युरोपियन आगमन

• अठारहवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में मुगल साम्राज्य के शीघ्र विघटन के कारण विविध भारतीय शक्तियों में राजनीतिक शून्यता को भरने के लिए तीव्र प्रतिद्वंद्विता दृष्टिगोचर हुई। कुछ समय के लिए ऐसा प्रतीत हुआ, कि मराठे मुगलों के स्थान पर भारत में सर्वाधिक शक्तिशाली हैं। लेकिन उनकी शक्ति के ह्रास ने भी यूरोपीय व्यापारिक कंपनियों को भारतीय राजनीति में सक्रिय होने का अवसर प्रदान किया।

• आरंभ में यूरोपीय कंपनियों ने स्थानीय शासकों के राजनीतिक मामलों में हस्तक्षेप करना शुरू किया। इस चरण में सर्वोच्चता के लिए पारस्परिक द्वंद्वों में भी उलझ गए। अंतत: अंग्रेज़ उप-महाद्वीपीय राजनीतिक शक्ति की प्रतिस्पर्धा में सक्रिय हो गए और अंतिम विजयी के रूप में सफल हुए।

• उनकी इस सफलता के पीछे भारतीय शक्तियों की सामान्य दुर्बलताएँ थीं। भारतीय व्यापार से अर्जित धन को युद्ध की श्रेष्ठ विधियों के साथ प्रयोग करते हुए, अंग्रेज़ों ने भारत में ब्रिटिश साम्राज्य स्थापित किया।

• यूरोप से भारत पहुँचने हेतु दो मार्ग थे:-

1. स्थल मार्ग:- बाल्कन प्रदेशों से टर्की, फारस ईरान से अफगान तक पहुँचता था फिर खैबर, कुर्रम, बोलन, तथा गोमल आदि दर्रों से होते हुए भारत पहुँचता था।

2. जलमार्ग:- भूमध्यसागर अथवा कालासागर द्वारा लालसागर, फारस की खाड़ी और अरब सागर होते हुए भारत पहुँचता था। 15वीं सदी में इन दोनों मार्गों पर अरबों का प्रसार बढ़ता गया।

• 1453 ई. में उस्मानिया तुर्कों ने कुस्तुनतुनिया पर अधिकार कर लिया और धीरे-धीरे सम्पूर्ण दक्षिण-पश्चिम दक्षिण-पूर्वी यूरोपीय क्षेत्रों व्यापार पर अधिकार हो गया।

• इस अधिकार के साथ ही स्थल मार्ग व्यापार हेतु बंद हो गया, अत: यूरोपियों को नए जल मार्ग की आवश्यकता पड़ी।

• भारत में यूरोपियों के आगमन का क्रम:-

पुर्तगाली   –   डच     –    अंग्रेज  –  डेनिस –   फ्रांसीसी

(1498 ई.)   (1595 ई.)  (1600 ई.)  (1616 ई.)   1664 ई.)

• भारत में फैक्ट्री की स्थापना का क्रम -

1. पुर्तगाल – 1503 ई. – कोचीन

2. डच – 1605 ई. – मछलीपट्टनम

3. अंग्रेज – 1611 ई. – मछलीपट्टनम

4. डेनमार्क – 1620 ई. (तंजौर)

5. फ्रांसीसी – 1668 ई. (सूरत)

भारत में पुर्तगालियों का आगमन:-

• आधुनिक युग में भारत आने वाले यूरोपीय व्यापारियों के रूप में पुर्तगाली सर्वप्रथम रहे। पोप अलेक्जेण्डर ने एक आज्ञा पत्र द्वारा पूर्वी समुद्रों में पुर्तगालियों को व्यापार करने का एकाधिकार प्रदान किया। प्रथम यूरोपीय यात्री वास्को-डि गामा 90 दिन की समुद्री यात्रा के बाद अब्दुल मनीक नामक गुजराती पथ प्रदर्शक की सहायता से 1498 ई. में कालीकट (भारत) के समुद्री तट पर उतरा।

• वास्को-डि-गामा ने भारत आने और पुर्तगाल जाने पर हुए यात्रा व्यय के बदले में लगभग 60 गुना अधिक कमाई की। धीरे-धीरे पुर्तगालियों का भारत आने का क्रम जारी हो गया।

