आवेश:-
- आवेश किसी पदार्थ का वह गुण है जिसके कारण वह वस्तु विद्युत एवं चुम्बकीय प्रभाव दर्शाती है।
- आवेश का SI मात्रक कूलाम (c), ऐब कूलाम, स्थैत कूलाम होता है।
कूलाम = एम्पियर × सेकण्ड
- किसी भी परमाणु में इलेक्ट्रॉन (e-), प्रोटोन (P+) व न्यूट्रॉन (N) उपस्थित होते हैं। प्रोटोन व न्यूट्रॉन नाभिक के अंदर उपस्थित होते हैं परन्तु इलेक्ट्रॉन मुक्त रूप से परमाणु के बाह्य कक्ष में चक्कर लगाते हैं।
नाभिक = प्रोटोन + न्यूट्रॉन
इलेक्ट्रॉन (e-):-
- यह ऋणावेशित कण होता है।
- इलेक्ट्रॉन पर 1.6 × 10-19 कूलाम आवेश होता है।
- इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान 9.1 × 10-31 किलोग्राम होता है।
- इलेक्ट्रॉन की खोज जे.जे. थामसन के द्वारा की गई थी।
प्रोटोन (P+):-
- यह धनावेशित कण होता है।
- प्रोटोन पर +1.6 × 10-19 कूलाम आवेश होता है।
- प्रोटोन का द्रव्यमान 1.67 × 10-27 किलोग्राम होता है।
- प्रोटोन की खोज गोल्डस्टीन द्वारा की गई।
न्यूट्रॉन:-
- यह उदासीन कण होता है।
- न्यूट्रॉन की खोज जैम्स चैडविक द्वारा की गई।
आवेश के गुण:-
- किसी उदासीन वस्तु में इलेक्ट्रॉन (e-) जोड़ देने पर वस्तु ऋणावेशित हो जाती है जबकि उदासीन वस्तु में से इलेक्ट्रॉन (e-) हटा देने पर वस्तु धनावेशित हो जाती है।
- वस्तु को धनावेशित करने पर उसके द्रव्यमान में कमी आती है जबकि ऋणावेशित करने पर उसके द्रव्यमान में वृद्धि होती है।
- आवेश स्थानांतरणीय होता हे।
- आवेश को न तो उत्पन्न किया जा सकता है, न ही नष्ट किया जा सकता है अर्थात् आवेश हमेशा संरक्षित रहता है।
- आवेश द्रव्यमान से संबंधित होता है।
- स्थिर आवेश विद्युत क्षेत्र उत्पन्न करता है।
- स्थिर वेग से गतिशील आवेश विद्युत क्षेत्र के साथ-साथ चुम्बकीय क्षेत्र भी उत्पन्न करता है।
- परिवर्ती वेग से गतिशील आवेश विद्युत क्षेत्र व चुम्बकीय क्षेत्र के साथ विकिरण भी उत्पन्न करता है।
- आवेश क्वाण्टीकृत होता है जिसका न्यूनतम संभव मान 1.6 × 10-19 कूलाम अर्थात् 1e- के बराबर होता है तथा इसके पूर्णांक गुणक जैसे- 1e-, 2e-, 100e- के रूप में ही आवेश संभव है।
- आवेश एक अदिश राशि है।
- आवेश की विमा A1T1 होती है।
विद्युत बल रेखाएँ:-
- किसी आवेश के चारों ओर विद्युत क्षेत्र पाया जाता है जिसकी दिशाओं को विद्युत बल रेखाओं द्वारा दर्शाते हैं।
- ये बल रेखाएँ आपस में एक-दूसरे को कभी नहीं काटती है।
स्थिर विद्युत बल (Electro-Static force):-
- दो स्थिर आवेश एक-दूसरे पर बल लगाते हैं, इसे स्थिर विद्युत बल कहते हैं।
- समान प्रकृति के आवेश एक-दूसरे को प्रतिकर्षित व विपरीत प्रकृति के आवेश एक-दूसरे को आकर्षित करते हैं।
