प्रथम संविधान संशोधन अधिनियम 1951
- अनुच्छेद 15 में खण्ड 4 जोड़कर सामाजिक और शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों तथा अनुसूचित जातियों के लिए विशेष सुविधाएँ दिये जाने का प्रावधान किया।
- संविधान में नौवीं अनुसूची जोड़ी गई।
- अनुच्छेद 31 में अमुक 31(क) और 31 (ख) जोड़ा गया।
चतुर्थ संविधान संशोधन अधिनियम 1955
- निजी संपत्ति के अनिवार्य अधिग्रहण के स्थान पर दी जाने वाली क्षतिपूर्ति की प्रमात्रा को न्यायालय की जांच से बाहर किया गया।
- किसी व्यापार को राष्ट्रीयकृत बनाने के लिए राज्यों को अधिकार।
पाँचवाँ संविधान संशोधन अधिनियम 1955
- राष्ट्रपति को यह शक्ति प्रदान की गई कि वह राज्यों के क्षेत्र, सीमा और नामों को प्रभावित करने वाले प्रस्तावित केन्द्रीय विधान पर अपने मत देने के लिए राज्यमण्डलों हेतु समय-सीमा का निर्धारिण करें।
सातवां संविधान संशोधन अधिनियम 1956
- राज्यों का वर्गीकरण समाप्त किया गया अर्थात् राज्यों के चार वर्गों – भाग क, भाग ख, भाग ग, भाग घ को समाप्त किया गया। इनके स्थान पर देश को कुल 14 राज्यों व 6 केन्द्र शासित प्रदेशों में विभाजित कर दिया गया।
- अनुच्छेद 230, 231 में संशोधन किया गया और उच्च न्यायालयों के क्षेत्राधिकार को केन्द्र शासित प्रदेशों तक बढ़ा दिया गया तथा दो या उससे अधिक राज्यों के लिए एक साझा उच्च न्यायालय की स्थापना का उपबंध किया गया।
आठवां संविधान संशोधन अधिनियम 1960
- अनुसूचित जाति एवं जनजाति को आरक्षण व्यवस्था में विस्तार और आंग्ल भारतीय प्रतिनिधि की लोकसभा एवं विधानसभाओं में दस वर्ष के लिए बढ़ोतरी। (1970 तक)
9वां संविधान संशोधन अधिनियम 1960
- भारत –पाक समझौते (1958) के अनुसार पाकिस्तान को बेरूबारी संघ (पश्चिम बंगाल स्थित) के भारतीय राज्यक्षेत्र का समर्पण।
15वां संविधान संशोधन अधिनियम 1963
- इस अधिनियम द्वारा उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति आयु 60 वर्ष से बढ़ाकर 62 वर्ष कर दी गयी। उच्चतम एवं उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की उम्र के निर्धारण हेतु प्रक्रिया की व्यवस्था की गई।
18वां संविधान संशोधन अधिनियम 1966
- इस शक्ति को स्पष्ट कर दिया गया कि संसद को राज्य निर्माण का अधिकार है। इसमें यह भी स्पष्ट किया गया कि दो राज्यों को जोड़ने व पृथक करने का अधिकार भी उसमें निहित है।
21वां संविधान संशोधन अधिनियम 1967
- सिंधी भाषा आठवीं अनुसूची में 15वीं भाषा के रूप में शामिल।
24वां संविधान संशोधन अधिनियम 1971
- यह संशोधन अधिनियम गोलकनाथ मामले में दिये गये निर्णय से उत्पन्न कठिनाइयों को दूर करने के लिए पारित किया गया।
- इस संशोधन के द्वारा अनुच्छेद 368 में संशोधन करके संसद को मूल अधिकारों सहित पूरे संविधान में संशोधन करने की शक्ति दी गई।
- राष्ट्रपति संसद द्वारा पारित संविधान संशोधन अधिनियम पर अपनी स्वीकृति देने से मना नहीं करेगा।
25वां संविधान संशोधन अधिनियम 1971
- इसके द्वारा सम्पत्ति के मूल अधिकार में संशोधन किया गया।
- अनुच्छेद 31 के खण्ड (2) में संशोधन करके ‘प्रतिकर’ शब्द के स्थान पर ‘राशि’ शब्द रखा गया।
- नया अनुच्छेद 31 (ग) जोड़ा गया जिसमें यह उपबंधित किया गया कि अनुच्छेद 39 के खण्ड (ख) और (ग) में वर्णित निदेशक तत्वों को प्रभावी करने वाली विधियों की विधिमान्यता को इस आधार पर चुनौती नहीं दी जायेगी कि वे अनुच्छेद 14, 19 व 31 से असंगत है। अर्थात् निदेशक तत्वों को मूल अधिकारों पर प्रधानता दी गई।
