जिला प्रशासन
- प्रशासनिक सुगमता की दृष्टि से सभी राज्यों को छोटी-छोटी इकाइयों में विभक्त किया गया है, जिन्हें जिला कहा जाता है।
- सन् 1772 में अंग्रेजी शासन काल में गवर्नर जनरल वारेन हेस्टंग्स द्वारा ‘कलेक्टर’ का पद सृजित करने के साथ ही आधुनिक जिला प्रशासन का एक नया अध्याय प्रारंभ हुआ।
- स्वतंत्रता के बाद जिला को भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था की एक महत्त्वपूर्ण इकाई के रूप में अपनाया गया।
- भारत के संविधान में भी जिला शब्द का प्रयोग किया गया है। संविधान में जिला शब्द का अनुच्छेद-233 में जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति के प्रसंग में प्रयोग किया गया है। पंचायती राज के लिए जिला परिषद् का प्रयोग अनुच्छेद 243 में किया गया है।
जिला प्रशासन के महत्त्व के कारण
- जिला प्रशासन तथा जिलाधीश के पद की छवि भारतीय जन साधारण के मन में परम्परागत श्रेष्ठता के रूप में अंकित है।
- भौगोलिक दृष्टि से संतुलित क्षेत्र स्थिति के कारण प्रशासनिक दृष्टि से सुविधापूर्ण तथा क्षेत्रीय स्तर तक पहुँच बनाए रखता है।
- जिला मुख्यालय तक आम आदमी का आना-जाना आसानी से होता रहता है।
- राज्य सरकार के समस्त कार्यालय प्राय: जिला स्तर पर स्थापित होने के कारण राज्य की राजधानी से समन्वय स्थापित करने में सुविधा रहती है।
- ऐतिहासिक निरन्तरता के साथ-साथ जिला एक विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान तथा अपनत्व का बोध कराता है।
- जिला प्रशासन स्थानीय समस्याओं से अवगत रहता है।
जिला प्रशासन के कार्य
जिला प्रशासन राज्य प्रशासन और जन साधारण के बीच की एक कड़ी के रूप में कार्य करता है। राज्य सरकार के समस्त कार्यों को जिला स्तर पर स्थापित करने का कार्य जिला प्रशासन के द्वारा किया जाता है।
जिला प्रशासन के द्वारा निम्नलिखित कार्य किए जाते हैं–
- नियामकीय कार्य :- जिला प्रशासन के नियामकीय कार्यों के जिले में कानून एवं व्यवस्था बनाए रखना, अपराधों पर नियंत्रण करना, न्यायिक प्रशासन करना, आयकर, ब्रिकीकर चुंंगीकर, वनों पर कर एकत्रित करना, भू-राजस्व बकाया प्राप्त करना, भूमि प्रशासन के सामान्य कार्य आदि करना सम्मिलित है।
- विकासात्मक कार्य करना :- जिला प्रशासन के द्वारा जिले में विभिन्न प्रकार के विकास से संबंधित कार्य किए जाते है। विकास के कार्यों के अंतर्गत जनकल्याणकारी और लोकहितकारी कार्य किए जाते हैं। जिले में कृषि उत्पादन बढ़ाना, सहकारिता, पशुधन और मछली पालन को प्रोत्साहित करना, शिक्षा का प्रसार करना, समाज कल्याण के कार्य करना।
- कार्मिक प्रशासन के कार्य करना :- कार्मिक प्रशासन के कार्यों में भर्ती करना, प्रशिक्षण देना, पदोन्नति करना, पर्यवेक्षण एवं नियंत्रण करना और पुरस्कार एवं प्रोत्साहन देना आदि कार्यों को सम्मिलित किया जाता है।
