मौलिक अधिकार

परिभाषा           
- वे अधिकार जो व्यक्ति के जीवन के लिए मौलिक एवं अनिवार्य हैं, जो संविधान द्वारा नागरिकों को प्रदान किये जाते हैं, उन्हें मौलिक अधिकार कहा जाता है।

मूल अधिकारों की पृष्ठभूमि
- मूल अधिकारों का सर्वप्रथम प्रयोग ब्रिटेन में हुआ। ब्रिटिश सम्राट जॉन द्वारा 1215 ई. में हस्ताक्षरित अधिकार पत्र मूल अधिकार सम्बन्धी प्रथम लिखित दस्तावेज हैं। ये अमेरिका के संविधान से प्रभावित हैं।

- मूल अधिकारों की मांग सर्वप्रथम भारत में बाल गंगाधर तिलक ने स्वराज्य विधेयक 1895 के माध्यम से की। मूल अधिकारों के निर्माण का प्रथम प्रयास 1928 में मोतीलाल नेहरू ने 'नेहरू रिपोर्ट' के माध्यम से किया। वर्ष 1931 के कराची अधिवेशन में कहा गया "स्वाधीन भारत के किसी भी संविधान को मौलिक अधिकारों की गारण्टी होनी चाहिए।"

- भारत में सर्वप्रथम मौलिक अधिकारों की स्पष्ट रूप से मांग वर्ष 1935 में जवाहर लाल नेहरू ने की।

भारत के संविधान में उल्लेख
- भारत के संविधान के भाग-3 में अनुच्छेद-12 से 35 तक मौलिक अधिकारों के बारे में वर्णन किया गया है।

मूल अधिकारों का वर्गीकरण
सामान्य वर्गीकरण
- समता का अधिकार (अनुच्छेद 14-18)
- स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 19-22)
- शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23-24)
- धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 25-28)
- संस्कृति और शिक्षा संबंधी अधिकार (अनुच्छेद 29-30)
- संवैधानिक उपचारों का अधिकार (अनुच्छेद 32)

प्राप्ति के आधार पर-
1. केवल नागरिकों को प्राप्त मौलिक अधिकार
अनुच्छेद-15,16,19, 29, 30

2. भारत में निवास करने वाले सभी व्यक्तियों (विदेशियों को भी) प्राप्त मौलिक अधिकार
अनुच्छेद-14,20,21,23, 25, 26, 27, 28

संपत्ति का अधिकार

- संपत्ति के अधिकार को वर्ष 1978 में 44वें संविधान संशोधन द्वारा मौलिक अधिकार से विधिक अधिकार में परिवर्तित कर दिया गया था। 44वें संविधान संशोधन से पहले यह अनुच्छेद-31 के अंतर्गत एक मौलिक अधिकार था, परंतु इस संशोधन के बाद इस अधिकार को अनुच्छेद- 300(A) के अंतर्गत एक विधिक अधिकार के रूप में स्थापित किया गया।

मौलिक अधिकारों की विशेषताएँ-
- मौलिक अधिकार, सर्वाधिक विस्तृत घोषणा-पत्र है।
- मौलिक अधिकार, निरपेक्ष व असीमित नहीं हैं।
- मौलिक अधिकार, मुख्यतः कार्यपालिका और अंशत: विधायिका के विरुद्ध प्रदान किये गये हैं।
- भाग-3 में वर्णित मौलिक अधिकारों को दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है- नकारात्मक अधिकार एवं सकारात्मक अधिकार।