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- दो स्थिर आवेशों के मध्य लगने वाला स्थिर विद्युत बल दोनों आवेशों के गुणनफल (q1×q2) के समानुपाती तथा उनके बीच की दूरी (r) के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होता है। इसे ही ‘कूलाम का नियम’ कहते हैं।
\(\mathrm{F}_{\mathrm{e}} \alpha \frac{\mathrm{q}_{1} \mathrm{q}_{2}}{\mathrm{r}^{2}} \Rightarrow \mathrm{F}_{\mathrm{e}}=\mathrm{K} \frac{\mathrm{q}_{1} \mathrm{q}_{2}}{\mathrm{r}^{2}}\)
जहाँ K- समानुपाती नियतांक है।
\(\mathrm{K}=\frac{1}{4 \pi \mathrm{E}_{0}}\)![]()
Eo = निर्वात की विद्युतशीलता
= 8.85 × 10-12 फैरेड / मीटर
या कूलाम2 / न्यूटन × मीटर2 ![]()
\(
\mathrm{F}_{\mathrm{e}}=\frac{1}{4 \pi \mathrm{E}_{0}} \frac{\mathrm{q}_{1} \mathrm{q}_{2}}{\mathrm{r}^{2}} \\
\mathrm{~K}=\frac{1}{4 \times \frac{22}{7} \times 8.85 \times 10^{-12}}
\)
= 9 × 109 न्यूटन×मीटर2 / कूलाम2![]()
- निर्वात की विद्युतशीलता की (Eo) विमा
M-1L-3T4A2 होती है।
- स्थिर विद्युत बल आवेशों के मध्य उपस्थित माध्यम पर भी निर्भर करता है।
विद्युत क्षेत्र (Electric Field):-
- आवेश अपने चारों ओर विद्युत क्षेत्र उत्पन्न करता है तथा किसी बिंदु पर विद्युत क्षेत्र या इसकी तीव्रता उस बिंदु पर स्थिर इकाई धनावेश पर लगने वाले बल के बराबर होती है।
\( \mathrm{E}=\frac{\mathrm{F}}{\mathrm{q}} \quad\left[\mathrm{F}=\frac{\mathrm{KQq}_{0}}{\mathrm{r}^{2}}\right] \\ \mathrm{E}=\frac{\mathrm{KQq}_{0}}{\mathrm{q}_{0} \mathrm{r}^{2}} \\ \mathrm{E}=\frac{\mathrm{KQ}}{\mathrm{r}^{2}} \)
मात्रक = न्यूटन / कूलाम
या वोल्ट / मीटर![]()
विमा =
\(\frac{\mathrm{M}^{1} \mathrm{~L}^{1} \mathrm{~T}^{-2}}{\mathrm{AT}}=\mathrm{M}^{1} \mathrm{~L}^{1} \mathrm{~T}^{-3} \mathrm{~A}^{-1}\)
- विद्युत क्षेत्र सदिश राशि है, जिसकी दिशा विद्युत बल रेखाओं के द्वारा दर्शातें हैं।
विद्युत विभव (Electric potential):-
- अनंत से किसी इकाई धनावेश को विद्युत क्षेत्र में स्थित बिंदु तक लाने में किया गया कार्य उस बिंदु पर विभव के बराबर होता है।
- विद्युत विभव का मात्रक
\(\mathrm{V}=\frac{\mathrm{w}}{\mathrm{q}} \Rightarrow\) ![]()
जूल / कूलाम![]()
या वोल्ट
- विद्युत विभव की विमा = (जूल / कूलाम
= \(\frac{\mathrm{M}^{1} \mathrm{~L}^{1} \mathrm{~T}^{-2}}{\mathrm{AT}}\)
= M1L2T-3A-1)
विद्युत धारा:-
