के लिए चले जाते हैं। हम उन्हें कभी भी वापस नहीं ला सकते। संकटग्रस्त जातियों को संभाला जा सकता है और यह हमारा लक्ष्य होना चाहिए कि यह निश्चित करें कि इन जातियों का वही अंत न हो जो विलुप्त जातियों का हुआ था।     

रेड डाटा बुक

1. ऐटिस

2. वाछा बच 

3. कुलंजन 

4. अंगूरसाग

5. मिशमी तीता

6. पिकोटी डेन्ड्रोबियम 

7. गुग्गल 

8. किन्स

9. हिम ऑर्किड

10. काडू  

11. कमल 

12. भारतीय पोडोफाइलम

13. सर्पगंधा

14. सूकड  

15. कुथ मूल 

16. ब्रह्म कमल

                                                                                                            

जैव विविधता का संरक्षण -

जैव विविधता का स्व-स्थानिक (या मूल-स्थानिक) संरक्षण -

1.प्राकृतिक विरासत की विविधता तथा पूर्णता को इसके पूरे स्वरूप में अर्थात् प्राकृतिक वातावरण, वनस्पति एवं जीवों के रूप में बनाए रखना एवं संरक्षित रखना;

2.पारिस्थितिक संरक्षण तथा पर्यावरण संरक्षण के विभिनन पक्षों पर शोध कार्य को बढ़ावा देना;

3.शिक्षा, जागरूकता तथा प्रशिक्षण के लिए सुविधाएं उपलब्ध कराना।

1.कोर क्षेत्र - प्राकृतिक व सबसे कम व्यावधान वाला क्षेत्र।

2.मैनीपुलेशन वानिकी क्षेत्र - मानव निर्मित जंगल वाला क्षेत्र।

3.मैनीपुलेशन पर्यटन क्षेत्र - पर्यटन, शिक्षा व प्रशिक्षण के लिए सुरक्षित क्षेत्र।

4.मैनीपुलेशन कृषीय क्षेत्र - वन्य जनजातियों व कृषि जन्य भूमि के लिए सुरक्षित क्षेत्र।

5.पुर्नकरण क्षेत्र - वह भूमि क्षेत्र जिसका मानव द्वारा विनाश कर दिया गया है और उसे धीरे-धीरे पुनः सुरक्षित करने की आवश्यकता है।

इस समय भारत में निम्न 18 जीव मण्डल आरक्षित क्षेत्र हैं-

  1. नीलगिरि (कर्नाटक, तमिलनाडु तथा केरल के मिलन क्षेत्र में)     

  2. कच्छ (गुजरात)

  3. नंदा देवी (उत्तरांचल)

  4. अमरकंटक (मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़)

  5. नोकरेक (मेघालय)

  6. कोल्ड डेजर्ट (हिमाचल प्रदेश)

  7. ग्रेट निकोबार (अण्डमान निकोबार)                              

  8. शेषाचलम (आंध्रप्रदेश)

  9. मनार की खाड़ी (तमिलनाडु)         

  10. पन्ना (मध्यप्रदेश) वर्ष 2011 में निर्मित

  11. मानस (असम)

  12. सुन्दरवन (पश्चिम बंगाल)

  13. सिमलीपाल (उड़ीसा)

  14. डिब्रू-सैखोवा

  15. देहांग-देबांग (अरूणाचल प्रदेश)

  16. पंचमढ़ी (मध्यप्रदेश)

  17. कंचनजंगा (सिक्किम)

  18. अगस्तयमलाई (तमिलनाडू)

प्राकृतिक स्थल -

1.   काजीरंगा राष्ट्रीय पार्क (असम)

1985

2.   मानस वन्यजीव अभयारण्य (असम)

1985

3.   केवलादेव राष्ट्रीय पार्क, भरतपुर (राजस्थान)

1985

4.   सुन्दरबन राष्ट्रीय पार्क (प. बंगाल)

1987

5.   नंदा देवी राष्ट्रीय पार्क चमोली (उत्तराखण्ड)

1988

6.   पश्चिमी घाट (सहयाद्री पर्वत) (मुख्यतः केरल में)

2012

7.   ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क

2014

        