संबंधित अनुच्छेद
- अनुच्छेद 12 (परिभाषा)
- अनुच्छेद 13 (मूल अधिकारों से असंगत या उनका अल्पीकरण करने वाली विधियाँ।)
- अनुच्छेद 14 (विधि के समक्ष समता) विधि के समान संरक्षण
- अनुच्छेद 15 (धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर विभेद का प्रतिषेध)
- अनुच्छेद 16 (लोक नियोजन के विषय में अवसर की समता)
- अनुच्छेद 17 (अस्पृश्यता का अंत)
- अनुच्छेद 18 (उपाधियों का अंत)
- अनुच्छेद 19 (वाक्–स्वातंत्र्य आदि विषयक कुछ अधिकारों का संरक्षण)
- अनुच्छेद 20 (अपराधों के लिए दोषसिद्धि के संबंध में संरक्षण)
- अनुच्छेद 21 (प्राण और दैहिक स्वतन्त्रता का संरक्षण)
- अनुच्छेद 22 (गिरफ्तारी के संबंध में संरक्षण)
- अनुच्छेद 23 (मानव के दुर्व्यापार और बलात् श्रम का प्रतिषेध)
- अनुच्छेद 24 (कारखानों आदि में बालकों के नियोजन का प्रतिषेध)
- अनुच्छेद 25 (अंत: करण की और धर्म के अबोध रूप में मानने, आचरण और प्रचार करने की स्वतंत्रता)
- अनुच्छेद 26 (धार्मिक कार्यों के प्रबंध की स्वतंत्रता)
- अनुच्छेद 27 (किसी विशिष्ट धर्म की अभिवृद्धि के लिए करों के संदाय के बारे में स्वतंत्रता)
- अनुच्छेद 28 (कुछ शिक्षा संस्थाओं में धार्मिक शिक्षा या धार्मिक उपासना में उपस्थित होने के बारे में स्वतंत्रता)
- अनुच्छेद 29 (अल्पसंख्यक वर्गों के हितों का संरक्षण)
- अनुच्छेद 30 (शिक्षा संस्थाओं की स्थापना और प्रशासन करने का अल्पसंख्यक वर्गों का अधिकार)
- अनुच्छेद 31क (संपदाओं आदि के अर्जन के लिए उपबंध करने वाली विधियों की व्यावृत्ति)
- अनुच्छेद 31ख (कुछ अधिनियमों और विनिमयों का विधिमान्यकरण)
- अनुच्छेद 31ग (कुछ निदेशक तत्त्वों को प्रभावी करने वाली विधियों की व्यावृत्ति)
- अनुच्छेद 32 (इस भाग द्वारा प्रदत्त अधिकारों को प्रवर्तित करने के लिए उपचार)
- अनुच्छेद 33 (इस भाग द्वारा प्रदत्त अधिकारों का, बलों आदि को लागू होने में, उपांतरण करने की संसद की शक्ति)
- अनुच्छेद 34 (जब किसी क्षेत्र में सेना विधि प्रवृत्त है तब इस भाग द्वारा प्रदत्त अधिकारों का निर्बधन
- अनुच्छेद 35 (इस भाग के उपबंधों को प्रभावी करने के लिए विधान)

अनुच्छेद-12
- इसके अंतर्गत राज्य को परिभाषित किया गया है तथा राज्य में भारत सरकार, राज्य सरकार विधानमण्डल तथा सभी स्थानीय निकाय एवं अन्य ऐसे सभी प्राधिकारी शामिल होंगे जिन्हें संविधान या विधि के अंतर्गत नियम बनाने, कानून बनाने, आदेश जारी करने तथा अधिसूचना जारी करने का अधिकार प्राप्त है।
- अन्य प्राधिकारी के अंतर्गत ऐसे प्राधिकारी या निकाय आते हैं जो संविधान द्वारा सृजित किये जाते हैं और जिन्हें विधि या उपविधि बनाने की शक्ति प्राप्त होती है।

अनुच्छेद-13
- मूल अधिकारों से असंगत विधियाँ –
- इसके अंतर्गत न्यायालयों को मूल अधिकारों का सजग प्रहरी या अभिभावक बनाया गया है। इसके तहत न्यायालय ऐसे किसी भी विधि को अवैध घोषित कर सकता है, जो मूल अधिकारों से असंगत हो। इस प्रकार अप्रत्यक्ष रूप से न्यायिक पुनर्विलोकन की अभिव्यक्ति होती है। इसके अंतर्गत निम्नलिखित सिद्धांत निहित हैं-

ग्रहण या आच्छादन का सिद्धांत –
- संविधान लागू होने से पूर्व निर्मित विधि किसी मूल अधिकार से असंगत है, तो वह निष्क्रिय हो जायेगी लुप्त नहीं होगी। यदि मूल अधिकारों द्वारा लगाया गया प्रतिबंध हटा दिया जाए तो वह पुन: सक्रिय हो जायेगी।

अधित्याग का सिद्धांत –
- संविधान में कहा गया है कि कोई व्यक्ति संविधान द्वारा प्राप्त मूल अधिकारों को स्वेच्छा से नहीं त्याग सकता है।

पृथक्करणीयता का सिद्धांत –
- यदि किसी अधिनियम का कोई भाग असंवैधानिक या मूल अधिकारों के विरुद्ध है तो अधिनियम के मूल उद्देश्य को समाप्त किये बिना अधिकारों से असंगत वाला भाग ही असंवैधानिक घोषित किया जायेगा, सम्पूर्ण अधिनियम नहीं।

अनुच्छेद 14- विधि के समक्ष समता
- यह विधि के समक्ष समानता अथवा विधि के समान संरक्षण प्रदान करता है। विधि के समक्ष समानता का प्रावधान ब्रिटिश संविधान से लिया गया है और विधि के समान संरक्षण संयुक्त राज्य अमेरिका से। इस व्यवस्था के अनुसार सभी व्यक्ति बिना किसी विभेद देश के सामान्य कानूनों से शासित होंगे अर्थात् कोई भी व्यक्ति विधि से ऊपर नहीं है। मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ (1980) के वाद में  उच्चतम न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय के बाद अनुच्छेद-14 में निहित विधि के शासन को संविधान का आधारभूत ढाँचा घोषित किया गया है।