• पुर्तगालियों के दो प्रमुख उद्देश्य -

- अरबों और वेनिस के व्यापारियों का भारत से प्रभाव समाप्त करना।

- ईसाई धर्म का प्रचार करना।

• वास्को-डि-गामा के बाद पुर्तगालियों ने भारत में कालीकट, गोवा, दमन, दीव एवं हुगली के बंदरगाहों में अपनी व्यापारिक कोठियाँ स्थापित की। पूर्वी जगत के कालीमिर्च और मसालों के व्यापार पर एकाधिकार प्राप्त करने के उद्देश्य से पुर्तगालियों ने 1503 ई. में कोचीन (भारत) में अपने पहले दुर्ग की स्थापना की।

• 1505 ई. में फ्रांसिस्को अल्मेडा भारत में प्रथम पुर्तगाली वायसराय बन कर आया। उसने सामुद्रिक नीति (नीले पानी की नीति) को अधिक महत्त्व दिया तथा हिन्द महासागर में पुर्तगालियों की स्थिति को मजबूत करने का प्रयत्न किया। 1509 ई. में अल्मेडा ने मिस्र, तुर्की और गुजरात की संयुक्त सेना को पराजित कर दीव पर अधिकार कर लिया।

• अल्मेडा के बाद अलफांसो अल्बुकर्क 1509 ई. में पुर्तगालियों का दूसरा वायसराय बनकर भारत आया। उसने कोचीन को अपना मुख्यालय बनाया।

• 1510 ई. में उसने बीजापुर के शासक यूसुफ आदिल शाह से गोवा को छीन कर अपने अधिकार में कर लिया। गोवा के अलावा अल्बुकर्क ने 1511 ई. में मलक्का (द.पू.एशिया) और 1515 में फारस की खाड़ी में स्थित हरमुज पर अधिकार कर लिया। इस प्रकार दमन, दीव, सालसेट, बसीन, चोला, मुम्बई हरमुज तथा सेन्ट थोमे पर पुर्तगालियों का अधिकार हो गया।

• पुर्तगालियों की आबादी को बढ़ाने के उद्देश्य से अल्बुकर्क ने भारतीय स्त्रियों से विवाह को प्रोत्साहन दिया। उसने अपनी सेना में भारतीयों को भी भर्ती किया। 1515 ई. में अल्बुकर्क की मृत्यु हो गई। उसे गोवा में दफना दिया गया।

• अल्बुकर्क के बाद नीनो-डी-कुन्हा अगला पुर्तगीज गवर्नर बनकर भारत आया। 1530 ई. में उसने अपना कार्यालय कोचीन से गोवा स्थानान्तरित किया और गोवा को पुर्तगाल राज्य की औपचारिक राजधानी बनाई। कुन्हा ने सैन्थोमी (चेन्नई), हुगली (बंगाल) तथा दीव (काठमाण्डू) में पुर्तगाली बस्तियों को स्थापित कर भारत में पूर्वी समुद्र तट की ओर पुर्तगाली वाणिज्य का विस्तार किया। उसने 1534 ई. में बसीन और 1535 ई. में दीव पर अधिकार कर किया।

• मेड्रिक संधि:- 1633 ई. में यह संधि ब्रिटेन पुर्तगालियों के मध्य हुई थी। इसकी शर्त पुर्तगाल ब्रिटेन के मध्य व्यापारिक शत्रुता समाप्त करना था।

पुर्तगालियों का पतन

• अपनी शक्ति के विस्तार के साथ ही पुर्तगालियों ने भारतीय राजनीति में भी हस्तक्षेप करना प्रारम्भ कर दिया। यह कालीकट के राजा के शत्रुओं से, जिनमें कोचीन का राजा प्रमुख था, संधियाँ करने लगे।

• धार्मिक असहिष्णुता की नीति।

• अल्बुकर्क के अयोग्य उत्तराधिकारी।

• डच तथा अंग्रेज शक्तियों का विरोध।

• बर्बरतापूर्वक समुद्री लूटमार की नीति का पालन।

• स्पेन द्वारा पुर्तगाल की स्वतन्त्रता का हरण।

• विजयनगर साम्राज्य का विध्वंस आदि

• ब्राजील का पता लग जाने पर पुर्तगाल की उपनिवेश संबंधी क्रियाशीलता पश्चिम की ओर उन्मुख हो गई।

• हिन्द महासागर और दक्षिणी तट पर पुर्तगालियों के पतन के लिए निम्नलिखित कारण जिम्मेदार थे-