31वां सं विधान संशोधन अधिनियम 1972
- इस संशोधन अधिनियम द्वारा लोकसभा की सीटों की संख्या 525 से बढ़ाकर 545 किया गया।
35वां संविधान संशोधन अधिनियम 1974
- सिक्किम की संरक्षण व्यवस्था को बर्खास्त करते हुए उसे भारतीय संघ को सहयोगी राज्य बनाया गया। भारतीय संघ मे सिक्किम को जोड़े जाने की सेवा शर्तों के लिए 10वीं अनुसूची को जोड़ा गया।
36वां संविधान संशोधन अधिनियम 1975
- इस संशोधन के द्वारा सिक्किम देश के 22वें राज्य के रूप मेंभारतीय संघ में सम्मिलित किया तथा दसवीं अनुसूची का लोप किया गया।
38वां संविधान संशोधन अधिनियम 1975
- राष्ट्रपति द्वारा आपातकाल की घोषणा गैर-वाद-योग्य घोषित।
- राष्ट्रपति, राज्यपाल एवं केंद्रशासित प्रदेशों के प्रशासकों द्वारा जारी अध्यादेश गैर-वाद-योग्य घोषित।
- राष्ट्रपति के विभिन्न आधारों पर राष्ट्रीय आपातकाल की विभिन्न घोषणा करने की शक्ति प्रदान की गई।
41वां संविधान संशोधन अधि नियम 1976
- इस संशोधन के द्वारा राज्य लोक सेवा आयोग एवं संयुक्त लोक सेवा के अध्यक्ष व सदस्यों की सेवानिवृत्ति की आयु को 60 वर्ष से बढ़ाकर 62 वर्ष कर दिया गया।
42वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1976
- प्रस्तावना- समाजवादी, पंथनिरपेक्ष तथा अखंडता तीन नए शब्दों को जोड़ा गया।
- भाग-iv (क) में नागरिकों के लिये मौलिक कर्तव्यों को जोड़ा गया।
- कैबिनेट की सलाह मानने के लिये राष्ट्रपति को बाध्य कर दिया गया।
- अधिकरणों की व्यवस्था की गई। (भाग (xiiv) (क) जोड़ा गया)
- लोकसभा तथा राज्य विधानसभाओं के कार्यकाल में 5 से 6 वर्ष की बढ़ोतरी की गई।
- यह व्यवस्था की गई कि DPSP के क्रियान्वयन हेतु बनाए गए कानूनों को इस आधार पर अवैध करार नहीं दिया जा सकता है कि ये कानून मौलिक अधिकारों का हनन करते हैं।
- तीन नये नीति-निदेशक तत्व जोड़े गए ये हैं- समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता, उद्योगों के प्रबंधन में कर्मकारों की सहभागिता, पर्यावरण संरक्षण तथा संवर्द्धन और वन एवं वन्य जीवों का संरक्षण करना।
- भारत के किसी भाग में राष्ट्रीय आपात की उदघोषणा की व्यवस्था की गई।
- राज्य में राष्ट्रपति शासन की अवधि को एक-बार में 6 माह से बढ़ाकर एक वर्ष तक कर दिया गया।
- पाँच विषयों को राज्य सूची से समवर्ती सूची में भेजा गया। ये हैं- शिक्षा, वन, वन्यजीवों एवं पक्षियों का संरक्षण, नापतौल एवं न्याय प्रशासन, उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों को छोड़कर अन्य सभी न्यायालयों का गठन एवं संगठन।
- अखिल भारतीय विधि सेवा के सृजन की व्यवस्था की गई।
44वाँ संविधान सं शोधन अधिनियम, 1978
- लोक सभा तथा राज्य विधान सभाओं के वास्तविक कार्यकाल को पुनःस्थापित कर दिया गया गया व संसद एवं राज्य विधानमंडलों में कोरम की व्यवस्था को पूर्ववत रखा गया।
- संसदीय विशेषाधिकारों के संबंध में ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन्स के संदर्भ को हटा दिया गया।
- कैबिनेट की सलाह को पुनर्विचार के लिये एक बार लौटाने/ वापस भेजने की राष्ट्रपति को शक्तियाँ दी गई। परंतु पुनर्विचारित सलाह को राष्ट्रपति को मानने के लिये बाध्य कर दिया गया।
