नागरिक अधिकार पत्र
क्या है नागरिक घोषणापत्र (Citizen Charter)
- नागरिक घोषणापत्र एक ऐसा लिखित दस्तावेज है, जिसमें संगठन की अपनी सेवाओं के मानक, संगठन संबंधी सूचनाओं, पसंद और परामर्श, सेवाओं तक भेदभाव रहित पहुँच, शिकायत निवारण एवं शिष्टाचार आदि के संबंध में अपने नागरिकों के प्रति प्रतिबद्धताओं का व्यवस्थित विवरण होता है।
- नागरिक घोषणापत्र में सार्वजनिक सेवाओं का नागरिक केंद्रित होना सुनिश्चित किया जाता है।
- नागरिक घोषणपत्र सुशासन के तीन महत्त्वपूर्ण घटकों यथा- पारदर्शिता, उत्तरदायित्व एवं जवाबदेहिता को लागू करने तथा सरकार एवं नागरिकों के मध्य अंतराल को कम करने के लिए एक महत्त्वपूर्ण साधन है।
भारत में नागरिक घोषणापत्र
- ब्रिटेन में लोक सेवाओं में दक्षता लाने के लिए वर्ष वर्ष 1991 में नागरिक घोषणापत्र लागू किया गया।
- भारत में वर्ष 1997 में भारतीय प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों का सम्मेलन आयोजित किया गया।
- इस सम्मेलन में प्रभावी एवं जिम्मेदार प्रशासन हेतु एजेंडा पर सिफारिश की गई कि सभी लोक संगठनों के लिए नागरिक घोषणापत्र लाने के प्रयास किए जाए।
- इसके तहत चिन्हित मंत्रालयों एवं विभागों में नागरिक घोषणापत्र के निर्माण की निगरानी हेतु एक समिति का गठन किया गया।
- वर्ष 2004 में प्रशासनिक सुधार एवं शिकायत निवारण विभाग ने नागरिक घोषणापत्र पर एक प्रपत्र प्रस्तुत किया जिसमें आदर्श नागरिक घोषणापत्र के मार्गदर्शक सिद्धांत बताए गए।
- इसके अनुसार घोषणापत्र में निम्नलिखित बिंदु सम्मिलित होने चाहिए :-
- विज़न एवं मिशन का विवरण।
- संगठन द्वारा संपादित कार्यों का विवरण।
- संगठन से जुड़े ग्राहक समूहों का विवरण।
- ग्राहकों को प्रदत्त सेवाओं का विवरण।
- जन शिकायत निवारण से संबंधित जानकारी।
- चार्टर का सरल होना आवश्यक।
सेवा प्रदायगी में नागरिक घोषणापत्र की भूमिका
- सेवा प्रदायगी को बेहतर करना अर्थात् सार्वजनिक सेवाओं की समय पर गुणवत्तापूर्ण उपलब्धता सुनिश्चित करने में सहायक होता है।
- नागरिकों के प्रति अधिकारियों की जिम्मेदारी एवं जबावदेही को सुनिश्चित करता है।
- पारदर्शिता, उत्तरदायित्व एवं जबावदेही को सुनिश्चित कर प्रशासन में जनता की भागीदारी बढ़ाने में सहायक होता है।
- नागरिकों को जन सेवाओं की प्राप्ति संबंधी अधिकारों के प्रति जागरूक करने में सहायक होता है।
- यह सुनिश्चित करता है कि शिकायत के संबंध में कहाँ संपर्क करना है।
- कर्मचारियों में अपने कार्य के प्रति सकारात्मक दबाव एवं प्रतिबद्धता सुनिश्चित करने में सहायक होता है जिसका सीधा लाभ नागरिकों को प्राप्त होता है।
- नागरिकों एवं प्रशासन के मध्य अंतराल को कम करने में सहायक होता है।
नागरिक घोषणापत्र को प्रभावी बनाने के उपाय
- आदर्श नागरिक घोषणापत्र संहिता का पालन किया जाए।
- नागरिक घोषणापत्र बनाते समय शोध और अनुसंधान पर विशेष बल दिया जाना चाहिए।
- नागरिक घोषणापत्र के निर्माण की प्रक्रिया को पारदर्शी व परामर्शी बनाने के लिए नागरिक समाज एवं मीडिया की प्रभावी भूमिका को सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
- नागरिक घोषणापत्र का समय-समय पर पुनर्मूल्यांकन किया जाना चाहिए।
