ओजोन परत एवं हरित गृह प्रभाव:

 ओजोन परत:

- पृथ्वी के वायुमंडल की समताप मंडल परत में ऊपर ओजोन (O3) का कवच स्थित है। इसकी सांद्रता सर्वाधिक 15km से 35 km तक होती है।

- ये ओजोन परत सूर्य से आने वाली हानिकारक पराबैंगनी विकिरणों को अवशोषित कर लेती है।
\(\mathbf{O}_{2} \stackrel{\text { uv }}{\longrightarrow} \mathbf{O}+\mathbf{O}\)
\(\mathbf{O}+\mathbf{O}_{2} \longrightarrow \mathbf{O}_{3}\) (
ओजोन)
 

- इस परत की ऊँचाई, ध्रुवों पर कम तथा विषुवत् रेखा पर अधिक होती है।

- समताप मण्डल में वर्ष 1980 से प्राण रक्षक ओजोन की परत पतली होती जा रही है। ओजोन की पतली परत को ओजोन छिद्र भी कहते है।

- फ्रेऑन सबसे अधिक घातक क्लोरोफ्लोरोकार्बन है।

- सर्दी के महीनों में वायुमण्डलीय क्लोरीन के एकत्रित होने के कारण, अण्टार्कटिका में ओजोन परत महीन होती जा रही है।

- किरणों से विघटित होकर क्लोरीन आयन बनाते हैं, जो O3 से क्रिया करके इसे खत्म कर देती है।
\( \mathrm{CF}_{2} \mathrm{Cl}_{2} \stackrel{\mathrm{UV}}{\longrightarrow} \mathrm{Cl}+\mathrm{CF}_{2} \mathrm{Cl} \\ \mathrm{Cl}+\mathrm{O}_{3} \longrightarrow \mathrm{ClO}+\mathrm{O}_{2} \)
\(\mathrm{ClO}+\mathrm{O} \longrightarrow \mathrm{Cl}+\mathrm{O}_{2}\)
 

 सूर्य से आने वाली पराबैंगनी विकिरणें 3 प्रकार की होती है-

(i) U.V.- A विकिरणें : ये ओजोन परत द्वारा अवशोषित नहीं होती तथा जीवों के लिए हानिकारक भी होती है।

(ii) U.V.- B विकिरणें : इन विकिरणों का अधिकांश भाग ओजोन परत द्वारा अवशोषित की जाती है, यदि ओजोन परत की मोटाई में कमी आने लगे तो ये विकिरणें पृथ्वी पर पहुँचने वाली हानिकारक विकिरणें जो कि त्वचा का कैंसर, अंधापन जैसे रोग उत्पन्न करती है।

(iii) U.V.- C विकिरणें : इनका पूर्ण अवशोषण ओजोन परत द्वारा हो जाता है।

- ओजोन परत 280-315nm तरंगदैर्ध्य वाली पराबैंगनी किरणों को धरती पर आने से रोकती है।

- प्रतिवर्ष 16 सितम्बर को ‘ओजोन वर्ल्ड डे’ मनाया जाता है।

- ओजोन परत की मोटाई को डॉबसन युनिट/इकाई में नापते हैं तथा ओजोन परत की औसत मोटाई लगभग 300 डॉबसन युनिट होती है।

 मॉन्ट्रियल/मॉनट्रियल प्रोटोकॉल (Montreal Protocol)

- ओजोन परत व वातावरण पर हुए 40 वर्षों के अनुसंधान से उत्पादन पर रोक लगाती है वर्ष 1987 से 150 से अधिक देशों में यह प्रस्ताव (मोनट्रियल प्रोटोकॉल) मान्य है।

- जिससे वर्ष 1986 की अपेक्षा में वर्ष 1999 CFc की वातावरण में मात्रा आधी हो गई है।

2. हरित गृह प्रभाव (Green house effect)

- पृथ्वी पर आने वाली सौर विकिरणें उच्च आवृत्ति व निम्न तरंगदैर्ध्य की होती है अत: इनकी ऊर्जा भी अधिक होती है।

- इन सौर विकिरणों का लगभग 50% भाग तो पृथ्वी के वायुमण्डल की बाहरी सतहों से ही परावर्तित हो जाता है, शेष 50% भाग पृथ्वी पर पहुंचता है तो इसमें से कुछ विकिरण पृथ्वी की सतह से परावर्तित हो जाती है व कुछ विकिरण पृथ्वी सतह से अवशोषित हो जाती है।

- विकिरणों का अवशोषण कर पृथ्वी गर्म हो जाती है तथा स्वयं विकिरणों का उत्सर्जन करने लगती है अत: पृथ्वी सतह से परावर्तित एवं उत्सर्जित विकिरण पार्थिव विकिरण कहलाते हैं। इनकी तरंगदैर्ध्य उच्च व आवृत्ति कम होती हैं।

- अत: इनकी ऊर्जा भी कम होती है जिससे ये विकिरणें पृथ्वी के वायुमण्डल की निचली सतहों से एकत्र होकर पृथ्वी का तापमान बढ़ाती है, इसे ही हरित गृह प्रभाव कहते है।

- हरित गृह प्रभाव पृथ्वी पर जीवन के लिए आवश्यक है, क्योंकि इसकी अनुपस्थिति में पृथ्वी का औसत तापमान –18°C गिर जाता है।

 हरित गृह जैसे :-

(i) कार्बन डाई-ऑक्साइड (CO2) : वर्तमान वातावरणीय मात्रा 380 ppm है आयु 5-200 वर्ष है।

(ii) मीथेन : वर्तमान वातावरणीय मात्रा 1750 ppb (Part per billion) है।

(iii) नाइट्रस ऑक्साइड (N2O) : वर्तमान वातावरणीय मात्रा 316 ppb है।

(iv) क्लोरोफ्लोरो कार्बन (CFCs) : वर्तमान वातावरणीय मात्रा 282 ppt (Part per trillion) है।

   CO2  >   CH4  >  CFC  >  N2O

   (60%)     (20%)   (14%)    (6%)

 Global Warming :

- धरातलीय वातावरण एवं समुद्र के औसत तापमान में हुई वृद्धि को ग्लोबल वार्मिंग कहते हैं, जिससे निपटने हेतु 1997-98 में संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों ने “क्योटो-प्रोटोकॉल” अपनाया तथा ग्रीन हाउस गैसों के कटौती में सहमति प्रदान की।

- Green house प्रभाव के बारे में सर्वप्रथम “फूरियर” ने बताया।

-आरेनियस ने इस ग्रीन हाऊस प्रभाव को समझाया।