- एशियाई जहाजों की तुलना में पुर्तगाली नौसेना का अधिक कुशल होना।

- मुगल शासक शाहजहाँ ने 1632 ई. में पुर्तगालियों से हुगली छीन लिया, क्योंकि पुर्तगाली वहाँ पर लूटमार तथा धर्म परिवर्तन आदि निन्दनीय कार्य कर रहे थे।

भारत पर पुर्तगाली प्रभाव:-

• भारत में गोथिक स्थापत्य कला का आगमन पुर्तगालियों के साथ हुआ पुर्तगालियों ने गोवा, दमन और दीव पर 1961 ई. तक शासन किया।

• भारत जापान के मध्य व्यापार प्रारंभ करने का श्रेय पुर्तगालियों को दिया जाता है।

• ईसाई मिशनरियों ने भारत में धर्म परिवर्तन के प्रयास किए। 1540 ई. में गोवा के सभी हिंदू मंदिरों को नष्ट कर दिया गया।

• इसके द्वारा 1560 ई. में गोवा में ईसाई धार्मिक न्यायालय की स्थापना।

• 1556 ई. में गोवा में सर्वप्रथम प्रिंटिंग प्रेस की स्थापना पुर्तगालियों  द्वारा की गई थी।

• 1563 ई. में भारतीय जड़ी-बूटियाँ वनस्पति पर आधारित प्रथम पुस्तक ‘द इंडियन मेडिसनल प्लांट्स’प्रकाशित की गई।

भारत में डचों का आगमन

- डच लोग हालैण्ड के निवासी थे। दक्षिण-पूर्व एशिया के मसाला बाजारों में सीधा प्रवेश प्राप्त करना ही डचों का महत्वपूर्ण उद्देश्य था। 10 मार्च, 1602 की एक राजकीय घोषणा के आधार पर "यूनाईटेड ईस्ट इण्डिया कम्पनी ऑफ नीदरलैण्ड” की स्थापना की गई।

- 1596 ई. में भारत में आने वाला प्रथम डच नागरिक कारनोलिस डेडस्तमान था।

भारत में डचों की महत्वपूर्ण कोठियाँ

• डचों ने भारत में अपना पहला कारखाना 1605 ई. में मछलीपट्टनम में खोला। मछलीपट्टनम से डच लोग नील का निर्यात करते थे। डच लोग भारत में मुख्यतः मसालों , नील, कच्चे रेशम, शीशा, चावल अफीम का व्यापार करते थे। डचों ने मसालों के स्थान पर भारतीय कपड़ों को अधिक महत्त्व दिया। यह कपड़े कोरोमण्डल तट, बंगाल और गुजरात से निर्यात किए जाते थे।

• डचों का भारत में अन्तिम रूप से पतन 1759 ई. में अंग्रेजों एवं डचों के मध्य हुए ‘बेदारा के युद्ध’ में हुआ। इस युद्ध में अंग्रेजी सेना का नेतृत्व क्लाइव ने किया था।

भारत में अंग्रेजों का आगमन

• इंग्लैण्ड की रानी एलिजाबेथ-I के समय में 31 दिसम्बर, 1600 को ‘दि गवर्नर एण्ड कम्पनी ऑफ लन्दन ट्रेंडिंग इन्टू दि ईस्ट इंडीज’ अर्थात् ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी की स्थापना हुई जिसे महारानी एलिजाबेथ ने पूर्वी देशों से व्यापार करने के लिए चार्टर प्रदान किया।

• प्रारंभ में यह अधिकार मात्र 15 वर्ष के लिए मिला था, किन्तु कालान्तर में इसे 20-20 वर्षों के लिए बढ़ाया जाने लगा। ईस्ट इंडिया कम्पनी में उस समय कुल करीब 217 साझेदार थे। कम्पनी का आरम्भिक उद्देश्य व्यापार था।

• 1608 ई. में ब्रिटेन के सम्राट जेम्स प्रथम ने कैप्टन हॉकिन्स को अपने राजदूत के रूप में मुगल सम्राट जहाँगीर के दरबार में भेजा। 1609 ई. में हॉकिन्स ने जहाँगीर से मिलकर सूरत में बसने की इजाजत मांगी परन्तु पुर्तगालियों तथा सूरत के सौदागरों के विद्रोह के कारण उसे स्वीकृति नहीं मिली।

• हॉकिंस फारसी भाषा का ज्ञाता था। कैप्टन हॉकिंस तीन वर्ष आगरा में रहा। जहाँगीर ने उससे प्रसन्न होकर 400 का मनसब तथा जागीर प्रदान की।