- आवेश के प्रवाह की दर या किसी चालक तार के अनुप्रस्थ काट क्षेत्रफल से प्रति सेकण्ड प्रवाहित होने वाले आवेश की कुल मात्रा विद्युत धारा कहलाती है।
विद्युत धारा (i) = (प्रवाहित आवेश (Q) / समय (t))![]()
- विद्युत धारा का मात्रक ऐम्पियर या (कूलाम / सेकण्ड)
होता है।
- विद्युत धारा की विमा = A
- धारा की दिशा इलेक्ट्रॉन की गति के विपरीत दिशा में होती है।
- परिमाण (Magritude) व दिशा (direction) होते हुए भी विद्युत धारा अदिश राशि (Scalar quantity) है, क्योंकि ये सदिशों के योग नियम का पालन नहीं करती है।
- एक इलेक्ट्रॉन पर आवेश 1.6 × 10-19 कूलाम होता है।
- यदि ne- प्रवाहित हो तो कुल प्रतिशत आवेश=n×q
यहाँ e- की संख्या (n) × 1e- का आदेश (q)
(i) दिष्ट धारा (DC):-
- दिष्ट धारा में धारा का मान व दिशा दोनों अपरिवर्तित रहते हैं।
- सेल, बैटरी आदि से दिष्ट धारा प्राप्त होती है।
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(ii) प्रत्यावर्ती धारा (AC):-
- प्रत्यावर्ती धारा में धारा के मान तथा दिशा दोनों में परिवर्तन होता है।
- प्रत्यावर्ती धारा में प्रति सेकण्ड धारा दो बार दिशा बदलती है।
- विद्युत उपकरण प्रत्यावर्ती धारा (AC) पर आधारित है।
- भारत में प्रत्यावर्ती धारा (AC) 220 वोल्ट व 50 हर्ट्ज की आवृति पर कार्य करती है।
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ओम का नियम (Ohm’s law):-
- यदि किसी तार की भौतिक परिस्थितियाँ समान बनी रहे तो तार से प्रवाहित होने वाली धारा (i) तार के सिरों पर लगाए गए विभवांतर (v) के समानुपाती होती है।
अर्थात् \(\text { I } \alpha \text { v }\)\(
\mathrm{i}=\frac{\mathrm{V}}{\mathrm{R}} \\
\mathrm{R}=\frac{\mathrm{V}}{\mathrm{i}}
\)![]()
जहाँ R = तार का प्रतिरोध
![]()
ग्राफ का ढाल (Slope) = प्रतिरोध (R)
ढाल \((\tan \theta)=\frac{v}{i}\)
- ओम का नियम सार्वजनिक नियम नहीं है।
- ओम का नियम अर्धचालकों, क्रिस्टन, दिष्टकारी, गैसों, विद्युत अपघट्य आदि पर लागू नहीं होता है।
प्रतिरोध (Resistance):-
- पदार्थ का वह गुण जिसके कारण वह उससे प्रवाहित होने वाली धारा का विरोध करें, प्रतिरोध कहलाता है।
- ओम के नियम से
\( \mathrm{R}=\frac{\mathrm{V}}{\mathrm{I}} \\ \mathrm{R}=\frac{\mathrm{v} \times \mathrm{t}}{\mathrm{O}} \quad\left[\mathrm{I}=\frac{\mathrm{Q}}{t}\right] \)
- मात्रक = ओम, (वोल्टऐ / म्पियर
, वोल्ट×सेकण्ड / कूलाम)![]()
- विमा = M1L2T-3A-2
- किसी तार का प्रतिराध \((\mathrm{R})=\mathrm{R}=\rho \times \frac{\mathrm{I}}{\mathrm{A}}\) ![]()
\(\rho\) = तार का विशिष्ट प्रतिरोध या प्रतिरोधकता (Resistivity)
