पृष्ठभूमि
- भारत की संविधान सभा में नेहरू जी ने कहा था-“बदलती आवश्यकताओं के अनुसार भविष्य में संविधान में संशोधन की जरूरत हो सकती है, क्योंकि कोई भी संविधान आने वाली पीढ़ियों को बाँध नहीं सकता।“
- भारत में संविधान सभा में पण्डित जवाहर लाल नेहरू का यह कथन भारत में समय के साथ बदलती परिस्थितियों के साथ बदलने वाले कानूनों के निर्माण व समापन के सन्दर्भो को स्पष्टत: दर्शाता है।
- भारत की आजादी के समय उस समय की परिस्थितियों तथा संविधान सभा के सदस्यों के समकक्ष लाए गए विचारों के आधार पर संविधान निर्माण के साथ-साथ संविधान में संशोधन की सम्भावना को भी बरकरार रखा गया था।
- भारत का संविधान समय के साथ संशोधनों को स्वयं में समाहित करता गया तथा आज सम्पूर्ण वृहत दस्तावेज के रूप में है।
- संविधान में संशोधन के आधार पर भी संविधान को लचिला तथा मुलायम भी कहा जाता है। क्योंकि संविधान में कुछ प्रावधान साधारण बहुमत से संशोधित किए जा सकते है जबकि कुछ संशोधन विशेष बहुमत जिसमें आधे राज्यों की सहमती भी आवश्यक होती है, के द्वारा किये जाते हैं।
संविधान में उल्लेख
- भारत के संविधान के भाग-XX के अनुच्छेद-368 में संसद की संविधान में संशोधन की शक्ति का उल्लेख किया गया है।
- उच्चतम न्यायालय द्वारा केशवानंद भारती मामले (1973) में कहा गया है कि संसद उन संविधान की उन व्यवस्थाओं को संशोधित नहीं कर सकती, जो संविधान के मूल ढाँचे से संबंधित हो।
संविधान संशोधन की प्रक्रिया
- संविधान के अनुच्छेद-368 में संविधान के संशोधन की प्रक्रिया का उल्लेख किया गया है-
- संविधान के संशोधन का आरंभ संसद के किसी भी सदन में किया जा सकेगा जो किसी मंत्री या सदस्य द्वारा आरंभ किया जा सकता है।
- संविधान के संशोधन का आरंभ करने के लिए राष्ट्रपति की पूर्व स्वीकृति आवश्यक नहीं होती है।
संविधान संशोधन के प्रकार
- संविधान के अनुच्छेद-368 संविधान में दो प्रकार के संशोधनों का उल्लेख करता है।
- संसद के विशेष बहुमत द्वारा।
- संसद के विशेष बहुमत द्वारा व आधे राज्यों द्वारा साधारण बहुमत के माध्यम से संस्तुति द्वारा।
- Note- संसद के साधारण बहुमत से भी संविधान के कुछ उपबंध संशोधित हो सकते हैं, जो साधारण विधायी प्रक्रिया का रूप है। साधारण बहुमत से किया गया संशोधन अनुच्छेद-368 के तहत नहीं आता है।
साधारण बहुम त द्वारा
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संविधान में कुछ अनुच्छेद ऐसे हैं जिन्हें संसद के दोनों सदनों में साधारण बहुमत से संशोधित किया जा सकता है।
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साधारण बहुमत से संशोधन करने के लिए कोई विधेयक संसद के किसी भी सदन में पेश किया जा सकता है और एक सत्र द्वारा पारित किए जाने पर उसको दूसरे सदन में भेजा जाता है ।दूसरे सदन द्वारा विधेयक को पारित करने पर उसे राष्ट्रपति की अनुमति के लिए भेजा जाता है और राष्ट्रपति द्वारा अपनी अनुमति प्राप्त कर लेने पर विधेयक अधिनियम के रूप में बन जाता है।
- नए राज्यों का प्रवेश या गठन
- नए राज्यों का निर्माण और उसके क्षेत्र, सीमाओं या संबंधित राज्यों के नामों का परिवर्तन
- राज्य विधानपरिषद का निर्माण या उसकी समाप्ति।
- दूसरी अनुसूची- राष्ट्रपति, राज्यपाल, लोकसभा अध्यक्ष, न्यायाधीश आदि के लिए परिलब्धियाँ, विशेषाधिकार आदि।
- संसद में गणपूर्ति।
- संसद सदस्यों के वेतन एवं भते।
- संसद में प्रक्रिया नियम
- संसद व इसके सदस्यों और इसकी समितियों को विशेषाधिकार
- संसद में अंग्रेजी भाषा का प्रयोग।
- उच्चतम न्यायालयों में अवर न्यायाधीशों की संख्या।
- उच्चतम न्यायालय के न्यायक्षेत्र को ज्यादा महत्व प्रदान करना।
- राजभाषा का प्रयोग
- नागरिकता की प्राप्ति एवं समाप्ति
- संसद एवं राज्य विधानमंडल के लिए निर्वाचन
- निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्निधारण।
- केंद्रशासित प्रदेश
- पाँचवी अनुसूची
- छठी अनुसूची
विशेष बहुमत द्वारा
- संसद के विशेष बहुमत द्वारा किए जाने वाले संवैधानिक परिवर्तन को संविधान संशोधन कहा जाता है इस प्रकार संविधान संशोधन करने के लिए किसी विधेयक को संसद द्वारा विशेष बहुमत से पारित किया जाना चाहिए। विशेष बहुमत से तात्पर्य सदन की कुल सदस्य संख्या के 50% तथा मतदान करने वाले सदस्यों के दो तिहाई से कम ना हो
- इस तरह से संशोधन व्यवस्था में शामिल हैं-
