पर्यावरणीय समस्यायें और उनके निदान हेतु वैश्विक रणनीति
पर्यावरण अंग्रेजी भाषा के शब्द Environment का हिन्दी अर्थ है। जो फ्रेंच शब्द Environ से बना है।
Environ का अर्थ होता है- आसपास का आवरण।
हिन्दी शब्द पर्यावरण (परि+आवरण) का अर्थ ओता है। परि= चारों तरफ, आवरण= घेरा, अर्थात् प्रकृति में जो भी चारों तरफ परिलक्षित है जैसे वायु, जल, मिट्टी, पेड़-पौधे, जीव-जन्तु सभी पर्यावरण के अंग है।
प्रकृति में पाए जाने वाले-
(i) निर्जीव भौतिक घटकों - वायु, जल, मृदा आदि।
(ii) जैविक घटकों - पेड़-पौधे, जीव-जंतु, सूक्ष्म जीवाणु आदि के आधार पर पर्यावरण को मुख्यतः दो भागों में विभाजित किया गया है-
(a) भौतिक पर्यावरण (अजैविक पर्यावरण)
(b) जैविक पर्यावरण
पर्यावरण के प्रकार
पर्यावरण की प्रकृति गतिशील है। भौतिक तथा जैविक पर्यावरण के तत्त्वों में सदैव कुछ न कुछ परिवर्तन होता रहता है। पर्यावरण के परिवर्तन का प्रभाव पेड़-पौधों और जीव जन्तुओं पर होता है।
आज से 10 लाख वर्ष पूर्व पर्यावरण में आए परिवर्तन के कारण मनुष्य का विकास हुआ था।
पर्यावरणीय समस्याऐं
समस्याओं का वर्गीकरण :-
इन्हें तीन वर्ग़ों में बाँटा जा सकता है।
(A) स्थलीय वातावरण से संबंधित समस्याएं
(B) वायुमण्डलीय वातावरण से संबंधित समस्याएं
(C) जैविक वातावरण से संबंधित समस्याएं
(A) स्थलीय वातावरण से संबंधित समस्याएं -
1. मृदा प्रदूषण
2. जल प्रदूषण
3. वनों का विनाश
1.मृदा प्रदूषण -
जब भूमि में प्रदूषित जल, रसायनयुक्त कीचड़, कूड़ा, कीटनाशक दवा और उर्वरक अत्यधिक मात्रा में प्रवेश कर जाते हैं तो उससे भूमि की गुणवत्ता घट जाती है। इसे मृदा-प्रदूषण कहा जाता है। मृदा-प्रदूषण की घटना भी आधुनिकता की देन है।
मृदा-प्रदूषण के कारण
(1)कीटनाशक व उर्वरक- कीटनाशक व उर्वरक मृदा-प्रदूषण के प्रमुख कारण हैं। इनके प्रयोग से फसलों की प्राप्ति तो हो जाती है, लेकिन जब वे तत्त्व भूमि में एकत्रित हो जाते हैं तो मिट्टी के सूक्ष्म जीवों का विनाश कर देते हैं। इससे मिट्टी का तापमान प्रभावित होता है और उसके पोषक तत्त्वों के गुण समाप्त हो जाते हैं।
(2)घरेलू अवशिष्ट-कूड़ा-कचरा, गीली जूठन, रद्दी, कागज, पत्तियां, गन्ना-अवशिष्ट, लकड़ी, कांच व चीनी मिट्टी के टूटे हुए बर्तन, चूल्हे की राख, कपड़े, टीन के डिब्बे, सडे-गले फल व सब्जियाँ, अंडों के छिलके आदि अनेक प्रकार के व्यर्थ पदार्थ मिट्टी में मिलकर मृदा-प्रदूषण को बढ़ावा देते हैं।
(3)औद्योगिक अवशिष्ट- उद्योगों से निकल व्यर्थ पदार्थ किसी न किसी रूप में मृदा-प्रदूषण का कारण बनते हैं।
(4)नगरीय अवशिष्ट- इसके अन्तर्गत मुख्यतः कूड़ा-करकट, मानव मल, सब्जी बाजार के सड़े-गले फल व सब्जियों का कचरा, बाग-बगीचों का कचरा, उद्योगों, सड़कों, नालियों व गटरों का कचरा, मांस व मछली बाजार का कचरा, मरे हुए जानवर व चर्मशोधन का कचरा, आदि को सम्मिलित किया जाता है। इन सबसे मृदा-प्रदूषण होता है।
मृदा-प्रदूषण नियंत्रण के उपाय
व्यर्थ पदार्थों व अवशिष्टों का समुचित निक्षेपण किया जाना चाहिए।
कृषि कार्यों में डी.डी.टी., लिण्डेन, एल्ड्रिन तथा डीलिड्रन आदि के प्रयोग पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए।
नागरीकों को चाहिए कि वे कूड़ा-कचरा सड़क पर न फैंके।
अस्वच्छ शौचालयों के स्थान पर स्वच्छ शौचालयों का निर्माण करना चाहिए।
अवशिष्टों के निक्षेपण को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
नागरिकों में सफाई के प्रति चेतना जागृत करनी चाहिए।
मृदा-क्षरण को रोकने के उपाय करने चाहिए।
2.जल प्रदूषण -
जल में किसी ऐसे बाहरी पदार्थ की उपस्थिति, जो जल के स्वाभाविक गुणों को इस प्रकार परिवर्तित कर दे कि जल स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह हो जाय या उसकी उपयोगिता कम हो जाय, जल प्रदूषण कहलाता है।
जल प्रदूषण निवारण तथा नियन्त्रण अधिनियम, 1974 की धारा 2 (ड) के अनुसार जल प्रदूषण का अर्थ है- जल का इस प्रकार का संक्रमण या जल के भौतिक, रासायनिक या जैविक गुणों में इस प्रकार का परिवर्तन या किसी (व्यापारिक) औद्योगिक बहिःस्राव का या किसी तरल वायु (गैसीय) या ठोस वस्तु का जल में विसर्जन जिससे उपताप हो रहा हो या होने की सम्भावना हो।
या ऐसे जल को नुकसानदेह तथा लोक स्वास्थ्य को या लोक सुरक्षा को या घरेलू, व्यापारिक, औद्योगिक, कृषीय या अन्य वैधपूर्ण उपयोग को या पशु या पौधों के स्वास्थ्य तथा जीव-जन्तु को या जलीय जीवन को क्षतिग्रस्त करें।
वे वस्तुएं एवं पदार्थ जो जल की शुद्धता एवं गुणों को नष्ट करते हों, प्रदूषक कहलाते हैं।
जल प्रदूषण के स्रोत अथवा कारण -
जल प्रदूषण के सेतों अथवा कारणों को दो वर्ग़ों में बांटा जा सकता है-
1. प्राकृतिक स्रोत 2. मानवीय स्रोत।
जल प्रदूषण के प्राकृतिक स्रोत -
इसके अतिरिक्त नदियों, झरनों, कुओं, तालाबों का जल जिन स्थानों से बहकर आता है या इकट्ठा रहता है, वहां की भूमि में यदि खनिजों की मात्रा है तो वह जल में मिल जाता है। वैसे तो इसका कोई गम्भीर प्रभाव नहीं होता है।
परन्तु यदि जल में इसकी मात्रा बढ़ जाती है तो नुकसानदेह साबित होते हैं।
यही कारण है कि किसी क्षेत्र विशेष में एक ही बीमारी से बहुत से लोग पीड़ित होते हैं क्योंकि उस क्षेत्र विशेष के लोग एक जैसे प्राकृतिक रूप से प्रदूषित जल का उपयोग करते हैं।
जल में जिन धातुओं का मिश्रण होता है उन्हें विषैले पदार्थ कहते हैं- जैसे सीसा, पारा, आर्सेनिक तथा कैडमियम।
इसके अतिरिक्त जल में बेरियम, कोबाल्ट, निकल एवं वैनेडियम जैसी विषैली धातुएं भी अल्पमात्रा में पायी जाती हैं।
जल प्रदूषण के मानवीय स्रोत -
जल प्रदूषण के मानवीय स्रोत अथवा कारण हैं-
1. घरेलू बहिःस्राव (Domestic effluent)
2. वाहित मल (Sweage)
3. कृषि बहिःस्राव (Agricultural effluent)
4. औद्योगिक बहिःस्राव (Industrial effluent)
5. तेल प्रदूषण (Oil pollution)
6. तापीय प्रदूषण (Thermal pollution)
7. रेडियोधर्मी अपशिष्ट एवं अव्पात (Radioactive wastes and fall outs)
8. अन्य कारण (Other causes of pollution)
जल प्रदूषण का प्रभाव (Effect of Water Pollution)
जल प्रदूषण का प्रभाव बहुत ही खतरनाक होता है। इससे मानव तो बुरी तरह प्रभावित होता ही है, जलीय जीव-जन्तु, जलीय पादप तथा पशु-पक्षी भी प्रभावित होते हैं।
1. जलीय जीव-जन्तुओं पर प्रभाव
2. जलीय पादपों पर प्रभाव
3. पशु-पक्षियों पर प्रभाव
4. मानव पर प्रभाव
5. जल प्रदूषण के कुछ अन्य प्रभाव
(i) पेयजल का अरुचिकर तथा दुर्गन्धयुक्त होना
(ii) सागरों की क्षमता में कमी
(iii) उद्योगों की क्षमता में कमी
जल में विद्यमान रोगकारक तथा उनसे होने वाले रोग

रासायनिक अवयव तथा स्वास्थ्य पर उनका प्रभाव

3. वनों का विनाश -
(B) वायुमण्डलीय वातावरण से संबंधित समस्याएं -
वायुमंडलीय वातावरण से संबंधित समस्याएँ - जीवाश्मी ऊर्जा (कोयला, पेट्रोल, डीजल, गैस आदि) के अत्यधिक प्रयोग, वनों के तीव्र विनाश, परिवहन साधनों के उपयोग में भारी वृद्धि आदि के कारण वेश्विक जलवायु परिवर्तन देखने को मिले हैं।
वायुमडलीय वातावरण से संबंधित असंतुलन मुख्यतः तीन प्रकार के हैं -
(क)ओजोन छिद्र (Ozone Hole)
(ख)भूमंडलीय तापन (Global Warming)
(ग)अम्लीय वर्षा (Acid Rain)
(क)ओजोन छिद्र (Ozone Hole) -
समताप मंडल के ऊपरी भाग में पायी जानेवाली ओजोन परत सूर्य के पराबैंगनी किरणों को अवशोषित कर लेती है।
इन किरणों से चर्म रोग होने का खतरा रहता है तथा कृषि व जलवायु पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है।
ओजोन परत से सूर्य की पराबैंगनी किरणों की 70 से 90 प्रतिशत तरंगें छन जाती है।
ओजोन परत में छेद सर्वप्रथम फॉरमैन द्वारा 1973 में अंटार्कटिका में देखा गया था।
अंटार्कटिका के ऊपर स्थित ओजोन परत के इस छेद में सामान्यतः सितम्बर व अक्टूबर के दौरान ही वृद्धि होती है।
ओजोन परत में छेद होने का प्रमुख कारक क्लोरिन है।
इसकी उत्पति क्लोराफ्लोरो कार्बन, हैलोजेन्स व इनसे संबंधित कुछ अन्य पदार्थ कार्बन, टेट्राक्लोरीन व मिथाइल क्लोरोफार्म जैसे रसायनों से होती है।
वैज्ञानिकों के अनुसार क्लोरीन का एक अणु ओजोन के 1 लाख अणुओं को तोड़ सकता है।
रेफ्रिजरेशन, एयर कंडीशनिंग व प्लास्टिक आदि ने ओजोन परत को छेदने में प्रमुख भूमिका निभाई है।
इनसे उत्सर्जित होने वाले क्लोरोफ्लोरो कार्बन (HFC), मिथाइल ब्रोमाइड आदि रसायनों के बढ़ते उपयोग से तथा जेट विमानों द्वारा उत्सर्जित नाइट्रोजन ऑक्साइड के कारण ओजोन परत में छिद्र की समस्या उत्पन्न हो गई है।
पृथ्वी पर चर्म कैंसर के लिए अंटार्कटिक के ऊपर के ओजोन छिद्र को उत्तरदायी समझा जाता है।
चिली के भेड़ो में अंधापन, अंटार्कटिक में प्लैंक्टन घास के खत्म होने की प्रवृति, ऑस्टेलिया के पूर्वी तट पर प्रवाल जीवों के असामयिक विनाश का कारण भी इसी छ्रिद्र को माना जा रहा है।
एक नए ओजाने छिद्र का पता आर्कटिक सागर के ऊपर चला है जिसका प्रतिकूल प्रभाव उ. गोलार्द्ध में होने की आशंका है।
ओजोन परत में बढ़ते छिद्र को रोकने के लिए 1987 ई. में मांट्रियल संधि (कनाडा) में एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया गया था, जिसमें विभिन्न राष्ट्रों की सहमति ली गई है।
(ख)भूमंडलीय तापन (Global waming) -
औद्योगिक क्रांति के बाद से वायुमंडल में कार्बन-डाई-आक्साइड (CO2), कार्बन-मोनो-ऑक्साइड (CO),मीथेन (CH4), क्लोरो-फलोरो-कार्बन (CFC), हाइड्रो -फ्लोरो कार्बन (HFC) आदि ग्रीन हाउस गैसों की मात्रा में तीव्र वृद्धि हुई है।
इनमें भी भूमंडलीय तापन के लिए मुख्यतः CO2 जिम्मेदार है।
यह भारी गैसों में आती है एवं वायुमंडल के पार्थिव विकिरण के लिए अपारगम्यता को बढ़ाती है।
इस कारण ग्रीन हाउस प्रभाव उत्पन्न होते हैं और तापमान में वृद्धि देखी जाती है।
यदि वायुमंडल में CO2 की मात्रा इसी तरह बढ़ती रही तो 1900 ई. की तुलना में 2030 ई. में विश्व के तापमान में 30C की वृद्धि हो जाएगी।
भूमंडलीय तापन के कारण हिम क्षेत्र पिघलेंगे जिसके परिणामस्वरूप समुद्री जलस्तर 2.5 से 3 मी. तक बढ़ जाएगा।
इससे अनेक द्वीपों और तटीय क्षेत्रों के डूबने की आशंका है।
उदाहरण के लिए प्रशांत महासागर का तुवालू और कारटरेट द्वीप डूब गए हैं एवं मालदीव के भी जलमग्न होने की आशंका है।
तापमान बढ़ने के कारण अनेक सूक्ष्म जीव व जीव-जन्तु विनष्ट हो सकते है ंएवं जैव-विविधता में कमी आएगी।
अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी ‘नासा’ के गोड्डार्ट इंस्टीट्यूट फॉर स्पेस स्टडीज के आंकलन के अनुसार पिछली एक सदी में सर्वाधिक गर्म पांच वर्ष पिछले एक दशक में ही रहे है।
सन् 2012 अब तक का सबसे गर्म वर्ष रहा है।
(ग) अम्लीय वर्षा (Acid Rain)
वायुमंडल में सल्फर डाइऑक्साइड नाइट्रोजन के ऑक्साइड, क्लोरीन व फ्लोरीन जैसे हैलोजन पदार्थों के मिलने से वर्षा में अम्लीयता की मात्रा बढ़ी है।
जब वर्षा जल का PH मान 5 से नीचे आ जाता है तो यह अत्यधिक हानिकारक हो जाता है।
वर्षा में सल्फ्युरिक अम्ल, नाइट्रिक अम्ल, हाइड्रोक्लोरिक अम्ल आदि के मिश्रण का पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता हैं।
वनस्पति के क्लोरोफिल पर भी इसका विपरीत प्रभाव पड़ता है एवं उनकी प्रकाश संश्लेषण की क्रिया बाधित होती है।
इससे उनके पत्ते पीले पड़ने लगते हैं और वनस्पति जल्दी नष्ट हो जाती है।
झीलों में अम्लीयता के बढ़ने से नार्वे, अमेरिका व कनाडा जैसे देशों के मत्स्य-उद्योग पर प्रतिकूल असर पड़ा है।
संगमरमर की इमारतों पर भी इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
ताजमहल के संदर्भ में इसे समझा जा सकता है।
(C)जैविक वातावरण से संबंधित समस्याएँ -
पारिस्थितिक संतुलन का सर्वाधिक प्रतिकूल प्रभाव जीवमंडल के जैविक संरचना पर पड़ा है।
UNEP के एक रिपोर्ट के अनुसार प्रतिदिन 50 जीव-जन्तुओं की प्रजातियाँ विलुप्त होने की श्रेणियों में आ रहे हैं।
यह जैविक विनाश वनों के विनाश से भी संबंद्ध है।
प्रेयरी भैंस, सफेद हाथी, सफेद बाघ, दरयाई घोड़ा, चिम्पांजी, व्हेल, डॉल्फिन, प्रवाल जीव आदि अत्यधिक संकटग्रस्त स्थिति में हैं।
पुनः जैव - तकनीकी से उत्पन्न ट्रांसजेनिक बीजों एवं जीवों के कारण पंरपरागत बीज व जीव क्रमशः विलीन होते जा रहे है।
मानव की संख्या में अनियंत्रित वृद्धि व प्रकृति के अनियोजित व अनियंत्रित दोहन से खाद्य - श्रृंखला प्रतिकूल रूप से प्रभावित हुआ है।
पर्यावरणीय समस्याओं के निदान हेतु
वैश्विक रणनीति
1. पर्यावरण पर स्टाकहोम सम्मेलन(Stockholm Conference on Environment)
संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा 5 जून 1972 में स्वीडन की राजधानी स्टाकहोम में आयोजित पर्यावरण सम्मेलन में वैज्ञानिकों ने नदी जल प्रदूषण, वन विनाश, वायु प्रदूषण, खाद्य अपमिश्रण, परमाणु परीक्षण तथा औद्योगिक बस्तियों के विस्तार पर चिंता व्यक्त की।
स्टाकहोम सम्मेलन में जारी मानवीय पर्यावरण संबंधी घोषणा मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा की तरह महत्वपूर्ण है।
स्टाकहोम सम्मेलन में दिए गए सुझाव के अनुसार प्रतिवर्ष 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है।
पर्यावरण के स्टाकहोम सम्मेलन की सिफारिश के अनुरूप विश्व स्तर पर पर्यावरण कार्यक्रमों का समन्वय करने के लिए 58 सदस्यीय संयुक्त राष्ट्रीय पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP - United Nations Environment Programme) की स्थापना की गई।
संयुक्त राष्ट्रीय पर्यावरण कार्यक्रम का मुख्यालय नैरोबी (केन्या) में स्थापित किया गया।
किसी विकासशील देश में स्थापित की गई संयुक्त राष्ट्र संगठन की यह प्रथम एजेंसी है।
2. रियो पृथ्वी सम्मेलन
पर्यावरण एवं विकास पर सं.रा.सं. का प्रथम सम्मेलन 13-14 जून, 1992 के बीच ब्राजील के रियो डि जेनेरियो नगर के आयोजित किया गया।
पृथ्वी-1 के नाम से प्रसिद्ध रियो सम्मेलन में आगामी शताब्दी के लिए विकास एवं पर्यावरण संबंधी एजेण्डा-21 को स्वीकार किया गया।
रियो पृथ्वी सम्मेलन में हस्ताक्षरित विश्व जैव विविधता संधि 29 दिसम्बर, 1993 को लागू हो गई।
अमेरिका ने अभी तक इस जैव विविधता संधि पर हस्ताक्षर नहीं किए।
रियो पृथ्वी सम्मेलन में स्वीकार किए गए एजेण्डा 21 नामक दस्तावेज में संतुलित एवं पर्यावरण पोषणीय विकास (Sustainable Development) के उपायों का उल्लेख किया गया है।
रियो सम्मेलन की सिफारिश पर संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा एजेण्डा 21 के क्रियान्वयन की निगरानी हेतु 53 सदस्यीय सतत् विकास आयोग का गठन किया गया।
यह आयोग आर्थिक एवं सामाजिक परिषद के अधीन कार्य करता है।
3. संयुक्त राष्ट्र पृथ्वी शिखर सम्मेलन
वर्ष 1992 के रियो पृथ्वी शिखर सम्मेलन में घोषित कार्यक्रमों की प्रगति की समीक्षा करने के लिए जून 1997 में न्यूयार्क में संयुक्त राष्ट्र पृथ्वी शिखर सम्मेलन आयोजित किया गया।
170 देशों के प्रतिनिधियो के इस सम्मेलन में वनों के क्षेत्र में कमी तथा लुप्त हो रही प्रजातियों पर चिंता व्यक्ति की गई।
सम्मेलन में वन संरक्षपण, जहरीली गैसों के उत्सर्जन, पर्यावरण के अनुकूल तकनीकी के वित्तपोषण व इसके आसान हस्तान्तरण पर गहन विचार विमर्श हुआ परन्तु कोई समझौता संभव नहीं हो सका।
सितम्बर 2002 को दक्षिण अफ्रीका के जोहान्सबर्ग में संपन्न 189 देशों के पृथ्वी सम्मेलन में पर्यावरण को हुई क्षति की भरपाई करने तथा गरीबी दूर करने का संकल्प लिया गया।
4. ग्लोबल वार्मिंग पर क्योटो प्रोटोकाल
बढ़ते हुए तापमान के दुष्प्रभावों से पृथ्वी की रक्षा करने हेतु जापान के शहर क्योटो मे दिसम्बर, 1997 को ग्लोबल वार्मिंग सम्मेलन आयोजित किया गया।
इस सम्मेलन में वैश्विक तापन हेतु उत्तरदायी गैसों के उत्सर्जन को नियंत्रित करने के लिए सभी राष्ट्रों के बीच सहमति हुई।
क्योटो सम्मेलन इस सम्मेलन में यह निर्णय लिया गया कि सन् 2008 से 2012 तक अवधि में तीन प्रमुख ग्रीन हाउस गैसों अर्थात कार्बनडाई आक्साइड, मिथेन, नाइट्स ऑक्साइड के 1990 के उत्सर्जन स्तर में औसतन पांच प्रतिशत की कमी लायी जायेगी।
इसके अंतर्गत 2008 से 2012 तक -
यूरोपीय संघ के सदस्य देश - 8 प्रतिशत,
जापान - 6 प्रतिशत
अमेरिका - 8 प्रतिशत
तक ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी करके इसे 1990 के स्तर तक ले जाएंगे।
क्योटो प्रोटोकाल के अंतर्गत यूरोपीय संघ के देशों, जापान तथा अमेरिका के अलावा 21 अन्य औद्योगिक राष्ट्र तथा प्रोटोकाल पर हस्ताक्षर करने वाले अन्य देश, 2008 से 2012 तक 6 ग्रीनहाउस गैसों-
कार्बनडाई आक्साइड
मीथेन
नाइट्रस आक्साइड
हाइड्रोफ्लोरो कार्बन्स
परफ्यूरोकार्बन्स
सल्फर हैक्साफ्लोराइड के उत्सर्जन में कमी करेंगे।
‘विश्व पर्यावरण तथा ग्रीन हाउस सम्मेलन’ के नाम से चर्चित इस अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन की अध्यक्षता राउल प्रस्टाडा ने की थी।
अद्यतन इस क्योटो प्रोटोकाल को विश्व के 25 देशों ने अनुमोदित कर दिया है।