- अध्यादेशों को जारी करने के संदर्भ में राष्ट्रपति, राज्यपालों एवं प्रशासकों की अंतिम संतुष्टि वाले उपबंध को समाप्त कर दिया गया।
- सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों की कुछ शक्तियों को पुनः बहाल कर दिया गया।
- राष्ट्रीय आपात के संदर्भ में ‘आंतरिक अशांति’ शब्द के स्थान पर ‘सशस्त्र विद्रोह’ शब्द को रखा गया।
- राष्ट्रपति द्वारा कैबिनेट की लिखित सिफारिश के आधार पर ही राष्ट्रीय आपात की घोषणा करने की व्यवस्था की गई।
- राष्ट्रपति शासन तथा राष्ट्रीय आपातकाल के संदर्भ में कुछ प्रक्रियात्मक सुरक्षा के उपाय किये गये।
- मौलिक अधिकारों की सूची में संपत्ति के अधिकार को समाप्त कर दिया गया तथा उसे केवल एक विधिक अधिकार के रूप में रखा गया।
- अनुच्छेद 20 तथा 21 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों को राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान निलंबित नहीं किये जा सकने की व्यवस्था की गई।
- उस उपबंध को हटा दिया गया जिसने न्यायपालिका की राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री तथा अध्यक्ष के निर्वाचन संबंधी विवादों पर निर्णय देने की शक्ति छीन ली थी।
52वां संविधान सं शोधन अधिनियम 1985
- 52वें संविधान संशोधन अधिनियम को ‘दल-बदल विरोधी अधिनिमय’भी कहा जाता है क्योंकि इस अधिनियम द्वारा दल बदल पर रोक लगाने की व्यवस्था की गई।
- इसके द्वारा अनुच्छेद 101, 102, 190 और 191 में संशोधन किया गया तथा एक नई अनुसूची ‘दसवीं अनुसूची’ जोड़ी गई।
- दसवीं अनुसूची में संसद व राज्य विधानमण्डल सदस्यों की दल बदल के आधार पर सदस्यता के संदर्भ में निरर्हक ठहराने की व्यवस्था का विस्तार से उल्लेख किया गया है।
59वां संविधान सं शोधन अधिनियम 1988
- पंजाब में राष्ट्रपति शासन का तीन वर्ष के लिए विस्तार।
- आंतरिक अशांति के आधार पर पंजाब में राष्ट्रीय आपात की घोषणा।
61वां संविधान संशो धन अधिनियम 1989
- इस संशोधन अधिनियम द्वारा मताधिकार यानी मतदान करने की न्यूनतम आयु 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष कर दी गई।
65वां संविधान संशोधन अधिनियम 1990
- अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए राष्ट्रीय आयोग में विशेष अधिकारी के स्थान पर बहुसदस्यीय व्यवस्था का उपबंध किया गया।
69वां संविधान संशोधन अधिनियम 1991
- इस अधिनियम द्वारा संविधान में दो नये अनुच्छेद 239कक और 239कख जोड़े गए जिनके द्वारा संघ राज्य क्षेत्र दिल्ली को विशेष दर्जा देते हुए ‘राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली’ बनाया गया। दिल्ली के लिए विधानमण्डल (70 सदस्यीय विधानसभा) एवं मंत्रिमण्डल का उपबंध किया गया।
71वां संविधान संशोधन अधिनियम 1992
- कोंकणी, मणिपुरी और नेपाली भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया। इसके साथ ही अनुसूचित भाषाओं की संख्या बढ़कर 18 हो गई।
73वां संविधान संशोधन अधिनियम 1992
- इस संशोधन अधिनियम द्वारा ‘पंचायती राज संस्थाओं’ को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया गया। इस उद्देश्य से संविधान में निम्न संशोधन किये गये।
- संविधान में एक नया भाग, ‘भाग-9’ जिसमें अनुच्छेद 16 जोड़ा गया जिसे ‘पंचायत’नाम दिया गया। साथ ही एक नई अनुसूची 11वीं अनुसूची जोड़ी गई जिसमें पंचायतों को 29 कार्यकारी विषय प्रदान किये गए।
