उच्च न्यायालय

भारत में एकल न्यायिक व्यवस्था का प्रावधान है।

- भारत में उच्च न्यायालय संस्था का सर्वप्रथम गठन 1862 में कलकत्ता, बंबई और मद्रास उच्च न्यायालयों के रूप में हुआ।

- 1866 में चौथे उच्च न्यायालय की स्थापना इलाहाबाद (प्रयागराज) में हुई।  

- भारतीय संविधान के भाग-6 के अनुच्छेद 214 से लेकर 232 तक राज्यों के उच्च न्यायालय के संगठन एवं प्राधिकार संबंधी प्रावधानों का वर्णन किया गया है।

- अनुच्छेद 214 के तहत प्रत्येक राज्य में एक उच्च न्यायालय होगा लेकिन अनुच्छेद 231 के अन्तर्गत संसद को दो या दो से अधिक राज्यों के लिए एक ही उच्च न्यायालय की व्यवस्था की शक्ति प्राप्त है। (7 वें संविधान 1956 के तहत)

-  अनुच्छेद 230 के तहत संसद कानून बनाकर किसी उच्च न्यायालय का विस्तार संघ शासित प्रदेश के लिए कर सकती है।

- पहले भारत में 21 उच्च न्यायालय थे।

- मार्च 2013 में मेघालय, मणिपुर एवं त्रिपुरा में नए उच्च न्यायालय स्थापित किए गए हैं।

- निम्न संयुक्त उच्च न्यायालय है-

i. पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ़ :- चंडीगढ़ उच्च न्यायालय

ii. महाराष्ट्र, गोवा, दमन व दीव, दादर एवं नागर हवेली- बॉम्बे उच्च न्यायालय

iii. असम, अरुणाचल प्रदेश, नागालैण्ड, मिजोरम :- गुवाहटी उच्च न्यायालय

iv. तमिलनाडु, पुडुचेरी :- मद्रास उच्च न्यायालय

v. केरल, लक्षद्वीप :- एर्नाकुलम उच्च न्यायालय

vi. प. बंगाल, अण्डमान एवं निकोबार द्वीप समूह:- कलकत्ता उच्च न्यायालय

- वर्तमान में 25 उच्च न्यायालय है।

- 25 वां उच्च न्यायालय आंध्रप्रदेश राज्य का जो 1 जनवरी, 2019 अमरावती में स्थापित हुआ है। 

- केन्द्रशासित प्रदेशों में दिल्ली ऐसा संघ क्षेत्र है जिसका अपना उच्च न्यायालय (1966 से) है।

नोट :- जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम 2019 के तहत जम्मू-कश्मीर राज्यों को दो केन्द्रशासित प्रदेशों (जम्मू-कश्मीर व लद्दाख) में विभाजित कर दिया गया। इससे पूर्व जम्मू कश्मीर राज्य में भी उच्च न्यायालय था लेकिन इस एक्ट के लागू होने के बाद जम्मू-कश्मीर राज्य का उच्च न्यायालय जम्मू-कश्मीर केन्द्रशासित प्रदेश में यथास्थित रहेगा।

उच्च न्यायालय का गठन (अनुच्छेद 216)

- अनुच्छेद 216 में उच्च न्यायालय के गठन का उल्लेख किया गया है। जिसमें एक मुख्य न्यायाधीश और अन्य न्यायाधीश होंगे। संिवधान में न्यायाधीशों की संख्या निश्चित नहीं है। राष्ट्रपति समय-समय पर आवश्यकतानुसार न्यायाधीशों की संख्या निर्धारित करते है।

न्यायाधीशों की नियुक्ति (अनुच्छेद 217)

- उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।

- उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा भारत के मुख्य न्यायाधीश और संबंधित राज्य के राज्यपाल से परामर्श के पश्चात की जाती है। 

- कॉलेजियम की अनुशंसा पर अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।

- संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश तथा उच्च न्यायालय के 2 वरिष्ठतम न्यायाधीश इस संदर्भ में पहल करते हैं।