क्योटो प्रोटाकाल को यूरोपीय संघ के देशों तथा रूस ने स्वीकार कर लिया है, परन्तु अमेरिका ने इस संधि को अभी तक स्वीकार नहीं किए।
द हेग (नीदरलैण्ड) में नवम्बर 2000 में मौसम परिवर्तन पर छठा संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन का आयोजन हुआ।
5. पर्यावरण पर बैंकाक सम्मेलन
30 अप्रैल, 2007 को थाईलैण्ड की राजधानी बैंकाक में जलवायु परिवर्तन पर एक सम्मेलन प्रारंभ हुआ।
जलवायु परिवतन पर संयुक्त राष्ट्र द्वारा गठित अंतरसरकारी पैनल (I.P.C.C. - Intergovernmental Panel on Climate Change) की यह तीसरी बैठक थी।
इसका उद्देश्य जलवायु परिवर्तन के संबंध में तकनीकी एवं अर्थव्यवस्था के विभिन्न पहलुओं के बारे में निश्चित दिशा निर्देशों का तय किया जाना है, ताकि 2030 तक पूरी दूनिया में हानिकारक कार्बन गैसों के उत्सर्जन पर रोक लगाया जा सके।
इस अंतरसरकारी पैनल (I.P.C.C.) के अध्यक्ष राजेन्द्र पचौरी हैं।
4 मई, 2007 को इस सम्मेलन से संबंधीत एक रिपोर्ट प्रस्तुत की गई जिसमें वैज्ञानिकों ने सहमति व्यक्ति की है कि पृथ्वी के बढ़ते तापमान और जलवायु परिवर्तन से मानव समेत सभी जीव-जंतुओं और वनस्पतियों के अस्तित्व पर आये संकट को टालने के लिए अगले 50 वर्षों में ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में 85 प्रतिशत तक की भारी कटौती करनी होगी, जो बहुत थोड़ी कीमत पर हासिल हो सकेगी तथा जिसमें वैश्विक सकल घरेलू उत्पादन में मात्र 0.12 प्रतिशत का घाटा उठाना होगा।
120 देशों के 400 पर्यावरण वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों द्वारा तैयार रिपोर्ट में परमाणु ऊर्जा से लेकर उर्वरक उत्पादन तक औद्योगिक और मानवीय गतिविधियों में परम्परागत तरीकों की जगह पर्यावरण के अनुकूल नई प्रौद्योगिकी और वैज्ञानिक तरीके अपनाने की शिफारिश की गई है।
6. नूसादुआ-बाली सम्मेलन
सयंक्त राष्ट्र के नेतृत्व में 3-15 दिसंबर 2007 तक इंडोनेशिया के बाली द्वीप में स्थित नूसादुआ में विश्व जलवायु सम्मेलन आयोजित किया गया।
इस सम्मेलन में 193 देशों के 11000 प्रतिनिधयों ने हिस्सा लिया।
बाली सम्मेलन के दौरान ग्लोबल वार्मिग की मौजूदा स्थिति पर चिंता व्यक्त की गई तथा जलवायु परिवर्तन पर क्योटो संधि के स्थान पर नई संधि लागू करने की सहमति दी गई।
नई संधि के अंतर्गत ही वर्ष 2009 के अंत में डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगेन में एक दौर की वार्ता का प्रावधान किया गया।
आस्टेलिया के प्रधानमंत्री केविन रूड ने इस सम्मेलन को संबोधित किया।
बैठक में भारतीय शिष्टमण्डल का प्रतिनिधित्व केन्द्रीय विज्ञान मंत्री कपिल सिब्बल ने किया।
इस अवसर पर जारी रिपोर्ट ने कहा गया है कि सभी देशों द्वारा बदली परिस्थितियों का सामना करने के लिए कडे कदम उठाने आवश्यक है।
वैज्ञानिक मत के अनुसार वायुण्मण्डल में कार्बन डाईऑक्साइड की मात्रा तेजी से बढ़ती जा रही है।
अगर इस विषय पर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया गया तो जीव-जंतुओं, वनस्पति एवं मानवीय संसाधन के अस्तित्व पर संकट आ सकता है।
अतः यह जरूरी है कि आने वाले तीन-चार वर्ष़ों में कार्बन डाई-ऑक्साइड के स्तर को कम किया जाये।
बाली सम्मेलन में I.P.C.C. की रिपोर्ट को भी शामिल किया गया। जिसमें यह कहा गया है कि वायुमण्डल में ग्रीन हाउस गैसों की मात्रा 450 PPM से अधिक नहीं होनी चाहिए।
सम्मेलन में प्रमुख औद्योगिक देशों से ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी लाने की अपील की गई।
बाली रोडमैप में यह किए गए लक्ष्य :-
वर्ष 2009 में कोपेनहेगन में होने वाली बैठक में क्योटो संधि के स्थान पर एक अन्य संधि का प्रावधान किया जाएगा जिस पर हस्ताक्षर करने वाले देशों को इसे मानने के लिए 2-3 वर्ष का समय दिया जायेगा।
विकासशील देशों से उत्सर्जन में कमी लाने के साथ-साथ वित्त एवं तकनीक संबंधी सहायता उपलब्ध किए जाने की अपील की गई।
बाली रोडमैप पर जारी प्रस्तावों की प्रगति के संदर्भ में वर्ष 2008 में चार बैठकों का आयोजन किया जायेगा।
प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने की दिशा में जंगलों के क्षय पर विशेष कदम उठाने की योजना है।
ग्लोबल वार्मिंग की समस्या को देखते हुए इससे संबंधित सभी दुष्परिणामों एवं उपायो पर ध्यान दिया जायेगा।
कार्बन प्रदूषण को खत्म करने के लिये उच्चतम तकनीक के इस्तेमाल को प्राथमिकता दी जायेगी।
ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन की दर को 2050 तक वर्ष 2000 तक के स्तर पर लाने की बात कही गई है।
इस सम्मेलन के अंतर्गत UNFCC के विशेषज्ञों को स्वच्छ वातावरण हेतु विभिन्न योजनाओं पर अपनी रिपोर्ट पेश करने को कहा गया है।
अविकसित देशों को जलवायु समस्या से निपटने के लिए सहायता हेतु अनुकूलन फंड की देखरेख पर सहमति हुई है।
इसके अंतर्गत स्वच्छ वातावरण क्रियान्वयन वाली परियोजनाओं पर 2% का कर लगाया जाने का प्रावधान है।
7. कोपेनहेगन सम्मेलन
जलवायु परिवर्तन को लेकर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन 6 से 18 दिसंबर, 2009 को डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगेन में आयोजित किया गया।
इस सम्मेलन का अध्यक्ष डेनमार्क था।
इस सम्मेलन में कोई बाध्यकारी समझौता नहीं हुआ।
इस सम्मेलन का वास्तविक परिणाम अमेरिका और बेसिक देशों- ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और चीन के बीच समझौता के रूप में सामने आया, परंतु जी-77 और गरीब देशों ने इसे स्वीकार नहीं किया।
इस सम्मेलन में लगभग 200 देशों के प्रतिनिधि शामिल नहीं किया।
इस सम्मेलन में लगभग 200 देशों के प्रतिनिधि शामिल हुए।
यहां उल्लेखनीय है कि डेनमार्क और अन्य कई देशों ने सम्मेलन के पूर्व ही कह दिए थे कि इसमें कोई कानूनी बाध्यता वाला निर्णय नहीं लिया जाएगा क्योंकि उन्हें मालूम था कि वे किसी बाध्यता का पालन नहीं कर सकते।
भारत और चीन इसके खिलाफ इसलिए थे क्योंकि विकसित देश कार्बन उत्सर्जन कम करने का बोझ उन्हीं के सर पर डालते।
जबकि अफ्रीकी देश तथा अन्य गरीब देश चाहते थे कि कोई कानूनी बाध्यता वाला समझौता हो जाए अन्यथा पर्यावरण में परिवर्तन का सबसे बड़ा दुष्परिणाम उन्हें भुगतना होगा और कार्बन घटाने के किसी समझौते में उन्हें फायदा ही होगा।
इस बैठक का लक्ष्य 2012 के बाद क्योटों प्रोटोकाल की अवधि समाप्त हो जायेगी।
कोपेनहेगन के बेलासेंटन में 192 देशों के शीर्ष नेताओं ने विश्व भर से आये लगभग 5000 प्रतिनिधियों के समक्ष सर्वसम्मति से पारित समझौते पर एक मत से हस्ताक्षर किए।
इस सम्मेलन में भारत चीन अमेरिका और यूरोपीय संघ सहित सभी प्रमुख देशों ने समझौते के मसौदे को सर्वमान्य बनाने का प्रयास किया किन्तु अंतिम क्षणों में विकसित देश एवं विकासशील देशों की गुटबंदी प्रत्यक्ष रूप से उभर कर सामने आ गयी।
अंततः सम्मेलन में अफ्रीका, भारत, चीन ब्राजील जैसे प्रमुख देशों के प्रस्तावों को शामिल करते हुए एक गैर-बाध्यकारी समझोते पर हस्ताक्षर संभव हो सका।
इस समझौते के बाद प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा कि जलवायु परिवर्तन के संकट से निपटने के लिए भविष्य में कोई वार्ता समान तौर पर भार वहन करने के समान सिद्धांत पर आधारित होगी जैसा कि क्योटो प्रोटोकाल एवं बाली वार्ता में पहले से तय किया जा चुका है।
यद्यपि पर्यावरणवादियों को इस सम्मेलन से निराशा ही हाथ लगी और उन्होंने जलवायु परिवर्तन मुद्दे पर अमेरिका, चीन, भारत, ब्राजील एवं दक्षिण अफ्रीका के बीच हुए अबाध्यकारी समझौता को अस्वीकार कर दिया अतः इस सम्मेलन का अंत एक प्रकार के नाकामी में हुआ, जिसकी आशंका थी।
उपरोक्त अबाध्यकारी समझौते का तात्कालिक लक्ष्य है- धरती का औसत तापमान पूर्व औद्योगिक युग की तुलना में 2 डिग्री सेंटीग्रेड से उपर नहीं जाने देना।
इसमें यद्यपि उत्सर्जन घटाने की किसी विस्तृत समय-सारणी की व्यवस्था नहीं है, परंतु कुछ तो हासिल हुआ ही।
उपरोक्त समझौते में विश्व के तापमान में 2 डिग्री सेंटीग्रेड से अधिक नहीं बढ़ने देने के लिए सभी देशों से कार्बन उत्सर्जन में स्वैच्छिक कटौती करने की बात कही गई है। इसकी अन्य विशेषताएं निम्न हैं-
उनकी स्वैच्छिक कटौती पर अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था भी की गई है।
समझौता के अंतर्गत गरीब देशों को नियमित आर्थिक सहयता देने पर भी सहमति व्यक्त की गई है ताकि वे अपने यहां पेड़ों की कटाई पर रोक लगा सकें। साथ ही ऐसी तकनीकें अपनाने की ओर भी बढ़े जिनसे कार्बन कटौती को बढ़ावा मिले।
विकसित देश विकासशील देशों को आर्थिक एवं तकनीकी संसाधन उपलब्ध करवाएंगे।
वर्ष 2015 तक इस समझौते के कार्यान्वयन की समीक्षा की जाएगी।
विवाद के मुद्दे : वर्तमान में उत्सर्जित कार्बन, वातावरण में बढ़ती कार्बन डाई ऑक्साइड की मात्रा के लिए प्रमुख रूप से जिम्मेवार नहीं है।
क्योंकि कार्बन डाई ऑक्साइड एक बार उत्सर्जित होने के बाद वायुमंडल में लगभग 100 वर्ष़ों तक बने रहते हैं।
अतः वायुमंडल में विस्तृत 70 प्रतिशत कार्बन डाईऑक्साइड गैसों के लिए भूतकाल में विकसित देशों के उत्सर्जन ही प्रमुख रूप से जिम्मेदार हैं और यही विवाद की मुख्य वजह भी है।
विकासशील देशों का कहना है कि विकसित देशों की गलतियों के लिए उन्हें सजा न दी जाए।
इसमें द्वितीय विवाद यह है कि कार्बन उत्सर्जन की कुल मात्रा के माप से परिस्थितियों का सही विवरण उपलब्ध नहीं होता है।
अतः विकासशील देशों की मांग है कि इनकी जगह प्रति व्यक्ति उत्सर्जन की माप के आधार पर विकसित देश उत्सर्जन के आंकड़ों को प्रस्तुत करें क्योंकि यह माप ज्यादा सटीक है।
यदि इस मानकता के आधार पर देखा जाए तो अमेरिका का प्रति व्यक्ति वार्षिक कार्बन उत्सर्जन 20 टन है, जबकि भारत का मात्र 0.8 टन है।
अतः इस दृष्टिकोण से अमेरिका को अपने कार्बन उत्सर्जन में भारत जैसे देशों के मुकाबले ज्यादा कटौती करनी होगी। परंतु विकसित देश इसके लिए तैयार नहीं हैं।
जैव विविधता
पृथ्वी पर विभिन्न प्रजातियों के पौधों और जंतुओं का होना जैव-विविधता को प्रदर्शित करता है जिसे हम जैविक विविधता भी कहते हैं। जैव विविधता पद का प्रयोग किसी विशिष्ट स्थान में रहने वाली विभिन्न प्रजातियों की संख्या को व्यक्त करने या वहां पाए जाने वाले विभिन्न जीवों के बारे में बताने के लिए किया जाता है। अर्थात् जैव-विविधता को हम इस तरह परिभाषित कर सकते हैं कि किसी स्थान विशेष में रहने वाली विभिन्न प्रजातियों की कुल संख्या और प्रत्येक प्रजाति में पाई जाने वाली आनुवांशिक भिन्नता के रूप में भी दी जा सकती है।
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम - यूनाइटेड नेशंस एन्वायरमेंट प्रोग्राम (यूएनईपी 1992) के अनुसार जैव विविधता का आशय किसी विशिष्ट स्थान पर वास करने वाले भिन्न-भिन्न प्रजाति के जीवों की संख्या से है जिनकी जीवन शैली में पर्याप्त भिननताएं पाई जाती है।
वास स्थान (Habitat) किसी जीव का वास (स्थान) वह स्थान है जहां वह जीव वास करता है। अर्थात् रहता है और जिस स्थान पर उस जीव को भोजन, आवास और जलवायु संबंधी उपर्युक्त दशाएं प्राप्त होती है ताकि वह जीव बिना किसी प्रतिकूल परिस्थिति का सामना किए अपनी संख्या वृद्धिकर सकें।
प्रजातियाँ (Species) – किसी विशिष्ट प्रकार के पौधों या जंतुओं की एक श्रेणी या वर्ग को उस जीव की प्रजाति कहते हैं। जिसके सदस्य अपनी ही प्रजाति के सदस्य के साथ प्रजनन करके जीवनक्षम संतानों को उत्पन्न कर सकते हैं।
जैव-विविधता की अवधारणा (Concepts of Biodiversity) – जैव विविधता को संरक्षण प्रदान करना हमारे और साथ ही हमारे पर्यावरण के हित में भी है। इस पृथ्वी पर विभिन्न प्रजातियों के असंख्य जीव (पौधे और जंतु) निवास करते हैं। ये विभिन्न प्रकार के जीव एक-दूसरे से अनेक रूपों में भिन्न है। फिर भी इन जीवों के बीच अत्यधिक जटिल संबंध है। यह संबंध है आपसी रिश्तों का, एक-दूसरे पर निर्भरता का और भोजन का। जैव विविधता के कारण पर्यावरण में संतुलन स्थापित होता है। जितनी अधिक जैव-विविधता होगी, उतना ही पर्यावरण में अधिक संतुलन होगा।
जैव-विविधता में वस्तुतः तीन भिन्न-भिन्न अवधारणाएं या श्रेणीबद्ध स्तर अंत निहित है :-
आनुवांशिक विविधता
प्रजाति विविधता
(a) प्रजातियों की प्रचुरता किसी स्थान विशेष में प्रजातियों की कुल संख्या
(b) प्रजातियों की एकरूपता (प्रजातियों की आपेक्षिक बाहुल्य)
(c) प्रजातियों की प्रभाविता (सर्वाधिक बहुल प्रजाति)
1. आनुवांशिक विविधता (Genetic Diversity) - आनुवांशिक विविधता का अर्थ किसी विशेष प्रजाति में जीनों (आनुवांशिक गुणों) की विविधता से है। उदाहरणस्वरूप किसी गांव या शहर में कुल अलग-अलग नस्लों के कुत्ते होते हैं। दिखने पर प्रत्येक नस्ल का कुत्ता दूसरे नस्ल के कुत्ते से काफी भिन्न होता है, किन्तु वे सभी कुत्ते एक ही प्रजाति के जीव हैं, क्योंकि ये सभी विभिन्न नस्लों के कुत्तों के साथ प्रजनन करके ऐसी संतान उत्पन्न कर सकते हैं जो स्वयं भी संतान उत्पन्न करने में सक्षम हों।
मनुष्यों की विभिन्न जातियों नीग्रायॅड, कॉकेसॉयड, मंगोलॉयड जातियां एक-दूसरी जातियों से शारीरिक गठन, रंग, अभिलक्षण, ऊंचाई और स्वभाव आदि में भिन्न होती है, किन्तु ये सभी जातियाँ एक ही प्रजाति होमोसेपिएन्स के जीव है। जातियों के बीच का अंतर जीवों की प्रजाति के भीतर आनुवांशिक संघटन में अंतर के कारण दृष्टिगोचर होते हैं।
आनुवांशिक संघटन के अंतर निम्नलिखित कारणों में से किसी भी एक के परिणाम स्वरूप हो सकता है।
(a) एलील्स में भिन्नता (एक ही जीन के विभिन्न प्रारूपों में)
(b) संपूर्ण जीन में भिन्नता जिसमें किसी विशिष्ट अभिलक्षण को निर्धारित करने वाले लक्षण प्रभावित होते हैं, या
(c) गुणसूत्रों की संरचना में परिवर्तन आनुवांशिक भिन्नता प्रजाति विशेष को किसी विशिष्ट पर्यावरण के साथ अनुकूलन स्थापित करने में सहायता करती है। इससे उस प्रजाति की उत्तरजीविता-दर में वृद्धि होती है ओर ऐसा प्राकृतिक चयन को प्रभावित करने वाले कारकों के अनुरूप भी है। यदि किसी प्रजाति में अधिक आनुवांशिक भिन्नता है तो बदलते पर्यावरण में उस प्रजाति की उत्तरजीविता दर उस प्रजाति के जीवों की तुलना में अधिक है जिसमें अपेक्षाकृत कम आनुवांशिक भिन्नता पाई जाती है।
आनुवांशिक भिन्नता से जैविक विकास की प्रक्रिया में अत्यधिक महत्वपूर्ण सहायता प्राप्त हुई है। यह नई प्रजातियों के जाति उद्भवन का मूल आधार है। यह प्रजाति और समुदाय के स्तर पर जैविक विविधता को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
जिस समुदाय में बहुत अधिक संख्या में प्रजातियां निवास करती है उसमें कुल आनुवांशिक भिन्नता उस समुदाय की तुलना में अधिक होती है। जिसमें निवास करने वाली प्रजातियों की संख्या अपेक्षाकृत कम होती है।
2. प्रजाति विविधता (Species Diversity) - प्रजाति विविधता का आशय किसी क्षेत्र विशेष में पाए जाने वाले विभिन्न प्रजातियों के जीवों से है। प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र और कृषि पारिस्थितिक तंत्र में प्रजाति विविधता का अंतर स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।
मानव द्वारा विकसित एक ही प्रजाति के पौधों के वनक्षेत्र की तुलना में प्राकृतिक वन पारिस्थितिक तंत्र से होने वाले आर्थिक लाभ कहीं अधिक है।
प्रजातियां प्रकृति में देखी जाने वाली विविधता की सुस्पष्ट इकाइयां है। वे पारिस्थितिक तंत्र को नियमित करने में एक महत्वपूर्ण और विशिष्ट भूमिका निभाती है। इनकी इस विशिष्ट भूमिका के कारण ही यदि किसी कारणवश कोई प्रजाति पारिस्थितिक तंत्र से विलुप्त हो जाती है तो संपूर्ण पारिस्थितिक तंत्र के स्थायित्व पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
(a) प्रजातियों की प्रचुरता - प्रति इकाई क्षेत्र में रहने वाली प्रजातियों की कुल संख्या को प्रजातियों की प्रचुरता कहते हैं।
(b) प्रजातियों की एकरूपता - इसका आशय किसी क्षेत्र विशेष में प्रजातियों के आपेक्षिक बाहुलय या उनकी विविधता से है। प्रकृति में प्रजातियों की संख्या और प्रकार में व्याप्त भिन्नता है जिसके कारण प्रकृति में अत्यधिक जैव-विविधता पाई जाती है।
(c) प्रजातियों की प्रभाविता - किसी क्षेत्र विशेष में रहने वाली अनेक प्रजातियों में से जिस प्रजाति की संख्या अन्यों की तुलना में अधिक हो वह प्रजाति प्रभावी मानी जाती है।
इसका अर्थ है जीवित प्रजातियों में विविधता। इस विविधता के मूल्यांकन और सूचकांक में प्रजातियों की प्रचुरता (एक सीमित क्षेत्र में प्रजातियों की संख्या), प्रजातियों की बहुलता (प्रजातियों के बीच सापेक्षिक संख्या) और जातिवृत्ति संबंधी विविधता (विभिन्न प्रजाति समूहों के बीच संबंधी सूत्रता)। भूमध्य क्षेत्र धरती के अन्य भागों की तुलना में प्रजातियों की दृष्टि से अधिक समृद्ध है। समुदायों की सुचारू कार्यप्रणाली और सामुदायिक स्तर के गुणों के विकास के लिए प्रजाति विविधता उसी तरह अनिवार्य है, जैसे एक जीव समूह (कॉम्पलेक्स आर्गेनिज्म) के ठीक से कार्य करने के लिए अलग-अलग तरह के डीएनए ऐनकोडिड ऐन्जाइम जरूरी होते हैं।