74वां संविधान संशोधन अधिनियम 1992
- इस अधिनियम द्वारा शहरी स्थानीय निकायों को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया गया।
- संविधान में एक नया भाग, ‘भाग-9(क)’ नगरपालिकाएं नाम से जोड़ा गया और 18 नये अनुच्छेद तथा एक नई अनुसूची बारहवीं अनुसूची जोड़ी गई।
- 12वीं अनुसूची में 18 विषयों का उल्लेख किया गया है जिन पर नगरपालिकाओं को विधि निर्माण की शक्ति प्राप्त है।
76वां संविधान संशोधन अधिनियम 1994
- इस संशोधन अधिनियम द्वारा ‘तमिलनाडु आरक्षण अधिनियम 1994’को जो, पिछड़े वर्गों व अनुसूचित जातियों और जनजातियों को सरकारी नौकरी में 69 प्रतिशत आरक्षण देने वाला अधिनियम नौवीं अनुसूची में शामिल कर न्यायिक पुनर्विलोकन से संरक्षण प्रदान किया गया।
77वां संविधान संशोधन अधिनियम 1995
- इस संशोधन अधिनियम द्वारा अनुच्छेद 16 में नया खण्ड 4(क) जोड़कर यह उपबंध किया गया कि राज्य के अधीन सेवाओं में अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजातियों के लोगों को पदोन्नति के लिए आरक्षण दिया जा सकेगा।
81वां संविधान संशोधन अधिनियम 2000
- इस अधिनियम द्वारा अनुच्छेद 16 में नया खण्ड 4(ख) जोड़ा गया जिसमें कहा गया कि आरक्षित वर्ग के लिए आरक्षित स्थानों में किसी वर्ष कुछ स्थान बगैर भरे रह जाते हैं तो ऐसी रिक्तियों को अगले वर्ष भरी जाने वाली रिक्तियों से पृथक श्रेणी माना जायेगा।
- ये रिक्तियाँ सरकार एक अलग श्रेणी में रखकर अगले वर्षों मे भर सकती हैं और ऐसा करते समय इन्हें 50 प्रतिशत की आरक्षण सीमा में नहीं गिना जाएगा। अर्थात् इस संशोधन अधिनियम द्वारा बैकलॉग रिक्तियों के मामले में 50 प्रतिशत तक की आरक्षण की सीमा को समाप्त कर दिया गया।
84वां संविधान संशोधन अधिनियम 2001
- इस संशोधन अधिनियम में विभिन्न निर्वाचनों और निर्वाचन क्षेत्रों के समायोजन के सम्बन्ध में प्रावधान था। यह प्रावधान किया गया कि जब तक 2006 के पश्चात् की गई जनगणना के आंकड़े प्रकाशित नहीं कर दिये जाते हैं निम्न प्रयोजन के लिए राज्य की आबादी का निर्धारण इस प्रकार किया जायेगा-
- राष्ट्रपति का निर्वाचन 1971 की जनगणना के आधार पर
- लोकसभा में प्रत्येक राज्यों के लिए सीटों का आवंटन का आधार 1971 की जनगणना
- लोकसभा में राज्यों के निर्वाचक मण्डलों में विभाजन 1991 की जनगणना के आधार पर
- राज्य विधानमण्डल का गठन 1991 की जनगणना के आधार पर
- अनुसूचित जाति व जनजाति के लिए सीटों का आरक्षण 1991 की जनगणना के आधार पर
- इस प्रकार इस संशोधन द्वारा लोकसभा एवं राज्य विधानसभा में सीटों के पुननिर्धारण पर 25 वर्षो तक (2026 तक) समय सीमा बढ़ा दी गई।
86वां संविधान संशोधन अधिनियम 2002
- इस संशोधन द्वारा संविधान में एक नया अनुच्छेद 21(क) जोड़ा गया। जिसमें 6 से 14 वर्ष की आयु के सभी बच्चों के लिए ‘नि:शुल्क व अनिवार्य प्रारंभिक शिक्षा’ की व्यवस्था की गई। अर्थात् प्रारंभिक शिक्षा को मूल अधिकार बनाया गया।
- अनुच्छेद 51 (क) में एक नया मूल कर्त्तव्य जोड़ा गया।
87वां संविधान संशोधन अधिनियम 2003
- इस संशोधन द्वारा प्रत्येक राज्य में क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन के लिए 1971 की जनगणना के स्थान पर 2001 की जनगणना को आधार बनाने का प्रावधान किया गया।