रामसर कन्वेंशन के अनुसार - दलदली, ठहरे या अलवण जल के साथ 6 मीटर तक की लहरों वाला समुद्री क्षेत्र नम भूमि या आर्द्र भूमि के अंतर्गत आता है। नमभूमि भारत के कुल क्षेत्रफल के 4.63 प्रतिशत भाग पर फैली है। 2 फरवरी विश्व आर्द्रभूमि दिवस (World Wetland Day) क्योंकि 2 फरवरी 1971 को रामसर (ईरान में) समझौता सम्पन्न किया गया। लेकिन यह संधि दिसंबर 1975 में अस्तित्व में आई थी। मई 2014 तक इसके सदस्य राष्ट्र 168 हैं। सबसे ज्यादा साईट U.K. में 169 है। जबकि भारत में कुल साईट 26 हैं।

रामसर आर्द्रभूमि क्षेत्र (भारत में)

1.  Tsomorari – J & K – 120 वर्ग किमी.

2.  Nokrsar – J & K  – 13.75 वर्ग किमी.

3.  Surinsar Mansar Lake – J & K – 3.5 वर्ग किमी.

4.  Wular Lake – J & K – 189 वर्ग किमी.

5.  चंद्रताल - H.P. – 0.49 वर्ग किमी.

6.  पोंग बांध झील - H.P. – 156.62 वर्ग किमी.

7.  रेनुका झील - H.P. – 0.20 वर्ग किमी.

8.  रोपड़ - पंजाब - 13.65 वर्ग किमी.

9.  कंजली - पंजाब - 1.83 वर्ग किमी.

10. हरिके - पंजाब - 41 वर्ग किमी.

11. अपर गंगा नदी - U.P. - 265.9 वर्ग किमी.

12. केवलादेव राष्ट्रीय पार्क - राजस्थान - 28.73 वर्ग किमी 1.10.81 को घोषित

13. सांभर झील - राजस्थान - 240 वर्ग किमी.

14. भोज - मध्यप्रदेश - 32 वर्ग किमी.

15. भीतरकणिका - उड़ीसा - 650 वर्ग किमी.

16. चिल्का झील - उड़ीसा - 1165 वर्ग किमी.-1.10.81 को घोषित

17. पूर्वी कोलकाता - P.B. – 125 वर्ग किमी.

18. Deepor Beel – Assam – 40 वर्ग किमी.

19. अस्तमुड़ी - केरल - 614 वर्ग किमी.

20.    Sasthamkotta Lake – केरल - 3.73 वर्ग किमी.

21. Vembnad Kol Lake – केरल - 1512.5 वर्ग किमी.

22.    नालसरोवर पक्षी अभ्यारण्य - गुजरात - 123 वर्ग किमी.

23.    लोकटक झील - मणिपुर - 266 वर्ग किमी.

24.    रूद्रसागर झील - त्रिपुरा - 2.4 वर्ग किमी.

25.    कोल्लेरू झील - आंध्रप्रदेश - 901 वर्ग किमी.

26.    पोइंट केलीमेर - तमिलनाडु - 385 वर्ग किमी.

भारत में मैंग्रोव वनस्पति

          भारतीय कच्छ वनस्पति मुख्यतः तीन प्रकार के तटीय क्षेत्रों में पायी जाती है-

          1. डेल्टा       2. पश्च जल नदी मुहाने       3. द्वीपीय क्षेत्र।

डेल्टा क्षेत्र में उगने वाले मैंग्रोव मुख्यतः पूर्वी तट पर पाये जाते हैं जहां बड़ी नदियों जैसे- गंगा, ब्रह्मपुत्र, महानदी, कृष्णा, गोदावरी तथा कावेरी डेल्टा का निर्माण करती हैं। नदी मुहानों पर उगने वाली मैंग्रोव वनस्पति मुख्यतः पश्चिमी तट पर पायी जाती है जहां मुख्य नदियां जैसे- सिंधु, नर्मदा, ताप्ती आदि के मुहाने हैं। इन क्षेत्रों में नदियों द्वारा डेल्टा क्षेत्रों का निर्माण नहीं होता है। द्वीतीय मैंग्रोव वन मुख्यतः खाड़ियों में स्थित द्वीपों में पाये जाते हैं जहां छोटी नदियों, ज्वारीय क्षेत्रों तथा खारे पानी की झीलों में मैंग्रोव के उगने के लिए आदर्श परिस्थितियां उपस्थित होती हैं।