• 1615 ई. में सम्राट जैम्स-I ने सर टामस-रो को अपना राजदूत बना कर जहाँगीर के पास भेजा।

• 1611ई. में दक्षिण-पूर्वी समुद्र तट पर सर्वप्रथम अंग्रेजों ने मछलीपट्टनम में व्यापारिक कोठी की स्थापना की। यहाँ से वस्त्रों का निर्यात होता था। 1632 ई. में गोलकुण्डा के सुल्तान ने एक सुनहरा फरमान दिया, जिसके अनुसार 500 पगोड़ा सालाना कर देकर गोलकुण्डा राज्य के बन्दरगाहों से व्यापार करने की अनुमति मिल गई।

• 1661ई. में इंग्लैण्ड के सम्राट चार्ल्स -II का विवाह पुर्तगाल की राजकुमारी कैथरीन से हुआ तथा चार्ल्स को बम्बई दहेज के रूप में प्राप्त हुआ जिसे उन्होंने 1668ई. में दस पौण्ड वार्षिक किराये पर कम्पनी को दे दिया था।

• 1639 ई. में अंग्रेजों ने चंद्रगिरि के राजा से मद्रास को पट्टे पर लेकर कारखाने की स्थापना की तथा कारखाने की किलेबन्दी कर उसे फोर्ट सेंट जॉर्ज का नाम दिया। फोर्ट सेन्ट जॉर्ज शीघ्र ही कोरोमण्डल समुद्र तट पर अंग्रेजी बस्तियों के मुख्यालय के रूप में मछलीपट्टनम से आगे निकल गया।

• 1651 ई. में बंगाल में सर्वप्रथम अंग्रेजों ने व्यापारिक छूट प्राप्त की। राजकुमार शुजा की अनुमति से अंग्रेजों ने बंगाल में अपनी प्रथम कोठी 1651 ई. में हुगली में स्थापित की। कम्पनी ने 1672 ई. में शाइस्ता खाँ से तथा 1680 ई. में औरंगजेब से व्यापारिक रियायतों के संबंध में फरमान प्राप्त किया। धीरे-धीरे अंग्रेजों का मुगल राजनीति में हस्तक्षेप प्रारम्भ हो गया।

• 1698 ई. में तत्कालीन बंगाल के सूबेदार अजीमुश्शान द्वारा कम्पनी ने तीन गाँव-सुतानाती, कलकत्ता एवं गोविन्दपुर की जमींदारी 12000 रुपये भुगतान कर प्राप्त कर ली। 1700 ई. तक जब चारनाक ने इसे विकसित कर कलकत्ता का रूप दिया। कलकत्ता में फोर्ट विलियम की स्थापना हुई। इसका पहला गवर्नर चार्ल्स आयर बना।

• डॉक्टर विलियम हैमिल्टन, जिसने सम्राट फर्रुखसियर को एक प्राण घातक बीमारी से निजात दिलाई थी,इस सेवा से खुश होकर 1717 ई. में सम्राट फर्रुखसियर ने ईस्ट इंडिया कम्पनी के लिए फरमान जारी किया, जिसके तहत-

- बंगाल में कम्पनी को 3000 रुपये वार्षिक देने पर नि:शुल्क व्यापार का अधिकार मिल गया।

- कम्पनी को कलकत्ता के आस-पास की भूमि किराये पर लेने का अधिकार दिया गया।

- कम्पनी द्वारा बम्बई की टकसाल से जारी किए गए सिक्कों को मुगल साम्राज्य में मान्यता प्रदान की गई।

- सूरत में 10,000 रुपये वार्षिक कर देने पर निःशुल्क व्यापार का अधिकार प्राप्त हो गया।

• फर्रुखसियर द्वारा जारी किए गए इस फरमान को कम्पनी का महाधिकार पत्र (Magna Carta) कहा जाता है।

• 1669 ई. से 1677 ई. तक बम्बई का गवर्नर रहा गोराल्ड औगियार ही वास्तव में बम्बई का महानतम संस्थापक था। 1687 ई. तक बम्बई पश्चिमी तट का प्रमुख व्यापारिक केन्द्र बना रहा। गोराल्ड औगियार ने बम्बई में किलेबन्दी के साथ ही गोदी का निर्माण करवाया तथा बम्बई नगर की स्थापना और एक न्यायालय और पुलिस दल की स्थापना की। गोराल्ड औगियार ने बम्बई के गवर्नर के रूप में यहाँ से ताँबे और चाँदी के सिक्के ढालने के लिए टकसाल की स्थापना करवाई।

