पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी

पर्यावरण:-  
- 5 जून, 1972 मे  स्टोक होम सम्मेलन हुआ।
- 5 जून – पर्यावरण दिवस मनाया जाता है।

पारिस्थितिकी:-
-  यह शब्द रिटर ने दिया था।
- विस्तार से अध्ययन  O.P. ओडम द्वारा किया गया।
- father of indian ecology  p. रामदेव मिश्रा को कहा जाता है।
-
पर्यावरण के जैविक तथा अजैविक, घटकों का अध्ययन पारिस्थितिकी कहलाता है।

जीव:– 
- पर्यावरण की इकाई जीव कहलाती है।
- जीव एक कोशिका से लेकर अनेक कोशिकाओं से मिलकर बना होता है।
- जीवों का एक जीवन चक्र होता है।

प्रजाति के प्रकार:-
1. Key stone species:- 
- जीवों का वह समूह जिसकी तंत्र में संख्या कम हो लेकिन तंत्र पर प्रभाव सर्वाधिक होता है जैसे – शेर, बाघ।

2. एनेडेमिक प्रजाति:– 
- जीवों का वह समूह हो निश्चित भौगोलिक क्षेत्र में निवास करता है, उसे एनेडेमिक प्रजाति कहा जाता है। जैसे – ऑस्ट्रेलिया का कंगारू, न्यूजीलैण्ड में कीवी

3. अम्ब्रेला प्रजाति:–
- जीवों का वह समूह जिसको बचाने के लिए सरकार द्वारा विशेष प्रयास किये जाते हैं, उसे एम्ब्रेला प्रजाति कहा जाता है। जैसे- गोडावण, बाघ, शेर

4. (Indicator)सूचक प्रजाति:-
- जीवों का वह समूह जो पर्यावरण की स्थिति को प्रदर्शित करता है। जैसे – ई-कोलाई – जल प्रदूषण की सूचक लाइकेन – वायु प्रदूषण का सूचक, so2 प्रदूषण का सूचक
जीव – समष्टि- समुदाय – पारिस्थितिकी तंत्र

समुदाय:–
- किसी निश्चित भौगोलिक क्षेत्र की विभिन्न प्रजातियों के जीवों की कुल संख्या समुदाय कहलाती है।

A. सकारात्मक संबंध:-

1. सहजीवी संबंध:–
- इस प्रकार के संबंध जिससे दोनों जीवों को लाभ होता है। जैसे–
(i) लाइकेन – शैवाल + कवक
(ii) माइकोराइजा – उच्च पादप(साइकस पादप) + कवक  
(iii) राइजोबियम जीवाणु तथा लेग्यूमिनेसी पादप में (दालों वाले पौधे) N2 78% होती है।
N = N (strong covalent land)

2. सहभोजिता:-
- जिसमें एक जीव को लाभ तथा दूसरे जीव को ना लाभ,  ना हानि होती है।
उदाहरण :- अधिपादप (आरोही पादप) जैसे- बैल (चरती हुई गाय के पास मक्खियों का भिनभिनाना)

B. नकारात्मक संबंध:–

1. परजीवी :–
- जीवों के मध्य ऐसा संबंध जिसमें एक जीव को लाभ हो तथा दूसरे जीव को हानि हो।
- परजीवी हमेशा छोटा होता है तथा वह लाभ में रहता है।  
- पोषक बड़ा होता है तथा वह हानि में रहता है।

A. बाह्य परजीविता:-
- इसमें परजीवी पोषक के शरीर के ऊपर होता है।जैसे – मानव + मच्छर, मानव + जूँ, अमरबेल + अन्य पादप

B. आंतरिक परजीविता:–
- इसमें परजीवी पोषक के शरीर के अंदर होता है।
जैसे – मानव + रोगाणु
मानव + मलेरिया

C. नीड परजीविता:–
- ऐसे परजीविता, जिसमें कोई पक्षी दूसरों के घोसलों में अंडा देता है। जैसे – कोयल, कौओं के घोंसले में अंडा देती है।
प्रतिस्पर्धा/संबंध:- एक जीव को लाभ तथा दूसरे जीव को हानि होती

