राजपूत राजवंश
क्षेत्रिय राज्यों का प्रादुर्भाव
- 800 - 1200 ई. का काल राजपूत काल के नाम से भी जाना जाता है। इस काल में अधिकांश शासक राजपूत थे।
- गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद पाटलिपुत्र का स्थान कन्नौज ने ले लिया।
- हर्ष की मृत्यु के बाद कन्नौज पर आधिपत्य के लिए बंगाल के पाल दक्षिण के राष्ट्रकूट तथा उत्तर के गुर्जर - प्रतिहारों के बीच त्रिपक्षीय संघर्ष हुआ।
पाल वंश :
- पाल वंश की स्थापना 750 ई. में गोपाल द्वारा की गयी।
- गोपाल का उत्तराधिकारी धर्मपाल हुआ (770-810 ई.) जिसे राष्ट्रकूट राजा ध्रुव ने पराजित किया।
- परन्तु ध्रुव के वापस लौटने पर धर्मपाल ने कन्नौज पर अधिकार कर पंजाब, पूर्वी राजस्थान आदि को जीत लिया।
- प्रतिहार नरेश नागभट्ट द्वितीय ने मुंगेर के निकट धर्मपाल को पराजित किया।
- पाल और प्रतिहार राजाओं के बीच बिहार तथा पूर्वी उत्तर प्रदेश पर नियंत्रण के लिए बराबर संघर्ष हुए।
- 9वीं शताब्दी के मध्य में सुलमान नामक एक अरबी यात्री ने भारत की यात्रा की। उसने पाल साम्राज्य को 'रूहमा' (धर्म या धर्मपाल का संक्षिप्त) कहा है।
- तिब्बती इतिवृत्तियों के अनुसार पाल शासक बौद्धधर्म के संरक्षक थे।
- नालन्दा विश्वविद्यालय (बिहार) को धर्मपाल ने पुनर्जीवित किया था तथा उसके खर्च के लिए 200 गाँवों का अनुदान दिया था।
- धर्मपाल ने विक्रमशिला विश्वविद्यालय (बंगाल) की भी स्थापना की थी।
- शैलेन्द वंश बौद्ध अनुयायी थे।
- शैलेन्द्र राजा ने पाल शासक से नालन्दा में एक बौद्ध मठ की स्थापना की अनुमति मांगी तथा पाल नरेश देवपाल से इस मठ की सहायता हेतु पाँच गाँवों का अनुदान भी मांगा। देवपाल ने इसे स्वीकार कर लिया।
प्रतिहार वंश :
- प्रतिहार को गुर्जर - प्रतिहार भी कहा जाता है क्योंकि उनकी उत्पत्ति गुजरात या दक्षिण - पूर्वी राजस्थान से हुई थी।
- सिंध की ओर से राजस्थान पर होने वाले अरब शासकों के आक्रमण को रोकने के लिए उनकी ख्याति में वृद्धि हुई।
- प्रतिहार वंश और साम्राज्य का वास्तविक और सर्वश्रेष्ठ राजा भोज था।
- कन्नौज प्रतिहारों की राजधानी थी।
- भोज विष्णु का पुजारी था और 'आदिवराह' की उपाधि धारण की।
- कुछ समय पश्चात् कन्नौज पर शासन करने वाले परमार वंशी राजा भोज और इस प्रतिहार वंशी राजा भोज में अंतर स्पष्ट करने के लिए इसे कभी - कभी मिहिर भोज भी कहा जाता है।
- बगदाद निवासी अलमसूदी 915-916 ई. में गुजरात आया था। उसने गुर्जर-प्रतिहार को अल-गुजर तथा राजा को बौरा कहकर पुकारा है जो आदिवराह का अशुद्ध उच्चारण है।
- राजशेखर की कृतियाँ - कर्पूरमंजरी, काव्यमीमांसा, विठुशालभञ्जिका व बालरामायण। राजशेखर महेन्द्रपाल के गुरु थे। इन्हीं के दरबार में रहते थे।
- प्रतिहार सिंध के अरबी शासकों के विरुद्ध शत्रुता के लिए विख्यात थे।
गहड़वाल वंश :
- गुर्जर - प्रतिहारों के बाद चन्द्रदेव ने 1080-85 में कन्नौज में गहड़वाल वंश की स्थापना की।
- गोविन्दचन्द्र (1114-1154) इस वंश का महत्वपूर्ण शासक था। इसके मंत्री लक्ष्मीधर ने कल्पद्रुम नामक विधिग्रंथ की रचना की।
- जयचंद, गहड़वाल वंश का अंतिम शक्तिशाली शासक था।
- 1194 के चन्दावर युद्ध में मुहम्मद गोरी ने जयचंद को पराजित किया।
- नैषधचरित के लेखक श्रीहर्ष जयचन्द के दरबार में रहता था।
दिल्ली तथा अजमेर के चौहान :
- सातवीं शताब्दी में वासुदेव ने चौहान शाकम्भरी वंश की स्थापना की।
- विग्रहराज चतुर्थ बीसलदेव (1158-1163) महान कवि एवं लेखक भी था। उसने हरिकेली नामक नाटक की रचना की।