3. पारिस्थितिक तंत्र की विविधता - जीवमंडल में एक साथ बहुत से पारिस्थितिक तंत्र पाए जाते हैं। प्रत्येक पारिस्थितिक तंत्र में विभिन्न प्रकार के पौधों और जीव-जन्तुओं की अनेकानेक प्रजातियाँ निवास करती है जो एक-दूसरे पर परस्पर निर्भर होते हैं और विभिन्न प्रकार के वास स्थान में निवास करने के लिए अनुकूलित होती हैं। पारिस्थितिक तंत्र को भौगोलिक क्षेत्र या देश आदि के आधार पर परिभाषित किया जाता है। भू-दृश्य, मरुभूमि, घास के मैदान, पर्वत, वन, नदियाँ, झील, तालाब, समुद्र आदि सभी प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र के उदाहरण हैं। पारिस्थितिक तंत्र की विविधता संघटकों का वर्णन करती है, जैसे पारिस्थितिक तंत्र में निवास करने वाली प्रजातियों के लिए उपयुक्त पर्यावरण की विभिन्न पारिस्थितियां, विभिन्न पोषण स्तर तथा पारिस्थितिक तंत्र के भीतर ऊर्जा का प्रवाह, आहार जालों की संख्या और पोषक तत्वों के पुनर्चक्रण को बनाए रखने वाली प्रक्रिया आदि।
पारिस्थितिक तंत्र की विविधता के निम्नलिखित तीन संघटक हैं-
1.ऐल्फा विविधता - यह किसी वास स्थान में प्रजातियों की संख्या को निरूपित करती है।
2.बीटा विविधता - यह किसी भौगोलिक क्षेत्र में प्रजातियों के आवागमन की दर अर्थात् भौगोलिक क्षेत्र के भीतर किसी एक वास स्थान में प्रजातियों के प्रवेश करने और निकास की दर को दर्शाती है।
3.गामा विविधता - यह भिन्न-भिन्न भौगोलिक क्षेत्रों के एक जैसे वास स्थानों के बीच प्रजातियों के आवागमन या प्रतिस्थापन की दर को निरूपित करती है।
कृष्य पौधों में विविधता (Diversity in Cultivated Plants) -
कृष्य पौधों (फसलों) और पालतू मवेशियों में भी अत्यधिक जैव-विविधता दृष्टिगोचर होती है। ऐसा हमारी सदियों पुरानी सभ्यता के कारण हैं। इन फसलों का उगाया जाता था और कालांतर में इनसे विभिन्न उन्नत किस्में विकसित की गई। भारत में परंपरागत कृषि में अनाजों, सब्जियों, फलों और अन्य पौधों की 30,000-40,000 से भी अधिक किस्में शामिल हैं। इनकी सर्वाधिक विविधता उच्च वर्षा वाले क्षेत्रों जैसे कि : पश्चिमी घाट और पूर्वी घाट के पहाड़ी क्षेत्रों, उत्तरी हिमाचल क्षेत्र और पूर्वोत्तर राज्यों आदि में देखी जाती है।
जीन बैंकों द्वारा भारत में उगने वाले अनाजों की 34,000 से अधिक प्रजातियों और दलहन की 22,000 प्रजातियों के जीन एकत्रित किए गए हैं। जहां तक पालतू पशुओं का संबंध है, हमारे देश में गाय-बैलों की 27 नस्लें, बकरियों की 22 नस्लें और भैसों की 8 नस्लें हैं। इनकी अनेक नस्लें नष्ट हो चुकी हैं और भारत में अब लुप्त प्राय हो चुकी हैं, क्योंकि किसान विदेशी नस्लों को अधिक अच्छा मानते हैं। अब भारतीय नस्ल की गायों के स्थान पर किसान होलसटम और जरसी गायों को अधिक उपयोगी मानते हैं। फसलों के संबंध में भी यही बात लागू होती है। हमारी अधिकांश परंपरागत फसलों का स्थान नकदी फसलों ने ले लिया है। पहले जहां हमारी धरती पर अनेकानेक प्रकार के पेड़-पौधे उगते थे और उगाए जाते थे वहीं पर आर्थिक दृष्टि से अधिक महत्वपूर्ण यूकेलिप्टस और वाटल उगाए जाते हैं इसलिए हमें विविध प्रकार के पेड़-पौधे दिखाई नहीं देते। इससे जैव-विविधता कम हुई है।
यदि हम चाहते हैं कि हमारी जैव-विविधता बनी रहे तो यह आवश्यक है कि हम अपने तात्कालिक वित्तसीय लाभ के लिए प्रकृति में पाए जाने वाले पेड़-पौधों और अन्य जीव-जन्तुओं को नष्ट न करें। यदि हम अपने राष्ट्र का हित चाहते हैं तथा अपनी जलवायु और अर्थव्यवस्था को स्थिर बनाए रखना चाहते हैं तो हमें अपने अल्पकालिक हितों का त्याग करना होगा। हमें यह याद रखना होगा कि जैव-विविधता जितनी अधिक होगी, वह देश और वहां के लोगों के लिए उतनी ही हितकारी होगी।
जैव-विविधता का मूल्य (Value of Biodiversity) -
मनुष्य भी जैव-विविधता का एक अंग है और प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से दूसरे जीवों से जुड़ा हुआ है। जीवमंडल में स्थायित्व बनाये रखने के अतिरिक्त जैव-विविधता का हमारे लिए निम्नलिखित रूप में महत्व है-
1. उपभोग मूल्य (Consumpative Value) - भोजन मनुष्य की मूलभूत आवश्यकता है। आदिकाल से ही मनुष्य भोजन की आवश्यकता को पूरा करने के लिए दूसरे जीव-जन्तुओं पर आश्रित रहा है। मनुष्य फल, अनाज, कंद-मूल, दूध, दवाईयां और मांस आदि प्रकृति में उपस्थित दूसरे जीव-जन्तुओं से प्राप्त करता है।
उदाहरण के लिए - आम, सेब, संतरा, केला, अंगूर आदि फल हमें वृक्षों से प्राप्त होते हैं। गाय, भैंस, बकरी, भेड़ आदि से हम दूध प्राप्त करते हैं। गाजर, लहसुन, अदरक, मूली, चकुन्दर आदि कंद-मूल हमें पौधों से मिलते हैं। खाने के अनाज चावल, गेहूं, मक्का, ज्वार, बाजरा आदि भी हमें पौधों से प्राप्त होते हैं। विभिन्न जन्तुओं, पक्षियों, मछलियों, आर्थोपोड्स के मांस को संसार के विभिन्न भागों में खाया जाता है। तुलसी, पुदीना, मुलहठी, करीपत्ता नीम, पत्थरचट्ट, आक् आदि पौधों के पत्तों के टहनियों का विभिन्न रोगों जैसे- खांसी, जुकाम, अपच, त्वचा रोग, चोट, मोच आदि के उपचार में प्रयोग किया जाता है।
2. उत्पादक मूल्य (Productive Value) - विभिन्न जीव उत्पादन की दृष्टि से मनुष्य के लिए उपयोगी हैं। कई पौधों से रासायनिक पदार्थ निकाल कर उनका उपयोग दवाइयां बनाने में किया जाता है। जैसे-सिनकोना वृक्ष से ‘कुनीन’, पोस्त से मार्फीन, अजवाइन के पौधे से ‘थाईमोल’, पुदीने से ‘मैन्थॉल’ आदि निकाल कर दवाइयां बनाने में उपयोग किया जाता है। जीवाणुओं से पेनिसिलिन जैसी एंटीबायटिक दवाइयां बनाई जाती हैं। मछलियों से Cod Liver Oil जिसका उपयोग कमजोरी दूर करने तथा केकड़ों, चिगटा और लोबस्टर के कंकालों से निकाल रसायन का उपयोग कवकीय संक्रमण को रोकने की दवाइयां बनाने में किया जाता है। वनों से प्राप्त होने वाली लकड़ी, गोंद, रेशे, रेसिन, लाख, शहद आदि पदार्थ़ों का उपयोग भी उत्पादन कार्य़ों में किया जा रहा है।
3. सामाजिक मूल्य (Social Value) - जैव-विविधता मनोरंजन व पर्यटन उद्योग के लिए आय का मुख्य स्रोत है। ऑस्ट्रेलिया के ‘ग्रेट बैरियर रीफ’, सिंगापुर के द्वीपों में पाई जाने वाली जैव-विविधता, गोवा के समुद्र तट, राजस्थान के टीले, राज्य उद्यान, कुल्लू-मनाली की पहाड़ियों आदि सभी क्षेत्र जैव-विविधता के कारण लोकप्रिय हैं। जैव-विविधता को देखने के लिए आये विदेशी पर्यटकों द्वारा जो मुद्रा आती हैं, वह अर्थव्यवस्था के विभिन्न अंगों में प्रवाहित होकर उसे शक्तिशाली बनाती है।
इसके अतिरिक्त विभिन्न जीवों में उपस्थित जीन या आनुवांशिक भंडार का उपयोग नई प्रजातियों के विकास एवं उत्पादन बढ़ाने में किया जा रहा है जिससे समाज के लोगों की आवश्यकताओं की पूर्ति की जा सके।
4. नैतिक मूल्य (Ethical Value) - प्रकृति में प्रत्येक जाति को अपना अस्तित्व बनाए रखने का मौलिक अधिकार है। मनुष्य को अपने लाभ के लिए किसी जाति का नुकसान पहुंचाने या लुप्त करने का कोई अधिकार नहीं है। यदि कोई जाति मनुष्य के अनुकूल नहीं हैं तो भी उसका प्राकृतिक मूल्य कम नहीं होता क्योंकि जीवमंडल में प्रत्येक जाति अपने स्तर पर स्थिरता बनाए रखने में सहायता करती है। इसलिए हमें ‘जिओ और जीने दो’ की नीति का पालन करते हुए दूसरे जीवों का संरक्षण करना चाहिए।
5. सौन्दर्यात्मक मूल्य (Aesthetic Value) - बहुत-सी जातियों का सौन्दर्यात्मक मूल्य है। उनको देखने व अनुभव करने से हमें शान्ति, स्फूर्ति एवं संतोष का अनुभव होता है। उदाहरण के लिए जंगली रसीले फलों का स्वाद, जंगली फूलों की महक, मॉस-बेड की कोमलता पक्षियों का मधुर कलरव का कोई आर्थिक मूल्य नहीं परन्तु उनका सौंदर्य-मूल्य हमें उनके संरक्षण के लिए प्रेरित करता है।
भारत का जैव-भौगोलिक वर्गीकरण (Bio-Geographical Classification of India) -
सामान्यतः भारत को पांच मुख्य खंडों में बांटा जाता है। ये भाग निम्नलिखित हैं-
(I) हिमालय पर्वतीय खण्ड
(II) प्रायद्वीपीय पठार और पहाड़ियां
(III) उत्तर का विशाल मैदान
(IV) पश्चिमी तटीय मैदान
(V) पूर्वी तटीय मैदान एवं द्वीप समूह
जैव-विविधता का महत्व
जैव-विविधता पृथ्वी पर जीवन के लिए इसलिए जरूरी है क्योंकि जैव विविधता ही इस ग्रह पर जीवन का आधार है।
जैव-विविधता के निरंतर हास से पृथ्वी की प्राकृतिक संपदा और पारितंत्र में बहुत गिरावट हो रहा है। जीवाणु और फफूंद (कवक) दोनों ही निम्न श्रेणी के पौधे होते हैं जो कई कचरे/गदंगी को विघटित करके मिट्टी को उर्वर बनाते हैं। अगर ये जीव नष्ट हुए तो हमारी कृषि उत्पादन में कमी आ जाएगी। क्योंकि प्रकृति में पाये जाने वाले तमाम कीट, पतंग, चमगादढ़ और पक्षी, फूलों में परागण की जैविक प्रक्रिया को सुनिश्चित करती है जिससे अंततः फल निर्माण होता है। यदि इनकी संख्या में कमी आयी तो स्पष्टतः कृषि उत्पादन प्रभावित होगा। इसके अलावा अनेक प्राकृतिक स्रोतों से करीब 42 फीसदी कैंसर रोगी दवाएं बनाई जाती है।
जैव विविधता के द्वारा हम प्राकृतिक पर्यावरण की खुबसूरती और प्रचुरता को बरकरार रख सकते हैं साथ ही इससे पारिस्थितिक प्रक्रिया भी सुचारू रूप से चलती रहती है। अर्थात् जैव विविधता के बिना हम पृथ्वी पर किसी भी जीवन स्वरूप की कल्पना नहीं कर सकते हैं।
पृथ्वी पर उपस्थित जैव विविधता का अपना महत्व है। एक अदृश्य धागे से हम सभी एक दूसरे से आबद्ध हैं। कोई भी घटक छूट गया तो उसका प्रभाव पूरे पारिस्थितिक तंत्र पर पड़ता है। हमारी पृथ्वी के जैव-विविधता मानवता के आर्थिक एवं सामाजिक विकास का मूल-आधार है। इसलिए यह हमारी वर्तमान और भावी पीढ़ियों के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण है।
जैव विविधता का महत्व पारिस्थितिक और आर्थिक दोनों क्षेत्रों में है। जैविक रूप से विविधता लिया हुआ प्राकृतिक परिवेश मनुष्य के जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। वह प्रत्येक वस्तु जो हम विश्व बाजार में क्रय या विक्रय करते हैं, उसकी पूर्ति पृथ्वी की यह समृद्ध जैव विविधता ही करती है। जैव विविधता भोजन, औषधियों एवं उद्योग आदि का एक अमूल्य स्रोत है जो मनुष्य को जीने के लिए आधारभूत कच्चा माल प्रदान करता है और यही विश्व की समस्त अर्थव्यवस्था का आधार है।
जैव-विविधता पारिस्थितिक तंत्र के सुचारू रूप से कार्य करने तथा जीवमंडल में जीवों के अस्तित्व के लिए आवश्यक दशाओं को बनाए रखने के लिए अत्यधिक आवश्यक है। इस संबंध में नीचे चर्चा की गई है-
ऑक्सीजन के उत्पादन, कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा में कमी लाने, जीवमंडल में जल चक्र को नियमित करने, मृदा अपरदन को रोकने, ग्लोबल वार्मिंग (भूमंडल के ताप में वृद्धि की घटना) और ग्लेशियरों को पिघलने से रोकने, नदियों, जलधाराओं को सूखने से बचाने, बाढ़, धूल-भरी आंधी तथा ऐसी ही प्राकृतिक घटनाओं जैसे कि सूखा, आदि पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए जैव-विविधता अत्यधिक अनिवार्य है।
भोजन, वस्त्र, आवास और औषधियों की उपलब्धता जैव-विविधता से सीधे-सीधे जुड़ी है। इसका सर्वाधिक सुस्पष्ट उदाहरण जनजातीय लोगों का वनों में रहना और अपने अस्तित्व हेतु आवश्यक सभी वस्तुओं को प्राप्त करने के लिए वनों पर आश्रित रहना है।
आज हम जिन खाद्यान्नों को उगा रहे हैं, वे सभी और हमारे पालतू मवेशी भी जैव-विविधता के ही परिणाम हैं।
जैव-विविधता के आर्थिक लाभ (Economic Potential of Biodiversity) –
एक उपयुक्त और स्थायी पर्यावरण प्रदान करने के साथ-साथ जैव-विविधता हमें दैनिक उपयोग की अनेक वस्तुएँ भी प्रदान करती है। नीचे जैव-विविधता के बुद्धिमतापूर्ण उपयोगों की चर्चा की गई है-
पादप प्रजनक ऐसे आनुवांशिक गुणों का पता लगाते हैं जिनका उपयोग करके बेहतर किस्म की फसलें उगाई जा सकती हैं।
जंतु, प्रजनक वन्य-जंतुओं के ऐसे जीनों की खोज करते हैं जिनका उपयोग करके उन्नत नस्ल के मवेशियों को उत्पन्न किया जा सकता है।
औद्योगिक क्षेत्र में भी मानव द्वारा प्रयोग हेतु नए उत्पादों को तैयार करने में जैव-विविधता का उपयोग किया जाता है।
अब जैव-विविधता का उपयोग जैव प्रौद्योगिकीविदों द्वारा एक ही प्रजाति के जीवों के जीनों में हेर-फेर करके नई प्रजातियाँ विकसित करने या अन्य जीवों में नए जीनों को प्रविष्ट कराकर बेहतर परिणाम प्राप्त करने के लिए भी किया जाने लगा है।
उपर्युक्त के अतिरिक्त मानव द्वारा अनेक सामान्य प्रयोजनों के लिए भी जैव-विविधता का उपयोग किया जा रहा है।
औषधियों और औषण निर्माण-विज्ञान के क्षेत्र में भी बेहतर परिणाम प्राप्त करने के लिए जैव-विविधता के उपयोग की भारी संभावना है।
औषधि प्रदान करने वाली वनस्पतियाँ से हम कई गंभीर बीमारियों का इलाज कर रहे हैं, जैसे मलेरिया, टाइफाइड, डायरिया, डाइबिटीज आदि। अभी प्रकृति में मौजूद समस्त वनस्पतियों के एक छोटे हिस्से के औषधीय महत्व को ही जाना गया है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि विश्व की 25 हजार चिन्हित वनस्पति प्रजातियों में से महज 5 हजार प्रजातियों को ही उनके औषधीय गुणों के लिए जाँचा गया है।
हमारी वर्तमान कृषि प्रणाली वानस्पतिक विविधता के एक बहुत छोटे हिस्से पर निर्भर है। मात्र 30 से 40 फसलों द्वारा पूरे विश्व को भोजन उपलब्ध होता है। करीब 1700 ऐसी वनीय वनस्पति को चिन्हित किया गया है जिन्हें खाद्य फसलों के रूप में उगाया जा सकता है। वर्तमान आँकड़ों के अनुसार पृथ्वी पर करीब 17.5 लाख जीव प्रजातियों की पहचान की गई है जिसमें से सर्वाधिक संख्या कीटों की है। वैज्ञानिक मानते हैं कि पृथ्वी पर वास्तव में 130 लाख जीव प्रजातियाँ मौजूद है। वैज्ञानिकों द्वारा नई और अब तक अज्ञात प्रजातियों की खोज निरंतर जारी है।
कृति संरक्षण के अंतर्राष्ट्रीय संघ (IUCN) ने रेड डाटा बुक नामक एक किताब विकसित किया है जिसमें जीव-जंतुओं और पेड़-पौधों की उन दुर्लभ प्रजातियों का विवरण होता है जो अपने अस्तित्व को लेकर जद्दोजहद कर रही है। इस किताब के 2009 संस्करण की सूची में 16,928 ऐसे दुर्लभ जीव प्रजातियों को दर्ज किया गया है जो विलोपन के कगार पर खड़ा है। इनमें से 21 प्रतिशत स्तनी, 12 प्रतिशत पक्षी, 31 प्रतिशत सरीसृप, 30 प्रतिशत उभयचर और 37 प्रतिशत मछली की प्रजातियाँ हैं।
किसी भी स्थान पर जितनी अधिक जैव विविधता होगी, वहाँ का पर्यावरण या प्राकृतिक आबोहवा उतना ही स्थायी होता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि हमारी प्रकृति के स्थायित्व के लिए जैव विविधता कितनी आवश्यक है।
जैव-विविधता को खतरा -
जैव-विविधता में कमी के लिए जिम्मेदार प्रमुख घटक इस प्रकार है-
अत्यधिक शोषण - अंधाधुंध शिकार से अनेक जीव-जन्तुओं का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है। केरल के पेरियार अभ्यारण्य में एक भी टॅस्कर (खांगदार हाथी) दिखाई न देना, इसका सबूत है। अनेक बहुमूल्य वस्तुओं के लिए जीव-जन्तुओं का शिकार किया जाता है, जैसे हाथी दांत, चर्म, चमड़ा, सींग आदि।
प्राकृतिक वासों का हास - प्रजातियों के प्रजनन की आदत छूट जाने से उनका अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है।
वनों का हास - भवन निर्माण और खेती भूमि के विस्तार के लिए विस्तृत वन क्षेत्रों का सफाया कर दिया गया है जिससे स्थानीय जीव-जन्तु बेघर हो गए हैं। बांधों के निर्माण से नदियों और धाराओं के व्यापक हिस्से और पारिस्थितिकी प्रणालियाँ नष्ट हो गई है। झूम खेती की वजह से पूर्वोत्तर के जंगलों में काफी कमी आयी है।
स्थल प्रदूषण - प्रदूषण पारिस्थितिकी प्रणाली पर दबाव डालता है और संवेदनशील प्रजातियों को कम करता है। ब्रिटेन में बार्न आउट यानी करैल या उल्लू के अस्तित्व को खतरा पैदा हो गया है क्योंकि वहाँ कुन्तकनाशी (रोडेन्टिसाइड) का इस्तेमाल बहुत अधिक किया गया है। कीटनाशकों में जो विष की मात्रा होती है उसका असर बायो-मैग्निफिकेशन प्रक्रिया के माध्यम से उत्तरी एवं दक्षिणी धुवीय क्षेत्रों के जीव-जन्तुओं पर भी पड़ रहा है। 6017 वर्ग किलोमीटर के सुन्दरवन क्षेत्र को 1997 में विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया है। उसे भी आज खतरे का सामना करना पड़ रहा है। हजारों उच्च कोटि के पेड़ समाप्त हो गए हैं। यहाँ तक कि मिट्टी में जो सूक्ष्म वनस्पति और जीव-जन्तु होते हैं, उन पर भी प्रदूषण का दुष्प्रभाव पड़ा है। क्योंकि उद्योगों से भारी मात्रा में हानिकारक रसायन छोड़े जा रहे हैं।
अन्तर्राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन - अगली शताब्दी में धरती के तापमान में बढ़ोतरी होने से समुद्र का स्तर एक से दो मीटर तक बढ़ जाने का अनुमान है। उस समय भारत का क्या मानचित्र होगा। इसका पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता क्योंकि अनेक तटीय क्षेत्र और द्वीप समुद्र में डूब जायेंगे। अक्सर अपनाई जाने वाली प्रजातियों के कारण स्थानीय प्रजातियों का सफाया हो सकता है। परभक्षियों के अभाव के कारण उनकी संख्या स्थानीय प्रजातियों से अधिक हो सकती है, जिसे देखते हुए अन्ततः स्थाई प्रजातियाँ विलुप्त हो सकती है।