- इनके द्वारा उच्चतम न्यायालय के कॉलेजियम (भारत का मुख्य न्यायाधीश + 4 वरिष्ठतम न्यायाधीश) के पास नाम भेजे जाते है। यह कॉलेजियम राष्ट्रपति को इस सन्दर्भ में अनुशंसा करते हैं। 

नोट :-  99 वें संविधान संशोधन अधिनियम 2014 तथा राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग अधिनियम 2014 द्वारा SC एवं HC के न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम प्रणाली की जगह राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) का गठन किया गया लेकिन SC ने इस संशोधन एवं अधिनियम को असंवैधानिक घोषित कर दिया। वर्तमान में कॉलेजियम व्यवस्था के तहत ही न्यायाधीशों की नियुक्ति होती है।

न्यायाधीशों की योग्यताएँ [अनुच्छेद 217 (2)]

1. वह भारत का नागरिक हो।

2. वह भारत के राज्यक्षेत्र में कम से कम दस वर्ष तक न्यायिक पद धारण कर चुका हो।

या

वह उच्च न्यायालय या न्यायालयों में लगातार 10 वर्षों तक अधिवक्ता रह चुका हो।

शपथ अथवा प्रतिज्ञान (अनुच्छेद 219)

- सभी न्यायाधीशों को शपथ राज्यपाल अथवा राज्यपाल द्वारा अधिकृत किए गए व्यक्ति द्वारा दिलायी जाती है।

- सभी न्यायाधीश पद तथा संविधान के प्रति निष्ठा की शपथ लेते हैं।

- उच्च न्यायालय का न्यायाधीश तीसरी अनुसूची के अनुसार शपथ ग्रहण करता है।

नोट–(1) अनुच्छेद 220 में यह स्पष्ट उल्लिखित है कि उच्च न्यायालय का न्यायाधीश सेवानिवृत्ति के बाद उन उच्च न्यायालयों में अधिवक्ता के रूप में सेवा नहीं दे सकते हैं जहाँ उन्होंने न्यायाधीश के रूप में सेवा दी है। 

(2) न्यायाधीशों को सेवानिवृत्ति के बाद भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन कोई लाभ का पद भी नहीं दिया जाता है।

(3) न्यायाधीश सेवानिवृत्ति के बाद चुनाव लड़ सकते हैं। उदाहरण के लिए – उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश विजय बहुगुणा किसी भी राज्य के पहले एवं एकमात्र मुख्यमंत्री है जो उच्च न्यायालय में न्यायाधीश भी रह चुके है।

वेतन एवं भत्ते (अनुच्छेद 221)

- उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतन भत्ते राज्य की संचित निधि से मिलते हैं परन्तु पेंशन भारत की संचित निधि से मिलती है।

- उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश का वेतन 2,50,000/- तथा अन्य न्यायाधीशों का वेतन  2,28,000/- हैं।

- पद पर रहते हुए उनके वेतन भत्ते में अलाभकर परिवर्तन नहीं किया जा सकता है।

न्यायाधीशों का कार्यकाल

- संविधान में उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों का कार्यकाल निश्चित नहीं किया गया है। लेकिन इस संबंध में चार प्रावधान किए गए है।

1. उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की 62 वर्ष की सेवानिवृत्ति आयु होती है। (15 वें संशोधन एक्ट 1963 द्वारा सेवानिवृत्ति की आयु 60 से 62 वर्ष कर दी गई।)

नोट :- 114 वें संविधान संशोधन विधेयक के द्वारा उच्च न्यायालय के जजों की सेवानिवृत्ति की आयु 62 से 65 वर्ष बढ़ाने का प्रावधान था लेकिन विधेयक पारित नहीं हुआ।

2. राष्ट्रपति को त्यागपत्र भेज सकता है।

3. संसद की सिफारिश से राष्ट्रपति उसे पद से हटा सकता है।

4. उसकी नियुक्ति उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीश के रूप में हो जाने या उसका किसी दूसरे उच्च न्यायालय में स्थानांतरण हो जाने पर वह पद छोड़ देता है।