89वां संविधान संशोधन अधिनियम 2003
- इस संशोधन अधिनियम द्वारा राष्ट्रीय अनुसूचित जाति व जनजाति का विभाजन किया गया अर्थात् दो आयोगों का निर्माण किया गया।
- राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (अनुच्छेद 338)
- राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (अनुच्छेद 338क)
91वां संविधान संशोधन अधिनियम 2003
- इस संविधान संशोधन अधिनियम, द्वारा मंत्रिपरिषद् के आकार को परिसीमित कर दिया गया है।
- केंन्द्रीय मंत्रिपरिषद् में प्रधानमंत्री समेत मंत्रियों की अधिकतम संख्या लोकसभा की कुल सदस्य संख्या 15 प्रतिशत से अधिक नहीं होगी।
- संसद के किसी भी सदन का सदस्य यदि दल-बदल के आधार पर निर्योग्य पाया जाता है तो ऐसा सदस्य मंत्री बनने के लिए भी निरर्हक होगा।
- राज्यों में मुख्यमंत्री समेत मंत्रियों की अधिकतम संख्या विधानसभा की कुल सदस्य संख्या के 15 प्रतिशत से अधिक नहीं होगी। किंतु राज्यों में मुख्यमंत्री समेत मंत्रियों की न्यूनतम संख्या 12 से कम नहीं होगी।
- राज्य विधानमण्डल का कोई भी सदस्य यदि दल-बदल के आधार पर निर्योग्य पाया जाता है तो ऐसा सदस्य मंत्री बनने के लिए भी निरर्हक होगा।
- संसद या राज्य विधानमण्डल के किसी भी सदन का सदस्य चाहे वह किसी भी दल से संबंधित हो यदि दल-बदल के आधार पर सदस्यता से निरर्हक करार दिया जाता है तो ऐसा सदस्य किसी भी लाभप्रद राजनैतिक पद को धारित करने के लिए भी निरर्हक होगा। ऐसे पद से अभिप्राय (i) केन्द्र या राज्य सरकार के अधीन कोई पद जहाँ उस पद के लिये लोक राजस्व से वेतन एवं अन्य सुविधाओं के लिए भुगतान किया जाता है, या (ii) केन्द्र या राज्य सरकार के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष नियंत्रणाधीन कोई पद जहाँ उस पद के लिये लोक राजस्व से वेतन एवं अन्य सुविधाओं के लिये भुगतान किया जाता है, सिवाय जहाँ वेतन या पारिश्रमिक क्षतिपूरक प्रकृति का हो।
- 10वीं अनुसूची में वर्णित वह उपबंध, जिसके अनुसार यदि किसी दल के एक-तिहाई सदस्य दल-बदल करते हैं तो उन्हें अयोग्य घोषित नहीं किया जा सकता, इस उपबंध को समाप्त कर दिया गया है। इसका अर्थ है कि दोषियों को फूट के आधार पर कोई संरक्षण प्राप्त नहीं है।
92वां संविधान संशोधन अधिनियम 2003
- इस संशोधन अधिनियम द्वारा संविधान की आठवीं अनुसूची में चार प्रादेशिक भाषाओं को जोड़ा गया है। ये है- बोडो, डोगरी, मैथिली एवं संथाली। इस प्रकार आठवीं अनुसूची मे कुल 22 भाषा हो गयी।
97वां संविधान संशोधन अधिनियम 2011
- इस संशोधन अधिनियम द्वारा संविधान के अनुच्छेद 19 में संशोधन किया गया साथ ही संविधान में एक नया भाग, ‘भाग-9B’ जोड़ा जिसमें ‘सहकारी समितियों’ को बढ़ावा दिया गया।
- 97वां संशोधन अधिनियम द्वारा संविधान के भाग-3 (मूल अधिकार), भाग- 4(नीति निदेशक तत्व) में संशोधन किया गया।
- 97वें संविधान अधिनियम द्वारा सहकारी समितियों को संवैधानिक दर्जा दिया गया।
- इस संशोधन अधिनियम द्वारा संविधान के भाग-3 (मूल अधिकारों) के अनुच्छेद 19 के खण्ड (1) के उपखण्ड (C) में ‘संघ’शब्द के आगे ‘या सहकारी समितियाँ’ शब्द जोड़ा गया।
- संविधान के भाग – 4 (नीति –निदेशक तत्व) में नया अनुच्छेद 43 (B) जोड़ा गया
