ब्रिटिश साम्राज्य का विस्तार

आंग्ल - मैसूर युद्ध

आंग्ल-मराठा युद्ध
प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध (1775-1782 ई.) :-
- 1775 ई. में रघुनाथ राव और अंग्रेजों के बीच सूरत की संधि हुई। इस संधि के अनुसार रघुनाथ राव को पेशवा बनया जाना था तथा कम्पनी को सालसेट तथा बेसीन मिलने थे।
- अंग्रेज तथा रघुनाथ राव ने मिलकर अर्रा के युद्ध में पेशवा को पराजित किया। अंग्रेजों की कलकत्ता कौंसिल ने सूरत की संधि को निरस्त कर दिया। फलस्वरूप अंग्रेजों और पेशवा के मध्य 1776 ई. में पूना की संधि हुई। इसके अनुसार कम्पनी ने रघुनाथ राव का साथ छोड़ दिया।
- लेकिन अंग्रेजों और मराठों के बीच शांति स्थापित नहीं हो सकी और पेशवा की सेना ने 1778 ई. में अंग्रेजों को तेलगाँव एवं बड़गाँव में पराजित किया। 1779 ई. में बड़गाँव की संधि हुई इसके अंतर्गत अंग्रेजों को मराठों के प्रदेश वापस करने थे। लेकिन अंग्रेजों ने इसे नहीं माना और उनमें अनेक युद्ध हुए।
- 1782 ई. में महादजी सिंधिया के प्रयासों के फलस्वरूप दोनों पक्षों में सालबाई की संधि हुई और प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध समाप्त हो गया। इसके अंतर्गत सालसेट एवं एलीफैंटा अंग्रेजों को मिला तथा अंग्रेजों ने माधवराव द्वितीय को पेशवा मान लिया।
द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध (1803-1806 ई.):-
- आंग्ल-मराठा संघर्ष का दूसरा दौर फ्रांसीसी भय से प्रेरित था। लॉर्ड वेलेजली ने इससे बचने के लिए समस्त भारतीय प्रान्तों को अपने अधीन करने का निश्चय किया।
- लॉर्ड वेलेजली के मराठों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप की नीति और सहायक संधि थोपने के कारण द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध आरम्भ हुआ।
- 1802 ई. में पेशवा ने अंग्रेजों के साथ बेसिन की संधि की। जिसके अंतर्गत पेशवा ने अंग्रेजों का संरक्षण स्वीकार कर लिया। एक तरह से वह पूर्ण रूप से अंग्रेजों पर निर्भर हो गए। लेकिन अंग्रेजों को होल्कर शासकों से संघर्ष करना पड़ा।
- जसवंत राव होल्कर की पराजय के बाद 1804 ई. में होल्कर और अंग्रेजों के मध्य राजपुर घाट की संधि हुई और युद्ध समाप्त हो गया।
तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध (1817-1818 ई.) :-
- लॉर्ड हेस्टिंग्स भारत में अहस्तक्षेप की नीति का अनुसरण करने की इच्छा से आया था। लेकिन अंग्रेज़ों द्वारा पिंडारियों के दमन ने तृतीय मराठा युद्ध आरम्भ हुआ।
- तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध (1817-1818 ई.) का प्राथमिक कारण पेशवा बाजीराव-II का अपनी अधीनस्थ स्थिति से असंतुष्ट होना था। इसलिए उसने अंग्रेजों के विरुद्ध अन्य मराठा प्रमुखों को संगठित करना शुरू किया। हालाँकि, बड़ौदा का गायकवाड़ उसके पक्ष में नहीं था।
- अतः उस पर दबाव डालने के लिए पेशवा ने गायकवाड़ से अहमदाबाद क्षेत्र की मांग की। यहाँ तक कि पूना में गायकवाड़ों के दूत की भी बहुत बुरी तरह से हत्या कर दी गई। इस हत्या में पेशवा के मंत्री त्रिम्बक जी का हाथ होने की आशंका थी। इसलिए पूना में ब्रिटिश रेजीडेंट एलफिंस्टन ने गायकवाड़ों की ओर से हस्तक्षेप किया। उसने त्रिम्बक जी के आत्मसमर्पण और पेशवा के साथ एक नई सहायक संधि करने की मांग की।
- इसी प्रकार, गायकवाड़, भोंसले प्रमुख अप्पा साहेब और दौलतराव सिंधिया को अंग्रेजों के साथ नई संधियाँ करनी पड़ी। मराठा सरदारों के साथ हुए इस प्रकार के व्यवहार को पेशवा ने पसंद नहीं किया। अतः उसने अंग्रेज़ों पर आक्रमण कर दिया। इसी समय नागपुर में अप्पा साहेब भोंसले ने और इंदौर में मल्हार राव- II ने अंग्रेजों के विरुद्ध हथियार उठा लिए। अंग्रेज़ों ने शीघ्र ही इन तीनों को अलग-अलग हरा दिया और इस प्रकार तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध का अंत 1818 ई. में हो गया।
- 1818 ई. को बाजीराव-II ने सर जॉन मेल्कम के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। इसके बाद पेशवा का पद समाप्त कर दिया गया और पेशवा को विठूर भेज दिया गया। पूना पर अंग्रेजों का अधिकार स्थापित हो गया।
- मराठों के आत्मसम्मान की तुष्टि के लिए सतारा नामक एक छोटे राज्य का अंग्रेजों द्वारा निर्माण किया गया तथा इसे शिवाजी के वंशज को सौंप दिया गया तथा पेशवा के राज्य के शेष भागों को बोम्बे प्रेजीडेन्सी में मिला दिया गया।
सहायक संधि-लॉर्ड वेलेजली
- अपने साम्राज्यवादी उद्देश्यों की पूर्ति के लिए लॉर्ड वेलेजली ने एक नीति अपनाई, जो ‘सहायक संधि' कहलाई थे।