जैव-विविधता के हास के प्रभाव -
प्रजातियों का अस्तित्व बड़ी तेजी से मिटता जा रहा है ओर इनमें अनेक ऐसी प्रजातियाँ भी हैं जिनके बारे में दस्तावेज तक तैयार नहीं होता और वे नष्ट हो जाती हैं। प्रजातियों को जब अनेक वर्ष़ों तक नहीं देखा जाता, उसके बाद ही उनका अस्तित्व समाप्त समझा जाता है। भारतीय जीवविज्ञान सर्वेक्षण के हाल के अध्ययन के अनुसार चीता, गुलाबी चोंच वाली बत्तख और माउन्टेन क्वेल का अस्तित्व पिछले दशक में ही मिट गया था जबकि भूरे सींग वाले हीरण, दृढ़लोमी खरगोश (हिपसिड हेयर) आदि का अस्तित्व खतरे में पड़ा हुआ है। वनस्पति विविधता का भी यही हश्र हुआ है।
आनुवांशिक विविधता का हास - इससे कृषि जोखिम में पड़ गई है। किसानों में संकर किस्मों की बढ़ती लोकप्रियता के कारण उनकी वन्य संबंधी प्रजातियों की उपेक्षा हो रही है जो अंततः समाप्त हो जाती है। ओइजानिवारा नाम की वन्य प्रजाति में आवश्यक जीन पाये गए। उत्तर प्रदेश से मिली यह प्रजाति आनुवांशिक संसाधनों के संरक्षण में महत्वपूर्ण साबित हुई। विश्वभर में आनुवांशिक दृष्टि से विशेष महत्व के करीब 492 पेड़ों के समूहों का अस्तित्व खतरे में पड़ा हुआ है।
सांस्कृतिक विविधता की क्षति - आनुवांशिक ओर पारिस्थितिकी प्रणाली दानां की ही विविधता की क्षति से सांस्कृतिक विविधता को नुकसान पहुँचता है। जैसे-जैसे नए दबाव और पद्धतियाँ सामने आती है, तो उनके फलस्वरूप समग्र परिवर्तन होते हैं। धर्म, मिथक शास्त्र और लोकगीतों में अनेक प्रजातियों के विलुप्त होने की बात सन्निहित है। प्राकृतिक आवास नष्ट किए जाने से अधिक उष्णकटिबंधी स्तरों में ऐसे बड़े जीव-जन्तुओं के विलुप्त होने का अंदेशा अधिक रहता है जिनकी संख्या में बढ़ोतरी की दर कम होती है और जिनकी गर्भ अवधि अधिक होती है।
पारिस्थितिकी प्रणाली एक कठिन जाल है। किसी एक प्रजाति के विलुप्त होने का पारिस्थितिकी में अन्य प्रजातियों पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है। यह विनाशकारी प्रभाव उस समय सामने आता है जब एक प्रजाति का स्थानीय तौर पर विलुप्त होना अन्य प्रजातियों की संख्या के अनुपात में महत्वपूर्ण बदलाव लाता है।
जैव-विविधता और आईपीआर
जैव-विविधता से उत्पादों में भी विविधता आती है। रूपान्तरित सूक्ष्मजीव समूह, पौधे और जीव जन्तुओं का पेटेन्ट किया जा सकता है और बौद्धिक सम्पदा अधिकारों (आईपीआर यानी इंटलैक्चुअल प्रोपर्टी राइट्स) के तहत उन्हें निजी सम्पत्ति बनाया जा सकता है। जैव-विविधता के संरक्षण के लिए किसी प्राकृतिक वास अथवा देश की वनस्पति और जीव-जन्तुओं का व्यापक सर्वेक्षण किया जाता है। खास विषयों में विशेषज्ञ प्रजाति स्तर पर प्रत्येक समूह की पहचान कर सकते हैं। व्यवस्थित अध्ययन के जरिए ही यह पहचान संभव है। प्रजातियों की संख्या में कमी अथवा उनके विलुप्त होने के कारणों का पता लगाने के लिए पारिस्थितिकी प्रणाली, उसके घटकों, संभावित ऊर्जा चक्र और पौष्टिक भोजन का प्रवाह, जीव-जन्तु का दर्जा कि यह परभक्षी है या शिकार, उनकी जीवन पद्धति, भोजन की आदत आदि की समुचित जानकारी जरूरी होती है।
जैविक संसाधनों के आर्थिक योगदान की चर्चा करना भी जरूरी है। धन प्राप्ति के संदर्भ में उनकी सेवाओं का संरक्षण करके ही सही मूल्यांकन किया जा सकता है। यह काम उपयोग के मूल्यांकन के जरिए संभव है, जहाँ प्राकृतिक उत्पादों जैसे इऔधन, चारा आदि के मूल्य पर विचार किया जाता है। गैर उपभोगवादी मूल्यांकन में पारिस्थितिकी प्रणाली के प्रत्यक्ष मूल्य को आंका जाता है। समय-समय पर निगरानी रखना भी जरूरी है। सूदूर संवेदन प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल करके धरती के संसाधनों के बारे में विश्वसनीय सूचनाएँ दी जाती है। आईआरएस एक-सी और आईआरएस दो-डी से भू-परिदृश्यों के विस्तृत चित्र हासिल किए जा सकते हैं और जैविक संभावना मंडलों की विशेषताओं का बखान करने के लिए उनका इस्तेमाल किया जा सकता है। भारत में मात्र 19% भू-भाग वन-आच्छादित है।
जैव-विविधता बनाए रखने के उपाय -
प्राकृतिक वासों का संरक्षण इस दिशा में प्रथम कदम है। बंजर भूमि पर वृक्षारोपण करके उसका परिष्कार किया जा सकता है। वृक्षों का चयन प्राकृतिक वास के प्रचलित स्वरूप के अनुसार होना चाहिए। संरक्षण के लिए राष्ट्रीय उद्यानों, अभ्यारण्य और अन्य सुरक्षित क्षेत्रों का निर्माण किया जाना चाहिए। उन औद्योगिक इकाइयों को नियंत्रित किया जाना चाहिए जो बड़े पैमाने पर प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल करती है और उनसे कहा जाना चाहिए कि वे पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव का विश्लेषण करायें। प्रत्येक देश को प्राकृतिक उत्पादों और पर्यावरण संसाधन के आधार पर होने वाले परिवर्तनों का ब्यौरा तैयार करना चाहिए। प्रजातियों और पारिस्थितिकी प्रणालियों के बारे में ज्ञान का वर्तमान स्तर अपर्याप्त है और अनेक समूहों के प्रसार और जनसंख्या के आकार के बारे में विस्तृत जानकारी हमें नहीं है। विज्ञान के सम्पूर्ण विकास के लिए जीव-समृद्ध और प्रौद्योगिकी सम्पन्न देशों तथा प्रौद्योगिकी विपन्न देशों के बीच प्रौद्योगिकी के विनिमय और भागीदारी को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। पर्यावरण प्रबन्ध तकनीक ओर संरक्षण के बारे में विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आयोजन किया जाना चाहिए। देश की वनस्पति और जीव-जन्तुओं के संरक्षण के लिए जैव विविधता विधेयक पारित किया जाना चाहिए। इस बारे में स्पष्ट आम सहमति होनी चाहिए कि क्या कहाँ, कैसे ओर कितना संरक्षण किया जाना है।
जैव-विविधता मूल्यांकन और प्रबन्ध संबंध परियोजनाओं को परम राष्ट्रीय आवश्यकता समझते हुए उनके लिए अधिक धन आवंटित किया जाना चाहिए। पर्यावरण की ताजा समस्याओं के बारे में लोगों में जागरूकता पैदा करने के लिए संचार माध्यमों का व्यापक उपयोग करना चाहिए। जैविक संसाधनों का स्थाई इस्तेमाल लोगों की भागीदारी के आधार पर किया जाए। स्थानीय समुदायों से परामर्श करके जैव-विविधता सूची तैयार करनी चाहिए जिससे प्राकृतिक संसाधनों की स्थानीयता का सबूत मिल सके। प्रस्तावित राष्ट्रीय जैव विविधता विधेयक के मसौदे में इस प्रकार की सूची को वैधानिक दर्जा दिया गया है। इससे हमारी वनस्पति और जीव-जन्तुओं का विदेशियों द्वारा शोषण किए जाने पर भी निगरानी रखी जा सकेगी।
जैव विविधता के संरक्षण के लिए आज विभिन्न दुर्लभ जीव जातियों के जीन संरक्षित कर रखे जाने लगे हैं। (जीन बैंक/प्लाज्मा बैंक) ताकि भविष्य में यदि वह जीव जाति विशेष लुप्त हो जाये तो एक बार पुनः उसे उसके संरक्षित जीन द्वारा जीवंत किया जा सके। ऐसे तमाम प्रयत्न भारत और दुनिया भर के देशों द्वारा किए जा रहे हैं।
जैव विविधता को बचाने के लिए एक वैश्विक मुहिम शुरू की गई है और इसका नाम काउन्ट डाउन 2010 नेटवर्क दिया गया है। इस नेटवर्क में पुरी दुनिया से करीब 969 पार्टनर है जिनमें सरकारी और गैर सरकारी दोनों ही प्रकार की संस्थाएं हैं। सभी प्रकार के सार्वजनिक संस्थान, स्थानीय और राष्ट्रीय गैर सरकारी संस्थाएँ इस मुहिम से जुड़ी है। नेटवर्क का एक सक्रिय हिस्सा बनकर ये संस्थाएँ अपने स्थानीय मुद्दों को ग्लोबल जैव विविधता के एजेंडे से जोड़ने का काम कर रही है और इस प्रकार जैव विविधता संरक्षण के मसले पर एक अंतर्राष्ट्रीय बहस का मंच तैयार हो रहा है। काउन्ट डाउन 2010 के पार्टनर दुनिया के 60 से भी अधिक देशों में स्थित है। यूरोपीय, एशियाई, अमेरिकी और अफ्रीकी देशों में इस नेटवर्क के सारे केन्द्र स्थापित किए गए हैं। इस नेटवर्क का मूल उद्देश्य है पूरी दुनिया में जैव विविधता के संरक्षण को लेकर जन जागरूकता पैदा करना। काउन्ट डाउन 2010 नेटवर्क संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित अंतर्राष्ट्रीय जैव विविधता वर्ष 2010 का एक प्रमुख सहयोगी बना हुआ है और इस नेटवर्क में पूरी दुनिया में फैले 900 से अधिक पार्टनर इस वर्ष का लक्ष्य हासिल करने के लिए जैव विविधता से जुड़ी हर छोटी-बड़ी सूचनाओं का परस्पर आदान-प्रदान करते रहेंगे।
जैव विविधता के संरक्षण से पृथ्वी के अनमोल जीवित पर्यावरण को बचाया जा सकता है और यदि पृथ्वी पर मौजूद पर्यावरण को बचा लिया तो लंबे समय तक पेड़-पौधे, जंतु और हम मनुष्य इस पृथ्वी पर अपना अस्तित्व कायम रख सकते हैं। यदि हम जैव विविधता के सतत् संरक्षण और उपयोग में विफल होने की दशा में हमारे द्वारा विघटित पर्यावरण, नई व विकराल बीमारियाँ और गरीबी के अलावा कुछ नहीं आयेगा। अतएव जैव विविधता का उचित संरक्षण करके इस प्राकृतिक पूँजी को अपनी भावी पीढ़ी को सौंपना हमारी नैतिक जिम्मेदारी बनती है। हमें इस जिम्मेदारी से मुँह नहीं मोड़ना चाहिए।
जैव-विविधता के समक्ष उत्पन्न संकट
हर वर्ष 22 मई का दिन अंतर्राष्ट्रीय जैव-विविधता दिवस के रूप में मनाया जाता है, विशेष कर वर्ष 2010 को अंतर्राष्ट्रीय जैव-विविधता वर्ष के रूप में मनाया गया। आम लोगों में जैव विविधता को लेकर विविध गतिविधियां चल रही है। आम लोगों को जानकारी उपलब्ध कराकर तथा उनमें जैव-विविधता के महत्व के बारे में जागरूकता बढ़ाने का कार्य पूरे विश्व में हो रहा है। इससे जैव-विविधता के समक्ष उत्पन्न खतरा तथा इसके संरक्षण में जो कठिनाई आ रही है वे भी कम होगी।
जैव-विविधता से हमारा तात्पर्य है कि हमारे चारों तरफ अनेक प्रकार के जीव दिखाई देते हैं, जिनमें छोटे-छोटे पौधों से लेकर बड़े-बड़े वृक्ष और छोटे-बड़े जंतु होते हैं। ये सब जैव-विविधता के अंग हैं। अर्थात् परिवेश में उपस्थित सारे जीव जैव-विविधता के अंतर्गत आते हैं। वर्तमान में जो जैव-विविधता के समक्ष स्थिति उत्पन्न हुई ओर जिसके फलस्वरूप जैव-विविधता के ऊपर बहुत अधिक खतरा आ रहा है उसमें प्रकृति का कुछ लेना-देना नहीं है। इसके लिए मुख्य रूप से मनुष्य जाति ही उत्तरदायी है। इस समय जैव-विविधता की जो परिभाषा है उसमें मनुष्य सम्मिलित नहीं है जबकि मनुष्य भी इस धरती पर रहने वाले अन्य जीवों की तरह ही एक जीव है ओर उसी प्रकार धरती के संसाधनों पर आधारित है जैसे दूसरे जीव। अंतर इतना अवश्य है कि मनुष्य जाति धरती पर सबसे अधिक बुद्धिमान है। यही कारण है कि मनुष्य ने धरती पर अपना अधिकार जमा लिया है तथा धरती पर उपस्थित हर प्रकार के संसाधन का उपयोग अपने लाभ के लिए करने लगा। परंतु अधिकार के साथ जिस प्रकार की जिम्मेदारी मनुष्य जाति को निभानी थी उसे वह भूल गया। मनुष्य ने अपनी गतिविधियों के कारण धरती के पर्यावरण को तरह-तरह से बिगाड़ना शुरू किया। प्राकृतिक वास स्थान को बहुत हानि पहुंची चाहे वह जंगल हो, जलाशय हो, बीहड़ हो, गांव तथा शहर के आस-पास की हरियाली हो, सभी को नुकसान हुआ।
अगर हम जंगल की बात करे तो विगत कुछ दशकों में पूरे विश्व में वनों का क्षेत्र बहुत तेजी से कम हुआ है। 1990 से वर्ष 2000 के बीच प्रत्येक वर्ष विश्व स्तर पर लगभग 0.22 प्रतिशत क्षेत्र से वन समाप्त हुए थे। वर्ष 2000 से 2005 तक इस दर में थोड़ी कमी देखी गई हैं। इन वर्ष़ों में यह दर कम हो कर 0.18 प्रतिशत हो गई थी। भारत के संदर्भ में स्थिति में कोई खास सुधार नहीं है। वर्ष 2007 में देश में वनों का क्षेत्र 21.02 प्रतिशत रह गया था। इसके अतिरिक्त लगभग 2.8 प्रतिशत क्षेत्र पर वृक्ष है, जिन्हें वनों के वर्ग में नहीं रखा जा सकता परंतु, वे भी पर्यावरण के संतुलन में अपना योगदान देते हैं। बीसवीं सदी में वन क्षेत्र में बहुत अधिक कमी हो चुकी थी। स्पष्ट है कि इसका प्रभाव देश में उपस्थित जैव-विविधता पर पड़ा होगा, इसका प्रमाण भी उपलब्ध है। अगर हम पशु की बात करें तो कई उदाहरण हमारे सामने हैं। एक महत्वपूर्ण उदाहरण है चीता, जो हमारे देश में काफी बड़े क्षेत्र में पाया जाता था इस समय पूरी तरह विलुप्त हो चुका है। इसका मुख्य कारण है चीतों के प्राकृतिक वास स्थान तेजी से बिगड़ा था जिससे चीतों के लिए भोजन प्राप्त करना कठिन हो गया था।
वास स्थान के समाप्त होने या सिकुड़ने से जैव-विविधता को जो खतरा उत्पन्न होता है उसके अनेक उदाहरण हमारे सामने है। परंतु हम यहां देश के दो बिल्कुल अलग-अलग भाग से एक-एक उदाहरण लेते हैं। उत्तर पूर्व में मणिपुर में एक खास प्रकार का हिरण पाया जाता है। इसे Brow antlered deer के नाम से जाना जाता है। जिसकी संख्या बहुत कम हो गई है कारण है कि उस हिरण का वास स्थान लगातार सिकुड़ता गया है। दूसरी ओर कश्मीर में एक अलग प्रकार का हिरण पाया जाता है जिसका नाम हांगुल है। उसके साथ भी ऐसी ही समस्या है। जहां तक छोटे पशु है उन पर हमारा ध्यान कम जाता है परंतु, वह भी इस समस्या से जूझ रहा है। जब किसी खास प्रकार का वास स्थान समाप्त होता है तो वहां बसने वाले सभी जीवों पर संकट आता है।
जैव-विविधता के ऊपर दूसरा बड़ा खतरा है प्रदूषण का। मनुष्य की बढ़ती गतिविधियों के कारण पर्यावरण का प्रत्येक अंग प्रदूषण का शिकार हो रहा हैं। प्रदूषण के कारण अनेक प्रकार के जीव समाप्त हो रहे हैं इस संबंध में कुछ दशक पूर्व एक पुस्तक लिखी गई थी। पुस्तक का नाम था-साइलेंट स्प्रिंग जिसमें पक्षियों के संकट को उजागर किया गया था। इसी प्रकार तालाब, झील, नदी तटीय क्षेत्र में जल प्रदूषण के कारण अनेक प्रकार के जीवों के लिए खतरा पैदा हो गया है। कई बार यह खतरा उर्वरकों के कारण भी होता है। कृषि कार्य में उपर्युक्त उर्वरक वर्षा जल या सिंचाई के जल के साथ झील, तालाब, नदी और समुद्र तट तक पहुंच जाते हैं। इनके कारण वहां पोषक तत्वों के बढ़ जाने से अपतृणों (घास-पतवार) की मात्रा बढ़ जाती हैं, जिसके परिणाम स्वरूप उन वास स्थानों में प्राकृतिक रूप से बसने वाले जीवों के ऊपर खतरा पैदा हो जाता है।
जैव-विविधता के समक्ष एक अन्य खतरा है आवश्यकता से अधिक दोहन का। यह खतरा प्रकृति में उपस्थित अनेक जीवों के समक्ष है। उदाहरण के लिए मछुआरों द्वारा इतना अधिक मछली-पकड़ना कि उनका सफाया ही हो जाए।
पूरे विश्व में जहां भी औषधीय पौधे पाए जाते हैं उनके साथ ही यही स्थिति है। उनका आवश्यकता से अधिक दोहन हो रहा है। कहीं लोग लालच में ऐसा कर रहे हैं तो कहीं अज्ञानता के कारण। उदाहरण के लिए अगर पौधे का केवल एक भाग उपयोगी होता है तो भी लोग पूरे पौधे को उखाड़ लेते हैं। इन सबका परिणाम यह है कि औषधीय पौधों के ऊपर संकट बढ़ता जा रहा है और उनकी अनेक जातियां ऐसी है जो विलुप्त होने के कगार पर है। अगर वे विलुप्त हो जाती है तो मानव जाति के लिए बहुत बड़ा नुकसान होगा। एक कारण यह है कि उनका उपयोग तरह-तरह की बीमारियों से मुक्ति के लिए किया जाता है। दूसरा कारण यह है कि उनक उपयोग अधिकतर वे लोग करते हैं जिन्हें स्वास्थ्य संबंधी आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध नहीं है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का अनुमान है कि विश्व स्तर पर गरीब राष्ट्रों में लगभग 80 प्रतिशत जनसंख्या पारंपरिक चिकित्सा पद्धति पर निर्भर है जिनमें औषधीय पौधों का बहुत अधिक उपयोग होता है। दूसरी ओर औषधीय पौधों पर हो रहे शोध से बहुत से नए तथ्य सामने आ रहे हैं। उदाहरण के लिए यकृत-शोध जो एक खतरनाक रोग है, के विषय में यह तथ्य सामने आ चुका है कि भुई-आमला जैसा साधारण पौधा इस रोग के उपचार में सहायक हो सकता है। एक अन्य पौधा है सदाबहार जो लगभग हर जगह पाया जाता है, के विषय में यह स्पष्ट हुआ है कि उसका उपयोग कर कैंसर की कुछ खास किस्म का उपचार संभव है। अगर इस प्रकार के शोध पर विचार किया जाए तो स्पष्ट है कि भविष्य में भी हमें ऐसे और अधिक पेड़-पौधों के विषय में जानकारी मिल सकती है जिनकी सहायता से खतरनाक बीमारियों का उपचार संभव हो सकेगा। अगर इस प्रकार के शोध के पूरा होने के पहले ही हम उन पौधों को खो देंगे तो उनसे होने वाले लाभ से हम वंचित रह जाएंगे।
इस तरह के अनेक उदाहरण हम हर दिन देखते हैं। यह अलग बात है कि हम उन पर जैव-विविधता की दृष्टि से निगाह नहीं डालते। अगर हम अपने घर के भीतर या आसपास पाए जाने वाले जीव जैसे- मछली, छिपकली, गिरगिट, गौरेया, मैना, बुलबुल, उल्लू, मेंढक आदि को देखें तो ये सब हमारे परिवेश में पाए जाने वाले कीड़ों का शिकार करते रहते हैं। अगर इस तरह के जीव पर्यावरण में नहीं हो तो कीड़ों की संख्या इतनी बढ़ जाएगी कि स्वयं हमारे अस्तित्व पर प्रश्न चिन्ह लग जाएगा। इसी तरह पर्यावरण प्रदूषण को कम करने के लिए भी अनेक प्रकार के जीवों का उपयोग होता है। वे भी जैव-विविधता का ही अंग है। बहुत से पेड़-पौधे वायुमंडल से प्रदूषक तत्वों को सोख कर अलग करने का गुण रखते हैं तो कई पेड़-पौधों में यह गुण होता है कि वे मिट्टी या पानी में उपस्थित प्रदूषक तत्वों को नष्ट कर देते हैं या उन्हें अपने अंदर सोख लेते हैं, जिसके फलस्वरूप मिट्टी, पानी आदि प्रदूषण मुक्त हो जाता है। अगर इस प्रकार के काम के लिए हम रासायनिक विधि का उपयोग करना चाहें तो एक तरफ तो खर्च बहुत अधिक आएगा और दूसरी तरफ उन रसायनों से पर्यावरण को बहुत क्षति होगी।