है।

एमेनचलिज्म:–
- एक को हानि, दूसरे को ना लाभ ना हानि होती है। जैसे – बबूल के पौधे के पास दूसरा पौधा विकास नहीं कर पाता है।

Eco-system:–
- पर्यावरण की क्रियात्मक इकाई पारिस्थितिकी तंत्र कहलाती है।
- पर्यावरण के जिस घटक का अध्ययन किया जाता है, उसे पारिस्थितिकी तंत्र कहते हैं।
- वैज्ञानिक ए.जी. टेन्सले ने पारिस्थितिकी तंत्र शब्द दिया था।
- ओडम ने पारिस्थितिकी तंत्र का विस्तार से अध्ययन किया था।
- Eco system छोटा तथा बड़ा हो सकता है। जैसे – पानी की एक बूंद या ग्रह का अध्ययन
करना।

जैविक घटक:–
- प्रकृति के सजीव घटक सम्मिलित है-

1. उत्पादक:–
- प्रकृति के ऐसे जीव जो अपने भोजन का निर्माण स्वयं करते हैं।
(transducer):–
- वर्तमान में उत्पादक को transducer कहा जाता है, जो प्रकाशीय ऊर्जा को रासायनिक ऊर्जा में परिवर्तित करते हैं। जैसे – हरे पेड़-पौधे – ये प्रकाश संश्लेषण के द्वारा अपने भोजन का निर्माण स्वयं करते हैं।
- नील हरित शैवाल (साइनो बैक्टीरिया), शैवाल, सुनहरा शैवाल आदि।
Note:–
- सल्फर बैक्टीरिया, आयरन बैक्टीरिया उत्पादक तो है पर वह प्रकाश संश्लेषण नहीं करते हैं।
- अमरबेल/कस्कूटा – उत्पादक की श्रेणी में नहीं आता है और प्रकाश संश्लेषण भी नहीं करता है।

2. उपभोक्ता-(consumer):-
- प्रकृति के ऐसे जीव, जो भोजन के लिए उत्पादकों पर निर्भर रहते हैं उन्हें उपभोक्ता कहा जाता है।

Consumers are of three types-

A. प्राथमिक उपभोक्ता:-
- प्रकृति के ऐसे जीव जो भोजन के लिए प्रत्यक्ष रूप से उत्पादकों पर निर्भर रहते हैं। जैसे – शाकाहारी जीव- गाय, बकरी, हरिण, खरगोश, तोता, मैना, घोड़ा, मवेशी आदि।

B. द्वितीयक उपभोक्ता:-
- इस प्रकार के जीव जो अपना भोजन प्राथमिक उपभोक्ता से ग्रहण करते हैं, और खुद किसी ओर के शिकार बनते हैं।
उदाहरण- यूटेकुलिरिस तथा नैफ्थींज घटपर्णी पादप है, जो द्वितीयक उपभोक्ता में आते हैं, जो नाइट्रोजन आपूर्ति के लिए सूक्ष्म जीवों को अपने अंदर ले लेते हैं।

C. तृतीयक उपभोक्ता/शीर्षस्थ उपभोक्ता-
- ये अपना भोजन प्राथमिक तथा द्वितीयक उपभोक्ता से ग्रहण करते हैं तथा ये अन्य जीवों को शिकार नहीं बनाते हैं।