- वे भारतीय शासक, जिन्हें इस संधि को स्वीकार करने के लिए आमंत्रित किया जाता था, उनसे यह अपेक्षा की जाती थी, कि वे ब्रिटिश अनुमति के बिना किसी अन्य शक्ति से न तो लड़ाई करेंगे और न ही किसी प्रकार का संबंध रखेंगे।
- सहायक संधि स्वीकार करने वाले राज्य की आंतरिक शांति और व्यवस्था बनाए रखने के लिए ब्रिटिश जनरलों के नियंत्रण में एक ब्रिटिश सेना रखी जाती थी।
- इस सेना के खर्च को वहन करने के लिए उस राज्य को अपने क्षेत्र का एक हिस्सा कंपनी को देना पड़ता था या फिर केवल वार्षिक अनुदान देना पड़ता था। इसके बदले में कंपनी सहायक राज्यों को उनके आकार का विचार किए बिना बाह्य आक्रमणों से सुरक्षा प्रदान करती थी।
सहायक संधि स्वीकार करने वाले प्रमुख राज्य
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- हैदराबाद – 1798
- मैसूर – 1799
- अवध – 1801
- पेशवा – 1802
डलहौजी की व्यपगत नीति(Doctrine of lapse):-
- लॉर्ड डलहौजी के काल में ब्रिटिश साम्राज्य का अभूतर्पूव विस्तार हुआ। इसके साधन के रूप मे डलहौजी ने व्यपगत नीति का प्रयोग किया। इस नीति के अंतर्गत भ्रष्टाचार या कुशासन का आरोप लगाकर राज्यों को हड़प लिया गया।
- इसी नीति का एक महत्वपूर्ण भाग पतन का सिद्धान्त था जिसके अंतर्गत राज्य का स्वाभाविक या आनुवांशिक उत्तराधिकारी न होने पर, गोद निषेध द्वारा उन राज्यों को हड़प लिया गया। इसमें यह भी प्रावधान किया गया कि दत्तक पुत्र को तभी उत्तराधिकारी माना जाएगा जब ब्रिटिश सरकार उसे मान्यता दे।
- इस नीति द्वारा ब्रिटिश साम्राज्य में शामिल राज्य-
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- सतारा – 1848
- संभलपुर – 1849
- जैतपुर – 1849
- उदयपुर (MP) – 1852
- झाँसी – 1853
- नागपुर – 1854
- तंजौर - 1855
अंग्रेजों की पंजाब विजय
- अंग्रेजों के लिए पंजाब विजय उनके साम्राज्य की सीमाओं को उत्तर-पश्चिम में उसकी प्राकृतिक सीमा तक विस्तृत करने के लिए आवश्यक थी। पंजाब में महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु से राजनीतिक अव्यवस्था उत्पन्न हो गई थी।
- मेजर ब्रॉडफूट को पंजाब में लॉर्ड हार्डिंग (1844- 1848 ई.) द्वारा अंग्रेजों के राजनीतिक प्रतिनिधि के रूप में भेजा गया था, जिसने सिख कुलीनों को विभाजित करने और सिख सेना को सतलुज नदी पार करने के लिए प्रवृत्त करने हेतु हर तरह का प्रयास किया।
- 1809 ई. में अमृतसर में की गई संधि द्वारा इस नदी को ब्रिटिश और महाराजा रणजीत सिंह के राज्यक्षेत्रों के मध्य की सीमा निर्धारित कर दिया गया था। सिख सेना ने मुश्किल से नदी पार की ही थी, कि लॉर्ड हार्डिंग ने युद्ध की घोषणा कर दी। यह युद्ध प्रथम आंग्ल- सिख युद्ध (1845-1846 ई.) के नाम से जाना गया। सिखों के सेनापति तेजसिंह और अन्य सेनापतियों द्वारा की हार के साथ ही यह युद्ध समाप्त हुआ।
- अंग्रेज़ लाहौर की ओर बढ़े और शांति की शर्तों का निर्देश दिया। इसी के अनुरूप मार्च, 1846 में लाहौर की संधि पर हस्ताक्षर किए गए। इस संधि द्वारा महाराजा दलीप सिंह ने सतलुज नदी के बायीं तरफ और सतलुज व व्यास नदी के बीच के सभी क्षेत्र अंग्रेज़ों को सौंप दिए।
- युद्ध के एक बड़े मुआवजे के रूप में उसे जम्मू और कश्मीर भी सौंपना पड़ा। उसकी सेना की शक्ति बहुत कम कर दी गई। इसके अतिरिक्त लाहौर में सुरक्षा सेना के साथ एक ब्रिटिश रेजीडेंट को नियुक्त किया गया।
- 1846 ई. के शांति समझौते ने न तो अंग्रेज़ों की साम्राज्यवादी आकांक्षाओं की पूर्ति की और न ही सिखों को संतुष्ट किया। सिखों ने विशेष रूप से पंजाब के आंतरिक मामलों में अंग्रेजों के हस्तक्षेप को पसंद नहीं किया।
- लॉर्ड डलहौज़ी पंजाब को अधिगृहीत किए जाने के अवसर का इंतज़ार कर रहा था। उसको यह अवसर उस समय मिला जब गवर्नर मूलराज द्वारा 'उत्तराधिकार शुल्क' चुकाने में असमर्थता के कारण मुल्तान में विद्रोह हुआ।
- इसी बीच 20 अप्रैल,1848 ई. को दो अंग्रेज़ अधिकारियों की हत्या कर दी गई। डलहौज़ी की राय में यह ' सिख जाति का युद्ध के लिए आह्वान' था। इस प्रकार का 'विश्वास-भंग' होने पर द्वितीय आंग्ल-सिख युद्ध (1848-1849 ई.) हुआ।
- कई लड़ाइयों के बाद अंततः 12 मार्च, 1849 को सिखों ने आत्मसमर्पण कर दिया। इसके सत्रह दिनों बाद पंजाब का ब्रिटिश साम्राज्य में अधिग्रहण कर लिया गया। महाराजा दलीप सिंह को इंग्लैंड निर्वासित कर दिया गया और पेंशन दी गई। प्रसिद्ध कोहिनूर हीरा भी उससे लेकर महारानी विक्टोरिया के पास भेज दिया गया।