इस तरह के अनेक उदाहरण दिए जा सकते हैं जहां हम धरती पर उपस्थित जैव-विविधता का लाभ उठाते हैं या तो सीधे या परोक्ष रूप हैं। परंतु समस्या यह है कि धरती पर उपस्थित जैव-विविधता को संकट का सामना करना पड़ रहा है और इसका आभास काफी समय से रहा है। यही कारण था कि संयुक्त राष्ट्र द्वारा 1992 में रियो डि जेनेरो, ब्राजील में आयोजित संयुक्त राष्ट्र विकास एवं पर्यावरण सम्मेलन में अनेक अति महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर हुए। उनमें दो ऐसे समझौते थे जो बाध्यकारी थे और बाध्यकारी समझौतों में से एक जैव-विविधता से संबंधित था उसे ‘कन्वेंशन ऑन बायोलॉजिकल डाइवर्सिटी’ के नाम से जाना जाता है। उस ‘कन्वेंशन’ का उद्देश्य था जैव-विविधता का संरक्षण तथा जैव-विविधता का सतत उपयोग। रियो डि जेनेरो में ही 150 से अधिक राष्ट्रों ने उस समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए थे, जिनमें भारत भी सम्मिलित है। वह समझौता 29 दिसम्बर 1993 में लागू है। अब तक लगभग 190 राष्ट्र इससे जुड़ चुके हैं। भारत ने जैव-विविधता के संरक्षण के लिए एक अलग अधिनियम भी बनाया है, जिसे जैव-विविधता अधिनियम 2002 के नाम से जाना जाता है। संसद ने उस अधिनियम को 5 फरवरी 2003 को स्वीकृति भी दे दी थी। इस अधिनियम का मुख्य उद्देश्य है देश में उपस्थित जैव-विविधता का संरक्षण तथा उसके उपयोग को इस प्रकार संघटित करना कि जैव-विविधता नष्ट न हो और जैव-विविधता के उपयोग का लाभ देश तथा देशवासियों को मिले। यह इसलिए भी अनिवार्य था क्योंकि भारत एक जैव-विविधता प्रधान देश है। पूरे विश्व में भारत सहित कुल सोलह देश हैं जिन्हें जैव-विविधता प्रधान देशों की श्रेणी में रखा जाता है। इसका कारण है कि पूरे विश्व में भू-भाग का केवल 2.4 प्रतिशत भारत में है। इतना कम क्षेत्र होने के बावजूद भी भारत में विश्व की 7.5 - 8 प्रतिशत जैव-विविधता पाई जाती हैं। यही कारण है कि भारत पर जैव-विविधता को बचाने की बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। भारत में बहुत बड़ी संख्या में ऐसे जीव पाए जाते हैं जो स्थानिक हैं अर्थात् जो कहीं ओर नहीं पाए जाते हैं। अगर वे जीव यहां से विलुप्त हो जाएं तो परिणाम होगा उनका पूरे संसार से विलुप्त होना। भारत में वैसे भी पेड़-पौधे तथा पशु-पक्षियों को संरक्षण देने की बहुत प्राचीन परंपरा रही है परंतु पिछले कुछ दशकों में वह परंपरा कमजोर पड़ रही थी। इसलिए अब अलग-अलग तरह के कानूनों की सहायता से उन्हें संरक्षण दिया जा रहा है। इसका परिणाम है कि देश के लगभग 20 प्रतिशत भाग में किसी न किसी तरह जैव-विविधता संरक्षण को जगह दी जा रही है। परंतु पूरे विश्व में स्थिति ऐसी नहीं है यही कारण है कि संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2010 को जैव-विविधता वर्ष के रूप में मनाया।
जैव विविधता के लिए वर्तमान संकट
हाल के वर्ष़ों में प्रजातियों के विलुप्त होने की दर में काफी तीव्र गति से वृद्धि हुई है। यदि प्रजातियां इसी दर से विलुप्त होती रहीं तो वह समय दूर नहीं जबकि ज्ञात आधी प्रजातियाँ पृथ्वी के पटल से विलुप्त हो जाएंगी। कारण है मानव की बढ़ती हुई जनसंख्या और इसके साथ ही पृथ्वी के संसाधनों का अत्यधिक तीव्र गति से दोहन किया जाना। मानव को जैव-विविधता की क्षति के लिए सीधे-सीधे जिम्मेवार ठहराया जा सकता है। जैव-विविधता की क्षति के निम्नलिखित प्रमुख कारण हैं-
1. मानव जनसंख्या में वृद्धि।
2. प्राकृतिक वास-स्थान का नष्ट होना।
3. भोजन और वन्य वाणिज्यिक उत्पादों को प्राप्त करने के लिए वन्य जंतुओं का शिकार
4. प्राकृतिक संसाधनों का दोहन।
5. किसी पारिस्थितिक तंत्र में अन्य पारिस्थितिक तंत्र से नई प्रजाति के जीवों का प्रवेश।
संकटग्रस्त जातियाँ -
पौधों और प्राणियों की अनेक जातियाँ विलुप्त हो जाने की संभावना के संकट से घिरी हुई है। इतना अवश्य हैं कि संकट की गंभीरता अलग-अलग है। उदाहरण के लिए, जिस जाति के 50 से भी कम बचे हुए प्राणी एक छोटे से क्षेत्र में रह रहे हैं वे बहुत अधिक गंभीर स्थिति में हैं बजाय उस जाति के जिसके 5,000 बचे हुए प्राणी कई क्षेत्रों में रह रहे हैं।
अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ के उत्तरजीविता सेवा आयोग अब जाति उत्तरजीविता आयोग कहलाता है, ने संकटग्रस्त जातियों की चार श्रेणियाँ बनाई हैं। इन श्रेणियों से यह पता चलता है कि किसी जाति के विलोपन का खतरा किस अंश तक हैं। ये श्रेणियाँ इस प्रकार हैं-
1. संकटापन्न
2. दुर्लभ
3. अवक्षयित और
4. अनिर्धारित
1. संकटापन्न जाति - एक जाति को संकटग्रस्त तब माना जाता है तब इसके सदस्य इतने कम या और इसका गृहक्षेत्र इतना छोटा है कि अगर इसे विशेष रक्षण नहीं दिया गया तो यह विलुप्त हो सकती है।
इस श्रेणी में पौधों और जंतुओं की ऐसी प्रजातियों को रखा गया है जिन पर लुप्त होने का संकट मंडरा रहा है और यदि उनके अस्तित्व को संकट में डालने वाली परिस्थितियां बनी रहीं तो उन्हें लुप्त होने से बचा पाना संभव नहीं होगा। इनमें ऐसे जीव भी शामिल हैं जिनकी संख्या वास-स्थानों की कमी के कारण अत्यधिक कम हो गई हैं। ऐसे जीव विलुप्त होने की कगार पर हैं।
बाघ, हाथी, गैंडा, भारतीय जंगली गधा, हंगुल (कश्मीरी हिरन), सुनहरा लंगूर, बौना सूअर, साइबेरियाई सारस, सोहन चिड़िया, गिद्ध, बाज, उल्लू आदि शिकारी पक्षी, सरीसृपों, उभयचरों और अनेक अकशेरूकी जंतुओं की प्रजातियाँ।
दक्षिण भारत के वर्ष़ों वनों और “शोलाज” में रहने वाले सिंह-पृच्छी बंदर विश्व का सर्वाधिक संकटग्रस्त प्राइमेट है। ऐसा माना जाता है कि वनों में इस सुंदर प्राणियों की संख्या 195 से ज्यादा नहीं बची हैं क्योंकि इसके आवास स्थल का विस्तार पिछले 3 वर्ष़ों में तेजी से घट गया है। इन वर्षा वनों में रहने वालों के आवास प्रमुख रूप से डिप्टेरोकार्पस पेड़ों पर था जिन्हें बेरहमी से काट डाला गया है। कॉफी और चाय सम्पदाओं के स्थापन के लिए देशज वनस्पति को साफ करने से स्थिति और बिगड़ गई है। उनकी संख्या को पर्याप्त रूप से करने के लिए अनाधिकृत शिकार भी जिम्मेदार है। मांस के लिए भी इस प्राणी का शिकार किया जाता है। इन्हें पालतू बनाने और चिड़ियाघर में भेजने के लिए पकड़ने का व्यापार भी फल-फूल रहा है।
2. दुर्लभ जाति - ये जातियाँ वे हैं जिनकी संख्या थोड़ी-सी है या वे इतने छोटे क्षेत्रों में रहती हैं या ऐसे असामान्य पर्यावरणों (विशेष क्षेत्री) में रहती हैं कि वे जल्दी विलुप्त हो सकती है।
इस श्रेणी में पौधों और जंतुओं की ऐसी प्रजातियों का रखा गया है जिनकी विश्व में बहुत कम संख्या पाई जाती है। वर्तमान में ये संकटापन्न या असुरक्षित नहीं है किंतु कम संख्या में पाए जाने के कारण इनके संकटापन्न या असुरक्षित हो जाने का खतरा मंडरा रहा है। जंतुओं और पौधों की ये प्रजातियाँ एक विशेष भौगोलिक क्षेत्र या वास-स्थान में ही निवास करती हैं या किसी अधिक बड़े क्षेत्र में कम संख्या में निवास करती हैं।
उदाहरण- सूअर के समान पूंछ वाला लघुपुच्छ वानर, मलय देश में पाया जाने वाला भालू (पूर्वोत्तर क्षेत्र), साह (हिमाचल क्षेत्र), छत्रयुक्त सारस (मैदानी और दलदली क्षेत्रों में पाया जाने वाला) आदि।
दुर्लभ जाति का एक उदाहरण है- हवाई मॉन्क सील है। यह केवल हवाई द्वीप समूह से उत्तर-पश्चिम में फैले छः छोटे-छोटे द्वीपों पर पाई जाती है। इनकी संख्या शायद 1500 से ज्यादा नहीं है। 1800 सदी के उत्तरार्ध में इन्हें वसा (चर्बी) के लिए मारा जाता था और वे लगभग विलुप्त हो गई। 1909 में इनकी रक्षा की जा रही है और धीरे-धीरे इनकी संख्या बढ़ी है। दुर्भाग्यवश अब स्थिति यह है कि इनका मारना बंद करना भी शायद इन्हें बचाने के लिए पर्याप्त न हो। जिन पुलिनों पर मादाएँ अंडे देती हैं अगर वहाँ इन्हें क्षुब्ध कर दिया जाए तो वे दूर पानी में भाग जाती हैं। पीछे जो बच्चे छोड़ जाते हैं उनमें से अधिकांश मर जाते हैं। सारी हवाई मॉन्क सील केवल इन कुछ द्वीपों पर ही सिमटकर रह गई हैं इसलिए यह संभव है कि कोई भी प्राकृतिक महाविपत्ति इनका नामो-निशान मिटा दे। उदाहरण के लिए तेल चिकनापृष्ठ ऐसी घोर विपत्ति है। कुछ सील बंदीगृहों में हैं लेकिन वहाँ उन्होंने कभी भी प्रजनन नहीं किया।
दूसरा उदाहरण महान भारतीय सारंग (बस्टर्ड) है का है। दुनिया के सबसे दुर्लभ पक्षियों में यह भी एक है जो भारतवासी है। पहले यह पूर्वी पाकिस्तान से पश्चिम बंगाल तक तथा दक्षिण दिशा में दक्षिणी मद्रास के प्रायद्वीपीय क्षेत्रों तक वितरित था।
आजकल यह गुजरात, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, कर्नाटक, हरियाणा और उत्तरप्रदेश के बड़े-बड़े घासस्थलों, शुष्क और अर्ध-शुष्क भूमियों तथा बोए हुए खेतों में छोटे-छोटे समूहों में रहता है। ऐसा विश्वास है कि अब केवल 750 पक्षी ही बचे हैं और आज भी इनका मुख्य आवास गुजरात है। हाल ही के वर्ष़ों में अनाधिकृत शिकार और इसके प्राकृतिक आवास के नष्ट हो जाने के कारण इस दुर्लभ और घटती जा रही जाति का विनाश हुआ। इसके प्राकृतिक आवास के चारों और कीटनाशकों तथा पीड़कनाशकों के अंधाधुंध उपयोग के कारण भी इन पर प्रभाव पड़ा है। खाने के लिए भी इन्हें मारा जाता रहा है
3. अवक्षयित (अतिसंवेदनशील) जातियाँ - इनमें वे जातियाँ शामिल हैं जिनकी संख्या पहले की अपेक्षा बहुत कम हो गई है और अभी भी लगातार घट रही है। यह लगातार हो रही कमी ही चिंता का कारण है। इस श्रेणी के प्राणी जल्दी ही दुर्लभ या संकटापन्न श्रेणी में आ सकते हैं।
उत्तरी अफ्रीका का ऐडैक्स बारहसींगा (ऐन्टिलोप) कुल (फैमिलि) का सदस्य है। यह मूल रूप से मिस्र से लेकर मॉरीटिना के रेगिस्तान में रहता था। इस प्राणी का इतना अधिक शिकार किया जाता रहा कि अपने पहले वाले निवास के सारे क्षेत्रफल में 5,000 से भी कम जीवित बचे हैं। 1900 से ही मिस्र में तो इनका नामो-निशान ही नहीं रहा और ट्यूनीशिया से भी ये अलविदा हो गए हैं। लीबिया, स्पैनी सहारा, ऐल्जीरिया या सूडान में भी इनके अस्तित्व के बारे में संदेह है। लगता है उनका अंतिम जमावड़ा मॉरीटिना और माली में था जहाँ के खनाबदोश मूल निवासी उनका अभी भी शिकार करते हैं और उनके माँस को खाने के लिए सुखाते हैं। ऐडैक्स बारहसींगा की संख्या दिनोदिन घट रही है। अगर इनकी आबादी का कम होना लंबे समय तक जारी रहा तो जाति विलुप्त हो जाएगी। लेकिन, अगर आज इनका शिकार करना बंद कर दिया जाए तो जीवित बने रहने के लिए इनकी संख्या अभी भी पर्याप्त रहेगी और आवास भी काफी फैला हुआ मिल जाएगा।
पिछले कुछ वर्ष़ों में कुपीत चीता का फर कश्मीर में अवैध रूप से बेचा जाता था। हिमालय प्रदेशों में इनकी संख्या इतनी घट गई है कि इसके दर्शन ही दुर्लभ हो गए हैं। सदाबहार वनों की बिगड़ती हालत इनकी अवक्षयित स्थिति के लिए उत्तरदायी है। इस सुंदर प्राणी का क्षेत्र नेपाल, भूटान, सिक्किम से लेकर असम तक फैला हुआ है। इसलिए इसके संरक्षण के लिए उचित कदम उठाने चाहिए ताकि यह विलुप्ति के कगार पर न पहुँचने पाए।
4. अनिर्धारित जातियाँ - चौथी श्रेणी में वे जातियाँ आती हैं जो खतरे में पड़ी हुई लगती हैं, लेकिन उनके बारे में पर्याप्त जानकारी के अभाव में उनकी सही स्थिति का विश्वसनीय आकलन करना संभव नहीं है।
इस श्रेणी में आने वाली जातियों के अनेक उदाहरण हैं। एक उदाहरण उत्तर-पूर्वी ब्राजील के तीन-तट्टी वाले आर्मेडिलो है जिसका माँस के लिए शिकार किया जाता है।
दूसरा उदाहरण सुमात्रा के छोटे कान वाले शश निसोलैगस नेत्स्चेरी का है जहाँ खेती-बाड़ी के लिए जंगलों के काटे जाने से यह गायब होता जा रहा है। तीसरा उदाहरण मेक्सिको के प्रेअरी कुत्ते का है जिसे खाने के लिए मारा जाता है और इसके आवास पर खेती-बाड़ी के लिए कब्जा कर लिया जाता है।
आम तौर पर किसी अनिर्धारित जाति, इसके परिवर्तनों और इसकी स्थिति पर निर्भर करते हुए जब विस्तृत जानकारी एकत्रित की जाती है तब इसे ऊपर दी गई किन्हीं भी तीन श्रेणियों में रखा जा सकता है अथवा इसे सुरक्षित जाति घोषित किया जा सकता है। उदाहरण के लिए एक अलवणजल समुद्र गौ (अमेजॉन मैनैटी) ट्राइकिकस इनन्गुइस की स्थिति 1966 में अनिर्धारित समझी जाती थी। दो वर्ष़ों के भीतर ही इसकी स्थिति संकटापन्न निर्धारित की गई। मांस के लिए शिकार किए जाने के कारण अब यह सर्वाधिक संकटापन्न जाति हो गई है। 1968 में हिम चीता को अनिर्धारित जाति के रूप में वर्गीकृत किया गया और 1970 में इसे संकटापन्न घोषित किया गया। आप शायद जानते होंगे कि हिम चीते का शिकार इसके सुंदर मोटे फर के लिए किया जाता है।
विलुप्त प्राणी हमेशा के लिए चले जाते हैं। हम उन्हें कभी भी वापस नहीं ला सकते। संकटग्रस्त जातियों को संभाला जा सकता है और यह हमारा लक्ष्य होना चाहिए कि यह निश्चित करें कि इन जातियों का वही अंत न हो जो विलुप्त जातियों का हुआ था।
खतरे से बाहर जातियाँ - इसमें वे जातियाँ शामिल हैं जो पहले ऊपर की श्रेणियों में आती थी लेकिन जो अब अपेक्षाकृत सुरक्षित समझी जाती है क्योंकि प्रभावशाली संरक्षण उपाय किए गए हैं या उनके जीवित न बचे रहने के लिए जो कारण था, उसे दूर कर दिया गया है।
रेड डाटा बुक
अनेक एजेंसियाँ और कुछ निजी संगठन भी संकटग्रस्त मानी गई जातियों की सूची बनाते हैं। इन सूचियों में सर्वाधिक उल्लेखनीय रेड डाटा बुक है। अनेक जातियों की स्थिति पर यह एक खुला पृष्ठ खंड है। अद्यतन करने का यह कार्य मॉर्गीज, स्विट्जरलैंड में स्थित अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ द्वारा किया जाता है। “लाल” उस संकट का प्रतीक है जो कभी संकटग्रस्त जातियों को झेलना पड़ता है। इन जातियों में प्राणी और पौधे दोनों शामिल है। रेड डाटा बुक सूचीबद्ध जातियों के सूत्रण, परिरक्षण और प्रबंध के लिए बतौर निर्देशिका के आई.यू.सी.एन. के विशेष उत्तरजीविता आयोग द्वारा 1969 में जारी की गई। इस किताब में दूसरे प्राणियों और पौधों की अपेक्षा संकटापन्न स्तनियों और पक्षियों के बारे में अधिक व्यापक जानकारी दी गई है। इसमें उन जीवों के बारे में अधिक व्यापक जानकारी दी गई है। इसमें उन जीवों के बारे में भी जानकारी दी हुई है जो कम विशिष्ट हैं और विलोपन का सामना कर रहे हैं।
इस प्रकाशन में गुलाबी पृष्ठों में गंभीर रूप से संकटापन्न जातियाँ भी शामिल की गई हैं। प्राणियों की स्थिति बदल जाने पर शुल्कदाताओं को नए पृष्ठ भेजे जाते हैं। जो जातियाँ पहले संकटापन्न थीं, लेकिन अब वे उन संकटों से उभर आई हैं तथा वे संकटापन्न नहीं रहीं उनके बारे में हरे पृष्ठों में ब्यौरा मिलता है। हाल के वर्ष़ों में गुलाबी पृष्ठों की संख्या बढ़ती जा रही है।
ऐसा विश्वास किया जाता है कि भारत में मौजूद 15,000 फूल वाले पौधे में से कम से कम 100 पौधे या संभवतया 200 पौधे संकटग्रस्त हैं। भारत में सर्वाधिक संकटग्रस्त पादप जातियाँ अतिशोषित औषधीय पौधे, ऑर्किड जैसे सजावटी पौधे, घटपर्णी जैसे वानस्पतिक जिज्ञासा वाले पौधे हैं। भारत में ऑर्किड की लगभग 1250 जातियाँ हैं जिसमें से अकेले मेघालय में ही 300 जातियाँ दुर्लभ हो रही हैं। आज, लगभग 20 मेघालय ऑर्किड जातियाँ संकटापन्न हैं। हमारे देश के कुछ संकटापन्न पौधों की सूची -
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1. ऐटिस |
2. वाछा बच |
3. कुलंजन |
4. अंगूरसाग |
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5. मिशमी तीता |
6. पिकोटी डेन्ड्रोबियम |
7. गुग्गल |
8. किन्स |
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9. हिम ऑर्किड |
10. काडू |
11. कमल |
12. भारतीय पोडोफाइलम |
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13. सर्पगंधा |
14. सूकड |
15. कुथ मूल |
16. ब्रह्म कमल |
जैव विविधता का संरक्षण -
जैव-विविधता से अभिप्राय विभिन्न रूपों से है- यानी विभिन्न प्रकार के पौधे, जीव-जन्तु और सूक्ष्म जीव समूह। इसमें उसके जीन और वे पारिस्थितिकी प्रणालियाँ भी शामिल हैं, जिनका वे निर्माण करते हैं। जैव-विविधता एक ऐसी अवधारणा है जिसमें सजीव जगत की परस्पर संबद्ध एवं प्रक्रियाओं पर बल दिया जाता है। जैव विविधता के संरक्षण का अर्थ है कि प्रकृति द्वारा निर्मित जीवन-समर्थक प्रणाली को हर तरह से बचाए रखना और पारिस्थितिकी विषयक स्थानीय विकास के लिए अनिवार्य जीवन संसाधनों की रक्षा करना।
भारत जैव-विविधता की दृष्टि से असाधारण रूप से समृद्ध है और विश्व के 17 बड़े केन्द्रों में से एक है। भारत में 10 जैव भौगोलिक अंचल और 25 जीवीय प्रांत हैं और यहाँ विश्व की सभी प्रमुख पारिस्थितिकी प्रणालियाँ पायी जाती है। जैव विविधता की दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थलों में मुख्य रूप से पूर्वी घाट, पश्चिमी घाट और पूर्वोत्तर पर्वतीय क्षेत्र शामिल हैं। भारत में 45000 से अधिक पौधों की प्रजातियाँ और 81000 जीव-जन्तु प्रजातियाँ पायी जाती हैं। विश्व की 7 प्रतिशत वनस्पति प्रजातियाँ और 6.5 प्रतिशत जीव-जन्तु प्रजातियाँ भारत में मौजूद हैं, जिनमें 33 प्रतिशत वनस्पति और 62 प्रतिशत जीव-जन्तु प्रजातियाँ स्थानिक (देशज) हैं।