उदाहरण:-
- उच्च मांसाहारी, सर्वाहारी जैसे – शेर, बाघ, तेंदुआ, बाज, मानव

अपघटक/अपमार्जक/मृतोपजीवी:-
- इस प्रकार के जीव अपना भोजन मृत जीवों से प्राप्त करते हैं।
- ये अपना भोजन जटिल कार्बनिक पदार्थों से ग्रहण करते हैं।
- ये जटिल कार्बनिक पदार्थों को सरल कार्बनिक पदार्थों में तोड़ते हैं।
- ये खनिजों के पुनर्चक्रण में सहायता करते हैं, इसलिए इन्हें पारिस्थितिकी तंत्र के मित्र कहा जाता है। जैसे – जीवाणु, कवक, प्रोटोजोआ, हेल्मन्थीज

पोष स्तर:-      

 

 

 

 

खाद्य शृंखला:-
- पारिस्थितिकी तंत्र में सभी जीव भोजन के लिए एक दूसरे पर निर्भर रहते हैं तथा भोजन की निर्भरता के आधार पर छोटी-छोटी शृंखलाओं का निर्माण होता है, जिसे खाद्य शृंखला कहा जाता है। 
- खाद्य शृंखला में ऊर्जा का प्रवाह सदैव एक दिशीय होता है।

1. चारण खाद्य शृंखला:-
- इस प्रकार के खाद्य शृंखला में प्रत्येक पोष स्तर पर जीवों का आकार बढ़ता है तथा जीवों की संख्या घटती है।
घास    बकरी  →  कुत्ता  →  भेड़िया  →  शेर
घास    खरगोश  → भेड़िया  →  शेर

2. परजीवी खाद्य शृंखला:-
- इस प्रकार की खाद्य शृंखला में प्रत्येक पोष स्तर पर जीवों की संख्या बढ़ती है तथा आकार घटता है।
जैसे- पेड़    चिड़िया    जूँ

 

 

3. अपरद खाद्य शृंखला:- 
- यह सबसे छोटी खाद्य शृंखला होती है।
- इस प्रकार की खाद्य शृंखला मृत जीवों से आंरभ होकर अपघटकों पर समाप्त हो जाती है।
- इस प्रकार की खाद्य शृंखला यह प्रदर्शित करती है कि पारिस्थितिकी तंत्र को सुचारू रूप से चलाने के लिए उत्पादक तथा अपघटकों की आवश्यकता होती है।

खाद्य जाल (food web):-
- छोटी-छोटी खाद्य शृंखलाएँ मिलकर एक जाल का निर्माण करती है, जिसे खाद्य जाल कहा जाता है।

- खाद्य जाल में जिसकी इच्छा है, वो खाये इसलिये वास्तविक है।
- खाद्य जाल हमेशा वास्तविक होता है।
- खाद्य जाल जितना जटिल होगा, पारिस्थितिकी तंत्र उतना ही स्थायी होगा।

पारिस्थितिकी पिरामिड/एल्टोनिय पिरामिड:-
- खोजकर्ता – एल्टॉन

-  पारिस्थतिकी तंत्र में विभिन्न पोष स्तर पर जीवों की संख्या, जीवों का भार तथा ऊर्जा में अंतर पाया जाता है तथा इन अंतर को एक ग्राफ में प्रदर्शित करते हैं, जिसे पिरामिड कहा जाता है।
-  पिरामिड बनाते समय उत्पादक को सदैव आधार में रखा जाता है।

पिरामिड के प्रकार:-

1. संख्या के पिरामिड:-
- यह किसी पारिस्थितिकी तंत्र में जीवों की संख्या को निरूपित करता है।
- संख्या के पिरामिड सीधा व उल्टा दोनों बनता है।
- संख्या के पिरामिड किसी पारिस्थतिकी तंत्र की जैविक क्षमता को प्रदर्शित करते हैं।

जैविक क्षमता:–
- अनुकूल परिस्थतियों में किसी प्रजाति की जीवों की संख्या अधिकतम हो।


(सीधा)                                    (उल्टा)

जैसे - पादप प्लवक, कीट, छोटी मछली तथा बड़ी मछली
(सीधा) का पिरामिड :-

 