विधि के समक्ष समानता का अपवाद

विधि के समक्ष समता के कुछ अपवाद भी हैं, जो इस प्रकार हैं-

1.
(i) राष्ट्रपति एवं राज्यपाल को विधि के समक्ष समानता से छूट प्रदान की गई है। (अनुच्छेद-361)
(ii) राष्ट्रपति एवं राज्यपाल, दोनों अपने पद के शक्तियों के प्रयोग और कर्तव्यों के लिए न्यायपालिका के प्रति उत्तरदायी नहीं होंगे।
(iii) दोनों के विरुद्ध उनके कार्यकाल के दौरान किसी प्रकार की दाण्डिक अथवा आपराधिक कार्यवाही न तो आरंभ होगी और न ही बनी रहेगी।
(iv) राष्ट्रपति व राज्यपाल पर उनके कार्यकाल के दौरान या बाद में सिविल कार्यवाही आरंभ की जा सकती है।

2. कोई भी व्यक्ति यदि संसद के या राज्य विधानसभा के किसी भी सदन की सत्य कार्यवाही से संबंधित विषय वस्तु का प्रकाशन समाचार-पत्र में (रेडियो या टेलीविजन) करता है तो उस पर किसी प्रकार का मुकदमा, देश के किसी भी न्यायालय में नहीं चलाया जा सकेगा। (अनुच्छेद 361-क)

3. संसद या राज्य के विधानमण्डल या संसदीय समिति या राज्य विधानमण्डलीय समिति के किसी सदस्य द्वारा कही गयी बात या दिए गए किसी मत के संबंध में उसके विरुद्ध किसी न्यायालय में कार्यवाही नहीं की जाएगी। (अनुच्छेद 105,194)

4. विदेशी संप्रभु (शासक), राजदूत एवं कूटनीतिक व्यक्ति, दीवानी और फौजदारी मुकदमों से मुक्त होंगे।

5. संयुक्त राष्ट्र संघ एवं इसकी एजेंसियों को छूट प्राप्त है।

अनुच्छेद 15- धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थल के आधार पर विभेद का प्रतिषेध

- यह मूल अधिकार केवल भारतीय नागरिकों के लिए है। इसके अंतर्गत समता के आधार को विशेष क्षेत्रों में लागू करने की व्यवस्था है। यह धर्म, मूल वंश, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर किसी भी प्रकार के विभेद को रोकता है।

- अनुच्छेद-15(4) को प्रथम संविधान संशोधन अधिनियम, 1951 द्वारा संविधान में अंत: स्थापित किया गया जिसके अनुसार शिक्षण संस्थाओं में आरक्षण का प्रावधान किया गया है। यह सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े हुए नागरिकों के लिए, अनुसूचित जाति के लिए, अनुसूचित जनजाति के लिए है।

- 93वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2005 द्वारा संविधान के अनुच्छेद-15 में खण्ड(5) जोड़ा गया जिसमें कहा गया है कि राज्य नागरिकों के सामाजिक एवं शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों या अनुसूचित जातियों, जनजातियों की उन्नति के लिए शैक्षिक संस्थाओं में प्रवेश के लिए छूट संबंधी विशेष उपबंध बना सकता है। 103वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2019 के द्वारा अनुच्छेद-15 में (6) जोड़ा गया जिसके अनुसार राज्य अनुच्छेद-15(4) तथा अनुच्छेद-15(5) में वर्णित वर्गों के अतिरिक्त आर्थिक रूप से दुर्बल किन्हीं वर्गों की उन्नति के लिए विशेष उपबंध कर सकेगा।

अनुच्छेद 16- लोक नियोजन के विषय में अवसर की समता

अनुच्छेद 16(1) :- प्रत्येक नागरिक को राज्य के अधीन सेवाओं में नियोजन एवं नियुक्ति में अवसर की समानता होगी।

NOTE:- इसी अनुच्छेद में प्रतिष्ठा की स्वतंत्रता अंतरानिहित है।

अनुच्छेद 16(2) :- राज्य लोक नियोजन के क्षेत्र में किसी भी नागरिक को धर्म, जाति, जन्म स्थान, मूलवंश, लिंग, उद्भव व निवास स्थान के आधार पर लोक नियोजन के क्षेत्र में भेदभाव नहीं करेगा।

- अनुच्छेद 16(3) :- राज्य निवास स्थान के आधार पर विशेष प्रावधान कर सकता है। ऐसा करने हेतु कानुन केवल संसद द्वारा बनाये जायेगें।

- अनुच्छेद 16(4) :- नागरिकों के पिछडे़ वर्ग को जिनका राज्य की नजर में राज्य के अधीन सेवाओं व पदों में अपर्याप्त प्रतिनिधित्व  है के लिए राज्य आरक्षण की व्यवस्था कर सकता है। SC, ST को सरकारी नौकरियों में आरक्षण संविधान लागू होने से ही प्राप्त है।

- अन्य पिछड़ा वर्गो (O.B.C.) के निर्धारण हेतु 1953 में काका कालेलकर आयोग गठित किया गया, जिसने 1955 में अपनी रिपोर्ट दी।

- OBC के संबंध में दूसरा आयोग 1979 में मण्डल आयोग (B.P. मण्डल)  गठित किया गया। इस आयोग ने 1980 में अपनी रिपोर्ट दी। मण्डल आयोग की शिफारिश के आधार पर 1990 में विश्व नाथ प्रताप (V.P. Singh) सरकार ने OBC को केन्द्रीय सेवाओं में 27% आरक्षण प्रदान किया।