प्रकृति के संरक्षण का अर्थ है विकास के प्रभावों से प्रकृति की रक्षा करना, जबकि जैव-विविधता संरक्षण के अन्तर्गत खेती योग्य वनस्पति और वनों तथा पालतू और जंगली सभी तरह के जीव-जन्तुओं का संरक्षण शामिल हैं। जैव-विविधता के तीन विशिष्ट स्तर है, हालांकि वे सभी एक जटिल जाल के घटक हैं।
पूरे विश्व में पौधों और जन्तु संसाधनों के अंधाधुंध दोहन के कारण जीवमण्डल में असंतुलन हो रहा है। बहुत से जीव-जन्तु लुप्त हो गए हैं और अन्य बहुत-से संकटग्रस्त हैं। ऐसा अनुमान है कि बीसवीं शताब्दी के अंतिम 40-50 वर्ष़ों में जीवों की लगभग 3,00,000 प्रजातियाँ लुप्त हो गई हैं। इसीलिए अंतराष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय स्तर पर जैव-विविधता के संरक्षण को महत्व दिया जा रहा है।
जैव-विविधता की रक्षा के लिए समय-समय पर अनेक उपाय किए जाते रहे हैं। वन्य जीवों के संरक्षण हेतु तीन बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति अर्थात (i) पर्याप्त भोजन और सुरक्षा (ii) आश्रय स्थल (वास-स्थल), और (iii) प्रजनन हेतु सुरक्षित स्थान की उपलब्धता आवश्यक है। जैव-विविधता के संरक्षण के दो प्रमुख पहलू हैं, ये हैं-
स्व-स्थानिक (या मूल-स्थानिक) संरक्षण
बाह्य स्थानिक संरक्षण
जैव विविधता का स्व-स्थानिक (या मूल-स्थानिक) संरक्षण -
In-Situ संरक्षण से अभिप्राय जीवों को उनकी वास्तविक परिस्थितियों जैसे-जंगलों या प्राकृतिक आश्रयस्थलों में संरक्षित करने से हैं। जीवों को प्राकृतिक स्थलों में संरक्षित करना महत्वपूर्ण है क्योंकि बहुत-से वन्य जीवों की प्रजातियां अपने प्राकृतिक जैवीय समुदायों में ही जीवित रह सकती हैं। In-Situ संरक्षण में विविध जीवों को राष्ट्रीय उद्यान (National Park), वन्य जीव विहार (Wild Life Sanctuary) अथवा जीवमण्डल रिजर्व (Biosphere Reserves) में संरक्षित किया जाता है।
वन्य-जीवों के वास-स्थानों को नष्ट करना और उनकी चोरी-छिपे हत्या करना जैव-विविधता के लिए दो प्रमुख संकट हैं। उष्ण कटिबंधीय और उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों (देशों) में यह समस्या अत्यधिक गंभीर है। क्योंकि ये क्षेत्र जैव-विविधता की दृष्टि से अत्यधिक समृद्ध है। इस स्थिति के लिए मुख्य दोष स्वयं मानव ही है।
जैव-विविधता के संरक्षण हेतु सर्वोत्तम उपाय जीवों के प्राकृतिक वास स्थानों को फिर से उनके रहने के उपयुक्त बनाना (पुनरूद्धार) और संरक्षण प्रदान करना है। ऐसा उनके वास-स्थानों को जैव आरक्षित और संरक्षित क्षेत्र घोषित करके ऐसा किया जा सकता है। राष्ट्रीय प्राणी उद्यान और वन्य जीव अभयारण्य जैव-विविधता हेतु जीवों को स्व-स्थानिक (या मूल-स्थानिक) संरक्षण प्रदान करते हैं।
इसमें मनुष्य की गतिविधियों द्वारा प्रभावित जीव-जन्तुओं को उनके पारितंत्र सहित संरक्षित किया जाता है। In-situ संरक्षण के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं-
1.प्राकृतिक विरासत की विविधता तथा पूर्णता को इसके पूरे स्वरूप में अर्थात् प्राकृतिक वातावरण, वनस्पति एवं जीवों के रूप में बनाए रखना एवं संरक्षित रखना;
2.पारिस्थितिक संरक्षण तथा पर्यावरण संरक्षण के विभिनन पक्षों पर शोध कार्य को बढ़ावा देना;
3.शिक्षा, जागरूकता तथा प्रशिक्षण के लिए सुविधाएं उपलब्ध कराना।
यह संरक्षण राष्ट्रीय उद्यान, वन्य जीव विहार एवं जीवमण्डल आरक्षित क्षेत्र में किया जाता है।
राष्ट्रीय उद्यान से अभिप्राय ऐसे क्षेत्र से हैं जो पर्यावरण, प्राकृतिक और ऐतिहासिक वस्तुओं तथा उस पर्यावरण में रहने वाले वन्य जीवों को संरक्षित करने के लिए समर्पित है। राष्ट्रीय उद्यान में किसी का कोई निजी अधिकार नहीं होता। इनमें सभी वन सम्बन्धी कार्य ओर दूसरे उपयोग जैसे घरेलू पशुओं की चराई, लकड़ी काटना आदि नहीं किए जा सकते। राष्ट्रीय उद्यान में ऐसे ढंग और ऐसे साधनों से आनन्द उठाने की व्यवस्था की जाती है जिससे इनमें उपस्थित जैव-विविधता को काई भी क्षति न पहुंचे। भारत में इनका क्षेत्र आयाम 0.04 से 3162 वर्ग कि.मी. तक होता है। इनमें शोध व वैज्ञानिक प्रबन्धीकरण नहीं होता।
वन्य जीव विहार अथवा अभयारण्य से अभिप्राय ऐसे क्षेत्र से है जो राज्य सरकार द्वारा विशिष्ट प्रकृति के संरक्षण के लिए निर्धारित किया जाता है। इनमें पक्षियों और स्तनधारियों की किसी भी प्रजाति को मारना, उसका शिकार करना या कैद करना मना होता है। केवल बिहार के प्रबन्ध के लिए उत्तरदायी उच्चतम अधिकारी के नियंत्रण में ऐसा किया जा सकता है। वन्य जीवन बिहार में निजी अधिकारों और अन्य उपयोगों की एक सीमा तक स्वीकृति दी जा सकती है जिससे इसके वन्य जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। इनका क्षेत्र राष्ट्रीय उद्यान की अपेक्षा अधिक व्यापक 0.61 से 7818 वर्ग कि.मी. तक होता है।
जीवमण्डल आरक्षित क्षेत्र से अभिप्राय कम-से-कम व्यवधान वाली, मनुष्य द्वारा कम-से-कम रूपान्तरित व कम-से-कम अवतरान्तित भूमि क्षेत्र से है जो वन्य जीवन की रक्षा के लिए विशेष रूप से सीमांकित किए जाते हैं। इनका क्षेत्र अपेक्षाकृत अधिक व्यापक 5670 वर्ग कि.मी. से अधिक होता है। एक जीवमण्डल आरक्षित क्षेत्र को निम्नलिखित पांच भागों में बाँटा जाता है-
1.कोर क्षेत्र - प्राकृतिक व सबसे कम व्यावधान वाला क्षेत्र।
2.मैनीपुलेशन वानिकी क्षेत्र - मानव निर्मित जंगल वाला क्षेत्र।
3.मैनीपुलेशन पर्यटन क्षेत्र - पर्यटन, शिक्षा व प्रशिक्षण के लिए सुरक्षित क्षेत्र।
4.मैनीपुलेशन कृषीय क्षेत्र - वन्य जनजातियों व कृषि जन्य भूमि के लिए सुरक्षित क्षेत्र।
5.पुर्नकरण क्षेत्र - वह भूमि क्षेत्र जिसका मानव द्वारा विनाश कर दिया गया है और उसे धीरे-धीरे पुनः सुरक्षित करने की आवश्यकता है।
इस समय भारत में निम्न 18 जीव मण्डल आरक्षित क्षेत्र हैं-
नीलगिरि (कर्नाटक, तमिलनाडु तथा केरल के मिलन क्षेत्र में)
कच्छ (गुजरात)
नंदा देवी (उत्तरांचल)
अमरकंटक (मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़)
नोकरेक (मेघालय)
कोल्ड डेजर्ट (हिमाचल प्रदेश)
ग्रेट निकोबार (अण्डमान निकोबार)
शेषाचलम (आंध्रप्रदेश)
मनार की खाड़ी (तमिलनाडु)
पन्ना (मध्यप्रदेश) वर्ष 2011 में निर्मित
मानस (असम)
सुन्दरवन (पश्चिम बंगाल)
सिमलीपाल (उड़ीसा)
डिब्रू-सैखोवा
देहांग-देबांग (अरूणाचल प्रदेश)
पंचमढ़ी (मध्यप्रदेश)
कंचनजंगा (सिक्किम)
अगस्तयमलाई (तमिलनाडू)
इनमें से सुन्दर वन एवं मन्नार की खाड़ी विश्व जीवमण्डल रिजर्व के नेटवर्क हेतु प्राप्त हुए हैं। इसके अतिरिक्त भारत में 6 अंतर्राष्ट्रीय तराई क्षेत्र तथा 5 विश्व सम्पदा स्थल भी हैं।
इस प्रकार के नेटवर्क से वन्य जीव अभयारण्यों को संरक्षण प्रदान करने में अत्यधिक सहायता मिलेगी।
गुजरात के पाटन में स्थित ‘रानी की वाव’, कुल्लू स्थित ‘ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क’ को विश्व विरासत सूची (World Heritae List) में जून 2014 में शामिल किया गया है। 11वीं सदी में सरस्वती नदी के तट पर निर्मित ‘रानी की वाव’ को सास्कृतिक परिसम्पत्तियों की श्रेणी में विश्व विरासत सूची में शामिल किया गया है। यूनेस्को की वर्ल्ड हेरिटेज कमेटी की दोहा (कतर) में 15-25 जून, 2014 को सम्पन्न 10 दिवसीय बैठक में किया गया। इन्हें मिलाकर विश्व विरासत सूची में परिसम्पत्तियों की कुल संख्या 1007 हो गई है, जो 161 देशों में स्थित हैं। उनमें 779 सांस्कृतिक परिसम्पत्तियाँ, 197 प्राकृतिक स्थल व 31 मिश्रित परिसम्पत्तियाँ शामिल हैं। भारत की कुल 32 भारतीय परिसम्पत्तियाँ (25 सांस्कृतिक स्थल/परिसम्पत्तियों की श्रेणी में तथा 7 प्राकृतिक स्थलों की श्रेणी में) इस सूची में शामिल हैं-
प्राकृतिक स्थल -
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1. काजीरंगा राष्ट्रीय पार्क (असम) |
1985 |
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2. मानस वन्यजीव अभयारण्य (असम) |
1985 |
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3. केवलादेव राष्ट्रीय पार्क, भरतपुर (राजस्थान) |
1985 |
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4. सुन्दरबन राष्ट्रीय पार्क (प. बंगाल) |
1987 |
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5. नंदा देवी राष्ट्रीय पार्क चमोली (उत्तराखण्ड) |
1988 |
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6. पश्चिमी घाट (सहयाद्री पर्वत) (मुख्यतः केरल में) |
2012 |
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7. ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क |
2014 |
रामसर कन्वेंशन के अनुसार - दलदली, ठहरे या अलवण जल के साथ 6 मीटर तक की लहरों वाला समुद्री क्षेत्र नम भूमि या आर्द्र भूमि के अंतर्गत आता है। नमभूमि भारत के कुल क्षेत्रफल के 4.63 प्रतिशत भाग पर फैली है। 2 फरवरी विश्व आर्द्रभूमि दिवस (World Wetland Day) क्योंकि 2 फरवरी 1971 को रामसर (ईरान में) समझौता सम्पन्न किया गया। लेकिन यह संधि दिसंबर 1975 में अस्तित्व में आई थी। मई 2014 तक इसके सदस्य राष्ट्र 168 हैं। सबसे ज्यादा साईट U.K. में 169 है। जबकि भारत में कुल साईट 26 हैं।
रामसर आर्द्रभूमि क्षेत्र (भारत में)
1. Tsomorari – J & K – 120 वर्ग किमी.
2. Nokrsar – J & K – 13.75 वर्ग किमी.
3. Surinsar Mansar Lake – J & K – 3.5 वर्ग किमी.
4. Wular Lake – J & K – 189 वर्ग किमी.
5. चंद्रताल - H.P. – 0.49 वर्ग किमी.
6. पोंग बांध झील - H.P. – 156.62 वर्ग किमी.
7. रेनुका झील - H.P. – 0.20 वर्ग किमी.
8. रोपड़ - पंजाब - 13.65 वर्ग किमी.
9. कंजली - पंजाब - 1.83 वर्ग किमी.
10. हरिके - पंजाब - 41 वर्ग किमी.
11. अपर गंगा नदी - U.P. - 265.9 वर्ग किमी.
12. केवलादेव राष्ट्रीय पार्क - राजस्थान - 28.73 वर्ग किमी 1.10.81 को घोषित
13. सांभर झील - राजस्थान - 240 वर्ग किमी.
14. भोज - मध्यप्रदेश - 32 वर्ग किमी.
15. भीतरकणिका - उड़ीसा - 650 वर्ग किमी.
16. चिल्का झील - उड़ीसा - 1165 वर्ग किमी.-1.10.81 को घोषित
17. पूर्वी कोलकाता - P.B. – 125 वर्ग किमी.
18. Deepor Beel – Assam – 40 वर्ग किमी.
19. अस्तमुड़ी - केरल - 614 वर्ग किमी.
20. Sasthamkotta Lake – केरल - 3.73 वर्ग किमी.
21. Vembnad Kol Lake – केरल - 1512.5 वर्ग किमी.
22. नालसरोवर पक्षी अभ्यारण्य - गुजरात - 123 वर्ग किमी.
23. लोकटक झील - मणिपुर - 266 वर्ग किमी.
24. रूद्रसागर झील - त्रिपुरा - 2.4 वर्ग किमी.
25. कोल्लेरू झील - आंध्रप्रदेश - 901 वर्ग किमी.
26. पोइंट केलीमेर - तमिलनाडु - 385 वर्ग किमी.
भारत में मैंग्रोव वनस्पति
मैंग्रोव शब्द का प्रयोग पौधों के उस समूह के लिए किया जाता है जो खारे पानी और अधिक नमी वाले स्थानों पर उगते हैं। इस शब्द का प्रयोग पौधों की एक विशेष प्रजाति के लिए किया जाता है। मैंग्रोव उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों के तटों पर उस स्थान पर उगने वाली वनस्पति को कहा जाता है जहाँ ज्वार के समय समुद्र का खारा पानी भर जाता है।
मैंग्रोव वनों में पौधों की प्रजातियों के वितरण के आधार पर उन्हें दो भागों में बांटा जा सकता है। पहले समूह में वे पौधे आते हैं जिनमें खारे पानी को सहने की क्षमता अपेक्षाकृत अधिक होती है और जो समुद्री पानी में 2 से 3 गुना अधिक खारे पानी में भी जीवित रह सकते हैं जबकि दूसरे समूह में वे पौधे आते हैं जो केवल समुद्र के पानी से कम खारे पानी में ही जीवित रह पाते हैं।
भारत में लगभग 4482 वर्ग किमी. क्षेत्र मैंग्रोव वनों के अंतर्गत आता है जिनमें 59 प्रतिशत पूर्वी तट (बंगाल की खाड़ी), 23 प्रतिशत पश्चिमी तट (अरब सागर) तथा 18 प्रतिशत अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में पाया जाता है।
भारतीय कच्छ वनस्पति मुख्यतः तीन प्रकार के तटीय क्षेत्रों में पायी जाती है-
1. डेल्टा 2. पश्च जल नदी मुहाने 3. द्वीपीय क्षेत्र।
डेल्टा क्षेत्र में उगने वाले मैंग्रोव मुख्यतः पूर्वी तट पर पाये जाते हैं जहां बड़ी नदियों जैसे- गंगा, ब्रह्मपुत्र, महानदी, कृष्णा, गोदावरी तथा कावेरी डेल्टा का निर्माण करती हैं। नदी मुहानों पर उगने वाली मैंग्रोव वनस्पति मुख्यतः पश्चिमी तट पर पायी जाती है जहां मुख्य नदियां जैसे- सिंधु, नर्मदा, ताप्ती आदि के मुहाने हैं। इन क्षेत्रों में नदियों द्वारा डेल्टा क्षेत्रों का निर्माण नहीं होता है। द्वीतीय मैंग्रोव वन मुख्यतः खाड़ियों में स्थित द्वीपों में पाये जाते हैं जहां छोटी नदियों, ज्वारीय क्षेत्रों तथा खारे पानी की झीलों में मैंग्रोव के उगने के लिए आदर्श परिस्थितियां उपस्थित होती हैं।
मैंग्रोव का महत्व -
मनुष्य द्वारा मैंग्रोव वनों का उपयोग अनेक रूपों में किया जाता है। पारम्परिक रूप से स्थानीय निवासियों द्वारा इनका प्रयोग भोजन, औषधि, टेनिन, इऔधन तथा इमारती लकड़ियों के लिये किया जाता रहा है। इनका मुख्य महत्व निम्न बिंदुओं को लेकर है-
1. प्राकृतिक शरण स्थल
2. भोजन के स्रोत
3. प्राकृतिक जल शोधक
4. सूर्य की पराबैंगनी B किरणों से बचाव
5. हरित गृह प्रभाव को कम करना
6. प्राकृतिक स्थायीकारी
7. बाढ़ नियंत्रण
8. तटीय क्षरण को कम करना
9. तलछट को कम करना
10. औषधीय उपयोग
भारत में कुछ संरक्षित क्षेत्रों को समुद्री सुरक्षित क्षेत्र के अंतर्गत पूर्ण सुरक्षा प्राप्त है। भारत में कुल 26 ऐसे सुरक्षित क्षेत्र हैं जिनमें 17 अभ्यारण्य तथा राष्ट्रीय उद्यान हैं। इन सुरक्षित क्षेत्रों के अंतर्गत आने वाले मैंग्रोव क्षेत्र काफी हद तक सुरक्षित हैं। सुन्दरवन अब प्राकृतिक विश्व धरोहर स्थल के अंतर्गत आता है और इस श्रेणी में आने वाला यह विश्व का पहला मैंग्रोव क्षेत्र है।
ऐसा करके जंतुओं की तीन बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति अर्थात् (क) पर्याप्त भोजन और सुरक्षा (ख) आश्रय स्थल (वास-स्थान) और (ग) प्रजनन हेतु सुरक्षित स्थान की उपलब्धता सुनिश्ति होगी। इसके लिए निम्नलिखित उपाय अपेक्षित है।
1. वन्य-जीवों को दोहन रोकने के लिए जैव आरक्षित क्षेत्रों राष्ट्रीय प्राणी उद्यान और वन्य जीव अभयारण्यों की स्थापना की गई है। यदि वन्य जीवन के दोहन पर पूर्ण रोक लगाना संभव न हो तो वनों की कटाई कड़े दिशा-निर्देशों के अंतर्गत एक चरणबद्ध रूप में की जाती है।
2. एक धान्य कृषि अर्थात् कृषि भूमि में बार-बार एक ही प्रजाति के पौधों को उगाने को हतोत्साहित किया जाना चाहिए तथा इसके बदले मिश्रित कृषि पर बल दिया जाना चाहिए।
3. जंतुओं के चोरी-छिपे शिकार पर रोक लगाने के लिए वनों के प्राकृतिक प्रवेश मार्ग़ों, जलमार्ग़ों और नदी तटों पर वन्य जंतुओं की सुरक्षा का ध्यान रखा जाना चाहिए।
4. घास के मैदानों में चारे की उपलब्धता में वृद्धि करने और मृदा में कार्बनिक (जैविक) सामग्रियों को बनाए रखने के लिए बीच-बीच में अनजले क्षेत्रों को छोड़ते हुए जगह-जगह पर घास को जला देना चाहिए।
5. वन्य जंतुओं के धूल स्नान की पर्याप्त व्यवस्था की जानी चाहिए। वनों में ऐसे कृत्रिम स्थान भी विकसित किए जाने चाहिए जहां जाकर वन्य जंतु नमक खां सकें या चाट सकें।
6. वनों में पालतू मवेशियों को चराने पर रोक लगाई जानी चाहिए। ऐसा यह सुनिश्चित करने के लिए किया जाता है कि पालतू मवेशियों द्वारा वन्य जंतुओं में कोई रोग ने फैलाया जा सके।
7. वन्य-जीव अभयारण्यों के निकट कृषि कार्य पर रोक लगाई जानी चाहिए ताकि कृषि कार्य में प्रयुक्त कीट नाशक रसायनों के कारण पारिस्थितिकीय संकट की स्थिति उत्पन्न न हो।
8. जंतुओं की संकटापन्न प्रजातियों के संबंध में योग्य व्यक्तियों द्वारा वैज्ञानिक अध्ययन को बढ़ावा दिया जाना चाहिए ताकि उनकी स्थिति का मूल्यांकन किया जा सके और उसमें सुधार लाया जा सके। इस अध्ययन में उन पर समुचित निगरानी रखते हुए उन्हें प्रजनन हेतु उचित परिवेश उपलब्ध कराना और ऐसे वास-स्थान में उन्हें पुनर्वास प्रदान करना शामिल है जहां सूक्ष्म एक कोशिक पौधों और जंतुओं से लेकर विशाल पेड़ और विशाल शरीर वाले स्तनधारी जीव भी रहते हैं।
जीवों की प्रजातियों को संरक्षण प्रदान करने के लिए यह आवश्यक है कि संपूर्ण पारिस्थितिक तंत्र की रक्षा की जाए जहां वे रहते हैं।
उपर्युक्त सभी प्रयासों से जैव-विविधता के संरक्षण में कुछ हद तक सहायता मिल सकती है किंतु जैव-विविधता की रक्षा करने और वन्य जीवन को नष्ट होने से बचाने के लिए और भी बहुत कुछ करने की आवश्यकता है। जैव-विविधता को प्राकृतिक परिवेश में अपनी उन्नत अवस्था में पहुंचने के लिए उचित दशाएँ उपलब्ध कराई जानी चाहिए। जैव-विविधता के संरक्षण हेतु सर्वाधिक महत्वपूर्ण कदम है वनों को नष्ट होने से बचाना, वन्य जीवों के बारे में जागरूकता विकसित करना तथा लोगों का विशेषकर बच्चों को इस संबंध में शिक्षित करना। जिस देश में जितनी अधिक जैव-विविधता होगी वह देश उतना ही अधिक समृद्ध होगा।
स्व-स्थनिक (या मूल-स्थानिक) संरक्षण हेतु किए गए उपाय