- संविधान में एक नया भाग, ‘भाग-9(B)’ सहकारी समितियों के नाम से जोड़ा गया साथ ही इसमें नये अनुच्छेद 243ZH से 243ZT तक शामिल किये गये जो सहकारी समितियों से सम्बन्धित है।
99वां संविधान संशोधन अधिनियम 2014
- सर्वोच्च न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम प्रणाली के स्थान पर एक नये निकाय ‘राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग’ की स्थापना की।
- हालांकि वर्ष 2015 में सर्वोच्च न्यायालय ने इस संशोधन को असंवैधानिक एवं रद्द घोषित कर दिया। परिणामस्वरूप पूर्व से चल रही कॉलेजियम प्रणाली पुन: लागू की गई।
100वां संविधान संशोधन अधिनियम 2015
- भारत द्वारा कतिपय भू-भाग का अधिग्रहण एवं कुछ अन्य भू-भाग का बांग्लादेश को हस्तांतरण (अंत: क्षेत्रों की बदला-बदली तथा विपरीत दखल की अवधारणा के द्वारा), भारत-बांग्लादेश भूमि सीमा समझौता 1974 तथा इसके प्रोटोकॉल 2011 के अनुपालन में।
- इस उद्देश्य के लिए इस संशोधित अधिनियम ने चार राज्यों (असम, पश्चिम बंगाल, मेघालय एवं त्रिपुरा) के भू-भागों से संबंधित संविधान की पहली अनुसूची के प्रावधानों को संशोधित किया।
101वां संविधान संशोधन अधिनियम 2016
- भारत में वस्तु एवं सेवा कर (Goods and Services Tax Bill या GST Bill) को मान्यता प्रदान की गई।
- इसके अन्तर्गत संविधान में एक नया अनुच्छेद 246A जोड़ा गया है जो यह प्रावधान करता है कि, संसद और राज्यों की विधान सभाओं दोनों को वस्तु एवं सेवा कर GST से संबंधित विषयों पर कानून बनाने का अधिकार है।
- संविधान में एक नया अनुच्छेद 269A जोड़ा गया है जो यह प्रावधान करता है कि, अंतर्राज्यीय व्यापार के विषय में GST परिषद् की अनुशंसाओं के अनुसार कर केन्द्र सरकार द्वारा लगाए और वसूले जाएंगे परन्तु उनका विभाजन केन्द्र और राज्यों के बीच किया जाएगा।
- संविधान में एक नया अनुच्छेद 279A जोड़ा गया है जो यह प्रावधान करता है कि इस अधिनियम के लागू होने के 60 दिनों की अवधि में राष्ट्रपति द्वारा एक GST परिषद् का गठन किया जायेगा।
102वां संविधान संशोधन अधिनियम 2018
- इस अधिनियम के माध्यम से संविधान में अनुच्छेद 338ब जोड़कर राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा दिया गया जोकि 1993 में संसद के एक अधिनियम द्वारा स्थापित किया गया था।
- राज्य या संघ क्षेत्र के संबंध में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों को निर्दिष्ट करने के लिए राष्ट्रपति को अधिकार दिया गया।
103वां संविधान संशोधन अधिनियम 2019
- आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को सरकारी नौकरियों तथा शिक्षण संस्थाओं में 10 प्रतिशत आरक्षण देने का संवैधानिक प्रावधान करने के लिए संसद में 124वाँ संविधान संशोधन विधेयक प्रस्तुत किया गया।
- इस विधेयक द्वारा अनुच्छेद 15(6) तथा 16(6) जोड़ा गया तथा राज्यों को ऐसे वर्गों के पक्ष में 10 प्रतिशत नियुक्तियों या पदों के आरक्षण का प्रावधान करने की अनुमति दी। 10 प्रतिशत तक का यह आरक्षण मौजूदा आरक्षण के अतिरिक्त होगा।
104वां संविधान संशोधन अधिनियम 2020
- इसके माध्यम से लोकसभा एवं देश के सभी विधानसभाओं में अनुसूचित जाति व जनजाति के लिए विधायिका में आरक्षण की अवधि 10 वर्ष बढ़ाकर, 2020 से 2030 कर दिया गया है। वही एंग्लो इण्डियन समुदाय के प्रतिनिधियों के मनोनयन के प्रावधान की अवधि में वृद्धि नहीं की गई है।