NOTE:- 1992 में इन्द्रिरा सहानी बनाम भारत संघवाद में

इस आरक्षण को चुनौती दी गई।

- 16 नवम्बर, 1992 को सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय लिया कि:-

i. OBC को दिया गया आरक्षण वैध है।

ii. आरक्षण सामाजिक व शैक्षिक पिछड़ेपन के आधार पर दिया गया है।

iii. आर्थिक आधार पर आरक्षण देना असंवैधानिक है।

iv. आरक्षण नियुक्ति में दिया जा सकता है, पदोन्नति में नहीं

v. कुल आरक्षण की सीमा 50%

vi. क्रिमीलेयर को आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा।

Note:- क्रिमीलेयर शब्द सतनाथन आयोग द्वारा वर्ष 1971 में केरल में प्रथम बार प्रयोग किया।

Note:- क्रिमीलेयर के निर्धारण हेतु 1993 में रामानंद समिति गठित की गई। इस समिति ने क्रिमीलेयर के निर्धारण के दो आधार बताये-

i. लगातार 3 वर्षो में वार्षिक आय 8 लाख रुपये (पहले यह राशि 1 लाख रुपये थी।)

ii. राजपत्रित अधिकारी (40 वर्ष)

- 77वें. सं. स.- 1995 के तहत अनुच्छेद 16(4)A जोड़ा गया तथा प्रावधान किया की SC, ST को पदोन्नती में आरक्षण दिया जा सकता है।

- इस अनुच्छेद में 85 वें सं. स. 2001 के तहत संशोधन करते हुए प्रावधान किया गया की SC, ST को पदोन्नति में आरक्षण के साथ वरिष्ठता भी दी जायेगी।

- 81वें सं.स. 2000 के तहत अनुच्छेद 16(4)B जोड़ा गया तथा प्रावधान किया गया कि बैकलॉग की भर्ती के संबंध में कुल आरक्षण की सीमा 50% से अधिक हो सकती है।

Note:- 82वें सं. स. 2000 के तहत अनुच्छेद-335 में संशोधन करते हुए प्रावधान किया गया की सरकारी सेवाओं में योग्यता हेतु निर्धारित न्यूनतम प्राप्तांको में SC, ST को छूट प्रदान की जानी चाहिए।

- 77, 81, 82, 85 वें सं. स. को M. नागराजन पाद में चुनौती दी गई। परन्तु सर्वोच्च न्यायालय ने दी गई चुनौती को खारिज करते हुए आरक्षण के निम्नलिखित आधार बतायें।

                                    सामाजिक

1. पिछड़ापन         

                                    शैक्षणिक

2. अपर्याप्त प्रतिनिधित्व

3. प्रशासनिक दक्षता

अनुच्छेद 16(5)- यह आवश्यक नहीं है कि किसी धर्म या वर्ग विशेष की संस्था के प्रशानिक उत्तरदायित्व का निर्वहन उसी धर्म या वर्ग विशेष के व्यक्ति द्वारा किया जाये।

अनुच्छेद 16(6)- 103वें सं. स. 2019 के तहत जोड़ा गया तथा इसमें प्रावधान किया गया कि राज्य नागरिकों के आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को सरकारी सेवाओं में आरक्षण दे सकता है।

इस अनुच्छेद के तहत आर्थिक रूप से कमजोर नागरिकों को अपने वर्ग में अधिकतम 10% आरक्षण का प्रावधान किया गया।

- शैक्षणिक आरक्षण:- अनुच्छेद 15[4], 15[5] व 15[6]

- नौकरियों में आरक्षण:- अनुच्छेद 16(4), 16(4)A, 16(4)B व 335

- राजनीति आरक्षण:-

अनुच्छेद

 

प्रावधान

330

 

लोक सभा में SC, ST का आरक्षण

331

 

लोकसभा में आंग्ल भारतीयों का प्रावधान

332

 

विधानसभा में SC, ST का आरक्षण

333

 

विधानसभा में आंग्ल भारतीयों का प्रावधान

नोट- 104वें सं.स. 2020 के तहत SC व ST का आरक्षण और आगे 10 वर्ष तक बढ़़ा दिया गया है।

नोट- 104वें सं.स. 2020 के तहत आंग्ल भारतीयों अनुच्छेद 331 व 333 के आधार पर मनोनयन निष्प्रभावी हो गया है।

अनुच्छेद 17- अस्पृश्यता का अंत
- यह भारतीय समाज में व्याप्त कुरीति अस्पृश्यता का अन्त करता है तथा छुआछूत का समर्थन करने वालों को दण्डित करने की व्यवस्था करता है। संसद ने अनुच्छेद-17 के अधीन शक्ति का प्रयोग करते हुए 'अस्पृश्यता अपराध अधिनियम,1955' अधिनियमित किया, जिसे सन् 1976 में पुन: संशोधन कर 'नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1976' नया नाम दिया गया। अनुच्छेद-17 स्वत: क्रियान्वित कानून है अर्थात् इसके उल्लंघन पर न्यायालय सीधे भारतीय दण्ड संहिता के आधार पर दण्ड दे सकता है।