न्यायाधीशों को हटाना 

- संविधान में न्यायाधीशों को हटाने के लिए Remoral शब्द काम में लिया गया है जिसका अर्थ है “पद से हटाना” जबकि राष्ट्रपति के लिए Impeachment शब्द काम में लिया गया है जिसका अर्थ है “महाभियोग”।

- हटाने के दो आधार “सिद्ध कदाचार” और “अक्षमता” है।

- उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को राष्ट्रपति के आदेश से पद से हटाया जा सकता है।

-  राष्ट्रपति न्यायाधीश को हटाने का आदेश संसद द्वारा उसी सत्र में पारित प्रस्ताव के आधार पर ही जारी कर सकता है।

- प्रस्ताव को विशेष बहुमत के साथ संसद के प्रत्येक सदन का समर्थन (इस प्रस्ताव को उस सदन के कुल सदस्यों के बहुमत का समर्थन और उस सदन में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के 2/3 का समर्थन) मिलना आवश्यक है।

- इस तरह, सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश की तरह ही उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को उसी प्रक्रिया और आधारों पर हटाया जा सकता है।

-  न्यायाधीश जाँच एक्ट (1968) में उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को महाभियोग की प्रक्रिया द्वारा हटाने के नियम निम्न है–

1. यदि प्रस्ताव लोकसभा में पेश हो तो 100 सदस्यों या फिर राज्यसभा में पेश हो तो 50 सदस्यों द्वारा हस्ताक्षरित हटाने का प्रस्ताव को अध्यक्ष/सभापति को सौंपा जाएगा।  

2. अध्यक्ष/सभापति प्रस्ताव को स्वीकृत या अस्वीकृत कर सकता है।

3. यदि प्रस्ताव स्वीकृत को जाता है तो अध्यक्ष/सभापति एक समिति का गठन करेगा। समिति में उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश या कोई न्यायाधीश, किसी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश तथा एक प्रख्यात न्यायविद् होना अनिवार्य है।

4. यदि समिति यह पाती है कि न्यायाधीश कदाचार का दोषी है या अयोग्य है तो सदन प्रस्ताव पर विचार कर सकता है।

5. संसद के दोनों सदनों द्वारा विशेष बहुमत से प्रस्ताव पास होने के बाद न्यायाधीश को हटाने के लिए इसे राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है।

6. अंतत: न्यायाधीश को हटाने के लिए राष्ट्रपति आदेश पारित कर देते हैं।

- इस प्रकार उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के समान ही है।

नोट– पी.डी. दीनाकरन (कर्नाटक), सोमित्र सेन (कलकत्ता), एस. के सेंगले (जबलपुर) तथा जे.बी. पारदीवाला (गुजरात) उच्च न्यायालय के 4 ऐसे न्यायाधीश है जिन्हें हटाने हेतु राज्यसभा में प्रस्ताव लाया गया था। दीनाकरन ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। सेंगले के विरुद्ध गठित समिति ने आरोपों को खारिज कर दिया। पारदीवाला के विरुद्ध लाया गया प्रस्ताव लम्बित है। जबकि सोमित्र सेन एकमात्र ऐसे न्यायाधीश है जिनके विरुद्ध राज्यसभा में प्रस्ताव पारित किया गया है। लेकिन लोकसभा में चर्चा होने से पहले ही उन्होंने अपना इस्तीफा दे दिया। 

न्यायाधीशों का स्थानांतरण (अनुच्छेद 222)

- भारत के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श के बाद राष्ट्रपति एक न्यायाधीश का स्थानांतरण एक उच्च न्यायालय से दूसरे उच्च न्यायालय में कर सकता है।

- तृतीय न्यायाधीश केस (1998) में उच्चतम न्यायालय ने राय दी िक उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के स्थानांतरण मामले में भारत के मुख्य न्यायाधीश को उच्चतम न्यायालय  के चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों, उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों (एक वहाँ से जहाँ से न्यायाधीश का स्थानांतरण हो रहा है, एक वहाँ से जहाँ वह जा रहा हो) से परामर्श करना चाहिए।