हाल के वर्ष़ों में वन्य जीवन के संरक्षण, प्रबंधन और इस संबंध में जागरूकता सृजन हेतु इंटरनेशनल यूनियन फॉर कन्जर्वेशन ऑफ नेचर एंड नेचुरल रिसोर्सेस, वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फंड इंटरनेशनल और इंटरनेशनल काउंसिल फॉर वर्ड प्रिजर्वेशन जैसे अनेक अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएँ काम कर रही हैं। भारत उपर्युक्त तीनों अंतराष्ट्रीय संस्थाओं का सदस्य देश है। इन संस्थाओं की सहायता और सुझाव से जीवमंडल और उसके संघटकों के संरक्षण हेतु हमारे देश में भी अनेक उपाय किए गए हैं। वन्य जीवन संरक्षण हेतु परियोजनाएं शुरू की गई हैं, जिनमें मुख्य हैं-
1. बाघ परियोजना - भारत में यह परियोजना वर्ष 1973 में केन्द्र सरकार के सहयोग से शुरू की गई। प्रोजेक्ट टाइगर या बाघ परियोजना आरंभ में देश के विभिन्न पारिस्थितिक तंत्रों में स्थित नौ बाघ आरक्षित क्षेत्रों से शुरू की गई। बाद में इस प्रमुख प्रजाति की रक्षा हेतु स्थापित बाघ आरक्षित क्षेत्रों की संख्या धीरे-धीरे बढ़कर 27 हो गई। इन बाघ आरक्षित क्षेत्रों के अंतर्गत कुल 37,761 वर्ग किमी क्षेत्र शामिल किया गया है। इन प्रयासों के फलस्वरूप वर्ष 1997 की स्थिति के अनुसार बाघ आरक्षित क्षेत्रों में बाघों की कुल संख्या 1500 है।
2. गिर सिंह परियोजना - एशियाई सिंहों को संरक्षण प्रदान करने के लिए गुजरात के गिर वन में गिर सिंह परियोजना शुरू की गई है। यह अभयारण्य जिसे राष्ट्रीय प्राणी उद्यान घोषित किया गया है लगभग 1300 वर्ग किमी क्षेत्र में फैला हुआ है। वास स्थान की दशा में सुधार होने तथा मनुष्य द्वारा कम हस्तक्षेप किए जाने के फलस्वरूप इस अभयारण्य में सिंहों की संख्या में वृद्धि हुई है।
3. हंगुल परियोजना - यह परियोजना भारत और जम्मू और कश्मीर तथा हिमाचल प्रदेश के कुछ भागों में पाए जाने वाले लाल हिरन हंगुल, जो हिरनों की एक दुर्लभ उपप्रजाति है, को संरक्षण प्रदान करने के लिए शुरू की गई है। जम्मू एवं कश्मीर में स्थित डाचीगाम राष्ट्रीय प्राणी उद्यान हंगुल या कश्मीरी हिरन के लिए प्रसिद्ध है।
4. हाथी परियोजना - यह परियोजना देश के उत्तर, पूर्वोत्तर और दक्षिणी भागों के हाथियों के प्राकृतिक वास-स्थानों की रक्षा करने के लिए वर्ष 1991-92 में शुरू की गई। बावजूद इसके मानव के क्रियाकलापों और प्राकृतिक वास-स्थानों को नष्ट किए जाने के कारण देश में हाथियों की संख्या में निरंतर कमी हो रही है।
5. कस्तूरी मृग परियोजना - हिमालय क्षेत्र में कस्तूरी मृग पहले पाकिस्तान, म्यांमार (बर्मा) और तिब्बत तथा दक्षिणी-पश्चिमी चीन में पाए जाते थे। हालांकि कस्तूरी मृग परियोजना इस दुर्लभ प्रजाति की रक्षा के लिए बहुत पहले शुरू की गई थी, किन्तु वर्तमान में यह प्रजाति विलुप्त होने की कगार पर है।
6. राष्ट्रीय प्राणी उद्यान और वन्य जीव अभयारण्य - हमारे देश के विभिन्न भागों में समृद्ध जैव-विविधता की रक्षा के लिए राष्ट्रीय प्राणी उद्यान और वन्य जीव अभयारण्यों की स्थापना की गई है। इन राष्ट्रीय प्राणी उद्यानों और अभयारण्यों में अत्यधिक दुर्लभ और बहुमूल्य प्रजातियों के पौधों और जंतुओं को प्राकृतिक वास-स्थान और संरक्षण प्रदान किया गया है।
7. कुछ राष्ट्रीय प्राणी उद्यान - भारत में अत्यधिक दुर्लभ और बहुमूल्य प्रजातियों के पौधों और जंतुओं को संरक्षण प्रदान करने के लिए स्थापित किए गए कुछ महत्वपूर्ण राष्ट्रीय प्राणी उद्यानों को नीचे की तालिका में सूचीबद्ध किया गया है।
भारत में कुल 592 संरक्षित क्षेत्र हैं।
इनमें से 92 राष्ट्रीय प्राणी उद्यान तथा 500 वन्य-जीव अभयारण्य है।
इनकी स्थापना वन्य पौधों और जंतुओं की अत्यधिक संकटापन्न प्रजातियों को संरक्षण प्रदान करने की दृष्टि से की गई है।
इन राष्ट्रीय प्राणी उद्यान और अभयारण्यों में संरक्षित अधिकांश प्रजातियाँ विश्व के अन्य किसी भी भाग में नहीं पाई जाती।
बाह्य स्थानिक संरक्षण
Ex-Situ संरक्षण से अभिप्राय जीवों को कुछ विशेष परिस्थितियों या स्थानों जैसे-वनस्पतिक बाग चिड़ियाघर या Arboreta में संरक्षण करने से हैं। जीवों का कृत्रिम अथवा विशिष्ट परिस्थितियों में संरक्षण करने से जैविक विविधता बनाए रखने में सहायता मिलती है। इसके अतिरिक्त अनुसंधानकर्त्ता और वैज्ञानिक इस प्रकार के संरक्षण द्वारा फसलों में सुधार लाना, जीवों का अध्ययन आदि करते हैं।
जीवों की विभिन्न प्रजातियों को उनके अपने ही प्राकृतिक वास-स्थानों में सर्वाधिक उपयुक्त रूप में संरक्षण प्रदान किया जा सकता है, किन्तु कभी-कभी जब अनेक कारणों से ऐसा कर पाना संभव न हो और संकटापन्न प्रजाति विलुप्त होने की कगार पर हो, तो ऐसे प्रजाति के सरंक्षण हेतु अन्य विधियाँ भी अपनाई जाती हैं। जीवों को उनके प्राकृतिक वास-स्थान से दूर संरक्षित रखना उनका बाह्य स्थानिक संरक्षण कहलाता है। इस विधि में जीवों को नियंत्रित दशाओं में सुरक्षित रखा जाता है जैसे कि जंतुओं को चिड़िया घरों में और पौधों को वनस्पति उद्यानों में संरक्षित रखना जहां विशेषज्ञों की देखरेख में जीवों को संख्या वृद्धि के लिए आवश्यक दशाएँ उपलब्ध कराई जाती हैं। इस प्रजनन कार्यक्रम में जंतुओं के बीच लैंगिक प्रजनन की उपयुक्त स्थितियां विकसित की जाती है ताकि उत्पन्न संतान दुर्बल न हों।
जीवों को कृत्रिम अथवा विशेष परिस्थितियों में संरक्षित करने के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं-
1. संकटग्रस्त प्रजातियों को लुप्त होने से बचाना।
2. पृथ्वी की जैव-विविधता को बनाए रखना।
3. वन्य जीवों के संवर्धन से सम्बन्धित गतिविधियों को प्रोत्साहित करना।
चिड़ियाघरों और वनस्पतिक बागों में विभिन्न जीवों को संरक्षित किया जाता है। इनमें हमें क्षेत्र विशेष में उपस्थित प्राकृतिक वनस्पति और जन्तुओं से परिचित होने और उनका अध्ययन करने का अवसर मिलता है। ऐसे जीव जिनके प्राकृतिक आवास मनुष्य की गतिविधियों और वनस्पतिक बागों में संरक्षित किया जाता है। चिड़िया घरों के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित होते हैं-
1. सभी दुर्लभ जीव प्रजातियों को सुरक्षा प्रदान करना।
2. दुर्लभ जीवों के प्रजनन का प्रबन्ध करवाना।
3. दूसरे चिड़ियाघरों से प्रजनन हेतु जीवों के आदान-प्रदान का प्रबन्ध करवाना।
4. लोगों में वन्य जीवन से संबंधित चेतना का विकास करना।
5. शिक्षा तथा मनोरंजन के स्थान उपलब्ध करवाना।
हमारे देश में पहला चिड़िया घर वर्ष 1855 में चेन्नई शहर में बनाया गया। वर्ष 1875में स्थापित अलीपुर चिड़ियाघर (कलकत्ता) देश का सबसे बड़ा चिड़ियाघर है। इस समय हमारे देश में 200 चिड़ियाघर हैं। इन चिड़ियाघरों के उचित प्रबन्धन के लिए केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण स्थापित किया गया है।
जीन बैंकों में वन्य जीवों की विभिन्न प्रजातियों के जीन सुरक्षित रखे जाते हैं। यदि किसी जीव के अस्तित्व को खतरा हो तो इन जीन्स की सहायता से कृत्रिम प्रजनन द्वारा नये जीव उत्पन्न किये जा सकते हैं। कृत्रिम प्रजनन की दो प्रचलित तकनीकें हैं-टेस्ट ट्यूब बेबी तकनीक और क्लोनिंग तकनीक। टेस्ट ट्यूब बेबी तकनीक में यह प्रजाति के लगभग समान आयु के नर के शुक्राणु और मादा का अंडा लेकिन उन्हें परखनली में निषेचित किया जाता है। निषेचन से जाइगोट बनता है जो विखंडन के पश्चात् में बदल जाता है। इस Embryo को उस प्रजाति या किसी समान प्रजाति की मादा के गर्भ में डाल दिया जाता है। जहाँ उसका पूर्ण विकास होता है और नया जीव उत्पन्न होता है। चीन में इस तकनीक का प्रयोग करके दो ‘पांडा’ शिशु उत्पन्न किए गए हैं जिससे लुप्त होते पांडा जीव की संख्या में वृद्धि की जा सके। अमेरिका के टेक्सास नगर के एक चिड़ियाघर में इसी तकनीक का प्रयोग करके एक जेबरा शिशु का जन्म मादा घोड़े की कोख से करवाया गया है।
क्लोनिंग तकनीक में नद एवं मादा के शुक्राणु और अंडा लेने की अपेक्षा जीव के शरीर से कोई भी कोशिका ले कर उसका संवर्धन किया जाता है और उसे कृत्रिम परिस्थितियों में Embryo में बदला जाता है। इस Embryo को टेस्ट ट्यूब बेबी तकनीक की भांति किसी सेरोगेट मादा की कोख में स्थानांतरित कर दिया जाता है। कोरिया के सियोल विश्वविद्यालय के डॉ. वू सुक ह्वांग ने क्लोनिंग तकनीक का प्रयोग करके वहां के संकटग्रस्त राष्ट्रीय पशु ‘अमर चीता’ का सफलतापूर्वक विकास किया है।
भारत में कुछ जंतुओं के बाह्य स्थानिक संरक्षण हेतु सफल प्रजनन कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। भारत में मगरमच्छों के प्रजनन का सर्वाधिक सफल कार्यक्रम चेन्नई (मद्रास मगरमच्छ ट्रस्ट बैंक) में चलाया गया है जहां 10 मगरमच्छों द्वारा 8000 मगरमच्छों को जन्म दिया गया है। इसके अन्य उदाहरण हैं, गुवाहटी चिड़ियाघर जहां बनैले सूअरों का प्रजनन कराया गया है और दिल्ली का चिड़ियाघर जहां मणिपुरी दुर्लभ भूरे सींग वाले हिरनों को प्रजनन की अनुकूल परिस्थितियां उपलब्ध कराकर उनकी संख्या में वृद्धि की गई है।
मानव और वन्य-जीव के बीच हित-संघर्ष -
बढ़ती हुई जनसंख्या और उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए मानव ने धीरे-धीरे वनों, घास स्थलों और जीवों के प्राकृतिक वास स्थानों को नष्ट करके उन्हें अपने सहयोग के लिए तैयार किया है।
इससे वन्य-जीव और वनों में भी कमी आई और जैव-विविधता पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा। यदि मानव जाति को इस पृथ्वी पर अपना अस्तित्व बनाए रखना है और यह सुनिश्चित करना है कि इस अत्यधिक महत्वपूर्ण जैव-विविधता जिसके कारण प्रकृति (पर्यावरण) में संतुलन की स्थिति बनी हुई है, का लाभ आने वाली पीढ़ियों को भी मिलता रहे तो यह सुनिश्चित करना होगा।
भारत की जैव-विविधता
भारत विश्व के 17 चुनिंदा अत्यधिक जैव-विविधता वाले क्षेत्रों में से एक है। अब तक देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र में से 70 प्रतिशत क्षेत्र का जैव-विविधता के संदर्भ में अध्ययन किया जा चुका है। इसमें वनस्पतियों की 45,500 प्रजातियां पाई गई है। प्रजातियों की यह संख्या विश्व में पाई जाने वाले वनस्पतियों और जंतुओं की कुल संख्या का क्रमशः 7 प्रतिशत और 6.5 प्रतिशत है।
जैव-विविधता के संदर्भ में देखें तो भारत के कीटों की 59,353 मछलियों की 2,546 उभयचर की 240 सरीसृप की 460, पक्षियों की 1,232 और स्तनधारियों की 397 प्रजातियाँ पाई जाती हैं। इनमें से 18.4 प्रतिशत स्थानिक है और 10.8 प्रतिशत प्रजातियां खतरे में हैं।
देश में संवाहिका (वैस्कुलर) वाली वनस्पतियों की 18,664 प्रजातियां पाई गई है, इनमें से 26.8 प्रतिशत प्रजातियाँ स्थानिक है। पूरे विश्व के कुल भू-क्षेत्र में से मात्र 2.4 प्रतिशत भाग हमारे देश का है जब कि विश्व की कुल जैव-विविधता का 8 प्रतिशत यहां पाया जाता है।
हमारे देश में हिमालय का पूर्वी क्षेत्र और पश्चिमी घाट जैव-विविधता के मुख्य केंद्र है। इनके अतिरिक्त जंगल, घास का मैदान, दलदली, भूमि, सागर तटीय क्षेत्र और रेगिस्तान के क्षेत्रों में भी जैव-विविधता पाई जाती है। हिमालय के पूर्वी क्षेत्र (उत्तर-पूर्व भारत, नेपाल, भूटान, दक्षिणी और पश्चिमी चीन) में वनस्पतियों की लगभग 9000 प्रजातियां पाई जाती है। जिनमें से लगभग 39 प्रतिशत स्थानिक प्रजातियां है। पूर्वी हिमालय के भारतीय क्षेत्र में ही वनस्पतियों की 5,800 प्रजातियां पाई गई है, इनमें 36 प्रतिशत स्थानिक है।
इस क्षेत्र में वनस्पतियों की कम से कम 55 ऐसी प्रजातियां हैं, जो स्थानिक भी हैं और दुर्लभ भी, बहुचर्चित पिचर प्लांट भी इस श्रेणी में है। इस पूरे क्षेत्र में अनेक ऐसे पुष्पीय वनस्पतियां पाई जाती हैं जो पुष्पीय वनस्पतियों के विकास के क्रम में आरंभिक श्रेणी में आती है। इस क्षेत्र में अनेक अनावृतबीजी प्रजातियां और फर्न की अनेक अनावृतबीजी प्रजातियां भी पाई जाती हैं। हिमालय का पूर्वी क्षेत्र पॉम की आर्थिक विशेषता वाली पांच प्रजातियों-नारियल, ऐरेकानट, पामीरा पॉम, सूगर पॉप और जंगली खजूर- की उत्पत्ति और विविधता का केंद्र है। चाय का उत्पादन इस क्षेत्र में चार हजार वर्ष़ों से किया जा रहा है। चाय, धान की मूल प्रजातियां इस क्षेत्र में मिलती है। टैक्साल (टेक्सस वालिशियाना) नामक पौधे से कैंसर की दवा निकाली जाती है। इस पौधे से दवा निकाली जाती है। इस पौधे का इतना दोहन किया गया कि अब इसके विलुप्त होने की संभावना है।
पश्चिमी घाट को अतुलनीय जैव-विविधता का क्षेत्र माना जाता है। द्विदलीय वृक्षों की लगभग 1500 प्रजातियां स्थानिक है। सागरतटीय वृक्षों की 490 प्रजातियों में से 308 स्थानिक हैं। पश्चिमी घाट के क्षेत्र में आर्किड की 245 प्रजातियां पाई जाती हैं। जिनमें 112 प्रजातियां स्थानिक हैं। रीढ़धारी जंतुओं की 315 प्रजातियां स्थानिक हैं, इनमें स्तनधारियों की 12, पक्षियों की 13, सरीसृप की 89 अभयचर की 87 और मछलियों की 104 प्रजातियां सम्मिलित हैं। इस क्षेत्र में कुछ दुर्लभ प्रजातियां हैं, लायन टेल्ड मेकाक्व, नीलगिरि लंगूर, फ्लाइंग स्क्विरल और मालाबार ग्रे हॉर्नबिल।
देश में दलदली भूमि (वेटलैंड) का विस्तार हिमालय क्षेत्र से लेकर डक्कन के पठार तक है। राष्ट्रीय दलदली भूमि संरक्षण और प्रबंधन कार्यक्रम के अंतर्गत कुल 104 दलदली भूमि क्षेत्र की पहचान की गई है। इनमें से 25 क्षेत्रों का संरक्षण रामसर समझौते के अंतर्गत किया जाता है। फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया की वर्ष 2005 की रिपोर्ट के अनुसार देश के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल में से 23.6 प्रतिशत क्षेत्र में वन हैं। भारतीय कोरल रीफ क्षेत्र का विस्तार 2375 वर्ग किलोमीटर है। इस क्षेत्र में अनेक प्राकृतिक संसाधन हैं। मन्नार की खाड़ी और कच्छ की खाड़ी के क्षेत्र में कोरल, कोरल के अवशेष और कोरल की रेत का अत्यधिक दोहन किया जाता है जबकि दक्षिण भारत में इन्हें सजावट के समान की तरह उपयोग में लाया जाता है। रीफ के क्षेत्र में एक्वेरियम में सजाने योग्य मछलियों की बहुतायत थी, पर इनका अत्यधिक दोहन किया गया है।
समुद्री क्षेत्र में कछुओं की पांच प्रजातियां पाई जाती हैं। ग्रीन टर्टल, लैगरहेड, ओलिव रिडले, हाक्सबिल और लेदरबैक। अत्यधिक शिकार और सागर तटीय क्षेत्रों में बढ़ती मानवीय गतिविधियों के कारण कछुओं की संख्या तेजी से कम हो रही है। मैंग्रोव वन देश के 4,500 वर्ग किलोमीटर सागरतटीय क्षेत्र में फैले हैं जो विश्व में मैंग्रोव क्षेत्र का लगभग 5 प्रतिशत हैं। देश में मैंग्रोव क्षेत्र के कुल विस्तार में से लगभग आधा पश्चिम बंगाल के सुंदरवन में स्थित है।
सरकारी स्तर पर जैव-विविधता को संरक्षित करने के अनेक प्रयास किए गए हैं। वन्य प्राणि (संरक्षण) अधिनियम, 1972, जैव-विविधता अधिनियम, 2002, सागरतटीय प्रबंधन क्षेत्र ड्राफ्ट नोटिफिकेशन, 2008 आदि प्रावधान महत्वपूर्ण हैं। इनके साथ ही राष्ट्रीय वन नीति, 1988 और राष्ट्रीय जैव-विविधता कार्य योजना के तहत भी प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर जैव-विविधता को संरक्षित करने का प्रयास किया जा रहा है। देश के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल में से 4.83 प्रतिशत संरक्षित हैं जिनमें 99 राष्ट्रीय उद्यान और 523 वन्य प्राणी अभयारण्य है। इनमें से 100 का विस्तार भूमि के साथ ही मृदु जल संसाधनों तक है जबकि 31 सागरतटीय क्षेत्र हैं। देश के कुल 15 बायोस्फेयर रिजर्व हैं। यूनेस्को को ‘मैन एंड बायोस्फेयर’ कार्यक्रम के अंतर्गत वर्ष 1971 से बायोस्फेयर रिजर्व की स्थापना के लिए विश्वव्यापी कार्यक्रम आरंभ किया गया। वर्ष 2008 तक 105 देशों में 531 बायोस्फेयर रिजर्व स्थापित किए जा चुके थे जिनमें से 15 भारत में हैं।
बहुचर्चित बाघ परियाजना का आरंभ 1973 में कुल 9 क्षेत्रों से किया गया था, जिनकी संख्या वर्ष 2006 तक बढ़कर 29 तक पहुंच गई। देश के 1.17 प्रतिशत क्षेत्र यानी 38620 वर्ग किलोमीटर में इनका विस्तार है। हाथी परियोजना का आरंभ 1991-92 से किया गया और आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, असम, झारखंड, कर्नाटक, केरल, मेघालय, नागालैंड, उड़ीसा, तमिलनाडु, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में इससे संबंधित योजनाएं चलाई जा रही हैं।
स्पष्ट है कि हमारे देश में जैव-विविधता की प्रचुरता है और अनेक योजनाओं द्वारा इन्हें संरक्षित करने के प्रयास किए जा रहे हैं। पर संरक्षित करने के प्रयास में आम आदमी की भागीदारी महत्वपूर्ण है। लोगों को इस मुहिम से जोड़ने में इस क्षेत्र में शिक्षण और जनजागरूकता की आवश्यकता है अतः इस दिशा में भी प्रयास करने की आवश्यकता है।
प्रजातियों की समूहवार संख्या
एक अनुमान के अनुसार भारत में स्तनधारियों (उच्च वर्ग के जंतुओं का समूह जिसमें मानव भी शामिल है) की सर्वाधिक प्रजातियां पाई जाती हैं। हमारे देश में पक्षियों की लगभग 1200 प्रजातियां, सरीसृपों की 453 प्रजातियां, उभयचरों की 182 प्रजातियां, कीटों की 50,000से भी अधिक प्रजातियां तथा पुष्पी पौधों की 14,500 प्रजातियां पाई जाती हैं।
भारतीय वन्य जीव बोर्ड