प्रतिरोध की निर्भरता:-
- प्रतिरोध पदार्थ पर निर्भर करता है।
- प्रतिरोध लंबाई के समानुपाती होता है।
- प्रतिरोध अनुप्रस्थ काट के क्षेत्रफल के व्युत्क्रमानुपाती होता है।
- तापमान में वृद्धि के साथ चालकों का प्रतिरोध बढ़ता है।
विशिष्ट प्रतिरोध/प्रतिरोधकता (
\(\rho\)):-
- किसी पदार्थ का विशिष्ट प्रतिरोध उस पदार्थ के 1 मीटर लंबे तथा 1 मीटर2 अनुप्रस्थ काट क्षेत्रफल वाले तार के प्रतिरोध के बराबर होता है।
- ये विशिष्ट प्रतिरोध तार की लंबाई व मोटाई पर निर्भर नहीं करता है।
= \(\rho=\frac{R \times A}{I}\) ![]()
- मात्रक = (ओम×मीटर2 / मीटर)
= ओम × मीटर
- विमा = M1L3T-3A-2
- तापमान बढ़ाने, अशुद्धि मिलाने तथा यांत्रिक प्रतिबल लगाने पर विशिष्ट प्रतिरोध बढ़ता है।
- लोहा (Fe), कोबाल्ट (Co) तथा निकिल (Ni) के अलावा अन्य धातुओं की प्रतिरोधकता बाह्य चुम्बकीय क्षेत्र में बढ़ती है।
प्रतिरोध संयोजन:-
(i) श्रेणीक्रम संयोजन:-
- प्रतिरोधों के सिरे अलग-अलग घटकों से जुड़े होते हैं।
- प्रत्येक प्रतिरोध से गुजरने वाली धारा का मान एक समान होता है।
- प्रत्येक प्रतिरोध के सिरों पर वोल्टता अलग-अलग होती है।


- श्रेणीक्रम का तुल्य प्रतिरोध (R) = R1 + R2 + R3
(ii) समान्तर क्रम संयोजन:-
- प्रतिरोधों के सिरे एक समान बिंदु से जुड़े होते हैं।
- प्रत्येक प्रतिरोध से गुजरने वाली धारा का मान अलग-अलग होता है।
- प्रत्येक प्रतिरोध के सिरों पर वोल्टता समान होती है।


समान्तर क्रम में तुल्य प्रतिरोध \(\frac{1}{\mathrm{R}}=\frac{1}{\mathrm{R}_{1}}+\frac{1}{\mathrm{R}_{2}}+\frac{1}{\mathrm{R}_{3}}\)![]()
Note:- हमारे घरों, ऑफिस व अन्य स्थानों पर विद्युत उपकरण ‘समान्तर क्रम’ में जोड़े जाते हैं।
दैनिक जीवन में उपयोगी विद्युत उपकरण:-
(i) फ्यूज तार:-
- फ्यूज तार का गलनांक कम होता है।
- फ्यूज तार का प्रतिरोध ज्यादा होता है।
- फ्यूज, टिन (63%) व लेड/सीसा (37%) के मिश्रण से बना हुआ होता है।
(ii) हीटर:-
- हीटर में प्रयुक्त तार का गलनांक ज्यादा होता है।
- हीटर में प्रयुक्त तार का प्रतिरोध ज्यादा होता है।
- हीटर में प्रयुक्त तार नाइक्रोम (Ni + Cr) से बना होता है।
(iii) विद्युत बल्ब:-
- विद्युत बल्ब का फिलामेंट, टंगस्टन से बना होता है, जिसका प्रतिरोध व गलनांक दोनों ज्यादा होते हैं।
- प्रतिरोध बॉक्स में प्रयुक्त होने वाले मानक प्रतिरोधों का निर्माण पदार्थों से किया जाता है जिनके प्रतिरोध पर तापमान का प्रभाव नहीं पड़ता है।
जैसे- मैग्नीज (Cu + mn + Ni)
कांस्टेटन (Cu + Ni)
सेल/बैटरी:-