- इस तरह एकमात्र भारत के मुख्य न्यायाधीश की राय से ही परामर्श प्रक्रिया पूरी नहीं होती है।

कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश (अनुच्छेद 223)

- राष्ट्रपति किसी उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को निम्न तीन स्थितियों में उच्च न्यायालय का कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश नियुक्त कर सकता है-

 1.  उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश का पद रिक्त हो।

 2.  उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश अस्थायी रूप से अनुपस्थित हो।

 3.  यदि मुख्य न्यायाधीश अपने कार्य में अक्षम हो।

अतिरिक्त और कार्यकारी न्यायाधीश (अनुच्छेद 224)

-  अतिरिक्त का प्रावधान केवल उच्च न्यायालय के लिए है। जबकि तदर्थ न्यायाधीश की नियुक्ति उच्च न्यायालय में नहीं की जाती।

- राष्ट्रपति भारत के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श के बाद निम्नलिखित परिस्थितियों में योग्य व्यक्तियों को उच्च न्यायालय के अतिरिक्त न्यायाधीशों के रूप में अस्थायी रूप से नियुक्त कर सकते है, जिसकी अवधि 2 वर्ष से अधिक नहीं होगी।

1. यदि अस्थायी रूप से उच्च न्यायालय का कामकाज बढ़ गया हो।

2. उच्च न्यायालय में बकाया कार्य अधिक हो।

- राष्ट्रपति उस पारिस्थितियों में योग्य व्यक्तियों को किसी उच्च न्यायालय का कार्यकारी न्यायाधीश नियुक्त कर सकता है जब उच्च न्यायालय का न्यायाधीश (मुख्य न्यायाधीश के अलावा) अनुपस्थित या अन्य कारणों से अपने कार्यों का निष्पादन करने में असमर्थ हो तथा किसी न्यायाधीश को अस्थायी तौर पर संबंधित उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया हो।

नोट :- हालांकि अतिरिक्त या कार्यकारी न्यायाधीश 62 वर्ष की आयु के पश्चात पद पर नहीं रह सकता।

सेवानिवृत्त न्यायाधीश [अनुच्छेद 224 (A)]

- उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश किसी भी समय उस उच्च न्यायालय अथवा किसी अन्य उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश को अस्थायी के लिए बतौर कार्यकारी न्यायाधीश काम करने के लिए कह सकते हैं।

- वह ऐसा राष्ट्रपति की पूर्व संस्तुति एवं संबधित व्यक्ति की मंजूरी के बाद ही कर सकता है।

न्यायाधीशों की स्वाधीनता

- संविधान में अनुच्छेद 202 के तहत व्यवस्था की गई है कि न्यायाधीशों के वेतन एवं भत्ते राज्य की संचित निधि पर भारित होंगे।

- अनुच्छेद 221 के तहत न्यायाधीशों की नियुक्ति के पश्चात संसद उनके वेतन व भत्तों में अलाभकारी परिवर्तन नहीं कर सकती।

नोट :- अनुच्छेद 360 (4) (ख) के अनुसार अलाभकारी परिवर्तन केवल वित्तीय आपातकाल के समय ही हो पाएगा। 

- उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को पद से उसी रीति से हटाया जाएगा, जिस रीति से उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है।

उच्च न्यायालय का न्याय क्षेत्र एवं शक्तियाँ

- उच्च न्यायालय राज्य में अपील करने का सर्वोच्च न्यायालय होता है।

- यह नागरिकों के मूल अधिकारों का रक्षक होता है।

-  उच्च न्यायालय की समस्त शक्तियों एवं क्षेत्राधिकार को तीन वर्गों में बाँटा जा सकता है।

