कम्प्यूटर नेटवर्क
(Computer Network)
परिभाषा - दो या दो से अधिक परस्पर जुड़े हुए कम्प्यूटर व डिजिटल युक्तियाँ को जोड़ने वाली व्यवस्था को कम्प्यूटर नेटवर्क कहते हैं। ये कम्प्यूटर आपस में इलेक्ट्रोनिक सूचना का आदान-प्रदान कर सकते हैं और आपस में तार या बेतार से जुडे़ रहते हैं। सूचना का यह आवागमन होता है, जिसे प्रोटोकॉल कहते हैं कई नेटवर्क जब एक साथ जुड़े होते हैं उन्हें इंटरनेटवर्क कहा जाता है, जिसका संक्षिप्त रूप इन्टरनेट (अंतर्जाल, Internet) काफ़ी प्रचलित है।
सूचनाओं के आदान प्रदान के लिए एनालॉग तथा डिजिटल विधियों का प्रयोग किया जाता है। नेटवर्क के उपादानों में तार, हब, स्विच, राउटर आदि उपकरणों के नाम से जाना जाता है। कम्प्यूटर नेटवर्किंग में बेतार नेटवर्क का प्रभाव बढ़ता जा रहा है। कम्प्यूटर नेटवर्क का उपयोग इलेक्ट्रॉनिक संचार में किया जाता है। इसके माध्यम से एक स्थान से दूसरे स्थान पर सूचना भेजने की प्रक्रिया को दूरसंचार कहते हैं। एक या एक से अधिक कम्प्यूटर और विविध प्रकार के टर्मिनलों के बीच ऑकड़ों/सूचनाओं को भेजना या प्राप्त करना कम्प्यूटर नेटवर्क कहलाता है।
कम्प्यूटर नेटवर्क
- कम्प्यूटर नेटवर्क से आशय दो या दो से अधिक कम्प्यूटर के जुड़ने से है।
- दो या दो से अधिक कम्प्यूटर या डिवाइस को जोड़कर बनाया गया क्षेत्र, कम्प्यूटर नेटवर्क कहलाता है।
- कम्प्यूटर नेटवर्क के द्वारा डेटा व सूचनाओं का आदान-प्रदान किया जाता है।
- नेटवर्क के द्वारा डेटा, निर्देश, फाइल इत्यादि को एक कम्प्यूटर से अन्य कम्प्यूटर पर भेजा जाता है।
- कम्प्यूटर नेटवर्क के द्वारा कम से कम डिवाइस का अधिकतम प्रयोग किया जा सकता है।
- कम्प्यूटर नेटवर्क की शुरुआत अमेरिका में 1969 ई. में की गयी।
- शुरुआत में कम्प्यूटर नेटवर्क का नाम ARPANET (अरपानेट) रखा गया।
- ARPANET – Advance Research Project Agency Network
कम्प्यूटर नेटवर्क के द्वारा एक कम्प्यूटर से दूसरे कम्प्यूटर में डेटा और हार्डवेयर को शेयर करता है ।
Computer, printer आदि जैसे नेटवर्क पर data या information भेजने और प्राप्त करने के लिए node से जोड़ा जाता है, और Nodes को जोड़ने वाली link को communication channel कहा जाता है।
नेटवर्क शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है – पहला नेट अर्थात् ‘जाल’ और दूसरा वर्क का अर्थ ‘कार्य करने’ से है ।
कम्प्यूटर नेटवर्क के लाभ एवं विशेषताएँ –

कम्प्यूटर नेटवर्क के उपयोग
कम्प्यूटर सिस्टम और उनके उपकरणों को नेटवर्क द्वारा जोड़ने से कई प्रकार के फायदे होते हैं –
कम्प्यूटर नेटवर्क के प्रकार
कम्प्यूटर नेटवर्क में प्रत्येक कम्प्यूटर और अन्य डिवाइस को किसी दूसरे डिवाइस के साथ जोड़ दिया जाता है लेकिन इसे आपस में जोड़ने के कई तरीके और माध्यम होते हैं । अत: भौगोलिक क्षेत्रों को आधार मानकर कम्प्यूटर नेटवर्क को कई भागों में विभाजित किया गया है जैसे
1. LAN
2. MAN
3. WAN
1. LAN (Local Area Network/लोकल एरिया नेटवर्क) :-
- कम्प्यूटर नेटवर्क को भौगोलिक क्षेत्र के आधार पर बांटा गया है, जिसमें सबसे छोटा क्षेत्र LAN कहलाता है।
- एक सीमित भौगोलिक क्षेत्र में दो या दो से अधिक जोड़े गये कम्प्यूटर नेटवर्क लोकल एरिया नेटवर्क कहलाते हैं।
- इसका क्षेत्र लगभग 1 किलोमीटर हो सकता है।
- उदाहरण– एक बिल्डिंग, एक ऑफिस, विश्वविद्यालय, घर, विद्यालय, हॉस्पिटल आदि में उपयोग किये जाने वाला छोटा नेटवर्क LAN होता है।