- अस्पृश्यता में निम्नलिखित बिंदु सम्मिलित हैं-
(i) किसी सार्वजनिक संस्था, जैसे-अस्पताल, शैक्षणिक संस्थाओं में किसी व्यक्ति के प्रवेश को प्रतिबंधित करना। 
(ii) सार्वजनिक पूजा स्थलों पर किसी व्यक्ति को पूजा से प्रतिबंधित करना।
(iii) किसी भी सार्वजनिक स्थान में प्रवेश से प्रतिबंधित करना।
(iv) अनुसूचित जाति के लोगों को छुआछूत के नाम पर अपमानित करना।
(v) छुआछूत का प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में उपदेश देना।
(vi) छुआछूत को ऐतिहासिक, धार्मिक या दार्शनिक या अन्य किसी आधार पर औचित्यपूर्ण बताना।

अनुच्छेद 18- उपाधियों का निषेध
यह उपाधियों का उन्मूलन करता है। अनुच्छेद-18 के खण्ड(1) में कहा गया है कि राज्य नागरिक व गैर-नागरिकों को सैनिक तथा शैक्षणिक सेवाओं से जुड़ी उपाधियों के अतिरिक्त अन्य उपाधियाँ देने पर प्रतिबंध लगाता है।

नोट- अनुच्छेद 18 का उल्लंघन किये जाने पर कोई कानूनी प्रावधान नहीं है।

नोट- H.V. कामथ ने संविधान सभा में उपाधी लेने पर नागरिकता समाप्त करने का प्रस्ताव रखा।

अनुच्छेद 19- वाक्-स्वातन्त्र्य आदि विषयक कुछ अधिकारों का

संरक्षण
- स्वतंत्रता लोकतंत्र का आधारभूत लक्षण है एवं अनुच्छेद-19 केवल भारतीय नागरिकों के लिए है। अनुच्छेद-19(1) के अन्तर्गत प्रारम्भ में भारतीय संविधान के द्वारा सभी नागरिकों को कुल 7 स्वतंत्रताएँ प्रदान की गई थी परन्तु 44वें संविधान संशोधन, 1978 के माध्यम से अनुच्छेद-19(1)(च) में उपबंधित सम्पत्ति के अर्जन, धारण और व्ययन की स्वतंत्रता को समाप्त कर दिया गया।

- वर्तमान में भारतीय संविधान के द्वारा सभी नागरिकों को अनुच्छेद-19(1) के अन्तर्गत 6 स्वतंत्रताएँ प्रदान की गई हैं-

1. अनु. 19(1)(क)- वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
2. अनु. 19(1)(ख)- शांतिपूर्ण व निरायुद्ध सम्मेलन की स्वतंत्रता
3. अनु. 19(1)(ग)- संघ, संगठन या सहकारी समिति
(97 संशोधन 2011) बनाने की स्वतंत्रता
4. अनु. 19(1)(घ)- अबाध संचरण या आगमन की स्वतंत्रता
5. अनु. 19(1)(ङ)- निवास की स्वतंत्रता
6. अनु. 19(1)(च) -निरसित
7. अनु. 19(1)(छ)- रोजगार या जीविका की स्वतंत्रता

Note:- सड़कों के किनारे अस्थायी रूप से ठेला लगाना भारतीय नागरिकों का इस अनुच्छेद में अन्तरनिहित अधिकार है।

अनुच्छेद-19(2):- देश की एकता और अखण्डता, लोक व्यवस्था, सदाचार एवं शिष्टाचार, मानहानि, न्यायालय की अवमानना, विदेशों के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध तथा अपराधों को बढ़ावा देने के आधार पर अनुच्छेद 19(1)(क) पर प्रतिबंध लगाये जा सकते है।

अनुच्छेद-19(3):- देश की एकता और अखण्डता तथा लोक व्यवस्था के आधार पर अनुच्छेद 19(1)(ख) पर प्रतिबन्ध लगाया जा सकता है।

अनुच्छेद-19(4):- देश की एकता और अखण्डता, लोक व्यवस्था और सदाचार के आधार पर अनुच्छेद 19(1)(ग) पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है।

अनुच्छेद-19(5):- साधारण जनता के हित में तथा अनुसूचित जनजाति के हितों के संरक्षण के आधार पर अनु. 19(1)(घ) तथा अनु. 19(1)(ड़) पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है।

अनुच्छेद-19(6):- साधारण जनता के हित में अनुच्छेद 19(1)(छ) पर प्रतिबंध लगया जा सकता है।

अनुच्छेद 20- अपराधों के लिए दोषसिद्धि के संबंध में संरक्षण
अनुच्छेद-20 के अन्तर्गत व्यक्तियों को राज्य के विरुद्ध अपराध के संबंध में निम्नलिखित संवैधानिक संरक्षण प्राप्त हैं-