 

 

 

 

 

 

 

2. जैव भार के पिरामिड:-
- इस प्रकार के पिरामिड किसी पारिस्थितिकी तंत्र में जीवों के भार को निरुपित करते हैं अर्थात् “खड़ी फसल” को निरूपित करते हैं।
- यह पिरामिड उल्टे तथा सीधे दोनों बन सकते हैं।
खड़ी फसल:-
- जीवों में कुल कार्बनिक पदार्थ की मात्रा खड़ी फसल कहलाती है-जैसे – पेड़ – चिड़िया – जूँ (सीधा)

 

 

 

 

 

 

ऊर्जा के पिरामिड:-
- इस प्रकार के पिरामिड किसी पारिस्थितिकी तंत्र में जीवों की ऊर्जा को निरूपित करते हैं।
- उत्पादक से उपभोक्ताओं की तरफ बढ़ने पर ऊर्जा का मान में सदैव कमी आती है।
- ऊर्जा का पिरामिड सदैव सीधा बनता है।
- ऊर्जा के पिरामिड उत्पादकता को निपित करता है।

10% law/ दक्षांश नियम:-
- यह नियम लिण्डेमान ने दिया था। 
- इसके अनुसार प्रत्येक जीव 100% ऊर्जा में से 90% ऊर्जा अपने दैनिक कार्य को पूर्ण करने में खर्च कर देते हैं तथा 10% ऊर्जा अगले पोष स्तर में स्थानान्तरित करता है।

 

 

पारिस्थितिकी दक्षता (Ecological Efficiency):-
- एक पोष स्तर से दूसरे पोष स्तर में स्थानान्तरित ऊर्जा प्रतिशत मात्रा ही Ecological Efficiency कहलाती है।

 

 

अजैविक घटक:-
1. तापमान
2. प्रकाश
3. मिट्टी
4. जल
5. वर्षा

1. तापमान:-
- ये जलवायु के अनुसार परिवर्तित होता है।
- भूमध्य रेखा से ध्रुवों पर जाने पर तापमान घटता है।

तापमान का प्रभाव:–
1. वनस्पति पर प्रभाव:-
- भूमध्य रेखा के आस-पास उष्ण कटिबन्धीय सदाबहार वनस्पति पायी जाती है क्योंकि यहाँ ताप अधिक व वर्षा भी अधिक होती है इस कारण प्रकाश संश्लेषण की क्रिया अधिक होती है वनस्पति हरी-भरी पायी जाती है।

2. रंग पर प्रभाव:-
- भूमध्य रेखा के पास तापमान ज्यादा होता है, इसलिए मिलेनिन वर्णक का निर्माण ज्यादा होता है। इस कारण वहाँ पर निग्रो मानव निवास करते हैं, जबकि भूमध्य रेखा के ऊपर की ओर तापमान कम होता है एवं ठण्डे प्रदेशों के कारण वहाँ के लोग गोरे होते हैं।
- शरीर की समस्त जैव रासायनिक क्रियाएँ एंजाइम की उपस्थिति में होती है तथा एंजाइम ताप से प्रभावित होते हैं।
- तापमान के आधार पर जीव दो प्रकार के होते हैं-

समतापी

असमतापी

वे जीव जो अपने शरीर के आंतरिक तापमान को निश्चित रखने की क्षमता रखते हैं। जैसे- मानव, पक्षी 
मानव शरीर का तापमान

वे जीव जो अपने शरीर के आंतरिक तापमान को निश्चित बनाये रखने की क्षमता नहीं रखते हैं। जैसे- सरीसृप तथा (उभयचर)

तापमान बढ़ने तथा घटने पर जीवों में होने वाले अनुकूलन:-

1. प्रवास:–
- तापमान बढ़ने तथा घटने पर जीव अपने मूल स्थान को त्यागकर अनुकूलतम तापमान वाले स्थान की तरफ गमन करता है। जैसे – आर्कटिक टर्न
- साइबेरियन सारस आर्कटिक क्षेत्र में अर्जेंटीना के पम्पास वनों की तरफ गमन करते हैं।