मैंग्रोव का महत्व -

मनुष्य द्वारा मैंग्रोव वनों का उपयोग अनेक रूपों में किया जाता है। पारम्परिक रूप से स्थानीय निवासियों द्वारा इनका प्रयोग भोजन, औषधि, टेनिन, इऔधन तथा इमारती लकड़ियों के लिये किया जाता रहा है। इनका मुख्य महत्व निम्न बिंदुओं को लेकर है-

1.   प्राकृतिक शरण स्थल

2.  भोजन के स्रोत

3.  प्राकृतिक जल शोधक

4.  सूर्य की पराबैंगनी B किरणों से बचाव

5.  हरित गृह प्रभाव को कम करना

6.  प्राकृतिक स्थायीकारी

7.  बाढ़ नियंत्रण

8.  तटीय क्षरण को कम करना

9.  तलछट को कम करना

10. औषधीय उपयोग

भारत में कुछ संरक्षित क्षेत्रों को समुद्री सुरक्षित क्षेत्र के अंतर्गत पूर्ण सुरक्षा प्राप्त है। भारत में कुल 26 ऐसे सुरक्षित क्षेत्र हैं जिनमें 17 अभ्यारण्य तथा राष्ट्रीय उद्यान हैं। इन सुरक्षित क्षेत्रों के अंतर्गत आने वाले मैंग्रोव क्षेत्र काफी हद तक सुरक्षित हैं। सुन्दरवन अब प्राकृतिक विश्व धरोहर स्थल के अंतर्गत आता है और इस श्रेणी में आने वाला यह विश्व का पहला मैंग्रोव क्षेत्र है।

ऐसा करके जंतुओं की तीन बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति अर्थात् (क) पर्याप्त भोजन और सुरक्षा (ख) आश्रय स्थल (वास-स्थान) और (ग) प्रजनन हेतु सुरक्षित स्थान की उपलब्धता सुनिश्ति होगी। इसके लिए निम्नलिखित उपाय अपेक्षित है।

1.   वन्य-जीवों को दोहन रोकने के लिए जैव आरक्षित क्षेत्रों राष्ट्रीय प्राणी उद्यान और वन्य जीव अभयारण्यों की स्थापना की गई है। यदि वन्य जीवन के दोहन पर पूर्ण रोक लगाना संभव न हो तो वनों की कटाई कड़े दिशा-निर्देशों के अंतर्गत एक चरणबद्ध रूप में की जाती है।

2.  एक धान्य कृषि अर्थात् कृषि भूमि में बार-बार एक ही प्रजाति के पौधों को उगाने को हतोत्साहित किया जाना चाहिए तथा इसके बदले मिश्रित कृषि पर बल दिया जाना चाहिए।

3.  जंतुओं के चोरी-छिपे शिकार पर रोक लगाने के लिए वनों के प्राकृतिक प्रवेश मार्ग़ों, जलमार्ग़ों और नदी तटों पर वन्य जंतुओं की सुरक्षा का ध्यान रखा जाना चाहिए।

4.  घास के मैदानों में चारे की उपलब्धता में वृद्धि करने और मृदा में कार्बनिक (जैविक) सामग्रियों को बनाए रखने के लिए बीच-बीच में अनजले क्षेत्रों को छोड़ते हुए जगह-जगह पर घास को जला देना चाहिए।

5.  वन्य जंतुओं के धूल स्नान की पर्याप्त व्यवस्था की जानी चाहिए। वनों में ऐसे कृत्रिम स्थान भी विकसित किए जाने चाहिए जहां जाकर वन्य जंतु नमक खां सकें या चाट सकें।

6.  वनों में पालतू मवेशियों को चराने पर रोक लगाई जानी चाहिए। ऐसा यह सुनिश्चित करने के लिए किया जाता है कि पालतू मवेशियों द्वारा वन्य जंतुओं में कोई रोग ने फैलाया जा सके।

7.  वन्य-जीव अभयारण्यों के निकट कृषि कार्य पर रोक लगाई जानी चाहिए ताकि कृषि कार्य में प्रयुक्त कीट नाशक रसायनों के कारण पारिस्थितिकीय संकट की स्थिति उत्पन्न न हो।

