पृथ्वी पर किसी क्षेत्र व स्थान की स्थिति का वर्णन करने के लिए देशांतर व अक्षांश महत्वपूर्ण आधार है। अक्षांश व देशांतर कल्पित रेखाएं हैं।
अक्षांशः अक्षांश रेखाएं भूमध्य रेखा से उत्तर व दक्षिण में किसी स्थान की कोणिक दूरी को दर्शाती है। यह भूमध्यरेखा के सामांतर खींची जाती है। एक अक्षांश रेखा पर सभी स्थान भूमध्य रेखा से समान दूरी पर होते हैं। भूमध्य रेखा 0° का अक्षांश वृत्त हैं तथा अक्षांश भूमध्य रेखा से 90° उत्तर तथा दक्षिण तक गिने जाते हैं। 90° उत्तर तथा दक्षिण पृथ्वी के दो ध्रुवों की स्थितियां हैं।दो अक्षांश रेखाओं के बीच की दूरी 111km. होती है।

देशांतरः किसी स्थान का देशांतर उस स्थान की प्रधान मध्यान रेखा से पूर्व तथा पश्चिम को मापी गई कोणिक दूरी होती है। 0° देशांतर जो लंदन के निकट ग्रीनविच से गुजरती है। प्रधान मध्यान रेखा कहलाती है। देशांतरों का मान 0° से 180° तक होता है तथा सभी देशांतर रेखाएं धुवों पर अभिसरित होती हैं। देशांतर रेखाएं एक ही देशांतर पर स्थित सभी स्थानों को मिलाने वाली रेखाएं होती हैं तथा इन्हें मध्यान्न रेखा भी कहते हैं।

कुछ महत्वपूर्ण अक्षांश व देशांतर रेखाएं: 0° की अक्षांश रेखा भूमध्य रेखा कहलाती है। इसके उत्तर में 23½° अक्षांश की रेखा कर्क रेखा और दक्षिण में 23½° अक्षांश की रेखा मकर रेखा के नाम से जानी जाती है। 66½° उतरी अक्षांश रेखा को `आर्कटिक वृत' तथा 66½° दक्षिणी अक्षांशीय रेखा को `अण्टाकेटिक वृत' कहा जाता है।
कर्क तथा मकर रेखाएं उस क्षेत्र की सीमाएं हैं जहां पर सूर्य की किरणें सीधी पड़ती हैं। ग्रीनविच की देशांतर रेखा को मुख्य याम्योत्तर के नाम से भी जाना जाता है। 0° देशांतर से पूर्व व पश्चिम की और 180° के अंतर पर क्रमशः 180° पूर्व व 180° पश्चिम देशांतर हैं। ग्लोब पर मुख्य याम्योत्तर के सामने वाली रेखा अर्थात् 180° देशांतर को अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा कहा जाता है। यह रेखा प्रशांत महासागर के मध्य से गुजरती है तथा एक सीधी रेखा नहीं है। अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा तिथि तथा उसमें परिवर्तन का मुख्य आधार है। इससे पूर्व की अपेक्षा पश्चिम में तिथि आगे होती है। इसलिए यदि कोई इस रेखा को पूर्व से पश्चिम की ओर पार करता है तो तिथि को एक दिन आगे पाता है, परंतु यदि वह विपरीत दिशा में आगे बढ़ता है तो वह छोड़े हुए दिन को पुनः प्राप्त करता है। इसलिए यह कहा जाता है कि यदि कोई व्यक्ति इस रेखा को पार करता है तो उसे एक दिन का लाभ अथवा हानि होती है।

पृथ्वी की गतियाँ- घूर्णन और परिक्रमण

पृथ्वी की दो गतियाँ हैं –

1. घूर्णन - पृथ्वी का अपने अक्ष पर घूमना घूर्णन कहलाता है। पृथ्वी करीब 24 घंटे में अपने अक्ष पर एक चक्कर पूरा करती है।
2. परिक्रमण / परिभ्रमण - सूर्य के चारों ओर एक स्थिर कक्ष में पृथ्वी की गति परिक्रमण कहलाती है। पृथ्वी की परिक्रमा का मार्ग अंडाकार है।

पृथ्वी का घूर्णन (Rotation on the axis)