2. निलंबन:–
- तापमान बढ़ने तथा घटने पर कुछ समय के लिए शरीर की क्रियाओं को रोक दिया जाता है।

3. शीत निष्क्रियता:-
- तापमान घटने पर शरीर की कुछ क्रियाओं को रोक दिया जाता है। उदाहरण - भालू।

4. ग्रीष्म निष्क्रियता:-
- तापमान बढ़ने पर शरीर की कुछ क्रियाओं को रोक दिया जाता है। उदारहण - कछुआ, केंचुआ।

2. प्रकाश:-
- ये एक विद्युत चुम्बकीय तरंग है।
- पर्यावरण में ऊर्जा अथवा प्रकाश का प्राकृतिक स्त्रोत सूर्य है।
- पौधों में प्रकाश संश्लेषण की अभिक्रिया प्रकाश की उपस्थिति में होती है।
- 100 % प्रकाश का संश्लेषण में केवल 10 % प्रकाश का उपयोग करते हैं। जिसे PAR (Photosynthetically Active Radiation) कहते हैं।

3. जल:-
- जल दो प्रकार का होता है।
- रासायनिक जल व लवणीय जल
- पौधे केशिकत्व  के द्वारा जल का उपयोग करते  हैं।

Some terms used in ecosystem:-

आवास

(hebitent)

Home hangs

टेरीटरी /

परिसीमा

वह स्थान जहाँ पर

किसी जीव के मिलने

की संभावना

सर्वाधिक हो उसे

आवास कहा

जाता है।

वह स्थान जहाँ

कोई जीव अपने

मल मूत्र का त्याग

करता है।

वह स्थान जहाँ

कोई जीव अपना

भोजन प्राप्त

करता है।

इकोटोन:-
- वह स्थान जहाँ पर दो पारितंत्र एक-दूसरे को अति-व्यापित करते हैं उस स्थान को इकोटोन कहा जाता है।
- इकोटोन में जैव विविधता ज्यादा रहती है।
- इकोटोन वाले क्षेत्र में जैव विविधता सर्वाधिक होती हैं, जिसे कोर प्रभाव कहा जाता है।

Niche (निके):-
- किसी जीव का आवास तथा उसकी क्रियात्मक भूमिका मिलकर निके बनाते हैं।
- यह सार्वत्रिक होता है।

प्रदूषण:-
- पर्यावरण के जैविक, भौतिक तथा रासायनिक संगठन से होने वाले अवांछनीय परिवर्तन प्रदूषण कहलाता है।
- प्राकृतिक संसाधनों में होने वाला अवांछनीय परिवर्तन जिससे उसकी उपयोगिता नष्ट हो जाये, उसे प्रदूषण कहा जाता है।
- प्रदूषण प्राकृतिक तथा मानव निर्मित हो सकते हैं।

प्रदूषक:-
- पर्यावरण के वे कारक जो प्रदूषण फैलाते हैं, उसे प्रदूषक कहा जाता है।
- प्रदूषक गैसीय, द्रवीय, तथा ठोस हो सकते हैं।

प्रदूषक के प्रकार (Types of pollutants):-

(A) समष्टि के आधार पर:-

1. जैव निम्नीकृत (Bio Degradable):-
- वे प्रदूषक जिनका सूक्ष्म जीवों द्वारा अपघटन होता है उन्हें जैव निम्नीकृत कहा जाता है। जैसे - रसोई का कचरा, जीवों का अपशिष्ट।