- मूल अधिकार
- राज्य की नीति के निदेशक तत्व
विशेष बहुम त एवं आधे राज्यों की स्वीकृति द्वारा
- इस श्रेणी में संविधान के उपबंध आते हैं जो संघात्मक राज्य से संबंधित हैं इन उपबंधों में संशोधन करने के लिए संसद के प्रत्येक सदन के दो तिहाई बहुमत तथा कम से कम 50% राज्यों के विधान मंडलों का समर्थन आवश्यक है ।
- संघीय अवधारणा से संबंधित संविधान के उपबंधो को संसद के विशेष बहुमत द्वारा संशोधित किया जा सकता है और इसके लिए यह भी आवश्यक है कि आधे राज्य विधानमंडलो में साधारण बहुमत के माध्यम से उनको मंजूरी मिली हो। विधेयक को स्वीकृति देने के लिए राज्यों के लिए कोई समय सीमा निर्धारित नहीं है।
- राष्ट्रपति का निर्वाचन एवं इसकी प्रक्रिया।
- केंद्र एवं राज्य कार्यकारिणी की शक्तियों का विस्तार।
- उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालय।
- केंद्र एवं राज्य के बीच विधायी शक्तियों का विस्तार।
- सातवीं अनुसूची से संबद्व कोई विषय।
- संसद में राज्यों का प्रतिनिधित्व
- संविधान का संशोधन करने की संसद की शक्ति और इसके लिए प्रक्रिया
संविधान सं शोधन की सीमा
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संविधान का आर्टिकल 368 भले ही संविधान में संशोधन की शक्ति देता है लेकिन यह शक्ति अनियंत्रित और असीमित नहीं है। संविधान संशोधन की एक सीमा है और जहाँ कहीं कोई संशोधन संविधान के आधारभूत ढाँचे को नष्ट करता हो, वहां संशोधन नहीं किया जा सकता।
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केशवानंद भारती बनाम स्टेट ऑफ केरल (AIR 1973, SC 1461) के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के आधारभूत ढांचे को संविधान की लक्ष्मण रेखा माना और कहा कि संसद द्वारा संविधान में ऐसा कोई संशोधन नहीं किया जा सकता जिससे संविधान का आधारभूत ढाँचा नष्ट होता हो।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद-368
- इस संविधान में किसी बात के होते हुए भी, संसद अपनी संविधायी शक्ति का प्रयोग करते हुए इस संविधान के किसी उपबंध का परिवर्धन, परिवर्तन या निरसन के रूप में संशोधन इस अनुच्छेद में अधिकथित प्रक्रिया के अनुसार कर सकेगी।
- इस संविधान के संशोधन का आरंभ संसद के किसी सदन में इस प्रयोजन के लिए विधेयक पुनरःस्थापित करके ही किया जा सकेगा और जब वह विधेयक प्रत्येक सदन में उस सदन की कुल सदस्य संख्या के बहुमत द्वारा तथा उस सदन के उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत द्वारा पारित कर दिया जाता है तब वह राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा, जो विधेयक को अपनी अनुमति देगा और तब संविधान उस विधेयक के निबंधनों के अनुसार संशोधित हो जाएगा :
- अनुच्छेद 54, अनुच्छेद 55, अनुच्छेद 73, अनुच्छेद 162 या अनुच्छेद 241 में, या
- भाग 5 के अध्याय 4, भाग 6 के अध्याय 5 या भाग 11 के अध्याय 1 में, या
- सातवीं अनुसूची की किसी सूची में, या
- संसद में राज्यों के प्रतिनिधित्व में, या
- इस अनुच्छेद के उपबंधों में, कोई परिवर्तन करने के लिए है तो ऐसे संशोधन के लिए उपबंध करने वाला विधेयक राष्ट्रपति के समक्ष अनुमति के लिए प्रस्तुत किए जाने से पहले उस संशोधन के लिए कम से कम आधे राज्यों के विधान-मंडलों द्वारा पारित इस आशय के संकल्पों द्वारा उन विधान-मंडलों का अनुसमर्थन भी अपेक्षित होगा।
- अनुच्छेद 13 की कोई बात इस अनुच्छेद के अधीन किए गए किसी संशोधन को लागू नहीं होगी।
- इस संविधान का (जिसके अंतर्गत भाग 3 के उपबंध हैं) इस अनुच्छेद के अधीन संविधान (बयालीसवाँ संशोधन) अधिनियम, 1976 की धारा 55 के प्रारंभ से पहले या उसके पश्चात् किया गया या तात्पर्यित कोई संशोधन किसी न्यायालय में किसी भी आधार पर प्रश्नगत नहीं किया जाएगा।
- शंकाओं को दूर करने के लिए यह घोषित किया जाता है कि इस अनुच्छेद के अधीन इस संविधान के उपबंधों का परिवर्धन, परिवर्तन या निरसन के रूप में संशोधन करने के लिए संसद की संविधायी शक्ति पर किसी प्रकार का निर्बन्धन नहीं होगा।
संविधान संशो धन के सन्दर्भ में-
- संविधान संशोधन विधेयक को संयुक्त बैठक के द्वारा पारित कराने का प्रावधान नहीं है।
- संविधान संशोधन विधेयक को राष्ट्रपति सहमति देंगे। वे न तो विधेयक को अपने पास रख सकते हैं और न ही संसद के पास पुनर्विचार के लिए भेज सकते हैं।