2. MAN (Metropolitan Area Network/
मेट्रोपॉलिटन एरिया नेटवर्क) :-
- एक शहरी भौगोलिक क्षेत्र में दो या दो से अधिक कम्प्यूटर अथवा दो या दो से अधिक नेटवर्क को जोड़ा जाए तो बनने वाला नेटवर्क मेट्रो एरिया नेटवर्क कहलाता है।
- जैसे किसी एक संस्था के शहर में दो अलग-अलग स्थानों पर लगे कम्प्यूटर नेटवर्क को एक साथ जोड़ना MAN कहलाता है।
- इस नेटवर्क की सीमा लगभग 200-300 किमी तक हो सकती है। यह नेटवर्क पर तथा क्षेत्र पर आधारित होता है।

3. WAN (Wide Area Network/ वाइड एरिया नेटवर्क) :-
- विस्तृत या विशाल भौगोलिक क्षेत्र में फैला गया कम्प्यूटर नेटवर्क वाइड एरिया नेटवर्क कहलाता है इसमें हजारों किलोमीटर दूर स्थित नेटवर्क को जोड़ा जा सकता है।
- कम्प्यूटर नेटवर्क का सबसे बड़ा नेटवर्क WAN होता है।
- इस नेटवर्क में अधिक दूरी के कारण संचार उपग्रह, संकेतों आदि का प्रयोग किया जाता है।

• अन्य नेटवर्क –
• PAN (Personal Area Network/
पर्सनल एरिया नेटवर्क) :-
- आजकल कम्प्यूटर के साथ अन्य डिवाइस में भी नेटवर्क का चलन बढ़ता जा रहा है, ऐसे नेटवर्क जो एक सीमित क्षेत्र में दो डिवाइस को निजी क्षेत्र के आधार पर जोड़ते हैं तो उसे पर्सनल एरिया नेटवर्क कहते हैं।
जैसे – वायरलैस संकेत, ब्लुटूथ, वाई-फाई आदि।
नेटवर्किंग डिवाइस :-
कम्प्यूटर नेटवर्क में जब दो या दो से अधिक डिवाइस को आपस में जिस डिवाइस के द्वारा जोड़ा जाता है उसे नेटवर्किंग डिवाइस कहते हैं।
1. NIC :- Network Interface Card

2. HUB :- हब
- हब एक नेटवर्किंग डिवाइस होती है जिसके द्वारा लोकल एरिया में उपस्थित कम्प्यूटरों को आपस में जोड़ा जाता है।
- हब में कई पोर्ट्स लगे होते हैं जो डिवाइस को जोड़ने का कार्य करते हैं।
- हब में एक पोर्ट पर डेटा पैकेट्स आता है तो उसे अन्य पोर्ट से भी उपयोग किया जा सकता है।


3. Switch :- स्विच
- स्विच भी एक हार्डवेयर नेटवर्किंग डिवाइस है इसके द्वारा नेटवर्क के कम्प्यूटर और डिवाइस को आपस में जोड़ा जाता है। स्विच और हब लगभग समान प्रकार से ही उपयोग में लिए जाते हैं लेकिन स्विच के द्वारा डेटा को केवल गन्तव्य स्थान (कम्प्यूटर) पर भेजा जाता है।

4. ब्रिज (Bridge) :-
- ब्रिज दो समान प्रोटोकॉल रखने वाले नेटवर्क को जोड़ने का कार्य करता है।