8.  जंतुओं की संकटापन्न प्रजातियों के संबंध में योग्य व्यक्तियों द्वारा वैज्ञानिक अध्ययन को बढ़ावा दिया जाना चाहिए ताकि उनकी स्थिति का मूल्यांकन किया जा सके और उसमें सुधार लाया जा सके। इस अध्ययन में उन पर समुचित निगरानी रखते हुए उन्हें प्रजनन हेतु उचित परिवेश उपलब्ध कराना और ऐसे वास-स्थान में उन्हें पुनर्वास प्रदान करना शामिल है जहां सूक्ष्म एक कोशिक पौधों और जंतुओं से लेकर विशाल पेड़ और विशाल शरीर वाले स्तनधारी जीव भी रहते हैं।

स्व-स्थनिक (या मूल-स्थानिक) संरक्षण हेतु किए गए उपाय

हाल के वर्ष़ों में वन्य जीवन के संरक्षण, प्रबंधन और इस संबंध में जागरूकता सृजन हेतु इंटरनेशनल यूनियन फॉर कन्जर्वेशन ऑफ नेचर एंड नेचुरल रिसोर्सेस, वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फंड इंटरनेशनल और इंटरनेशनल काउंसिल फॉर वर्ड प्रिजर्वेशन जैसे अनेक अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएँ काम कर रही हैं। भारत उपर्युक्त तीनों अंतराष्ट्रीय संस्थाओं का सदस्य देश है। इन संस्थाओं की सहायता और सुझाव से जीवमंडल और उसके संघटकों के संरक्षण हेतु हमारे देश में भी अनेक उपाय किए गए हैं। वन्य जीवन संरक्षण हेतु परियोजनाएं शुरू की गई हैं, जिनमें मुख्य हैं-

1.  बाघ परियोजना - भारत में यह परियोजना वर्ष 1973 में केन्द्र सरकार के सहयोग से शुरू की गई। प्रोजेक्ट टाइगर या बाघ परियोजना आरंभ में देश के विभिन्न पारिस्थितिक तंत्रों में स्थित नौ बाघ आरक्षित क्षेत्रों से शुरू की गई। बाद में इस प्रमुख प्रजाति की रक्षा हेतु स्थापित बाघ आरक्षित क्षेत्रों की संख्या धीरे-धीरे बढ़कर 27 हो गई। इन बाघ आरक्षित क्षेत्रों के अंतर्गत कुल 37,761 वर्ग किमी क्षेत्र शामिल किया गया है। इन प्रयासों के फलस्वरूप वर्ष 1997 की स्थिति के अनुसार बाघ आरक्षित क्षेत्रों में बाघों की कुल संख्या 1500 है।

2.  गिर सिंह परियोजना - एशियाई सिंहों को संरक्षण प्रदान करने के लिए गुजरात के गिर वन में गिर सिंह परियोजना शुरू की गई है। यह अभयारण्य जिसे राष्ट्रीय प्राणी उद्यान घोषित किया गया है लगभग 1300 वर्ग किमी क्षेत्र में फैला हुआ है। वास स्थान की दशा में सुधार होने तथा मनुष्य द्वारा कम हस्तक्षेप किए जाने के फलस्वरूप इस अभयारण्य में सिंहों की संख्या में वृद्धि हुई है।

3.  हंगुल परियोजना - यह परियोजना भारत और जम्मू और कश्मीर तथा हिमाचल प्रदेश के कुछ भागों में पाए जाने वाले लाल हिरन हंगुल, जो हिरनों की एक दुर्लभ उपप्रजाति है, को संरक्षण प्रदान करने के लिए शुरू की गई है। जम्मू एवं कश्मीर में स्थित डाचीगाम राष्ट्रीय प्राणी उद्यान हंगुल या कश्मीरी हिरन के लिए प्रसिद्ध है।

4.  हाथी परियोजना - यह परियोजना देश के उत्तर, पूर्वोत्तर और दक्षिणी भागों के हाथियों के प्राकृतिक वास-स्थानों की रक्षा करने के लिए वर्ष 1991-92 में शुरू की गई। बावजूद इसके मानव के क्रियाकलापों और प्राकृतिक वास-स्थानों को नष्ट किए जाने के कारण देश में हाथियों की संख्या में निरंतर कमी हो रही है।