• औगियार का उत्तराधिकारी रौल्ड (1677-82 ई.) बना।

• कम्पनी और उसके व्यापार की देख-रेख ‘गवर्नर-इन- काउन्सिल’ करता था।                        

भारत में फ्रांसीसियों का आगमन

• फ्रांसीसियों ने भारत में सबसे अन्त में प्रवेश किया। फ्रांस के सम्राट लुई 14वें के मंत्री कोलबर्ट के सहयोग से 1664 ई. में भारत में फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कम्पनी की स्थापना हुई। यह सरकारी आर्थिक सहायता पर निर्भर थी, इसलिए इसे सरकारी व्यापारिक कम्पनी भी कहा जाता है।

• भारत में फ्रांसीसियों की पहली कोठी फ्रेंको कैरो द्वारा सूरत में 1668 ई. में स्थापित हुई। गोलकुण्डा रियासत के सुल्तान से अधिकार पत्र प्राप्त करने के बाद फ्रांसीसियों ने अपनी दूसरी व्यापारिक कोठी की स्थापना 1669 ई. में मछलीपट्टनम में की थी।

• 1673 ई. में फ्रांस्वा मार्टिन तथा बेलागर लेस्पिन ने वलिकोण्डपुरम के मुस्लिम सूबेदार शेर खाँ लोदी से एक छोटा गाँव पुडुचेरी प्राप्त किया। पुडुचेरी में ही फ्रांसीसियों ने पांडिचेरी की नींव डाली।

• बंगाल के तत्कालीन नवाब शाइस्ता खाँ ने 1674 ई. में फ्रांसीसियों को एक जगह दी जहाँ पर 1690-92 ई. के मध्य चन्द्रनगर की सुप्रसिद्ध फ्रांसीसियों की कोठी की स्थापना हुई। पांडिचेरी के कारखाने में ही मार्टिन ने फोर्ट लुई का निर्माण कराया।

• 1742 ई. से पूर्व फ्रांसीसियों का मूल उद्देश्य व्यापारिक लाभ कमाना था, परन्तु 1742 ई. के बाद डूप्ले के पांडिचेरी का गवर्नर नियुक्त होने पर राजनीतिक लाभ, व्यापारिक लाभ से महत्वपूर्ण हो गया। डूप्ले की इस महत्वाकांक्षा ने ही भारत में फ्रांसीसियों के पतन के मार्ग को प्रशस्त किया।

डेन :

- डेनमार्क की "ईस्ट इण्डिया कम्पनी" की स्थापना 1616 ई. में हुई। इस कम्पनी ने 1620 ई. में त्रैकोवार (तमिलनाडु) तथा 1667 ई. में सेरामपुर (बंकार) में अपनी व्यापारिक फैक्ट्रियाँ स्थापित की। सेरामपुर इनका प्रमुख व्यापारिक केन्द्र था। 1845 ई. में डेन लोगों ने वाणिज्य कंपनी को अंग्रेजों को बेच दिया।

आंग्ल-फ्रांसीसी संघर्ष -

- व्यापार पर एकाधिकार और राजनीतिक नियत्रंण स्थापित करने की महत्वाकांक्षा ने ईस्ट इंडिया कम्पनी और फ्रेंच ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच तीन कर्नाटक युद्धों को जन्म दिया।

प्रथम कर्नाटक युद्ध (1746-48 ई.)

• कर्नाटक का प्रथम युद्ध यूरोप में इंग्लैंड एवं फ्रांस के बीच ऑस्ट्रिया के उत्तराधिकार को लेकर चल रहे संघर्ष का विस्तार था।

• 1746 ई. डूप्ले ने मद्रास पर अधिकार कर लिया और इसे कर्नाटक के नवाब अनवरुद्दीन को वापस लौटाने से इंकार कर दिया। परिणामस्वरूप नवाब ने फ्रांसीसियों के विरुद्ध सेना भेजी।

• डूप्ले ने इस सेना को सेंट टोमे के युद्ध की लड़ाई में पराजित कर दिया।

• कर्नाटक का प्रथम युद्ध सेंट टोमे के युद्ध के लिए प्रसिद्ध है क्योंकि यह पहला युद्ध था जो किसी भारतीय सेना और यूरोपीय सेना के बीच लड़ा गया था। इसे अडयार का युद्ध भी कहते हैं।