- निर्वाचन संबंधी कार्य करना :- जिले में लोकसभा, विधानमण्डल, स्थानीय निकायों और पंचायती राज संस्थाओं के चुनावों को करवाना जिला प्रशासन का महत्त्वपूर्ण कार्य होता है।
- स्थानीय संस्थाओं का संचालन करना :- जिले में नगरीय संस्थाओं और ग्रामीण स्थानीय संस्थाओं के प्रशासन की सुचारू रूप से संचालित करने में जिला प्रशासन सहयोग प्रदान करता है।
- राहत कार्य करना :- जिले में प्राकृतिक आपदाओं जैसे- बाढ़, भूकम्प, सूखा, अकाल तथा अन्य प्राकृतिक आपदाओं के समय जिला प्रशासन के द्वारा राहत कार्यों का संचालन किया जाता है।
- समन्वय संबंधी कार्य करना :- जिला प्रशासन के द्वारा अन्तर्राष्ट्रीय अभिकरणों, केन्द्र सरकार एवं राज्य सरकार के विभिन्न कार्यालयों, स्वयंसेवी संगठनों, निजी संगठनों, गैर सरकारी संगठनों तथा अन्य संबद्ध संस्थानों में समन्वय स्थापित करने का कार्य किया जाता है।
जिला कलेक्टर
- जिला प्रशासन में जिला कलेक्टर या डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर का पद अत्यंत महत्त्वपूर्ण होता है।
- जिला कलेक्टर भारतीय प्रशासनिक सेवा (I.A.S.) का अधिकारी होता है।
जिला कलेक्टर के कार्य एवं भूमिका
(A) प्रशासनिक अधिकारी के रूप में
एक प्रशासनिक अधिकारी के रूप में जिला कलेक्टर निम्नलिखित कार्यों को संपादित करता है।
- पोस्डकॉर्ब (POSDCORB) के कार्यों को करना।
- जिला प्रशासन के विभिन्न अधिकारियों जैसे तहसीलदार, नायब तहसीलदार और जिले में कार्यरत अन्य राजपत्रित अधिकारियों को पदस्थापना करना और उनका स्थानांतरण करना।
- वार्षिक बजट का अनुमान प्रस्तुत करना।
- कार्मिक प्रशासन से संबंधित कार्य करना।
- जिले के राजस्व भवनों का निर्माण करना और उनकी देखभाल करना।
- वह जिला कोषालय का प्रभारी होता है और जिले की सभी ट्रेजरी या कोषालयों की सुरक्षा करना उसकी जिम्मेदारी है।
- सरकारी वाहनों, सर्किट हाउस और डाक बंगले पर नियंत्रण रखना।
- जिला प्रशासन की संपत्ति, धरोहर, भवनों, इमारतों और पर्यटक स्थलों की रक्षा करता है।
- जिला प्रशासन में कार्यरत अधिकारियों एवं कर्मचारियों का निरीक्षण करना।
- जिले के गाँवों और नगरीय क्षेत्रों का दौरा करके जनता की शिकायतों की सुनवाई करना।
(B) जिलाधीश के रूप में
जिला कलेक्टर के रूप में वह राजस्व संग्रह का कार्य करता है जो निम्न है-
- भू- राजस्व की दरों का निर्धारण करना।
- भू- राजस्व को संग्रह करना।
- कृषि आयकर, ब्रिकी कर, सिंचाई कर, नहरी शुल्क तथा आयकर और अन्य करों को संग्रह करना।
- कृषि ऋणों का वितरण और उनकी वसूली करना।
- भू-अभिलेख से संबंधित सभी प्रकरणों को देखना।
- भू-राजस्व से संबंधित मुकदमों की अपील पर सुनवाई करना।
- भूमि अधिग्रहण से संबंधित कार्य करना।
- स्टाम्प एक्ट का क्रियान्वयन करना।
- सरकारी संपत्ति और भूमि की रक्षा करना।
- उपखण्ड अधिकारी, तहसीलदार, नायब तहसीलदार, कानूनगो और पटवारी को भू-राजस्व के संबंध में मार्गदर्शन देना और उन पर नियंत्रण करना।