5.  कस्तूरी मृग परियोजना - हिमालय क्षेत्र में कस्तूरी मृग पहले पाकिस्तान, म्यांमार (बर्मा) और तिब्बत तथा दक्षिणी-पश्चिमी चीन में पाए जाते थे। हालांकि कस्तूरी मृग परियोजना इस दुर्लभ प्रजाति की रक्षा के लिए बहुत पहले शुरू की गई थी, किन्तु वर्तमान में यह प्रजाति विलुप्त होने की कगार पर है।

6.  राष्ट्रीय प्राणी उद्यान और वन्य जीव अभयारण्य - हमारे देश के विभिन्न भागों में समृद्ध जैव-विविधता की रक्षा के लिए राष्ट्रीय प्राणी उद्यान और वन्य जीव अभयारण्यों की स्थापना की गई है। इन राष्ट्रीय प्राणी उद्यानों और अभयारण्यों में अत्यधिक दुर्लभ और बहुमूल्य प्रजातियों के पौधों और जंतुओं को प्राकृतिक वास-स्थान और संरक्षण प्रदान किया गया है।

7.  कुछ राष्ट्रीय प्राणी उद्यान - भारत में अत्यधिक दुर्लभ और बहुमूल्य प्रजातियों के पौधों और जंतुओं को संरक्षण प्रदान करने के लिए स्थापित किए गए कुछ महत्वपूर्ण राष्ट्रीय प्राणी उद्यानों को नीचे की तालिका में सूचीबद्ध किया गया है।

बाह्य स्थानिक संरक्षण            

1. संकटग्रस्त प्रजातियों को लुप्त होने से बचाना।

2. पृथ्वी की जैव-विविधता को बनाए रखना।

3. वन्य जीवों के संवर्धन से सम्बन्धित गतिविधियों को प्रोत्साहित करना।

1. सभी दुर्लभ जीव प्रजातियों को सुरक्षा प्रदान करना।

2. दुर्लभ जीवों के प्रजनन का प्रबन्ध करवाना।

3. दूसरे चिड़ियाघरों से प्रजनन हेतु जीवों के आदान-प्रदान का प्रबन्ध करवाना।

4. लोगों में वन्य जीवन से संबंधित चेतना का विकास करना।

5. शिक्षा तथा मनोरंजन के स्थान उपलब्ध करवाना।

मानव और वन्य-जीव के बीच हित-संघर्ष -

भारत की जैव-विविधता

प्रजातियों की समूहवार संख्या

1.  समुचित विधि और प्रशासनिक उपायों से वन्य जीवों के संरक्षण को बढ़ावा देना और चोरी-छिपे शिकार करने को प्रभावी रूप से रोकने के उपायों के विषय में केंद्र तथा राज्य सरकारों को परामर्श देना।

2.  राष्ट्रीय उद्यानों, अभयारण्यों तथा प्राणी उद्यानों की स्थापना करने के विषय में सलाह देना।

3.  जीवित पशुओं तथा वन्य जीवों की ट्राफियों, खालों लोम, चर्म (फर), पंखों तथा अन्य उत्पादों के निर्यात के बारे में सरकार को राय देना।

4.  देश में वन्य जीव संरक्षण के क्षेत्र में प्रगति की समय-समय पर पुनरीक्षण करना और सुधार के लिए आवश्यक उपाय सुझाना।

5.  वन्य जीवों तथा प्रकृति और मानव पर्यावरण के अनुकूल उनके परिरक्षण की आवश्यकता के प्रति लोगों में रूचि पैदा करना।

6.  वन्य जीव सोसायटियों के गठन के लिए सहायता तथा प्रोत्साहन देना और इस तरह के सभी निकायों के लिए केंद्रीय समन्वय एजेंसी के रूप में कार्य करना।

7.  जिन उद्देश्यों के लिए बोर्ड का गठन किया गया है उनके अनुकूल इस तरह के कार्य करना।

8.  बोर्ड को भेजे जाने वाले किसी भी मामलें पर केंद्र सरकार को सलाह देना बशर्ते कि इसका विषय बोर्ड के निर्धारित कार्य़ों में आता हों।