5. राउटर (Router) :-
- दो या दो से अधिक नेटवर्क को जोड़ने के लिए राउटर का प्रयोग किया जाता है। इसके द्वारा सूचनाऐं अपने गन्तव्य स्थान पर पहुँच जाती है। राउटर राउटिंग टेबल का भी प्रयोग करता है जिसमें सूचनाएँ रखी जाती है।
- राउटर OSI मॉडल के नेटवर्क लेयर पर कार्य करते हैं।

6. गेट वे (Gateway) :-
- दो या दो से अधिक भिन्न प्रोटोकॉल रखने वाले नेटवर्क को गेटवे के द्वारा जोड़ा जाता है।
7. रिपीटर :-
- इस नेटवर्किंग डिवाइस के द्वारा सिग्नल को गति दी जाती है अर्थात् निम्न स्तर के सिग्नल को उच्च स्तर में बनाकर जोड़ा जाता है।

RJ-45 connector –
• डुप्लेक्स चैनल (Duplex Channel)
- संचार चैनल :-
- दो डिवाइस के मध्य संचार माध्यम को डुप्लेक्स चैनल कहा जाता है। यह निम्न तीन प्रकार के होते हैं-
1. सिम्प्लेक्स चैनल :- इस विधि में डेटा हमेशा एक ही दिशा में प्रवाह होता है। जैसे - रेडियो, कीबोर्ड आदि।
2. हाफ डुप्लेक्स चैनल :- इस विधि में डेटा का दोनों दिशाओं में प्रवाह होता है लेकिन एक समय में एक ही तरफ डेटा प्रवाह होता है। जैस – टेलीफोन, वॉकी-टॉकी, ब्लुटूथ आदि।

3.फुल डुप्लेक्स चैनल :- इस चैनल में एक समय में दोनों दिशाओं में डेटा प्रवाह होता है। जैसे – वाई-फाई, ऑनलाइन मैसेज आदि।

कम्प्यूटर संचार :-
एक कम्प्यूटर से दूसरे कम्प्यूटर तक डेटा और सूचना के आदान प्रदान को डेटा संचार कहते है ।आज के इस सूचना प्रौद्योगिकी के युग में घर बेठे हुए कम्प्यूटर और इन्टरनेट से जुड़कर आसानी से कार्य किया जा सकता है ।जैसे:- रेलवे रिज़र्वेशन ,होटल रिज़र्वेशन , हवाई यात्रा का टिकेट हम आसानी से घर पर प्राप्त कर सकते हैं यह सब कम्प्यूटर नेटवर्क और कम्प्यूटर संचार के कारण ही संभव हो पाया है ।
Data communication कुछ सरल शब्दों में सीखे तो इसकी परिभाषा इस प्रकार है किन्हीं दो डिवाइसेज के बीच में Data लेनदेन को Data communication कहते हैं।
* सेंडर (Sender):- जो डेटा को भेजता है वह Sender कहलाता है जिसको सोर्स भी कह सकते है, जहाँ से डेटा जनरेट किया जाता है।
* रिसीवर (Receiver):- Sender द्वारा भेजे गए डेटा को Receive करता है या प्राप्त करता है उसे रिसीवर (Receiver) कहते हैं या डेस्टिनेशन कहते हैं।
* ट्रांसमिशन मीडियम (Transmission Medium):- वह रस्ता या वह डिवाइस जिसकी सहायता से Sender रिसीवर को डेटा भेजता है।
ट्रांसमिशन मीडिया
सन्देश भेजने वाला और प्राप्त करने वाला जब डेटा को एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजता है तो वह किसी न किसी माध्यम का उपयोग करता है यह माध्यम दो प्रकार के होते हैं 1 तार के द्वारा 2 बेतार के द्वारा।
केबल के द्वारा :- इस माध्यम में तार या केबल का प्रयोग करके डेटा को एक डिवाइस से दूसरी डिवाइस पर भेजा जाता है, इसमें निम्न केबल का प्रयोग किया जाता हैं जैसे –
1. ट्विस्टेड पेअर केबल
2. कोअक्षिअल केबल
3. ऑप्टिकल फाइबर केबल
Twisted pair cable –
Twisted Pair Cable एक ऐसी वायर होती है जिसमे दो वायर आपस में एक दूसरे से Twisted होती हैं । इस Cable में प्लास्टिक के अन्दर 4 Pairs होते हैं और 1 pair से 2 वायर लिपटी होती है और सभी का अलग अलग कलर कोड होता है । यह LAN Network में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली Cable है
Twisted Pair Cable 2 तरह की होती है ।
1. UTP (Unshielded Twisted pair) यह Un-Shielded Twisted Pair Cable होती है मतलब इसमें कोई अलग से शील्डिंग या कवर नहीं होता है, जैसा की आप UTP केबल में देख सकते हैं । यह केबल आम तौर पर 100 मीटर तक 1GBps से 10GBps तक डेटा को ट्रांसफर कर सकती हैं ।
2. STP (Shielded Twisted pair) – यह Shielded Twisted Pair Cable होती है । इस Cable में एक अतिरिक्त Shield होती हैं जिससे इसमें डेटा Secure हो जाता है और Data Transfer की Speed भी बढ़ जाती है ।
Twisted pair Cable के लाभ अथवा फायदे जो नीचे दिए गए हैं ।
अन्य Cables की तुलना में यह Cables सस्ती होती हैं ।
• इसकी Installation करना काफी सिंपल है ।
• इसके द्वारा किसी भी Device को नेटवर्क से कनेक्ट करना बहुत ही आसान हैं ।
Coaxial cable
Coaxial Cable में मुख्य एक ताँबे का तार होता है जिसे कोर कहते है । कॉपर वायर के ऊपर Insulation की एक परत होती हैं और उसके ऊपर ताम्बे की Copper Mesh । इसकी डेटा को ट्रांसफर करने की दूरी लगभग 185 मीटर तक होती है । Coaxial Cable की Installation करना Easy हैं, लेकिन यह काफी लचीली-और कमजोर होती है जिससे इसका टूटने का ज्यादा डर रहता था । Coaxial Cable का इस्तेमाल मुख्यतया Bus Topology में किया जाता है ।
कोअक्षिअल केबल दो प्रकार की होती है।