- जन प्रतिक्रियाओं के आधार पर नागरिक घोषणापत्र में सुधार किया जाना चाहिए।
- नागरिक घोषणापत्र को वैधानिक दर्जा दिया जाना चाहिए।
- ग्राहकों की अपेक्षाओं का उल्लेख किया जाना चाहिए।
नागरिक घोषणापत्र का मूल्यांकन
- वर्ष 2002-03 में प्रशासनिक सुधार एवं लोक शिकायत निवारण विभाग ने एक निजी एजेंसी द्वारा तथा वर्ष 2008 में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन द्वारा विभागीय नागरिक घोषणापत्रों का मूल्यांकन और निम्नलिखित कमियों का उल्लेख किया गया-
- अधिकांश नागरिक घोषणापत्रों का प्रारूप ठीक नहीं होता तथा उसमें महत्त्वपूर्ण सूचनाओं का अभाव होता है।
- अधिकांश घोषणापत्रों के निर्माण में पारदर्शिता एवं परामर्शी प्रक्रिया का अभाव होता है।
- नागरिक घोषणापत्रों में नवोन्मेष एवं अद्यतन जानकारियों का अभाव होता है।
- समय-समय पर पुनर्मूल्यांकन नहीं किया जाता।
- जागरूकता एवं जागरूकता प्रसार के प्रयास का अभाव पाया गया।
- लोक संगठनों में नागरिक घोषणापत्र के प्रति रुचि का अभाव देखा गया।
निष्कर्षत: नागरिक घोषणापत्र नागरिक सेवाओं को समयबद्ध एवं गुणवत्तापूर्ण बनाने तथा सुशासन की स्थापना करने में अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है परंतु इसकी कमियों को दूर किए जाने की आवश्यकता है।
1. राजस्थान लोक सेवाओं के प्रदान करने की गारंटी अधिनियम-2011
- 14 नवम्बर, 2011 को प्रभावी
- प्रथमत: 15 विभागों की 108 सेवाएं अधिसूचित की गई जिसे वर्तमान में बढ़ाकर 25 विभागों की 221 सेवाएं कर दी गई हैं।
- अधिनियम का उद्देश्य लोक प्राधिकरण द्वारा प्रदेश के नागरिकों को उनके दैनिक कार्य से संबंधित सेवाएं निर्धारित समय में प्रदान करने की गारंटी देना है।
अधिनियम का मुख्य प्रावधान
- इसमें जनता से जुड़े 25 विभाग यथा ऊर्जा, पुलिस, चिकित्सा, शिक्षा, यातायात, जन-स्वास्थ्य अभियांत्रिकी, राजस्व, स्थानीय निकाय, नगरीय विकास, आवासन, खाद्य वित्त, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता, सार्वजनिक निर्माण, जल संसाधन एवं जिला प्रशासन को सम्मिलित किया गया हैं।
- इन 25 विभागों के अन्तर्गत आम जनता से संबंधित दिन-प्रतिदिन के कार्य एवं कल्याणकारी योजनाओं के विषयों की 221 सेवाओं को समयबद्ध एवं पारदर्शी रूप से निर्धारित समय-सीमा में उपलब्ध कराने की गारंटी। आवश्यकता होने पर और अधिक सेवाओं को जोड़ा जा सकता हैं।
- किसी विभाग का कोई अधिकारी कर्मचारी उसकी परिधि में घोषित सेवाओं को निर्धारित समय-सीमा में प्रदान नहीं करता है तो कम से कम रु. 500 से लेकर अधिकतम रु. 5000 तक के आर्थिक दण्ड का प्रावधान।
- यदि वह सेवा करने में अनावश्यक विलम्ब करता है तो प्रतिदिन रु. 250 (अधिकतम रु. 5000) का आर्थिक दण्ड।
- अधिकारी अथवा उसके द्वारा अधिकृत व्यक्ति द्वारा आवेदक को पावती देनी होगी।
2. राजस्थान जन सुनवाई का अधिकार अधिनियम-2012
- राजस्थान सुनवाई का अधिकार अधिनियम 2012 राज्य में 1 अगस्त, 2012 से लागू किया गया है।
- अधिनियम में विभिन्न स्तरों पर सुनवाई अधिकारी, अपील अधिकारी नियत कर, शिकायतों पर 15 दिवस में सुनवाई का समय सीमा निर्धारित की गई है।
- समयावधि में सुनवाई नहीं होने पर इस अधिनियम में भी 2 अपीलों का अवसर सुनवाई हेतु प्रदान किया गया है।