9.  ऐसे सभी कार्य, जिन्हें बोर्ड वन्य जीवों के परिरक्षण तथा संरक्षण के लिए जरूरी, उचित या सहायक समझे या इस तरह के अन्य प्रयोजनों, जिनके लिए इसका गठन किया गया है, को या तो अकेले अथवा अन्य के सहयोग से या भारत सरकार के निर्देश पर करना। इनमें वे कार्य भी शामिल हैं जो इसमें बताए गए हैं।

वन्य जीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972

इस अधिनियम के अंत में पांच अनुसूचियां हैं, जो निम्न प्रकार हैं -

1.प्रथम अनुसूची में उन दुर्लभ और संकटापन्न वन्य प्रजातियों की सूची है। जिनको सुरक्षा प्रदान की गई है। इनका शिकार करना धारा 9 के अनुसार निषेध है।

2.  दूसरी से चौथी अनुसूची में दिए गए वन्य पशु-पक्षियों के शिकार पर भी पूर्ण प्रतिबंध है।

अधिनियम की धारा 11 के अनुसार इन वन्य पशुओं में से किसी का तभी शिकार किया जा सकता है जब वह मानव जीवन के लिए खतरनाक हो गया हो या वह इतना असक्षम या रूग्ण हो जाए कि उसके स्वस्थ होने की संभावना ही शेष न रहे। अनुसूची 2 से 4 तक के पशुओं को मारने के लिए एक अन्य कारण यह भी हो सकता है कि वह संपत्ति, जिसमें खड़ी फसल भी शामिल है, के लिए खतरनाक हो जाए।

धारा 12 के अनुसार मुख्य वन्य जीव संरक्षक किसी व्यक्ति को लिखित रूप से कारणों व शर्त़ों के साथ, समुचित शुल्क देने पर, शिक्षा, वैज्ञानिक अनुसंधान और वैज्ञानिक प्रबंध के लिए, किसी पशु का शिकार करने की आज्ञा दे सकता है।

3.  पांचवीं अनुसूची उन पशुओं की है जो कष्टदायक या पीड़क (वरमिन) हैं ओर जिनको बिना रोक-टोक मारा जा सकता है।

इस अधिनियम के लागू हो जाने से संपूर्ण देश में वन्य जीवों के लिए एक समान विधि व्यवस्था हो गई है जिसके तहत दुर्लभ और संकटापन्न प्रजातियों को पूर्ण सुरक्षा प्रदान की गई है और अन्य वन्य जीवों की सुरक्षा के लिए बने कानूनों में बहुत विभिन्नता थी और उनमें अपराधों के लिए दो दंड निर्धारित किए गए थे। वे अपराधों की गंभीरता के आनुपातिक नहीं थे, न ही अर्थ दंड अपराधों से होने वाले आर्थिक लाभों के अनुरूप थे। उनसे अपराधियों में कोई भय की भावना नहीं होती थी। इस अधिनियम का उद्देश्य इन सब कमियों को दूर करना था जिससे भारत में पाए जाने वाले वन्य पशु-पक्षी यथेष्ट संख्या में जीवित रह सकें और किसी भी पशु-पक्षी की प्रजाति, सुरक्षा के अभाव में, लुप्त न हो सके।

भारत 1976 में वन्य प्राणिजाति और वनस्पति जाति की संकटापन्न प्रजातियों के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार संबंधी अनुबंध (कान्वेंशन आन इंटरनेशनल ट्रेड इन एनडेंजर्ड स्पीसीज आफ वाइल्ड फौना एंड फ्लोरा-साईट्स) का हस्ताक्षरकर्त्ता बना। जो देश इन कन्वेंशन के हस्ताक्षरकर्त्ता हैं, वे उन प्राणि और वनस्पति प्रजातियों का, जिनकी सूची कन्वेंशन की अनुसूची में दी गई है, बिना आज्ञापत्र के आयात निर्यात नहीं कर सकते।

आईची लक्ष्य (Aichi Target)

नागोया प्रोटोकॉल

जैव विविधता सम्मेलन (कॉप-11) और भारत

कॉप-11 के कुछ मुख्य बिन्दु

कन्वेंशन ऑन बायोडाइवर्सिटी (सीबीडी)

     इस संधि के तीन मुख्य उद्देश्य निर्धारित किये गये हैं-