- 1178 में पृथ्वीराज तृतीय या रायपिथौरा दिल्ली की गद्दी पर बैठा।
- तराइन के प्रथम युद्ध में 1191 में पृथ्वीराज चौहान ने मुहम्मद गोरी को पराजित किया लेकिन तराइन के द्वितीय युद्ध में चौहान पराजित हुए।
सेनवंश :
- सामंत सेन ने राढ में सेनवंश की स्थापना की।
- बल्लाल सेन का उत्तराधिकारी लक्ष्मण सेन ने गहड़वाल शासक जयचंद के खिलाफ सैन्य अभियान में सफलता प्राप्त की।
- 1202 ई. में बख्तियार खिलजी ने लक्ष्मणसेन की राजधानी लखनौती पर आक्रमण किया था।
- लक्ष्मण सेन के राजदरबार में गीतगोविन्द के लेखक जयदेव तथा हलायुध एवं पवनदूतम के लेखक धोयी कवि रहते थे।
बुंदेलखंड के चंदेल :
- चंदेल वंश का संस्थापक नन्नुक था।
- पूर्व में चंदेल गुर्जर - प्रतिहार के सामंत थे।
- चंदेलों की राजधानी खजुराहो थी।
- खजुराहो में चतुर्भुज मंदिर का निर्माण यशोवर्मन ने किया था।
- खजुराहो में ही विश्व प्रसिद्ध कंदरिया महादेव का मंदिर बनवाने का श्रेय धंग को जाता है।
- इस वंश का अंतिम महान शासक परमर्दिदेव (1165-1203) को पृथ्वीराज तृतीय ने पराजित किया था।
मालवा के परमार वंश :
- परमार वंश का प्रथम स्वतंत्रत शासक सीयक/श्रीहर्ष था।
- परमारों की आरम्भिक राजधानी उज्जैन में थी जिसे बाद में धारा स्थानान्तरित कर दिया गया।
- भोज इस वंश का सबसे महत्वपूर्ण शासक था। अपने विद्वता के कारण वह 'कविराज' नाम से जाना जाता था।
- भोज ने ही राजधानी उज्जैन से धारा स्थानान्तरित की तथा त्रिभुवन नारायण मंदिर (चित्तौड़) का निर्माण करवाया।
- भोज ने अनेक ग्रंथों की रचना की - समरांगण सूत्रधार, राज मार्तंड, सरस्वती कंठाभरण आदि।
कलचुरी वंश :
- कलचुरी चेदि वंश के नाम से भी प्रसिद्ध है।
- इस वंश की स्थापना कोकल्ल प्रथम ने की थी।
- त्रिपुरी कलचुरियों की राजधानी थी।
- कलिंग विजय के बाद कर्णदेव ने 'त्रिकलिंगाधिपति' की उपाधि धारण की।
हिन्दूशाही वंश :
- हिन्दूशाही वंश की स्थापना कल्लर ने 9वीं शताब्दी में की तथा उदमांडपुर (अटक) को अपनी राजधानी बनाया।
- तोरमण तथा भीमदेव इस वंश के अन्य महत्वपूर्ण शासक हुए।
- जयपाल ने महमूद गजनवी द्वारा पराजित होने के बाद आत्मदाह कर लिया।
कश्मीर के राजवंश :
- कर्कोट राजवंश - दुर्लभवर्धन ने कश्मीर ने कर्कोट वंश की स्थापना की।
- ललितादित्य मुक्तापीड (724-760) ने 723 ई. में चीन में दूत भेजा था।
- सूर्य के मार्तंड मंदिर का निर्माण भी ललितादित्य मुक्तापीड के शासनकाल में हुआ।
- जयापीड विनयादित्य इस वंश का अंतिम शासक था।
उत्पल वंश :
- उत्पल वंश की स्थापना अवंतिवर्मन ने की (855-885)।
- कश्मीर शासक क्षेमेन्द्रगुप्त का विवाह लोहार वंश की राजकुमारी दिद्दा से हुआ जिसने क्षेमेन्द्र की मृत्यु के बाद 50 वर्ष तक कश्मीर पर शासन किया।
लोहार वंश :
- लोहार वंश का संस्थापक संग्राम राज था।
- इसी वंश का हर्ष एक कवि, विद्वान एवं अनेक भाषाओं का ज्ञाता था।
- राजतरंगिणी का लेखक कल्हण हर्ष का दरबारी कवि था।
- हर्ष को कश्मीर का नीरो कहा जाता है।
कामरूप का वर्मन राजवंश :
- पुष्यवर्मन इस राजवंश का प्रथम महत्वपूर्ण शासक था जिसने प्रागज्योतिषपुर (असम) को अपनी राजधानी बनाया।
अन्हिलवाड़ के चालुक्य :
- मूलराज प्रथम इसके संस्थापक थे जिसने अन्हिलवाड़ को अपनी राजधानी बनाया।
- भीम प्रथम के शासनकाल में महमूद गजनवी ने सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण किया।
- जयसिंह सिद्धराज के राजदरबार में प्रसिद्ध जैन आचार्य हेमचन्द्र रहते थे।
- मूलराज द्वितीय ने 1178 ई. में आबू पर्वत के समीप मुहम्मद गोरी को परास्त किया था।