- सेल/बैटरी, रासायनिक ऊर्जा से विद्युत ऊर्जा प्राप्त करने की युक्ति होती है।
- प्रयोग में लाने व पुन: चार्ज करने के आधार पर सेल दो प्रकार के होते हैं-
(i) प्राथमिक सेल:-
- ये सेल एक बार प्रयोग में लेने के बाद पुन: आवेशित नहीं होते हैं।
- रासायनिक ऊर्जा → विद्युत ऊर्जा (सेल अभिक्रिया अनुत्क्रमणीय)
उदाहरण- साधारण सेल, लेम्लांशे सेल, डेनियल सेल, शुष्क सेल
(ii) द्वितीयक सेल:-
- ये सेल प्रयोग में लेने के बाद पुन: आवेशित कर प्रयोग में लाए जाते हैं।
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(सेल अभिक्रिया उत्क्रमणीय)
उदाहरण- सीसा संचायक सेल, निफे सेल, Li-आयन बैटरी
प्राथमिक सेल के दोष:-
(i) स्थानीय क्रिया:-
- जिंक के इलेक्ट्रॉड पर कार्बन की अशुद्धि के कारण होती है जिसे पारे/मर्करी/Hg का लेप कर ठीक कर सकते हैं।
(ii) ध्रूवण क्रिया:-
- कॉपर (Cu) के इलेक्ट्रॉड पर H2 की परत बन जाने के कारण होती है जिसे MnO2 या CuSO4 का प्रयोग कर ठीक कर सकते हैं।
इलेक्ट्रॉड:-
- विद्युत सेल में धातु की दो छड़े होती है जिन्हें इलेक्ट्रॉड कहते हैं। इन छड़ों पर विपरीत प्रकार के आवेश होते हैं। वह छड़ जो धनावेशित होती है एनोड कहलाती है तथा ऋणावेशित छड़ कैथोड कहलाती है। ये छड़ें विभिन्न प्रकार के विलयनों में पड़ी रहती है इन विलयनों को विद्युत अपघट्य कहते हैं।
विद्युत चुम्बकीय प्रेरण (Electro Magnetic Induction):-
- किसी बन्द परिपथ में होकर गुजरने वाले चुम्बकीय फ्लक्स में परिवर्तन कर दिया जाए, तो परिपथ में विद्युत धारा उत्पन्न हो जाती है, विद्युत धारा उत्पन्न होने की इस घटना को विद्युत चुम्बकीय प्रेरण कहते हैं।
लेंज का नियम:-
- कुण्डली में प्रेरित धारा की दिशा लेंज के नियम के ज्ञात करते हैं, जिसके अनुसार प्रेरित विद्युत धारा की दिशा इस प्रकार होती है कि वह सदैव अपने उत्पन्न होने के कारण का विरोध करती है।
फैराडे के विद्युत चुम्बकीय प्रेरण का नियम:-
(i) प्रथम नियम:-
- फैराडे ने बताया कि जब चालक की कुण्डली से संबंधित चुम्बकीय क्षेत्र में परिवर्तन होता है तो कुण्डली में विद्युत वाहक बल उत्पन्न होता है जिससे कुण्डली में विद्युत धारा उत्पन्न होती है।
(ii) द्वितीय नियम:-
- कुण्डली से संबंधित चुम्बकीय क्षेत्र या फ्लक्स की मात्रा में परिवर्तन दर प्रेरित विद्युत वाहक बल के समानुपाती होती है।
- विद्युत मोटर व जनरेटर दोनों ही विद्युत चुम्बकीय प्रेरण के सिद्धान्त पर कार्य करती है।
- ऑरस्टेड ने सबसे पहले बताया कि धारावाही चालक तार के आस-पास चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न होता है।