1. न्याय संबंधित शक्तियाँ

A. प्रारंभिक क्षेत्राधिकार / मूल अधिकारिता

- प्रारंभिक क्षेत्राधिकार का अर्थ है उच्च न्यायालय की विवादों की प्रथम दृष्टया सुनवाई सीधे (न कि अपील के जरिए) करने का अधिकार है जो निम्नलिखित मामलों में विस्तारित है-

i. अधिकारिता का मामला, वसीयत, विवाह, तलाक, कंपनी कानून, न्यायालय की अवमानना।

ii. संसद सदस्यों और विधानमंडल सदस्यों के निर्वाचन संबंधी विवाद।

iii. राजस्व मामले या राजस्व संग्रहण के लिए बनाए गए किसी अधिनियम अथवा आदेश के संबंध में।

iv. नागरिकों के मूल अधिकारों का प्रवर्तन।

v. संविधान की व्याख्या के संबंध में अधीनस्थ न्यायालय से स्थानांतरित मामलों में।

vi. उच्च महत्त्व के मामलों में चार उच्च न्यायालयों (कलकत्ता, बंबई, मद्रास और दिल्ली उच्च न्यायालय) के मूल नागरिक क्षेत्राधिकार है।

नोट :- 1973 से पूर्व कलकत्ता, बंबई एवं मद्रास उच्च न्यायालयों के पास मूल आपराधिक न्यायिक क्षेत्र थे। इनका अापराधिक प्रक्रिया संहिता 1973 द्वारा पूर्णतया: निरस्त कर दिया गया। 

B. अपीलीय क्षेत्राधिकार

-  उच्च न्यायालय को दीवानी एवं फौजदारी दोनों मामलों में अपील सुनने का अधिकार प्राप्त है।

i. दीवानी मामले :- इस संबंध में उच्च न्यायालय का न्यायादेश निम्नानुसार है-

a) जिला न्यायाधीशों और अन्य अधीनस्थ न्यायाधीशों से ऊँचे मूल्य वाले वादों में तथ्य और विधि दोनों के प्रश्नों पर अपील सीधे उच्च न्यायालय को होती है।

b) पेटेण्ट तथा डिजाइन, उत्तराधिकार, भूमि प्राप्त, दिवालियापन और संरक्षता आदि अभियोगों का मामलों में।

c) कोई ऐसा मामला जिसमें संविधान की व्याख्या का प्रश्न निहित हो (तथ्यों का नहीं)

ii. आपराधिक मामले :- उच्च न्यायालय का आपराधिक मामलों में अपीलीय क्षेत्राधिकार निम्नलिखित है-  

a) सत्र न्यायालय और अतिरिक्त सत्र न्यायालय के निर्णय के खिलाफ उच्च न्यायालय में तब अपील की जा सकती है जब किसी को सात साल से अधिक सजा हुई है।

नोट :- सत्र न्यायालय या अतिरिक्त सत्र न्यायालय द्वारा दी गई मृत्यु-दण्ड पर कार्यवाही से पहले उच्च न्यायालय द्वारा इसी पुष्टि की जानी चाहिए। चाहे सजा पाने वाले व्यक्ति ने कोई अपील की हो या न की हो। 

b) आपराधिक प्रक्रिया संहिता (1973) में कुछ मामलों में उल्लिखित सहायक सत्र न्यायाधीश, नगर दडांधिकारी या उच्च दंडाधिकारी के निर्णय के विरुद्ध उच्च न्यायालय में अपील की जा सकती है। 

C. रिट क्षेत्राधिकार

- अनुच्छेद 226 के अनुसार प्रत्येक उच्च न्यायालय अपनी अधिकारिता वाले समूचे राज्य क्षेत्र में मूल अधिकारों को लागू कराने के लिए या किसी अन्य प्रयोजन के लिए किसी व्यक्ति या प्राधिकारी को ऐसे निर्देश, आदेश या रिट जैसे बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, अधिकार-पृच्छा,उत्प्रेषण, इं-जंक्शन रिट या उनमें से किसी को जारी कर सकेगा।

नोट – इं-जंक्शन नामक याचिका केवल उच्च न्यायालय में ही दायर की जाती है। यह याचिका अंतरिम राहत उपलब्ध करवाती है। 