• नवाब की सेना और मद्रास पर विजय के बाद फ्रांसीसियों ने पांडिचेरी के दक्षिण में स्थित अंग्रेजों की बस्ती फोर्ट सेंट डेविड पर अधिकार करने का प्रयास किया। प्रत्युत्तर में अंग्रेजों ने पांडिचेरी पर घेरा डाल दिया। किन्तु दोनों ही अपने प्रयासों में विफल रहे।

• वर्ष 1748 में एक्स – ला शापेल की संधि से यूरोप में दोनों शक्तियों के मध्य समझौता होने से प्रथम कर्नाटक युद्ध भी समाप्त हो गया और मद्रास अंग्रेजों को वापस मिल गया, जिसके बदले में फ्रांसीसियों को उत्तरी अमेरिका में नए क्षेत्र मिले।

• इस युद्ध ने भारतीय युद्ध पद्धति पर यूरोपीय युद्ध पद्धति की श्रेष्ठता और नौसेना की शक्ति के महत्व को उजागर किया।

द्वितीय कर्नाटक युद्ध (1749 - 55 ई.)

• यह युद्ध भारतीयों के आपसी संघर्षों से लाभ उठाने के उद्देश्य से यूरोपीय शक्तियों में अप्रत्यक्ष रूप से हुए संघर्ष का परिणाम था।

• उस समय तीन भारतीय रियासतों में उत्तराधिकार संघर्ष चल रहा था।

- कर्नाटक में नवाब अनवरुद्दीन और भूतपूर्व नवाब दोस्द अली के दामाद चांदा साहब के बीच संघर्ष

- हैदराबाद में निजाम की मृत्यु के बाद उसके पुत्र मुजफ्फरगंज तथा अन्य दावेदार नासिरगंज के बीच संघर्ष।

- तंजौर में गद्दी के लिए मराठे संघर्षरत थे।

· अंग्रेजों ने कर्नाटक में अनवरुद्दीन का तथा हैदराबाद में नासिरजंग का साथ दिया और फ्रांसीसियो ने कर्नाटक में चांदासाहब तथा हैदराबाद में मुजफ्फरगंज का साथ दिया।

· 1749 ई. वेल्लोर के निकट अम्बर के युद्ध में अनवरुद्दीन मारा गया तथा चांदा साहब का कर्नाटक पर अधिकार हो गया और बाद में हैदराबाद पर भी फ्रांसीसी समर्थित मुजफ्फरगंज एव उसके पुत्र सलावतगंज का नियत्रंण स्थापित हो गया।

· इस प्रकार प्रारम्भिक स्तर पर फ्रांसीसियों का प्रभाव स्थापित हुआ पर कुछ ही समय बाद अनवरुद्दीन के पुत्र मुहम्मद अली ने अंग्रेजों के साथ मिलकर चांदा साहब एवं फ्रांसीसियों को हराकर कर्नाटक पर अपनी सत्ता स्थापित की, लेकिन हैदराबाद पर फ्रांसीसियों प्रभाव बना रहा।

· 1755 ई. में अंग्रेजों एवं फ्रांसीसियों के बीच पाण्डिचेरी की संधि हुई। जिसमें यह तय हुआ कि दोनों एक दूसरे के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेंगे। 

तृतीय कर्नाटक युद्ध (1756-63 ई.)

· 1756 . में यूरोप में सप्रवर्षीय युद्ध प्रारम्भ होने पर पाण्डिचेरी की संधि द्वारा स्थापित शांति समाप्त हो गई। 1757 . में बंगाल विजय से अंग्रजों को अपार धन मिला, जबकि फ्रांसीसी कम्पनी के सामने धन की कमी एक प्रमुख समस्या थी।

· 1760 में वांडिवाश के युद्ध में सर आयर कूट ने फ्रांसीसी सेना को बुरी तरह से पराजित किया और 1761 में अंग्रेजों ने फ्रांसीसी मुख्यालय पाण्डिचेरी पर अधिकार कर लिया। पांडिचेरी की किलेबंदी नष्ट कर दी गई और भारत में फ्रांसीसियों के प्रसार की संभावनाओं को नष्ट कर दिया।

· 1763 ईमें यूरोप में फ्रांसीसियों और अंग्रेजों के बीच हुई पेरिस की संधि द्वारा फ्रांसीसियों को पांडिचेरी, कराइकल, माहे एवं चन्द्र नगर वापस कर दिये गए, लेकिन वहाँ किलेबंदी पर रोक लगा दी गई।