2. जैव अनिम्नीकृत:-
- वे प्रदूषक जिनका सूक्ष्म जीवों द्वारा अपघटन नहीं होता है। उन्हें जैव अनिम्नीकृत कहा जाता है। उदाहरण - DDT (Dichloro-Diphenyl-Trichloroethane), BHC (Banzene Hexa Chloride), डाईक्लोफेनिल,प्लास्टिक, डाई सल्फॉन, अपमार्जक आदि।

जैव अनिम्नीकृत पदार्थों के नकारात्मक प्रभाव:-

1. जैव आवर्धन (Bio Magnification):-
- जैव अनिम्नीकृत पदार्थों की मात्रा लगातार प्रत्येक पोष स्तर पर बढ़ती है तथा अंतिम पोष स्तर पर इसकी सांद्रता सर्वाधिक होती है जिससे जीव की मृत्यु हो जाती है।

घास → टिड्‌डा → मेंढक → साँप → मोर

1g          5g          25g      125g    625g

उदाहरण- DDT, डाईक्लोफेनेक एवं एन्डोसल्फेन आदि।

DDT:-
- इसकी खोज मूलर ने की थी।
- यह एक कीटनाशक है।

डाईक्लोफेनेक:-
- यह एक दर्द निवारक दवाई है, इसके कारण गिद्धों की संख्या में कमी आई है।

एन्डोसल्फेन:–
- यह एक बैंजीन युक्त हाइड्रोकार्बन है।
- इसका सर्वाधिक उपयोग केरल में किया गया, जिसके कारण बच्चों में कई जन्मजात रोग उत्पन्न हो गये।
NOTE:-
- कीटनाशकों के उपयोग को रोकने के लिए स्टोक होम एग्रीमेंट बनाया गया है।

2. सुपोषण:-
- शैवाल प्रस्फुटन (Algae bloom) – शैवाल से अधिक मात्रा में नाइट्रेट  तथा फॉस्फेट प्राप्त हुई (अपमार्जक से) जिसके कारण इसका विकास व वृद्धि ज्यादा हुई, जिसे शैवाल प्रस्फुटन कहा जाता है।
- शैवाल प्रस्फुटन के कारण समुद्री जीवों की मृत्यु हो जाती है।
- शैवाल प्रस्फुटन के कारण पादप प्लवक प्रकाश संश्लेषण नहीं कर पाते है। जिसके कारण वो नष्ट हो जाती है।
- वॉटर हॉयसिथ (शैवाल) को बंगाल का आतंक कहा जाता है।

स्त्रोत के आधार पर:-

प्राथमिक प्रदूषक:-
- वे प्रदूषक जो सीधे स्त्रोत से निकले, जिसे प्राथमिक प्रदूषक कहते हैं।

उदाहरण:–
1. SO2 (सल्फर डाई ऑक्साइड)
2. CO (कार्बन मोनो ऑक्साइड)
3. CO2 (कार्बन डाई ऑक्साइड)

द्वितीयक प्रदूषक:-
- वे प्रदूषक जो स्त्रोत से निकलकर अन्य पदार्थों से क्रिया करके ऐसे रासायनिक पदार्थों का निर्माण जो पर्यावरण को प्रदूषित करें, उन्हें द्वितीयक प्रदूषक कहते हैं।

उदाहरण:–
PAN (पॉली एक्रिलो नाइट्राइल)
SO3 (सल्फर ट्राई ऑक्साइड),
O3 (ओजोन)
दिल्ली स्मॉग

मात्रा के आधार पर:-

मात्रात्मक प्रदूषक:-
- वे प्रदूषक जिनकी अल्प मात्रा वायुमंडल को प्रदूषित नहीं करती है लेकिन मांग बढ़ने पर वायुमंडल को प्रदूषित करती है।
- CO2 सामान्य प्रदूषक नहीं है लेकिन इसकी मात्रा बढ़ने पर वायुमंडल को प्रदूषित करती है क्योंकि CO2 की सामान्य मात्रा Green House Effect दर्शाती है। (Its positive effect) लेकिन अधिक मात्रा Global warming दर्शाती है। (Its negative effect)