- आमजन की सहायता एवं सुविधा के लिए सभी प्रकार के आवेदन एक ही स्थान पर जमा करने की व्यवस्था के तहत प्रत्येक ग्राम पंचायत मुख्यालय पर एकल खिड़की के रूप में “लोक सुनवाई सहायता केन्द्र” स्थापित कराए गए हैं।
लोक सुनवाई अधिकारी
- सुनवाई का अधिकार सुनिश्चित करने के लिए प्रदेश सरकार के हर दफ्तर और विभाग में एक लोक सुनवाई अधिकारी नियुक्त होगा।
- इनसे संतुष्ट न होने पर अपीलीय अधिकारी के पास मामला जाएगा जो दोनों पक्षों को सुनकर दंड तय किया जाएगा। जनता की नहीं सुनी तो अफसर पर रुपये 5000 का जुर्माना होगा।
इस जन सुनवाई अधिनियम से
- राजस्थान लोक सेवा प्रदान की गारन्टी अधिनियम 2011 के लिए अधिसूचित 153 सेवाओं को प्राप्त करने में आने वाली कठिनाइयों का समाधान।
- राज्य एवं केन्द्र की सभी जन कल्याणकारी योजनाओं तथा कार्यक्रमों के क्रियान्वयन का लाभ प्राप्त करने में आमजन की कठिनाइयों का निराकरण।
- समय लगने वाली प्रक्रिया को सुगम करने हेतु निर्धारित सुगम केन्द्रों से मदद तथा जवाबदेही के साथ निस्तारण की समयबद्ध व्यवस्था।
3. राजस्थान राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण
- राज्य में नि:शुल्क व सक्षम विधिक सेवा उपलब्ध कराने के लिए विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के अन्तर्गत 7 अप्रैल, 1988 को जयपुर में राजस्थान राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण का गठन किया गया।
- राष्ट्रीय स्तर पर इस हेतु नई दिल्ली में राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (नाल्सा – National Legal Services Authority) का गठन किया गया है।
- प्रदेश में सभी नागरिकों को समान अवसर के आधार पर न्याय सुलभ हो और कोई भी नागरिक आर्थिक या किसी अन्य निर्योग्यता के कारण न्याय प्राप्त करने से वंचित न रहे, के लिए प्रदेश में राजस्थान राज्य विधिक सेवा प्राधिनियम नियम 1995, विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 (यथा संशोधित) एवं राजस्थान राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण विनियम, 1999 के प्रावधानों के तहत राजस्थान राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण व इसके अधीन जिला विधिक प्राधिकरण, उच्च न्यायालय विधिक साक्षरता, लोक अदालत, मीडियेशन, पैरालीगल क्लीनिक एवं केन्द्रीय व राज्य सरकार, राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण व राजस्थान राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण द्वारा समाज के विभिन्न कमजोर वर्गों के कल्याण के लिए निर्देशित विभिन्न योजनाओं का क्रियान्वयन किया जा रहा है।
4. राजस्थान सिविल सेवा अपील अधिकरण
- राज्य कर्मचारियों के सेवा संबंधी मामलों तथा आनुषांगिक विवादों के निपटारे के लिए राजस्थान विधानसभा द्वारा पारित राजस्थान सिविल सेवा (सेवा मामलों के लिए अपील अधिकरण) अधिनियम, 1976 क तहत 1 जुलाई, 1976 को जयपुर में राजस्थान सिविल सेवा अपील अधिकरण का गठन किया गया।
- अधिकरण की जोधपुर के लिए एक चलपीठ का गठन 30 अक्टूबर, 1996 के द्वारा किया गया है।
- जयपुर एवं जोधपुर में केन्द्रीय प्रशासनिक अपीलीय न्यायाधिकरण (CAT) कार्य कर रहा है, जिसका क्षेत्राधिकार सम्पूर्ण राजस्थान है।