- जब किसी नागरिक के मूल अधिकार का हनन होता है तो पीड़ित व्यक्ति का अधिकार है कि वह या तो उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय सीधे जा सकता है।

- हालांकि उच्च न्यायालय का इस संबंध में न्यायिक क्षेत्र में उच्चतम न्यायालय से ज्यादा विस्तारित है क्योंकि उच्चतम न्यायालय केवल मूल अधिकारों के हनन होने पर रिट जारी करता है जबकि उच्च न्यायालय मूल अधिकारों सहित एक सामान्य कानूनी अधिकार के उल्लंघन पर रिट जारी कर सकता है। 

D. उच्च न्यायालय का अभिलेख न्यायालय होना/कोर्ट ऑफ रिकॉर्ड

- संविधान के अनुच्छेद 215 के अनुसार प्रत्येक उच्च न्यायालय अभिलेख न्यायालय होगा और उसका अपने अवमानना के लिए दण्ड देने की शक्ति सहित ऐसे न्यायालय की सभी शक्तियाँ होगी। उच्च न्यायालय को अपने अधीनस्थ न्यायालयों के संरक्षण निर्देशन की शक्ति है। इसे अवमानना पर दंड की शक्ति भी है।

नोट – सन् 2017 में कलकत्ता उच्च न्यायालय के तात्कालीन न्यायाधीश सी.एस. कर्णन को अवमानना के मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा 6 माह की सजा दी गई थी।  

E. पर्यवक्षीय क्षेत्राधिकार

- उच्च न्यायालय को अधिकार है कि वह अपने क्षेत्राधिकार के क्षेत्र के सभी न्यायालयों व सहायक न्यायालयों के क्रियाकलापों पर नजर रखे।

-  इस प्रकार वह 

a) मामले वहाँ से स्वयं के पास मंगवा सकता है।

b) सामान्य नियम तैयार और जारी कर सकता है।

c) उनके द्वारा रखे जाने वाले लेख, सूची आदि के लिए प्रपत्र निर्धारित कर सकता है।

d) क्लर्क, अधिकारी एवं वकीलों के शुल्क आदि निश्चित करता है।

2. प्रशासन संबंधित शक्तियाँ

- उच्च न्यायालय को यह अधिकार है कि वह अपने अधीनस्थ न्यायालयों के किसी निर्णय के बारे में पूछताछ कर सकता है।

- संविधान का अनुच्छेद 227 उच्च न्यायालय को अन्य अधीनस्थ न्यायालयों के अधीक्षण की शक्ति देता है।

- उच्च न्यायालय को यह भी देखने का अधिकार है कि अधीनस्थ न्यायालय शक्ति का अतिक्रमण तो नहीं कर रहे है।

- उच्च न्यायालय को अभियोगी को एक न्यायालय से दूसरे न्यायालय को स्थानांतरित करने का भी अधिकार है।

- अनुच्छेद 228 के अंतर्गत उच्च न्यायालय संवैधानिक महत्त्व के प्रश्नों को अधीनस्थ न्यायालय से अपने पास मंगा सकता है।

नोट – अनुच्छेद 229 के तहत उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश अपने अधिकारियों व कर्मचारियों की नियुक्ति करते हैं। उनके सन्दर्भ में सेवा शर्तों का निर्धारण करना भी उच्च न्यायालय का ही कार्य है।

3. न्यायिक पुनरावलोकन की शक्तियाँ

- उच्च न्यायालय की न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति राज्य विधानमंडल व केन्द्र सरकार दोनों के अधिनियमों और कार्यकारी आदेशों की संवैधानिकता के परीक्षण के लिए है।

- यदि वे संविधान का उल्लंघन करने वाले है तो उन्हें असंवैधानिक और शून्य घोषित किया जा सकता है।

-  यद्यपि न्यायिक पुनरवलोकन जैसे शब्द का उल्लेख संविधान में कही भी नहीं किया गया है लेकिन अनुच्छेद 13 और 226 में उच्च न्यायालय द्वारा समीक्षा के उपबंध स्पष्ट है।