पृथ्वी का अक्ष एक काल्पनिक रेखा होती है, जो इसके कक्षीय सतह से 66½0 का कोण बनाती है। वह समतल जो कक्ष के द्वारा बनाया जाता है, उसे कक्षीय समतल कह जाता है। पृथ्वी पर प्रकाश का स्रोत सूर्य है। पृथ्वी का आकार गोले के समान है, इसलिए एक समय में सिर्फ इसके आधे भाग पर ही सूर्य की रोशनी प्राप्त होती है। सूर्य की ओर वाले भाग में दिन (Day) होता है, जबकि दूसरा भाग जो सूर्य से दूर होता है वहाँ रात (Night) होती है। ग्लोब पर वह वृत्त जो दिन तथा रात को विभाजित करता है उसे प्रदीप्ति वृत्त कहते हैं। यह वृत्त अक्ष के साथ नहीं मिलता है।
पृथ्वी अपने अक्ष पर एक चक्कर पूरा करने में लगभग 24 घंटे का समय लेती है। घूर्णन के समय काल को पृथ्वी दिन कहते हैं। यह पृथ्वी की दैनिक गति कहलाती है।

पृथ्वी का परिक्रमण / परिभ्रमण (Rotation of earth around the Sun orbit)

पृथ्वी की दूसरी गति जो सूर्य के चारों ओर कक्ष में होती है उसे परिक्रमण/परिभ्रमण (Rotation) कहा जाता है। सामान्यतः एक वर्ष को गर्मी, सर्दी, वसंत एवं शरद् ऋतुओं में विभाजित किया जाता है।

पृथ्वी की परिक्रमण गति के प्रभाव –
1. सूर्य की किरणों का सीधा एवं तिरछा चमकना।
2. वर्ष की अवधि का निर्धारण।
3. जलवायु कटिबंधों का निर्धारण।
4. दिन-रात का छोटा-बड़ा होना।
5. ध्रुवों पर 6-6 माह के दिन और रात।
6. धरातल पर ताप वितरण में भिन्नता।
उत्तर अयनांत (North Solstice)
21 जून को उत्तरी गोलार्ध सूर्य की तरफ झुका है। सूर्य की किरणें कर्क रेखा पर सीधी पड़ती हैं। इसके परिणामस्वरूप इन क्षेत्रों में अधिक ऊष्मा प्राप्त होती है। ध्रुवों के पास वाले क्षेत्रों में कम ऊष्मा प्राप्त होती है, क्योंकि वहाँ सूर्य की किरणें तिरछी पड़ती हैं। उत्तर ध्रुव सूर्य की तरफ झुका होता है तथा उत्तरी ध्रुव रेखा के बाद वाले भागों पर लगभग 6 महीने तक लगातार दिन रहता है। चूंकि, उत्तरी गोलार्ध के बहुत बड़े भाग में सूर्य की रोशनी प्राप्त होती है, इसलिए विषुवत् वृत्त के उत्तरी भाग में गर्मी का मौसम होता है। 21 जून को इन क्षेत्रों में सबसे लंबा दिन तथा सबसे छोटी रात होती है। पृथ्वी की इस अवस्था को उत्तर अयनांत कहते हैं।
दक्षिण अयनांत (South Solstice)
22 दिसंबर को दक्षिण ध्रुव के सूर्य की ओर झुके होने के कारण मकर रेखा पर सूर्य की किरणें लम्बवत् पड़ती हैं। चूँकि, सूर्य की किरणें मकर रेखा पर सीधी पड़ती हैं इसलिए दक्षिणी गोलार्ध के बहुत बड़े भाग में प्रकाश प्राप्त होता है। इसलिए, दक्षिणी गोलार्ध में लंबे दिन तथा छोटी रातों वाली ग्रीष्म ऋतु होती है। इसके ठीक विपरीत स्थिति उत्तरी गोलार्ध में होती है। पृथ्वी की इस अवस्था को दक्षिण अयनांत कहा जाता है। आस्ट्रेलिया में ग्रीष्म के समय में क्रिसमस का पर्व मनाया जाता है।
विषुव (Equinox)
21 मार्च एवं 23 सितम्बर की स्थितियाँ जब सूर्य भूमध्य रेखा पर लंबवत् चमकता है, जिसके कारण दोनों गोलार्द्ध में सर्वत्र दिन-रात बराबर होते हैं। 21 मार्च वाली स्थिति का बसंत विषुव एवं 23 सितम्बर वाली  स्थिति को शरण विषुव की अवस्था कहा जाता है।
वर्ष की गणना
पृथ्वी एक वर्ष या 365 दिन में सूर्य का एक चक्कर पूरा करती है। एक वर्ष 365 दिन का होता हैं तथा सुविधा के लिए 6 घंटे को इसमें नहीं जोड़ा जाता हैं। चार वर्षों में प्रत्येक वर्ष के बचे हुए 6 घंटे मिलकर एक दिन यानी 24 घंटे के बराबर हो जाते हैं। इसके अतिरिक्त दिन को फरवरी के महीने में जोड़ा जाता है। इस प्रकार प्रत्येक चौथे वर्ष फरवरी माह 28 के बदले 29 दिन का होता है। ऐसा वर्ष जिसमें 366 दिन होते हैं उसे लीप वर्ष कहा जाता है।