- कृषि से संबंधित सांख्यिकी और आंकड़ों को तैयार करवाना।
- जिला स्तर के स्थानीय अधिकारियों के राजस्व निर्णय की अपीलें सुनना।
(C) जिला दण्डाधिकारी के रूप में
- जिले में शांति-व्यवस्था और कानून व्यवस्था बनाए रखना।
- शान्ति भंग होने से उत्पन्न संकट में आदेश जारी करना।
- साम्प्रदायिक दंगो, आंतकवादी गतिविधियों, जन आन्दोलनों, उग्र छात्र प्रदर्शनों, राजनीतिक आन्दोलनों तथा जातीय संघर्षं पर नियंत्रण करना।
- फौजदारी घटनाओं के बारे में पुलिस से जानकारी प्राप्त करना।
- जिले की पुलिस के कार्यों का निरीक्षण करना और उसे तत्संबंधी आदेश एवं निर्देश जारी करना।
- अपराधियों और असामाजिक तत्वों को जिले से बाहर भेजना।
- जिला कारागारों एवं उनमें रहने वाले कैदियों का निरीक्षण करना।
- जिला पुलिस प्रशासन की वार्षिक रिपोर्ट प्राप्त करना और गृह विभाग को उस वार्षिक रिपोर्ट को भेजना।
(D) जिला विकास अधिकारी के रूप में
- जिले में विकास कार्यों से संबंधित विभिन्न योजनाओं और कार्यक्रमों का क्रियान्वयन करना।
- जिले में विभिन्न प्रकार की विकासात्मक और रोजगारोन्मुखी योजनाओं को लागू करना।
- औद्योगिक विकास के लिए जिला उद्योग केन्द्रों को आवश्यक मार्गदर्शन और निर्देश जारी करना।
- ग्रामीण क्षेत्रों में विकास में जन सहभागिता को प्राप्त करके विकासात्मक कार्य करना।
- पंचायती राज संस्थाओं को विकास कार्यों के लिए सहयोग करना।
- एकीकृत ग्रामीण विकास योजनाओं का जिले में संचालन करना।
- जिला परिषद् को विकास के लिए योजनाएं बनाने और उन्हें क्रियान्वित करने के लिए निर्देश जारी करना।
(E) आपदा निवारक अधिकारी के रूप में
बाढ़, भूकंप,अकाल, सूखा और अतिवृष्टि के समय राहत कार्य और राहत सहायता प्रदान करना।
- सांप्रदायिक दंगो और आंतकवादी घटनाओं के समय जिला प्रशासन को सक्रिय करना।
- महामारी और दैवीय प्रकोप के समय जिला प्रशासन को उचित आदेश एवं मार्गदर्शन प्रदान करना।
उपखण्ड अधिकारी
- भारत में राज्यों के जिलों को उपखण्डों में विभाजित किया गया है।
- उपखण्ड के अधिकारी को उपखण्ड अधिकारी (SDO) कहा जाता है।
- जिले में एक से अधिक उपखण्ड होते हैं और कई जिलों में तो 5 से 6 तक उपखण्ड होते हैं।
- यह उपखण्ड अधिकारी जिला कलेक्टर और तहसीलदारों के मध्य एक प्रशासनिक कड़ी का कार्य करता है।
- उपखण्ड अधिकारी उपखण्ड में राजस्व से संबंधित उपखण्ड दण्डनायक (SDM) और कार्यपालक अधिकारी के रूप में कार्य करता है।
उपखण्ड अधिकारी के कार्य
(A) भू-राजस्व अधिकारी के रूप में
वह अपने उपखण्ड क्षेत्र में भू-राजस्व से संबंधित न्यायिक, अर्द्ध-न्यायिक और प्रशासनिक नियंत्रण करने से संबंधित कार्यों को सम्पन्न करता है।
- वह अपने उपखण्ड में भू-अभिलेख और राजस्व ग्रामों के नक्शे तैयार करवाता है।