· इसके बाद अंग्रजों और भारतीय शक्तियों के बीच संघर्ष का दौर प्रारम्भ हुआ।

ईस्ट इण्डिया कम्पनी की बंगाल विजय

· 1717 . में मुर्शीदकुली खाँ की मुगल गवर्नर के रूप में नियुक्ति हुई लेकिन उसने बंगाल मे स्वतंत्र राज्य स्थापित करने में सफलता प्राप्त की। 1740 . में अलीवर्दी खाँ बंगाल का नवाब बना और उसकी मृत्यु के बाद 1706 . में उसका पोता सिराजुद्दौला बंगाल का नवाब बना। सिराजुद्दौला के अंग्रेजों से मतभेद के कारण 1757 . में प्लासी का युद्ध हुआ।

 अंग्रेजों से मतभेद के कारण-

1. 1717 . में कम्पनी को मिले दस्तक का दुरुपयोग।

2. नवाब के अंग्रेजों को किलेबंदी रोकने के आदेश की अवहेलना।

3. सिराजुद्दौला के नवाब बनने पर जो द्वारा दरबार में पेश होने की परंपरा का उल्लंघन।

4. अंग्रेजों द्वारा नवाब के विरोधियों जैसे घसीटी बेगम, राजवल्लभ आदि के साथ मिलकर षड‌्यंत्र।

5. अंग्रेजों द्वारा नवाब के शत्रुओं को आश्रय देना।

ब्लैक हॉल दुर्घटना-

• 4 जून, 1756 को नवाब ने अंग्रेजों की कासिम बाजार कोठी पर हमला कर दिया और 20 जून तक फोर्ट विलियम पर भी कब्जा कर लिया।

• इसके बाद बंदी बनाए गए 146 अंग्रेज कैदियों को 14 फुट 10 इंच की कोठरी में बंद कर दिया गया। भयंकर गर्मी एवं दम घुटने से अगले दिन केवल 23 कैदी ही जीवित बचे।

• इसे ब्लैक हॉल दुर्घटना कहा जाता है।

अलीनगर की संधि

• रॉबर्टक्लाइव और वॉटसन के नेतृत्व में अंग्रेजों द्वारा पुन: कलकत्ता पर नियंत्रण के बाद यह संधि हुई थी। इस संधि के द्वारा अग्रेजों को व्यापारिक सुविधाएँ सिक्के ढालने और किलेबंदी का अधिकार मिले।

• युद्ध के हर्जाने के रूप में नवाब अंग्रेजों को भारी रकम दी। बदले में अंग्रेजों ने नवाब ने की सुरक्षा का आश्वसन दिया।

प्लासी का युद्ध (23 जून, 1757)

• बंगाल पर नियंत्रण स्थापित करने हेतु क्लाइव ने नवाब के सेनापति मीर जाफर, जगत सेठ, राय दुर्लभ एवं अमीचन्द के साथ मिलकर ड्यंत्र किया। जिसके तहत मीर जाफर को नवाब बनाना तय किया गया।

• 23 जून, 1757 को मुर्शिदाबाद के दक्षिण में प्लासी के मैदान में युद्ध लड़ा गया। यह औपचारिकता मात्र था। क्योंकि मीर जाफर एवं दुर्लभ राय के नेतृत्व वाले हिस्से ने युद्ध मे भाग ही  नहीं लिया।

• अंग्रेजों से बड़ी सेना के बावजूद नवाब को इस युद्ध से भागना पड़ा तथा बाद में मारा गया।

प्लासी के युद्ध के परिणाम

· इस युद्ध के बाद में ईस्ट इंडिया कंपनी के सहयोग से मीर जाफर बंगाल का नवाब बना। ईस्ट इंडिया कंपनी को अपदस्थ नवाब सिराजुद्दौला से कलकत्ता पर आक्रमण करने के मुआवज़े स्वरूप 17,700,000 रुपये भी मिले।

· कंपनी को बंगाल, बिहार और ओडिशा में उन्मुक्त व्यापार का अधिकार भी मिला। इसके अतिरिक्त कंपनी को नवाब मीर जाफर से बंगाल के 24 परगना की ज़मींदारी भी मिली। इस प्रकार रातों-रात यह कंपनी भारत में एक क्षेत्रीय शक्ति बन गई।

· फिर भी कंपनी की लालसा और अधिक धन पाने की थी, जिसको संतुष्ट करने में मीर जाफर सक्षम नहीं था। इसलिए कंपनी ने उसके दामाद मीर कासिम के साथ गुप्त समझौता कर 1760 . में मीर जाफर को सिंहासन त्यागने के लिए मजबूर कर दिया।