- कार्योत्तर विधियों से संरक्षण अनुच्छेद-20(1) –
अनुच्छेद 20(1) में कहा गया है कि किसी व्यक्ति को प्रवृत्त विधि के अतिक्रमण या उल्लंघन के आधार पर ही अपराधी ठहराया जायेगा।

- दोहरे दण्ड से संरक्षण– अनुच्छेद-20 के खण्ड (2) में कहा गया है कि किसी व्यक्ति को एक ही अपराध के लिए एक बार से अधिक 'दण्डित' या 'अभियोजित' नहीं किया जायेगा।

- आत्म-अभिशंसन से संरक्षण अनुच्छेद-20(3) में कहा गया है कि किसी व्यक्ति को, जो कि अपराधी है, स्वयं अपने विरुद्ध साक्ष्य देने के लिये बाध्य नहीं किया जायेगा।

अनुच्छेद 21- प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण
- अनुच्छेद-21 में कहा गया है कि किसी भी व्यक्ति को उसके प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता से कानून अथवा विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अतिरिक्त अन्य किसी प्रकार से वंचित नहीं किया जा सकता। 'ए.के. गोपालन बनाम मद्रास राज्य, ए.आई.आर. 1950' मामले में उच्चतम न्यायालय ने कहा, कि अनुच्छेद-21 विधान मण्डल विधि द्वारा किसी व्यक्ति को प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार से वंचित कर सकता है।

- 'मेनका गांधी बनाम भारत संघ ए.आई.आर. 1978' मामले में उच्चतम न्यायालय ने गोपालन मामले में दिये अपने निर्णय को उलट दिया तथा निर्णय दिया कि अनुच्छेद-21 के तहत प्राप्त संरक्षण केवल कार्यपालिका की मनमानी कार्यवाही के विरुद्ध ही नहीं बल्कि विधानमण्डलीय कार्यवाही के विरुद्ध भी उपलब्ध है अर्थात् विधायिका विधि द्वारा किसी व्यक्ति को उसके प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार से वंचित नहीं कर सकती है।

- अनुच्छेद-21 की महत्ता के कारण डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने इसे 'संविधान का मेरुदण्ड’ तथा ‘मेग्नाकार्टा' कहा है। 44 वें संविधान संशोधन अधिनियम-1978 में संसद ने अनुच्छेद-359 में संशोधन करके स्पष्ट किया कि अनुच्छेद-20 तथा 21 में प्रदत्त स्वतंत्रता के अधिकार को आपातकाल में भी निलम्बित नहीं किया जा सकता।

अनुच्छेद-21(क) – शिक्षा का मूल अधिकार
- 86वें संविधान संशोधन अधिनियम-2002 द्वारा संविधान में एक नया अनुच्छेद-21(क) जोड़ा गया जिसमें प्रारंभिक शिक्षा का अधिकार सम्मिलित है। अनुच्छेद-21(क) में कहा गया है कि राज्य का यह कर्तव्य होगा कि वह 6 से 14 वर्ष की आयु के सभी बालकों को नि:शुल्क व अनिवार्य शिक्षा उपलब्ध कराये। शिक्षा के मूल अधिकार के क्रियान्वयन के लिए संसद ने 'शिक्षा का अधिकार विधेयक-2009' पारित किया जो 1 अप्रैल, 2010 से लागू हो गया। राजस्थान ने इसे 1 अप्रैल, 2011 से लागू किया गया।

अनुच्छेद 22- गिरफ्तारी और निरोध से संरक्षण
अनुच्छेद-22 गिरफ्तारी एवं निरोध के विरुद्ध संरक्षण प्रदान करता है। गिरफ्तारी दो प्रकार की होती हैं-
(i) सामान्य दण्ड विधि के अधीन
(ii) निवारक निरोध विधि के अधीन

- अनुच्छेद-22 सामान्य दण्ड विधि के अधीन गिरफ्तारी के संबंध में निम्नलिखित अधिकार प्रदान करता है-
(क) 24 घंटे से अधिक बिना मजिस्ट्रेट के आदेश के विरुद्ध गिरफ्तार नहीं किया जा सकता।
(ख) गिरफ्तारी के कारणों से यथाशीघ्र अवगत कराया जाने का अधिकार।
(ग) अपनी रुचि के विधि-व्यवसायी से परामर्श एवं बचाव का अधिकार।

अपवाद-
- यह अधिकार शत्रु विदेशी को प्राप्त नहीं है।
- निवारक निरोध विधि के अधीन गिरफ्तार व्यक्तियों को भी उपर्युक्त अधिकार प्राप्त नहीं हैं।