- वह राजस्व प्रशासन से संबंधित निम्न स्तरीय कार्मिकों और अधिकारियों जैसे- पटवारी, भू-अभिलेख निरीक्षक और गिरदावर पर नियंत्रण करता है और कानूनगो तथा तहसीलदारों के कार्यों का निरीक्षण करता है।
- वह उपखण्ड क्षेत्रों में भूमि का सर्वे और सीमाकंन कराता है, साथ ही उपखण्ड की फसलों और कृषि उत्पादन का आंकलन करवाता है उसकी रिपोर्ट तैयार करवाता है।
- उपखण्ड अधिकारी अपने क्षेत्र में भू-राजस्व संग्रहण के लिए तहसीलदार और अन्य अधीनस्थ कार्मिकों को निर्देश देता है।
- वह अपने उपखण्ड की शांति-व्यवस्था और राजस्व प्रशासन से संबंधित कार्यों की रिपोर्ट जिला कलेक्टर को प्रस्तुत करता है।
(B) न्यायिक अधिकारी के रूप में
- उपखण्ड अधिकारी अपने क्षेत्र के भू-राजस्व भूमि और सरकारी संपत्ति से संबंधित प्रारंभिक अपीलीय और पुनरीक्षण के लिए न्यायिक और अर्द्ध-न्यायिक शक्तियों का प्रयोग करता है।
- वह जिन प्रकरणों में न्यायिक अधिकारी के रूप में कार्य करता है वे प्रकरण निम्नलिखित है-
- भूमि सीमा विवाद
- चारागाह और वन भूमि विवाद
- भू-अभिलेख और पंजीकरण के विवाद
- भूमि नामान्तरण के विवाद
(C) उपखण्ड दण्डनायक के रूप में
वह उपखण्ड में सब डिवीजनल मजिस्ट्रेट के रूप में शांति व्यवस्था बनाए रखता है।
- फौजदारी प्रशासन का संचालन करने, जेल पुलिस थानों और पुलिस चौकियों का निरीक्षण करने, किसी अपराधी को पुलिस के रिमाण्ड में रखने और उपखण्ड क्षेत्र में धारा-144 लागू करने संबंधी कार्यों को सम्पन्न करता है।
(D) प्रशासनिक अधिकारी के रूप में
उपखण्ड प्रशासन में पदस्थापित लोक सेवकों पर नियंत्रण और पर्यवेक्षण से संबंधित कार्यों को संपादित करता है।
- वह उपखण्ड क्षेत्र की जनता के लिए आवश्यक उपभोग की वस्तुओं जैसे- गेहूँ, चीनी, मिट्टी का तेल, चावल आदि का उचित मूल्यों पर वितरण करवाता और उनका निरीक्षण करता है।
- वह राजस्व अभियानों के अंतर्गत आने वाली विभिन्न प्रकार की जन शिकायतों का निराकरण करता है।
- यह गाँवों में विकास कार्यक्रमों और आर्थिक एवं सामाजिक न्याय के लिए कार्य करता है।
तहसीलदार
- प्रशासनिक सुविधा की दृष्टि से प्रत्येक जिले को उपखण्डों में और उपखण्ड को तहसीलों में विभाजित किया गया है।
- तहसील राजस्व प्रशासन की एक मुख्य इकाई होती है।
- तहसील अरबी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ सरकारी मालगुजारी वसूल करने वाली प्रशासनिक इकाई होता है।
- राजस्थान में अलवर में 1791 ई. में तहसील शब्द का प्रयोग राजस्व प्रशासन में देखने को मिलता है।
- तहसील का प्रमुख अधिकारी तहसीलदार होता है।
- राजस्थान में तहसीलदार राज्य अधीनस्थ सेवा का अधिकारी होते हुए भी राजपत्रित अधिकारी होता है।
तहसीलदार के कार्य
(A) भू- राजस्व अधिकारी के रूप में
वह तहसील क्षेत्र के प्रत्येक गाँव के भू-अभिलेख, नक्शों और सूचनाओं को सुरक्षित रूप में रखता है।
- वह तहसील के सभी पटवारियों, कानूनगों और भूमि निरीक्षकों के कार्यों का निरीक्षण करता है।