मीर कासिम और वेब्सिटार्ट की संधि (सितम्बर, 1760)

 मीर कासिम को नवाब बनाने हेतु कलकत्ता काउंसिल एवं मीर कासिम के बीच यह संधि हुई जिसके प्रावधान थे-

- कम्पनी को बर्दवान, मिदनपुर चटगांट के जिले देना।

- 3 वर्ष तक सिलहट के चूने के व्यापार में कम्पनी की आधी हिस्सेदारी

- मीर कासिम द्वारा कम्पनी के दक्षिण अभिया हेतु 5 लाख रुपये का राशि देना।

- कम्पनी आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगी तथा नवाब को सैनिक सहायता देगी।

- मीर कासिम कम्पनी के मित्र या शत्रु को अपना मित्र या शत्रु मानेगा।

बक्सर का युद्ध (22 अक्टूबर, 1764)

· मीर कासिम ने आशा की थी, कि कंपनी बंगाल के नवाब के रूप में उसकी संप्रभुता का सम्मान करेगी। अपनी वास्तविक शक्ति को सुनिश्चित करते हुए उसने अपनी राजधानी मुर्शिदाबाद से मुंगेर स्थानांतरित कर दी थी। उसने भारतीय व्यापारियों को अंग्रेज़ व्यापारियों के समान ही बिना किसी शुल्क अदायगी के व्यापार करने की अनुमति दे दी। यह कदम कंपनी की अपेक्षाओं के प्रतिकूल थे।

· अतः मीर कासिम और कंपनी के बीच लड़ाई आवश्यक हो गई। मीर कासिम ने अवध के नवाब शुजा-उद्-दौला और मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय, जो अवध में रह रहा था, का समर्थन प्राप्त किया। हमेशा की भाँति अंग्रेजों ने दांव-पेंच का सहारा लिया और शुजा-उद्-दौला के बहुत से अधिकारियों और अधीनस्थों को अपने पक्ष में कर लिया।

· अंत में दोनों सेनाओं के बीच 1764 ई. में बक्सर की लड़ाई हुई। इस लड़ाई में कंपनी की सेना के कमांडर हेक्टर मुनरो ने शुजा-उद्-दौला और मीर कासिम को बुरी तरह परास्त कर दिया। इस बीच मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय ने बनारस में कंपनी के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया। मीर कासिम दिल्ली भाग गया जहाँ अत्यंत निर्धनता में 1777 ई. में उसकी मृत्यु हो गई। इस प्रकार प्लासी में शुरू हुई प्रक्रिया को बक्सर की विजय ने पूर्ण कर दिया और बंगाल अंग्रेजों के अधीन गया।

· मई, 1765 में क्लाइव को युद्धोत्तर औपचारिकताओं को पूरा करने के लिए पुन: भारत के गवर्नर के रूप में भेजा गया। क्लाइव ने सर्वप्रथम नवाब शुजा-उद्-दौला के साथ एक संधि की। इस संधि के द्वारा नवाब ने इलाहाबाद और कड़ा कंपनी को सौंप दिया और लड़ाई के मुआवजे के रूप में पचास लाख रुपये देना भी स्वीकार किया।

· बाद में क्लाइव ने 12 अगस्त, 1765 को मुगल बादशाह शाह आलम-II के साथ इलाहाबाद की संधि पर हस्ताक्षर किए। इस संधि के अनुसार मुगल बादशाह को कंपनी की सुरक्षा में ले लिया गया और अवध के नवाब द्वारा दिए गए दोनों इलाके उसे सौंप दिए गए।

· पुनः, कंपनी ने बंगाल, बिहार और ओडिशा की दीवानी का स्थायी अधिकार सौंपने के बदले मुगल बादशाह को एक फरमान के अनुसार 26 लाख रुपये वार्षिक पेंशन देना स्वीकार किया।

· इलाहाबाद की संधि ने बंगाल पर नवाब की सत्ता का अंत कर वहाँ 'दोहरे शासन' की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया। इस व्यवस्था के अंतर्गत नवाब कानून और प्रशासन की देखभाल करता था, जबकि कंपनी ने राजस्व संग्रह का अधिकार अपने हाथों में रखा था। संक्षेप में, नवाब को बिना शक्ति के उत्तरदायित्व दिया गया था और कंपनी बिना किसी उत्तरदायित्व के शक्ति का आनंद ले रही थी।