अनुच्छेद 23- मानव के दुर्व्यापार और बलात् श्रम का प्रतिषेध
- अनुच्छेद-23 में मानव का दुर्व्यापार और बेगार तथा इसी प्रकार का अन्य बलात श्रम निषिद्ध ठहराया गया है। अनुच्छेद-23 राज्य व निजी व्यक्तियों दोनों के विरुद्ध संरक्षण प्रदान करता है।
- 'मानव-दुर्व्यापार' में मनुष्यों (स्त्री-पुरुष) का वस्तुओं की भाँति क्रय-विक्रय, स्त्रियों व बच्चों का अनैतिक व्यापार (वैश्यावृत्ति) करना तथा दास प्रथा शामिल है। मानव दुर्व्यापार से संबंधित कानून बनाने की शक्ति संसद को प्राप्त है। अनुच्छेद-23 व्यक्तियों को बेगार व अन्य इसी प्रकार के बलपूर्वक लिये जाने वाले श्रम अर्थात् बलात् श्रम से संरक्षण प्रदान करता है।

अनुच्छेद 24- कारखानों आदि में बालकों के नियोजन का

प्रतिषेध
- अनुच्छेद-24 के अंतर्गत 14 वर्ष से कम आयु के बालकों को कारखानों, खनन अथवा अन्य किसी जोखिम पूर्ण कार्य में नियोजन का निषेध किया गया है।

अनुच्छेद 25- अंत:करण की और धर्म के अबाध रूप से मानने, आचरण और प्रचार करने की स्वतंत्रता
- अनुच्छेद-25(1) के अनुसार  सभी व्यक्तियों को अंत:करण की स्वतंत्रता का और धर्म के अबाध रूप से मानने, आचरण करने और प्रचार करने का समान हक होगा। इसके प्रभाव हैं-
- अंत:करण की स्वतंत्रता – किसी भी व्यक्ति को भगवान या उसके रूपों के साथ अपने ढंग से अपने संबंध को बनाने की आंतरिक स्वतंत्रता।
- मानने का अधिकार – अपने धार्मिक विश्वास और आस्था की सार्वजनिक और बिना भय के घोषणा करने का अधिकार।
- आचरण का अधिकार – धार्मिक पूजा, परंपरा, समारोह करने और अपनी आस्था और विचारों के प्रदर्शन की स्वतंत्रता।
- प्रचार का अधिकार – अपनी धार्मिक आस्थाओं का अन्य को प्रचार और प्रसार करना या अपने धर्म के सिद्धांतों को प्रकट करना।
- अपवाद-
पहला- कृपाण धारण करना और लेकर चलना। सिख धर्म के मानने का अंग समझा जाएगा।
दूसरा- इस संदर्भ में हिंदुओं में सिख, जैन और बौद्ध सम्मिलित हैं।

अनुच्छेद 26- धार्मिक कार्यों के प्रबंधन की स्वतंत्रता
- अनुच्छेद-26 के अनुसार, प्रत्येक धार्मिक संप्रदाय या उसके किसी अनुभाग को निम्नलिखित अधिकार प्राप्त होंगे-
1. धार्मिक एवं मूर्त प्रयोजनों के लिए संस्थाओं की स्थापना और पोषण का अधिकार।
2. अपने धर्म विषयक कार्यों का प्रबंध करने का अधिकार।

अनुच्छेद 27- किसी विशिष्ट धर्म की अभिवृद्धि के लिए कर
भुगतान के बारे में स्वतंत्रता
- किसी भी व्यक्ति को किसी विशिष्ट धर्म या धार्मिक संप्रदाय की अभिवृद्धि या पोषण में व्यय करने के लिए करों के संदाय हेतु बाध्य नहीं किया जाएगा। करों का प्रयोग सभी धर्मों के रख-रखाव एवं उन्नति के लिए किया जा सकता है।

अनुच्छेद 28- कुछ शिक्षण संस्थाओं में धार्मिक शिक्षा या धार्मिक उपासना में उपस्थित होने के बारे में स्वतंत्रता
- अनुच्छेद-28 के अंतर्गत राज्य-निधि से पूर्णत: पोषित किसी शिक्षा संस्था में कोई धार्मिक शिक्षा न दी जाए। हालाँकि यह व्यवस्था उन संस्थाओं में लागू नहीं होती, जिनका प्रशासन तो राज्य कर रहा हो लेकिन उनकी स्थापना किसी विन्यास या न्यास के अधीन हुई हो।

अनुच्छेद 29- अल्पसंख्यक वर्गों के हितों का संरक्षण
- भारतीय संविधान में अल्पसंख्यक वर्ग स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं हैं, परन्तु उनके संरक्षण के लिए विशेष व्यवस्था की गई है। भारतीय संविधान में भाषायी व धार्मिक आधारों पर अल्पसंख्यकों का निर्धारण होता है।

अनुच्छेद 30- शिक्षा संस्थाओं की स्थापना और प्रशासन करने का अल्पसंख्यक वर्गों का अधिकार
- धर्म या भाषा पर आधारित अल्पसंख्यक वर्गों को अपनी रुचि के शिक्षा संस्थानों की स्थापना और प्रशासन का अधिकार होगा। इन शिक्षण संस्थानों को सम्पत्ति का अधिकार होगा।

अनु. 31- सम्पत्ति का अनिवार्य अधिग्रहण (निरस्त)