प्रदूषण के प्रकार (Types of pollution):-

1. वायु प्रदूषण:-
- वायुमंडल में सभी गैसों का अनुपात निश्चित होता है। यदि इनके अनुपात में कोई परिवर्तन होता है, तो उसे वायु प्रदूषण कहा जाता है।
O2  - 21%
N2 - 78%
CO2 - 0.0038%
Ar - 0.9%

- CO (कार्बन मोनो ऑक्साइड) à CO, Hb के साथ क्रिया कर कार्बनऑक्सी हिमोग्लोबिन बना लेता है, जिससे शरीर में मेटाहिमोग्लोबिन का निर्माण होता है एवं व्यक्ति की दम घुटने से मौत हो जाती है।
- NH3 (अमोनिया), SO2, SO3 à वायु प्रदूषण के कारक
- लाइकेन वायु प्रदूषण का सूचक होता है -
- NAQI (National Air Quality Index) के द्वारा भारत में वायु प्रदूषण का पैमाना तैयार किया जाता है।

2. जल प्रदूषण:-
- जल में कार्बनिक तथा अकार्बनिक पदार्थों के मिलने के कारण जल के भौतिक तथा रासायनिक तथा जैविक संगठन में अवांछनीय परिवर्तन जल प्रदूषण कहलाता है।
- जल प्रदूषण की जाँच जल में घुली हुई ऑक्सीजन के आधार पर की जाती है।
- जल प्रदूषण की जाँच (BOD - Biological Oxygen demand) के द्वारा की जाती हैं।
- जल में उपस्थित कार्बनिक पदार्थों के विघटन हेतु सूक्ष्म जीवों को जितनी ऑक्सीजन चाहिए, उसे BOD  कहा जाता है।

जल प्रदूषण से होने वाले रोग:- 
Hg (पारा) - मिनिमाता रोग (जापान से)
Cd (कैडमियम) - इटाई – इटाई रोग
(फ्लोरीन) - फ्लोरोसिस (दाँतों)
NO3- (Nitrate) तथा PO4-2 (Phosphate):-
- यदि जल में इनकी मात्रा हो तो blue baby सिन्ड्रोम हो जाता है।
- जल को साफ करने के लिए क्लोरीन गैस, लाल दवा
(KMNO4) (पोटैशियम परमेंग्नेट), फिटकरी नामक रासायनिक पदार्थों का उपयोग करते हैं।
- पराबैंगनी प्रकाश का उपयोग जल प्रदूषण को कम करने में किया जाता है।  

3. ध्वनि प्रदूषण:-
- सामान्यत: ध्वनियाँ 3 प्रकार की होती हैं।
- ध्वनि प्रदूषण को कम करने के लिए घरों में छिद्रनुमा टाइलें लगाई जाती है।
- विद्युतीय उपकरणों को वैज्ञानिक तरीकों से नष्ट ना करके जब इन्हें अन्य तरीकों से नष्ट किया जाता है, तो इससे ध्वनि प्रदूषण फैलता है।

अश्रव्य तरंग

पराश्रव्य तरंग

श्रव्य तरंग

- 20 Hz से कम आवृत्ति होती है।

- पक्षी, कुत्ते, चूहे, हाथी, गाय आदि इन्हें सुन सकते हैं।
- भूकम्प, ज्वालामुखी आदि के समय अश्रव्य ध्वनि उत्पन्न होती है।

- 20 हजार Hz से ज्यादा आवृत्ति होती है।

- SONAR नामक तकनीक में इसका प्रयोग किया जाता है।
- चमगादड़ उड़ते समय इन्हीं ध्वनि तरंगों का प्रयोग करते है। 

 

- 20 Hz -  20 हजार Hz  तक आवृत्ति होती है।
- इसे मानव द्वारा सुना जा सकता है।