- वह गाँवों की भूमि की खसरा, नक्शा, नामान्तरण और भूमि से संबंधित आवश्यक अभिलेख तैयार करवाता है।
- भू-राजस्व के दोषी व्यक्तियों (जिन्होंने भू-राजस्व को नहीं चुकाया है) की फसल की उपज या अन्य चल-अचल राजस्व संपत्ति को नीलाम एवं कुर्की कर वह भू-राजस्व को वसूल करता है।
- तहसीलदार तहसील क्षेत्र में राजस्व न्यायालय के रूप में भूमि सीमा संबंधी विवाद, गोचर एवं वन भूमि संबंधी विवाद, भूमि का नामांतरण संबंधी विवाद, भू-राजस्व वसूली संबंधी विवाद और सरकारी भूमि पर अतिक्रमण संबंधी विवादों का निपटारा करता है।
- वह अपने उपखण्ड में भू-अभिलेख और राजस्व ग्रामों के नक्शे तैयार करवाता है।
(B) न्यायिक अधिकारी के रूप में
राजस्व प्रशासन के नियमों के अंतर्गत तहसीलदार निम्नलिखित प्रकरणों की प्राथमिक सुनवाई करता है –
- तहसीलदार न्यायिक अधिकारी के रूप में काश्तकारी भूमि विवाद।
- चारागाह भूमि एवं वन भूमि विवाद
- कृषि भूमि सीमा विवाद
- लगान मुक्त भूमि की जांच एवं परीक्षण करना
- उत्तराधिकार एवं नामांतरण संबंधी विवाद
- भूमि मुआवजे के मामलों से संबंधित विवाद और संबंधी प्रकरणों
- तहसीलदार उपरोक्त प्रकरणों में दोषी व्यक्तियों को न्यायिक अधिकारी के रूप में 6 माह की सजा और 200 रुपये का जुर्माना लगा सकता है।
(C) प्रशासनिक अधिकारी के रूप में
तहसीलदार प्रशासनिक कार्यों में तहसील के कोषागार की रक्षा एवं नियंत्रण करता है।
- कृषि भूमि के विक्रय का पंजीकरण करता है।
- आम निर्वाचन में समुचित व्यवस्थाएं करता है।
- तहसील में विभिन्न प्रकार की केन्द्रीय सरकार एवं राज्य सरकार की योजनाओं का संचालन एवं पर्यवेक्षण करता है।
- सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अंतर्गत सस्ते मूल्यों की दुकानों का निरीक्षण करता है।
- कृषि उपजों, कृषि जोतों की श्रेणी, भूमि स्वामित्व, और कृषि भूमि के क्षेत्रफल से संबंधित सूचनाएँ एवं आंकड़े एकत्रित करता है।
- जन्म एवं मृत्यु का पंजीयन करता है।
- प्राकृतिक आपदाओं के समय राहत कार्यों का संचालन करता है।
- तहसीलदार अपनी तहसील के क्षेत्र का समय-समय पर दौरा करता है, जन-सुनवाई करता है तथा लोगों की समस्याओं का निराकरण करता है।
- तहसील प्रशासन में तहसीलदार को उसके कार्यों को संपन्न करने के लिए नायब तहसीलदार, कानूनगों, गिरदावर, भूमि राजस्व निरीक्षक और पटवारी सहायता करते हैं।
पटवारी
- प्रत्येक तहसील विभिन्न पटवार क्षेत्रों में विभाजित होती है।
- प्रत्येक पटवार क्षेत्र का प्रमुख अधिकारी पटवारी होता है।
- पटवारी का कार्यालय उसके कार्य क्षेत्र के प्रमुख गाँव में होता है और वह उसी गाँव में निवास करता है।
- पटवारी सरकारी प्रतिनिधि के रूप में भारत की ग्रामीण जनता के प्रत्यक्ष निकटतम रहता है।
- राजस्थान में स्वतंत्रता पूर्व राजस्व एकत्र करने का उत्तरदायी लम्बरदार का होता था लेकिन 1963 में इस लम्बरदार पद को समाप्त करके पटवारी का पद सृजित किया गया।