अनु.31क- संपदा के अधिग्रहण के लिए कानून की सुरक्षा

अनु.31ख- कुछ अधिनियमों और विनियमनों की वैधता

अनु.31ग- नीति निदेशक सिद्धांतों पर प्रभाव डालने वाले कानूनों की सुरक्षा

अनु.31घ- राष्ट्र विरोधी गतिविधियों से संबंधित कानूनों की सुरक्षा (निरस्त)

संवैधानिक उपचारों का अधिकार(अनुच्छेद-32)
- अनुच्छेद 32 संवैधानिक उपचारों के अधिकार को डॉ. अम्बेडकर ने 'भारतीय संविधान की आत्मा' और 'संविधान की प्राचीर' कहा है। अनुच्छेद-32 के तहत संवैधानिक उपचार केवल उसी व्यक्ति को उपलब्ध होगा जिसके मूल अधिकारों का उल्लंघन हुआ हो। इसके अनुसार सर्वोच्च न्यायालय-5 प्रकार की रिट जारी करने की शक्ति रखता है। सम्पूर्ण भारतीय क्षेत्र से कोई भी व्यक्ति अपने मूल अधिकारों की रक्षा के लिये सीधे सर्वोच्च न्यायालय में अपील कर सकता है।
- रिट जारी करने की शक्ति सर्वोच्च न्यायालय को अनुच्छेद-32 के अन्तर्गत जबकि उच्च न्यायालय को अनुच्छेद-226 के अन्तर्गत प्राप्त है। उच्च न्यायालय विधिक अधिकार (कानूनी अधिकार) के सम्बन्ध में  अन्तरिम राहत प्रदान करने हेतु “इन-जक्सन” नामक रीट भी जारी कर सकता है। इसी कारण रिट जारी करने के सम्बन्ध में उच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार व्यापक है।

प्रमुख रिट या प्रलेख निम्न हैं-
बन्दी प्रत्यक्षीकरण– इसका शाब्दिक अर्थ है 'को प्रस्तुत किया जाए' यह रिट ऐसे व्यक्ति या प्राधिकारी के विरुद्ध जारी की जाती है, जिसने किसी व्यक्ति को अवैध रूप से निरुद्ध किया है। इसके अनुसार न्यायालय निरुद्ध या कारावासित व्यक्ति को अपने समक्ष उपस्थित कराता है।
परमादेश– इसका शाब्दिक अर्थ है- 'हम आदेश देते हैं।' इस रिट का प्रयोग ऐसे अधिकारी को आदेश देने के लिए किया जाता है जो सार्वजनिक कर्तव्यों को करने से इंकार या उपेक्षा करता है।
यह रिट राष्ट्रपति एवं राज्यपाल के विरुद्ध जारी नहीं की जा सकती है।
प्रतिषेध– इसका अर्थ है- 'मना करना या रोकना।' इसके अनुसार ऐसी अधिकारिता का प्रयोग करने से निषिद्ध किया जाता है, जो उसमें निहित नहीं है। यह रिट सिर्फ न्यायिक या अर्द्धन्यायिक कृत्यों के विरुद्ध जारी की जाती है। जिस तरह परमादेश सीधे सक्रिय रहता, प्रतिषेध सीधे सक्रिय नहीं रहता है।
उत्प्रेषण– इसका शाब्दिक अर्थ है- 'सूचना देना या प्रमाणित होना।' उत्प्रेषण प्रलेख प्रतिषेध प्रलेख के समान ही है, क्योंकि दोनों अधीनस्थ न्यायालयों के विरुद्ध जारी की जाती हैं किन्तु दोनों प्रलेखों में मुख्य अन्तर यह है कि प्रतिषेध रिट कार्यवाही के दौरान, कार्यवाही को रोकने के लिए जारी की जाती है, जबकि उत्प्रेषण रिट कार्यवाही की समाप्ति पर निर्णय को रद्द करने हेतु जारी की जाती है।
अधिकार पृच्छा– इसका शाब्दिक अर्थ 'किसी प्राधिकृत या वारंट के द्वारा है।' यदि किसी व्यक्ति के द्वारा गैर वैधानिक तरीके से किसी भी पद को धारण किया गया हो तो न्यायालय इस रिट के माध्यम से उसके पद का आधार पूछती है। अन्य चार रिटों से हटकर इसे किसी भी इच्छुक व्यक्ति द्वारा जारी किया जा सकता है, न कि पीड़ित द्वारा। इसे मंत्रित्व और निजी कार्यालय के लिए जारी नहीं किया जा सकता।

अनुच्छेद 33
- इस भाग द्वारा प्रदत्त अधिकारों का सशस्त्र बलों आदि को लागू होने में, उपांतरण करने की संसद की शक्ति।

अनुच्छेद 34
- किसी क्षेत्र में सेना विधि प्रवृत्त है तब इस भाग द्वारा प्राप्त अधिकारों पर निर्बंधन।

अनुच्छेद 35
- मूल अधिकारों के सम्बन्ध में विधि निर्माण केवल संसद कर सकती है, राज्य विधानमंडल विधि निर्माण नहीं कर सकती।