1. Thinnet
2. Thiknet
थिननेट – इसका उपयोग ज्यादा किया जाता हे यह सस्ती , लचीली और आसान होती है ।
थिकनेट – यह केबल मोटी होती है जिसे आसानी से मोड़ा नहीं जा सकता इसका उपयोग टीवी केबल आदि में किया जाता हे
•डेटा का सुरक्षित ट्रांसमिशन करना ।
•क्रॉस टॉक से डेटा को सुरक्षित करना ।
Fiber optic Cable

यह Cable ग्लास से बनी होती है Fiber Optic Cable ने Internet की दुनिया में क्रान्तिकारी परिवर्तन किया है, आज सारे देश इन्टरनेट के द्वारा एक दूसरे से जुड़े हैं, जिसमे Fiber optic Cable की बहुत बड़ी भूमिका है Fiber Optic Cable एक Advanced Transmission Media है जिसका उपयोग Data को High Speed तथा लम्बी दूरी में Transmit करने के लिए किया जाता है ।
Fiber Optic Cable अब तक Networking की दुनिया में Data को सबसे तेज गति से transfer करने वाली Cable है , इसलिए इसका इस्तेमाल submarine communications में ज्यादा होता है, मतलब एक देश के नेटवर्क को दूसरे देश के नेटवर्क से जोड़ने के लिए Fiber Optic Cable का इस्तेमाल किया जाता हैं । इस केबल में DATA Light signal की form में Travel करता है, और Data Destination पर पहुँचते ही Light signal से Digital signal में Convert हो जाता हैं ।
इस केबल में डेटा संचार की स्पीड 100 मेगाबाइट प्रति सेकंड से 2 गीगा बाइट प्रति सेकंड होती है।
बेतार माध्यम
इस माध्यम में बिना केबल के अर्थात् संकेतों के द्वारा डेटा को एक डिवाइस से दूसरे डिवाइस की ओर भेजा जाता है
वायरलेस ट्रांसमिशन मीडिया :- एक कम्प्यूटर से दूसरे कम्प्यूटर पर डेटा के लेन-देन के लिए बिना तार का प्रयोग बेतार कहलाता है। इसमें सिग्नल का प्रयोग करके एक कम्प्यूटर से दूसरे कम्प्यूटर को जोड़ा जाता है। इसमें कई माध्यम उपयोग में लिये जाते हैं।
1. रेडियो तरंग :- इस तरंग का उपयोग लम्बी दूरी पर डेटा को पहुँचाने के लिए किया जाता है। यह ऊँची इमारतों या अन्य रुकावटों को भी आसानी से पार कर लेता है। यह संकेत सभी दिशाओं में विचरण कर सकते हैं। इसमें डेटा भेजने वाला एवं प्राप्त करने वाला का एक ही पंक्ति में रहना आवश्यक नहीं होता है। रेडियो प्रसारण में VHF, UHF तथा SHF का उपयोग करके तीव्र गति से डेटा संचारण किया जा सकता है।
2. सूक्ष्म तरंग प्रसारण (माइक्रो वेव सिग्नल) :- इसमें उच्च आवृत्तिकी रेडियों तरंगों का उपयोग किया जाता है। जिन स्थानों पर केबल का प्रयोग करना मुश्किल होता है। वहाँ इस सिग्नल का प्रयोग आसानी से किया जा सकता है। यह माइक्रो वेव सिग्नल एक सीधी रेखा में चलने वाले सिग्नल होते हैं अर्थात् प्रेषण तथा ग्राही के मध्य यदि कोई रुकावट आती है तो सिग्नल एक स्थान से अन्य स्थान पर नहीं जा पाता है। इसीलिए ज्यादातर इनके टॉवर को ऊँचे स्थानों पर लगाया जाता है। यदि इन सिग्नलस् में कमी आ रही हो तो सामान्यत: 25 से 30 किलोमीटर की दूरी पर रिपीटर लगाए जाते हैं। यह रिपीटर संकेतों को परिवर्धित कर देते हैं। माइक्रो वेव संचरण अधिकांशत: लम्बी दूरी टेलीफोन संचार फोन टी.वी आदि के प्रसारण में प्रयुक्त किए जाते हैं। मौसम आदि के खराब होने पर यह सिग्नल कमजोर हो जाता है।