अंग्रेजों एवं भारतीय राज्यों के बीच हुई प्रमुख संधियाँ-
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संधि
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वर्ष
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संधिकर्ता
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अलीनगर की संधि
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9 फरवरी, 1757
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बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच। इस संधि में अंग्रेजों के प्रतिनिधि के रूप में क्लाइव और वॉटसन शामिल थे।
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अमृतसर की संधि
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28 अप्रैल, 1809
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महाराजा रणजीत सिंह और ईस्ट इण्डिया कंपनी के बीच। इस संधि के समय भारत के गवर्नर जनरल लॉर्ड मिन्टो थे जिन्होंने ईस्ट इण्डिया कंपनी की ओर से प्रतिनिधित्व किया था।
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इलाहाबाद की संधि
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1765 ई.
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क्लाइव और मुगल बादशाह शाहआलम-II के बीच।
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उदयपुर की संधि
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1818 ई.
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उदयपुर के राजा राणा और अंग्रेजों के बीच।
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गंडमक की संधि
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1879 ई.
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वायसराय लॉर्ड लिटन और अफगानिस्तान के अपदस्थ अमीर शेर अली के बीच।
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देवगाँव की संधि
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17 दिसम्बर, 1803 ई.
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रघुजी भोसले और अंग्रेजों के बीच।
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पुरंदर की संधि
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मार्च, 1776 ई.
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मराठों और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच।
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पूना की संधि
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1817 ई.
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पेशवा बाजीराव-II और अंग्रेजों के बीच।
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बड़गाँव की संधि
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1779 ई.
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मराठों और कंपनी के बीच (प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध के समय )। इस संधि पर अंग्रेजों की ओर से कर्नल काकवर्न ने हस्ताक्षर किया था।
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बनारस की संधि
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प्रथम संधि - 1773 ई.
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अवध के नवाब शुजाउद्दौला और अंग्रेज ईस्ट इण्डिया कम्पनी के बीच।
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द्वितीय संधि - 1776 ई.
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काशी नरेश चैत सिंह और ईस्ट इण्डिया कंपनी के बीच।
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बसीन की संधि
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31 दिसम्बर, 1802 ई.
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मराठा पेशवा बाजीराव-II और अंग्रेजों के बीच।
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सालबाई की संधि
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1782 ई.
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महाराजा शिन्दे और ईस्ट इण्डिया कंपनी के बीच।
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सुर्जीअर्जन गाँव की संधि
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1803 ई.
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अंग्रेजों और दौलत राव के बीच।
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