- पटवारी का चयन राजस्व मण्डल के द्वारा किया जाता है।
- पटवारी को विभिन्न प्रशिक्षण केन्द्रों में प्रशिक्षण दिया जाता है।
- राजस्थान में पटवारी प्रशिक्षण केन्द्र भरतपुर, टोंक, भीलवाड़ा तथा श्रीगंगानगर जिलों में स्थित है। जिनमें पटवारियों को प्रशिक्षण दिया जाता है।
पटवारी के कार्य
(A) भू -अभिलेख रखना
अपने पटवार क्षेत्र की भूमि के दस्तावेजों, नक्शों और अन्य अभिलेखों को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी पटवारी की होती है।
- इन अभिलेखों में गाँवों की भूमि की प्रकृति, क्षेत्रफल, भूमि का मालिकाना हक, फसल की स्थिति, सिंचाई के साधन, भूमि के मानचित्र और भू-राजस्व आदि का विस्तृत विवरण होता है।
- पटवारी अपने पटवार कार्यालय में गाँव की कृषि भूमि की गिरदावरी रिपोर्ट, जमाबंदी बिक्री, राजस्व वसूली पत्र, भूमि का नक्शा, संरक्षण चिह्नों की सूची, खसरा नंबर आदि अभिलेखों को सुरक्षित रखता है।
(B) भू-राजस्व संग्रहण करना
गाँव में भू-राजस्व प्राप्त करने का मुख्य उत्तरदायित्व पटवारी का होता है।
- पटवारी ही गाँव में एकत्रित किए गए भू-राजस्व को तहसील मुख्यालय के कोषागार में जमा करवाता है।
(C) आपातकालीन सहायता
गाँव में आने वाली विभिन्न प्रकार की प्राकृतिक आपदाओं जैसे- बाढ़, सूखा, अकाल, भूकंप, तूफान, ओलावृष्टि, पाला पड़ना, महामारी, टिड्डी दल का आक्रमण और फसलों का रोग लगने की स्थिति में पटवारी अपने अधीन आने वाले गाँवों में हुए नुकसान की जानकारी एवं सूचना हेतु तहसील कार्यालय को एक रिपोर्ट प्रस्तुत करता है।
(D) राजस्व अभियानों का संचालन करना
- राजस्थान में समय-समय पर राजस्व अभियानों का संचालन किया जाता है।
- राजस्व अभियानों के समय गाँवों के राजस्व संबंधी रिकार्डों या अभिलेखों को अप-टू-डेट किया जाता है।
- इन राजस्व अभियानों में ग्रामीणों की समस्याओं का निवारण करने का प्रयास किया जाता है।
- गाँवों में राजस्व अभियानों के सफल संचालन के लिए पटवारी की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है।
(E) सम्रग ग्रामी ण विकास करना
गाँवों के समग्र विकास में पटवारी और ग्राम सेवक की भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है।
- गाँवों के विकास हेतु राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गांरटी योजना, मनरेगा, 20 सूत्री कार्यक्रम, इंदिरा आवास योजना, स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना, वृद्धावस्था पेंशन योजना, सामाजिक सुरक्षा योजना आदि के संचालन में पटवारी की प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है।
(F) सरकार के विभिन्न कार्य करना
पटवारी के द्वारा समय-समय पर सरकार के विभिन्न कार्य किए जाते हैं।
- पशु गणना करना, आर्थिक गणना करना, जनगणना करना और निर्वाचन संबंधी कार्यों को करने में सहायता करना पटवारी का मुख्य दायित्व होता है।