3. उपग्रह संचरण (सैटेलाइट संकेत) :- सैटेलाइट संकेतों में सूक्ष्म तरंगों का ही उपयोग किया जाता है। लेकिन इसमें सीधी रेखा की समस्या नहीं रहती है। यह संचार उपग्रह भू-मध्य रेखा से 36 हजार किलोमीटर ऊँचाई पर एक कक्षा में स्थापित होता है। इसमें संचार उपग्रह को ही एक माइक्रो वेव रिले स्टेशन माना जा सकता है। जिससे पृथ्वी पर प्रेषण एवं ग्राही स्टेशन संकेतों को किसी भी स्थान से प्राप्त कर सकते हैं। इस संचरण में 6 गीगा हर्ट्ज आवृत्ति के संकेतों को पृथ्वी से अंतरिक्ष में उपग्रहों को भेजा जाता है। लम्बी दूरी के कारण यह संकेत कमजोर हो जाते हैं। इसलिए इनमें ट्रांसपोंडर का प्रयोग करके संकेतों को शक्तिशाली बनाया जाता है। इस प्रकार से उपग्रहों को संकेत भेजने व प्राप्त करने के लिए अलग-अलग आवृत्तियों का उपयोग किया जाता है। इस संकेत का उपयोग अत्यधिक लम्बी दूरी जैसे टेलीफोन संचार, टेलीविजन कार्यक्रम, अंतर्राष्ट्रीय संचार आदि में किया जाता है।
4. इन्फ्रारेड संकेत :- इसका उपयोग कम दूरी में डेटा के लेन-देन के लिए किया जाता है। इसमें अवरक्त किरणों का उपयोग किया जाता है। यह किरणें तीव्र आवृत्ति पर कार्य करती है। जैसे - टी.वी. को रिमोट के द्वारा संचालित करना।
5. ब्लूटूथ :- यह भी बिना तारों के विभिन्न उपकरणों को आपस में जोड़ने का आसान तरीका है। जिसमें ब्लूटूथ सिग्नल का प्रयोग किया जाता है। जैसे – कम्प्यूटर, मोबाइल, टेबल, लेपटॉप, प्रिन्टर, डिजिटल कैमरा, विडियो गेम आदि को जोड़ने के लिए इसका उपयोग किया जाता है।
6. वाईफाई :- इसका पूरा नाम वायर लैस फिडैलिटी है। वाईफाई एलाइन्स कम्पनी का ट्रेड मार्क है। इसके द्वारा लॉकल एरिया नेटवर्क को बिना केबलके आपस में जोड़ा जाता है। यह वायरलेस नेटवर्क बनाता है। जो IEEE पर आधारित है। वाईफाई संचार के लिए इस्तेमाल रेडियो तरंगे सेल फोन और रेडियो के समान होती है। इनकी आवृत्ति 2.4 गीगा हर्ट्ज से 5 गीगा हर्ट्ज होती है। जो सेल फोन की आवृत्तिसे बहुत तेज होती है। वाईफाई संचार में 802.11 नेटवर्किंग मानक का उपयोग किया जाता है।
डेटा संचरण का रूप :- डेटा संचरण में विद्युत संकेत का प्रयोग किया जाता है। यह दो प्रकार के होते हैं। 1. एनालॉग
2. डिजिटल
1. एनालॉग :- यह संकेत समय के सापेक्ष सतत रूप से परिवर्तित होते रहते हैं। यह संकेत निम्न से उच्च की ओर गति करते हैं। जैसे टेलीफोन सिस्टम एनालॉग डेटा संचरण का उदाहरण है।
2. डिजिटल :- यह संकेत असतत होते हैं जिसमें ऑन व ऑफ की अवस्था में डेटा संचरित किया जाता है।
टोपोलॉजी (Topology) :-
- नेटवर्क के फिजिकल स्ट्रक्चर को या फिजिकल लेआउट को टोपोलॉजी कहते हैं।
- नेटवर्क में कम्प्यूटर को जोड़ने का तरीका टोपोलॉजी कहलाता है।
- यह निम्न प्रकार की होती हैं-
1. Bus
2. Ring
3. Star
4. Mesh
5. Hybrid
1. Bus Topology बस टोपोलॉजी :-
इस टोपोलॉजी में नेटवर्क की सभी डिवाइस या कम्प्यूटर एक ही केबल के माध्यम से जुड़े होते हैं। यह टोपोलॉजी सीमित क्षेत्र के लिए प्रयोग में ली जाती है। इसमें इथरनेट डिवाइस का प्रयोग किया जा सकता है।