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद एक ऐसे स्थायी केंद्रीय संगठन की आवश्यकता प्रतीत हुई जो वन्य जीवों के संरक्षण और उनके समुचित विकास के संबंध में विचार करे और सरकार को समय-समय पर परामर्श दे। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर भारत सरकार ने सन् 1952 में भारतीय वन्य जीव बोर्ड का गठन किया, जिसकी प्रथम बैठक दिसंबर 1952 में मैसूर में हुई। बोर्ड का कार्य सरकार को वन्य जीवों की सुरक्षा व संवर्धन के लिए उपाय बताना, इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए विधेयक बनवाना, राष्ट्रीय उद्यानों, वनारण्यों और प्राणी उद्यानों की स्थापना को प्रोत्साहन देना, जन साधारण में वन्य जीवों के प्रति रूचि उत्पन्न करना और जीवित पशु-पक्षियों, ट्राफी (शिकार चिन्ह) पंख, लोम और अन्य वन्य जीव उत्पादों के संबंध में नीति बनाने जैसे विषयों पर सलाह देना था।
इस बोर्ड का प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में जनवरी 1991 में पुनर्गठन किया गया। बोर्ड के निम्नलिखित कार्य हैं-
1. समुचित विधि और प्रशासनिक उपायों से वन्य जीवों के संरक्षण को बढ़ावा देना और चोरी-छिपे शिकार करने को प्रभावी रूप से रोकने के उपायों के विषय में केंद्र तथा राज्य सरकारों को परामर्श देना।
2. राष्ट्रीय उद्यानों, अभयारण्यों तथा प्राणी उद्यानों की स्थापना करने के विषय में सलाह देना।
3. जीवित पशुओं तथा वन्य जीवों की ट्राफियों, खालों लोम, चर्म (फर), पंखों तथा अन्य उत्पादों के निर्यात के बारे में सरकार को राय देना।
4. देश में वन्य जीव संरक्षण के क्षेत्र में प्रगति की समय-समय पर पुनरीक्षण करना और सुधार के लिए आवश्यक उपाय सुझाना।
5. वन्य जीवों तथा प्रकृति और मानव पर्यावरण के अनुकूल उनके परिरक्षण की आवश्यकता के प्रति लोगों में रूचि पैदा करना।
6. वन्य जीव सोसायटियों के गठन के लिए सहायता तथा प्रोत्साहन देना और इस तरह के सभी निकायों के लिए केंद्रीय समन्वय एजेंसी के रूप में कार्य करना।
7. जिन उद्देश्यों के लिए बोर्ड का गठन किया गया है उनके अनुकूल इस तरह के कार्य करना।
8. बोर्ड को भेजे जाने वाले किसी भी मामलें पर केंद्र सरकार को सलाह देना बशर्ते कि इसका विषय बोर्ड के निर्धारित कार्य़ों में आता हों।
9. ऐसे सभी कार्य, जिन्हें बोर्ड वन्य जीवों के परिरक्षण तथा संरक्षण के लिए जरूरी, उचित या सहायक समझे या इस तरह के अन्य प्रयोजनों, जिनके लिए इसका गठन किया गया है, को या तो अकेले अथवा अन्य के सहयोग से या भारत सरकार के निर्देश पर करना। इनमें वे कार्य भी शामिल हैं जो इसमें बताए गए हैं।
वन्य जीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972
संसद ने 9 सितंबर 1972 को वन्य जीव (संरक्षण) अधिनियम 1972 पारित किया। यह वन्य जीवों की सुरक्षा के लिए पहला व्यापक अधिनियम था। इसमें वन्य जीवों की सुरक्षा के सभी पहलुओं-शिकार करने, अधिनियम के अंतर्गत सक्षम अधिकारियों, वनारण्यों, राष्ट्रीय उद्यानों, बंद क्षेत्रों की स्थापना, वन्य जीवों और उनके उत्पादों के व्यापार पर नियमन, अपराधों को ढूंढना और रोकना - पर विचार किया गया है और उनके संबंध में समुचित व्यवस्था की गई हैं।
इस अधिनियम के अंत में पांच अनुसूचियां हैं, जो निम्न प्रकार हैं -
1.प्रथम अनुसूची में उन दुर्लभ और संकटापन्न वन्य प्रजातियों की सूची है। जिनको सुरक्षा प्रदान की गई है। इनका शिकार करना धारा 9 के अनुसार निषेध है।
2. दूसरी से चौथी अनुसूची में दिए गए वन्य पशु-पक्षियों के शिकार पर भी पूर्ण प्रतिबंध है।
अधिनियम की धारा 11 के अनुसार इन वन्य पशुओं में से किसी का तभी शिकार किया जा सकता है जब वह मानव जीवन के लिए खतरनाक हो गया हो या वह इतना असक्षम या रूग्ण हो जाए कि उसके स्वस्थ होने की संभावना ही शेष न रहे। अनुसूची 2 से 4 तक के पशुओं को मारने के लिए एक अन्य कारण यह भी हो सकता है कि वह संपत्ति, जिसमें खड़ी फसल भी शामिल है, के लिए खतरनाक हो जाए।
धारा 12 के अनुसार मुख्य वन्य जीव संरक्षक किसी व्यक्ति को लिखित रूप से कारणों व शर्त़ों के साथ, समुचित शुल्क देने पर, शिक्षा, वैज्ञानिक अनुसंधान और वैज्ञानिक प्रबंध के लिए, किसी पशु का शिकार करने की आज्ञा दे सकता है।
3. पांचवीं अनुसूची उन पशुओं की है जो कष्टदायक या पीड़क (वरमिन) हैं ओर जिनको बिना रोक-टोक मारा जा सकता है।
इस अधिनियम के लागू हो जाने से संपूर्ण देश में वन्य जीवों के लिए एक समान विधि व्यवस्था हो गई है जिसके तहत दुर्लभ और संकटापन्न प्रजातियों को पूर्ण सुरक्षा प्रदान की गई है और अन्य वन्य जीवों की सुरक्षा के लिए बने कानूनों में बहुत विभिन्नता थी और उनमें अपराधों के लिए दो दंड निर्धारित किए गए थे। वे अपराधों की गंभीरता के आनुपातिक नहीं थे, न ही अर्थ दंड अपराधों से होने वाले आर्थिक लाभों के अनुरूप थे। उनसे अपराधियों में कोई भय की भावना नहीं होती थी। इस अधिनियम का उद्देश्य इन सब कमियों को दूर करना था जिससे भारत में पाए जाने वाले वन्य पशु-पक्षी यथेष्ट संख्या में जीवित रह सकें और किसी भी पशु-पक्षी की प्रजाति, सुरक्षा के अभाव में, लुप्त न हो सके।
भारत 1976 में वन्य प्राणिजाति और वनस्पति जाति की संकटापन्न प्रजातियों के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार संबंधी अनुबंध (कान्वेंशन आन इंटरनेशनल ट्रेड इन एनडेंजर्ड स्पीसीज आफ वाइल्ड फौना एंड फ्लोरा-साईट्स) का हस्ताक्षरकर्त्ता बना। जो देश इन कन्वेंशन के हस्ताक्षरकर्त्ता हैं, वे उन प्राणि और वनस्पति प्रजातियों का, जिनकी सूची कन्वेंशन की अनुसूची में दी गई है, बिना आज्ञापत्र के आयात निर्यात नहीं कर सकते।
आईची लक्ष्य (Aichi Target)
अक्टूबर 2010 में जापान के नागीया में जैव-विविधता सम्मेलन में जैव-विविधता के संरक्षण से संबंधित अंत संबंधित लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए एक दस वर्षीय रणनीति बनाई गई जिसे “आई ची लक्ष्य” नाम दिया गया। वस्तुतः आई ची जापान का फरफेक्च्यूर (प्रांत के जैसा) है जिसकी राजधानी नागोया है जहाँ जैव-विविधता सम्मेलन आयोजित हुआ। “आई ची लक्ष्य” के 20 लक्ष्य हैं, जिसे पाँच रणनीतिक शीर्षकों में विभाजित किया गया है जिसमें जैव विविधता क्षय के कारणों, जैव-विविधता संरक्षा, जैव-विविधता से प्राप्त लाभों को बढ़ाना व क्षमता निर्माण की प्राप्ति शामिल हैं। लक्ष्यों में शामिल है।
वनों सहित प्राकृतिक अधिवासों की क्षय दर को आधा करना और जहाँ संभव हो वहाँ इसे शून्य स्तर तक लाना।
वर्ष 2020 तक जमीन और अंतदेशीय जल क्षेत्र का 17 प्रतिशत तािा सामुदायिक व तटीय क्षेत्रों का 10 प्रतिशत का संरक्षण। इनमें जैव-विविधता व पारिस्थितिकी तंत्र वाले विशेष क्षेत्र शामिल हैं। पहले यह क्रमशः 13 और एक प्रतिशत था।
संरक्षण व पुनरुद्धार के द्वारा कंर्वेशन के पक्षकार देशों की सरकारें नष्ट वन क्षेत्रों (जैव-विविधता) का न्यूनतम 15 प्रतिशत फिर से पुनरूद्धार करेंगी।
प्रवाल भित्तियों पर दबाव को कम करने के लिए विशेष प्रयास।
नागोया प्रोटोकॉल
29 अक्टूबर, 2010 को जापान के नागोया में जैव-विविधता सम्मेलन के दौरान नागोया प्रोटोकॉल को स्वीकार किया गया था। इस प्रोटोकॉल का संबंध आनुवंशिक संसाधन से हैं। प्रोटोकॉल आनुवंशिक संसाधनों के अनुप्रयोगों से उत्पन्न लाभों का निष्पक्ष व बराबर हिस्सेदारी (Access and Benefit Sharing-ABS) की बात करता है। वैसे नगोया प्रोटोकॉल को क्वालालपुर प्रोटोकॉल के साथ संबंध कर दिया गया है और इसे ‘जैव सुरक्षा पर कार्टागेना प्रोटोकॉल का पूरक नगोया-क्वालालंपुर प्रोटोकॉल’ कहा जाने लगा है। यह भारत सहित विकासशील देशों की जीत है। हालांकि इस प्रोटोकॉल की सबसे बड़ी कमी यह है कि आनुवंशिक संसाधनों के सबसे बड़े प्रयोगकर्त्ता संयुक्त राज्य अमेरिका इस प्रोटोकॉल का हिस्सा नहीं है। नया एबीएस नियम का मतलब यह है कि अब बहुराष्ट्रीय कंपनियों को अपने लाभों का स्थानीय समुदायों में भी बांटना होगा। उदाहरण के तौर पर यदि किसी विदेशी दवा कंपनी ने भारतीय पौधों के मिश्रण से यदि कोई उत्पाद बनाया है तो उसे उन समुदायों को भी इसका हिस्सा देना होगा जिन्होंने सर्वप्रथम इन पौधों का पोषण किया। अंतरराष्ट्रीय दवा कंपनियों को पैथोजेन (लाभप्रद टीका विकास में प्रयोग होने वाले रोगजनक विषाणु) जैसे मानवीय आनुवंशिक सामग्रियों के प्रयोग का भी भुगतान करना होगा। इस प्रोटोकॉल के एक बार अस्तित्व में आने के पश्चात सदस्य देशों में देशी जैव विविधता से संबंधित घरेलू कानून का प्रारूप तैयार करने का फ्रेमवर्क प्रदान करेगा। ऐसा कानून उन स्थानीय समुदायों के लिए बेहद जरूरी है जिन्होंने वर्ष़ों तक अपने प्राकृतिक संसाधनों को पोषित तो किया पर विभिन्न संगठनों द्वारा इसके वाणिज्यिक उपयोग का लाभ नहीं उठा पाये। भारत ऐसे समुदाय का हमेशा से समर्थन करता रहा है और इसके लाभ में उचित भागीदारी से संबंधित अंतरराष्ट्रीय कानून के पक्ष में रहा है। बायोप्रोसपेक्टिंग पर नगोया प्रोटोकॉल पर सितंबर 2011 तक विश्व के 60 देशों ने हस्ताक्षर कर दिये। इससे इसके नियत समय से पूर्व क्रियान्वयन की संभावना बढ़ गई है। हस्ताक्षरित देशों में से 50 देशों द्वारा इसकी अभिपुष्टि के 90 दिन पश्चात यह प्रोटोकॉल लागू हो जाएगा। बहुत सी कंपनियां एवं विश्वविद्यालय जैविक विविधता वाले देशों से पौधों, जीवाणु व जानवरों के नमूने अनुसंधान, अन्वेषण व नये उत्पादों के विकास के लिए प्राप्त करते हैं। यह अनुसंधान ‘बायोप्रोसपेक्टिंग’ (bioprospecting) कहलाता है। नगोया प्रोटोकॉल के तहत इस पर सख्य निगरानी रखी जाएगी। नागोया प्रोटोकॉल का संबंध आनुवंशिक स्रोतों तक पहुंच (Access to Genetic Resources) व लाभों व उचित व समान हिस्सेदारी (Fair and Equitable Sharing of Benefits) से है। नागोया प्रोटोकॉल की महता वैश्वीकरण के दौर में वाणिज्यिक उद्देश्य से प्राकृतिक संसाधनों के गहन दोहन के संदर्भ में है।
जैव विविधता सम्मेलन (कॉप-11) और भारत
हैदराबाद में आयोजित संयुक्त राष्ट्र का जैव विविधता सम्मेलन कॉप-11-20 अक्टूबर, 2012 को विकसित एवं विकासशील देशों के बीच गतिरोध के साथ समाप्त हो गया। गतिरोध इस बात पर था कि जैव-विविधता के संरक्षण के लिए विकसित और विकासशील देशों की ओर से कितनी आर्थिक मदद दी जा सकती है। उन्नतीस दिनों तक चली इस सम्मेलन में विकासशील देशों के ग्रुप 77 की मांग थी कि विकसित देश आर्थिक योगदान बढ़ाए। अब तक केवल भारत एवं जर्मनी ने ही स्पष्ट घोषणा की है कि वे कितना पैसा खर्च करने के लिए तैयार हैं। भारत ने कहा है कि वह देश के अंदर जैव विविधता संरक्षण पर और इस काम के लिए विकासशील देशों के हित के लिए पांच करोड़ डॉलर खर्च करेगा जबकि जर्मनी ने कहा है कि वर्ष 2013-14 के दौरान विश्व भर में जंगलों के संरक्षण के लिए 50 करोड़ डॉलर देगा। भारत ने सुझाव रखा है कि वर्ष 2015 तक के लिए विकसित देश जैव विविधता के संरक्षण की सहायता के लिए अपनी सहायता दोगुनी कर दे। भारत इस कांफ्रेंस ऑन पार्टीज का अध्यक्ष बन गया है और दो वर्ष़ों तक यह पद संभालेगा। भारत का कहना है कि इसके लिए वर्ष 2006 से 2010 के बीच दी गई सहायता के अवसर या मध्यमान को आधार बनाया जाए लेकिन इसका अर्थ यह होगा कि विकसित देशों को फिर 2020 तक हर दो वर्ष के बाद अपनी सहायता बढ़ानी होगी और वे अपने देश के लिए तैयार नहीं है। इसके बदलें में भारत ने अपने सुझाव में कहा है कि खुद विकासशील देश भी कुछ कड़े कदम उठाते हुए इस काम के लिए अपना खुद का खर्च भी बढ़ाएगा।
विकसित देशों की एक और मांग को पूरा करते हुए भारत ने यह भी सुझाव रखा है कि विकासशील देश 2014 तक यह लक्ष्य निर्धारित करें कि वे जैव विविधता को नुकसान पहुंचाने वाले सब्सिडी को कब तक खत्म करेंगे।
प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने हैदराबाद में हो रहे संयुक्त राष्ट्र के जैव विविधता सम्मेलन के अधिवेशन में यह घोषणा की कि जैव विविधता की व्यवस्था बेहतर बनाने के लिए आगामी दो वर्ष़ों में भारत पांच करोड़ डॉलर का निवेश करेगा।
प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि जैव विविधता संरक्षण पर होने वाले खर्च को एक बोझ नहीं समझना चाहिए बल्कि वह एक पूंजी निवेश है कि जो भविष्य में लाभ पहुंचाएगा। डॉ. मनमोहन सिंह ने कहा कि भारत में जैव विविधता का संरक्षण लोगों की आजीविका या रोजगार से जुड़ा हुआ है और यह भारत की संस्कृति का एक भाग है। उन्होंने कहा कि देश में कृषि के पारंपरिक तरीके पौधों और पशुओं की जैव विविधता पर निर्भर है।
उन्होंने 193 देशों से आए 5000 से ज्यादा प्रतिनिधियों को यह भी बताया कि जैव विविधता के संरक्षण के लिए उनकी सरकार क्या प्रयास कर रही है। इनमें जंगल में रहने वाले लोगों को उनके साधनों पर अधिकार देने जैसे मुद्दे भी शामिल है।
कॉप-11 के कुछ मुख्य बिन्दु
कॉप-11, हैदराबाद 2012 में उपस्थित देशों ने इस बात पर सहमति जताई कि जैव विविधता संरक्षण के लिए किए जा रहे उपायों के लिए फंडिंग बढ़ाई जाए।
Biodiversity Strategic Plan 2011-2012 तथा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जैव विविधता से संबंधित लक्ष्यों को पूरा करने की दिशा में विकासशील देशों द्वारा किए जा रहे प्रयासों में सहयोग देने हेतु विकसित देशों ने अपनी सहायता राशि दोगुनी करने के लिए भी अपनी सहमति प्रकट की।
हैदराबाद सम्मेलन में कुछ उन क्षेत्रों जैसे सारागासो सागर, रोगो द्वीप तथा ब्राजील के तटवर्ती इलाकों के पास के कोरल रीफ आदि जो देश विशेष के क्षेत्र में न आने वाले समुद्री क्षेत्र है, पर खास ध्यान देने पर भी सहमति हुई ताकि समुद्री संसाधनों को क्षरण से बचाया जा सके।
इस सम्मेलन के दौरान Fishesies Management Body बनाने का भी आह्वान किया गया ताकि मत्स्यन किया जा सके।
कन्वेंशन ऑन बायोडाइवर्सिटी (सीबीडी)
सीबीडी-जैव विविधता से संबंधित एक अन्तरराष्ट्रीय संधि है जिसमें पहली बार जैव विविधता के सभी पहलुओं पर ध्यान दिया गया हैं इस संधि को वर्ष 1992 में ब्राजील के रियो डी जेनेरियो पृथ्वी सम्मेलन में हस्ताक्षर के लिए रखा गया था। दिसंबर 1993 में यह संधि लागू हुई। चूँकि इस संधि के विश्व के 193 देश पक्षकार हैं इसलिए इसका स्वरूप वैश्विक है। 184 सदस्यों वाली यह संधि आर्थिक विकास के साथ पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखने के लिए भी प्रतिबद्ध है। भारत भी सीबीडी का एक सदस्य है तथा इसने 5 मई, 1992 को इस संधि पर हस्ताक्षर किया। भारत ने 19 मई, 2004 को इसे अनुमोदित किया। इस संधि की शर्त़ों के पालन हेतु भारत ने जैव विविधता अधिनियम, 2002 के अन्तर्गत 1 अक्टूबर, 2003 को चेन्नई में एक राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण स्थापित किया। अधिनियम का अनुपालन करते हुए 18 राज्यों में राज्य जैव विविधता बोर्ड़ों की स्थापना की जा चुकी है और अन्य राज्यों में यह प्रक्रिया जारी है।
इस संधि के तीन मुख्य उद्देश्य निर्धारित किये गये हैं-
जैव विविधता का संरक्षण
जैव विविधता के घटकों का सतत् उपयोग तथा
आनुवंशिक संसाधनों से प्राप्त होने वाली सुविधाओं का उचित एवं समान वितरण।
उपर्युक्त कंवेंशन में जैव विविधता व पारिस्थितिकी को क्लाइमेट चेंज सहित सभी प्रकार के खतरों को संबोधित किया गया है। इस संधि की सहायक संधि ‘जैव विविधता पर कार्टागना प्रोटोकॉल’ आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी के सजीव उत्पादों से जैव विविधता को पहुंचने वाले खतरों से सुरक्षा का प्रावधान करता है। फिलहाल विश्व के 159 देशों एवं यूरोपीय संघ के कार्टागना प्रोटोकॉल की अभिपुष्टि किया है। यह प्रोटोकॉल 11 सितंबर, 2003 को लागू हुआ।
भारत उन कुछ देशों में से एक है जिसने कनवेंशन ऑन बायोडाईवर्सिटी के 1993 में अस्तित्व में आने के पश्चात् इसे 1994 में ही इसे अनुमोदित किया। रियो सम्मेलन 1992 के बाद से ही भारत ने रियो सम्मेलन के दौरान तैयार एजेंडा-21 को लागू करने के लिए प्रयास शुरू कर दिए थे। 1992 में ही भारत ने राष्ट्रीय स्तर पर विचार-विमर्श की प्रक्रिया शुरू की ताकि जैव विविधता कंवेंशन के तीनों उद्देश्यों-संरक्षण, संपोष्य उपयोग था प्राकृतिक संसाधनों तक पहुंच एवं उनके इस्तेमाल में समानता को एक लीगल फ्रेमवर्क के तहत लागू कियाजा सके। इसी प्रयास की शृंखला के एक अंग के रूप में 2002 में जैव विविधता अधिनियम, 2002 को संसद में पास किया गया तथा कानून के रूप में 2002 में इसे अधिसूचित किया गया। क्षेत्रीय एवं वैश्विक प्रयासों के स्तर पर अपनी भूमिका निभाते हुए भारत पहला ऐसा देश था जिसने जैव-विविधता संरक्षण को एक लीग फ्रेमवर्क का रूप दिया जिसके अन्तर्गत नेशनल बायोडाइवर्सिटी अथॉरिटी, स्टेट बायोडाइवर्सिटी बोर्ड तथा बायोडाइवर्सिटी मैनेजमेंट नाम के त्रिस्तरीय तंत्र अस्तित्व में लाया गया। पुनः NBA के अंतर्गत 32,000 बायोडाइवर्सिटी मैनेजमेंट कमिटी बनाई गई तथा 26 SBB का गठन किया गया जो जैव विविधता अधिनियम को कार्यक्रम देने के लिए उत्तरदायी है।