2.Ring Topology रिंग टोपोलॉजी :-
इस टोपोलॉजी में पहला कम्प्यूटर दूसरे से और इसी प्रकार अन्य कम्प्यूटर जुड़े होते हैं। अंतिम कम्प्यूटर प्रथम कम्प्यूटर से जुड़ जाता है तो यह रिंग की तरह संरचना बनाता है इसलिए इसे रिंग टोपोलॉजी कहते हैं। इस टोपोलॉजी में टोकन पासिंग सिस्टम का प्रयोग किया जाता है। इस टोपोलॉजी में डाटा एक दिशा में गति करता है।

3. Star Topology स्टार टोपोलॉजी :-
इस टोपोलॉजी में एक मध्य नेटवर्किंग डिवाइस या कम्प्यूटर होता है जो नेटवर्क में कम्प्यूटर के मध्य डाटा को एक डिवाइस से दूसरी डिवाइस पर पहुँचाता है।

4. Mesh Topology मैश टोपोलॉजी :-
इस टोपोलॉजी में नेटवर्क में उपस्थित सभी डिवाइस व कम्प्यूटर आपस में एक-दूसरे से सीधे जुड़े होते हैं।
5. Hybrid Topology हायब्रिड टोपोलॉजी :-
इस टोपोलॉजी में एक से अधिक टोपोलॉजी को एक साथ जोड़ा जाता है इसलिए इसे हाइब्रिड टोपोलॉजी कहा गया है।

• सर्वर-क्लाइन्ट रूप :-
- सर्वर :- नेटवर्क में मुख्य कम्प्यूटर सर्वर कहलाता है जिस पर डाटा को स्टोर किया जाता है और यह क्लाइन्ट से प्राप्त रिक्वेस्ट को रेसपोंस देता है।
- क्लाइन्ट :- नेटवर्क के सभी कम्प्यूटर जिससे यूजर जुड़ा होता है, क्लाइन्ट कहलाता है। जिस पर इनपुट आउटपुट का कार्य होता है।